May 23, 2017

हरफनमौला पत्रकार विद्या प्रकाश


- डॉ . मुहम्मद अहमद 
अपनी बहुमुखी प्रतिभा से हिंदी जगत को ओतप्रोत करनेवाले सुख्यात पत्रकार विद्या प्रकाश अब हमारे बीच नहीं रहे | उनका विगत 13 मई 2017 को देर रात लगभग सवा दो बजे उनके पैतृक नगर जौनपुर [ उत्तर प्रदेश ] में देहांत हो गया | वे 66 वर्ष के थे | मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मछलीशहर के जमुहर गाँव के रहनेवाले श्री श्रीवास्तव जौनपुर के सिपाह में दशकों से रहते थे |वे लीवर कैंसर से पीड़ित थे और इधर कुछ दिनों से चिकुनगुनिया से ग्रसित रहे |
; कान्ति ' साप्ताहिक और मासिक से वे दो दशक से अधिक समय से जुड़े रहे और इस्लाम सहित अन्य विषयों पर लगातार लिखते रहे | उनकी मृत्यु से ' कान्ति ' परिवार को गहरा सदमा लगा है | हमारा परिवार उनके आश्रितों के प्रति गहरी समवेदना प्रकट करता है | विद्या प्रकाश जी अपने पीछे पत्नी गीता श्रीवास्तव [ एडवोकेट ] , बेटे डॉ . अनुराग और बेटी जूही को छोड़ गये हैं |
विद्या प्रकाश का पूरा नाम विद्या प्रकाश श्रीवास्तव है , लेकिन वे सदा ' विद्या प्रकाश ' नाम से लिखते रहे | उन्होंने अपने नाम के साथ कभी जातिसूचक शब्द नहीं लगाया | अपने लंबे पत्रकारिता सफर में उन्होंने दैनिक आज , दैनिक जागरण , दैनिक मान्यवर , तरुण मित्र , दिल्ली न्यूज़ आदि में कार्य किया , लेकिन उनका ' कान्ति ' से जितना लगाव था , उतना किसी संचार माध्यम से नहीं था | सही मायने में ' कान्ति ' में लेखन उनके आत्मिक संतोष का बड़ा ज़रिया था | विद्या प्रकाश जी कहीं भी कार्यरत रहे हों , मगर वे ' कान्ति ' में लिखना नहीं भूलते | प्रायः प्रत्येक सप्ताह उनके लेख हमें मिलते और हम उन्हें प्रकाशित करते | कहानी , लघुकथा , कविता से लेकर रिपोर्ताज तक लिखना उनके लिए बड़ा सहज होता | वास्तव में वे पत्रकारिता के आल राउंडर थे | 
सभी जानते हैं कि ' कान्ति ' इस्लामी पत्रकारिता में दशकों से संलग्न है | अतः हमारे के लेखादि लिखना कुछ कठिन है , लेकिन हरफनमौला [ आल राउंडर ] विद्या प्रकाश जी ऐसा लिखते कि हमें अधिक संपादन की आवश्यकता नहीं पड़ती थी | वे इस्लामी शिक्षाओं से संबंधित विषयों पर ऐसा प्रभावपूर्ण - तथ्यपरक लिखते कि सब मंत्रमुग्ध हो जाते | ऐसे में कभी मुझ पर ये आरोप भी लगे कि मैं आलेख लिखकर ' विद्या प्रकाश ' नाम [ छद्म नाम ] डाल देता हूँ | विद्या प्रकाश नाम के कोई सज्जन नहीं हैं | वे इस्लाम पर कुशलतापूर्वक लिखने के साथ अन्य विषयों पर अपनी कलम चलाते |
अभी थोड़े समय पहले उन्होंने जो लेख भेजे थे , उनमें एक लेख हिंदी भाषा विषयक था , जिसका शीर्षक है ' हिंदी भाषा में विदेशी भाषाओँ के शब्द ' | इस लेख में उन्होंने हिंदी में आये अरबी शब्दों का विशेषकर उल्लेख किया है | विद्या प्रकाश जी एक गंभीर अध्येता भी थे | उनसे मोबाइल पर अक्सर बात होती |  कम बोलते , लेकिन सधी हुई भाषा बोलते | पिछले दिनों अपने बेटे कि शादी की , तो निमंत्रण दिया | मोबाइल पर भी बात की , किन्तु व्यस्तता के चलते मैं शादी - समारोह में शामिल नहीं हो सका | विद्या प्रकाश जी से मेरी एक बार भेंट हुई थी | वह अवसर था जमाअत इस्लामी हिन्द के एक कार्यक्रम का , जिसमें सम्मिलित होने के लिए वे भी आये थे | उस समय वे 'कान्ति ' में न के बराबर लिखते थे | भेंट के दौरान मैंने उनसे लिखने का आग्रह किया , तो उन्होंने लिखने का वादा कर लिया और इस वादे को जीवन पर्यन्त निभाया भी | ऐसे लोग विरले ही मिलते हैं , वह भी आज के ज़माने में | ' कान्ति ' परिवार की ओर से उन्हें हार्दिक शोकांजलि .... उनके योगदान के प्रति हम कृतज्ञ हैं |
        

Feb 24, 2017

सुप्रीम कोर्ट पर यह कैसा आरोप ?

सुप्रीम कोर्ट पर यह कैसा आरोप ?

यह इन्तिहाई अफ़सोसनाक बात है कि दलित - भेदभाव का सवाल देश की शीर्ष न्यायपालिका तक में अब उठने लगा है | कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सीएस करणन ने सुप्रीम कोर्ट से अवमानना नोटिस जारी होने के बाद इस कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को खत लिखा है। इस खत में कहा गया है कि हाई कोर्ट के सिटिंग जस्टिस के खिलाफ कार्रवाई सुनवाई योग्य नहीं है। जस्टिस करणन ने यह भी कहा, 'मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस के रिटायरमेंट के बाद होनी चाहिए। अगर बहुत जल्दी हो तो मामले को संसद रेफर किया जाना चाहिए। इस दौरान मेरे जूडिशल और एडमिनिस्ट्रेटिव वर्क मुझे वापस दिए जाने चाहिए।' चीफ जस्टिस जगदीश सिंह खेहर की अगुआई वाले 7 जजों की बेंच पर सवाल उठाते हुए करनन ने उस पर दलित-विरोधी होने का आरोप लगाया और कहा बेंच का झुकाव सवर्णों की ओर है। दलित समुदाय से ताल्लुक रखनेवाले जस्टिस करणन ने अप्रत्यक्ष रूप से सुप्रीम कोर्ट पर दलित-विरोधी होने का आरोप लगाते हुए उनके केस को संसद भेजने के लिए कहा | उल्लेखनीय है कि कोलकाता हाई कोर्ट के जज सी. एस. करणन ने 23 जनवरी को प्रधानमंत्री को एक खुला खत लिखा था , जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री से न्यायपालिका में हाई करप्शनकी शिकायत की थी. साथ में भ्रष्ट जजों की एक लिस्ट भी दी थी | लिस्ट के 20 नामों में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों के जज थे | भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब हाई कोर्ट के सिटिंग जज को सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों की बेंच ने अवमानना नोटिस जारी किया है। पहली बार ऐसा होगा जब हाई कोर्ट के सिटिंग जज सुप्रीम कोर्ट के जजों के सामने अवमानना के मामले में पेश होंगे। जस्टिस करणन ने पहले भी सुखियों में रहने का काम किया है | नवंबर 2011 में जस्टिस करणन ने अपने चेंबर से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दलित - सम्मान के सवाल को उठाते हुए सनसनीखेज़ आरोप लगाए थे | उन्होंने कहा कि उनके साथी जज उन्हें नीचा दिखाते हैं क्योंकि वो दलित हैं | उन्होंने कहा था कि वे दो साल से इस तरह का अपमान सह रहे हैं जनवरी 2014 में ही जस्टिस करणन ने नेशनल कमीशन फॉर एस.सी./एस.टी. में मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस आर.के. अग्रवाल के खिलाफ जाति आधारित भेद-भाव का आरोप लगाया था | जस्टिस अग्रवाल तब सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश बना दिए गए थे |करणन ने इसके अलावा शिकायत का एक खत राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कानून मंत्री, गृह मंत्री के अलावा मायावती और राम विलास पासवान को भी भेजा था | जस्टिस अग्रवाल ने भी एक खत करणन के अभद्र बर्ताव के खिलाफ तब के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को लिख दिया था | फरवरी 2016 में जस्टिस करणन चर्चा में रहे जब उन्होंने अपने ट्रांसफर के खिलाफ खुद ही स्टे दे दिया | जस्टिस करणन ने जो स्टे ऑर्डर किया था, वह चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का था | करणन का तबादला मद्रास हाई कोर्ट से कलकत्ता हाई कोर्ट होना था | वे बहुत मुश्किल से कोलकाता गए थे | जून 2013 में जस्टिस करणन ने यह फैसला दे दिया था कि एक औरत और पुरुष यदि एक दूसरे से सेक्शुअल प्लेज़र के लिए संबंध बनाते हैं तो उन्हें कानूनन पति-पत्नी माना जा सकता है | इसके बाद इस फैसले और इसके नतीजों पर बहस छिड़ गई थी | वास्तव में दलित दमन और सम्मान का सवाल पुराना है | कभी यह भावना जस्टिस करणन की कोशिशों में दिखती है , तो कभी अन्य रूप में | पंडित नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ' भारत की खोज ' में दलित जाति और अछूतों पर सवाल उठाकर खुद ही जवाब दिया है | वे कहते हैं कि दलित जाति का न्य नामकरण है और एक अस्पष्ट ढंग से समाज के बिलकुल नीचे के तल की कुछ जातियों पर लागू होता है , लेकिन इनके और औरों के बीच कोई निश्चित विभाजक रेखा नहीं है | ' दलित ' शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के धातु ' दल ' से हुई है , जिसका अर्थ तोड़ना , हिस्से करना , कुचलना है | विश्व के लंबे इतिहास को देखें तो पता चलता है कि इस्लाम की शिक्षाएं दलित की भी दुखनाशक रही हैं |

Jan 17, 2017

बयान ' फ़तवा ' नहीं


किसी इमाम या धार्मिक व्यक्ति . नेता का बयान ' फ़तवा ' नहीं कहला सकता | इस्लाम में ' फ़तवा ' दारुल इफ़्ता [ धर्मादेश केंद्र ] द्वारा जारी किया जाता है , जिसमें पवित्र इस्लामी शिक्षाओं विशेषकर क़ुरआन , सुन्नत की रोशनी में मुफ़्ती हज़रात द्वारा संबंधित विषय की व्याख्या की जाती है | इसके इतर किसी धर्म नेता का बयान उसका निजी विचार / राय से अधिक कुछ नहीं होता | इस हक़ीक़त के बावजूद देश की प्रभावशाली मीडिया इस स्पष्ट अंतर को भुलाकर किसी धर्मं नेता के बयान को ' फ़तवा ' कहकर प्रचारित करके अपना उल्लू सीधा करती है , जिससे इस्लाम और मुसलमानों की छवि ख़राब होती है | अभी पिछले दिनों नोटबंदी के विरोध के सिलसिले में इमाम आल इण्डिया मजलिसे शूरा और आल इण्डिया मायनारिटी फ़ोरम के संयुक्त तत्वावधान में कोलकाता में विगत सात जनवरी को आयोजित सम्मेलन में जो बातें कही गईं , उनमें से कुछ आपत्तिजनक / निंदनीय होने के बावजूद वक्ता के विचार / उद्गार मात्र हैं , जिनका इस्लाम की शिक्षाओं से कोई ताल्लुक़ नहीं | अतः क़ानून - उल्लंघन पर सरकार को आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए | मीडिया में आई रिपोर्टों के अनुसार , इस सम्मेलन में कोलकाता की एक टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम सैयद मुहम्मद नूरूरहमान बरकाती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया कि उन्होंने नोटबंदी के जरिए लोगों को ‘ठगा’ है। जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सिर और दाढ़ी मुंडेगा उसी 25 लाख रुपए दिए जाएगा। यूट्यूब पर यह वीडियो मौजूद है | वीडियो में बरकाती के साथ टीएमसी सांसद इदरीस अली भी बैठे थे , जो बरकाती के बयान पर ताली बजाते इस वीडियो में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि जब मौलवी ने फतवा जारी किया तो टीएमसी सांसद ने तालियां बजाईं। वीडियो में पीछे एक पोस्टर लगा हुआ है, जिस पर लिखा हुआ है, ‘ममता लाओ, मोदी हटाओ, देश बचाओ’। वास्तव में यह सम्मेलन ममता बनर्जी द्वारा नोटबंदी - विरोध के आह्वान के नतीजे में किया गया था | इसमें बरकाती ने कहा, ‘ नोटबंदी से रोजाना लोग परेशान हो रहे हैं और समस्या का सामना कर रहे हैं। मोदी समाज और निर्दोष लोगों को नोटबंदी के जरिए ठग रहे हैं और कोई भी नहीं चाहता कि वह प्रधानमंत्री पद पर बने रहें। पीएम मोदी का सिर और दाढ़ी मूंडने वाले को 25 लाख रुपए दिए जाएंगे।’ साथ ही उन्होंने कहा कि लोग ममता बनर्जी को प्रधानमंत्री बनते हुए देखना चाहते हैं। इस बयान पर भाजपा के रितेश तिवारी ने पुलिस में एफ आर आई दर्ज कराई है और अपनी पार्टी की ओर से इमाम की गिरफ्तारी की मांग की है। बरकाती के बयान को ‘फतवा’ करार देते हुए भाजपा के पश्चिम बंगाल प्रभारी सिद्धार्थ नाथ सिंह ने कहा, ‘‘हमारी मांग है कि ममता बनर्जी तत्काल उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश दें। हमारे प्रधानमंत्री के खिलाफ 'फतवा' बहुत निंदनीय है। '' अभी कुछ ही समय पहले बरकाती ने बंगाल भाजपा प्रभारी दिलीप घोष को पत्थरों से मार - मारकर जान लेने की बात कही थी | इसमें दो राय नहीं कि बरकाती की भाषा अमर्यादित और अवांछनीय है , जिसकी भर्त्सना की जानी चाहिए | सभ्य समाज में इसकी गुंजाइश नहीं | इस्लामी शिक्षाओं से इनका कोई लेना - देना नहीं | इस्लाम तो संस्कार / परिष्कार का दूसरा नाम है | आश्चर्य और अफ़सोस होता है , जब इमाम जैसे पद पर बैठे लोग सदाचरण भूल जाते हैं |