Oct 17, 2012

सुकूं मुहाल है कुदरत के कारनामे में


सुकूं मुहाल है कुदरत के कारनामे में ,
सबात एक तगय्युर को है ज़माने में .
- इक़बाल
व्याख्या : प्रकृति में जड़ता नहीं ......... परिवर्तन एवं नवीकरण प्रकृति का नियम है .इसी पर ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण व्यवस्था निर्भर है . मनुष्य को ही देख लीजिए . जन्म से लेकर मृत्यु तक के विभिन्न स्तरों के परिवर्तन पर विचार कर लीजिए . वनस्पतियों को देख लीजिए . मौसमों को भी देख लीजिए . तारों को भी देख लीजिए . सभी में यही नज़र आएगा ---
आराइश -ए जमाल से फारिग़ नहीं हनूज़ ,
पेश -ए नज़र है आइना दाइम नक़ाब में .
इसी प्रकार पत्येक धर्म और उसकी संस्कृति अपने अतीत एवं अदृश्य भविष्य के बीच दबी हुई है . होता यही है कि समय के साथ सभ्यताएं और संस्कृतियाँ भी फलती - फूलती हैं ..... ज़ोर भरती हैं ..... फिर मुरझा जाती हैं एवं अंत में मर जाती हैं . अब तक के ज्ञात इतिहास में २८ प्रतिशत सभ्यताएं नष्ट हो चुकी हैं . क्या इसके लिए हम तैयार हैं ?
= डॉ. मुहम्मद अहमद

Oct 16, 2012

COMMUNAL HARMONY

COMMUNAL  HARMONY
   Today we are living in a globalized world . Globalization has brought the world closer through interconnectivity . The world is shrinking in terms of time and the distances shorter . In such a world different cultures and religions are bound to meet and influences each other . It is impossible to keep the religions or cultures in an exclusive isolation . Hence , our efforts to bring harmony among religions must take into account both the specificity and identity of each religion as also the mutual influence religions could have in our contemporary times .
             -- Dr. Muhammad Ahmad

नवजात कन्या के शव का अंतिम -संस्कार


नवजात कन्या के शव का अंतिम -संस्कार 

    कन्या भ्रूण - हत्या की बढ रही घटनाएँ चिंता का विषय बनी हुई हैं . ऐसी ही एक घटना का मैं प्रत्यक्षदर्शी रहा हूँ जो वर्षों पहले मेरे पड़ोस में घटी थी . मैं प्रातवेला [गो धूलि ] में  नमाज़ के लिये घर से निकला ही था कि सड़क पर नवजात कन्या का शव देखकर सहम उठा .  उसका गर्दन दबाकर हत्या की गयी थी . कड़ाके की ठंड थी . शीत लहर चल रही  थी . मेरे क़दम ठिठक गये . नमाज़ पदने हेतु मस्जिद जाने का इरादा त्याग दिया . एक सज्जन की मदद से उस बच्ची का अंतिम संस्कार किया  . मेरा  कवि-मन बहुत गहरे  तक  मर्माहत  हो गया . उस समय उसने इसका जो चित्रण किया था ,उसे आप सभी सम्मान्य मित्रों से शेयर करना चाहता हूँ .आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी . कविता का शीर्षक है --

जब वह पूछेगी !                                                                        

सर्दीली हवाएँ 
कंटीली -सजीली , चुभती -सी 
माँ की ममता जैसी 
प्यार -दुलार फटकार-सी 
फिर भी बंधी है उसकी मुट्ठी 
अब जिसे खोलना है 
कर्म - भूमि  के पन्ने .
पर --------
सर्दीली हवाएँ 
आज कितनी निष्ठुर हो गयीं हैं !
कहाँ गयी उसकी  ममता ?
पलटने नहीं देती
 जिंदगी के पन्ने .
कन्या थी 
पैदा होते ही 
जमा दी गयी 
बर्फ -सी बना दी गयी 
गला घोंटकर !
    --
फिर भी चल रही हैं 
सर्दीली हवाएँ 
कन्या के शव से 
टकराती हुई 
गुज़रती हुई 
अपनी ममता जगाती  हुई
सोचती है
उस दिन क्या होगा ?
क्या जवाब होगा ?
जब कन्या पूछेगी 
किस अपराध में 
बनाया गया बर्फ उसे ? 
वह बोलेगी --
अमुक था ...अमुक थी ..
य़े सर्दीली हवाएँ 
चलती ही जाती हैं 
शबनम के झरते 
आंसुओं को समेटती हुई 
कल की गवाह 
जो हैं ठहरीं .
 = डॉ. मुहम्मद अहमद  

महान ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार त्यागी




 महान ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार त्यागी 



हालाते जिस्म ,सूरते जी , और भी ख़राब
चारों तरफ़ ख़राब , यहाँ और भी ख़राब .
नज़रों में आ रहे नज़ारे बहुत बुरे 
होठों में आ रही है ज़ुबां और भी ख़राब.
पाबंद हो रही है रवायत से रोशनी 
चिमनी में घुट रहा है धुआँ और भी ख़राब .
मूरत सँवारने में बिगड़ती चली गयी 
पहले से हो गया है जहाँ और भी ख़राब .
रोशन हुई चराग़ तो आँखें नहीं रहीं 
अंधों को रोशनी का गुमाँ और भी ख़राब .
आगे निकल गए हैं घिसटते हुए क़दम
राहों में रह गए हैं निशाँ और भी ख़राब .   

दुष्यंत जी ने अपने उपन्यास ' छोटे -छोटे सवाल ' का मन्तव्य कुछ यूँ समझाया है - 
शहरों में गाँवों  में , छोटे - छोटे सवाल 
क़ल्ब पर , निगाहों में , छोटे - छोटे सवाल ,
जगह - जगह अड़ते हैं , चुभते हैं , सड़ते हैं ,
हम सबकी राहों में , छोटे - छोटे सवाल .  

माटी के शायर नज़ीर बनारसी

माटी के शायर नज़ीर बनारसी 

 नज़ीर बनारसी साहब  किसी परिचय के मुहताज नहीं . उन्हें सांप्रदायिक सौहार्द्र के प्रखर शायर के तौर पर जाना - पहचाना जाता है .वाराणसी में  लगभग २९   वर्ष पूर्व उनसे मेरी भेंट हुई थी , जब मैं पूर्व केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री राजनारायण जी  के  हिंदी सांध्य  दैनिक ' जनमुख ' में क्राइम बीट के साथ उसका साप्ताहिक साहित्यिक पृष्ठ का भी प्रभारी था . मेरे प्रयासों से नज़ीर साहब ने कई रचनायें प्रकाशनार्थ दीं , जो ' जनमुख ' में छपती रहीं . इसी बीच वाराणसी एक बार फिर सांप्रदायिक तत्वों के निशाने पर आ गया . इस बार दंगे का घातक घनत्व कुछ अधिक बढ़ा हुआ था . नज़ीर साहब के मदनपुरा   स्थित आवास में भी उपद्रवियों ने आग लगा दी , जिसके कारण एक भाग जलकर राख  हो  गया था  . मैं उनसे मिलने और कुशल - क्षेम  जानने उनके घर पहुंचा . नज़ीर साहब बहुत उदास और चिंतामग्न  दिखे , जो स्वाभाविक बात थी . मुझे देखते ही कहने लगे , ' कमबख्तों ने मुझे भी नहीं बख्शा '..... ' कभी सोचा  भी न था कि आग मेरे घर को पकड़ेगी '!!! .... ' कितनी अजीब बात है कि साम्प्रदायिकता के  ' देव ' ने मुझे भी निगल लिया '. और भी कुछ बातें कहते रहे . यह उनके उदास दिनों में यह दिन किसी स्याह रात से कम नहीं था  . बहुत कम लोग जानते होंगे कि इस घटना के बाद नज़ीर साहब कुछ बदल ज़रूर गये  थे , लेकिन  उनकी उर्दू शायरी पुराने ढर्रे पर ही चलती रही . रही बात उनकी भोजपुरी - रचनाओं की , तो बहुत कम लोगों को पता है कि भोजपुरी में भी उनकी कई स्तरीय कवितायेँ हैं . उनकी  हास्य रचनायें बहुत कम हैं . स्मारान्जलि  के रूप में उनकी एक ऐसी भोजपुरी रचना पेश है , जिसमें हास्य ,श्रृंगार  का मधुर - मिलन है - 
सुतले प तोरे नैना कअ  किस्मत जगायिला
गिर - गिरके तोरी शाख के ऊँचा उठाईला ,
हम दावं हार - हारके तोहके जिताईला .
ज़ुल्फी तोहार चूमे बदे रोज़ आईला , 
निस दिन हम अपने मुहं पे नागिन डसाइला .
मुस्काईला उहाँ प , जहाँ चोट खाईला ,
दिन रात हम शरीर कअ बोझा उठाईला ,
ढो- ढो के रोज़ जिनगी  कअ कर्जा चुकाईला .
संसार से हमार अब उबिया गयल हौ जी ,
साथी हमार जा चुकलन , हम भी जाईला .
जे दिन तू चाहअ  घाटे प  आवअ मिलै बदे , 
हम रोज़ उठ के  भोर में गंगा नहाईला .
फूलन कअ डाली -डाली  में हेरै बदे तोहें , 
मधुमास आवअला तअ बैगैचन में जाईला .
जगले पे तोहे देखै कअ   साहस नाहीं पड़त ,
सुतले  प तोरे नैना कअ किस्मत जगाईला .
        --  डॉ . मुहम्मद अहमद

मीर तक़ी ' मीर '



सैयद अमानुल्लाह मीर तक़ी ' मीर '



.

मत इसे सहल  जानो , फिरता है फलक बरसों ,

तब खाक के परदे से , इन्सान निकलते हैं .                 
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मीर क्या सादा हैं बीमार हुए जिसके सबब ,


उसी अत्तार के लड़के से दवा लेते हैं .
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पत्ता - पत्ता , बूटा - बूटा , हाल हमारा जाने है ,

जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है .
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 ' मीर ' बन्दों से काम कब निकला
मांगना है जो कुछ ख़ुदा  से मांग .
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मेरे मालिक ने हम मजबूरों पर ,
यह तोहमत है मुख्तारी की ,
चाहते हैं सो आप करे हैं 
हमको अबस बदनाम किया .
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देख तो दिल कि जां से उठता है ,
ये धुआं कहाँ से उठता है .
यूँ उठे आह उस गली से हम
जैसे कोई जहाँ से उठता है .

  

Embrace a truth




Embrace a truth


Reject a lie

When that is most gainful

Embrace a truth
When that is most harmful
Thus success will be difficult
And failure easy
Otherwise success will be
As easy as mean
Man has grown by failures
But never through mean success .
-- Robindra Nath Tagore 







पद्यानुवाद ----


परम लाभकारी हो जिस क्षण
तब असत्य को ठुकराना ,प्रबल आपदाएं संभावित हों
तब वह सच अपनाना .
इससे विजय बनेगी दुर्लभ
सुलभ आपदाएं होंगी,पौरुषहीन सफलता का
जीवन में क्या आना - जाना ?तुच्छ सफलताओं से मानव
कब ऊँचा उठ पाता है ?संघर्षों से जूझ मनुज
जग का इतिहास बनाता है .
  --
डॉ. मुहम्मद अहमद