Nov 27, 2012

प्रार्थना


                प्रार्थना 


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इधर दानव पक्षियों के झुंड 

उड़ते आ रहे हैं क्षुब्ध अम्बर में

 ,
विकट वैतरणिका के अपार तट से 


यंत्र पक्षों के विकट हुँकार से करते 



अपावन गगन तल को ,

मनुज - शोणित - मांस के ये क्षुधित दुर्दम गिद्ध .


कि महाकाल के सिंहासन स्थित हे विचारक 

शक्ति दो मुझको .


निरंतर शक्ति दो , दो कंठ में मेरे -


विकट वज्रवाणी का कठिन प्रहार 


इस विभीत्सता पर ,


बालघाती , नारीघाती इस परम कुत्सित अल्प को 


कर सकूं धिक्कार - जर्जर .


शक्ति दो ऐसी कि यह वाणी सदा स्पंदित रहे 


लज्जातुरित इतिहास के उद्देश्य में ,


उस समय भी जब रुद्ध कंठ होगा यह 


श्रृंखलित युग चुपचाप हो प्रछन्न अपने चिताभस्म स्तूप में . 

= रबीन्द्रनाथ टैगोर

Nov 19, 2012

विचारणीय विषय


आइये हम सब प्रेम - दीप जलाएं
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तमसो मा ज्योतिर्गमय ..... दीपों 

का त्योहार बस आ ही चुका है ....

 एक ऐसा त्योहार जो अंतर को

तमरहित करता है , उसमें जीवन -

 ज्योति भरता है ..... पर इसको जो

 अभीष्ट है , वांछित है , उसका कम

 ही प्रदर्शन हो पाता है ..... अमावस की रात की दीपमालिकायें हमारे

 जीवन में उत्साह - उमंग का उन्मुक्त संचार तो अब भी करती है .. दूसरी 

ओर हमारे यक्ष - क्रीड़ा के स्थान पर अक्ष - क्रीडा जैसे असामाजिक -



कर्म कुछ प्रश्न - चिन्ह अवश्य लगा जाते हैं ..... यह यक्ष - क्रीड़ा होती 

तो बात ही क्या थी आपत्ति की , लेकिन यह तो द्धूत - क्रीड़ा के रूप में 

सामने आती है ..... है ना यह विचारणीय विषय ? 

आप जानते हैं कि वैयक्तिक , पारिवारिक और सामाजिक ख़ुशी के मौके 



पर प्रकाश करने की परम्परा बहुत पुरानी है , जिसे दीपोत्सव कहा जाता


था ... राम जी द्वारा लंका - विजय के बाद घर लौटने पर देशवासियों


ने सम्पूर्ण राज्य में प्रकाश किया था , दीप प्रज्ज्वलित किये थे ..... 



इसीलिए यह दीपोत्सव अपने विशाल स्वरुप के कारण आज भी 


दीपावली ... दीवाली ..... दीपमालिका आदि के नाम से याद की जाती है 


.... आइये हम सब असत्य पर सत्य की , उच्छ्रिन्खलता पर मर्यादा की 

घृणा पर प्रेम की और हिंसा पर करुणा की विजय की स्मृति के रूप में 


घर - द्वार पर दीप जलाकर प्रेम - प्रकाश करें ..... आप सभी को अंतर 


ह्रदय से शुभ - मंगलकामनाएं


डॉ. मुहम्मद अहमद 

जिस देश में गंगा बहती है और यमुना भी

जिस देश में गंगा बहती है और यमुना भी 


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 स्वामी महेश्वरानन्द सरस्वती जी  २४ अक्तूबर २००० को उत्तर प्रदेश 

के बलरामपुर जनपद में बेलवाम्मार गाँव के समीप अपनी कुटिया में 

ब्रह्मलीन हुए थे . उस समय उनकी आयु लगभग सौ वर्ष थी . स्वामी 



जी कोई सामान्य संत नहीं थे . बल्कि यूँ कहें तो अधिक ठीक रहेगा कि



 उनके जैसे संतों की संख्या बहुत कम है . वे लोभ - लालच , मान - 



सम्मान , आडम्बर और अन्य विकारों से सदैव दूर रहे . स्वामी जी 



आदिगुरु शंकराचार्य के अनुयायी थे और परापूजा को ईश्वर - प्राप्ति का 



साधन समझते थे . उन्होंने कब पूजा की , किसी ने नहीं देखी . उनके 



प्रिय शागिर्द अब्बास अली जी बताया कि हम लोग तो उनके साथ ही 



कुटी - परिसर में रहते थे , परन्तु कभी उनको पूजा - पाठ करते देखा 



.पंजाब और हरियाणा में उनके कई शिष्य हैं , लेकिन अब्बास जी का 


परिवार ही उनके सबसे निकट था .




स्वामी जी का जन्म उतरौला [ अब बलरामपुर जनपद ] के पास एक 

गाँव में हुआ था . उनके पिताश्री ने गृहस्थ जीवन त्याग कर सन्यास 

ग्रहण कर लिया था और सनातन धर्म कि ज्ञानमार्गी शाखा से जुड़ गये . 
कुछ वर्षों के बाद लगभग २१ वर्ष की आयु में स्वामी महेश्वरानन्द जी 

भी सन्यासी हो गये और अपने पिताश्री के साथ रहने लगे . उनका मूल 

नाम जयपत्र था . जब वे सन्यासी हुए , तो उस समय मध्य प्रदेश के 

रामगढ़ में वन निरीक्षक के पद पर नियुक्त थे . सन्यासी बनते ही 

नौकरी छोड़ दी .उनका अपने सन्यासी पिताश्री का साथ सात - आठ वर्ष

 तक ही रहा . वे ब्रह्मलीन हो गये , फिर भी उन्होंने अपने पिताश्री से 

संस्कृत सीखी , वेद , उपनिषद , आरण्यक ग्रंथों और कुछ विशिष्ट 

पुराणों के साथ ही गीता , रामायण और महाभारत का अध्ययन किया .

 वे इतने स्वाध्यायी थे कि हिंदी और गुरुमुखी भाषाएँ अच्छी तरह सीख

 लीं . उर्दू और अंग्रेज़ी में तो अपने विद्यार्थी जीवन में ही निपुणता 

प्राप्त कर ली थी . सिख और इस्लाम धर्म की पुस्तकों का भी उन्होंने

 अध्ययन किया था . कुरआन का उर्दू अनुवाद वे पहले ही पढ़ चुके थे .

 इतने विशाल ज्ञान - भंडार के बावजूद वे पांडित्य - प्रदर्शन से सदैव 

बचते रहे . उन्होंने सच्चे अर्थों में सन्यास को ज्ञान - प्राप्ति का साधन 

बनाया था . वे साम्प्रदायिकता , घृणा एवं कट्टरवाद के घोर विरोधी थे 

और ऐसी ताक़तों से जीवन - भर डटकर लोहा लेते रहे .उन्होंने पूरे देश 

और तिब्बत की पैदल यात्राएं कीं और लोगों को इन्सान बनने की 

नसीहत करते रहे . अब्बास जी ने पिछले दिनों बताया कि स्वामी जी 

हमारे धार्मिक कर्म - कांड का काफ़ी खयाल रखते थे . रमज़ान के रोज़ों 

के लिए हम सबको जगाते . सहरी खाने के लिए कहते . अब्बास जी से 

जब मैंने स्वामी जी की धरोहर के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि यह
कुटिया है और फ़्रेम वाली एक फ़ोटो , जो आदि शंकराचार्य जी की है .

 अब्बास जी के बेटे वह फ़ोटो लाकर दिखाने लगे . स्वामीजी अक्सर 

कहा करते थे कि सभी के धार्मिक तौर - तरीक़ों का आदर - सम्मान 

होना चाहिए . आज स्वामीजी की कुटिया के असली वारिस अब्बास जी 

हैं .ज़ाहिर है आज के युग में सांप्रदायिक - सद्भाव की इससे बढ़कर 

मिसाल और क्या हो सकती है .... स्वामी जी को शत - शत श्रद्धांजलि 

....... [ यहाँ जो तीन फ़ोटो पोस्ट किये गये है , वे सभी स्वामीजी की 

कुटिया पर लिए गये हैं - पहले में स्वामीजी के अंतिम संस्कार को 

अंजाम देते साधुजन , दूसरे में शंकराचार्य जी का चित्र दिखाते शाकिर 

अली जी , और तीसरे में अब्बास जी , उनकी पत्नी , उनका बेटा शाकिर ]


= डा. मुहम्मद अहमद  

Nov 17, 2012

सत्कर्म तुम करते रहो


सत्कर्म तुम करते रहो

 

सत्कर्म तुम करते रहो जो कभी मिटता नहीं ,

पाषाण पर रोपा गया पौधा कभी फलता नहीं .
.
उठो , हिम्मत - हौसले से निज कर्तव्य में लग जाओ ,


कुंठा ,निराशा , हताशा को पास कभी मत लाओ .


जो है सच्चा इन्सान कभी पुरुषार्थ से डिगता नहीं ,


पाषाण पर .......


बनो पाषाण सत्य के ,ईमानदारी को अपनाओ 


दूषित वातावरण को असीम - स्वच्छता पहुँचाओ .
सुप्त अंतर्मन कभी अपने अभीष्ट को पाता नहीं ,

पाषाण पर ......


सूरज डूबता है इसलिए कि उसे है फिर उगना ,
अपमान सहकर इन्सान को सम्मान मिलता दुगना .

संकल्प से इन्सान का सोचा हुआ टलता नहीं ,

पाषाण पर ......


चींटी को देखो वह कितनी अधिक है स्वावलम्बी , 
बार - बार गिर - गिरकर भी चढ़ जाती है गगनचुंबी .

जो स्वाभिमानी है , वह दूसरों पर पलता नहीं ,

पाषाण पर .....

है राह जो सबके लिए , उस राह पर कांटे न बो ,

दो - चार दिन सुख के लिए , इंसानियत अपनी न खो .

इन्सान सच्चा वह है ,जो इन्सान को छलता नहीं ,

पाषाण पर ......


= डॉ . मुहम्मद अहमद