Dec 2, 2012

हे ईश्वर , क्षमा कर मुझे





 कमला सुरैया की


 सुप्रसिध्द कविता
   
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= डॉ . मुहम्मद अहमद 


अंग्रेज़ी एवं मलयालम की प्रख्यात लेखिका कमला सुरैया [ जन्म १९३४ - मृत्यु २१ मई २००९ ] 

के अंग्रेज़ी साहित्य [ " समर इन कलकत्ता " , "अल्फाबेट आफ लस्ट " और कुछ स्फुट

 रचनाओं ] का अध्ययन करते हुए उनकी एक कविता मुझे काफ़ी पसंद आई . यह कविता दर्शन 

- बिम्बों और प्रतीकों से जितनी परिपूर्ण है , उतनी ही मार्मिक भी है . कवियत्री की ईश्वर से 

प्रार्थना भी है . " अगोनी " शीर्षक इस कविता का जो हिंदी अनुवाद मैंने किया है , उसे आपके 

समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ -


= व्यथा = 


हे ईश्वर , 


क्षमा कर मुझे 


मेरी गुज़री मनमानी राहों के लिए -


यदि तुम्हारे होते हाथ 


सुरक्षित गोद में रहती तुम्हारी 


सदैव 


और निर्मला रखती शरीर 


हस्त - चिन्ह रहित .


--


मेरे प्रिय ,


अहो , प्रियों में प्रियतम ,


यदि तुम्हारे स्वर होते मानुष के


मेरे कानों में करते सरगोशी 


तुम्हारे सुखद शब्द .


मैं सदा नहीं रहूँगी


तूफ़ान में पर्ण सदृश 


जो फिरता है 


इधर - उधर दिशाओं में ,


चाहता निरापद स्थिरता 


सदा चाहता 


और रहता सदा दुःख में ...!!!


--


हे ईश्वर , 


क्यों आती है निशा 


दुखी हृदयों पर 


जबकि समुद्र की भांति 


विस्तृत एवं संदीप्त 


तुम विद्यमान हो ?


--


मैं नहीं जानती 


कहाँ आदि इति होता है 


और अनंत अथ ?


--


मैं नहीं जानती वह क्षण 


जब खेलने की वस्तु 


खिलाड़ी बनती है 


और तब कुछ नहीं बचता 


लेकिन खेल ......


--


मैं नहीं जानती वह क्षण 


जब एक अजनबी 


उठाता है सुरक्षित परदा


परत दर परत 


सुगमता से प्रवेश के लिए 


मेरी आत्मा के श्रृंगार - कक्ष में .


--
असीमित ,तेरा दिव्य प्रकाश


ऐसा प्रकाश 


जो द्रष्टा है 


और सर्वज्ञ है ,


दयामय एवं मृदुल है


तेरा न्याय .