Jan 27, 2013

गणतंत्र दिवस


गणतंत्र दिवस पर गण
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= डॉ . मुहम्मद अहमद 
















इस बार मैंने भी देखा वह नज़ारा
जब ' गणतंत्र ' सामने था
और पुलिसवाले उसे बचा रहे थे
ठीक दामिनी की तरह !
पीट रहे थे आम निरीह ' गण ' [ जनता ] को
इस बार कुछ अधिक था उनका दमन
दामिनी - चेतना को पीटने का
प्रशिक्षण जो प्राप्त कर लिया था
दिल्ली पुलिस ने इस बार ..
बस पथराई आँखों से देखता
यह नज़ारा .....


मैं कुछ नहीं कर सका
 अपने ' गण ' को नहीं बचा सका
 अपने ही ' तंत्र ' से     

 क्योंकि मै मजबूर हूँ
 विवश हूँ  
 मैं अपने देश का ' गण ' हूँ
लगता है ......
पुलिस - तंत्र के आगे
 गणतंत्र नहीं चलता
 बस उपलब्धि - झांकियां
 धीरे - धीरे चलती हैं ...
 मैं कहाँ आ गया हूँ ?
 जहाँ से समझ में नहीं आता
 किस तंत्र को मुबारकबाद पेश करूं ?
 मेरे परमादरणीय मित्रो ...
 मुझे बताइए 
मुझे अपना तंत्र चाहिए .

मदोन्मत्त बौद्धिक

मदोन्मत्त बौद्धिक ???!!!

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भर्तृहरि जी ने अधकचरे ज्ञान से बवराए जिन बौद्धिकों को मदान्ध हाथी की उपमा दी , उनमें से कुछ से कल 
मेरी मुलाक़ात हुई ! गणतंत्र दिवस का अवसर था , अवकाश था .... ख़ुशी का दिन था , ऊपर से हज़रत 
मुहम्मद स. के जन्मदिवस का उपलक्ष्य था , जो ख़ुशी में आशातीत बृद्धि कर रहा था , मगर यह कैसे सुहा 
सकता था उनको , जिनकी आँखों का पानी मरा हुआ है ... आख़िरकार जल्द ही इन मदान्धों ने ख़ुशी को 
काफूर कर दिया ..... इन बौद्धिकों को बधाई ज्ञानवर्धन हेतु ...... हुआ यह कि ख़ुशी के पलों को इनकी नज़र लग गयी . इसी बीच जयपुर साहित्य महोत्सव से खबर आई कि सामाजिक / राजनैतिक चिन्तक के तौर पर जाने जानेवाले आशीष नंदी ने अपने अब तक के ज्ञान की पोल खोल दी . दलित भाइयों पर अनर्गल एवं गलत आक्षेप कर डाला . कह दिया कि अधिकांश भ्रष्ट लोग ओबीसी / एससी - एसटी के होते हैं . इस पर तुर्रा यह कि बयान के लिए माफ़ी मांगने से साफ़ इन्कार ! बिलकुल मदान्धता वाली बात की सार्थक करते हुए ...... क्या हमें नहीं पता  दलित भाइयों की दुर्दशा का ? सदियाँ बीत गयीं दुर्दिन देखते -
 देखते ...... कुछ पल बीते ही थे कि मुसलमानों के त्योहार पर फ़ेसबुक को हथियार बनाकर सुनियोजित ढंग से अटैक शुरू कर दिया गया ..... हज़रत मुहम्मद स. पर ऐसे आक्षेप , मानो इस्लाम को ही जड़मूल से 
नष्ट करने की चेष्टा .... जब मैंने यह कमेन्ट किया कि यह बात तो ऋग्वेद के अमुक मंत्र और मनुस्मृति 
के अमुक श्लोकों में मौजूद है , तो इनका उल्लेख क्यों नहीं किया गया ? जब क़ुरआन में यही बात आई , तो उत्पात क्यों ? मतलब साफ़ था किसी न किसी बहाने मुसलमानों को त्योहार के मौके पर उनका दिल दुखाकर अपनी मदान्धता दिखाना और अहं की तुष्टि करना . वास्तव में किसी धर्म या समाज विशेष पर कटाक्ष करने से कुछ सकारात्मक प्राप्ति नहीं हो सकती . इससे तो समस्या उलझती और जटिल होती है , सद्भाव बिगड़ता है . निदान तो तब होता है , जब सुधार के सकारात्मक प्रयास किए जाएँ .... कभी धर्मों के हवाले दिए भी जाएँ तो तुलनात्मक , भले ढंग से ... ऐसा न लगे कि एक धर्म विशेष पर प्रहार किया जा रहा है ..... हमें यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिए कि धार्मिक प्रावधानों को तत्कालीन परिप्रेक्ष्य / सन्दर्भ में ही देखा जाए .... सभी धर्मों में ऐसी बहुत सी चीजें हैं , जिन्हें आज का सम्बंधित समाज ठुकरा चुका है . लोग सुधार की ओर बढ़ रहे हैं . उन्हें उधर बढ़ते जाना चाहिए ... यह भी एक तथ्य है कि सुधार - कार्य किसी एक के प्रयास से नहीं हो सकता . इसमें सामूहिकता लाने के लिए हम सब प्रयास करेंगे , तभी लक्ष्य की प्राप्ति संभव है .
मैं नकारात्मकता में विश्वास नहीं करता . धर्मों की अच्छाईयाँ ही मेरे सामने रहती हैं , बाक़ी को मैं क्षेपक मानता हूँ .... इसी प्रकार मैं किसी समाज / समुदाय के नकारात्मक भाव नहीं रखता . मैं मानता हूँ कि सारे इन्सान भाई - भाई हैं और इस दृष्टि से सभी समान हैं , चाहे वे स्त्री हों या पुरुष .
इन दुखद घटनाओं को देखते हुए मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि इन मदान्धों के खिलाफ़ कोई पुलिस कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए , क्योंकि इससे इनकी सस्ती लोकप्रियता में बृद्धि होती जाएगी . इन दुर्बुद्धों 

का मनोबल बढ़ेगा , जो इनसे मानव - शत्रुता के और भड़ास निकलवाएगा . अतः इनको भर्तृहरि जी के निदर्शन के अनुसार विज्ञ विद्वानों की संगति में डालना चाहिए , जहाँ इनकी आँखें कुछ खुल सकें और इनके अहंकार का निरसन हो सके . भर्तृहरि जी ने मदान्धों के अहसासों का वर्णन इस प्रकार किया है -
यदा कंचिज्ञोअहं द्विप इ व मदान्धः समभव
तदा सर्वज्ञो अस्मीत्यमवदव लिप्तं मम मनः |
यदा किंचित्किन्चिद बुधजनसकाशादवगतं
तदा मूर्खो अस्मीति ज्वर इव मदोमेव्यपगतः |
अर्थात् , '' जब मुझमें ज्ञान की कुछ यों ही ज़रा - सी झलक थी , तब मैं मदान्ध हाथी - सा हो रहा था ---- तब मुझमें अहंकार की मात्रा इतनी अधिक थी कि मैं अपने को सर्वज्ञ समझता था , परन्तु किसी अदृश्य शक्ति की प्रेरणा से जब मुझे कुछ विज्ञ विद्वानों की संगति नसीब हुई और जब मैंने प्रकृत पंडितों की कुछ पुस्तकों का मनन किया , तब मेरी आँखें खुल गयीं , तब मेरा सारा अहंकार चूर्ण हो गया . उस समय मुझे ज्ञात हुआ कि मैं तो महामूर्ख हूँ . ''
सदैव सद्भाव की बात होनी चाहिए .... देश से नफ़रत मिटे .... इसका प्रयास होना चाहिए , लेकिन मेरा मानना है कि यह कार्य किसी पर आक्षेप / प्रहार करके संभव नहीं हो सकता .... सदैव मनुष्यता के अनुकूल शिष्ट बात होनी चाहिए , मंच चाहे जो भो हो .


= डॉ . मुहम्मद अहमद 

Jan 25, 2013

FROM IGNORANCE ...

                                  FROM IGNORANCE ...
                       


= Dr . Muhammad Ahmad 
[ On the auspicious occasion of Miladun Nabi , I am posting my article on  the life of  Prophet"s Hazrat Muhammad [ Peace be upon him ] , which had  been published  in ' Radiance ' [ weekly ] on sept. 5 , 1993 ]
.
   An eminent scholar Mr . Balram Singh Parihar has , in his book ' Devdoot Aaya , Ham Pahchan Na Sake ' said - ' There is a long chain of Devdoots [ Messengers of God ] . Since the beginning , numberless prophets came to this world and worked  in specific fields in their manners . Though incarnation of God is impossible , yet time  to  time   Mahamanava  [ great man ] came on earth with His special inspiration and His special powers ' . Mr. Parihar has rightly said that only a man could be Devdoot by Grace and Mercy of God . It is the very concept of Islam .
Forgot
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   In fact the messengers of God came in every part of the world as the Holy Quran says - ' To every people [ was sent ] as Apostle ' [ 10 - 47 ] . But we should  have in mind that all prophets came with the same religion and same teachings . Unfortunately , we have forgot their teachings . Not by chance but often willingly , we preferred to fulfill own our disastrous desires . At last the Most Gracious and Merciful Allah sent His last Prophet , Hazrat Muhammad [ pubh ] to renovate and re - establish the teachings of  ' The Islam ' . The Holy Quran says -  ' Muhammad [ pbuh ] is not the father of any of your men , but he is the Apostle of God and the lasts of prophets ' [ 33 - 40 ] . It is quite possible that the Prophets were sent also to India or the region concerned . As we see , the lives of great Indian Heros must have had inspiration and spiritual teachings . But  we cannot identify them as the Prophets.  As we knows Hazrat Muhammad [ pubh ] is the true benefactor and liberator of mankind He liberated people from various  things that are harmful to mankind .. The Last Prophet [ pubh ] asked people to come forward under the banner of ' La Ilaha Illallah " [ There is no deity except Allah ] , and to accept it . It means to bear witness that the only true deity is Allah . He is the Sustainer , the Ruler of the universe and the sole Sovereign , to believe in Him in the heart , worship Him alone , ans to put His laws into practice .By this " kalima ' Hazrat Muhammad [ pubh ] united the scattered society . 
Features 
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  Here I would like to present some distinguished features of the comprehensive life of Hazrat Muhammad [ pubh ] which uplifted mankind . The life of Prophet [ pubh ] is indeed a mercy for humanity .His life is an embodiment of all the attributes , virtues and qualities found individually in all the prophets [ Allah's blessings upon them ] . In him the religious zeal of a Believer, love for Allah and humanity , steadfastness and perseverance in the path of righteousness , dauntless courage in the face of hostility , resignation and submission to the Will of the Creator together with the qualities of a statesman and sicial reformer have been beautifully blended .
  Mr . Ramkrishna Rao writes - ' There is Muhammad [ pubh ] the Prophet , There is Muhammad the Warrior , Muhammad the Businessman , Muhammad the Reformer , Muhammad the Refuse of orphans , Muhammad the Protector of slaves , Muhammad the Emancipator of women , Muhammad the Judge , Muhammad the Saint . All in all these magnificent roles , in all these departments of human activities , he is like a hero ''. [ ' Muhammad - The Prophet of Islam ' ] Realty his noble life gives one the feeling of a perfect model for humanity .
   Hence , influenced by the life and mission of Hazrat Muhammad [ pubh ] Michel H . Hart writes in his book ' The 100 ' - ' My choice of Muhammad to lead the list of the world's most influential persons may surprise some readers ans may be questioned by others , but he was the onlymen in history who was supremely successful on both the religious and secular levels'. Before attending to the concrete and detailed teachings of Hazrat Muhammad [pubh], in various aspects of life,it will be beneficial and necessary to delve into the details of the pre-Muhammad era.
Ignorance
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   Pre-Islamic arabia was in the abyss of ignorance,in a total state of 'jahaliya'. It was a country without a government. Each tribe was sovereig. There was no law except the law of jungle. Loot,arson,enslavement and murder of innocent and weal people was the order of the day. Life,property and honour were always at stake.Tribes were at daggers drawn. Ferocious was erupted on trifle provocations. Persons of one tribe had no hesitation to kill,enslave,rob are plunder people from other tribes. They had no moral,no culture and no civilization. They revelled in drinking,gambling and adultery. No one was interested in cultivation and advancement of knowledge. All the vices and evilswere deep rooted and based on the denial of one God. the only good thing the Arabs possessed was a highly developed Arabic language. 
 In that society  Hazrat Muhammad [ pubh ] was born in  Makkah in 570 A.D. He passed his youth and early manhood among the people who were totally different from him. He grew to be a handsome with a dynamic personality. He believe in justice and fair play. He would never tell a lie. He would never use obscence language. His honesty became a by word in the city and he was the sobriquet 'Al-Amin'(worthy of trust). He was embodiment of modesty. He never touched alcohol,nor ever indulged in gambling. He lived a clean,simple and refined life. His heart overflowed with human sympathy. He abhored war and violence. Hw would always seek to reconcile feuding tribes. he inspired the people to free the slaves. He helped orphans and widows. He was hospitable to the way fairer. He never harmed anyone and recommended the use of sword strictly in self-defence.
   Hazrat Muhammad [ pubh ] was always anxious about the condition of society and tried to establish a society neat and clean . He used to sit in the solitude of Hira cave near Makkah . He fasted and meditated for days and njghts . He searched for light to melt away the encircling darkness . He surrendered himself totally to Allah and prayed for His guidance . At last , Allah: grace descended on him and he was informed to be His Last Prophet . Allah sent down revelations to him through the angel Gabriel . With the guidance of Allah , Hazrat Muhammad [ pubh ] started his mission to establish the kingdom of peace and salvation on earth and sucessfully completed his mission . He changed the whole " jahiliya society -- in " islamic ' society in a short period of 23 years . 
In India
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  In our Indian society , we found many kinds of corruptions and social injustice as untouchability , inequality , non - fraternity , nepotism , casteism , exploitation, riots and murder of the innocent and pitiable condition of women etc . The first and foremost basic right to live and respect for human life . The Holy Quran lays down - ' Whosoever kills a human being [ without any reason ] likr manslaughter or corruption on earth , it is though he had killed all mankind '  [ 5 - 32 ] . Regarding the right to life and peace , the blessed Prophet [ pbuh ] declared homicide as the greatest sin only next to polytheism . This right has been given to man only by Islam . 
   Islan not only recognises absolute equality between men irrespective of any distinction of colour , race or nationality , but makes it an important and significant principle , a realty . The Almighty has laid down in the Holy Quran - ' O mankind , we have created you from a male and a female ' [ 49 - 130 ] . In other words , all human beings are brothers to one another. In his last sermon , the Prophet [ pbuh ] declared - ' No Arab has any superiority over a non - Arab , nor does a non - Arab has any superiority over an Arab . Nor does a white man have any superiority over a black man , or the black man has any superiority over the white man .Ypu are all the children od Adam , ans Adam was created from clay ' [ Baihaqi , Bazzaz]. 
Equality
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    In this manner Islam established equality for the entire human race . It strikes at the very root of all distinctions based on colour , race , caste , economic inequality , language or nationality . Islam also gives people the right to absolute and complete equality in the eyes of the law . Regarding a special case of theft the Blessed Prophet [ pubh ] said - ' Many nations before you declined , and were ultimately destroyed only because of this fatal error - When someone who was highly placed committed a crime , he was let off and when someone who was of humble stock committed the same crime , they punished him , I swear by one in whose hands my life rests that even if Fatima , my daughter , would have committed a theft , I would command that her hand be cut off ' . 
   In this Hadith we find that everyone is equal in the eyes of the law and even rulers cannot be above the law . Hazrat Muhammad [ pubh ] also tried to solve the problem of slavery by encouraging the people in different ways to set their slaves free . By the command of Prophet [ pubh ] inspired - ' In expiation of some of their sins muslims should set their slaves free ' . Hazrat Muhammad [ pubh ] himself liberated as many as 63 slaves . The number of slaves freed by Aisha was 67 , Abbas liberated 70 , Abdullah bin Umar liberated 1000 and Abdul Rahman purchased 30000 and set them free . Similarly other companions of the Prophet [ pubh ] freed a large number of slaves .
Cleanliness 
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   To remove poverty , Islam orders to give Zakat , which means purity and cleanliness . A portion set apart from wealthy person for the needy and the poor is called Zakat . After Salah [ Namaz ] , Zakat is the second important pillar of Islam . The Holy Quran says - ' Verily Allah helps one who helps him . Lo ! Allah is Strong , Almighty . Those who , if We give them power in land , establish Salah and give Zakat and enjoin virtue and forbid evil . And with Allah is the sequel of events ' [ 22 - 40 , 41 ] .
            

Jan 5, 2013

प्रारब्ध

आत्मकथ्यात्मक संस्मरण    

        प्रारब्ध

 
   प्रारब्ध को कौन टाल सकता है ? फिर जीवन के साथ मरण तो अटल सत्य है जिसका सामना प्रत्येक जीव को करना पड़ता है  . इसी  वर्ष  १३  अप्रैल  २०१२ को लगभग ७० वर्ष की आयु में मेरी माँ का निधन हो गया .कैंसर से पीड़ित थीं ,जो आज का महा मारक रोग बना हुआ है ,असाध्य और लाइलाज है .वे मेरी माँ थीं ,लेकिन ज़माना उन्हें "सौतेली माँ" कहता था . उनके जीवन में यह वास्तविकता साथ - साथ चलती थी कि उन्होंने अपने कर्म और व्यवहार में कभी भी सौतेले पन की बू तक नहीं आने दी . दरअसल वे मेरी मौसी थीं .
   प्रारब्ध कुछ ऐसा हुआ कि जब वे ११-१२ वर्ष की थीं . चेचक के प्रकोप का शिकार हो गयीं . उनकी दोनों आँखों की रोशनी चली गयी .  पूर्णतः नेत्रहीन होना उनकी जीवन -ज्योति छिन जाने जैसा था. नाना - नानी का  पहले ही संसार - त्याग हो चुका था . मामा थे ही नहीं . उनको लेकर तीन बहनें थीं . मेरी सगी माँ बहनों में सबसे बड़ी थीं .उनसे छोटी  बहन अर्थात मौसी का विवाह भी नातेदारी में ही हुआ था , जो गाँव में ही रहती थीं .
   नेत्रहीन मौसी का एकमात्र  आश्रय उनके दोनों जीजाजी [मेरे पिताजी एवं मौसाजी ] थे , लेकिन मौसाजी एक दुर्घटना में आहत हो चुके थे और कमर के अस्थि -भंग के कारण वर्षों से शय्या पर लेटे रहने को मजबूर थे . अतयव वे नेत्रहीन मौसी की कोई विशेष सहायता करने में असमर्थ थे . मेरे पिताजी  उसूलपसंद और सिद्धांत प्रिय  इन्सान थे . वे मौसी की आर्थिक सहायता करने के लिये तैयार थे ,लेकिन उनसे विवाह करने के लिये कदापि तैयार न थे .मौसी १६-१७ वर्ष की हो गयी थीं . वे मेरे यहाँ ही रहती थीं . मेरे दादाजी चाहते थे कि पिताजी विवाह के लिये राज़ी हो जाएं . उनका कहना था कि नेत्रहीन लड़की से विवाह का रिश्ता मिलना एक तरह से असंभव है . मेरे पिताजी इकलौते बेटे थे और बडे दुलारे भी . दादाजी ज़मींदार थे . पांच गाँवों क़ी अधिकांश खेती क़ी  ज़मीनें उनकी थीं . इस स्थिति में लोक -लाज का सवाल भी गंभीर बना हुआ था . 
   दादाजी , पिताजी को निरंतर समझाते रहे ,पर पिताजी राज़ी न हुये . जब दबाव बढ़ा तो घर  छोड़ कर कहीं चले गये . कुछ दिनों बाद लौटे . दादाजी ने जबरन विवाह करा दिया . यह बहुविवाह का औचित्य समझाने वाली घटना थी . मौसीजी से एक बेटी [मेरी बहन ] है , जो मुझसे मात्र सात महीने क़ी छोटी है . मौसीजी के  निधन का समाचार मिलना मेरे किसी वज्र -प्रहार से कम न था . दुःख का पहाड़ टूट पड़ा .मैं दिल्ली में था और मौसी जी पार्थिव शरीर लगभग सात सौ किलोमीटर दूर था , जहाँ पहुँचने के लिये रेल संपर्क भी अनुपलब्ध है . भीर जहाँ तक ट्रेन जाती है ,वहां तक जाने के लिये टिकेट भी अनुपलब्ध .हमारे देश में "तत्काल " भी अनुपलब्ध रहता है . सब भ्रष्टाचार ले लेता है . बहरहाल  मुझे जाना ही था . वह भी तत्काल .
      अन्य कोई वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण मुझे दिल्ली से अपनी कर से वह भी स्वयं ही ड्राइव करके जाना पड़ा . मेरा पैतृक आवास अब उत्तर प्रदेश के गोंडा जनपद के बजाय बलरामपुर जनपद के सीमांचल में हिमालय की पर्वत - वल्लारिओं और श्रृंखलाओं में  पड़ता है . मैं  गहरे रंजोगम में डूबा कार को सरपट दौड़ा रहा था . साथ में पत्नीजी भी थीं , सबसे छोटा बेटा भी था . मेरे लिये दुःख और शोक का यह वातावरण काफी  सघन था . कुछ ही अन्तराल पूर्व पिताजी ने इस संसार को अलविदा कहा था . उनके प्रस्थान के अल्प -अन्तराल में ही मेरी सगी माताश्री ने अपनी अंतिम सांसें मेरे दिल्ली स्थिति आवास पर ली थीं .
     आकाश में कुछ बादल घुमड़ रहे थे .लगता था ये मेरे लिये दुःख - उत्प्रेरक बने हुये हैं और चिढ़ाने का कोई अवसर नहीं  चूक रहे हैं . अपने प्रकृति - धर्म को निभाते हुए बरस पडे ये . रास्ता अवरुद्ध हो गया . बरेली में रुकना पड़ा . इससे पहले सबसे बड़े भाई [प्राचार्य , इंजीनियरिंग कालेज ] सेल पर बात हुई थी और उन्हें यथास्थिति से अवगत करा दिया था .मंझले भाई [प्रभारी ,महाविद्यालय कंप्यूटर विभाग ] ने बताया कि गर्मी बहुत है .अतः शव को सुरक्षित रखना कठिन है .मेरे वहां पहुँचने में वाकई विलम्ब हो रहा था .इन  भाई साहब ने अंतिम संस्कार के लिये मेरी सहमति ली और रीति- रिवाजों का पालन करते हुये बड़े भाई ने धार्मिक अनुष्ठान किया . मैं विलम्ब से पहुंचा . चारों ओर शोक ही पसरा हुआ था .सभी मर्माहत थे . बड़ों की श्रृंखला समाप्त हो गयी .इसी के साथ उनके  स्नेह और संबल का अजस्र स्रोत भी सूख गया .
     कहने को तो मेरा पैतृक वास एक गाँव में है , लेकिन पिताजी ने उसे ऐसा रूप दिया था क़ि "जंगल में मंगल " था और आज भी कुछ है  . ज़मींदारी उन्मूलन के बाद लगभग ३५ वर्षों तक वे प्रधान - सरपंच थे . इस दायित्व को उन्होंने बखूबी निभाया था .उनकी ईमानदाराना कार्यशैली की लोग आज भी चर्चा करते हैं . जब मैंने  घर में प्रवेश किया तो उनकी भी याद आने लगी .वे घर के मामलों से  हम लोगों को दूर ही रखते थे . किसी भाई से सामान्यतः कोई परामर्श तक नेहीं  करते थे . कहते थे कि जिसका जो काम है वही करे . जो लड़का पढ़  रहा है वह पढने में ध्यान दे और   जो नौकरी कर रहा  है वह अपनी नौकरी की ओर ध्यान दे . अतः हम लोगों को "घर" को समझने में बड़ी कठिनाई हुई . खाता- बही के हिसाब में ही कई दिन लग गये . जब तक मौसी जी जीवित थीं , वही जो कहती थीं वही होता था . अब स्थिति यह है कि किसी भाई को ठीक से पता ही नहीं है कि हमारी ज़मीनें कहाँ -कहाँ हैं . बस मोटा -मोटी कुछ पता हैं . लेखपाल से संपर्क करने की बात है .मुझे प्रसन्नता है पिताजी की अमूल्य पुस्तकें भी  मुझे प्राप्त हुई  हैं  जो मेरे लिये रत्न की मानिंद हैं और एक प्रकार से पिताजी का सबसे महत्वपूर्ण उपहार है .वे मेरे स्वाध्याय पर बड़ा गर्व करते थे और लोगों से कहते भी थे कि मेरा छोटा बेटा अन्य बेटों की तुलना में बौद्धिक है .
   वैसे तो माता - पिता के उपकारों  और उपहारों को गिना नहीं जा सकता एवं न ही इनसे कोई उरिण हो सकता है .फिर भी कुछ उपहार ऐसे होते हैं जो जीवन भर याद ही नहीं रहते , अपितु धरोहर बन जाते है चाहे उनका कोई भौतिक रूप  निः शेष हो  और स्थूलता न रह जाये . ऐसा ही एक और महत्वपूर्ण उपहार पिताजी ने मुझे दिया था .वह था गुलाब पुष्प -उपहार .बात कुछ यूँ है - मेरी यायावरी से रुष्ट होकर मेरे भाइयों ने  पिताजी पर दबाव बढाया कि वे संपत्ति में मुझे सहभागी न बनाएं . उन्होंने कहा कि यह असंभव है .किन्तु यह सच है कि वे भी मेरी  पत्रकारिता  से प्रसन्न नहीं थे . वे इसे पेशे के तौर पर मेरे द्वारा अपनाये जाने के पूर्णतः विरुद्ध थे . मैं शुरू से धुन का पक्का था , अतयव इन विरोधों का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा . मैं विरोध -भावों का सामना करने के लिये विवश था .इस विरोध में आर्थिक सहायता में भरपूर कटौती इस उद्देश्य व मंतव्य के साथ की गयी कि मैं यह पेशा त्याग दूं .
       मैं अक्सर यह कहा करता था और आज नही मेरी यह दृढ धारणा है कि पत्रकारिता कई पेशा नहीं है ,अपितु मानव - कल्याणार्थ रचनात्मक कृत्य है .इसे  धनार्जन का साधन बनाना ग़लत है , लेकिन इससे प्रसूत जो भी वैध प्राप्ति हो उसे लेने में संकोच नहीं करना चाहिये . इसी दृष्टिकोण के आधार पर मैने आजीविका क़ी वैकल्पिक वयवस्था प्रमाणिक रूप में  जुटाई, जिसका  क्रियान्वयन कभी  भी संभव है . पिताजी के पुष्प -उपहार क़ी तदाधिक चर्चा से समीचीन होगा कि उसकी पूर्व पीठिका पर कुछ और प्रकाश डाला जाये . पिताजी को पत्रकारिता इतनी नापसंद थी कि जब मैंने  प्रथम श्रेणी में बी . जे. एम . सी . उत्तीर्ण किया ,तब भी वे प्रसन्न नहीं हुये . यही हाल एम .जे .एम .सी . करने पर रहा . इसके बाद भी मैंने कई डिग्रियां प्राप्त कीं , लेकिन  उनसे घरवालों को अवगत नहीं कराया . मेरे  भीतर उपेक्षा - भाव पैदा हो गया था , अतः मैं सबसे कटा - कटा रहने लगा .
   अक्तूबर १९८५ की बात है . दैनिक  "आज " के वाराणसी कार्यालय से मेरा ट्रांसफर पटना हो गया था . सेवा स्थाई हो गयी थी . वेतन भी बढ गया था . पद भी मुख्य उप संपादक का हो गया . था .स्वाभाविक रूप से मुझमें  हर्ष - संचार हुआ . सोचा कि पिताजी को वर्तमान स्थिति से अवगत करा दूं . मैं उनसे मिलने बलरामपुर के निकट स्थित फार्म हॉउस  गया और अपने पद एवं वेतन से उन्हें अवगत कराया तो कुछ नरम पडे , लेकिन तपाक से बोल पडे , " जहाँ दासता की  बू आये , तो अपनी सर्विस से कोई समझौता न करना , क्यों कि आपकी नौकरी किसी व्यापारी की चाकरी जैसी है ".मैंने उन्हें विश्वास दिलाया कि मेरी पत्रकारिता सदैव मूल्यों पर आधारित  होगी और लेखनी का दमन कदापि  नहीं होगा . ऐसा हुआ भी , आज भी ऐसा है , आगे भी ऐसा ही रहेगा .
   मुझमें स्वाभिमान शुरू  से ही था . घर के लोगों से सम्बन्ध टूटा रहा . घर आना - जाना भी बंद था . बस अपनी धुन में मग्न रहा .रात -दिन सिर्फ  पदना-लिखना , ज्ञानार्जन करना , जो अब तक जारी है सिवाय डिग्रियां प्राप्त करने  के  .मेरी कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी थीं . इसी बीच मेरी "यायावरी " से रुष्ट होकर भाइयों ने पिताजी पर दबाव बढाया कि वे मुझे संपत्ति में सहभागी न बनायें . पिताजी ने कहा कि ठीक है , आप लोग भी अपने बेटों को अपनी संपत्ति में हिस्सा नहीं देंगे . इस सम्बन्ध में आप लोग लिखित दस्तावेज़ लायें . दोनों भाई सकपका गये , निरुत्तर हो गये .सन २००३ में पिताजी अचानक दिल्ली स्थित मेरे आवास पर पधारे . उनके साथ गाँव के कुछ लोग भी थे .  पिताजी मेरा निजी घर देखकर बहुत  खुश हुये . मैंने और पत्नीजी ने पिताजी की खूब आवभगत की .यहाँ चार दिनों तक ठहरे . एक दिन गमले में लगे गुलाब -पुष्पों में से एक को तोड़कर लाये और बड़े स्नेह और वात्सल्य भाव से मुझे देते हुये कहा , "यह मेरी ओर से उपहार है" इतना सुनना था कि मेरी आंखें डबडबा आयीं .आज पिताजी , माताजी ,मौसीजी हमारे बीच नहीं हैं . दोनों भाइयों से अच्छा सम्बन्ध बना हुआ है .पाँचों बहनों में चार ही जीवित हैं , जो अपने -अपने परिवारों के साथ सकुशल से हैं . इन सबसे पूर्ववत नैसर्गिक लगाव है .जब भी गाँव जाता हूँ ,सभी से मिलने की कोशिश करता हूँ .य़े सभी अब उधर के क्षेत्र में ही अधिवासित हैं .

     = डॉ . मुहम्मद अहमद 

'' दामिनी '' के साथ अंतिम सांस

'' दामिनी '' के साथ अंतिम सांस 

बहुत - सी यादों , घटनाओं 
घपले - घोटालों 
दमन - व्यथाओं 
क्रूरताओं - पीड़ाओं 
सुखद - दुखद क्षणों 
आशाओं - आकांक्षाओं 
को छोड़कर 
अपने जीवन की अंतिम 
घड़ी में है मेरा
वर्तमान वर्ष
अहा ,... अंतिम साँस के साथ तू भी
चला जाएगा ' दामिनी ' के साथ
यह याद दिलाकर कि
जीवन - संगी कोई नहीं
कोई नहीं जो साथ - साथ चल सके
कर्मागत भी आवश्यकतानुसार है
खैर , कोई बात नहीं
हम अपनी जीवन - यात्रा
ख़ुद तय कर लेंगे
नवविहान भी ख़ुद बनायेंगे
अभावों में ही सही
पीड़ाएं , अपमान
सहकर भी
क्योंकि , हम भारतीय हैं
भारत - माता की संतति हैं .
====
' दामिनी ' के निर्मम दमन ने
मुझे भी गहरे ज़ख्म दिए हैं
मानवता को शर्मसारी तक पहुँचाया है
चेतना भी इसी ने जगाई है
अमर वेलि लगाई है
इतना कुछ करके जा रहा वर्ष
नूतन वर्ष की प्रतीक्षा में
नवकाल के सम्मान में !
और आवेग भरने !
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मगर लड़ाई तो शेष है
पर किस - किससे लड़ेंगे ?
कई महाज़ हैं खुले हुए
भूखे पेट , लटकती आंतें
सूखते ओजस
तपस्वी - सा मेरा जीवन
फिर भी मैं लडूंगा ... मैं
हमें तो सभी जंगें जीतनी हैं
क्योंकि , हम भारतीय हैं
भारत - माता की संतति हैं .
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उफ़ ,.. बढ़ती महंगाई की
सरकारी सौगात !
बदली इंसानी गात
चेहरे हुए ज़र्द
तभी तो हमारे बीच
घुस आये दरिन्दे !
पहचान का एक महासंकट
आसन्न है मेरे मित्रो !
ऊपर से अपसंस्कृति की यह आंधी
जो उजाड़ चुकी है मेरे माथे का छत्र भी
भाल - मुकुट धूल - धूसरित हो चुका है
बहुत - कुछ जा चुका है ......
नैतिकता , मर्यादा
शील - शुचिता की खोज में
पूरे वर्ष भटकता रहा
दर - दर
यह जानते हुए कि
सबका पानी मर चुका है .
बस अलविदा तुम्हें !
तेरे सभी वंशजों को भी !!
उस काल को भी जो तेरी देह में बसा था !!!
अलविदा , अलविदा , अलविदा .
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मुझे तो है आगे चलना
तुझे श्रद्धांजलि देकर आगे बढ़ना
मैं ठहर सकता नहीं
क्योंकि , मैं भारतवासी हूँ
घट - घट का वासी हूँ
जीवटता की मूरत हूँ
सभ्यता की सूरत हूँ
वह दर्पण हूँ
जिसे देख
सारी दुनिया हतप्रभ है
आख़िर वह मैं ही तो हूँ
वह दर्पण
जिसे तोड़ा है मैंने बार - बार
और शीशे भी बिखेरे हैं
वह भी अपने पैरों तले !
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अभी सिये हैं जो पल छिन
आत्मदीप बनकर
पर सादगी तो देखिए मेरी
जान नहीं पाया कि
दीप में कितनी जलन है
धूप में कितनी तपन है
छांव में कितनी ठिठुरन है
मेरे मित्रो , स्नेहियो !
आप ही बताइए
मेरा जीवन तो हवन है .
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अब गवाक्ष खोल दो
समय अनक़रीब है
मानस में पले सतरंगी पंखों के सहारे
फुदकने / बिहंसने लगा है
शीतल / मलयज काल
ठिठकने लगा है --
नवागत के स्वागत में
तथ्यों के जीवन - दृश्य उतरते
अम्बर को निरखने का यह अंदाज़
सचमुच कैलाश - शिखर है --
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स्वागतम , स्वागतम , स्वागतम
नवागत तेरा !!!
अब मैं स्वामी हूँ
अतीत हुआ मेरा
भविष्य है तेरा
अब चलूँगा तेरे साथ ही
'' उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ''
आओ एक बार
फिर करें
तिमिर - प्रकाश की सवारी
सरेराह .... गंतव्य तक जाने को
वह ठिकाना भी आ जाएगा
जब इसी तरह
मैं भी दूर चला जाऊँगा
बहुत दूर
बहुरंगी शब्दों की दुनिया छोड़कर
जहाँ नये / पुराने वर्ष नहीं आते
बस काल ही काल होता है ....

= डॉ . मुहम्मद अहमद 

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