Feb 28, 2013

मिटा दे अपनी हस्ती को

मिटा दे अपनी हस्ती को
मिटा दे अपनी हस्ती को , अगर कुछ मर्तबा चाहे |
कि दाना खाक में मिलकर गुले गुलज़ार होता है ||
- अल्लामा इक़बाल
व्याख्या - ऐ जीव , यदि तू कुछ प्राप्त करने का इच्छुक है , तो अपने अस्तित्व को अर्थात अपनी अहंता को पूरी तरह मिटा दे , क्योंकि दाना [ बीज ] जब मिट्टी में पूर्ण रूप से मिल जाता अर्थात अपने आपको मिटा देता है , तभी वह पौधा बनके फलता - फूलता है . इसलिए यदि कुछ बनने की अभिलाषा है , तो स्वयं को मिटा दो अर्थात अहंता - अहंकार का त्याग कर दो . अहंकार की भावना जीव के उपार्जन को पलभर में नष्ट कर देती है .
श्रीमद भगवद गीता [ ३ / २७ ] में है - अहंकार विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते || - अर्थात जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है , वह अज्ञानी ऐसा मानता है कि मैं ही कर्ता हूँ . वह अपना ही सर्वनाश करता है . अतः अहंता - अहंकार के त्याग से ही मानव - जीवन पल्लवित होता है .
- डॉ .मुहम्मद अहमद

Feb 26, 2013

हम तेरी आशिक़ी के



हम तेरी आशिक़ी के हसीन फ़साने कहते थे ,
करते थे मुसाफ़े मगर दिल को अलग रखते थे |
- डॉ, मुहम्मद अहमद

हुस्न पैदा कीजिए ....

हुस्न  पैदा कीजिए अपने किरदार में 
सब सुनेंगे कि आप क्या कह रहे हैं |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 




Feb 24, 2013

ताकि शांति आ सके


ताकि शांति आ सके 
===========

 फिर हैदराबाद .... वीभत्सता का आलम ... चहुँओर रक्तपात  ! बहुत दुखद , घृणित , निंदनीय ..... हैवानी , बर्बर , मानवता विरुद्ध अक्षम्य कार्रवाई .... माना कि प्रकृति ने मानव को स्वयं ही हिंसक प्रवृत्ति प्रदान की है  .... निजी सुरक्षा के लिए भी यह ज़रुरी समझी गयी गयी है ..... 
इसका मतलब यह क़तई नहीं कि आतंकवाद की लपटों में हम कायरों की तरह अपने समाज को जलता हुआ और बेकसूरों का खून बहता हुआ देखते रहें .... यह भी माना कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता , पर यह मनोवृत्ति बनाता कौन है ?
मेरा यह भी मानना है कि असहिष्णुता भी आतंकवाद के मूल में होती है और हर असहिष्णु व्यक्ति संकीर्ण एवं ओछी मानसिकता में ग्रस्त होता है  , जो द्वेषपूर्ण भावना को जन्म देकर उसे आतंकवाद की ओर धकेलती है , पर उसे असहिष्णु बनाता कौन है ? ..... ऐसे और भी सवाल हैं मेरे पास , पर इनका जवाब तो चाहिए ही .....  इतना कहने से काम नहीं चलेगा कि यह एक बहुत बड़ी चुनौती है देश को , जिसका डटकर मुकाबला किया जाना चाहिए ..... बहुत हो चुका ... अब दिखावे के बयान और छद्म - कार्रवाई छोडकर आगे बढने की ज़रूरत है ..... इसके लिए दृढ  संकल्पशक्ति की प्राथमिक आवश्यकता है , तभी आतंकवादियों का दमन करके हम अपने देश में शांति ला सकते हैं .
= डॉ . मुहम्मद अहमद 

सच्ची समता के दाने बोने हैं


सच्ची समता के दाने बोने हैं
=================

= डॉ . मुहम्मद अहमद
निश्चय ही ' प्रकृति के सुकुमार कवि ' सुमित्रानंदन पन्त जी  आज अगर जीवित होते , तो कल्पनातीत रूप से प्रसन्न होते , फिर भी उनकी अजर - अमर आत्मा को अवश्य ही परम शांति प्राप्त हो रही  होगी .....   कौसानी [ अल्मोड़ा - कुमाऊं  ] में १९०० ई .में  जन्मे इस महान कवि के अरमान जो आज  पूरे और साकार होते नज़र आए . वे अपनी रचनाओं में एक नवीन , सुंदर , सुखी समाज की सृष्टि के प्रति काफ़ी आशावान थे . विश्व - बंधुत्व और भ्रातृत्व उनका मौलिक आह्वान था  . पर्वतीय सांस्कृतिक संस्था (पंजी ), द्वारा उत्तराखंड द्वितीय महाकौथिग [मेले ] 2012 में परोक्ष रूप से महाकवि के इसी ख़्वाब  की एक  ताबीर नज़र आ रही थी . मैं भी इसका एक प्रत्यक्षदर्शी  था .  उत्तराखंड के पूर्व राज्यमंत्री श्री सच्चिदानंद शर्मा जी के आमंत्रण पर मैं सपरिवार  १६ दिसम्बर २०१२ को महाकौथिग में उपस्थित हुआ .
 यह पहला अवसर था , जब मुझे बहुत निकट से उत्तराखंड की सुमधुर  लोकधुनों को सुनने  और लोककलाओं को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ .
वास्तव में  गढ़वाली -कुमाउनी युवक - युवती वैवाहिक परिचय सम्मलेन बड़ा ही लाजवाब था . इसमें भी  मुझे बड़ी भाव - विश्रब्धता और शालीनता दिखाई पड़ी .विभिन्न जातियों के लोग आते और अपने विवाहयोग्य  पुत्र / पुत्री का नाम प्रस्तावित करते .पूरा परिचय कराते ...... और इस प्रकार वर्तमान में  शादी - विवाह के दुरूह पड़ते सम्बन्ध को सुगम बनाते . इस प्रकार का चलन उत्तराखंड की धरती की विशिष्ट देन ही है . फिर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का गज़ब का दौर चला मानो उत्तराखंड की धरती ही गाज़ियाबाद [ उ . प्र . ] के स्वर्ण जयंतिपुरम पार्क , इंदिरापुरम में उतर आई हो . लोक सुर - सरिता का ऐसा प्रवाह तो देखते बनता था . इसने साफ़ और पुष्ट कर दिया कि उत्तराखण्ड की लोक - संस्कृति एवं कला  बहुत समृद्ध है. आयोजकों को बारम्बार  बधाई .......
श्री सच्चिदानंद शर्मा जी इस त्रिदिवसीय महाकौथिग [ सम्मेलन ] के अंतिम कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे . आपसे मंच पर ही भेंट हुई . आपने अति अपनत्व का परिचय देते हुए अंकमाल कर वहीं मंच पर लगे सोफ़े पर बैठाया . शर्मा जी मुझे  बिलकुल आम्रकल्पी इन्सान लगे ..... बिलकुल सौम्य , भाव - रिध्द .... ज़रा भी अहंकार , घमंड नहीं .... मिलनसार ..... आम्र सदृश .
  महाकौथिग के आयोजकों को उत्तराखंड की धरा को यहाँ अवतरित करने के लिए मैं  एक बार फिर आत्मिक धन्यवाद देता हूँ और यह आशा करता हूँ कि महाकवि पन्त जी के ख़्वाब की भरपूर ताबीर के लिए यथेष्ठ प्रयास किया जाता रहेगा . क्या ख़ूब आह्वान है महाकवि का ---- धरती को स्वर्ग बनाने का .......
इसमें सच्ची समता के दाने बोने हैं ,
इसमें जन की क्षमता के दाने बोने हैं ,
इसमें मानव ममता के दाने बोने हैं --
जिससे उगल सके फिर धुल सुनहली फ़सलें ,
मानवता की - जीवन श्रम से हंसें दिशायें !--
हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे !
[ ' अतिमा ' से ]

Feb 22, 2013

ज़रा नम हो तो यह मिट्टी बड़ी जरखेज है साक़ी

'' ज़रा नम हो तो यह मिट्टी बड़ी जरखेज है साक़ी ''



======================================================


आज़ादी के पैंसठ वर्षों के बाद भी देश को जिन जटिल , पेचीदा और शोचनीय व गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है , वे किसी भी थोड़ी सुध - बुध रखनेवाले की निगाह से छिपी नहीं हैं . साथ ही अंतर्राष्ट्रीय समस्यायों का जो अनिवार्यतः प्रभाव हमारे देश पर पड़ रहा है , वह भी सामने है . दूसरी ओर यह भी सच है कि हमारे देश में प्रचुर भौतिक और प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं . विज्ञानं , तकनीक , वित्त , वाणिज्य , व्यापार , उद्यम , कृषि और अनुसंधान में असाधारण प्रगति हुई है , यहाँ तक कि संसार के उन्नत देशों में हमारा देश भी शामिल हो गया है . इसकी दूसरी प्रमुख विशेषता इसके लोकतान्त्रिक आधारों का मज़बूत होना है . यहाँ जनता को अधिकार है कि मताधिकार का इस्तेमाल करके केंद्र और राज्य सरकारों में अपने इच्छानुसार सरकार बना सकती है . भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है . इन विशेषताओं के बावजूद हकीक़त यह भी है कि देश के करोड़ों लोग बुनियादी ज़रूरतों से महरूम हैं . देश की सम्पत्ति सिमटकर कुछ हाथों में केन्द्रित हो गयी है . एक सर्वे के अनुसार ८२०० लोगों के पास देश की ७० फ़ीसद सम्पत्ति है . संसाधनों का अन्यायपूर्ण वितरण और आर्थिक असंतुलन ने अमीरों - गरीबों के बीच की खाई कई गुना बढ़ा दी है . बहुत - से संवैधानिक सुरक्षा - प्रावधानों के बावजूद अधिसंख्य जनता भय और आतंक में ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए अभिशप्त है . असुरक्षा के बढ़ते हुए अहसास ने जन - जीवन को अत्यंत दूभर कर दिया है . साथ ही उसके नागरिक और मानवीय अधिकार बुरी तरह पामाल हो रहे हैं . सांप्रदायिक एवं फासीवादी सोच , कुप्रवृत्ति और हरकतों ने देश के सामाजिक ताने - बाने को बुरी तरह प्रभावित कर डाला है . सांप्रदायिक हिंसा और दंगे सामान्य बात बन गयी है . राजनेताओं की हालत भी बड़ी चिंताजनक और ध्यातव्य है . हर पार्टी सरकारी संपत्ति के लूटपाट में लगी हुई है . इस समय हमारा देश ख़ासकर चार बड़े खतरों और संकटों में घिरा हुआ है . इनको अपराध - व्यसनी स्वार्थपरक मानसिकता वाले लोगों एवं राजनेताओं तथा भ्रष्ट नौकरशाही ने कई गुना अधिक बढ़ा दिया है . पहली विकट समस्या है पूंजीवादी साम्राज्यवाद की , जो देश को बड़े भयावह आर्थिक संकट में डाले हुए है . पेट्रोल की क़ीमतों में बार - बार वृद्धि , ज़रूरत की चीज़ों के दामों में बेतहाशा इज़ाफ़ा , खाद्यान्न संकट और आर्थिक संस्थाओं के अघोषित दीवालियेपन ने देश की गरीब जनता की कमर तोड़कर रख दी है . गरीबी , भुखमरी , बेरोज़गारी जैसी बुनियादी समस्याएं बढ़ती ही जा रही हैं . पूंजीपतियों की लोभ - लिप्सा , दिशाविहीन आर्थिक नीतियाँ और पूंजीवादी साम्राज्यवाद इस सूरतेहाल के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार हैं . हकीक़त यह है कि देश के सभी राजनीतिक दल और उनके द्वारा गठित केन्द्रीय एवं राज्य सरकारें अंतर्राष्ट्रीय पूंजीपतियों - कारपोरेट और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की गुलाम तथा बंधक हैं ! एक ओर वर्ल्ड बैंक , डब्ल्यू , टी . ओ . , आई . एम . एफ़ . के साम्राज्यवादी एजेंडे को अमली जामा पहनाया जा रहा है , तो दूसरी ओर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को स्वदेशी कम्पनियों के मुक़ाबले बहुत अधिक रियायतें और सुविधाएं दी जा रही हैं . ठीक इसके विपरीत गरीबों को अब तक मिल रही सब्सीडी और रियायतें छीनी जा रही है . अच्छी और स्तरीय शिक्षा आम भारतीय के लिए बहुत दूर की चीज़ बनी हुई है . चिकित्सा - सुविधाएं भी सुलभ नहीं हैं ... पौष्टिक खाना देश की बहुत बड़ी आबादी को मयस्सर नहीं है .
देश को पूंजीवादी साम्राज्यवाद की आग में झोंकने का काम सत्ताधारी वर्ग और प्रतिपक्षी दोनों कमोवेश कर रहे हैं . इनके साथ ही अधिकारियों और कर्मचारियों का पूरा गिरोह रिश्वतखोरी , कामचोरी और भ्रष्टता में बेख़ौफ़ लिप्त है ! बदतरीन हालत यह भी है कि सभी बड़े सौदों और संधियों में अरबों - खरबों की धनराशि कमीशन या रिश्वत के तौर पर ली जाती है . टू जी स्पेक्ट्रम , राष्ट्रमंडल खेल घोटाला , बोफ़ोर्स ,ताबूत और हाल का हेलीकाप्टर - खरीद घोटाला आदि अनगिनत काण्ड हैं , जो देश के कर्णधारों के वास्तविक चाल - चलन को पूरी तरह उजागर कर देते हैं , केंद्र और राज्य सरकारों का भी यही हाल है .... एक छोटे - से क्लर्क के पास से करोड़ों की काली कमाई निकलती है ! सरकारी कार्यालय भ्रष्टाचार के ' जीवंत ' केंद्र बने हुए हैं . हालत इतनी बदतर है कि किसी को भी अपना काम कराने के लिए रिश्वत देने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं है , गरीबों को उनका जायज़ हक़ रिश्वत के अभाव में नहीं मिलता . देश की आज़ादी के लिए जो लड़ाई हिन्दू - मुसलमान और अन्य लोगों ने मिलकर लड़ी थी , उनमें आज दूरी पायी जाती है . सांप्रदायिक दंगों में जो लगातार वृद्धि हो रही है , वह भी दूरी और बदगुमानी का ही कुपरिणाम है . इस सूरतेहाल में सांप्रदायिक और फ़ासीवादी तथा देश - तोड़क तत्वों को अपना काम करने का लगातार ' सुअवसर ' प्राप्त होता है . ये तत्व देश की सत्ता - राजनीति पर क़ाबिज़ होना चाहते हैं और इसके लिए अंग्रेज़ों की ' फूट डालो . राज करो ' की नीति को पूरी तरह अपना रखा है . इनकी पहुँच पुलिस , प्रशासन , मीडिया और न्यायपालिका तक है , जिसके कारण देश के अल्पसंख्यक और कमज़ोर वर्गों को अपने भौतिक एवं आस्थागत अस्तित्व को बचाना बहुत कठिन हो गया है . वास्तव में नागरिक और मानवीय अधिकारों की पामाली एक बड़ी समस्या बनी हुई है . यह तथ्य अब किसी से छिपा नहीं रहा कि आतंकवाद एवं अन्य चीज़ों के नाम पर पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियां हिन्दू , मुस्लिम और अन्य नौजवानों को बेबुनियाद और मनगढ़ंत आरोपों के तहत झूठे मुक़दमों में फंसाकर जेलों में झोंक रही हैं . स्थिति यह है कि जब तक इनकी बेगुनाही अदालत में साबित होती है , तब तक ये अपनी उम्र का बड़ा हिस्सा जेलों में गुज़ार चुकते हैं . यह अन्यायपूर्ण स्थिति भी ज़रूर बदलनी चाहिए . ज़रूरत इस बात की है कि शांति प्रिय , न्याय प्रिय और देश व समाज हितैषी हर व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारी महसूस करे और देश को इन समस्याओं के हल एवं चरित्रहीन व मलिन राजनीति से देश को पाक करने के लिए आगे आए . लोकतान्त्रिक समाज में असल ताक़त जनता के पास होती है . मैं देश के न्यायप्रिय , शांतिप्रिय और विवेकशील जनों से निराश नहीं हूँ , बल्कि मेरा अहसास है कि '' ज़रा नम हो तो यह मिट्टी बड़ी जरखेज है साक़ी '' . मैं आप सभी से अपील करता हूँ कि इस विषम स्थिति को सकारात्मकता में बदलने के लिए अपना सक्रिय योगदान दें .

  
= डॉ . मुहम्मद अहमद

Feb 20, 2013

प्राणमय कर्मशक्ति


प्राणमय कर्मशक्ति 


==================
वे चिरकाल रस्सी खींचते हैं ,
पतवार थामे रहते हैं ,
वे मैदानों में बीज बोते हैं ,
पका धान काटते हैं ,
वे काम करते हैं ,
नगर और प्रान्तर में .
राजच्छ्त्र टूट जाता है ,
रण - डंका बंद हो जाता है .
विजय - स्तम्भ मूढ़ की भांति ,
अपना अर्थ भूल जाता है .
लहूलुहान हथियार धरे हथियारों के
साथ सभी लहूलुहान आँखें .
शिशु पाठ्य कहानियों में
मुंह ढांपे पड़ी रहती हैं .
वे काम करते हैं ,
देश - देशांतर में ,
अंग - बंग - कलिग में
समुद्र और नदियों के घाट - घाट में
पंजाब में , बम्बई में , गुजरात में .
उनके गुरु - गर्जन और गुण - गुण स्वर
दिन - रात में गुंथे रहकर
दिनयात्रा को मुखरित किये रहते हैं .
मुद्रित कर डालते हैं
जीवन के महामंत्र की ध्वनि को
सौ - सौ साम्राज्यों के भग्नावशेष पर .
वे काम किये जा रहे हैं .
= रबीन्द्रनाथ टैगोर

Feb 17, 2013

सूखी नदी का चिन्तन - 1

सूखी नदी का चिन्तन - 1

==============




आज फिर उसी तिराहे पर खड़ा हूँ 

जहाँ से जीवन शुरू हुआ 

जहाँ पला - बढ़ा 

धूप की प्रचंडता देखी

शीतल समीर के साथ 

छांव में लिपटी 


कुहासे की चादर ओढ़े 


सोयी रहती थी वह 


मेरा जीवन , मेरी लय , मेरी गति थी .... . ...


वह जीवनदायिनी !


-----


एक नदी थी 


जो नवगजवा से बहती थी 


अभी तो अर्द्ध शती 


भी नहीं बीती !!


कहाँ है वह ?


कहाँ है उसकी निर्मल धारा


जो थी सबका सहारा


जानता हूँ 


अब तू नहीं बहती 


तेरा पानी जम चुका है 


ऊपर से सड़ांध 


नाले में तब्दील होकर भी 


तेरा यह हाल है !?


और तेरी भवितव्य 


संतति का ???


-------


वह नदी थी जो 


सुखद 


स्मृति - बोध कराती है 


कहाँ है वह 


अपनी थाती ?


जिस पर सवार होता था मैं 


बालमन के सपने बुनता था !


--------------

.क्या य़े गीली लकड़ियाँ हैं 

नाले का परवर्ती रूप ?

आज कुछ ऐसी ही 


कल्पना के सहारे खड़ा हूँ !


और य़े लकड़ियाँ .....


सुलगती हुई 


मेरे विचारों की तरह ,


बौनी पड़ती .


शायद इनका भी पानी मरने वाला है ? !


-----------


इन घनेरे वृक्षों की छांव 


जहाँ अब पथिक नहीं 


रेतीले भहराए तट हैं .....


दूर -दूर तक 

...
नदी के कंकाल को 


मैं साफ़- साफ़ देख रहा हूँ


नीर नहीं .... समीर नहीं 


दोनों काले / ज़र्द पड़ गए हैं !


अस्थि भी ऐसी नही कि


अंतिम संस्कार हो !


बस त्राहिमाम , बस त्राहिमाम 


औपचारिकता निभा लेता हूँ 


उसके साथ ..

.
जो समय के साथ सूख गयी ....


उन विचारों की तरह


जो सदक्रांति लाते थे !!!


- डॉ .मुहम्मद अहमद




Feb 10, 2013

भाषाबलं शस्त्रबलान्महौजः स्वराज्य लाभाय च रक्षितुम तत |
शस्त्रं शरीरं वशमाकरोति मनोवनं हस्तयते च भाषा| 


[ श्यामवर्ण द्विवेदी , ' विशालभारतम ' , गोरखपुर , १९६७ ]

 अर्थात , शस्त्र बल से भाषा का बल बढ़कर है | स्वराज्यप्राप्ति और उसे बचाए रखने  के लिए        [ भाषाबल की ज़रूरत है | ] शस्त्र से देह को वश   में किया जा सकता है , जबकि भाषा से मन पर क़ब्ज़ा होता है |

Feb 3, 2013

Indian Disparity

भारत दुर्दशा 

===========



हिंदी गद्य के पुरोधा , महान रचनाकार भारतेंदु हरिश्चंद की पद्य कृति  '' भारत दुर्दशा  '' से एक अंश --

 '' रचि बहु विधि के वाक्य पुरातन मांहि घुसाए ,
   सैव , सावत , वैष्णव अनेक मत प्रकति चलाये !
   जाती अनेकन करी , नीच अरु ऊंच बनायो ,
   खान - पान संबंध सबन सों बरजि छुड़ायो !
   जन्म पत्र बिन मिले ब्याह नहीं होन देत अब ,
   बालकपन में ब्याहि प्रीति , बल नस कियो सब !
   करि कुलीन के बहुत ब्याह बलबीरजु मारयो ,
   विधवा ब्याह निषेध कियो , बिभिचार प्रचारयो !
   रोकि विलायत - गमन कूप - मण्डूक बनायो ,
    औरन को संसर्ग छुड़ाइ प्रचार घटायो ! ''  
  

अब कहाँ ऐसी पत्रकारिता ?

 अब कहाँ है ऐसी पत्रकारिता ?
==========================


खल गनन सों सज्जन दुखी मति होहिं हरिपद मति रहे |
अपधर्म छूटै सत्य निज भारत गहै कर दुःख बहै |
बुध तजहिं मत्सर नारिनर सम होंहि जब आनन्द लहैं |
तजि ग्राम कविता सुकवि जन की अमृत बानी सब कहैं |
                                - भारतेन्दु हरिश्चंद       

1868 ई . में जब आपने ' कवि वचन सुधा ' का प्रकाशन शुरू किया | तब  यह मासिक था . बाद में गद्य की आवश्यकता समझ इसे पाक्षिक और फिर साप्ताहिक कर दिया गया | इस पत्र का सिद्धांत - वाक्य उपर्युक्त पंक्तियाँ थीं |