Mar 31, 2013

उम्रदराजी पाते ही उन्हें देखा


शजर के पत्तों की देखी थी बेऐब रंगत एक दिन
उम्रदराजी पाते ही उन्हें देखा इन्सां होना !
 --  डॉ . मुहम्मद अहमद                               
[ वृक्षों / पौधों  से जब नव पल्लवन होता है , तब नए पत्ते निर्मल और दोषमुक्त होते हैं , पर जैसे - जैसे उनकी आयु बढ़ती जाती है दोष आने लगते हैं ,रंग परिवर्तित होने लगता है मानव - जीवन की भांति] 

Mar 24, 2013

जलाओ होलियाँ लेकिन बचाना देश भारत को

आप सभी को होली की पुरखुलूस मुबारकबाद



फिर होली सामने है .... यह मन को मस्त और आँखों को बावरा बनाने का त्योहार  ही नहीं , मानवता , दया तथा सार्वभौम प्रेम की सीख देनेवाला त्योहार है . यह लोगों के दिलों में स्नेह - सौजन्य , सौमनस्यता एवं नवोत्साह का मनोवान्क्षाओं और अरमानों को संजोने वाला विविध मनमोहक रंग घोलने का त्योहार है ..... यह वृक्षों और पौधों में नई - नई  कोंपलें फूटने के अवसर पर आया वासन्तिक पर्व ही नहीं , जीवन में नवोत्साह भरने का भी अवसर है ....  दरअसल यह प्रेम और भाईचारे का त्योहार है ..... यह दिलों को तोड़ने नहीं जोड़ने का पर्व है ....  इन्सान की आंतरिक और  सब प्रकार की सामाजिक बुराइयों के दहन का अवसर है . कहा भी गया है -
 होलास्ति समतापर्वस्ताद्दिनेऽन्योन्यस्य वै ।
असमता ऽ सुरत्वस्य दाहः कार्यो होलिकावत्॥ ----- अर्थात , होली समता का त्योहार है . इस दिन निश्चय ही आपस की असमतारूपी असुरता का होली की तरह दाह करना चाहिए. 
  अब एक और महत्वपूर्ण पक्ष पर आते हैं . मैं अक्सर देखता हूँ कि हमारे बहुत - से बल्कि बड़ी संख्या में दीन - दुखी जन होली के दिन भी दूसरों के आगे हाथ फ़ैलाने की स्थिति में होते हैं . यह बड़ी दुखद और चिंताजनक स्थिति है . यह पर्व आम आदमी की पीड़ा को भी महसूस करने और उन्हें हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराने की भी शिक्षा देता है . इस पीड़ा को वरिष्ठ कवि शंकर दीक्षित ने ये शब्द दिए हैं -
होलिका से ज़्यादा दर्द भोग रहा है आदमी 
भंग की तरंग न उमंग न ठिठोली है 
प्यारी - प्यारी धन्नो जी की चूनरी है तार - तार 
गोरी रसबोरी कहाँ 
प्रीति भी अबोली है .
कहाँ से लाएं गुलाल भरपूरे दाम नहीं 
कैसी मजबूरी यार राख भरी झोली है 
चेहरों का उड़ा रंग 
पोर - पोर सर्पदंश
कैसे उत्सव फूटे भैया 
फीकी - फीकी होली है . 
यह स्थिति बदलने के लिए हमें आगे आना चाहिए . कहा भी गया है - निन्दितं चार्थिकं लोके विषमत्वमसङ्गतम् । प्राप्तव्यो निखिलैस्तत्र चावसरस्तुल्योचतः॥ अर्थात , संसार में आर्थिक विषमता, असंगत और निन्दित है .इस जगती-तल में सभी को (चाहे गरीब हो या अमीर) समान एवं उचित अवसर मिलना ही चाहिए . 
यह पर्व आत्मसम्मान और परम संकल्प की भी शिक्षा देता है . अवधी के महान हास्य कवि रमई काका [ चन्द्रभूषण त्रिवेदी जी ] ने ठीक ही लिखा है -
पड़े जो दाग चेहरों पर छुटा साबुन से डालेंगे 
 दिलों में दाग जितने हैं उन्हें कैसे छुड़ाएंगे ? 
जलाओ होलियाँ लेकिन बचाना देश भारत को 
अगर प्रह्लाद जल जाएगा कैसे मुंह दिखाएंगे ?
इस शुभावसर पर आप सभी को स्नेहपूर्ण हार्दिक शुभकामनाएँ एवं अनेकानेक बधाइयाँ .......

हर कोई निकला अपने शिकार में


'' हर कोई निकला अपने शिकार में ''

केंद्र की यूपीए सरकार एक बार फिर सांसत में है . तमिलों के मुद्दे पर डीएमके द्वारा सरकार को दिए जा रहे समर्थन की वापसी से यह सामयिक संकट आया है , लेकिन इसे बहुत गंभीरता से इसलिए नहीं लिया जाना चाहिए , क्योंकि केंद्र सरकार के पास अन्य विकल्प मौजूद हैं . ख़ुद वित्तमंत्री पी . चिदंबरम डीएमके के समर्थन के प्रति आशान्वित हैं और डीएमके भी सरकार गिराने के मूड में नही है . संयुक्तराष्ट्र मानवाधिकार केंद्र  की बैठक में तमिलों के खिलाफ़ हिंसा की स्वतंत्र जाँच की मांग के अमेरिकी प्रस्ताव की भाषा को हलका बनाने पर केंद्र सरकार से नाराज़ होकर और विधिवत जाँच का प्रस्ताव लाने की मांग को लेकर पिछले १९ मार्च को डीएमके ने समर्थन वापस ले लिया था . इस पर केंद्र सरकार के संकटमोचक बने पी. चिदंबरम ने यहां तक कह दिया कि हाल के कुछ दिनों में ऐसा क्या हुआ कि द्रमुक को यह फैसला लेना पड़ा . वित्तमंत्री ने  सरकार का रुख़ साफ़ करते हुए कहा कि यूएनएचआरसी को कठोर प्रस्ताव पारित करना चाहिए , जो श्रीलंका को कड़ा संदेश देगा और उसे स्वतंत्र एवं भरोसेमंद जाँच स्वीकार करने को प्रेरित करेगा . 
श्रीलंका के खिलाफ़ प्रस्ताव भी मानवाधिकार केंद्र में पारित हो गया , पर डीएमके की नरमी बहुत देर तक नहीं टिक पाई . डीएमके प्रमुख एम . करुणानिधि के बेटे एमके स्टालिन के घर समेत १९ स्थानों पर सीबीआई के छापों ने माहौल को फिर गरमा दिया . जबकि डीएमके ने छापों को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया है , जिसके जवाब में प्रधानमंत्री डॉ . मनमोहन सिंह को यह कहना पड़ा कि सरकार का इसकार्रवाई  से कोई लेना - देना नहीं है और वे इस घटना से खिन्न हैं . कुछ राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि यह केंद्र सरकार की दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई है .  बाबा रामदेव के ख़िलाफ़ भी इस अचूक अस्त्र का इस्तेमाल किया गया था . छापों के यह कार्रवाई दबाव की रणनीति है ताकि डीएमके केंद्र सरकार का दामन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से थामे रहे . बताया जाता है कि यह कार्रवाई उस वक्त अनिवार्य हो गयी थी  , जब मुलायम सिंह यादव को बयानबाज़ी के पुराने खिलाड़ी और पुराने सोशलिस्ट बेनी प्रसाद वर्मा ने बुरी तरह बिफरा दिया .
 केन्द्रीय इस्पात मंत्री  वर्मा ने मुलायम सिंह पर आरोप लगा दिया कि वे केंद्र को समर्थन देने के लिए रक़म लेते हैं . इस आरोप पर मुलायम सिंह तिलमिलाये हुए थे . जब कांग्रेस ने समर्थन माँगा , तो रख दी वर्माजी को मंत्रिमंडल से हटाने की मांग .... कांग्रेस आला कमान के कहने पर वर्मा जी ने खेद तो प्रकट कर दिया , पर इससे भी मुलायम जी कठोर ही बने हुए हैं . सोनिया गाँधी ने उन्हें मनाया भी , मगर उनकी अस्ल मंशा तो किसी जुगाड़ से प्रधानमंत्री बनने की है , जिसका इज़हार वे कई बार कर चुके हैं . वैसे हर राजनेता की  ' अंतिम ' इच्छा यही होती भी है . हाँ , यह बात भी अपनी जगह सही है कि जब चुनाव नज़दीक हों , तो फ़ितरी तौर पर यह उत्कंठा अधिक बढ़ जाती है . इसलिए भी हर पार्टी की हर हरकत चुनावी नफ़ा - नुक़सान के मद्देनजर होती है . करुणानिधि भी इसी फेर में हैं . तमिलनाडु में उनकी पार्टी में पहले जैसी कशिश बाक़ी नहीं रही . तमिलों का मुद्दा उछालने के पीछे चुनाव में कुछ उछलने के जुगाड़ के तौर पर देखा जाता है और  छापेमारी को  इसका एक  प्रभावी प्रतिकार ! दरहकीक़त हर राजनितिक पार्टी को अपनी पड़ी है .  इस स्थिति में जैसाकि आप जानते हैं कि केंद्र सरकार बैसाखी पर है और उसकी स्थिति तराज़ू में मेढक तौलने जैसी बनी हुई है . इस मार्मिक राज़ से सभी वाकिफ़ हैं . इसे इस मिसाल से भी समझा जा सकता है  - डीएमके की मांगों पर जब गौर किया जा रहा था , राष्ट्रवादी कांग्रेस ने उन पर ऐतिराज़ किया , अंतत: सरकार अल्पमत में आने के बाद बाहरी समर्थन के भरोसे रह गई . यहाँ नैतिकता का कोई सवाल नहीं है . सवाल जुगाड़बाज़ी और राजनैतिक दिखावे एवं दांवपेंच का है . 
सही पोजीशन यह है कि कोई भी दल आज कांग्रेस को नैतिकता या कथित आदर्शों  के चलते सहयोग नहीं कर रहा है . बाहर से समर्थन दे रहे सपा-बसपा के लिए तो और भी डर का मसला है . मुलायम और मायावती सबके चहेते हैं |इसी कारण केंद्र के एक मंत्री इन दोनों पार्टियों के नेताओं को सार्वजनिक रूप से काफी कुछ कह गए , पर प्रतिक्रिया कहाँ हुई ? जब तक सरकार की मजबूती दिखी सपा भी संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ के खेद से संतुष्ट हो गई मानो कुछ हुआ ही नहीं ! पर जैसे ही हवा बदली बेनी बाबू को माफी मांगनी पड़ी . यह तो सियासत है , वह भी हिन्दुस्तानी ! इसे देखते हुए  डीएमके का  मुख्य मसला तमिल प्रेम का भी नहीं है . मुख्य बात तो चुनाव पास देखकर संप्रग से बाहर आना ही है क्योंकि उसे उसके साथ होने का कोई लाभ नहीं दीखता . हां , कुछ घाटे की जरूर आशंका है .  फिर तमिल मसला उठाकर राज्य की राजनीति में वापसी करने का मौका जो  मिल गया है , उसे कौन गंवाना चाहेगा ?  डीएमके का दांव इसी ओर है .  पिछले विधानसभा चुनाव में जिस तरह उसकी धुनाई हुई थी उसमें इस भावनात्मक मुद्दे के सहारे वापसी न भी हो तो स्थिति को सुधारा तो जा ही सकता है . एक और मुद्दा है कांग्रेस से पुराना हिसाब चुकता करना , अपमान का बदला लेना .... कांग्रेस ने जिस तरह से २ -जी मामले में अपना पल्लू झाड़ लिया और सारा दोष डीएमके  नेताओं और पार्टी सुप्रीमो की दुलारी बेटी के मत्थे डाल दिया , वह सिर्फ प्रतिष्ठा के नुकसान का ही नहीं राज्य की सत्ता के नुकसान का मसला भी साबित हुआ . अब  मनमोहन सरकार  बाहरी समर्थन पर निर्भर रह गई है , वहीं  यह भी तय है कि मायावती हों या मुलायम अभी तुरंत सरकार को गिराना नहीं चाहेंगे . मायावती  नहीं चाहती कि तुरंत चुनाव हो जाएं ,पर चुनाव के लिए तैयार बैठे मुलायम सिंह यादव भी सरकार के खिलाफ तभी वोट करने का निर्णय लेंगे जब सरकार का गिरना तय हो . वह न तो भाजपा के साथ दिखना चाहेंगे न ही अपना वोट देने के बाद भी सरकार को बचते देखना चाहेंगे .  स्पष्ट है, यह सूरत अभी नहीं बनी है . दूसरी ओर इस पेंग से इन्कार नहीं किया जा सकता , जो नीतीश बाबू  की ओर से आयी है . वे पहले ही कह चुके हैं कि जो  भी बिहार के लिए स्पेशल पैकेज देगा वह जद के समर्थन का अधिकारी होगा . कांग्रेस इस चारे को भी सामने पड़ा देख रही है . कहने का मतलब यह कि कांग्रेस के सामने विकल्प की कमी नहीं . ऐसा भी हो सकता है कि इस साल दिल्ली और कर्नाटक में होनेवाले विधानसभाओं के चुनाव में उसे अच्छी जीत मिली , तो वह ख़ुद आम चुनाव समय - पूर्व कराने पर गौर कर सकती है . 
= डॉ . मुहम्मद अहमद 

जब हम सच बोलते हैं जग हंसता है

जब हम सच बोलते हैं जग हंसता है ,
बात ऐसी नहीं कि वो सच कहता है ,
सच्ची बात से हुस्न का रिश्ता कैसा ?
जब सामने आता दर तल्ख़ लगता है |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Mar 23, 2013

सद्भाव के पुष्प


सद्भाव के पुष्प 
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सद्भाव से प्रेम का दीपक जलाओ 
हर बगिया में सुवासित पुष्प खिलाओ   .
ये नकाबपोश आये हैं खून बहाने
अपने दुष्कर्मों से हम सबको सताने 
बढ़ती ही जा रही हैं दिलों की दूरियां 
प्रेम - सुधा बरसाओ , धर्म - मर्म बताओ .

फ़ज़ा  में घुल रही बारूद की गंधता 
रिश्तों में पनप रही विकृत अन्धता 
जब भाई ही भाई का दुश्मन बन बैठा 
रंग भरो स्नेह का ,दिलों को परचाओ.

बागबां के हाथ में कांटे किसने दिए ?
उसके पर कतरने के सांचे किसने दिए ?
गुलशन में फूलों की रंगत बदल  गयी 
नई पौध लगाओ , नए पुष्प खिलाओ .

यह बहुरंगी चादर दाग़ से सिसक रही 
हिंसकों के कुटिल प्रहार से बिलख रही 
नफ़रत के बीज बोकर बनते जनसेवी 
असुरता भगाओ , धर्म - भाव जगाओ . 

- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Mar 14, 2013

महिलाओं के प्रति सकारात्मक नज़रिया ज़रुरी


       महिलाओं के प्रति सकारात्मक नज़रिया ज़रुरी 



कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने बिलकुल सच कहा है कि देश में महिलाओं के साथ बलात्कार और हिंसा की लगातार हो रही घटनाओं से हमारे सिर शर्म से झुक गए हैं . उन्होंने घोषणा की कि कन्या भ्रूणहत्या और महिलाओं के प्रति बढ़ रही चिंताजनक घटनाओं पर क़ाबू पाने के लिए जल्द ही कड़ा क़ानून बनाया जाएगा . उन्होंने बताया कि महिलाओं को सामजिक और आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनाने के लिए सरकार ने कई क़दम उठाये हैं . वास्तव में महिलाओं के प्रति आपराधिक घटनाओं में तेज़ी आई हुई है या यूँ कहें कि 16 दिसम्बर 2012 को 23 वर्षीया ज्योति की गेंगरेप के बाद हुई हत्या की हृदय विदारक घटना के बाद वे घटनाएं भी सामने आ जाती हैं , जो पहले दब - दबा जाती थीं . देश की राजधानी दिल्ली में बलात्कार की रोज़ाना औसतन चार घटनाएं घटित हो रही हैं . सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इस साल जनवरी से लेकर 15 फरवरी तक डेढ़ माह के दरमियान बलात्कार की 181 घटनाएं हुईं यानी हर दिन चार घटनाएं ! यानी स्थिति बिगड़ती जा रही है ..... महिलाओं का मान - सम्मान धूल - धूसरित हो रहा है . 
यह हकीक़त भी   लोगों को पता है कि इन घटनाओं के साथ ही  कन्या - भ्रूण हत्या और विभिन्न रूपों में महिला - शोषण जारी है ! आज इधर - उधर की बातें बहुत की जा रहीं हैं . महिला - दिवस भी मनाया जाता है ... हर साल बड़े धूम - धाम से आलमी सतह पर .... पर महिला आज भी बहुल भावना और विचार के यथार्थ धरातल पर दोयम दर्जे पर है . उसके प्रति सामाजिक सोच में दोहरापन मौजूद है , यानी महिला होने के कारण वह अपने नैसर्गिक एवं फ़ितरी अधिकारों से वंचित है . अभी पिछली सदी में महिलाओं के प्रति जागरुकता का परिचय देते हुये अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने आह्वान किया और 8 मार्च का दिन महिलाओं के सशक्तीकरण के रूप में मनाया जाने लगा . सबसे पहले 28 फरवरी 1909 ई. को अमेरिका में यह दिवस मनाया गया, लेकिन जिन उद्देश्यों को लेकर इसकी शुरुआत की गई थी, वह बहुत पहले ही खत्म हो गया था .बस औपचारिकता अब तक बाक़ी है . आज दुनिया के सभी तथाकथित विकसित और विकासशील देशों में भी महिलाओं को लेकर लगभग एक जैसी दुखद  स्थिति बनी हुई है.
 भौतिक रूप से समाज और देश ने भले ही खूब तरक्की कर ली हो, लेकिन इस बात से इंकार करना मुश्किल है कि महिलाओं के प्रति हमारा नजरिया सकारात्मक नहीं है . सृष्टि में उसकी रचना भी उन्हीं गुणों और तत्वों के आधार पर हुई है, जिससे पुरुष बना है, किन्तु सामाजिक और पारिवारिक दृष्टि से महिला अभी भी न्याय की राह तक रही है,  उसे न्याय नहीं मिल सका है .  सामाजिक, आर्थिक आदि स्तरों पर महिलाएं आज भी बहुत पिछड़ी हैं . सोचा तो यह भी गया था कि हमारे सामाजिक नजरिये में व्यापक बदलाव आयेगा और समाज अपने अभिन्न अंग को स्वयं के बराबर का दर्जा दे सकेगा, लेकिन ऐसा केवल पुस्तकीय ज्ञान और मंचीय भाषण तक सीमित होकर रह गया . ऐसे में यह विचार करना होगा कि साल में एक दिन महिलाओं के विषय में चिन्ता करना क्या पर्याप्त है या हमें उनके प्रति बाकी दिनों में भी चिन्ता करनी  चाहिये . संबंधों की बुनियाद पर आज किसी भी महिला को दहेज की दहलीज पार करनी पड़ती है , अन्यथा उसके साथ जो हश्र होता है वह किसी से छिपा नहीं है . हकीक़त यह है कि आज शिक्षा का प्रतिशत बढऩे के साथ ही नैतिकता का स्तर काफी गिरा है . दहेज  के कारण हत्याएं, मुकदमेबाजी, तलाक, बलात्कार जैसी घटनाओं ने तो मानवता के मुख पर कालिख ही पोत दी है . बिना किसी पूर्वाग्रह के बात करें तो शहरों की स्थिति बड़ी नाजुक है, जो जितना अधिक उच्च शिक्षित, बड़े सामाजिक दायित्व वाला है, वो उतना ही अनैतिक आचरण करते सुना जाता है .वास्तव में महिला - सम्मान की बात केवल भाषणों तक सीमित होकर रह जाती है . महिलाओं की मानसिक और वैचारिक स्थिति का यदि नैतिकता के आधार पर अध्ययन किया जाए तो ऐसे आंकड़े सामने आएंगे, जो हमारे सामाजिक खोखलेपन को रेखांकित करेंगे . राष्ट्रीय स्तर पर जारी एक रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि एशिया में प्रतिवर्ष 10 लाख से ज्यादा लड़कियों को वेश्यावृत्ति के धंधों में उतारा जाता है . यह आंकड़ा कोलकाता, दिल्ली आदि महानगरों में ज्यादा है . इसी प्रकार से विदेशों में भारत से भेजी जाने वाली घरेलू कामकाजी महिलाओं की स्थिति तो और भी लज्जास्पद है . अखबार और टेलीविजन के पर्दे पर जब कभी कोई महिला यदि रोते बिलखते अपनी पीड़ा लेकर आती है , तब हम सामाजिक न्याय के झंडे उठा लेते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे कितनी जिन्दगियां सिसकते आंसुओं के सैलाब में अपना गुजर कर रही हैं. उनका तो कोई पुरसानेहाल नहीं हैं . अतः जरूरी है कि सामाजिक संदर्भों में हमें महिलाओं  के प्रति अपनी दृष्टि को और व्यापक , पारदर्शी और उदार बनाएं .
- डॉ . मुहम्मद अहमद 


Mar 10, 2013

डूबते सूरज ने आज यूँ गवाही दी

डूबते सूरज ने आज यूँ गवाही दी 
खून के आंसू रोने की सफ़ाई दी ,
सच बोलिए , जहाँ से अदावत कीजिए 
सफ़र आख़िरी न होने की आगही दी |
- डॉ . मुहम्मद अहमद

बच्चों की गुमशुदगी

बच्चों की गुमशुदगी के बढ़ते मामले पुलिस और प्रशासन की सक्रियता ज़रूरी

















बच्चे देश के भविष्य हैं | उनकी सही देख- रेख की ज़िम्मेदारी न सिर्फ़ उनके माँ - बाप की होती है , बल्कि हर कल्याणकारी राज्य की यह ज़िम्मेदारी होती है कि वह बच्चों की समुचित देखरेख और प्रशिक्षण के प्रबंध करे | हमारे देश में भी बा- शोषण के विभिन्न रूप सामने आते हैं , जिनकी ओर सरकार का ध्यान अपेक्षित होता है | मगर यह भी देखा गया है कि भारतीय पुलिस की निष्क्रियता से बाल - शोषण के मामले बढ़ते जा रहे हैं , जो इन्तिहाई अफ़सोसनाक और चिंताजनक है | शोषण की विभिन्न शक्लों के शिकार लापता बच्चों और बच्चियों का मसला भी बड़ा संगीन है | बताया जाता है कि संगठित गिरोहों द्वारा बच्चों को अपहृत कर या घर से किसी कारण भागे हुए बच्चों से अनेक अपमानजनक कार्य लिए जाते हैं | उनकी बिक्री - तस्करी की जाती है और उन्हें इस तरह बाध्य कर दिया जाता है कि कोई रचनात्मक कार्य न कर सकें | संसदीय मामलों के राज्यमंत्री पवन सिंह घटोवार ने विगत ६ मार्च को राज्यसभा में बताया कि पिछले तीन साल में लापता हुए क़रीब ७५ हज़ार बच्चों का अब तक पता नहीं चल सका है | ऐसे मामलों को निबटाने के लिए और प्राथमिकी दर्ज कराने को अनिवार्य बनाने के लिए केंद्र ने राज्यों को सभी पुलिस थानों में नोडल अधिकारियों की नियुक्ति का मशविरा दिया है | यह मशविरा सुप्रीमकोर्ट के जनवरी २०१३ में दिए गये दो अंतरिम आदेशों के बाद जारी किया गया है | कोर्ट ने प्राथमिकी अनिवार्य करने और विभिन्न राज्यों में विशेष बाल पुलिस इकाईयों के गठन की अंतरिम व्यवस्था दी थी और लापता बच्चों के मामले में की जा रही ढिलाई पर काफ़ी नाराज़ी प्रकट की थी । गैर सरकारी संस्था ' बचपन बचाओ आंदोलन ' की ओर से दायर एक याचिका में अदालत को बताया गया था कि हर दिन लगभग सौ बच्चे लापता होते हैं और इनके बारे में कुछ पता नहीं चलता। एक सर्वे के अनुसार २०१० से २०१२ के बीच ही एक लाख से अधिक बच्चे लापता हुए और इनमें से अधिकतर को पुलिस तलाश नहीं पायी है। सरकारी तौर पर बताया जा रहा है कि गत तीन सालों में क़रीब दो लाख ३६ हज़ार बच्चे लापता हुए , जिनमें से क़रीब एक लाख ६१ हज़ार आठ सौ का ही पता चल सका है | . प्र . में भी लापता लड़कियों का मुद्दा गरमाया हुआ है | कांग्रेस ने मानव - तस्करी की बात कहते हुए लापता बच्चों के मामलों को मानव - तस्करी में शामिल करने की मांग की है | कांग्रेस के रामनिवास रावत ने विधानसभा में कहा कि प्रदेश में २००८ से अब तक गुम हुई ४९९० लड़कियों का कोई पता नहीं चल सका है | राज्य सरकार इसको लेकर गंभीर नहीं है |
उल्लेखनीय है कि गुमशुदगी के ये आंकड़े पुलिस में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर ही बनाए गए हैं। निठारी जैसे कितने ही कांड होते हैं, जब पुलिस रिपोर्ट ही नहीं लिखती है| ऐसे में लापता बच्चों की संख्या यकीनन और अधिक होगी | बच्चों को अपहृत कर उनकी तस्करी एवं उन्हें अन्य अनैतिक कर्म में लिप्त करवाने वालों का बड़ा रैकेट काम करता है | दिल्ली पुलिस इससे लाख इन्कार करे , मगर सच्चाई यही है | गत वर्ष बंगलुरू में एक बड़ा रैकेट पुलिस के हत्थे चढ़ा था, जो बच्चों को नशीली दवाएं खिलाकर उनसे सड़कों पर भीख मंगवाया करता था। ऐसे कई गिरोह देश में बड़े आराम से अपना जाल फैलाकर काम कर रहे हैं, क्योंकि वे सरकार और प्रशासन की कमजोर इच्छाशक्ति से भली-भांति अवगत हैं। वास्तव में बच्चों के मामले में हमारा समाज काफी संवेदनहीन और सुस्त है। हम इतने बेहिस और संवेदनहीन होते जा रहे हैं कि हमारी आंखों के सामने बच्चों पर जो अत्याचार होता है, उसकी भी चीख हमारे कानों तक नहीं पहुंचती। बच्चे अनायास गायब नहीं होते। सार्वजनिक स्थलों से बच्चों का गुम हो जाने या फिरौती के लालच में हुए अपहरण की घटनाओं पर पुलिस की सक्रियता कभी दिख जाती है। लेकिन जब सोची - समझी साजिश के तहत बच्चों को गायब करवाया जाता है, फिर उनकी खरीद-फरोख्त होती है, कभी बंधुआ मजदूरी के लिए तो कभी देह व्यापार के लिए उन्हें मजबूर किया जाता है , तब पुलिस अपनी भूमिका सही तरीके से नहीं निभाती है। अक्सर ऐसा होता है जब बच्चों के कल्याण के लिए बनी गैर सरकारी संस्थाएं व अन्य सामाजिक संगठन गरीब मां-बाप की ओर से आवाज उठाते हैं , तब सरकारें भी सक्रिय होती हैं। फिर कुछ मामले अदालत तक पहुंचते हैं और पुलिस को कुछ करने के लिए मजबूर होना पड़ता है | इस मामले में राज्य सरकारों का रवैया बड़ा ढुलमुल और उदासीन होता है | इसकी एक बानगी देखिए - सुप्रीमकोर्ट ने पिछले दिनों अपने एक आदेश में गुजरात, तामिलनाडु, अरुणाचल प्रदेश, गोवा और उड़ीसा के मुख्यसचिवों को निर्देश दिया था कि वे लापता बच्चों पर दायर एक जनहित याचिका पर न्यायालय द्वारा जारी नोटिस का जवाब देने में विफल रहने का कारण स्पष्ट करने के लिए न्यायालय में व्यक्तिगत तौर पर पेश हों। इसके बावजूद गुजरात, तमिलनाडु और अरुणाचल प्रदेश के मुख्यसचिव अदालत नहीं पहुंचे। इस पर प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर ने तीनों मुख्यसचिवों द्वारा न्यायालय के निर्देश का उल्लंघन करने पर सख्त नाराज़ी जताई। नाराज न्यायालय ने पूछा कि क्या तीनों को पेश होने के लिए उनके खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी करने पड़ेंगे। न्यायमूर्ति कबीर ने सम्बंधित रायों की तरफ से पेश हुए वकीलों को फटकार लगाते हुए कहा कि आप क्या समझते हैं कि हम सिर्फ आदेश पारित करने के लिए आदेश पारित करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि लापता बच्चों की पीड़ा की चिंता किसी को नहीं है, यह हास्यस्पद है। स्थिति इतनी ख़राब है कि इस समस्या के हल हेतु सरकार की ओर से एक वेब पोर्टल ' ट्रैक चाइल्ड ' लांच किया गया था , जो मज़ाक़ बनकर रह गया है | किसी राज्य ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई | केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि लापता बच्चों की तलाशी के काम को तेज़ करें और ऐसे बच्चाचोर जैसे रैकेटों को पकड़ने के सघन अभियान चलाएँ 
- डॉ . मुहम्मद अहमद

Mar 7, 2013

बढ़ती भ्रूणहत्याओं से इंसान की उभरी और वीभत्स , क्रूर शक्ल


बढ़ती भ्रूणहत्याओं से सुप्रीमकोर्ट चिंतित 

इंसान की उभरी और वीभत्स , क्रूर शक्ल

लगता है , अब सुप्रीमकोर्ट भी  कन्या - भ्रूणहत्या की रोकथाम को लेकर बहुत मायूस और निराश हो चुकी है . उसके विभिन्न समयों में दिए गये विभिन्न निर्देश एवं उपाय प्रभावहीन साबित हुए हैं . कन्या - भ्रूणहत्याओं का सिलसिला अंधाधुंध जारी है ! सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ , हमारे प्रिय देश में हर साल लगभग पांच लाख कन्या - भ्रूणहत्याएं होती हैं , जिन्हें अंजाम देते हैं अधिकतर पढ़े - लिखे मध्यम वर्ग के लोग ! पंजाब और हरियाणा के लोग इस खूंरेजी में सबसे आगे हैं . इन्हीं राज्यों में अस्सी फ़ीसद से अधिक गर्भपात होते हैं . डाक्टर इन हत्यारों के सक्रिय सहयोगी की बढ़ - चढकर भूमिका निभाते हैं . सरकार की ब्रितानी पुलिस मोटी रिश्वत खाकर डाक्टरों पर मेहरबान रहती है . मेडिकल कौंसिल तो हमेशा ख़ामोश तमाशाई बनी रहती है . अब बड़ी मुश्किल से देशभर में सौ डाक्टरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की बात चल रही है , जिनमें से २८ हरियाणा के हैं . सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों की अपनी टिप्पणी में लोगों को नसीहत की है और इस सिलसिले में वेद , उपनिषद और स्मृतियों के कई हवाले दिए हैं . कोर्ट ने राज्यों को इन हत्याओं पर रोक लगाने के लिए प्रभावी क़दम उठाने का निर्देश देते हुए कहा कि इस मामले में राज्यों ने जो आंकड़े दिए हैं , वे बेहद चिंताजनक हैं और ऐसा लगता है कि लोगों को क़ानून का डर नहीं है . लोग अपराध की संगीनी को नहीं समझ रहे हैं . 
पीठ के जज श्री के . एस  राधाकृष्णन और श्री दीपक मिश्रा ने कहा कि इस सम्बंध में बने क़ानून के क्रियान्वयन न होने की वजह से महिला - पुरुष का अनुपात बिगड़ गया है . पूरे देश का औसत अनुपात एक हज़ार महिलाओं पर ९६२ पुरुषों का है , जो अफ़सोसनाक स्थिति है . एक आंकड़े के अनुसार , २०११ में उ . प्र . में महिला - पुरुष का लिंगानुपात ८९९ / १००० था . गुजरात में ८८६ , जम्मू - कश्मीर में ८५९ एवं हरियाणा में ८३० था  . देश के ६४० ज़िलों में से ४६१ ज़िलों में जन्मानुपात काफ़ी कम था . हरियाणा में ० - ६ वर्ष के बच्चों का लिंगानुपात ७७४ / १००० था . इस स्थिति में सुधार न आने पर सुप्रीमकोर्ट ने नये सिरे से क़ानून पर अमलदरामद की राज्यों को हिदायत दी है . कोर्ट ने साफ़ किया कि इस समस्या पर सिर्फ़ क़ानून के ज़रिये रोक नहीं लग सकती , बल्कि इसके लिए पर्याप्त जन - जागरूकता की आवश्यकता है .
 कोर्ट ने कहा कि धार्मिक ग्रंथों , वेदों , स्मृतियों , उपनिषदों और लोकोक्तियों में महिलाओं का सम्मान करने और धार्मिक अनुष्ठानों में उनका स्थान नियत किया गया है . कोर्ट ने यह श्लोक कोट किया -   '' यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:, यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रियाः '' | [ मनुस्मति ३ - ५६ ]  अर्थात , जहाँ स्त्रियों का आदर किया जाता है , वहन देवता रमण करते हैं , और जहाँ इनका निरादर होता है , वहाँ सब काम निष्फल होते हैं . 
इसी प्रकार उपनिषद के हवाले से एक श्लोक भी उद्धृत करते हुए उसका भावार्थ बताया कि '' महिला का पति , भाई , पिता , संबंधियों की तरह सम्मान करना चाहिए . यह सम्मान करते हुए महिलाओं को आभूषण , वस्त्र आदि उपहार के तौर पर देने चाहिए . इन शिक्षाओं पर अमल न हो पाना एक बड़ी समस्या है . महिला - सम्मान की बात अन्य धर्मग्रंथों में भी पायी जाती है .   
हज़रत मुहम्मद [ सल्ल .] से पूर्व अरब में महिलाओं की हालत बहुत ख़राब है . उन्हें कोई अधिकार प्राप्त न था . विरासत में किसी तरह का हिस्सा न था . पैदा होते ही लड़कियों की हत्या , बलात्कार और दुराचार सामान्य बात बन चुकी थी . कुमार्गगमन और बेहयाई आम थी . महिला - शोषण की इंतिहा थी . पुरुष जितनी चाहता शादियाँ कर लेता , यहाँ तक कि सौतेली माँ को भी अपनी पत्नी बना लेता . हज़रत मुहम्मद [  स . ]  ने इस महिला - विरोधी गंदी मानसिकता को पूरी तरह स्वस्थ - सकारात्मक मानसिकता में बदल दिया . महिलाओं को उनके स्वाभाविक अधिकार दिए एवं आदर - सम्मान प्रदान किया . आपने लड़कियों के अच्छी तरह लालन - पालन की शिक्षा और प्रेरणा दी . उनकी हत्या पर रोक लगा दी . समाज को भ्रूणहत्या जैसी लानत से मुक्त किया . इस्लाम लड़कों को लड़कियों पर प्राथमिकता नहीं देता . हज़रत मुहम्मद [ स . ] ने कहा ,  '' जिस व्यक्ति के लड़की हो वह न तो ज़िन्दा गाड़े , न उसके साथ उपेक्षा का व्यवहार करे , न उस पर अपने लड़के ही को प्राथमिकता दे , तो अल्लाह उसे जन्नत में दाख़िल करेगा '' [ अबू दाऊद ] एक और हदीस में है -  '' जिसने तीन लड़कियों की परवरिश की , उनकी शिक्षा - दीक्षा का प्रबंध किया , उनका विवाह किया और उनके साथ बाद में भी सद्व्यवहार किया , तो उसके लिए जन्नत है '' [ अबू दाऊद ]  . इस सिलसिले में इस्लाम की और भी शिक्षाएं हैं , जो महिला - सम्मान के लिए उभारती हैं . 
- डॉ . मुहम्मद अहमद  

Mar 5, 2013

जब साया ख़ुद से कतरा जाए

जब साया ख़ुद से कतरा जाए , तो समझ लेना ,

कांटे बिछानेवाले ही अब गुल बिछा रहे हैं |


- डॉ . मुहम्मद अहमद
 

Mar 3, 2013

हिंदी - हमारी मातृभाषा


हिंदी - हमारी मातृभाषा 
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फ़ेसबुक पर आकर मुझे यह महसूस एवं अन्देशा हुआ कि देवनागरी लिपि कहीं गर्त में न चली जाए . हिंदी लिखने के लिए रोमन लिपि कहाँ तक उचित है ? कहीं यह मजबूरी एक निहायत उम्दा लिपि से हमें महरूम न कर दे .
देवनागरी लिपि के अतिरिक्त अन्य कोई लिपि भावों को सोच्चारण व्यक्त करने में अक्षम है , इसलिए भी देवनागरी लिपि की अनिवार्य आवश्यकता है . विश्व की लगभग चार हज़ार भाषाओँ में हिंदी शब्द - संपदा की दृष्टि से सबसे समृद्ध है .यह सभी भाषा - शब्दों को आत्मसात करती रही है . शब्दों में उसके लिए कोई छुआछूत नहीं है .
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।।
अपनी भाषा से बढ़कर अपनत्व एवं संतोष की प्राप्ति नहीं हो सकती . आचार्य पं.रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में -
अपनी भाषा से बढ़कर अपना कहाँ ?
जीना जिसके बिना न जीना है यहाँ .
उस भाषा में जो है इस स्थान की ,
उस हिंदी में जो है हिंदुस्तान की .
उसमें जो कुछ रहेगा वही हमारे काम का ,
उससे ही होगा हमें गौरव अपने नाम का .
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- डॉ . मुहम्मद अहमद 

सम्मान

प्रिय सम्मान्य मित्रों , 
एक शुभसूचना --- सम्मानित हुआ हूँ ..... आभारी हूँ आलराउंड अकादमी का ...... इसी सन्दर्भ में एक बात और --- वह यह कि मेरे लिए तो कर्म ही सफलता है . कहा भी गया है - उद्यमेन हि सिध्यन्ति , कार्याणि न मनौरथै : - ' मनोरथों से कार्य सफल नहीं होते , वे तो प्रयत्नों से ही सफल हुआ करते हैं '.
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

मत इसे सहल जानो

मत इसे सहल जानो , फिरता है फलक बरसों ,
तब खाक के परदे से , इन्सान निकलते हैं .
- मीर
क्या आज के वे इन्सान भी जो महिलाओं के कट्टर शत्रु हैं .... हत्यारे हैं ... दरिन्दे हैं ? बलात्कार की शिकार युवती , जो कितने दिनों तक अब जी सकती है ..... जीवन ही छीन लिया हैवानों ने ... सर्वथा निंदनीय , भर्त्सनीय
 —  [ इस विचार को फ़ेसबुक पर २० दिसम्बर २०१२ को पोस्ट किया गया था . इसके कुछ ही दिनों बाद २९ दिसम्बर २०१२ को दामिनी - ज्योति सिंह पाण्डेय  की मृत्यु हो गयी . ]
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

मेरे शाहिद भाई

मेरे शाहिद भाई 
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आज मेरे जिगरी दोस्त मरहूम शाहिद रामनगरी [ पूर्व अध्यक्ष , बिहार अल्पसंख्यक आयोग ] की पुण्यतिथि है . बड़ी शिद्दत से याद आ रहे हैं . वे अध्यक्ष बनाये जाने एवं मंत्रिपद का दर्जा मिलने की ख़ुशी में शाहिद भाई इतने भावविभोर हो उठे थे कि उन्हें दिल का दौरा पड़ गया था और अपने वास्तविक प्रभु से जा मिले . बहरहाल वे अध्यक्ष बने .... पदभार ग्रहण किया .... कुछ पल , घंटे के लिए ही सही . असलन शाहिद भाई थे ठेठ पत्रकार .. मशहूर पत्रकार ..... वे मेरे लिए अब भी ज़िन्दा हैं . उन्हें '' हाज़िर नाज़िर '' मानकर एक स्वरचित शेअर नज्र कर रहा हूँ --
ऐ ख़ुदा , देता तो ऐसा देता क्यों है ?
जो मेरे दिल के दरीचे में न समाए .

- डॉ . मुहम्मद अहमद 

लाख काली घटाओं में सूरज है तो क्या हुआ ?


लाख काली घटाओं में सूरज है तो क्या हुआ ?

आँधियों से खूब लड़ा वह नन्हा दिया तो क्या हुआ ?

अब अपनी आँखों से सारे जहाँ ने देख लिया 

अगर खुद में गैरत नहीं गैरों से तो क्या हुआ ?

=
डॉ. मुहम्मद अहमद 

Mar 2, 2013

सुधार की गाड़ी को मंज़िल का पता नहीं !

सुधार की गाड़ी को मंज़िल का पता नहीं !

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वित्तमंत्री पी . चिदंबरम ने अपने आम बजट [ देश का 82 वां बजट ] में पुरानी रिवायत को बरक़रार रखा है और अपनी दयालुता अपने ख़ास लोगों यानी पूंजीपतियों के प्रति बनाये रखी है ! इस प्रकार यह बजट एक बार फिर अमीर - समर्थक और इसके नतीजे में अनिवार्यतः गरीब विरोधी हो गया है , बल्कि यह कहना ज़्यादा सही होता कि आम बजट की पुरानी गरीब विरोधी दिशा को बदलने की कोशिश ही नहीं की गयी . साथ ही आम बजट ने इस दर्शन को भी पूरी तरह झुठला दिया है कि दयालु होने के लिए कठोर होना पड़ता है . उल्लेखनीय है कि पिछले साल बजट पेश करते हुए तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणव् मुखर्जी ने शेक्सपियर के उपन्यास हैमलेट से एक पंक्ति उद्धृत करते हुए कहा था, 'दयालु होने के लिए मुझे कठोर होना पडे़गा.'

यह मानना पड़ेगा कि यह बजट वैश्वीकरण - उदारीकरण से बहुत अधिक प्रेरित है . इस आर्थिक दिशाहीन नीतियों पर चलने को आजकल सुधारीकरण यानी सुधार की गाड़ी का नाम दिया जाता है . भारतीय की पिछली और मौजूदा कई सरकारें स्वदेश हित की अनदेखी करती हुई इसी गाड़ी पर चलने को लगता है कि अभिशप्त हैं . अतः खेती और किसानों की गहराती समस्याओं के बावजूद उन आर्थिक नीतियों एवं विकास के उस माडल पर सिरे से पुनर्विचार ही नहीं किया गया , जिनके कारण यह भारी संकट पैदा हुआ है . किसानों को जो छिटपुट रियायतें दी गयी हैं , वे बहुत सतही और नाकाफ़ी हैं .

सरकार की आर्थिक नीतियों का कोई ठोस ऐलान नहीं किया गया , बल्कि ऐसा लगता है कि अर्थव्यवस्था बहुत ही छेददार हो गयी है , जिसे छिपाया जा रहा है . इस बात को यूँ भी समझा जा सकता है - अभी बजट से एक दिन पहले जो आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया गया , उसमें विकासदर छह फ़ीसद से ऊपर रहना अनुमानित है . दूसरी ओर वित्तमंत्री ने जो बजट पेश किया , वह इस विकासदर का किसी भी तरह से समर्थन नहीं करता . इसकी वजह साफ़ है .

वह यह कि बजट भ्रामक और दिशाहीन है एवं देश को आर्थिक दुष्चक्रों में डालनेवाला है . देश की आज़ादी के ६५ साल बीत चुके हैं . शुरू में तो देश - विकास की ओर पर्याप्त ध्यान दिया गया और कुछ वर्षों तक विकास - केन्द्रित बजट पेश किये गये कई साल तक बजट में विकास के लिए नई संस्थाएं स्थापित करने और देश को नीतिगत दिशा देने की भावना प्रधान रही. ..... फिर ऐसा लगने लगा मानो भारतीय बजट बाहर से बनाकर यहाँ भेजा जाता हो . पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार के समय जब संघीय बजट पेश होता था तो सोच यह होती थी कि यह सरकार की नीतियों के ऐलान का अवसर बने. आज इसकी भूमिका हिसाब-किताब की प्रक्रिया तक सिमट चुकी हैं. पिछले कुछ सालों से बजट सिरे से नीति संबंधी दस्तावेज नहीं बन पाते . यह किसी किरानी के खाते - बही जैसे हो गये हैं . अब अक्सर लोग इस बात को इस बात को भूल जाते हैं कि केन्द्रीय बजट अर्थव्यवस्था को एक दिशा देता है. यह भी एक हकीक़त है कि राज्य सरकारों का भी देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने - संवारने में बड़ा योगदान होता है ,

फिर भी केंद्र का बजट एक दिशा - निर्देशक एवं पोषक का कार्य करता है . हम अक्सर देखते हैं कि देशवासी बजट की सफलता इसी बात से आंकने लगते हैं कि टैक्स घटा या बढ़ा , आयकर सीमा कितनी बढ़ी , कौन - कौन से सामान सस्ते हुए और क्या- क्या रियायतें मिलीं , लेकिन क्या बजट का निहितार्थ इतना ही नहीं है . केन्द्रीय बजट का मतलब सिर्फ यही नहीं है कि कंपनियों को इससे क्या फायदा या नुकसान होगा? इससे भी महत्वपूर्ण बात यह होती है कि सामाजिक विकास की क्या भावी रूप - रेखा बनाई गयी है और कौन - सी ऐसी योजनाओं और कार्यक्रमों को अमली जामा पहनाया जाएगा जो अर्थव्यवस्था के जख्मों को ठीक से भर सकते हैं . आज भष्टाचार एक बड़ी समस्या है , जो सारी विकास - प्रक्रिया को बाधित कर देता है . आम बजट इस समस्या को नजरअंदाज कर देता है , मानो यह कोई समस्या ही नहीं !

अब हम देखेंगे कि आम बजट से आम आदमी को क्या मिला ? इसका सही जवाब है - कुछ नहीं . न तो बेलगाम बढ़ती महंगाई पर क़ाबू पाने की कोई घोषणा की गयी और न ही किसी रियायत का ऐलान किया गया . हाँ , आम जनता पर करों का बोझ कम डाला गया है , लेकिन पहले से विभिन्न समस्याओं से जूझ रही जनता को अपनी मौत आप मरने के लिए छोड़ दिया गया है ! इस बजट से निजी करदाताओं को भी कुछ हासिल नहीं हुआ . आयकर छूट की सीमा नहीं बढाई गयी . यह आशा की जा रही थी कि भूखी जनता के लिए कुछ विशेष प्रावधान होंगे , मगर यह आशा पूरी न हो सकी . हमारा देश कृषि प्रधान देश है . इस क्षेत्र में विकास की स्थिति बहुत शोचनीय है . बजट में ग्रामीण विकास मंत्रालय का बजटीय प्रावधान तो बढ़ाया गया है , लेकिन यह राहत पहुँचाने की किसी विशेष योजना के तहत नहीं किया गया है , बल्कि पुरानी असफल योजनाओं पर ही व्यय किया जाएगा . विकास के जिस रास्ते पर चलने का दावा सरकार द्वारा बार - बार किया जाता है , वह ऐसा रास्ता है , जहाँ बड़े पैमाने पर किसानों को बेदखल करके खेती की जमीनें हड़पी जा रही हैं . अब हरित - क्रांति की बात हवा - हवाई हो गयी . ऊपर से डीज़ल की कीमतों को नियंत्रणमुक्त कर देने से उसकी कीमतों में हो रही लगातार वृद्धि और अनुदानों को कम करने के कदमों तथा मुक्त व्यापार वाले आर्थिक सुधारों ने खेती को तेज़ी से घाटे का पेशा बना दिया है . अर्थशास्त्री जान मेनार्ड केन्स के इस कथन को पीठ पीछे डालकर पेट्रोलियम उत्पादों के दामों में की जा रही लगातार वृद्धि को केंद्र सरकार द्वारा राजकोषीय घाटे को लम्बी अवधि में पूरा हो जाने का बड़ा क़दम बताया जा रहा है , जबकि केन्स कहते हैं कि लम्बी अवधि में तो हम सभी मर चुके होंगे .

वास्तव में खेती - किसानी का संकट बहुत गहरा है . यह अनगिनत किसानों की आत्महत्याओं में भी दिखाई देता है . सरकारी आंकड़ों के अनुसार , हमारे देश में १९९५ से लेकर २०१२ तक दो लाख ८७ हज़ार किसान खुदकशी कर चुके हैं , यानी हर साल १६ हजार किसान खुदकशी कर रहे हैं . अतः रोज़ ४४ किसान देश के किसी न किसी कोने में खुदकशी कर रहे हैं . अफ़सोस है कि इनकी समस्याओं पर इस बार भी गौर नहीं किया गया . हाँ , किसानों को सात लाख करोड़ का क़र्ज़ बांटा जाएगा . किसानों की मौतों का बड़ा सबब यही कर्ज़ों की अदायगी का जंजाल रहा है . देश के किसानों का एक बड़ा वर्ग गन्ने की खेती करता है . इसे हड़पने एवं किसानों का शोषण करने के लिए एक और पूंजीवादी चाल चल दी गयी है . कथित आर्थिक सुधारों के प्रबल हिमायती सी. रंगराजन की अध्यक्षता में बनी छह सदस्यीय समिति ने पिछले साल चीनी उद्योग को पूरी तरह नियन्त्रणमुक्त करने की सिफ़ारिश की है . अगर ये सिफ़ारिशें मान ली गयीं , तो देश के किसानों की मुसीबतें बेइंतिहा बढ़ जायेंगी . समिति ने सिफ़ारिश की है कि राज्य सरकारों द्वारा गन्ने का समर्थन मूल्य घोषित करने की व्यवस्था समाप्त कर देनी चाहिए और गन्ने की कीमतें मिलों और किसानों के बीच तय होनी चाहिए . अगर ऐसा हुआ , तो बहुत आशंका है कि गन्ने की कीमतें बहुत घट जायेंगी .

किसान सामान्यतः असंगठित , लाचार और गरीब होते हैं . वे मिल मालिकों से सौदेबाज़ी नहीं कर पायेंगे . मुसीबत के मारी ग्रामीण जनता का एक अच्छा-खासा हिस्सा अकुशल श्रम की तरफ मुड़ रहा है और इस तरह शहरी गरीबों की आबादी में और बढ़ोतरी कर रहा है. पिछले साल के बजट ने इस क्षेत्र में नया निवेश लाने की कोशिश की थी, लेकिन इस बार यह भी नहीं हो पाया . खेती में नई जान फूंकने की कोशिश ही नहीं की गयी . वास्तव में हमें खेती को बदलने के लिए एक क्रांति की जरूरत है. क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी कहते हैं, 'सुधारों की प्रक्रिया ने कृषि क्षेत्र की उपेक्षा की है. बढ़ती महंगाई बता रही है कि यह क्षेत्र अपनी क्षमता के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर रहा. बजट दर बजट इसके हल के लिए सिर्फ छोटे कदम ही उठाए गए. हमें हरित क्रांति जैसे किसी बदलाव की जरूरत है.' मगर यहाँ तो चिंता अमीर वर्ग के हितों की ही होती है !

देश के बुनियादी ढांचे में सुधार का सवाल भी बड़ा अहम है . यह क्षेत्र भी भयानक संकट का सामना कर रहा है. सड़क, बिजली, पानी का बुरा हाल है. बजट इस पर एक तरह से चुप है . नौकरशाही की लापरवाही और भ्रष्टाचार ने इस क्षेत्र को बहुत बिगाड़ दिया है . अक्सर यही होता है कि पैसा आता है और बिना इस्तेमाल हुए ही वापस चला जाता है. चाहे वह सड़क बनाने वाला लोकनिर्माण विभाग हो या अलग-अलग राज्यों के बिजली और जल बोर्ड, सभी प्रक्रियाओं की जटिलता में फंसे हैं. ये सभी संस्थाएं बुनियादी सुविधाओं को विकसित करने के लिए बनाई गई थीं, लेकिन इनका अच्छा प्रदर्शन सुनिश्चित करने की कोई व्यवस्था नहीं है. देश के आम बजट में इस हकीक़त से जुझने की किसी रणनीति का साफ़ अभाव है . कुछ दिनों पहले वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने एक यथार्थपरक बात यह कही है , जिसका स्वागत होना चाहिए . उन्होंने अतिसंपन्न लोगों से ज्यादा कर वसूलने की वकालत की थी . उन्होंने कहा था कि कुछ खास मौकों पर सरकार को अमीरों पर ज्यादा कर लगाने पर विचार करना चाहिए ., हालांकि, विप्रो के अजीम प्रेमजी इस सुझाव को राजनीतिक रूप से सही ठहरा चुके थे . वहीं, औद्योगिक संगठनों ने सरकार से इस पर विचार नहीं करने का आग्रह किया था . अमीरों से ज्यादा वसूली का सुझाव सबसे पहले प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार सी. रंगराजन ने दिया था . साफ़ है , सरकार पूंजीपतियों के आगे झुक गयी .

बजट में किसी ऐसे प्रावधान का अभाव है . स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों पर भी अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है . इन्हें किसी देश का भविष्य बदलने वाली शक्तियों के तौर पर देखा जाता है. अगर भारत को अपनी एक बड़ी नवजवान आबादी का फायदा उठाना है तो स्वास्थ्य और शिक्षा को ठीक से सुधारे बिना बात नहीं बनने वाली. लेकिन अर्थव्यवस्था की गति को सुस्त कर रहे ये असल मुद्दे बजट से बाहर के हैं. यह भी सच है कि बजट में इन स्थितियों से निबटने की संकल्पना ज़रूर होनी चाहिए . भारतीय अर्थव्यवथा राजकोषीय घाटे की वजह से ही खस्ताहाली की शिकार है . इस घाटे को कम करने का जो दावा किया जा रहा है , उस पर यकीन करना बहुत मुश्किल है . ज़रूरत है , पूरी अर्थव्यवस्था पर विहंगम निगाह डालकर उसके सारे सूराखों को बंद करने की .

= डॉ . मुहम्मद अहमद