Apr 29, 2013

चल पड़ी जो बात

चल पड़ी जो बात वह मेरी ही बात थी ,
कब तलक मैं अपनी असलियत छिपा पाता |
- डॉ. मुहम्मद अहमद 

आओ सब मिलकर एक - एक दीप जलाएं

आओ सब मिलकर एक - एक दीप जलाएं ,

अब मुश्किल नहीं है अँधेरे को मिटाना |


- डॉ . मुहम्मद अहमद
 

Apr 28, 2013

शराब छोड़ो, सुख से जियो और जीने दो


शराब छोड़ो, सुख से जियो और जीने दो 
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आजकल बलात्कार की जितनी घटनाएं घट रही है हैं , उनके मूल कारणों में एक बड़ा कारण शराब का सेवन है . वास्तव में शराब बीमारियों की जननी है । मेडिकल साइंस ने इधर जाकर इसकी पुष्टि की है कि इसके शरीर पर बहुत घातक प्रभाव पड़ते हैं । सम्राट जार्ज के पारिवारिक डॉक्टर सर फ्रेडरिक स्टीक्स वार्ट का कहना है, ‘‘शराब शरीर की पची हुई शक्तियों को भी उत्तेजित करके  काम में लगा देती है, फिर  उसके ख़र्च हो जाने पर शरीर काम के  लायक़ नहीं रहता ।’’ इसी प्रकार सर एंड्रू क्लार्क वार्ट [ एम॰डी॰] का कथन है, ‘‘शरीर को अल्कोहल से कभी लाभ नहीं हो सकता ।’’
शराब ज़हर है
शराब एक ज़हरीला पदार्थ है । भोजन में यह गुण होना चाहिए कि वह शरीर का पोषण करे, नसों को बढ़ाये और शक्ति पैदा करे, लेकिन ज़हर में ये गुण नहीं होते । ज़हर को परिभाषित करते हुए डॉ॰ लेथवे लिखते हैं, ‘‘जो पदार्थ जीवित शरीर की नसों में चेतन शक्ति को नष्ट करता है अथवा जीवन का ह्रास करता है वह ज़हर है ।’’
शराब वह ज़हरीला पदार्थ है, जो आदमी को इतना मदहोश कर देता  है कि वह होशोहवास खो बैठता है । उसकी बुद्धि पर परदा पड़ जाता है । शराब मस्तिष्क में उत्तेजना और व्याकुलता उत्पन्न करती है, मस्तिष्क के विकास को रोकती है, ज्ञान तंतुओं को समेटती है ।
डॉ॰ एस॰के ॰ वर्मा लिखते हैं, ‘‘मद्यपान से सबसे पहले प्रभावित होता है मस्तिष्क का उच्चतम  कार्य । मदिरा सेवन से निर्णय की क्षमता घट जाती अथवा समाप्त हो जाती है, किन्तु भावनाएं फिर भी शोख रहती 
हैं । प्रकारान्तर में आवाज़ बदलती है, ज़बान लड़खड़ाती है तथा मांसपेशियों का सकल संचालन उलझता है, जिससे व्यक्ति सीध चल पाने में अक्षम हो जाता है । भले-बुरे की समझ न रह जाने से मदिरा के  कामोद्दीपक गुण को समझा जा सकता है । इससे काम शक्ति ही नहीं कामेच्छा भी घट जाती है ।’’           [ दैनिक जागरण, 25 जून 97 ]
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शराब का ज़हरीलापन इन्सान की ज़िन्दगी ख़त्म कर डालता है । एक बार मैरांडा पहाड़ियों की एक खान में चार आदमी और एक लड़का क़ैद  करके बन्द कर दिये गये । उन्हें खाने को कुछ नहीं दिया गया । उसमें पानी का एक स्रोत बहता था। उनमें से एक आदमी के पास चोरी से शराब की एक बोतल छिपी रह गयी थी । दस दिन बाद जब उन्हें छोड़ देने के लिए निकाला गया, तो पता चला कि उस व्यक्ति ने पानी को छुआ भी नहीं, शराब ही पी, वह आठवें दिन ही मर चुका था । बाकी  सबने पानी पिया और वे जीवित निकले । मेडिकल साइंस की दृष्टि से इसकी वजह यह थी कि शरीर में पानी की आपूर्ति होती रही । अतः जैविक तत्व तेज़ी से नहीं नष्ट हो सके । शरीर की हड्डी में 22 प्रतिशत, नसों में 76 प्रतिशत, रक्त में 70 प्रतिशत, अंतड़ियों के रस में 87 प्रतिशत पानी का अंश रहता है । शराब नसों और पुट्ठों की छोटी कोशिकाओं को नष्ट करके उनका बढ़ना रोक देती है । सर विक्टर होसल [ एफ॰आर॰एस॰] ने सच कहा है, ‘‘अल्कोहल [ शराब ] डॉक्टरी के  लिए भी योग्य नहीं है । भोजन भी नहीं है ।’’

एक प्रयोग
समाज में कुछ शराब समर्थक ऐसे मिल जाएंगे, जो कहते हैं कि यह नशीली तो है, लेकिन ज़हरीली नहीं है । उनकी यह बात बिलकुल झूठी है । शराब का ज़हरीलापन वैज्ञानिक प्रयोग से स्पष्ट हो जाता है । यह प्रयोग आप ख़ुद कर सकते हैं ।
चार परखनलियां लीजिए । सब में बराबर मात्रा में कच्चे अंडे की सफ़ेदी डालिए । फिर एक परखनली में कार्बोलिक एसिड ,दूसरी में Nitric Acid Carrosive Sublimate Alchohal सबको हिला-हिलाकर थोड़ी देर के लिए रख दें । आप देखेंगे कि सबमें अंडे की सफेदी एक तरह से जम गयी है । ये चारों रासायनिक पदार्थ अलग-अलग गुण वाले हैं, लेकिन सबका रासायनिक प्रभाव एक है । इससे यह सिद्ध हुआ कि अल्कोहल भी शेष तीनों ज़हरों जैसा गुण रखता है । पशु-पक्षियों और पौधों पर अल्कोहल के जो प्रयोग किये गये हैं, उनसे यह प्रमाणित हुआ है कि अल्कोहल घातक ज़हर है ।
अमेरिका के डॉ॰ सर बी॰डब्ल्यू॰ रिचर्डसन ने एक बार मडूसा मछली पर अल्कोहल का परीक्षण किया । क्यू गार्डन्स स्थित विक्टोरिया रेजिया नामक तालाब में मडूसा मछली को पालने वेफ लिए 80 डिग्री फारेनहाइट पानी का तापमान रखा जाता है । 
इस तापमान वाले पानी के दो बर्तन लिए गये । दोनों में एक हज़ार ग्रेन तालाब का पानी भरा गया । एक बर्तन में एक ग्रेन [0.0648 ग्राम ] अल्कोहल डालकर अच्छी तरह हिला-मिला दी गयी । फिर उसमें एक-एक मडूसा मछली डाली गयी। अल्कोहल का तत्काल प्रभाव देखने में आया। दो मिनट के भीतर ही मछली की हरकतें जो एक मिनट में 74 गिनी गयी, बन्द हो गयी । और वह नीचे बैठती गयी । वह बहुत अधिक  सिकुड़ गयी और पांच मिनट के बाद वह बिलकुल पेंदी में बैठ गयी एवं जड़वत हो गयी । उसे तुरन्त निकालकर एक दूसरे बर्तन में जिसमें ख़ाली टैंक का पानी भरा था, डाला गया और वह 24 घंटे तक उसी में पड़ी रहने दी गयी, फिर भी वह अच्छी नहीं हुई । इससे यह मालूम हुआ कि 1000वें पानी में अल्कोहल का एकवां भाग भी जीवन  के लिए कितना घातक और ख़तरनाक है । डॉ॰ रिचर्डसन कहते हैं कि ‘‘यह प्रयोग मैंने अनेक प्रकार से करके देखा, मनुष्यों पर भी करके  देखा, प्रत्येक अवस्था में अल्कोहल का ज़हरीला प्रभाव सामने आया ।’’

‘ज़हर’ के  कुप्रभाव
जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है कि शराब मन-मस्तिष्क को चौपट कर देती है । शराब नसों को जीर्ण-शीर्ण बनाकर शरीर को पिंजर में तब्दील कर देती है।
शराब के रसिया कुछ डॉक्टर यह कहते फिरते हैं कि शराब का हृदय पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता । यह बात सरासर ग़लत है । शराब शरीर में ऑक्सीजन के प्रसार को रोकती है, अतएव चर्बी बढ़ने लगती है । यद्यपि शराब का हृदय वाहनियों से सीधा संबंध् नहीं होता, लेकिन चर्बी की बृद्धि और मन-मस्तिष्क के प्रभाव होने का सीधा प्रभाव हृदय पर पड़ता है । यह अभिमत सही नहीं लगता कि कोलेस्ट्राल-एच॰डी॰एल॰ यानी उच्च घनत्व की लाइप्रोटींस संचार तंत्र में शराब कोलेस्ट्राल के हानिकारक तत्वों को दूर करने में मदद करता है । यह समाज के दुश्मन डॉक्टरों की फैलायी हुई अफवाह है । डॉक्टर पारकेस और डॉक्टर वूलोविज ने सबसे पहले हृदय पर शराब के क्या कुप्रभाव पड़ते हैं, इसका परीक्षण किया । उन्होंने अल्कोहल और पानी की अलग-अलग ख़ुराक पर एक स्वस्थ व्यक्ति को रखा । अल्कोहल के  इस्तेमाल से हृदय की गति बहुत बढ़ गयी । सामान्य अवस्था में स्वस्थ व्यक्ति का हृदय चौबीस घंटे में एक लाख बार धड़कता है । 
हृदय में दो कोनेरिया [ प्रकोष्ठ ] होती हैं, जिनमें 6 औंस रक्त का प्रवाह रहता है । यह रक्त इतनी तेज़ी से आता-जाता है कि अगर खुली हवा में यह छूटे तो 5 अथवा 6 फुट की दूरी पर जाकर पड़े ।
हृदय को यह श्रम 116 टन बोझ एक फुट ऊपर उठाने के समान करना पड़ता है । परीक्षण से ज्ञात हुआ कि एक औंस अल्कोहल से हृदय की धड़कन 4300 बढ़ जाती है, दो औंस से 8600 और तीन औंस से 12900 ।  इसका तात्पर्य यह हुआ कि शराब हृदय के लिए इतना नुक़सानदेह है कि उसका कार्य बढ़ जाता है । उसकी शक्ति निरर्थक व्यय हो जाती है । गति के बढ़ जाने से रक्त के प्रवाह में कमी आ जाती है । इस प्रकार हृदय की संचित ऊर्जा नष्ट होने लगती है । शराबियों क हृदय में चर्बी की मात्रा बढ़ जाती है, हृदय सिकुड़ कर मृतप्राय हो जाता है और रक्त का अभाव होते ही हृदय काम करना बंद कर देता है । दरअस्ल रक्त कोशिकाओं में और भी अत्यन्त सूक्ष्म कोशिकाएं होती हैं, जो ऑक्सीजन को खींचती हैं । अल्कोहल इन कोशिकाओं को सिकोड़ देती है । फिर वे निष्क्रिय हो जाती हैं और ऑक्सीजन ग्रहण करने में असमर्थ हो जाती हैं । ऑक्सीकरण की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाने से रक्त में दूषित पदार्थ एकत्र होते चले जाते हैं और शरीर विभिन्न रोगों से ग्रस्त हो जाता है । डॉ॰ फ्रेंक चेसायर ने मेंढ़कों पर अल्कोहल का परीक्षण करके  देखा, तो मेंढ़कों के हृदय, पाचन अंगों, टांग, सिर सब प्रभावित हुए । इन सब अंगों की क्रियाएं बाधित  हो गयीं ।

पाचन-क्रिया भी प्रभावित
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शराब पाचन शक्ति को भी नष्ट कर डालती है । शराबी व्यक्ति के पेट में जो पाचक-रस बनता है, उसमें पेप्सिन बहुत कम होती है । नयी पेप्सिन के निर्माण में शराब रोड़ा अटकाती है । अतः पाचक-रस में भोजन पचाने वाले तत्वों का अभाव हो जाता है । जेनेवा यूनीवर्सिटी में  प्रोफ़ेसर रह चुके डॉ॰ एल॰ रेविलियड और डॉ॰ पालबिनेट ने निष्कर्ष निकाला है कि शराबी का पेट अन्दर की ओर सिकुड़कर मोज़े की शक्ल का हो जाता है । उसमें चर्बी बढ़ जाती है । डॉ॰ बीयूमेंट का यह कहना बिलकुल सही है कि ‘‘शराबी लोगों को पेट की कोई न कोई बीमारी मौजूदगी अवश्यंभावी है ।’’
शराब गुर्दों और लीवर को भी ख़राब कर डालती है । शराब गुर्दों का आकार बढ़ा देती है, उसकी क्रिया मद्धिम कर देती है । शराबी व्यक्ति के  गुर्दे प्रायः झुरीदार, खुरदरे और पीले रंग के हो जाते हैं । तात्पर्य यह कि शराब शरीर के प्रत्येक अंग पर अपना कुप्रभाव डालती है । अमेरिका के  डॉ॰ हार्वी वेले कहते हैं, ‘‘औषध तत्व सार के पारंगत सभी विद्वान जिन्होंने शराब के प्रभाव का अन्वेंषण किया है, एकमत से सहमत हैं कि शराब पौष्टिक पदार्थ नहीं है । यह एक निरा ज़हरीला पदार्थ है, इसलिए व्हिस्की और ब्रांडी दोनों ही औषधि की श्रेणी में से अलग कर दी गयी है ।’’
.मद्य-पान करने वाले का मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है । ‘ऐसा प्रायः होता है कि नशे में आदमी अपनी स्त्री और बहनों में तथा पिता और मित्रों में भेद नहीं रख पाता और अत्यंत अशिष्ट व्यवहार कर बैठता है ।’ 
[ ‘अनंत आनंद’, आई॰जे॰ सिंह, पृष्ठ 553 ]
‘अमेरिका में हुए एक ताज़ा शोध के अनुसार गर्भावस्था के दौरान शराब-सेवन से शिशु के दिमाग़ की कोशिकाओं को नुक़सान पहुंचता है|  इससे उसवेफ मानसिक व शारीरिक विकास दोनों में ही अवरोध पैदा होता है ।’ 
[ ‘लोकतेज’, 10 फरवरी 2012 ]
लोगों का ज़हर-प्रेम
अभी कुछ दिनों पूर्व एक अंग्रेज़ी दैनिक में शराब के इस्तेमाल पर एक सर्वेक्षणात्मक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसमें बताया गया कि भारतीय समाज के विशेषकर अभिजात्य वर्ग के युवक और युवतियां शराब के प्रति तेज़ी से आकर्षित हो रहे हैं । यह वर्ग फैशन के तौर पर भी शराब का इस्तेमाल करता है । कहने का मतलब यह कि इस ज़हरीले पदार्थ का इस्तेमाल पढ़े-लिखे मूर्ख तो पहले से करते रहे हैं, यह दुर्व्यसन अपनी पीढ़ी की ओर भी स्थानांतरित कर रहे हैं । आश्चर्य और चिन्ता का विषय है लोगों की यह बुद्धि -भ्रष्टता ।
हमारे देश में एक ओर मद्य-निषेध विभाग शराब से बचने के लिए लोगों को नसीहतें करता है, दूसरी ओर आबकारी विभाग शराब की ख़ुद की दुकानें खुलवाता और इसकी बिक्री के लिए लाइसेंस प्रदान करता है|  इसका नतीजा यह है कि शराब दूर-दराज़ गांवों तक पहुंच गयी है और उन लोगों का  भी जीवन तबाह कर रही है जो अभी तक शराब की पहुंच से बाहर थे । यह भी कम आश्चर्य और चिन्ता का विषय नहीं है । 
गांधी जी ने कहा था, ‘बैरिस्टरों को भी शराब पीकर नालियों में लोटते हुए पाया गया है । उच्च वर्गीय होने के कारण पुलिस उनको बचा लेता है, किन्तु इसी अपराध के लिए ग़रीब लोग दंडित किये जाते हैं ।’
यह बात भी नहीं है कि लोग शराब के नुक़सानों से पूर्णतः अपरिचित हों, लेकिन यह अवश्य है कि उन्हें इसके हर पहलू की जानकारी नहीं है|  शराब पीने वाले लोगों को इतना अवश्य मालूम होता है कि वह अपनी लत को शांत करने के लिए जिस चीज़ का सेवन करते हैं, वह नुक़सानदेह है । 
हमारे देश में शराब से होने वाली मौतों की संख्या बहुत ज़्यादा है । अख़बार, पत्रिकाएं, आकाशवाणी और टी॰वी॰ आदि इसकी गवाह हैं, लेकिन ये इसके  ख़िलाफ जनचेतना जगाने में असफल हैं, बल्कि यह बात ज़्यादा सही है कि इसके लिए मीडिया कोई गंभीर प्रयास ही नहीं करती  | उल्टे टी॰वी॰, फिल्मों और कुछ पत्र-पत्रिकाओं में शराब के  विज्ञापन भी प्रसारित-प्रकाशित होते रहते हैं । ऐसे लेख-आलेख आदि भी छपते रहते हैं जो शराब पीने के लिए जनता को उकसाते रहते हैं । मतलब यह कि संबंधित  जन-माध्यम का उपकरण शराब-प्रबोधी  उपकरण बन जाता है । इन हरकतों से शराबबंदी असंभव-सी लगती है|  यह कुतर्क भी सामने आता है कि सर्दी से बचने के लिए मद्य-पान ज़रूरी है। जी॰ई॰जी॰ कैटलिन का कहना है, ‘जहां सर्दी से बचना आवश्यक हो जाता है, उन केसों में शराब का सेवन व्यर्थ ही नहीं, ख़तरनाक भी है ।’ धार्मिक ग्रंथों में शराबबंदी का आदेश मौजूद होने के  बावजूद स्वार्थी तत्वों के हथकंडों में लोग आते रहते हैं और शराबी बनते रहते हैं । आइए देखें, धर्म -ग्रंथों में शराब के विरुद्ध क्या-क्या आदेश मौजूद हैं ।
धार्मिक शिक्षाओं में शराब का निषेध
इस्लाम की सद्क्रान्तियों में से एक है शराब और मादक पदार्थों के  सेवन से मानवता को निजात दिलाना । अल्लाह के  रसूल हज़रत मुहम्मद [ सल्ल॰] के समय  में अरब समाज इतना पतित था कि जीवन में भोग-विलास  की जो भी सामग्री प्राप्त हो सकती थी उससे आनन्द लेना और आज़ादी के साथ शराब पीना लोगों की दिनचर्या में शामिल हो गयी थी । लेकिन उन पर इस्लामी शिक्षाओं का इतना ज़बरदस्त प्रभाव पड़ा कि शराब पीना बिलकुल बंद कर दिया और जब क़ुरआन की ये आयतें अवतरित हुईं, तो जिन लोगों के पास जो कुछ  शराब थी, उसे मदीना की गलियों में बहा दी -
‘‘ऐ ईमान लाने वालो ! यह शराब, जुआ और ये थान एवं पांसे शैतान के  गंदे कामों में से है । अतः इनसे बचो ताकि तुम सफल हो सको । शैतान तो यही चाहता है कि शराब और जुए के द्वारा तुम्हारे बीच वैमनस्य व द्वेष पैदा कर दे और तुम्हें अल्लाह की याद और नमाज़ से रोक दे । फिर क्या तुम बाज़ आ जाओगे ? अल्लाह का आदेश मानो और रसूल का आदेश मानो और [ इन चीज़ों से ] बचते रहो । यदि तुमने [ हुक्म मानने से ] मुंह मोड़ा, तो जान लो कि हमारे रसूल पर केवल स्पष्ट रूप से [ संदेश ] पहुंचा देने की ही ज़िम्मेदारी है ।’’   [ क़ुरआन , 5: 90-92 ]
क़ुरआन की इन आयतों में शराब के लिए ‘‘ख़म्र’’ शब्द प्रयुक्त हुआ है, जिसकी व्याख्या हज़रत उमर [ रज़ि॰] ने इन शब्दों में की है, ‘‘ख़म्र उस चीज़ को कहते हैं जो बुद्धि पर परदा डाल दे ।’’ शराब मन-मस्तिष्क को सर्वाधिक प्रभावित करती है और बुद्धि को नष्ट कर डालती है । डॉ॰ ई॰ मैक्डोवेल कासग्रेव [ एम॰डी॰, एफ़॰आर॰सी॰पी॰] के अनुसार,‘‘अल्कोहल मस्तिष्क को नष्ट कर देती है ।’’.
इस्लाम ने हर प्रकार की शराब ही को हराम नहीं किया है, बल्कि इसके  अन्तर्गत हर वह चीज़ आ जाती है जो नशावर हो और मनुष्य की सोचने-समझने की शक्ति को नष्ट करे या उसे क्षति पहुंचाए ।
इस अवसर पर इस बात को भी ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि मनुष्य का जिस चीज़ के कारण समस्त प्राणियों में विशिष्ट और प्रतिष्ठित एवं केन्द्रीय स्थान दिया गया है, वह वास्तव में उसकी सोचने-समझने और सत्य-असत्य और भले-बुरे में अन्तर करने की क्षमता है । अब यह स्वाभाविक बात है कि जिस चीज़ या काम से मनुष्य की इस क्षमता और योग्यता को आघात पहुंचा हो या उसके पूर्ण रूप से क्रियाशील होने में बाधा उत्पन्न होती हो, उसको मनुष्य का निकृष्टतम शत्रु समझा जाए । शराब चूंकि मस्तिष्क को स्वाभाविक रूप से कार्य करने में रुकावट डालती है और उसकी तर्कशक्ति को शिथिल करके मनुष्य को मानवता से ही वंचित कर देती है, इसलिए उसे मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु घोषित करना बिलकुल उचित ही है ।
क़ुरआन मजीद में शराब के विषय में जो कुछ कहा गया है उसका स्पष्टीकरण अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद [ सल्ल॰ ] के बहुत से कथनों से भी होता है । आपने कहा है , ‘प्रत्येक मादक चीज़ ‘ख़म्र’ है और प्रत्येक मादक चीज़ हराम है ।’
‘वह हर पेय जो नशा पैदा करे, हराम है और मैं हर मादक चीज़ से वर्जित करता हूं ।’
शराब की हानि और ख़राबी के सिलसिले में इस्लाम के दृष्टिकोण को  इससे भी समझा जा सकता है कि अल्लाह 
के रसूल [ सल्ल॰ ] ने कहा , ‘अल्लाह ने लानत की है शराब पर, उसके पीने वाले पर, पिलाने वाले पर, बेचने वाले पर, उसको ख़रीदने वाले पर और उसे निचोड़ने वाले पर और जिसके लिए वह निचोड़ी जाए उस पर, उसे उठाकर ले जाने वाले पर और उस पर भी जिसके पास वह ले जायी जाए ।’
शराब के सिलसिले में इस्लाम की सख़्ती का यह हाल है कि एक व्यक्ति ने नबी [ सल्ल॰ ] से पूछा कि ‘क्या दवा के रूप में उसे प्रयोग में लाने की इजाज़त है ? तो आपने कहा,‘शराब दवा नहीं बल्कि बीमारी है।’
एक सहाबी जो हिमियर के रहने वाले थे, कहते हैं कि मैंने नबी [सल्ल॰] से निवेदन किया कि ‘हम एक ऐसे क्षेत्र के रहने वाले हैं जो अत्यन्त ठंडा है और हमें मेहनत भी बहुत करनी पड़ती है । हम लोग एक प्रकार की शराब बनाते हैं और उसे पीकर थकावट और ठंडक का मुकाबला करते हैं ।’ आपने पूछा, जो चीज़ तुम पीते हो वह नशा करती है ?’ मैंने कहा हां, आपने कहा, ‘तो फिर उससे परहेज़ करो ।’ मैंने निवेदन किया, ‘किन्तु हमारे इलाक़े के लोग नहीं मानेंगे।’ तो आपने कहा, ‘यदि वे न मानें तो उनसे युद्ध करो ।’
शराब के सिलसिले में इस्लाम का एक नियम यह भी है कि नशीली चीज़ को कम से कम मात्रा में भी इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं है । और यह मानव दुर्बलता की दृष्टि से एक बुद्धिसंगत बात है, क्योंकि शराब के विषय में जहां यह बात सत्य है कि मुंह को लग जाए तो बड़ी मुश्किल से छूटती है, वहीं यह बात भी सत्य है कि इसमें किसी सीमा का निर्धरण बहुत मुश्किल है, क्योंकि सीमा का निर्धरण बुद्धि ही करेगी और वह शराब के प्रभाव से शिथिल हो जाती है ।
अल्लाह के नबी [ सल्ल॰ ] कहते हैं , ‘जिस चीज़ की अधिक मात्रा नशा पैदा करे, उसकी थोड़ी मात्रा भी हराम है ।’
बाद के काल में भी मुस्लिम शासकों ने शराब और मादक पदार्थों से समाज को पाक रखने के लिए आदेश और घोषणाएं जारी कीं । इसका व्यावहारिक रूप भी देखने को मिला । भारत में बादशाह जहांगीर ने शराबनोशी के ख़िलाफ राजाज्ञा जारी की । अलाउद्दीन ख़िलजी के  शासनकाल में तो शराबियों को शिक्षाप्रद सज़ाएं दी गयीं, जिसके  फलस्वरूप लोगों की यह लत जाती रही । अकबर ने भी इसके विरुद्ध  घोषणाएं जारी कीं । औरंगज़ेब के शासनकाल में तो दिल्ली में शराब की एक भी दुकान न थी । बर्नियर [ फ़्रांसीसी डॉक्टर ] भारत आया था और औरंगज़ेब के दरबार में कई दिनों तक ठहरा रहा । वह लिखता है कि ‘‘शराब जो हमारे यहां भोजन का प्रधान अंग है, दिल्ली की किसी भी दुकान में नहीं मिलती ।’’
हिन्दू धर्म की शिक्षाएं
इस्लाम में शराब और मादक पदार्थों के इस्तेमाल के ख़िलाफ जिस प्रकार स्पष्ट और दो टूक अंदाज़ में शिक्षाएं मिलती हैं, अन्य धर्मों में नहीं मिलतीं । इस वजह से भी पूर्ण शराबबंदी के मार्ग में अवरोध उत्पन्न होता है और मादक पदार्थों का कारोबार फलता-पूफलता रहता है ।
हिन्दू धर्म के बहुत से ग्रंथों में सोम और सुरा का उल्लेख मिलता है । डॉ॰ पी॰वी॰ काणे अपनी प्रसिद्ध पुस्तक  ‘‘धर्मशास्त्र का इतिहास '' [प्रथम भाग ] में लिखते हैं कि सोम मदमस्त करनेवाला पेय पदार्थ था और इसका प्रयोग केवल देवगण और पुरोहित लोग कर सकते थे | '' [पृ॰ 428 ]
 इस पुस्तक में ‘‘मद्यपान’’ शीर्षक के अन्तर्गत डॉ॰ काणे लिखते हैं, ‘‘सुरा नामक मदिरा चावल के आटे से बनती थी [ पृ॰ 403] ’’ लेकिन सुरा का व्यापार ब्राह्मण के लिए वर्जित है | ''[ मनुस्मृति 10-89] ,  याज्ञवल्क्य स्मृति [ 3-27 ]
 वैदिक साहित्य के अनुसार सौत्रामणी यज्ञ में ब्राह्मण को बुलाया जाता था । वह सुरा से भरे पात्रा के निचले भाग वाली सुरा पीता था ।
कहते हैं, बाद में ब्राह्मणों ने सुरा पीनी छोड़ दी, लेकिन यह दूसरी जाति के लिए वैध ठहरा दी गयी । काठक संहिता में है, ‘‘अतः प्रौढ़, युवक, वधुएं और श्वसुर सुरा पीते हैं, साथ-साथ प्रलाप करते हैं, मूर्खता सचमुच अपराध है, अतः ब्राह्मण यह सोचकर कि यदि मैं पिऊंगा तो अपराध करूंगा, सुरा नहीं पीता, अतः यह क्षत्रिय के लिए है । ब्राह्मण से कहना चाहिए कि यदि क्षत्रिय सुरा पिये तो उसकी हानि नहीं होगी [ 12-12 ]।’’ ऐतरेय ब्राह्मण [ 37-4 ] में लिखा है कि अभिषेक के समय पुरोहित राजा के हाथ में सुरापात्र रखता था ।

मनुस्मृति [ 11-93,94 ]  के अनुसार, सुरा तीन प्रकार की होती है: गुड़वाली, आटेवाली और महुए के फूलों वाली [ गौड़ी, पैष्टी, माध्वी ] - इनमें किसी को भी ब्राह्मण न पिये । ब्राह्मणों के लिए शराब का स्पर्श ही आत्महत्या के समान है । मनुस्मृति के इन श्लोकों और गौतम स्मृति [ 2-25 ] में ब्राह्मणों के लिए सभी प्रकार की सुरा वर्जित मानी गयी है, किन्तु क्षत्रियों और वैश्यों के लिए केवल पैष्टी वर्जित है। विष्णु धर्म सूत्र [ 22-83,84,25 ]  में वर्णित है कि ब्राह्मणों के लिए दस प्रकार की शराबें वर्जित हैं -  [1] साधूक [ महुआ वाली ] [ 2 ] ऐक्षव [ईखवाली]  [3 ] टांक [4 ] कौल [ 5 ] खार्जूर [ खजूर वाली ] [ 6 ] पानस [ कटहल वाली ] [ 7] अंगूरी [ 8 ] माध्वी [ 9 ] मैरेय, और [10 ] नारिकेलज ।
 डॉ॰ काणे लिखते हैं कि ‘‘किन्तु ये दसों क्षत्रियों एवं वैश्यों के लिए वर्जित नहीं है [ पृ॰ 430 ]।’’ पानस नामक शराब बनाने का तरीका  ' मत्स्युक तंत्र ' नामक पुस्तक में इस प्रकार बताया गया है - कच्चे माल पानस [ कटहल ] को एक बर्तन में रखकर रोज़ाना कच्चे दूध् की धार उस पर डाला जाए, उसमें थोड़ा कच्चा मांस बारीक करके प्रति तीसरे दिन मिलाया जाए, फिर भांग और खाने का चूना बुरक कर उसे सड़ाया जाए । मालूम हुआ कि शराब के निर्माण में मांस भी प्रयुक्त होता था । शराब कुछ देवी-देवताओं के अर्पण-तर्पण के भी काम आती है । 
एक दूसरा पक्ष
उपर्युक्त विवरण से यह बात उभर कर सामने आयी कि शराब को एक विशिष्ट जाति को छोड़कर शेष के लिए विहित ठहरा दिया गया है । यहां पर यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि हिन्दू धर्मग्रंथों में शराब से परहेज़ करने की भी शिक्षाएं विद्यमान हैं । अब यहां इनका उल्लेख किया जाएगा -
ऋग्वेद [ 7-86-6 ] के अनुसार, वसिष्ठ ने वरुण से प्रार्थना भरे शब्दों में कहा है कि ‘‘मनुष्य स्वयं अपनी वृत्ति अथवा शक्ति से पाप नहीं करता, प्रत्युत भाग्य, सुरा, क्रोध्, जुआ और असावधानी के कारण वह ऐसा करता है ।’’
शतपथ ब्राह्मण [ 5-5-4-28 ] में सोम को सत्य, समृद्धि और प्रकाश एवं सुरा को असत्य क्लेश और अन्धकार कहा है। सुरा अथवा मद्य का सेवन एक महापातक कहा गया है [ वसिष्ठ धर्म सूत्र 1-20, विष्णु धर्म  सूत्र 15-1, आपस्तम्ब धर्म सूत्र 1-7-21-8, याज्ञवल्क्य 3-227 ]। गौतम [ 2-25 ] , आपस्तम्ब धर्म सूत्र [ 1-5-17-21] और मनु [11-94] ने एक स्वर से ब्राह्मणों के लिए सभी अवस्थाओं से नशीली वस्तुओं को वर्जित ठहराया है । मनु [ 9-80 ] और याज्ञवल्क्य [ 1-73 ] के  अनुसार ‘‘मद्यपान करने वाली पत्नी त्याज्य है ।’’ यदि ब्राह्मण पत्नी सुरा-पान करती है तो वह अपने पति के लोक को नहीं प्राप्त कर सकती, वह इसी लोक में जोंक, सीपी, घोंघा बनकर जल में घूमती रहती है । याज्ञवल्क्य स्मृति में है, ‘‘सुरापान करने वाली पत्नी अपने आगे के जन्मों में इस संसार में कुतिया, चील या सूअर होती है [ 3-256 ]।’’ यह भी सच है कि हिन्दू समाज में कुछ ऐसे त्योहार प्रचलित हैं, जिसमें शराब और जुआ को धर्म -विहित ठहरा दिया जाता है ।
बौद्ध धर्म की शिक्षाएं
मेगस्थनीज और स्ट्रैबो ने लिखा है कि यज्ञों के कालों को छोड़कर भारतीय कभी भी सुरापान नहीं करते [ ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के  समय ] महात्मा बुद्ध  ने यज्ञों के समय होने वाले अनाचारों के  ख़िलाफ आवाज़ बुलंद की । उन्होंने मद्यपान [ शराबनोशी ] को बुरा और त्याज्य ठहराया ।
बौद्ध धर्मिक पुस्तकों में शराब के इस्तेमाल के ख़िलाफ जनता को सचेत करने वाली एक शिक्षाप्रद कथा का उल्लेख मिलता है । पाठकों की जानकारी के लिए उसे हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं -
एक दिन की बात है कि प्रभु संसार के सब स्रष्ट जीवों पर दृष्टिपात कर रहे थे । सर्वमित्रा नामक एक राजा था । प्रभु ने देखा कि यह ख़ूब शराब पी रहा है । उसके साथ उसके मंत्री -गण ही नहीं उसकी प्रजा भी शराब की लत से ग्रस्त है । प्रभु ने सोचा, ‘‘यह तो महा पापाचार हो रहा है । हाय ! हाय !! इन इन्सानों पर यह कैसा अभिशाप है । शराब पीने में तो मधुर है, परन्तु इसका परिणाम बहुत भयानक है । इन सबका बुद्धि -विवेक नष्ट हो गया है । ये अनाचार क्यों कर रहे हैं ? यदि यह राजा सुधर जाए तो शेष प्रजाजन भी सुधर जाएंगे ।’’
ऐसा विचार कर प्रभु ने ब्राह्मण रूप धरण किया । एक सुराही में शराब भरकर अपने कंधे पर लटका ली और सर्वमित्रा के पास जा पहुंचे । राजा दरबारियों के साथ शराब पीने में मस्त था । प्रभु ने कहा कि मैं सुगंध्ति मधुर शराब लाया हूं । देखो! कितनी प्रिय चीज़ है बताओ ! तुममें से कौन इसकी कीमत दे सकता है ?

राजा की उत्सुकता को देखते हुए प्रभु ने कहा, ‘‘सुनो राजन इसमें न जल है, न मेद्यों की अमृत बूंदें हैं, न यह किसी पवित्रा स्रोत की पुनीत धारा है, न इसमें सुगंध्ति पुष्पों का सार मधु है, न परदर्शी घृत [ घी ] है और न ही दूध् है जो शरद-किरणों की मधुरिमा से युक्त हो । नहीं, नहीं, इस सुराही में पिशाचिनी शराब है । इस शराब के गुण सुनो ! जो इसको पियेगा उसकी सुध-बुध न रहेगी, वह नशे में चूर होकर भोजन के बदले विष्ठा [ गंदगी ] भी खा सकेगा । ऐसी यह शराब है, इसे ख़रीद लो, इतनी निकृष्ट यह सुराही बिक्री ही के लिए है । 
इस पदार्थ में तुम्हारा समस्त ज्ञान और विवेक नष्ट कर देने की शक्ति है, जिससे तुम अपनी विचारधारा पर अधिकार न रखकर एक जंगली जानवर की तरह व्यवहार कर सकोगे ।
तुम्हारे शत्रु तुम्हारी दशा पर हंसी उड़ाएंगे । तुम इसे पीकर ख़ूब नाच सकते हो, गा भी सकते हो। यह शराब अवश्य तुम्हारे ख़रीदने योग्य है|  इसमें एक भी अच्छा गुण नहीं है । इसके पीने से तुम्हारी लाज-भावना जाती रहेगी । तुम नंगे भी रह सकते हो । लोगों का समुदाय यदि तुम पर थूके , तब भी तुम्हें बुरा प्रतीत न होगा । लोग तुम पर गोबर, कीचड़, कंकर-पत्थर उछालें तब भी तुम न जान सकोगे । ऐसी शराब को मैं तुम्हारे पास बेचने के लिए लाया हूं ।
जो स्त्री इसका सेवन करेगी, वह नशे में चूर होकर अपने माता-पिता को रस्सियों से बांध्कर और कुबेर जैसे पति को ठुकराकर पतन के गढ़े में प्रसन्नता से जा गिरेगी । ऐसी यह शराब है । 
इसने अनेक सम्पन्न परिवारों को नष्ट किया है, सुन्दर स्वर्ण शरीर को पर जलाकर भस्म किया है, राजमहल और सम्राटों को धूल में मिलाकर पद दलित किया है, फिर भी इसकी प्यास नहीं बुझती ! ऐसी है प्रलयंकारी यह शराब !
इसे ज़बान पर रखते ही मन मलित हो जाता है, जी ऐंठ जाता है । ख़ूब हंसो, ख़ूब बको, कुछ भी ज्ञान नहीं रहता । उसमें झूठ बोलने का साहस आ जाता है, वह सच को झूठ और झूठ को सच समझने लगता है । नशा करने वाली इस वस्तु [ शराब ] के स्पर्श-मात्रा से ही पाप लगता है, बुद्धि मलिन होती, कष्ट और रोग बढ़ते हैं । यह समस्त अपराधों की जननी है, उज्ज्वल मन का भयानकअन्धकार है, जिसकी तीक्ष्ण ज्वाला शीतल हृदय पर सदैव धधककर दहकती रहती है । जो इसके  प्रभाव में होकर अपने माता-पिता, स्त्री , बहन और बच्चों का हंसते-हंसते क़त्ल कर सकता है, ऐसी यह शराब है । हे प्रजा के राजा ! यह पेय तुम्हारे प्रतापी कंठ से नीचे उतरने योग्य है, तुम इसे ख़रीदकर सेवन करो ।
इस शराब को ज़रा देखो तो ! इसका माणिक की भांति हल्का लाल रंग है...इसे पीकर इन्सान जानवर बन जाता है, यह नरक की खान है । प्रभु ने यह बखान करके चारों ओर देखा । सब स्तब्ध् थे । अचानक राजा ने तेज़ी से उठकर अपने शराब के पात्रों-बर्तनों को दीवार से टकराकर चूर-चूर कर डाला । राजा यह कहकर प्रभु के चरणों में गिर पड़ा, ‘‘हाय ! पिशाचिनी, मायाविनी शराब, तू जा ! जा !! मुझे छोड़ !!!’’
महात्मा बुद्ध ने अपने अनुयायियों को नसीहत करते हुए कहा था, ‘‘मनुष्यो! तुम सिंह [ शेर ] के  सामने जाते भयभीत न होना-यह पराक्रम की परीक्षा है, तुम तलवार के नीचे सिर झुकाने से भयभीत न होना-यह बलिदान की कसौटी है, तुम पर्वत शिखर से पाताल में पड़ने से भयभीत न होना-वह तप की साधना  है, तुम दहकती ज्वालाओं से विचलित न होना-यह स्वर्ण-परीक्षा है, पर सुरा देवी से सदैव भयभीत रहना, क्योंकि यह पाप और अनाचारों की जननी है ।’’ 
अनेक बौद्ध राजाओं ने अपने शासनकाल में शराबबंदी की नीतियां अपनायीं । चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के काल में कौटिल्य ने शराब की दुकानों पर स्वादिष्ट भोजन रखवा दिये । जो व्यक्ति  शराब पीने के लिए दुकान पर जाता, उसके सामने अच्छे भोजन पेश किये जाते । इनका मूल्य बहुत सस्ता होता था । भोजन में कुछ ऐसी औषधियाँ  मिली होती थीं, जिनसे शराब की लत छूट जाती थी । इस सम्राट के  काल में शराब पीने और पिलाने वाले दोनों दंडित किये जाते थे । सम्राट अशोक भी इस नीति पर चलता रहा ।
हमारे देश में इस समय शराब की 120 करोड़ लीटर वार्षिक क्षमता की 165 फैक्ट्रियां कार्यरत हैं । यहां महिला-दुर्व्यवहार और अपराध की अन्य घटनाओं में भारी वृद्धि होती जा रही है । एक अमेरिकी शोध के  अनुसार , 95 फीसद हत्याओं, 24 फीसद आत्महत्याओं के लिए शराब सेवन ज़िम्मेदार है, जबकि 25 से 30 फीसद मानसिक विक्षिप्तता के  शिकार हो जाते हैं । वास्तव में शराब-सेवन समाज के लिए कलंक है, अभिशाप है । हर व्यसन से जनता को दूर रखने के लिए व्यापक और प्रभावकारी क़दमों की आवश्यकता है ।

- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Apr 26, 2013

निज प्रभुमय देखहिं जगत ....

निज प्रभुमय देखहिं जगत ....
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दूई रा चूं बदर करदम यके दीदम दो आलिम रा ,
यके बीनम यके जोयम यके ख़ानम यके दानम |
- मौलाना रूम 
अर्थात , जब मैंने अपने मन से परायेपन को निकाल बाहर कर दिया , तब दोनों लोकों को एक देखा . अब एक ही देखता हूँ , एक ही ढूंढता हूँ , एक को ही भजता हूँ और एक को ही जानता हूँ .
तुलसीदास जी ' रामचरित मानस ' में लिखते हैं कि शंकर जी ने पार्वती जी से कहा -
उमा जे चरन रत बिगत काम मद क्रोध ,
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं  बिरोध |
इसी भाव को गुरु नानक जी ने इन शब्दों में प्रकट किया है -
मन ते बिनसै सगला भरमु ,
करि पूजै सगल पार ब्रह्मु |
   [ अष्टपदी 9 शब्द 3- 2 ]
अर्थात , भक्त अपने मन से [ परायेपन के ] सारे भ्रमों को त्याग देता है तथा सम्पूर्ण ब्रह्मांड को [ विभिन्न नामों और रूपों में ] पारब्रह्म [ का स्वरूप ] समझ कर उससे प्रेम करता है .
परायेपन के भाव से ही बहुत से झगड़े , बखेड़े और समस्याएं आती हैं , जैसाकि आज हम देख रहे हैं कि इस भाव के फैलाव से धरती की शांति छिनती जा रही है . लोग दूसरों को दुःख पहुंचा कर सुख का अनुभव करते हैं . यह इंसानियत के विरुद्ध है .
मौलाना रूम कहते हैं - 
मिआज़ार कसे व हर  चिन्ह खाही कुन ,
कि दर तरीकते मन ग़ैर अजीं गुनाहे नेस्त |
अर्थात , किसी को दुःख देने के अतिरिक्त और तेरे जी में जो कुछ भी आए ,कर , क्योंकि मेरे धर्म में इससे बढ़कर और कोई पाप ही नहीं .
वे आगे कहते हैं -
दिल बदस्तारद कि हज्जि अकबरस्त ,
अज़ हज़ारां कआबा यक दिल बेहतरस्तु |
अर्थात , दूसरों के दिल को अपने वश में कर लो , यही काबा की परम यात्रा है , क्योंकि सहस्रों काबों से एक दिल ही उत्तम है .
शेख़ सादी के कहा है -
बनी आदम आज़ाए यक दी गरंद ,
कि दर आफरीनद ज़ि जौहर अंद |
अर्थात , आदि उत्पत्ति में एक ही तत्व से उत्पन्न होने के कारण सब मनुष्य एक - दूसरे के अंग हैं . हज़रत मुहम्मद [ स. ] ने फ़रमाया - '' अल्ख्ल्कु इयालु अल्लाहि फा हुब्बूलखल्क़  इला अल्लाहि मनहसन इला इयालिही .''
अर्थात , सब प्राणी परमात्मा कर कुटुम्बी हैं . अतः प्राणियों से परमात्मा की खातिर अच्छा बर्ताव करो , वैसा ही जैसा अपने अपने कुटुंब वालों से करते हो .
एक सुभाषित है -
 सर्वे भवन्तु सुखिनः | सर्वे सन्तु निरामयाः |
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत् |
अर्थात्‌ , संसार में सब सुखी रहें, सब नीरोग या स्वस्थ रहें, सबका कल्याण हो और विश्व में कोई दुःखी न हो . 

- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Apr 25, 2013

कितने लोकतान्त्रिक हैं हम ?


कितने लोकतान्त्रिक हैं हम ?

दोहरी नीतियों और पक्षपात से ख़ुद रही हैं जड़ें !



यह कहने में भला किसको संकोच हो सकता है कि हमारा देश लोकतान्त्रिक मूल्यों में यकीन रखता है . लोकतान्त्रिक शासन - प्रणाली को अपनाने का सीधा अर्थ है जनोन्मुखी सरकार और कल्याणकारी शासन , न कि जनता का दमन , उत्पीड़न और मानवोचित अधिकारों का हनन . इसे सुनिश्चित करने के लिए देश के संविधान में मौलिक अधिकार जोड़े गये और सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाया गया . दबे - कुचले , पिछड़े वर्गों के साथ ही अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के अनेक प्रावधान किये गये . लेकिन अफ़सोस के साथ यह भी कहना पड़ता है कि संवैधानिक और क़ानूनी हित - रक्षक प्रावधानों के बावजूद इन सभी के साथ थोड़ी कमी - बेशी के अंतर के अपवाद के साथ ख़ासकर सरकार द्वारा ज़ुल्म - ज़्यादती और दमन की घटनाएं लगातार जारी हैं . ऐसा बार - बार महसूस होता है कि सरकार चुन - चुनकर  ऐसे लोगों का दमन करती है , जिनके बारे में उसे आशंका है कि वे उसके लिए किसी न किसी तौर पर अभी नहीं तो किसी चरण में खतरा बन सकते हैं . वह सिर्फ़ मुसलमानों के प्रति ही दुर्भाव नहीं रखती , बल्कि धर्म , जाति आदि से उपर उठकर हर उस शख्स या समूह को ठिकाने लगती है , जो उसकी पार्टी के समर्थक नहीं हैं या उसके हित - चिंतक नहीं हैं . इस लाइन पर सोचने के कारण वह रचनाकारों / संस्कृति कर्मियों समेत हर किसी पर हाथ डालती रहती है . ऐसे में जिस किसी वर्ग / समूह या घटक के प्रति उसका सहानुभूतिपरक रवैया होता है , वह भी कभी नहीं बच पाता .  पिछले दिनों दो चर्चित संस्कृतिकर्मी शीतल साठे और सचिन माली को महाराष्ट्र पुलिस ने  विधानसभा के समक्ष सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार कर लिया . इनका सम्बन्ध कबीर कला मंच (पुणे) से है . सरकार पर यह पुराना आरोप है कि वह जिसे चाहती है , फर्ज़ी आरोपों के सहारे गिरफ्तार कराती है और पुलिस द्वारा प्रताड़ित करवाती है ,यह जानते हुए भी कि अदालत में उसकी किरकिरी होगी , लेकिन  ' सबक़ ' सिखाने का उसका मक़सद तो कामयाब हो ही जाता है .  यह पहली बार नहीं है कि साहित्यिक वर्ग आक्रोशित हुआ हो . बहुत से रचनाकार और सर्जनात्मक लोगों एवं बुद्धिजीवियों ने इस घटना की जमकर निंदा की है और कहा है कि हम कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों के लोकतांत्रिक-संवैधानिक अधिकारों के साथ पूरी तरह एकजुटता जाहिर करते हैं और उनको राज्य मशीनरी द्वारा प्रताडि़त किए जाने तथा उन्हें गिरफ्तार किए जाने के खिलाफ व्यापक स्तर पर प्रतिवाद की अपील करते हैं. इन्होंने एक विज्ञप्ति में कहा है कि शासकवर्ग की राज्य मशीनरी लगातार दलाल, गुलाम और समझौतापरस्त बनाने की जो सांस्कृतिक मुहिम चलाती रहती है, जिसकी चपेट में बुद्धिजीवियों और कलाकारों का भी अच्छा-खासा हिस्सा आ जाता है, उसके समानांतर अगर कोई जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए संस्कृतिकर्म को अपनी जिंदगी का मकसद बनाता है और सामाजिक-राजनीतिक वर्चस्व और शोषण-उत्पीड़न का विरोध करता है, तो वह अनुकरणीय है और उससे समाज में बेहतर परिवर्तन की उम्मीद बंधती है. जहाँ तक कबीर कला मंच का ताल्लुक़ है , यह दलितों, कमजोर तबकों व मजदूरों के उत्पीड़न, शोषण और उनके हिंसक दमन के खिलाफ लोगों में चेतना फैलाने का काम करता है. क्या इसका यह सब कार्य सरकार की नज़र में गुनाह हो गया ? !सच तो यह है कि हमारी सरकार ख़ुद ही लोकतंत्र की बड़ी दुश्मन बन जाती हैं . केंद्र और राज्य सरकारों का मुसलमानों  के ताल्लुक़ से रवैया और भी खतरनाक और तशवीशनाक है . इस हकीक़त को भी थोडा समझने की कोशिश करते हैं . 
बेंगलुरु में 17 अप्रैल 2013 को भाजपा मुख्यालय के सामने हुए धमाके में 16 लोग घायल हुये, जिसकी जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी कर रही  है. दूसरी ओर बिना किसी प्रमाण के  शक की  पुरानी सुई इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) की तरफ घुमा दी गयी है , जिसका मतलब साफ़ है कि इसे भटके मुसलमानों ने अंजाम दिया और साफ़ संकेत यह भी दिया गया कि बेगुनाह मुसलमानों की गिरफ़्तारी शुरू कर दो मानो कोई और आतंकी होता ही नहीं . इस प्रकार सारे मुसलमानों की जान - बुझकर साज़िश के तहत तस्वीर बिगाड़ी जाती है . दूसरी ओर कुछ बाखबर राजनीतिक प्रेक्षक यह मानते हैं जो हकीक़त के क़रीब मालूम होता है कि यह विस्फोट पांच मई के विधानसभा चुनाव में भाजपा को फायदा पंहुचाने के लिए कराया गया . विस्फोट कौन करता है ? कौन - कौन से संगठन ऐसा करते हैं ? सही बात यह है कि बहुत कम ही हकीक़त को जानने यानी निष्पक्ष जांच कराई जाती है . अव्वलन तो जांच को बाधित कर दिया जाता है , जाँच होती भी है तो तथ्य तोड़े - मरोड़े जाते हैं , और अगर सही जाँच हो भी गयी , तो रिपो+र्ट को मंज़रेआम पर नहीं आने दिया जाता . यहाँ आर टी आई नहीं काम करता ! लगभग दो साल पूर्व 31 दिसंबर, 2011 मेको केरल के  कन्नूर शहर में एचूर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) कार्यालय एवं इसके द्वारा संचालित मछेरी एयूपी स्कूल बम विस्फोट से ध्वस्त हो गया था. 5 देसी बम भी बरामद किए गए थे, लेकिन आरोप सीपीएम कार्यकर्ताओं पर लगाया गया. अभी तक इस मामले की कोई जांच नहीं हो सकी है. अभी पिछले दिनों  8 अप्रैल  को कन्नूर के मतान्नूर क्षेत्र में एक मोटर साईकिल पर धमाके की सामग्री ले जा रहे दो व्यक्ति उस समय गंभीर रूप से घायल हो गए .जब मोटर साईकिल पर रखी  सामाग्री में ब्लास्ट हो गया.  इन दोनों घायलों को करीब के अस्पताल में पहुंचाया गया, जहां मोटर-साईकिल चलाने वाले दिलीप कुमार नाम के व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि दूसरे घायल व्यक्ति का अभी भी कन्नूर के एक निजी अस्पताल में इलाज जारी है.  पुलिस का कहना है कि दोनों पोटैशियम नाइट्रेट समेत तीन किलो धमाके की अन्य सामग्री मोटर साइकिल पर ले जा रहे थे कि बीच में ही धमाका हो गया. मीडिया ने इस खबर की अनदेखी की . एक - दो  अंग्रेज़ी के अखबारों में तस्वीर के साथ यह खबर ज़रूर प्रकाशित की गई ,जिसमें पुलिस के हवाले से यह बात भी लिखी गयी कि मरने वाला युवक भाजपा का समर्थक था और बम बनाने में माहिर था. क्यों नहीं बताई जा रही है इस विस्फोट की हकीक़त ? इतने गंभीर मामले की जांच क्यों नहीं कराई जा रही है ? मीडिया के मुंह क्यों सिले हुए हैं ? वजह साफ़ है , कोई हकीक़त से वास्ता नहीं रखना चाहता , क्योंकि मामला संघ परिवार से जुड़ा है . ऐसे में लोकतंत्र का सत्यानाश हो , तो क्या फ़र्क पड़ता है ? !  यह सूरतेहाल बहुत तशवीशनाक है .साम्प्रदायिकता और पक्षपात अच्छे समाज के लिए हमेशा घातक रहे हैं और आज भी हैं . इनका समूल खात्मा करने में ही सबकी भलाई निहित है . 
- डॉ . मुहम्मद अहमद  

Apr 23, 2013



आदरणीय मित्रो , हार्दिक अभिवादन 
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अभी कुछ ही पल की बात है . कुछ पंक्तियाँ बन गईं काव्यात्मक पीड़ा की ! अहमद ' मोहित ' नाम से बहुत पहले कई रचनाएं लिखी थीं . आज फिर उसी नाम से ..... आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं ये ------

अब किसी से गिला - शिकवा नहीं मुझे    
अपने तो थे नहीं ,  पराये हो गये 
सूरतें जो दिल को कुछ बहला सकतीं  
सीरतें तो थीं नहीं , बिस्मिल हो गये  
सब्र की बात पढ़ता - सुनता रोज़ हूँ 
वसीले तो थे नहीं , बेसब्रे हो गये 
अब आंधियां भी आह में आती हैं 
ठौर तो थी  नहीं , खंडहर हो गये   
किस कदर दाद दूँ उन जफ़ाओं का  
आग तो थी नहीं , दीवाने हो गये 
मर - मरके जीने की आदत कहाँ  
ज़िन्दगी तो थीं नहीं , ज़िन्दा हो गये 
दुनिया को फानी यूँ  समझ रखा था  
असलियत तो थी नहीं ,' मोहित ' हो गये |  

- अहमद ' मोहित '

मेरा देश यूँ ही महान नहीं


मेरा देश यूँ ही महान नहीं है !
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मैं नहीं जानता दिल जलता है मेरा कि जिगर ,
धुवाँ उठता है कहीं आग लगी है शायद |
- मीर 
हमारा देश यूँ ही महान नहीं है . यह अपनी विशिष्टताओं के कारण महान है . यहाँ की गंगा - जमुनी संस्कृति बड़ी समृद्ध है ... कटुता के इस काल में भी दिल को सकून पहुँचाने की बहुत - सी मिसालें हमारे सामने आती रहती हैं . इन्हीं में से एक है तामिलनाडु का श्री कोदंडा रामार मंदिर , जहाँ प्रत्येक वृहस्पतिवार को श्रध्दालुओं की भीड़ किसी हिंदू पंडित जी द्वारा नहीं , बल्कि एक मौलवी एम .अब्दुल सलाम के मुख से कम्बन  रामायण का प्रवचन सुनने को जुटती हैं। एक बार गीता पर प्रवचन देने का कार्यक्रम रद करने वाले एक हिंदू अध्यापक की जगह सलाम ने प्रवचन दिया और तभी से स्थानीय हिंदू, मुस्लिम और क्रिश्चियनों के धार्मिक संस्थानों में उन्हें मान्यता मिलने लगी। तमिल अध्यापक सलाम को  भगवद् गीता पर प्रवचन देने पर लोग प्यार से 'गीता सलाम' पुकारने लगे। उन्होंने अपने ज्ञान से सभी को चकित कर दिया। इसके चलते सलाम, स्थानीय मस्जिदों और चर्चों में भी काफी लोकप्रिय हैं। सलाम का पता भी इतना लोकप्रिय है कि खत पर सिर्फ 'गीता सलाम, रामनाथपुरम डिस्ट्रिक्ट' लिखना है और वह अपने पते पर आसानी से पहुंच जाता है| 

- डॉ. मुहम्मद अहमद  

Apr 22, 2013

' विकास पुरुषों ' की सियासी लड़ाई


' विकास पुरुषों ' की सियासी लड़ाई 
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 ' विकास पुरुष ' कौन है और कौन नहीं है ? यह तथ्य से भटकानेवाला सवाल है , क्योंकि आज हमारे देश के सभी सत्तासीनों को इस बात के लिए ' मजबूर ' किया जा रहा है कि वे न चाहते हुए भी विकास करें , विकास की बात करें और ऐसा करने, कहने में जिन्हें संकोच है वे अपने को सियासी तौरपर अस्तित्वहीन समझें. इन्हीं वास्तविकताओं के बीच यानी देश के बहुत - से ' विकास पुरुषों ' में से  दो   ' विकास पुरुष ' हमारे सामने हैं . ये हैं - मोदी और नीतीश . ये दोनों उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव राजग के ढांचे के भीतर अब तक येन केन प्रकारेण अवस्थित रहे हैं . ये दोनों पिछड़ी जाति के हैं . नीतीश कुर्मी हैं और मोदी घांची . दोनों ध्रुवों का ख़्वाब है प्रधानमंत्री बनना , लेकिन एक देश में दो प्रधानमंत्री न हो पाने की सच्चाई दोनों के सामने है . दूसरी ओर एक ही सियासी कुनबे में होने की त्रासदी अलग से है . सभी जानते हैं कि आम चुनाव के नतीजों तक प्रधानमंत्री पद  के उम्मीदवार का नाम टालना इन दोनों के हित में नहीं है , जैसा कि भाजपा अध्यक्ष राजनाथसिंह ने यह तुरुप चाल चलने की कोशिश की है कि संसदीय दल में ही इसे चुना जाएगा . इस संकेत को भांपकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों और हितेक्षुओं के बीच कौवारोर तेज़ हो गया  है . वास्तव में आरोप - प्रत्यारोप का अंतहीन सिलसिला चल पड़ा है . इस  स्थिति में ' विकास पुरुष ' ख़ामोश रहें , यह कैसे उचित है ? राजग ' तराज़ू ' से छटक भागने के फ़िराक में दिखते , भाजपा की टिप्पणी का जवाब देते हुए नीतीश कुमार ने कहा कि गोधरा कांड के समय भले ही वे  रेल मंत्री थे, लेकिन कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है . इसलिए गोधरा कांड के लिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली तत्कालीन प्रदेश सरकार जिम्मेदार थी .रेल मंत्रालय केवल रेलवे की पटरी तक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होता है. किसी शहर में फैली हिंसा व कानून व्यवस्था रोकना राज्य सरकार की जिम्मेदारी होती है। गोधरा हिंसा के समय राज्य सरकार को समुचित कदम उठाना चाहिए था. नीतीश कुमार ने साफ किया कि हालांकि वो प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तय करने के लिए बीजेपी को कुछ और वक़्त दे रहे हैं, लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं होंगे.दूसरी ओर राजग से जदयू का अलग हो जाना लगभग तय है  .जदयू में एक बड़ा खेमा [ नीतीश समर्थक ] चाहता है कि राजग से दूरी बना ली जाए . चुनाव के बाद नये सिरे से मोलतौल हो . दूसरी ओर भाजपा में एक बड़े वर्ग की सोच यह भी है कि नरेंद्र मोदी का नाम साफ नहीं किया जाए . उन्हें चुनाव प्रचार समिति जैसी इकाई का प्रमुख बनाकर उनकी ऊर्जा, तजुर्बे और कार्यकर्ताओं के एक वर्ग में उनके समर्थन का फायदा उठाया जाए और बाद में सहयोगी दलों से ही मोदी के नाम पर उठे एतिराज़ का फ़ायदा उठाकर ख़ुद सत्ता हासिल करने की ज़ुगत भिड़ाई जाए. इसी वजह से भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह यह फ़रमाते हैं कि नरेंद्र मोदी पार्टी के लिए देशभर में प्रचार करेंगे .
- डॉ. मुहम्मद अहमद  

Apr 21, 2013

कहाँ गयी वह नैतिकता ?


कहाँ गयी वह नैतिकता ?
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हिंदी के महान साहित्यकार, पत्रकार एवं युगप्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की साहित्यसेवा अविस्मरणीय है . उनके योगदान के कारण  हिंदी साहित्य का दूसरा युग 'द्विवेदी युग' के नाम से जाना जाता है .जनवरी, 1903 ई. से दिसंबर, 1920 ई. तक आपने ' सरस्वती ' नामक मासिक पत्रिका का संपादन कर एक कीर्तिमान स्थापित किया था, आपने अपने लिए बहुत - ही सुविचारित एवं अनुकरणीय  सिद्धान्त बना रखे थे  - वक़्त की पाबंदी करना, रिश्वत न लेना, अपना काम ईमानदारी से करना और ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना . द्विवेदी जी ने लिखा है, ‘‘पहले तीन सिद्धान्तों के अनुकूल आचरण करना तो सहज था, पर चौथे के अनुकूल सचेत रहना कठिन था , तथापि सतत् अभ्यास से उसमें भी सफलता होती गई . आपने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि '' इस समय तो कितनी महारानियाँ तक हिंदी का गौरव बढ़ा रही हैं , पर उस समय एकमात्र ' सरस्वती ' ही पत्रिकाओं की रानी नहीं , पाठकों की सेविका थी . तब उसमें कुछ छपाना या किसी के जीवन - चरित्र आदि प्रकाशन कराना ज़रा बड़ी बात समझी जाती थी . दशा ऐसी होने के कारण मुझे कभी - कभी बड़े - बड़े प्रलोभन दिए जाते थे . कोई कहता , मेरी मौसी का मरसिया छाप दो , मैं तुम्हें निहाल कर दूंगा . कोई लिखता , अमुक सभापति की ' स्पीच ' छाप दो , तो मैं तुम्हारे गले में बनारसी दुपट्टा डाल दूंगा . कोई आज्ञा देती , मेरे प्रभु का जीवन - चरित्र निकाल दो , तो तुम्हें एक बढ़िया घड़ी या पैर - गाड़ी  नज्र की जाएगी . इन प्रलोभनों पर विचार करके मैं अपने भाग्य को कोसता .... भला ये घड़ियाँ और गाड़ियाँ मैं कैसे हज़म कर सकूंगा . नतीजा यह होता कि मैं गूंगा और बहरा बन जाता और 'सरस्वती ' में वही मसाला जाने देता , जिससे पाठकों का लाभ समझता  .'' आज कहाँ गयी यह पत्रकारिता ? कहाँ गये आदर्श मूल्य  और नैतिकता ? अब तो ' पेड न्यूज़ ' का चक्कर चल रहा है  ! ऊपर से इसे क़ानूनी जामा पहनाने की कुचेष्टा चल रही है !! किस अंधे युग में जी रहे हैं हम , क्या सब कुछ भौतिकता के हवाले हो गया है ??? !!!
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

बलात्कार दंड


अद्यप्रभृति यामन्यां बलान्नारीं गमिष्यसि, तदा ते शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशय:।
अर्थात यदि आज के पश्चात तुमने किसी स्त्री के साथ बलात्कार किया तो इसमें संशय नहीं कि तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े हो जायेंगे। 
ब्रह्मा जी ने रावण को यह शाप दिया था , जब उसने पुंजिकस्थला नामक अप्सरा के साथ बलात्कार किया था | अतः आज की घटना के बाद किसी ने बलात्कार का दुस्साहस किया , तो उसका यही हश्र होगा |

- डॉ . मुहम्मद अहमद 

महान पत्रकार अखिलेश मिश्र

महान पत्रकार अखिलेश मिश्र  जी की याद 
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स्वनामधन्य मूर्धन्य पत्रकार एवं सम्पादकाचार्य  आदरणीय अखिलेश मिश्र जी के बारे में अब  मैं कोई चर्चा तक नहीं सुनता . क्या हो गया है लोगों को ? जिस विभूति ने अपना सारा जीवन पत्रकारिता के हवाले कर दिया हो , वह भी जनपक्षधर पत्रकारिता के हवाले , उसे याद तक न किया जाना बहुत दुखद है . आदरणीय अखिलेश मिश्र जी के साथ  मुझे कई बार यात्रा करने का अवसर मिला . बात 1979  के रमजान   की है , जब मैं IFWJ [ इंडियन फेडरेशन आफ  वोर्किंग जर्नलिस्ट ] की  गोंडा [ उत्तर प्रदेश ] इकाई का प्रांतीय पर्यवेक्षक था , इसलिये अक्सर कहीं न कहीं जाना पड़ता था . एक बार  जब  मैं लखनऊ गया हुआ था, तो मिश्र जी कहा कि जब बलरामपुर जाना तो बताना , मैं भी चलूँगा . मिश्रजी बलरामपुर में लाल बहादुर सिंह कलहंस जी [ एडवोकेट ] के यहाँ जाना चाहते थे . बस और जीप की  सवारी की गयी . विविध विषयों पर चर्चा रही . मैं तो सम्मानवश बस उनकी बातें ही सुनता रहा .बहुत कम प्रतिक्रिया दी . वे प्रभावित हुए और यह कहते हुए  महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की एक रचना अंग्रेजी में लिखकर मुझे दी कि  यह अप्रकाशित है .  उस रचना को मैंने कालेज मैगजीन में छपने के लिये दे दिया और वह प्रकाशित भी हुई .उस समय मैं बारहवीं कक्षा का छात्र था. वह रचना मेरे पास सुरक्षित नहीं रह सकी , किन्तु उसका भाव कुछ इस प्रकार था --
     बाधाएं अनगिनत   हैं , यदि मैं  उन्हें छुड़ाना चाहूं  
     पीर- वेदना बहुत पहुँचती उन्हें छुड़ाने में पर 
     मुक्ति मांगने पास तुम्हारे कैसे  आऊं 
        अंतर  मांगते लज्जा से जाता मर .   
मैं यह कहने में कतई संकोच नहीं करूंगा कि मिश्र जी हिंदी पत्रकारिता के अनुपम स्तम्भ थे .शुरू से ही मिश्र जी की प्रखर मेधा थी . जब वे बारह - तेरह वर्ष के थे , अख़बार बढ़ने गंगाप्रसाद मेमोरियल लाइब्रेरी [ अमीनाबाद , लखनऊ ] जाया करते थे . वहीं अमीनाबाद पार्क में एक पेड़ के नीचे ' माधुरी ' के सम्पादक रूप नारायण पाण्डेय , निराला जैसे दिग्गजों की बैठक हुआ करती थी .अखिलेश जी अपने मित्रों के इस गोष्ठी में श्रोता की हैसियत से पहुंच जाते .एक दिन बैठक में  बिहारी के इस दोहे का ज़िक्र आया - ' पावस घन अंधियार  मंहि भेदु नहि आनि , रात ह्योंस जान्यौ परत , लखि चकई चकवान | ' अखिलेश जी तपाक से बोल पड़े , बिहारी ने यह गलत लिखा है . पावस ऋतु में चकवा - चकवी प्रवास कर जाते हैं , तो दिखेंगे कैसे ? उनकी बात के सभी क़ायल हुए . रूप नारायण जी ने अखिलेश जी से कहा कि इस पर एक निबंध लिख दो . अखिलेश जी ने लिखा और ' माधुरी ' में छपा .
 वे पहले पत्रकार थे , जिन्हें कई नामचीन हिंदी दैनिकों का प्रथम सम्पादक बनने का श्रेय प्राप्त हुआ . इनमें  दैनिक गणेश , दैनिक स्वतंत्र चेतना , दैनिक जागरण [ गोरखपुर ] और दैनिक स्वतंत्र मत आदि शामिल हैं . मिश्र जी बड़े ही उसूल पसंद थे . सत्ता से , किसी पुरस्कार से सदैव दूर रहे . हर सम्मान / पुरस्कार को ठुकराते रहे . १९८८ में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी उन्हें भी पुरस्कार देनेवाले थे . उनके नाम का ऐलान हो चुका था . मिश्र जी पुरस्कार ठुकराते हुए आयोजकों को लिख भेजा कि '' सत्ता तन्त्र से जुड़े लोग क़लम घिसने वालों का सम्मान करने के पचड़े में क्यों पड़ें ? पत्रकार और शासक एक दूसरे को निजी तौर पर न जानें , इसी में दोनों की भलाई है . '' इसी प्रकार जबलपुर में दैनिक स्वतन्त्र मत के सम्पादक की हैसियत से तत्कालीन मुख्यमंत्री  दिग्विजय सिंह का स्वागत करने के लिए अख़बार मालिकों की ओर से कहा गया , जिन्होंने अखबार का विमोचन किया था . मिश्रजी ने सहज भाव से इनकार कर दिया . कहा , '' यह सम्पादक का काम नहीं है .'' मुख्यमंत्री जी ख़ुद चलकर मिश्र जी के कमरे में आए और आपसे मिले . कहाँ गया वह स्वाभिमान और मूल्य ... क्या आज के पत्रकार अपना यह सब कुछ गवां नहीं बैठे हैं ? 
  
- डॉ. मुहम्मद अहमद  

Apr 20, 2013

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए 
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िए

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए 

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िए

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए

छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िए |


- अदम गोंडवी [ रामनाथ सिंह ]

न किसी की आँख का नूर हूँ

न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सका मैं वो एक मुश्ते गु़बार हूं
मेरा रंग रूप बिगड़ गया, मेरा बख़्त मुझसे बिछड़ गया
जो चमन ख़िज़ां में उजड़ गया मैं उसी की फस्ले बहार हूँ 
मैं बसूं कहां मैं रहूं कहाँ, न यह मुझसे ख़ुश न वह मुझसे से ख़ुश
मैं ज़मीं की पीठ का बोझ हूं मैं फ़लक के दिल का गु़बार हूं
पढ़े फातिहा कोई आए क्यों, कोई चार फूल चढ़ाए क्यों
कोई आके शमा जलाए क्यों, मैं वह बेकसी की मज़ार हूं।


                                                                - बहादुर शाह जफ़र
 

सारी वसुधा ही एक कुटुम्ब है


अयं निजः परोवेति , गणना लघुचेतसाम ,
उदारचरितानान्तु वसुधैव कुटुम्बकम |

अर्थात , यह मेरा है , और यह दूसरे का है , इस तरह का हिसाब लगाना छोटे दिलवालों का काम है |उदार हृदयवालों के लिए सारी वसुधा ही एक कुटुम्ब है |

- डॉ. मुहम्मद अहमद  

पावस देखि रहीम मन


पावस देखि रहीम मन, कोइल साधे मौन
अब दादुर वक्ता भए, हमको पूछत कोय
                                       - रहीम 
अर्थात , वर्षा ऋतु आते ही मेंढको की आवाज चारों तरफ गूंजने लगती है तब कोयल यह सोचकर खामोश हो जाती है कि उसकी आवाज कौन सुनेगा।

अहिंसा और इस्लाम


अहिंसा और इस्लाम 
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वामन शिवराम आप्टे ने ‘संस्कृत-हिन्दी-कोश’ में ‘अहिंसा का अर्थ इस प्रकार किया है—अनिष्टकारिता का अभाव, किसी प्राणी को न मारना, मन-वचन-कर्म से किसी को पीड़ा न देना (पृष्ठ 134)। मनुस्मृति (10-63, 5-44, 6-75) और भागवत पुराण (10-5) में यही अर्थापन किया गया है । ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का वाक्य इसी से संबंधित है । प्रसिद्ध जैन विद्वान श्री वल्लभ सूरी ने अपनी पुस्तक ‘जैनिज़्म’ (Jainism) में ‘अहिंसा’ की व्याख्या इन शब्दों में की है—
‘‘जैन धर्म के संतों ने अहिंसा को सदाचार के एक सिद्धांत के रूप में ज़ोर देकर प्रतिपादित किया है । ‘अहिंसा’ की संक्षिप्त परिभाषा यह है कि जीवन सम्मानीय है चाहे वह किसी भी रूप में मौजूद हो । पर एक व्यक्ति कह सकता है कि जीवन के सभी रूपों को हानि पहुंचाने से पूर्णतः बचते हुए संसार में जीवित रहना लगभग असंभव है, इसलिए जैन धर्म विभिन्न प्रकार की हिंसाओं में हिंसा करने वाले की मानसिक प्रवृत्ति के अनुसार अन्तर करता है...यह बात मानी हुई है कि प्रतिदिन के कार्य, चलने-फिरने, खाना पकाने और कपड़े धोने एवं इस प्रकार के दूसरे कार्यों से बहुत कुछ हिंसा होती है। कृषि और उद्योग-धंधों के विभिन्न कार्य भी हिंसा का कारण बनते हैं । इसी प्रकार स्वयं की अथवा धन-संपत्ति की प्रतिरक्षा के सिलसिले में भी हमलावर से जीवन को हानि पहुंच सकती है या वह नष्ट हो सकता है । अतः जैन धर्म इस सामान्य और समग्र सैद्धांतिकता के बावजूद, जो इसके सभी सिद्धांतों की एक विशेषता है, एक गृहस्थ की हिंसा के इन तीन प्रकार को करने से नहीं रोकता है, जिन्हें सांयोगिक, व्यावसायिक और प्रतिरक्षात्मक कह सकते हैं। गृहस्थ को ऐसी हिंसा से बचने का परामर्श दिया गया है जो हिंसा के लिए हो, जो मात्र रस, प्रसन्नता और मनोविहार के रूप में हो या कोई उद्देश्य प्राप्त करना अभीष्ट न हो ।’’ (पृष्ठ 8-10)
इस्लाम व्यावहारिक मानव-जीवन के प्रत्येक अंग के लिए एक प्रणाली है। यह वह प्रणाली है जो आस्था-संबंधी उस कल्पना को भी अपने में समाहित किये हुए है, जो जगत की प्रकृति की व्याख्या करती और जगत में मानव का स्थान निश्चित करती है, जिस प्रकार वह मानव अस्तित्व के मौलिक उद्देश्य को निश्चित करने का कार्य करती है । इसमें सिद्धांत और व्यावहारिक व्यवस्थाएं भी शामिल हैं, जो इस आस्थात्मक कल्पना से निकलती एवं इसी पर निर्भर करती हैं और इसे वह व्यावहारिक रूप प्रदान करती मानव-जीवन में चित्रित होता है ।
‘इस्लाम’ अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है—
‘‘शांति में प्रवेश करना। यह संधि कुशलता, आत्मसमर्पण, आज्ञापालन और विनम्रता के संदर्भ में भी प्रस्तुत होता है। इस्लाम अर्थात् वह धर्म जिसके द्वारा मनुष्य शांति-प्राप्ति के लिए अल्लाह की शरण लेता है और क़ुरआन एवं हदीस (हज़रत मुहम्मद सल्ल॰ के वचन एवं कर्म) द्वारा निर्दिष्ट सिद्धांतों के आधार पर अन्य मनुष्यों के प्रति प्रेम और अहिंसा का व्यवहार करता है।’’ (शॉरटर इन्साइक्लोपीडिया ऑफ इस्लाम, पृष्ठ 176)
इस्लाम मनुष्य को शांति और सहिष्णुता का मार्ग दिखाता है। यह सत्य, अहिंसा, कुशलता का समर्थक है । इसका संदेश वास्तव में शांति का संदेश है।इसका लक्ष्य शांति, सुधार और निर्माण है|  वह न तो उपद्रव और बिगाड़ को पसन्द करता है और न ही ज़ुल्म-ज़्यादती, क्रूरता, अन्याय, अनाचार, अत्याचार, असहिष्णुता, पक्षपात और संकीर्णता आदि विकारों व बुराइयों का समर्थक है। ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने कहा कि जो व्यक्ति भी इस्लाम में आया, सलामत रहा ।
इतिहास में झांकें तो यह तथ्य स्पष्टतया सामने आता है कि हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) से पूर्व अरबवासी सभ्यता और मानवोचित आचार-व्यवहार से कोसों दूर थे, इसीलिए इस युग को ‘ज़माना-ए-जाहिलीयत’ (अज्ञानकाल) कहा जाता है (द्रष्टव्य-लिटररी हिस्ट्री ऑफ अरब्स-आर॰ए॰ निकल्सन, कैम्ब्रिज यूनीवर्सिटी, पृष्ठ 25)। उस युग में चारों ओर अज्ञान, अनाचार, अशांति, अमानवीय कृत्यों और वर्गगत विषमताओं का साम्राज्य था । अरबों में अधिकतर बद्दू थे, जो प्रायः असभ्य होने के साथ-साथ अत्यंत पाषाणहृदय भी थे । इनके बारे में पवित्र कु़रआन में कहा गया है—‘‘ये बद्दू इन्कार और कपटाचार में बहुत ही बढ़े हुए हैं ।’’
इस्लाम ने उन सभ्य आचार-विचार से रहित बद्दुओं को सन्मार्ग दिखाया और उन्हें पशुत्व से ऊपर उठाकर मानवता के श्रेष्ठ मूल्यों से परिचित कराया, बल्कि उन्हें दूसरों के पथ-प्रदर्शक एवं अल्लाह के धर्म का आवाहक बना दिया । हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने लोगों को सदाचार और नैतिकता की शिक्षा दी। उन्हें प्रशिक्षित कर आत्मशुद्धि का मार्ग दिखाया और समाज को तथ्यहीन रीति-रिवाजों से मुक्त कर उच्च कोटि के नैतिक व्यवहार, संस्कृति, सामाजिकता और अर्थ के नये नियमों पर व्यवस्थित कर सुसंगठित किया। पवित्र क़ुरआन में हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के बारे में अल्लाह ने कहा है—‘‘हमने तुम्हें सारे संसार के लिए बस सर्वथा दयालुता बनाकर भेजा है।’’ (21:107)। स्पष्ट है, जो सारे संसार के लिए दयालुता का आगार हो, उसकी शिक्षा हिंसात्मक कदापि नहीं हो सकती । हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने कहा है—‘‘अल्लाह ने मुझे नैतिक विशेषताओं और अच्छे कार्यों की पूर्ति के लिए भेजा है।’’ (शरहुस्सुन्नह)। क़ुरआन में है—‘‘निस्सन्देह तुम (हज़रत मुहम्मद सल्ल॰) एक महान नैतिकता के शिखर पर हो।’’ (68:4)
इस्लाम के विरोधी लोग और ऐसे कुछ लोग भी जो इस्लाम की शिक्षाओं से अनभिज्ञ हैं, यह दुष्प्रचार करते हैं कि यह हिंसा और आतंकवाद का समर्थक है । ये शब्द इस्लामी शिक्षाओं के विपरीतार्थक शब्द हैं, जिनका इस्लाम से दूर-दूर का भी कोई संबंध नहीं है। यदि कहीं कुछ मुसलमान अपने व्यक्तिगत हित के लिए हिंसा और आतंकवाद का मार्ग अपनाएं और इन्हें बढ़ावा दें, तो भी किसी प्रकार इनका संबंध इस्लाम से नहीं जुड़ सकता, बल्कि यह धर्म-विरुद्ध कार्य होगा और इसे धर्म के बदतरीन शोषण की संज्ञा दी जाएगी। इस्लाम दया, करुणा, अहिंसा, क्षमा और परोपकार का धर्म है । इसके कुछ सुदृढ़ प्रमाणों पर यहां चर्चा की जाएगी ।
क़ुरआन का आरंभ ‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम’ से होता है । क़ुरआन की सभी सूरतों (अध्यायों) का प्रारंभ इन्हीं शब्दों से होता है और इन्हीं शब्दों के साथ मुसलमान अपना प्रत्येक कार्य प्रारंभ करते हैं। इनका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है—‘अल्लाह के नाम से जो अत्यंत करुणामय और दयावान है।’ (‘याल्लाह नाम जापं योल्लाहो दयी हितैष्यपि’—संस्कृत अनुवाद)। इस वाक्य में अल्लाह की दो सबसे बड़ी विशेषताओं का उल्लेख किया गया है । वह अत्यंत करुणामय है और वह अत्यंत दयावान है। उसके बन्दों और भक्तों में भी ये उत्कृष्ट विशेषताएं अभीष्ट हैं। उसके बन्दों की प्रत्येक गतिविधि उसकी कृपा और अनुग्रह की प्राप्ति के लिए होती है । क़ुरआन में है—‘अल्लाह का रंग ग्रहण करो, उसके रंग से अच्छा और किसका रंग हो सकता है ? और हम तो उसी की बन्दगी करते हैं ।’ (क़ुरआन 2:138)
अल्लाह की कृपाशीलता और उसकी दयालुता का ज़िक्र (बखान) अल्लाह का बन्दा प्रत्येक नमाज़ में बार-बार करता है और अपनी परायणता व विनयशीलता की अभिव्यक्ति बार-बार करता है। यह उसकी सहिष्णुता का द्योतक भी है । पवित्र क़ुरआन के प्रथम अध्याय का पाठ अल्लाह का बन्दा प्रत्येक नमाज़ में अनिवार्यतः करता है, क्योंकि यह नमाज़ का महत्वपूर्ण भाग है, जिसके अभाव में नमाज़ का आयोजन पूर्ण नहीं हो सकता। यहां इस अध्याय का हिन्दी अनुवाद किया जा रहा है, ताकि सन्दर्भित विषय भली-भांति स्पष्ट हो सके—
‘‘प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है जो सारे संसार का प्रभु है, बड़ा कृपाशील और दया करने वाला है, बदला दिये जाने के दिन का मालिक है । हम तेरी ही बन्दगी करते हैं और तुझी से मदद मांगते हैं । हमें सीधा मार्ग दिखा, उन लोगों का मार्ग, जो तेरे कृपापात्र हुए, जो प्रकोप के भागी नहीं हुए, जो भटके हुए नहीं हैं ।’’  (क़ुरआन, 1:1-7)
इस्लाम की शांति, सहिष्णुता, सद्भावना की शिक्षाएं समझने के लिए पवित्र क़ुरआन की कुछ आयतों के अनुवाद यहां प्रस्तुत हैं—
‘‘जब कभी उनसे कहा गया कि धरती पर फ़साद (अशांति, बिगाड़) न पैदा करो, तो उन्होंने यही कहा कि ‘हम तो सुधार करने वाले हैं।’ सावधान, वास्तव में यही लोग फ़साद पैदा करते हैं, किन्तु ये जान नहीं पा रहे हैं ।’’ (क़ुरआन, 2:11,12)
‘‘अल्लाह का दिया हुआ खाओ-पियो और धरती में बिगाड़ न फैलाते फिरो।’’  (क़ुरआन, 2:60)
‘‘जब उसे सत्ता मिल जाती है तो धरती में उसकी सारी दौड़-धूप इसलिए होती है कि अशांति फैलाए, खेतों को नष्ट और मानव-संतति को तबाह करे—हालांकि अल्लाह बिगाड़ कदापि नहीं चाहता—और जब उससे कहते हैं कि अल्लाह से डर, तो अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान उसको गुनाह पर जमा देता है । ऐसे व्यक्ति के लिए तो बस नरक ही पर्याप्त है और वह बहुत बुरा ठिकाना है ।’’ (क़ुरआन, 2:205-206)
‘‘वे लोग जो ख़ुशहाली और तंगी की प्रत्येक अवस्था में अपने माल ख़र्च करते रहते हैं और क्रोध को रोकते हैं और लोगों को क्षमा करते हैं—और अल्लाह को भी ऐसे लोग प्रिय हैं, जो अच्छे से अच्छा कर्म करते हैं ।’’ (क़ुरआन, 3:134)
‘‘ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, आपस में एक-दूसरे के माल ग़लत ढंग से न खाओ, लेन-देन होना चाहिए आपस की रज़ामंदी से और अपने प्राणों (अर्थात, आत्महत्या और दूसरों के प्राणों) की हत्या न करो ।’’ (क़ुरआन, 4:29)
‘‘अपने प्रभु को गिड़गिड़ाकर और चुपके-चुपके पुकारो। निश्चय ही वह हद से आगे बढ़ने वालों को पसन्द नहीं करता। और धरती में उसके सुधार के पश्चात् बिगाड़ न पैदा करो। भय और आशा के साथ उसे पुकारो। निश्चय ही, अल्लाह की दयालुता सत्कर्मी लोगों के निकट है ।’’ (क़ुरआन, 7:55,56)
‘‘ऐ नबी, नरमी और क्षमा से काम लो, भले काम का हुक्म दो और अज्ञानी लोगों से न उलझो।’’ (क़ुरआन, 7:199)
‘‘और वे क्रोध को रोकने वाले हैं और लोगों को क्षमा करने वाले हैं। और अल्लाह को ऐसे लोग प्रिय हैं जो अच्छे से अच्छा कर्म करते हैं।’’ (क़ुरआन, 3:134)
‘‘निश्चय ही अल्लाह न्याय का और भलाई का एवं नातेदारों को (उनके हक़) देने का आदेश देता है और अश्लीलता, बुराई एवं सरकशी से रोकता है। वह तुम्हें नसीहत करता है, ताकि तुम शिक्षा लो।’’ (क़ुरआन, 16:90)
क़ुरआन की इन आयतों से इस्लाम की शांति, कुशलता और सदाचरण की शिक्षाएं स्पष्ट तथा परिलक्षित होती हैं और लोगों को सफल जीवन के लिए आमंत्रित करती हैं। वास्तव में शांति, प्रेम, अहिंसा और सदाचरण इस्लाम की महत्वपूर्ण शिक्षाएं हैं, लेकिन इस्लाम अहिंसा को इस अर्थ में नहीं लेता कि मानव-उपभोग की वे चीज़ें बहिष्कृत कर दी जाएं, जिनमें जीव-तत्व हो। इस आधार पर ही कोई व्यक्ति फल, सब्ज़ियां और दही, अनाज आदि का सेवन नहीं कर सकता, क्योंकि विज्ञान ने इनमें जीव-तत्व सिद्ध कर दिया है और न ही कोई व्यक्ति इस आधर पर एंटी बायोटिक औषधि का सेवन कर सकेगा, क्योंकि इससे जीवाणु मर जाएंगे। इस्लाम की शिक्षाएं मानव-जीवन के लिए पूर्णतः व्यावहारिक हैं। इस्लाम को यह भी अभीष्ट है कि जहां सत्य-असत्य के बीच संघर्ष हो, वहां सत्य का साथ दिया जाए और उसके लिए जी तोड़ प्रयत्न किया जाए। यह अहिंसा के विरुद्ध नहीं है। इस्लाम ने असत्य के विरुद्ध युद्ध का आदेश तो दिया है, लेकिन विभिन्न प्रकार के प्रतिबंधों के साथ ताकि आदेश कहीं ‘हिंसा’ की परिभाषा में न आ जाए। इस संबंध में क़ुरआन की कुछ आयतें दृष्टव्य हैं—
‘‘जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद (हिंसा और उपद्रव) फैलाने के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इन्सानों की हत्या कर डाली। और जिसने किसी की जान बचाई उसने मानो सारे इन्सानों को जीवन-दान दिया।’’ (क़ुरआन, 5:32)
‘‘और अल्लाह के मार्ग में उन लोगों से लड़ो जो तुमसे लड़ें, किन्तु ज़्यादती न करो। निस्सन्देह, अल्लाह ज़्यादती करने वालों को पसन्द नहीं करता ।’’  (क़ुरआन, 2:190)
इस्लाम ने युद्ध के दौरान वृद्धजनों, स्त्रियों, बच्चों और उन लोगों पर जो इबादतगाहों में शरण लिए हों (चाहे वे किसी भी धर्म के अनुयायी हों) हाथ उठाने से मना किया है और अकारण फलदार व हरे-भरे वृक्षों को काटने से रोका है ।
‘‘किसी जीव की हत्या न करो, जिसे (मारना) अल्लाह ने हराम ठहराया है। यह और बात है कि हक़ (न्याय) का तक़ाज़ा यही (अर्थात् हत्या करना ही) हो।’’  (क़ुरआन, 17:33)
‘‘तुम्हें क्या हुआ है कि अल्लाह के मार्ग में और उन कमज़ोर पुरुषों, औरतों और बच्चों के लिए युद्ध न करो, जो प्रार्थनाएं करते हैं कि हमारे रब! तू हमें इस बस्ती से निकाल, जिसके लोग अत्याचारी हैं और हमारे लिए अपनी ओर से तू कोई समर्थक नियुक्त कर और हमारे लिए अपनी ओर से तू कोई सहायक नियुक्त कर।’’  (क़ुरआन, 4:75)
‘‘इन्साफ़ की निगरानी करने वाले बनो और ऐसा न हो कि किसी गिरोह की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम इन्साफ़ करना छोड़ दो।’’ (क़ुरआन, 5:8)
यदि किसी के व्यवहार से किसी के मर्म (दिल) को पीड़ा पहुंचती है, तो यह भी हिंसा है। आइए, हम ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के कुछ पवित्र वचनों का अध्ययन करते हैं, जिनसे लोगों के साथ अच्छे व्यवहार, शील-स्वभाव और सदाचरण की शिक्षा मिलती है।
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि॰) से रिवायत (उल्लिखित व वर्णित) है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल॰) ने कहा—‘किसी सिद्दीक़ (अत्यंत सत्यवान व्यक्ति) के लिए उचित नहीं कि वह लानत करे।’ एक अन्य हदीस में है—‘लानत करने वाले क़ियामत (प्रलय) के दिन न तो सिफ़ारिश कर सकेंगे और न गवाही देने वाले होंगे ।’ (मुस्लिम)
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि॰) से रिवायत है कि नबी (सल्ल॰) ने कहा—‘‘आदमी को झूठे होने के लिए यही पर्याप्त है कि वह जो बात सुन पाये (सच होने का विश्वास पाए बिना) उसको बयान करता फिरे। (मुस्लिम)
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि॰) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल॰) ने कहा—‘‘मोमिनों में ईमान की दृष्टि से सबसे पूर्ण वह व्यक्ति है, जो उनमें शील-स्वभाव की दृष्टि से सबसे अच्छा हो। और तुममें अच्छे वे हैं जो अपनी स्त्रियों के प्रति अच्छे हों।’’ (तिरमिज़ी)
एक अन्य हदीस में है—‘‘पड़ोसियों में सबसे अच्छा पड़ोसी अल्लाह की दृष्टि में वह है जो अपने पड़ोसियों के लिए अच्छा हो।’’ एक-दूसरी हदीस में है—‘‘सारी मख़्लूक़ (संसार के लोग) अल्लाह का परिवार है। तो अल्लाह को सबसे अधिक प्रिय वह है, जो उसके परिवार के साथ अच्छा व्यवहार करे।’’
हज़रत आइशा (रज़ि॰) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल॰) ने कहा—‘निस्सन्देह अल्लाह नर्म है। वह हर एक मामले में नरमी को पसन्द करता है ।’’  (बुख़ारी, मुस्लिम)
हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने इन्सानों के प्रति उदारता, क्षमाशीलता और दयालुता का व्यवहार किया और इनकी शिक्षा दी। साथ ही, पशु-पक्षियों पर भी दया करने की शिक्षा दी। आप (सल्ल॰) सारे जीवधारियों के लिए रहमत बनाकर भेजे गए थे। पशु-पक्षी भी इससे अलग न थे। आप अत्यंत बहादुर थे और अत्यंत नर्मदिल भी। आपने जानवरों के साथ नरमी करने, उनको खिलाने-पिलाने का हुक्म दिया और सताने से रोका। इस्लाम के आगमन से पूर्व अरबवासी निशानेबाज़ी का शौक़ इस तरह किया करते थे कि किसी जानवर को बांध देते और उस पर निशाना लगाते। आप (सल्ल॰) ने इसको सख़्ती से मना किया। एक बार आपकी नज़र एक घोड़े पर पड़ी, जिसका चेहरा दाग़ा गया था। आप (सल्ल॰) ने कहा—‘‘जिसने इसका चेहरा दाग़ा है, उस पर अल्लाह की लानत हो।’’ (तिरमिज़ी)
आपने जानवरों को लड़ाने से भी मना फ़रमाया है। आपके दयाभाव की एक मिसाल देखिए। एक सफ़र में आप (सल्ल॰) के साथियों ने एक पक्षी के दो बच्चे पकड़ लिए, तो पक्षी अपने बच्चों के लिए व्याकुल हुआ। आपने देखा, तो कहा—‘‘इसको किसने व्याकुल किया?’’ सहाबा ने कहा—‘‘हमने इसके बच्चे पकड़ लिए।’’ आपने उन्हें छोड़ने का हुक्म दिया। (अबू दाऊद)
इसी से मिलती-जुलती एक घटना यह है कि आप (सल्ल॰) के पास एक व्यक्ति आया और उसने कहा कि एक झाड़ी में चिड़िया के ये बच्चे थे, मैंने निकाल लिये। उनकी मां मेरे ऊपर मंडराने लगी। आपने कहा—‘‘जाओ और जहां से इन बच्चों को उठाया है, वहीं रख आओ ।’’ (अबू दाऊद)
एक रिवायत में है कि एक ऊंट भूख से बेहाल था। आप (सल्ल॰) को देखकर वह बिलबिला उठा। आप (सल्ल॰) ने उसके मालिक को, जो एक अंसारी थे, बुलाकर चेतावनी दी—‘‘क्या तुम इन जानवरों के मामले में अल्लाह से नहीं डरते ?’’ (अबू दाऊद)
हज़रत इब्ने उमर (रज़ि॰) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल॰) ने कहा—‘‘एक स्त्री को एक बिल्ली के कारण यातना दी गयी, जिसको उसने बन्द रखा यहां तक कि वह मर गयी, तो वह स्त्री नरक में प्रविष्ट हो गयी। उसने जब उस बिल्ली को बन्द कर रखा था तो उसे न तो खिलाया और न उसे छोड़ा कि धरती के कीड़े-मकोड़े आदि ही खा लेती।’’ (बुख़ारी, मुस्लिम)
जानवरों के साथ बेरहमी और निर्दयतापूर्वक व्यवहार करने के अनेक मामले इस्लाम के पूर्व अरब में पाये जाते थे। हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने उनके साथ की जा रही ज़्यादतियों का पूर्णतः निषेध कर दिया।

- डॉ. मुहम्मद अहमद  

Apr 19, 2013

बच्चों को बचाइए !


बच्चों को बचाइए !
यह सभ्यता , देश और समाज हितैषियों के लिए दिल को सकून पहुँचाने वाली खबर ज़रूर है कि इंटरनेट पर बढ़ती अश्लीलता के खिलाफ़ सुप्रीमकोर्ट ने कुछ ठोस कार्रवाई शुरू की है . पिछले 15 अप्रैल को मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर के निर्देश पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय और अन्य विभागों को नोटिस जारी की गई है. इस नोटिस में कहा गया है कि इंटरनेट पर बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्रियां लगातार परोसी जा रही हैं.कोर्ट ने इस बाबत केंद्र सरकार से भी जवाब - तलब किया है. 
बच्चे किसी भी देश / समाज का भविष्य होते हैं . उनके कंधों पर ही भविष्य का भार होता है . वे जितने ही संस्कारित और बाकिरदार होंगे , भविष्य उतना ही उज्ज्वल होगा . उसके व्यक्तित्व को निखारना - संवारना हर माँ - बाप की प्राथमिक ज़िम्मेदारी है . मगर देखा जा रहा है कि भौतिकता की आंधी में देश के नौनिहाल भी कुम्भला गये हैं . माँ - बाप की धन कमाने की धुन ने बच्चों की सही परवरिश के प्रति उन्हें गाफ़िल कर दिया है . इसी का नतीजा है कि अभिभावकों की अनुपस्थिति में बच्चे इंटरनेट की अश्लील साईटों [ पोर्न ] के प्रति आकर्षित हो रहे हैं.
नोटिस में कहा गया है कि इन साइटों पर परोसी जा रही अश्लील सामग्रियों से बच्चों के कोमल मन पर बुरा असर हो रहा है. इसमें यह दलील भी दी गई है कि इन्हीं सब कारणों से समाज में अपराध में बढोत्तरी होती है.उल्लेखनीय है कि कमलेश वासवानी ने सुप्रीम कोर्ट में पिछले दिनों एक याचिका दायर करते हुए अपील की थी कि इंटरनेट पर चल रही इन अश्लील साइटों पर तुरंत लगाम कसी जाए. अश्लीलता किसी बड़ी बीमारी से कम नहीं . 
यह बच्चे क्या सभी आयु वर्ग के लोगों के जीवन को तबाह - बर्बाद कर डालती है , लेकिन चूँकि बच्चे कोमल मष्तिस्क वाले होते हैं , इसलिए पोर्न साईटों से वे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं . एक सर्वे में यह पाया गया कि हमारे देश में 11 साल की उम्र तक के बच्चे इन साईटों से किसी न किसी रूप में परिचित हो चुके होते हैं. इंटरनेट पर होने वाले सर्च में से 25 फ़ीसद सामग्री पॉर्न से संबंधित होती हैं और हर सेकंड कम से कम 30,000 लोग इस तरह की साइट देख रहे होते हैं.
 बच्चों और किशोरों द्वारा इन साईटों को देखने का सबसे ज़्यादा नुक़सान उनकी मानसिक अवरुद्धता और पढ़ाई की तरफ़ से अपेक्षित ध्यान का हटना है . यह माँ - बाप के लिए बड़ी समस्या है .भारत जैसे विकासशील देश में उन बच्चों की संख्या बढ़ रही है जिनके पास निजी कंप्यूटर, इंटरनेट कनेक्शन और स्मार्टफोन मौजूद है और इसीलिए पौर्न साइटों से प्रभावित होने के उनके खतरे भी बढ़ रहे हैं. इस गंभीर स्थिति से बच्चों को उबारने के लिए व्यक्तिगत , सामूहिक एवं सरकारी स्तर पर  ठोस और तात्कालिक कोशिश की जानी चाहिए .
- डॉ. मुहम्मद अहमद  

जब तक दम में दम है

जब तक दम में दम है मैं इससे जुदा न हूँ ,
अपने ऐसे दोस्त से गाफ़िल ज़रा न हूँ |
 - बाबू उदय प्रताप लाल श्रीवास्तव 
      [  रचना तिथि  - २२ मई १९५८ ]

अपनी भाषा से बढ़कर अपनत्व एवं संतोष की कहीं प्राप्ति नहीं हो सकती


अपनी भाषा से बढ़कर अपनत्व एवं 

संतोष की कहीं प्राप्ति नहीं हो सकती 
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फ़ेसबुक पर आकर मुझे यह महसूस एवं अन्देशा हुआ कि देवनागरी लिपि कहीं गर्त में न चली जाए . हिंदी लिखने के लिए रोमन लिपि कहाँ तक उचित है ? कहीं यह मजबूरी एक निहायत उम्दा लिपि से हमें महरूम न कर दे .
देवनागरी लिपि के अतिरिक्त अन्य कोई लिपि भावों को सोच्चारण व्यक्त करने में अक्षम है , इसलिए भी देवनागरी लिपि की अनिवार्य आवश्यकता है . विश्व की लगभग चार हज़ार भाषाओँ में हिंदी शब्द - संपदा की दृष्टि से सबसे समृद्ध है .यह सभी भाषा - शब्दों को आत्मसात करती रही है . शब्दों में उसके लिए कोई छुआछूत नहीं है .
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।।
आचार्य पं.रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में --
अपनी भाषा से बढ़कर अपना कहाँ ?
जीना जिसके बिना न जीना है यहाँ .
उस भाषा में जो है इस स्थान की ,
उस हिंदी में जो है हिंदुस्तान की .
उसमें जो कुछ रहेगा वही हमारे काम का ,
उससे ही होगा हमें गौरव अपने नाम का .
----------------  डॉ. मुहम्मद अहमद 

होवे न कलंकित हिन्दू धर्म - पाक इस्लाम

चिन्ता है होवे न कलंकित हिन्दू धर्म - पाक इस्लाम ,

गावें दोनों सुध - बुध खोकर , या अल्ला ,जय - जय घनश्याम |

- पंडित माखनलाल चतुर्वेदी

Apr 17, 2013

दिव्य सुवास

दिव्य सुवास 


ओ शांतनु !
सुवास के प्रेमी 
परिहास के प्रेमी 
क्या तूने पाया अनैसर्गिक गंध ?
सत्यवती को पाकर 
सत्या को लाकर 
क्या तूने पाया दिव्यता का सुवास ?
ओ शांतनु !
शांति - लाभ कर चर्चित 
हस्त - स्पर्श कर  हर्षित 
क्या तूने किया 
शांति का विलोम ? 
अपने का विलोम ?
भीष्म को पाकर 
देवव्रत को लाकर 
क्यों तूने किया
 शांति - भंग ?
ओ शांतनु !
देवव्रत सुत भीष्म 
सुनन्दा के भीष्म 
क्या हुआ तेरे 
जल - सुतों का ?
चित्रांगद का ?
विचित्रवीर्य का ?
मत्स्य गंधा तो बनी 
योजनगंधा .... 
क्या हुआ ?
चित्रांगद नहीं रहे 
विचित्रवीर्य भी जवान नहीं हुए 
बूढ़े ही रहे .... !
और निःसन्तान !
ओ शांतनु !
क्या हुआ तेरे 
कला - कौशल का ?
युवा बनाने का ?
शांति - लाभ का ?
यह सवाल 
आज भी है 
रह - रहकर 
जो मुझे सालता रहता है !!!
.............. डॉ . मुहम्मद अहमद 
  [ '' यथाशा '' , प्रकाशनकाल  सन 2000 से ]