May 30, 2013

जय ' उदन्त ' - जय जुगल

जय ' उदन्त ' - जय जुगल 
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 आज हिंदी पत्रकारिता दिवस है | 187 वर्ष पहले 30 मई 1826 को पंडित जुगल किशोर सुकुल ने हिंदी का पहला समाचारपत्र '' उदंत मार्तड " का प्रकाशन शुरू किया गया । यह साप्ताहिक पत्र था , लेकिन अर्थाभाव के चलते इसके मात्र 79 अंक ही निकल पाए थे | पहले की मिशनरी पत्रकारिता आज उद्योग बन चुकी है | इसके पास धन तो आ गया है , परन्तु आत्मा रुखसत हो चुकी है | नैतिक स्तर अधोगति को प्राप्त हो चुका है | पत्रकार और पत्रकारिता दोनों अनैतिकता के वाहक बने हुए हैं | पत्र - पत्रिकाओं की अश्लीलता कोई छिपी चीज़ नहीं | अश्लील विज्ञापनों ने नारी का  भारी मान - मर्दन किया है और कर रहे हैं | दूसरी ओर अख़बारों के धंधेबाज हर अनैतिक धंधे / कृत्य का विज्ञापन छापकर एडमंड बर्क की चतुर्थ सत्ता को रसातल में ले जा रहे हैं | धन कमाने की ऐसी होड़ लगी हुई है कि ' पेड न्यूज़' जैसा खुला भ्रष्टाचार सामने है ! आज न कोई मर्यादा है और न ही कोई आदर्श ... मिशन तो कब का फुर्र हो गया | बस धन आए .... चाहे जो करना पड़े , सब ठीक !! पत्रकारों की यह स्थिति  एक दिन में ही नहीं बन गयी , अपितु भौतिकवाद ने धीरे - धीरे उन्हें सभी मूल्यों से हटा दिया |  
   स्थितियां कितनी ही जटिल क्यों न हों , नैतिकता को खोना सचमुच बहुत चिंताजनक है | धनाभाव के कारण कोई सभ्य जीव भला अपनी नैतिकता क्यों खोएगा ? क्या हमारे पूर्वज धनवान थे? क्या उनका जीवन अर्थहीनता का शिकार न था ? आने - पाई के हिसाब वाली उनकी डायरियां देखिए ... उनके जीवन वृतान्त पढ़िए ...... क्या उनके सामने कम कठिनाइयां  और चुनौतियाँ थीं ? इतिहास गवाह है कि संपादकाचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की आर्थिक दशा इतनी चिंतनीय हो गयी थी कि आपने दो चलताऊ पुस्तकें लिखीं , लेकिन अंत में इसकी कमाई को हराम समझकर अपनी नैतिकता और मर्यादा पर अडिग रहते हुए पुस्तक को न प्रकाशित करवाने का फ़ैसला किया | क्या हिंदी पत्रकारिता दिवस पर हम अपने खोखलेपन को  दूर करने का कुछ संकल्प करेंगे या इस दिवस को परम्परागत ढंग से यूँ ही रस्मी अंदाज़ से मनाकर ' इति श्री' कर लेंगे ??? 

- डॉ . मुहम्मद अहमद 

May 27, 2013

कठोर दंड आवश्यक है

कठोर दंड आवश्यक है | छान्दोग्योपनिषद् में अश्वपति कैकेय द्वारा दावा किया गया है कि उसने अपने राज्यों से चोरों , शराबियों , जाहिलों और व्यभिचारियों को मार डाला है - 
न मे स्तेतो जनपदे , न कर्द्यों न मद्यपः ,
नानाहितार्ग्निर्न चा विद्द्वान न स्वैरी स्वैरिणी कृतः |
  अब आप ही बताइए हिंसाचारियों  और आतंकियों को तत्क्षण क्यों न मार डाला जाए ? 

- डॉ . मुहम्मद अहमद 

May 26, 2013

हिंसाचार का अंत बुरा


हिंसाचार का अंत बुरा !
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मेरे मालिक ने मेरे हक़ में यह एहसान किया
खाके नाचीज़ था मैं सो मुझे इन्सान किया।
आदमी से मलक को क्या निस्बत
शान अरफा है ' मीर ' इन्सां की।

   लेकिन क्या हो गया है इंसानों को जो ख़ुद इंसानों के खून के प्यासे हैं ..... चाहे नक्सली हों या अन्य हिंसाचारी ,  आख़िर ये सब इंसानियत के दायरे में कैसे आ सकते हैं ? क्या हिंसक अपनी मांगों पर बल देने के लिए अहिंसक रास्ता नहीं अपना सकते ? ज़माना गवाह है कि बेकसूरों के प्रति हिंसाचार  का परिणाम बड़ा दुखदाई होता है . इससे प्राप्ति अनर्थकारी और अकल्याणकारी ही होती है ..... बुद्ध पूर्णिमा  [ 25 मई 2013 ] के सुअवसर पर ऐसा नरसंहार सर्वथा निंदनीय और विक्षोभकारी भी है ....  अहिंसा के महान प्रवर्तक , प्राणी - हिंसा के सख्त विरोधी बुद्ध जी की शिक्षाओं के विपरीत माओ की हिंसा - शिक्षा  को प्रश्रय क्यों ? 
- डॉ . मुहम्मद अहमद  

आइए महसूस कीजिए ज़िन्दगी के ताप को


आइए महसूस कीजिए

















आइए महसूस कीजिए ज़िन्दगी के ताप को 
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको  
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गयी फुलिया बिचारी इक कुएं में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबरायी हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्‍हलायी हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी खामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाये खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोयी हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़ि़या है घात में
होनी से बेखबर कृष्ना बेखबर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गयी
छटपटायी पहले, फिर ढीली पड़ी, फिर ढह गयी
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
और उस दिन ये हवेली हंस रही थी मौज में
होश में आयी तो कृष्ना थी पिता की गोद में
जुड़ गयी थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आखिर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पांव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएंगे जिंदा उनको छोड़ेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुंह काला करें
बोला कृष्ना से – बहन, सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
पड़ गयी इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गये थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लंबी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई! क्या जमाना आ गया
कल तलक जो पांव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस में मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो
देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारों के यहां
पड़ गया है सीप का मोती गंवारों के यहां
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है, मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गयी
जाने-अनजाने वो लज्जत जिंदगी की पा गयी
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गयी
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही
जानते हैं आप मंगल एक ही मक्कार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गांव की गलियों में क्या इज्जत रहेगी आपकी
बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूंछों पर गये माहौल भी सन्ना गया
क्षणिक था आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हां, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था
रात जो आया न अब तूफान वह पुर जोर था
भोर होते ही वहां का दृश्य बिलकुल और था
सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
“जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आये सामने”
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलायी दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर “माल वो चोरी का तूने क्या किया”
“कैसी चोरी माल कैसा” उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस, होश फिर जाता रहा
होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -
“मेरा मुंह क्या देखते हो! इसके मुंह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूंक दो”
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहां चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुंहा बच्चा व बुड्ढा जो वहां खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे
“कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएं नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूं कोई कहीं जाए नहीं”
यह दरोगा जी थे मुंह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
फिर दहाड़े “इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा”
इक सिपाही ने कहा “साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें”
बोला थानेदार “मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है”
पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल“
कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल”
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को
मैं निमंत्रण दे रहा हूं आएं मेरे गांव में
तट पे नदियों की घनी अमराइयों की छांव में
गांव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहां पर नथ उतारी जा रही
हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !


...............
अदम गोंडवी [ रामनाथ सिंह ]

सितारों सामने आओ बहुत उदास है रात

सुखन की शम्मां जलाओ बहुत उदास है रात
नवाए मीर सुनाओ बहुत उदास है रात
कोई कहे ये खयालों और ख्वाबों से
दिलों से दूर न जाओ बहुत उदास है रात
पड़े हो धुंधली फिजाओं में मुंह लपेटे हुये
सितारों सामने आओ बहुत उदास है रात |

- फ़िराक़ गोरखपुरी 

May 23, 2013

कुछ यादें - कुछ बातें

कुछ यादें - कुछ बातें -- 1
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  आदरणीय मित्रो , मैं काफ़ी दिनों से यह सोच रहा हूँ कि अपने जीवन की कुछ यादों को आपसे शेअर करूं | अभी इसकी शुरुआत तो नहीं कर पा रहा हूँ , किन्तु आरम्भिका के तौर पर एक मुक्तक ज़रूर बन गया है | पेश है यह आपकी सेवा में -----
यादों के समुन्दर में कितना डूबूं , यह मुझ पर है ,
उन्मुक्त हो गोते लगाऊं या नहीं , यह मुझ पर है ,
मैं बेनियाज़ होकर भंवर में  ही  रहूँ तो क्या हो ?
कभी साहिल पर आऊं या जहाँ में , यह मुझ पर है | 
- डॉ. मुहम्मद अहमद  

May 22, 2013

शब्दों की अमरता


शब्दों की अमरता , अक्षयता एवं  संहारकता 
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यह एक महत्वपूर्ण विषय है , अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी | वास्तव में शब्द असीम है , अमर है  ... नाम , रूप से परे है  , लेकिन है यह बड़ा व्यापक ......  एक ओर तो यह  है बहुत ही  प्रचंड और तीक्ष्ण !  इतना कि इसके प्रहार से सब धराशाई हो जाते हैं ! दूसरी ओर कोमलता का आलम यह है कि इसे सुनने हेतु प्रयास करना पड़ता है ... साधना करनी पड़ती है ! कहा गया है कि शब्द को सुनने वाला धार्मिक दृष्टि से सफल है | वह अनहद को सुनकर अपने जीवन को सफल बना लेता है | प्रभु को प्राप्त कर लेता है | कहा गया है -
     जै जै सबदु अनाहदु बाजै ,
     सुनि सुनि अनद करें प्रभु गाजै |
  अर्थात , धन्य है वह जो अनहद - असीम शब्द - को सुन सकता है और जिसके शब्द - नाद को सुनकर वह असीम सुख का भोग करता है |
   ज्ञात हुआ कि शब्द - साधना से बड़े - बड़े विघ्न पार हो सकते हैं | अतः हमें बोलचाल में , जीवन के अन्य कार्यों में शब्द - प्रयोग में बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है | जो ऐसा नहीं करते अपने जीवन में बहुत - सी अनचाही समस्याओं को ले आते हैं | साथ ही हमें  अंतर्मन के शब्दों को सुनना भी है , जो सदैव हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा भरते रहेंगे ..... हाँ , इन शब्दों को सुनने के लिए सतत अभ्यास की ज़रूरत है |

- डॉ. मुहम्मद अहमद  

बौद्धिकता और भावना


बौद्धिकता और भावना
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   ये  दोनों अलग - अलग चीज़ें हैं | दोनों का अलग - अलग अस्तित्व है | अतः इनके  सम्मिश्रण / स्थानापन्नता  से समस्याएं उठ खड़ी होनी ही हैं | एक  शेअर में इसी ओर संकेत किया गया है - 
   खिरद का नाम जुनूं रख दिया जुनूं का खिरद 
   जो चाहे आपका हुस्ने करिश्मा साज़ करे | [ इक़बाल ]
अर्थात , बौद्धिकता को भावना  और भावना को बौद्धिकता कह दिया | यह तो आपका चमत्कारिक सौन्दर्य ही कर सकता है |
    बसोख्त अक्ल ज़ हैरत कि बुलअज्बीस्त 
अर्थात , बुद्धि चकित है कि यह तमाशा क्या है |
    बरीं अक्ल व दानिश बबायद गिरीस्त 
अर्थात , इस बुद्धि - विवेक पर रोना ही चाहिए |

- डॉ. मुहम्मद अहमद 

May 20, 2013

कोई ऐसा चराग लाओ

कोई ऐसा चराग लाओ मेरे दोस्तो ,


जो हर शै को अँधेरे से निकाल लाए |

- डॉ . मुहम्मद अहमद 

May 19, 2013

ये दुनिया मेरे आगे ...

ये दुनिया मेरे आगे अनेक रंगों रूप में ,
कभी लगे अपनों से बढ़कर ,कभी पराई है |
- डॉ . मुहम्मद अहम

May 18, 2013

कमाला है मज़ा इसमें

महान संत कबीरदास जी के सुपुत्र कमाल जी की रचनाएं बड़ी मुश्किल से मिलती हैं . हाजीपुर [ बिहार ] के मेरे मित्र श्री ऋषि कुमार जी के आग्रह पर मैंने कुछ रचनाएं प्राप्त की हैं . मैं हार्दिक रूप से आभारी हूँ परम मित्र डॉ. ज्ञान चन्द्र जी का , जिन्होंने डॉ . धनेश्वर प्रभाकर जी से ये रचनाएं प्राप्त कर मेरे पास भेजीं . इन रचनाओं में से एक शेअर जो मुझे सबसे अधिक पसंद आया  , आप आदरणीय मित्रों की सेवा में प्रस्तुत करने का लोभ - संवरण नहीं कर पा रहा हूँ -------


कमाला है मज़ा इसमें 
हर कोई ले नहीं सकता 
जो कोई मर के ज़िन्दा हो 
वही इस देश में आता |
- कमाल दास  

May 13, 2013

सदा सच बोलिए


हर हाल में सच बोलिए 
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ऐसा लगता है कि कोई सच बोलने को तैयार नहीं . आज एक राजनीतिक दल की प्रेस कांफ्रेंस में बर्क की ताज़ा हरकत का सवाल भी सामने आया , तो टाल - मटोल होने लगी . क्या हो गया है इन लोगों को ? इन्हें बस सस्ती लोकप्रियता चाहिए . क्या बर्क को किसी ने जबरन लोकसभा का सदस्य बनाया  है ? क्या उन्हें मालूम नहीं कि जिस संसद में जाने के लिए उन्होंने धन - जन शक्ति का भरपूर इस्तेमाल किया था , वहाँ विभिन्न आस्थाओं / मान्यताओं की नुमाइंदगी है ? फिर क्यों गये लोकसभा में ? फिर किसी परम्परा पर , जो नई भी नहीं है , आपत्ति थी , तो संसद में पहली बार पहुंचते ही उन्होंने इसके विरुद्ध निजी बिल क्यों नहीं पेश किया ? सस्ती - घटिया लोकप्रियता जो न कराए उनसे .... मैं कम से कम इतना तो जानता हूँ कि बहन जी अपने हर सदस्य से अपनी मान्यताओं के अनुरूप ही ' अभिवादन ' स्वीकार कराती हैं मानो उनका अपना ' सहारा परिवार ' हो [ अब क्या सहारा में मुसलमान की मौजूदा बड़ी संख्या काम न करे ? कृपया बताएं बर्कवादी ? ]  बस ज़रा - सी बात पर इनका धर्म ख़तरे में पड़ जाता है ! तो मन्दिरों / गुरुद्वारों से प्रसारित भजन - कीर्तन आदि से अब ये लोग क्या ऐसी दुनिया में घर बनायेंगे , जहाँ अन्य कोई आवाज़ सुनाई न देती हो ? यकीनन इस प्रकार की हरकत इस्लाम के ख़िलाफ़ है . हमारे पैगंबर हज़रत मुहम्मद [ स] ने तो दूसरे धर्म के लोगों को मस्जिद में ही उनके अपने धर्म के अनुसार इबादत की इजाज़त दी थी और सहिष्णुता , उदारता का जीवंत , अद्वितीय उदहारण पेश किया था . आज बर्क जैसे लोग है , जिन्हें सहिष्णुता छू तक नहीं गयी है ! क्या ऐसे लोग देश की महानतम - उच्चतम संस्था लोकसभा की सदस्यता के पात्र हो सकते हैं ? क्या ऐसी मानसिकता से ग्रस्त लोगों के द्वारा देश में शांति की स्थापना हो सकती है ? क़तई नहीं . धिक्कार है ऐसे लोगों पर ..... 

May 12, 2013

माँ के आंचल का विस्तार वृद्धाश्रम तक !!!


माँ के आंचल का विस्तार वृद्धाश्रम तक !!!
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माँ की महत्ता इतनी बड़ी है कि उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता | वह सृष्टिदायिनी है | दरहकीकत उसकी महत्ता के आगे  सारे जग की सर्वसंपन्न, सर्वमांगल्य, सारी शुचिता फीकी पड़ जाती है | वेद के अनुसार प्रथम नमस्कार माँ को करना चाहिए।  सारे संसार का प्रेम माँ रूपी शब्द में व्यक्त कर सकते हैं। जन्मजात दृष्टिहीन संतान को भी माँ उतनी ही ममता से बड़ा करती है। दृष्टिहीन संतान अपनी दृष्टिहीनता से ज्यादा इस बात पर अपनी दुर्दशा व्यक्त करता है कि उसका लालन-पोषण करने वाली माँ कैसी है, वह देख नहीं सकता, व्यक्त कर नहीं सकता। वेद में माँ को ' वीर प्रसविनी ' कहा गया है | वेद की ही शिक्षा है कि दूसरा नमस्कार पिता को करना चाहिए | ऐसी ही शिक्षा इस्लाम की है | हजरत मुहम्मद [स.] ने कहा-'यदि तुम्हारे माता और पिता तुम्हें एक साथ पुकारें तो पहले मां की पुकार का जवाब दो।' एक बार एक व्यक्ति ने हजरत मुहम्मद (सल्ल.) से पूछा'हे ईशदूत, मुझ पर सबसे ज्यादा अधिकार किस का है?'उन्होंने जवाब दिया 'तुम्हारी माँ का', 'फिर किसका?' उत्तर मिला 'तुम्हारी माँ का','फिर किस का?' फिर उत्तर मिला 'तुम्हारी माँ का' तब उस व्यक्ति ने चौथी बार फिर पूछा 'फिर किस का?' उत्तर मिला 'तुम्हारे पिता का।'
किसी ने सच ही कहा है कि -
माँ बनके ममता का सागर लुटाती हो,
बहन हो हक और स्नेह जताती हो,
पत्नी बन जीवनभर साथ निभाती हो,
बन बेटी, खुशी से दिल भर जाती हो,
तुम में अनंत रूप, असंख्य रंग हैं …
हर मोड़ पे साथ निभाती हो !
तुमसे है घर-द्वार, तुमसे संसार है,
सृष्टि भी बिना तुम्हारे लाचार है,
गुस्सा है तुम से और तुम से ही प्यार है,
हो साथ तुम तो क्या जीत क्या हार है,
बिना तुम्हारे न रहेगी ये दुनिया …
तुम्हारे ही कंधों पर सृष्टि का भार है !
लेकिन यह तो हुआ एक पक्ष .... व्यावहारिक पक्ष बड़ा ही चिंताजनक , दुखद और क्षोभकारी है ! आजकल इस महान हस्ती का जितना अनादर , तिरस्कार और दुत्कार का इसे सामना करना पड़ रहा है , शायद किसी और को नहीं . आज के कुपूत उसे बोझ समझते हैं और उसके आशीर्वाद के अमृत का पान न करके ज़रा - ज़रा सी बात पर वृद्धाश्रम का रास्ता दिखा देते हैं या उसकी हर सुख - सुविधा की उपेक्षा करने से नहीं चूकते .... आख़िर यह स्थिति कब तक ......???
- डॉ . मुहम्मद अहमद

May 11, 2013

नित्य हों बातें

 नित्य हों बातें वही बेकार की 

कल्पना के सुख भरे संसार की 

ज़िन्दगी वतन , पसीना मान है 

बना नीति माटी के इन्सान की |

- डॉ . मुहम्मद अहमद 

May 10, 2013

एकेश्वरवाद क्या है ?


एकेश्वरवाद क्या है ?
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अभी पिछले दिनों लोकसभा में दो मुस्लिम सांसदों ने वंदेमातरम् की धुन पर विरोध प्रकट किया . उनका यह क़दम कैसा है , इस पर बहुत - सी टिप्पणियाँ आ चुकी हैं . मैं सिर्फ़ इस बात को आपसे शेअर करना चाहता हूँ कि इस्लाम में एकेश्वरवाद क्या है ? अन्य धर्मों में इसकी क्या मान्यता है ? इस  सिलसिले में पिछले दिनों मैंने एक लेख लिखा था , जो पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो चुका है . प्रस्तुत है यह लेख ---- 

यह एक सर्वमान्य सच्चाई है कि मनुष्य सृजनकार-ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है। सृष्टि के अन्य सभी जीवों, वस्तुओं, चीज़ों और प्राकृतिक संरचनाओं में केवल मनुष्य को ही कुछ विशिष्ट गुण, क्षमताएं और अधिकार मिले हुए हैं, जिनके अंतर्गत वह अपनी बुद्धि और अक़्ल का प्रयोग सकारात्मक और नकारात्मक दोनों दिशाओं में करने के लिए स्वतंत्र है। वह अपने इच्छानुसार जीवन बरतता और जीता है। वास्तव में यह स्वतंत्रता और इरादे की शक्ति उसकी परीक्षा है, अन्यथा वह भी कई अन्य पहलुओं से सूर्य, चन्द्रमा आदि प्राकृतिक रचनाओं की भांति निश्चित नियम का पाबंद होता है। वह चाहता है तो ईश्वरीय आदेशों और निर्देशों के अनुसार जीवन व्यतीत करता है और इस प्रकार अपने लौकिक व पारलौकिक जीवन को सफल बनाता है। इसके विपरीत वह स्वच्छंद जीवन जीकर सर्वथा असफल परिणाम का भुक्त भोगी बनता है।
मनुष्य वह प्राणी है जिसको ईश्वर ने इतनी शक्ति व सामर्थ्य प्रदान की है कि वह एक सीमा के अंतर्गत सृष्टि के संसाधनों से लाभ उठा सकता है और उसका दोहन भी कर सकता है। इस दृष्टि से यह स्पष्ट है कि सृष्टि में जो मानव को स्थान प्रदान किया गया है, वह सोद्देश्य है और विशिष्ट उद्देश्य के अंतर्गत ही मनुष्य के लिए वे असीमित और असंख्य संसाधन जुटाए गए हैं।
स्वाभाविक रूप से एवं सुगमता के साथ यह तथ्य और मर्म समझा जा सकता है कि जिस स्रष्टा-पालनकर्ता प्रभु ने जिस मानव तथा उसके लिए विशाल सृष्टि को उत्पन्न किया है उसे उसका उपकृत होकर ही नहीं, बल्कि उसके प्रति निष्ठावान एवं आभारी होकर भी उसकी भक्ति व बन्दगी करनी चाहिए। इस प्रकार मनुष्य और उसके स्रष्टा के बीच एक विशिष्ट प्रकार का मधुर संबंध पाया जाता है। कुछ अनेकेश्वरवादी लोग इस संबंध का इन्कार और उसकी अवहेलना कर सकते हैं, लेकिन ईश्वर एवं उसकी सृष्टि के बीच मानव के इस कोमल नैसर्गिक संबंध में कदापि कोई परिवर्तन नहीं ला सकते। यह तथ्य स्वमेव सप्रमाण हर काल और समय में उपस्थित रहा है। फिर भी आश्चर्य और चिंता का विषय है कि अंधता के विश्वासियों की दृष्टि नहीं खुल पा रही है!
स्रष्टा और मनुष्य के बीच इस संबंध को अपेक्षित है कि मनुष्य अपने पालनकर्ता प्रभु का आज्ञाकारी बने और उसके आदेशों व इच्छाओं के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करे। उस एक ईश्वर स्रष्टा, पालनकर्ता को छोड़कर किसी अन्य को पूज्य, उपास्य, नियंता, अधिपति न बनाए। वह विशुद्धभाव से एकेश्वरवादी बने और एक ईश्वर को ही अपना उपास्य और पूज्य माने। अपनी आवश्यकताओं, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं आदि के लिए उसी की ओर रुजू करे, उसी से विनीत भाव से प्रार्थना करे और उसकी ही प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास करे। 
मनुष्य के पास एक ही हृदय है, जो एक ईश्वर की भक्ति की सामर्थ्य रखता है, फिर भक्ति को विखंडित तो किया ही नहीं जा सकता। अन्तरात्मा को भी यही वांछित है कि वह एक ही ईश्वर की भक्ति करे। मनुष्य के अपने स्रष्टा के साथ इस प्रकार के मधुर संबंध की उक्त और अन्य अपेक्षाओं-वांछाओं को मानव जीवन में सही तौर पर उतारने, बरतने और उन्हें अमल में लाने के परिणामस्वरूप जीवन में जो गुण, विशिष्टताएं, शील-स्वभाव, नैतिकता और सदाचार पैदा होते हैं वे जीवन को विकारों और चिंताओं से मुक्त करते ही हैं, ईश्वर की प्रसन्नता का इतना उत्तम साधन बन जाते हैं कि मनुष्य का लोक-परलोक दोनों सुधर-संवर जाता है। यही सफलता मानव जीवन की वास्तविक सफलता है।
इसके विपरीत जो मनुष्य स्रष्टा के नैसर्गिक संबंध को झुठलाता है, उससे मुंह फेरता है वह बड़ा कृतघ्न तो है ही अपने जीवन को अत्यंत जटिल और समस्याग्रस्त भी बना लेता है। अंततः उसके हाथ असफलता और निराशा ही लगती है। मानव इतिहास यह बताता है कि मनुष्य अपने विवेक का प्रयोग उद्दंडता, निरंकुशता और मनमाने व्यवहार के रूप में भी करता रहा है, वहीं दूसरी ओर करुणामय, पालनहार, स्रष्टा ने उसे बार-बार सन्मार्ग दिखाया और इस्लाम को परिपूर्ण रूप से ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के द्वारा भेजा। ईश्वरीय शिक्षाओं को जब भी झुठलाया गया या उनमें परिवर्तन आ गया तो इसका समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा और उसमें बिगाड़ आ गया। इन अवसरों पर सर्वशक्तिमान संप्रभु, ईश्वर मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए अपने दूत, संदेशवाहक, पैग़म्बर और रसूल भेजता रहा एवं आवश्यकता के अनुसार उन पर अपनी किताब उतारी। इस प्रकार करुणामय दयावान प्रभु ने उन शिक्षाओं को मनुष्य तक पहुंचाने का प्रबंध किया जिन्हें वे भुला बैठे थे। ईश्वर के दूत और पैग़म्बर संसार के प्रत्येक भू-भाग में भेजे गए, अतः भारत में भी वे ईश्वर का संदेश लेकर आए होंगे। सभी नबियों ने अपने आह्वान का आरंभ एकेश्वरवाद (तौहीद) से किया और इस पर इस प्रकार जमे रहे कि किसी भी हाल में इससे बाल बराबर भी हटने को तैयार न हुए। अल्लाह के अंतिम रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) से विरोधियों ने बार-बार चाहा कि आप इस विषय में थोड़ी-सी नरमी दिखाएं, लेकिन आपने ज़रा भी नरमी नहीं दिखाई, यहां तक कि आपको प्रलोभन दिया गया, रिश्वत में वह सब कुछ पेश किया जिसकी उन्हें सामर्थ्य थी, लेकिन इन सब उपायों के बावजूद भी वे पैग़म्बर को विचलित न कर सके।
‘इस्लाम’ का शाब्दिक अर्थ है—आज्ञा मानना अर्थात् एक ईश्वर सर्वशक्तिमान की आज्ञा का पालन करना। आज्ञापालन करनेवाले को मुस्लिम कहते हैं। इस्लाम ‘सिल्म’ धतु अक्षर से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ अम्न और शांति है। ‘इस्लाम’ शब्द का अर्थ है ईश—आज्ञापालन द्वारा शांति की (अवश्यंभावी) प्राप्ति।
इस्लाम विशुद्ध एकेश्वरवादी धर्म है। अर्थात् उसकी यह धरणा है कि संपूर्ण जगत का एक ही ईश और ख़ुदा है और वही एक मात्र पूज्य और उपास्य है। इस्लामी शब्दावली में ईश, पूज्य प्रभु, पालनहार को अल्लाह कहा जाता है, परन्तु अल्लाह शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है। आगे बढ़ने से पहले इसे जान लेना उचित और समीचीन होगा। ‘‘अल्लाह’’ शब्द का अर्थ निरुपण मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘तफ्सीर सूरह फ़ातिहा’’ में निम्नलिखित शब्दों में किया है—
‘‘सामी भाषाओं के अध्ययन से ज्ञात होता है कि व्यंजनों और स्वरों का एक मुख्य समूह है, जो ‘‘पूजित’’ के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है। इबरानी, सुरयानी, कलदानी, हमीरी, अरबी आदि समस्त भाषाओं में उसका यही शाब्दिक गुण पाया जाता है। यह ‘अलिफ़’, ‘लाम’ और ‘हे’ का धातु है। कलदानी और सुरयानी का ‘अलाहिया’, इबरानी का ‘उलूह’ और अरबी का ‘इलाह’ इसी से बना है। और निस्सन्देह यही ‘इलाह’
 है, जो ‘अलिफ़’ और ‘लाम’ अक्षरों के बढ़ा देने से ‘अल्लाह’ हो गया है, और इस प्रयोग ने ‘अल्लाह’ नाम को उस सत्ता के लिए विशिष्ट कर दिया है, जो संपूर्ण सृष्टि का रचयिता है। परन्तु यदि ‘अल्लाह’, ’इलाह’ से बना है तो ‘अल्लाह’ का अर्थ क्या है? इसके संबंध में विद्वानों के विभिन्न कथन हैं। परन्तु सबसे अधिक प्रबल पक्ष यह ज्ञात होता है कि इस नाम का उद्गम शब्द ‘अलह’ है। ‘अलह’ का अर्थ चकित और विवश हो जाना है। कुछ ने कहा है कि ‘अल्लाह’, ‘वलह’ शब्द से बना है। इसका अर्थ भी यही है। अतः सृष्टि के रचयिता का नाम ‘अल्लाह’ इसलिए हुआ कि इस सत्ता के विषय में मनुष्य जो कुछ जानता है और जान सकता है वह इससे अधिक और कुछ नहीं है कि बुद्धिचकित रह जाए और उसकी वास्तविकता को समझने के लिए विवश हो जाए।’’
‘‘अल्लाह’’ शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए मौलाना अबू-मुहम्मद इमामुद्दीन ‘रामनगरी’ लिखते हैं—
‘इलाह’ का अर्थ है: पूज्य। इसलिए ‘इलाह’ प्रत्येक उस व्यक्ति, जीव और निर्जीव वस्तु को कह सकते हैं जिसकी पूजा की जाए। इस ‘इलाह’ शब्द में ‘अ’ और ‘ल’ संयुक्त कर ‘अल्लाह’ कर देने का अभिप्राय यह है कि एक ईश्वर ही पूज्य है। इसके अतिरिक्त कोई और पूज्य व उपास्य नहीं है।
(इस्लाम का एकेश्वरवाद, पृ॰ 1, इस्लामी साहित्य सदन, रामनगर, वाराणसी)
‘अल्लाह’ शब्द में यह विशिष्ट गुण निहित है कि उसका प्रयोग एक ही उपास्य-प्रभु के लिए हो सकता है। भाषा विज्ञान के अनुसार, उसके सिवा किसी अन्य के लिए इसका प्रयोग नहीं हो सकता। इस शब्द का न तो कोई बहुवचन है और न ही इसका कोई लिंग (Gender) है। इस शब्द का सटीक हिन्दी अनुवाद ‘ईश्वर’ इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि यह शब्द भगवान, देवी-देवता, देव, विशिष्ट पुरुष अथवा जीव आदि उपास्यों के लिए भी भाववाचक रूप में प्रायः प्रयुक्त होता है। यह ज़रूर है कि काम चलाने अथवा समझने-समझाने के लिए अल्लाह का अनुवाद ईश्वर किया जा सकता है। वैसे क़ुरआन के मुताबिक़ सारे अच्छे नाम अल्लाह के ही लिए है। एक हदीस के अनुसार अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने अल्लाह के लिए 99 नामों का उल्लेख किया है, जिसे ‘‘अस्समाउलहुस्ना’’ (अल्लाह के अच्छे नाम) कहा जाता है।
क़ुरआन में है—
  • ‘‘कह दो अल्लाह कहकर पुकारो या रहमान कहकर जिस नाम से भी पुकारो उसके सब अच्छे ही नाम हैं।’’  (17:110)
  • ‘‘अल्लाह अच्छे नामों का अधिकारी है—उसको अच्छे ही नामों से पुकारो और उन लोगों को छोड़ दो, जो उसके नाम रखने में सच्चाई से हट जाते हैं।’’ (7:180)
  • ‘‘वह अल्लाह ही है उसके सिवा कोई पूज्य नहीं, उसके लिए सर्वोत्तम नाम हैं।’’ (20:8)
अल्लाह एक है
‘‘अल्लाह’’ शब्द में उसके एक होने का अर्थ निहित है। पवित्र क़ुरआन में अल्लाह के एक होने के संबंध में अनेक आयतें अवतरित हुई हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं—
  • ‘‘तुम्हारा पूज्य प्रभु एक ही पूज्य प्रभु है, उस करुणामय और दयावान के सिवा कोई और पूज्य प्रभु नहीं है।’’   (2:163)
  • ‘‘वही अल्लाह है उसके सिवा कोई पूज्य प्रभु नहीं।’’  (28:70)
  • ‘‘कह दो वह अल्लाह है यकता (अकेला)।’’  (112:1)
  • ‘‘अल्लाह का आदेश है दो ख़ुदा न बनाओ, ख़ुदा तो बस एक ही है।’’  (16:51)
वास्तव में इस्लाम की शिक्षाओं का सार-तत्व एकेश्वरवाद (तौहीद) है। दूसरे शब्दों में यह इस्लाम की आधारशिला है। ‘‘ला इलाह इल्लल्लाह’’ अर्थात् अल्लाह के सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं—इस्लाम के प्रथम सूत्र-वाक्य (कलिमा) का आरंभिक वाक्यांश है, जिस पर ईमान लाना प्रत्येक मुसलमान के लिए अनिवार्य है। हम अपनी खुली आंखों और बुद्धि-विवेक एवं चेतना के ज़रिए से जब समूची सृष्टि पर नज़र डालते हैं, तो एक से अधिक ईश्वर के न चिन्ह मिलते हैं न प्रमाण। स्वयं ‘ब्रह्माण्ड’ शब्द भी इस सत्य-तथ्य का द्योतक है। अन्य धर्म-ग्रंथों में भी इस सिलसिले में कई उद्धरण पाए जाते हैं, जो इस सच्चाई और वास्तविकता को प्रकट करते हैं। मानव की प्रकृति मौलिक रूप से एकेश्वरवाद के प्रति ही आकर्षित होती है, क्योंकि यह उसके सर्वथा अनुकूल है। क़ुरआन में है—
  • ‘‘अल्लाह एक मिसाल देता है। एक व्यक्ति तो वह है जिसके मालिक होने में बहुत-से दुःशील स्वामी साक्षी हैं जो उसे अपनी-अपनी ओर खींचते हैं और दूसरा व्यक्ति पूरा का पूरा एक ही स्वामी का दास है। क्या इन दोनों का हाल एक-सा हो सकता है? —प्रशंसा अल्लाह के लिए है, मगर ज़्यादातर लोग नादानी में पड़े हुए हैं।’’ (39:29)
उसका कोई साझी नहीं
अल्लाह का कोई साझी और शरीक नहीं है। उसकी सत्ता अखंड है। जिस प्रकार किसी राज्य में दो शासक नहीं हो सकते, उसी प्रकार पूरी सृष्टि में एक ही शासक की सत्ता संभव है। यदि किसी भी स्थान पर एक साथ दो आदेश चलाए जाएंगे तो व्यवस्था सुचारू रूप से नहीं चल सकती। क़ुरआन में है—
  • ‘‘अगर आसमान और ज़मीन में एक अल्लाह के सिवा दूसरे पूज्य होते तो (ज़मीन और आसमान) दोनों की व्यवस्था बिगड़ जाती।’’  (21:22)
    अल्लाह संपूर्ण जगत का स्रष्टा है। वह किसी के द्वारा स्रष्ट नहीं कि उसमंज स्रष्ट प्राणियों की भांति कमज़ोरियां पायी जाती हों। क़ुरआन में है—
  • ‘‘अल्लाह सबसे निरपेक्ष है और सब उसके मुहताज हैं, न उसकी कोई सन्तान है और न वह किसी की सन्तान है। और कोई उसका समकक्ष नहीं है।’’  (112:2-4)
    सारी सृष्टि अल्लाह की आज्ञाकारी है—‘‘क्या तुम देखते नहीं हो कि अल्लाह के आगे सजदे में हैं वे सब जो आसमानों में हैं और जो धरती में हैं, सूरज, चांद और तारे और पहाड़ और पेड़ और जानवर और बहुत-से इन्सान और बहुत से वे लोग जो अज़ाब के अधिकारी हो चुके हैं?’’  (22:18)
    अल्लाह ने किसी को न बेटा-बेटी बनाया और न ही अन्य किसी को साझीदार ठहराया। क़ुरआन की निम्नलिखित आयतें इन मिथ्यापूर्ण बातों का पूर्णतः खंडन करती हैं—
  • ‘‘उनका कहना है कि अल्लाह ने किसी को बेटा बनाया। अल्लाह पाक है इन बातों से। वास्तविक तथ्य यह है कि धरती और आकाशों में पायी जानेवाली सभी चीज़ों का वह मालिक है। सबके सब उसके आज्ञाकारी हैं।’’  (2:116)
  • ‘‘अल्लाह ने किसी को अपनी संतान नहीं बनाया है, और कोई दूसरा ख़ुदा उसके साथ नहीं है। अगर ऐसा होता तो हर ख़ुदा अपनी सृष्टि को लेकर अलग हो जाता और फिर वे एक-दूसरे पर चढ़ दौड़ते। पाक है अल्लाह उन बातों से जो ये लोग बनाते हैं। खुले और छिपे केा जाननेवाला, वह उच्चतर है उस शिर्क से जो ये ठहरा रहे हैं।’’  (23:91,92)
  • ‘‘लोगों ने जिन्नों को अल्लाह का साझीदार ठहरा दिया, हालांकि वह उनका पैदा करनेवाला है और उन्होंने जाने-बूझे उसके लिए बेटे और बेटियां रच दी। हालांकि वह पाक और उच्च है उन बातों से जो ये लोग कहते हैं। वह तो आकाशों और धरती का आविष्कारक है उसका कोई बेटा कैसे हो सकता है जबकि उसका कोई जीवन साथी ही नहीं है। उसने हर चीज़ को पैदा किया है और उसे हर चीज़ का ज्ञान है।’’                (6:100,101)
  • ‘‘उसके साथ किसी को साझीदार न बनाओ।’’  (6:151)
शिर्क (अनेकेश्वरवाद)
‘शिर्क’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है—शरीक करना या साझी ठहराना, अर्थात् अल्लाह के साथ किसी अन्य को शरीक करना या उसका साझी ठहराना। ईश्वर की सत्ता और उसके गुणों व अधिकारों में किसी को सम्मिलित करना या उसका साझी ठहराना शिर्क है। मानव की मूल प्रकृति इसके विरुद्ध है। पवित्र क़ुरआन में इसकी निंदा की गयी है और इससे जनसामान्य को बचने का आदेश दिया गया है।
अल्लाह शिर्क को कदापि क्षमा नहीं करता। क़ुरआन में है—
  • ‘‘अल्लाह बस शिर्क (साझीदार बनाने) ही को माफ़ नहीं करता, इसके सिवा दूसरे जितने भी गुनाह हैं वह जिसके लिए चाहता है माफ़ कर देता है।’’  (4:48)
  • ‘‘ये लोग अल्लाह के सिवा उनको पूज रहे हैं, जो इनको न हानि पहुंचा सकते हैं न लाभ और कहते हैं कि ये अल्लाह के यहां हमारे सिफ़ारिशी हैं—पाक है वह और उच्च है उस शिर्क से जो ये लोग करते हैं।’’  (10:18)
  • ‘‘इन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर अपने कुछ ख़ुदा बना रखे हैं कि वे इनके पृष्ठपोषक होंगे। कोई पृष्ठपोषक न होगा। वे सब इनकी उपासना का इन्कार करेंगे और उल्टे इनके विरोधी बन जाएंगे।’’  (19:81,82)
  • ‘‘ख़ूब सुन लो, वास्तव में ये लोग अपनी मनगढ़ंत कहते हैं कि अल्लाह संतान रखता है और वास्तव में ये लोग झूठे हैं।’’ (37:151,152)
  • ‘‘(ऐ नबी) इनसे कहो, फिर क्या ऐ अज्ञानियों तुम अल्लाह के सिवा किसी और की बन्दगी मुझसे करने के लिए कहते हो? (यह बात तुम्हें उनसे साफ़ कह देनी चाहिए क्योंकि) तुम्हारी ओर और तुमसे पहले गुज़रे हुए सारे नबियों की ओर यह प्रकाशना भेजी जा चुकी है कि अगर तुमने शिर्क किया तो तुम्हारा सारा कर्म व्यर्थ हो जाएगा और तुम घाटे में रहोगे। अतः तुम बस अल्लाह ही की बन्दगी करो और कृतज्ञ बन्दों में से हो जाओ।’’  (39:64,65)
  • ‘‘तुम स्पष्ट रूप से कह दो कि ‘‘मुझे तो सिर्फ़ अल्लाह की बन्दगी का आदेश दिया गया है और इससे रोका गया है कि किसी को उसका साझीदार ठहराऊं, अतः मैं उसी की ओर बुलाता हूं और उसी की ओर मेरा रुजू (पलटना) है।’’ (13:36)
    ‘‘जिसने ताग़ूत का इन्कार करके अल्लाह को माना उसने एक ऐसा मज़बूत सहारा थाम लिया जो कभी टूटनेवाला नहीं।’’ (2:256)
    शिर्क करनेवाला अर्थात् अनेकेश्वरवादी/बहुदेववादी व्यक्ति आश्रयहीन, बेसहारा और दुर्दशाग्रस्त हो जाता है। उसकी हालत ऐसी हो जाती है मानो वह आकाश से गिर पड़ा हो और बुरी तरह धूल-धूसरित हो गया हो। क़ुरआन में है—
  • ‘‘एकाग्रचित होकर अल्लाह के बन्दे बनो, उसके साथ किसी को साझी न ठहराओ। और जो कोई अल्लाह के साथ साझी ठहराए तो मानो वह आसमान से गिर गया, अब तो उसे पक्षी उचक ले जाएंगे या हवा उसको ऐसे स्थान पर ले जाकर फेंक देगी जहां उसके चीथड़े उड़ जाएंगे।’’  (22:31)
  • ‘‘वही एक आसमान में भी ईश्वर है और ज़मीन में भी ईश्वर, और वही तत्वदर्शी और सर्वज्ञ है। बहुत उच्च और सर्वोपरि है वह जिसके अधिकार में ज़मीन और आसमानों और हर उस चीज़ की बादशाही है जो ज़मीन और आसमानों के बीच पायी जाती है। और वही क़ियामत की घड़ी का ज्ञान रखता है, और उसी की ओर तुम सब पलटाये जानेवाले हो। उनको छोड़कर ये लोग जिन्हें पुकार रहे हैं उन्हें किसी सिफ़ारिश का अधिकार प्राप्त नहीं, सिवाय इसके कि कोई ज्ञान के आधार पर हक़ की गवाही दे। और अगर तुम इनसे पूछो कि इन्हें किसने पैदा किया है, तो ये ख़ुद कहेंगे कि अल्लाह ने। फिर कहां ये धोखा खा रहे हैं।’’  (43:84-87)
हिन्दू धर्म में एकेश्वरवाद
वेद हिन्दू धर्म का आधार हैं। इन्हें ईश्वरीय ग्रंथ कहा जाता है। अतएव ईश्वर के वास्तविक स्वरूप और उसकी सत्ता को जानने का एक माध्यम वेद हो सकते हैं। इनमें ईश्वर के एक होने अर्थात् एकेश्वरवाद की बात बहुत खुलकर आयी है। इनमें अनेकेश्वरवाद/बहुदेववाद नहीं पाया जाता। ऋग्वेद (1-164-46), अथर्ववेद (9-10-28), ऋग्विधा॰ (1-25-7), बृहद्देवता (4-42) और निरुक्त (7-18, 14-1) नामक पुस्तकों में आया है—
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः सुपर्णो गरुत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः।।
पं॰ दामोदर सातवलेकर ने इस मंत्र का अनुवाद इन शब्दों में किया है—
‘‘एक ही सत् स्वरूप परमात्मा को अनेक प्रकार से बोलते हैं। इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, दिव्य, सुपर्ण, गरुत्मान्, सत्, सम, मातरिश्वा आदि नामों से एक ही परमात्मा का वर्णन करते हैं।’’ (‘‘यजुर्वेद का सुबोध भाष्य’’, पृ॰ 530)
इस मंत्र से मिलता-जुलता मंत्र यजुर्वेद (32-1) में भी आया है।
पं॰ सातवलेकर इस मंत्र के संबंध में लिखते हैं—‘‘जिस प्रकार एक ही पुरुष को पिता, भाई आदि गुणबोधक अनेक शब्द प्रयुक्त होते हैं, तथापि इन अनेक शब्दों से उस एक ही व्यक्ति का बोध होता है, उसी प्रकार अग्नि, वायु आदि अनेक गुण-बोधक शब्दों से एक ही परमात्मा का बोध होता है। इसलिए भिन्न नामों के भ्रम से अनेक-देवतावाद में फंसना किसी को भी उचित नहीं।’’ (‘‘यजुर्वेद का सुबोध भाष्य’’, पृ॰ 530)
सारी सृष्टि का एक ही ईश्वर है और वही पूजनीय व वंदनीय है। ऋग्वेद में है—
  • य एक इत्। तमुष्टिहि।  (6-45-16)
    अर्थात्, वह एक ही है। उसी को पूजो।
  • मा चिदन्यद् विशंसत। (8-1-1)
    अर्थात्, किसी दूसरे को मत पूजो।
    (उक्त दोनों मंत्रांशों के अनुवाद पं॰ गंगा प्रसाद उपाध्याय ने किये हैं।
                     —‘इस्लाम के दीपक’, पृ॰ 402, 385, अमर स्वामी प्रकाशन विभाग, ग़ाज़ियाबाद, उ॰प्र॰)
  • पतिर्बभृथासमो जनानामेको विश्वस्य भुवनस्यराजा। (ऋग्वेद 6-36-4)
अर्थात्, संसार का स्वामी जिसके समान और नहीं, वह (एक) सहायरहित प्रकाशमान राजा है।
(स्वामी दयानंद सरस्वती, ऋग्वेद भाष्य, पृ॰ 498)
  • भुवनस्य पस्यपतिरेभ एव
नमस्यो विक्ष्वीड्यः। (अथर्ववेद, 2-2-1)
अर्थात्, सब ब्रह्माण्ड का एक ही स्वामी, नमस्कार योग्य और स्तुति योग्य है। (पं॰ क्षेमकरण दास त्रिवेदी)
अथर्ववेद (2-2-2) में है—
  • एक एव नमस्यः सुशेवाः।
अर्थात्, वह एक ही है, जो नमस्कार और पूजा के योग्य है।
(पं॰ गंगा प्रसाद उपाध्याय, ‘इस्लाम के दीपक’, पृ॰ 386)
ईश्वर शरीर धरण नहीं करता। यजुर्वेद (40-8) में है—
  • स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर शुद्धमपापविद्धम्।
    कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽ
    अर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः।।
श्री नारायण स्वामी ने इस मंत्र का अनुवाद इस प्रकार किया है—
‘‘वह (ईश्वर) सर्वत्र व्यापक, जगदुत्पादक, शरीर-रहित, शारीरिक विकार-रहित, नाड़ी और नस के बंधन से रहित, पवित्र, पाप से रहित, सूक्ष्मदर्शी, मननशील, सर्वोपरि, वर्तमान, स्वयंसिद्ध, अनादि प्रजा (जीव) के लिए ठीक-ठीक कर्मफल का विधान करता है।’’  (‘‘वेद रहस्य’’, पृ॰ 94, वैदिक पुस्तकालय, वाराणसी, 1972)
डॉ॰ पं॰ श्रीपाद दामोदर सातवलेकर ने इसका अनुवाद इस प्रकार किया है—‘‘वह (ईश्वर) सर्वत्र गया हुआ है। वह देहरहित, स्नायुरहित है। वह व्रणरहित है। वह पवित्र और वीर्यवान है। वह पाप से विद्व (बिंधा) हुआ नहीं है। वह मन का स्वामी है, विचारशील है। वह सबसे श्रेष्ठ व विजयी है। वह अपनी शक्ति से स्थित है। करने योग्य कार्य वह करता रहता है।’’ (‘यजुर्वेद का सुबोध भाष्य’, पृ॰ 647)
अथर्ववेद (13-4-16 से 18, 20, 21) में उसकी अविभाज्यता का स्पष्ट शब्दों में उल्लेख आया है—
  • न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते ।।16।।
    न पंचमो न षष्ठः सप्तमो नाप्युच्यते ।।17।।
    नाष्टमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते ।।18।।
    तमिदं निगतं सहः स एष एक एकवृदेक एव ।।20।।
    सर्वे अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति ।।21।।
दयानन्द सरस्वती जी इन मंत्रों का भावार्थ व्यक्त करते हुए लिखते हैं—
‘‘इन सब मंत्रों से यह निश्चय होता है कि परमात्मा एक ही है, उससे भिन्न कोई न दूसरा, न तीसरा, न कोई चैथा परमेश्वर है। (16) न पांचवां, न छठा, और न कोई सातवां ईश्वर है। (17) न आठवां, न नौवां, और न कोई दसवां ईश्वर है। (18) किन्तु वह सदा एक अद्वितीय ही है। उससे भिन्न दूसरा कोई भी नहीं। ...वह अपने काम में किसी की सहायता नहीं लेता, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है। (20) उसी परमात्मा की सामर्थ्य में वसु आदि सब देव अर्थात् पृथ्वी आदि लोक ठहर रहे हैं और प्रलय में भी उसकी सामर्थ्य में लय होकर उसी के बने रहते हैं। (21)  (‘‘दयानन्द ग्रंथ-माला’’, (द्वितीय खंड), पृ॰ 337,338)
इसी से मिलता-जुलता अनुवाद पं॰ क्षेमकरण दास त्रिवेदी और पं॰ सातवलेकर ने किया है। अलबत्ता इन मंत्रों की क्रम संख्या में समानता नहीं है।
ईश्वर के एकत्व की बात ऋग्वेद (1-164-6, 3-54,8, 8-58-2, 10-82-3, 10-82-6, 10-82-7, 10-129-2 और 10-129-3), अथर्ववेद (10-2-23, 10-7-21, 10-8-6, 10-8-11, 10-8-28 और 10-8-29) के अतिरिक्त यजुर्वेद (32-8, 32-9, 40-4, 40-5) में भी आयी है।
(‘‘विश्व ज्योति’’, वेद अंक, पृ॰ 164 से 169, डॉ॰ विश्व बंधु के आलेख से उद्धृत, होशियारपुर जून-जुलाई 1972)
इन मंत्रों में ईश्वर के एक होने, उसी के पूर्व सामर्थ्यवान होने और उसकी तत्वदर्शिता का बहुत ही खुलकर उल्लेख हुआ है। डॉ॰ पी॰वी॰ काणे के अनुसार ऋग्वेद के 8-58-1 और 10-129-2 मंत्रों में भी ईश्वर के एक होने का वर्णन है। डॉ॰ काणे महाभारत और कुछ पुराणों के अतिरिक्त कुमार संभव (7-44) में भी एकेश्वरवाद की धरणा के पाए जाने की बात कहते हैं और निम्नलिखित हवाले पेश करते हैं—
वन पर्व (39-76, 77), शांति पर्व (343-131), ब्रह्म पुराण (192-51), विष्णु पुराण (5-18-50) और हरिवंश (विष्णु पुराण 25-31)।
(‘‘धर्मशास्त्र का इतिहास’’, (पंचम भाग), पृ॰ 393)
एक ईश्वर ही के होने का तथ्य इन मंत्रों में भी पाया जाता है: ऋग्वेद (10-12-3, और (10-12-11), यजुर्वेद (13-4, 23-1 और 23-3)। इनके अतिरिक्त वेदों में और भी मंत्र मिलते हैं, जो एकेश्वरवाद की धारणा का प्रतिपादन करते हैं। अतः वेदों में बहुदेववाद की धरणा नहीं पायी जाती। इस सत्य के विपरीत किसी प्रकार के प्रयास को अनुचित ही कहा जाएगा।
ईश्वर वास्तविक सम्राट है, किन्तु उसकी कोई प्रतिमा (मूर्ति) नहीं है। वह सम्राट है (इन्द्रश्च सम्राड्, यजुर्वेद 8-37), वह चल-अचल का राजा है (इन्द्रो पातोडवसितस्य राजा, यजुर्वेद, 36-8), उससे श्रेष्ठ कोई नहीं (यस्मान्नान्यत्परमस्ति भूतम्, यजु॰ 32-6), इसकी कोई प्रतिमा नहीं (न तस्य प्रतिमाडअस्ति, यजु॰, 32-3)। 
(‘‘यजुर्वेद का सुबोध भाष्य’’, पृ॰ 551)
गुणों का उल्लेख इस प्रकार किया है—वह पोषक है (पूषा) वह एक ज्ञानी है (एक ऋषिः) वह नियायक है (यमः) वह प्रकाशक है (सूर्यः) वह पालक शक्ति से युक्त है (प्रजापत्य: 40-16) वह उत्तम मार्ग से ऐश्वर्य की ओर ले जाता है (सुपथारपेनयरति), वह सब कर्मों को जानता है (विश्वानिवयुनानि विद्वान) वह कुटिलता और पाप से युद्ध करता है (जुहुराणां एनः युध्यते: 40-18)।  
(‘‘यजुर्वेद का सुबोध भाष्य’’, पृ॰ 648)
ऋग्वेद (1-4-1 से 5) में है—
  • सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे।
    जुहूमसि द्यविद्यवि।1।।
    उप नः सवनागहि सोमस्य सोमपाः पिब।
    गोदा इद्रेवतो मदः।2।।
    अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम।
    मा नो अतिख्या आगहि।3।।
    परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रं पृच्छा विपश्चितम्।
    यस्ते सखिभ्य आ वरम्।4।।
    उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत।
    दधना इन्द्र इददुवः।5।।
पं॰ दुर्गाशंकर सत्यार्थी ने इन मंत्रों का अनुवाद इस प्रकार किया है—
‘‘सुन्दर रूपों वाली मूर्ति बनाकर, गाय दुहकर (अपनी समझ में) और द्यवि द्यवि अर्थात् दिवि दिवि अर्थात् संपूर्ण पृथ्वी में ये उन मूर्तियों की उपासना करते हैं। (1) ये हमारे सब (मार्गों का) परित्याग कर चन्द्रमा की महत्ता (अर्थात् चन्द्रमा को देखते हुए भी हमारी शक्ति) भूलकर शराब पीते हैं। (अर्थात् मूर्तिपूजक ईश्वर की शक्ति एवं सामर्थ्य का विस्मरण कर मूर्तिपूजा में चूर रहते हैं) ये नशे की गोद में दुराचारियों के समान सो गए हैं। (2) वे अन्तिम दिन का विस्मरण कर विधा एवं बुद्धि का तिरस्कार कर हमारी निश्चित की हुई सीमा को पकड़ रहे हैं। (3) अपनी विस्तृत इन्द्रियों से परे ये विपत्तियों का ठिकाना पूछते हैं। जो ऐसे साथियों के लिए परम अर्थात् श्रेष्ठ हैं (हम उन्हें विपत्तियां ही देंगे) (4) और ये हमारी निन्दा करते हैं। तुम जो कि अपनी इन्द्रियों को वश में करनेवाले हो, हमारा स्तवन करो। और विधर्मियों को इस देश से दूर भाग जाने को कहो अर्थात् उन्हें देश से निकाल दो, वे पवित्र आर्यावर्त में रहने योग्य नहीं हैं। (5)
(मधुर उपहार, पृ॰ 128, 129, मर्कज़ी मक्तबा इस्लामी)
यजुर्वेद में भी कई ऐसे मंत्र हैं, जिनके द्वारा एक ईश्वर की भक्ति पर बल दिया गया है। उसे छोड़कर अन्य की भक्ति करने वाले को चेतावनी दी गयी है। कुछ मंत्रों पर दृष्टिपात कीजिए—
  • ईशा वास्यमिदम् सर्व यत्किं च जगत्यां जगत।
    तेन त्यक्त्तेन भुत्र्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्वनम्।।
    (यजुर्वेद, 40:1)
स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने इस मंत्र का निम्नलिखित शब्दों में अनुवाद किया है—‘‘हे मनुष्य! जो कुछ इस संसार में जगत् है उस सब में व्याप्त होकर जो नियंता है वह ईश्वर कहाता है। उससे डरकर तू अन्याय से किसी के धन की आकांक्षा मत कर। उस अन्याय के त्याग और न्यायाचरणरूप धर्म से अपने आत्मा से आनन्द को भोग। (सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास: 7)
इसी वेद में है—
  • अन्धन्तमः प्रविशन्ति येडसंभूतिमुपासते।
    ततो भूयडइव ते तमो यडउसम्भूत्याम् रताः।। (यजुर्वेद, 40:9)
भावार्थ—‘‘जो ‘असंभूति’ अर्थात् अनुत्पन्न अनादि प्रकृति कारण की ब्रह्म के स्थान में उपासना करते हैं वे अंधकार अर्थात् अज्ञान और दुःख सागर में डूबते हैं। और संभूति जो कारण से उत्पन्न हुए कार्य रूप पृथ्वी आदि भूत, पाषाण और वृक्षादि अवयव और मनुष्यादि के शरीर की उपासना ब्रह्म के स्थान पर करते हैं, वे उस अंधकार से भी अधिक अंधकार अर्थात् महामुर्ख चिरकाल घोर दुःख, नरक में गिरके महाक्लेश भोगते हैं।’’ (सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास: 11)
गीता में एकेश्वरवाद
श्रीमद् भगवद् गीता में है—
  • अंतवन्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
    देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि।।
    अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्वयः।
    परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।।
    नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।
    मूढोडयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्।।
    (अध्याय, 7:23-25)
अर्थात् जो मेरे अतिरिक्त किसी और को पूजते हैं, वे उसी को प्राप्त होते हैं। (अर्थात् पत्थर, नदी, पहाड़ों को पूजनेवालों को पत्थर, नदियां और पहाड़ों की ही प्राप्ति होती है) किन्तु मुझे पूजनेवाले मुझ तक पहुंच जाते हैं। ऐसा होने पर भी सब मनुष्य मुझे नहीं पूजते (इसका कारण यह है कि बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अर्थात् जिससे उत्पन्न कुछ भी नहीं ऐसे अविनाशी परमभाव को तत्व से न जानते हुए मन इन्द्रियों से घिरे मुझको मनुष्यों की भांति मानते हैं। मैं उनके सामने प्रत्यक्ष नहीं होता हूं। इसलिए अज्ञानी मनुष्य मुझ जन्मरहित अविनाशी परमात्मा को तत्व से नहीं जानते हैं और मुझे जन्म लेने तथा मरनेवाला समझते हैं।’’           
(अनुवाद: दुर्गाशंकर सत्यार्थी, मधुर उपहार, पृ॰ 123, मर्कज़ी मक्तबा इस्लामी)
एक अन्य श्लोक में ईश्वर को अजन्मा बताया गया है। श्लोक निम्नलिखित है—
  • नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।
    मूढोडयं नभिजानाति लोको मामजमव्ययम्।। (7:25)
श्री जयदयाल गोयन्दका ने इस श्लोक का अनुवाद इस प्रकार किया है—
‘‘अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिए यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता अर्थात् मुझको जन्मने-मरनेवाला समझता है।’’ (‘‘गीता तत्व-विवेचनी’’, पृ॰ 323)
उपनिषदों में एकेश्वरवाद
उपनिषदों में भी एकेश्वरवाद की धारणा पायी जाती है। कुछ उपनिषद तो वेद मंत्र ही हैं, जैसे शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा और काण्व शाखा की संहिताओं के अन्तिम अध्याय को ईशोपनिषद या ईशावास्योपनिषद (माध्यन्दिन) और ईशोपनिषद या ईशावास्योपनिषद (काण्वीय) कहा जाता है। इसी प्रकार के कुछ और उपनिषद हैं। श्वेताश्वेतरोपनिषद (3-1,2) में एकेश्वरवाद को इस प्रकार निरूपित किया गया है—
  • य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वांल्लोकनीशत ईशनीभिः।
    य एवैक उद्भवे संभवे च य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति।।1।।
    एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमांल्लोकानीशत ईशनीभिः।
    प्रत्यडनांस्तिष्ठति संचुकोपान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा।।2।।
पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य ने इन श्लोकों का निम्नलिखित शब्दों में अनुवाद किया है—
‘‘विश्वरूप जाल का स्वामी अपनी प्रभु-सत्ता द्वारा संसार पर प्रभुत्व रखता है। वह सब लोकों का नियामक अकेला ही सृष्टि रचना करने और उसे विस्तृत करने में समर्थ है। उसे जो ज्ञानीजन जान लेते हैं, वे अमृत्व को प्राप्त होते हैं। जो अपनी शक्तियों से सब लोकों पर प्रभुत्व रखता है वह रुद्र एक ही है, इसलिए अन्य का आश्रय ज्ञानियों ने नहीं लिया। वह सभी देहधारियों में स्थित होकर लोक रचना करता हुआ सबकी रक्षा करता है और सृष्टि के लय काल (प्रलय) में सबको अपने भीतर समेट लेता है।
(‘‘108 उपनिषद’’, (ज्ञान खंड), पृ॰ 302,303, संस्कृति संस्थान, बरेली, संशोधित संस्करण: 1990)
एक ही ईश्वर के अनेक नाम हैं। कैवल्योपनिषद (8) में आया है—
  • स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोडक्षरः परमः स्वराट्।
    स एव विष्णुः स प्राणः स कालोडग्निः स चन्द्रमाः।।8।।
डॉ॰ रणजीत सिंह शास्त्री ने इसका अनुवाद इस प्रकार किया है—
‘‘यह ईश्वर ही ब्रह्मा है, वही विष्णु है, वही रुद्र है, वही शिव है, वही अक्षर है, वही स्वराट् है, वही इन्द्र है, वही कालाग्नि है और वही चन्द्रमा है।
(‘‘ईश्वर की सत्ता और उसका स्वरूप’’, पृ॰ 28, 29,
मधुर प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण: 1992)
ईश्वर एक है, वह अद्वितीय है (एकमेवाद्वितीयम्-छान्दोग्योपनिषद, 6-2-1)। उससे श्रेष्ठ कोई नहीं (श्वेताश्वतरोपनिषद, 3-9)। उसके अनेक रूप नहीं। उसे जो अनेक रसों में मानते हैं, उनको सावधान करते हुए कठोपनिषद (द्वितीय अध्याय, प्रथम बल्ली) में कहा गया है—
  • ‘‘यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह।
    मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ।।10।।
    मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन।
    मृत्योः स मृत्यु गच्छति य इह नानेव पश्यति।।11।।
पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य के शब्दों में इन श्लोकों का अनुवाद इस प्रकार है—
‘‘जो मनुष्य इहलोक (संसार) में परमेश्वर को अनेक रूपों वाला देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है...यह सत्य मन के द्वारा ही प्राप्त हो सकता है। इस लोक में अनेकत्व किंचित नहीं है। जो मनुष्य अनेकत्व देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है।’’ (‘‘108 उपनिषद’’, (ज्ञान खंड), पृ॰ 46, 47)
यजुर्वेद (40-9) में भी इसकी ओर संकेत है—
‘‘जो लोग परमेश्वर को छोड़कर अन्य की उपासना करते हैं, वे अज्ञान-अंधकार में प्रविष्ट होते हैं और जो व्यसनों में रत हैं, वे और भी अधिक अंधकार में पड़े हैं।’’     
(अनुवाद: राज बहादुर पाण्डेय, ‘‘यजुर्वेद’’,
                                   (संक्षिप्त), पृ॰ 159, डायमंड पाकेट बुक्स)
ईश्वर के वास्तविक स्वरूप, उसके गौरव और प्रताप के विषय में वेदों, उपनिषदों और श्रीमद् भगवद्गीता में जो चीज़ें मिलती हैं, उनमें से मात्र कुछ को ही उपर्युक्त विवरणों में प्रस्तुत किया गया है।
अतएव हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ईश्वर एक है, अकेला है, अद्वितीय और अविनाशी है। उसका कोई साक्षी नहीं। उसके अनेक नाम हैं, किन्तु उसका कोई रूप नहीं। उसका न तो कोई शरीर है और न ही वह शरीर ग्रहण करता है। वह सारे ब्रह्माण्ड का स्वामी है, नियामक है, पालनकर्ता, स्रष्टा और संहारक भी है। वह प्रत्येक कार्य करने में समर्थ और सबसे अधिक शक्तिशाली है। वही संपूर्ण जगत का सम्राट है। उस जैसा कोई नहीं।
कपोल-कल्पित अवधारणा के दुष्परिणाम
ईश्वर के इन और अन्य गुणों एवं विशेषताओं के विरुद्ध जो बातें कही जातीं हैं उनकी हैसियत बस इतनी है कि वे वास्तविकता से परे और कल्पना पर आधारित हैं। शाश्वत सत्य अपने आप में सत्य होता है। उसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है।
अगर हम किसी प्रमाण की भी बात करें तो पूरी सृष्टि में जिधर भी नज़र डालें एक मात्र ईश्वर की धारणा के प्रमाण ही प्रमाण नज़र आएंगे। पूरा ब्रह्माण्ड और समग्र सृष्टि कितनी सुव्यवस्थित, क्रमबद्ध और संतुलित है, हम सहज ही समझ व देख सकते है। इसकी नियमितता और विधेयात्मकता आश्चर्यचकित करनेवाली है। इसमें ज़रा भी स्वच्छंदता और प्रतिफलित होनेवाले परिवर्तन नहीं हैं। अतः हम देखते हैं कि अल्लाह द्वारा सभी स्रष्ट चीज़ों में तत्वदर्शिता, बुद्धिमत्ता, पूर्णता, सौंदर्य, उपयोगिता और नैतिक प्रयोजन सब कुछ विद्यमान है। सूर्य और चन्द्रमा की गतियों का भी यही हाल है। यदि ईश्वर अनेक हो जाए, तो प्रत्येक की अपनी-अपनी प्रभुसत्ता और महत्वाकांक्षा के अनुकूल सृष्टि में अव्यवस्था उत्पन्न कर दे और वह छिन्न-भिन्न होकर रह जाए।
तार्किक और बौद्धिक सभी दृष्टियों से यदि हम विचार करते हैं, तो हम इस वास्तविकता और सच्चाई को स्वमेव पा जाते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व है, वह एक है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के पास सर्वाधिकार है, वह सर्वशक्ति-सम्पन्न है। उसका और उसकी सत्ता का इन्कार वास्तव में ईश्वर की महानता और शान में धृष्टता है।
एक ही ईश्वर को न मानना और उसका साझी ठहराना सर्वशक्ति-सम्पन्न ईश्वर का अपमान और अनादर है। यह केवल मनुष्य की ईश्वर के प्रति धृष्टता ही नहीं, एक गंभीर विश्वासघात भी है। स्पष्ट है, जब मनुष्य उस सृजनकार-सत्ता के साथ विश्वासघात करेगा, जिसने उसे पैदा किया है, तो यह अपराध कितना गंभीर हो जाएगा इस तथ्य को सहज ही समझा जा सकता है। यह विश्वासघात चरित्र पर आघात करेगा और जीवन में भांति-भांति के विकार पैदा कर देगा। एकेश्वरवाद वह मज़बूत आश्रय है, जिससे वंचित होकर एवं ईश्वर से अपने नैसर्गिक व मधुरिम संबंध का विच्छेद करके मनुष्य भ्रम, संशय और दुर्बलता की स्थिति में आकर अपने जीवन को विभिन्न प्रकार के विकारों, व्याधियों और झंझावातों में डाल देता है। उसके जीवन में आशा, उत्साह, उमंग, साहस और कर्मठता, उत्तरदायित्व जैसे उत्तम गुण क्षीण हो जाते हैं और इनके विपरीत भाव जन्म लेकर बढ़ने लगते हैं, जो लौकिक 
जीवन को कष्टकर बनाते ही हैं, पारलौकिक जीवन को भी असफल बना देते हैं। 
तात्पर्य यह कि अनेकेश्वरवादी, बहुदेववादी व्यक्ति के व्यक्तित्व का वांछित विकास बाधित और खंडित हो जाता है। इस प्रकार वह मनुष्यत्व और पुरुषार्थ से अपना संबंध तोड़ डालता है, जो सही अर्थों में एक ईश्वर पर विश्वास के परिणामस्वरूप जीवन में उद्भूत और पैदा होते हैं। एकेश्वरवाद के बिना मानव जगत में वास्तविक 
भाईचारे व एकत्व की बुनियाद नहीं क़ायम की जा सकती है।यह भी मनुष्य पर ईश्वर का महान उपकार है कि उसने अपने अतिरिक्त अन्य के समक्ष उसका सिर झुकने से बचा लिया। इस प्रकार उसके आत्मसम्मान और उसकी गरिमा को सुरक्षित रखा और उसे अधमता व हीनता से बचा लिया।
अतः मनुष्य का परम कर्तव्य है कि वह मात्र ‘एक ईश्वर’ की भक्ति और बन्दगी 
करे जो सर्वशक्तिमान, निराकार, न्यायकारी, क्षमाशील, दयावान, अजन्मा, अनुपम, 
अजर, अमर, निर्विकार, अनन्त, सर्वाधार , सर्वव्यापक, सर्वसत्ताधरी, सर्वान्तरयामी, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। क़ुरआन में है—
‘‘अल्लाह वह जीवन्त शाश्वत सत्ता है, जो सम्पूर्ण जगत को संभाले हुए है, उसके सिवा कोई प्रभु, पूज्य नहीं है। वह न सोता है और न उसे ऊंघ लगती है। ज़मीन और आसमानों में जो कुछ है, उसी का है। कौन है जो उसके सामने उसकी अनुमति के बिना सिफारिश कर सके? जो कुछ बन्दों के सामने है उसे भी वह जानता है और उसके ज्ञान में से कोई चीज़ उनके ज्ञान की पकड़ में नहीं आ सकती यह और बात है कि किसी चीज़ का ज्ञान वह ख़ुद ही उनको देना चाहे। उसका राज्य आसमानों 
और ज़मीन पर छाया हुआ है और उसकी देखरेख उसके लिए कोई थका देनेवाला 
काम नहीं है। बस वही एक महान और सर्वोपरि सत्ता है।’’ (क़ुरआन, 2:255)
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

May 9, 2013

ये भारत देश है मेरा !


ये भारत देश है मेरा !

तो क्या भ्रष्टाचारी को फांसी न हो ? !
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हमारा देश कई मायने में विचित्र है . यहाँ बड़े विरोधाभास भी हैं . कहीं - कहीं तो हौच - पौच का आलम है . इस देश के साथ सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि यहां राष्ट्रघात या देशद्रोह पारिभाषित नहीं है, लेकिन सजा मिलती जा रही है . देशद्रोह की जो परिभाषा अंग्रेज़ों ने गढ़ी था, आज़ाद भारत  ने उसको ओढ़ लिया . हमारे यहाँ फांसी तक हो भी  रही है और कुछ के लिए फांसी की सज़ा मांगी भी जा रही है .  कसाब ,अफजल को फांसी के बाद अब भुल्लर को फांसी आसन्न है . यह विचित्र बात है कि हत्या करने वाले को फांसी हो, देशद्रोही को फांसी हो, आतंकवादी को फांसी हो,बलात्कारी को फांसी हो, लेकिन भ्रष्टाचारी को फांसी न हो। खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वाले को फांसी न हो , नक़ली दवाओं के कारोबारियों को फांसी न हो , जो इन्सान को इन्सान से लड़ाए उसे फांसी न हो , जो दंगा करवाए और बेक़सूर लोगों की जान ले , उसे फांसी पर न लटकाया जाए , जो दूसरों के धर्मस्थलों को ध्वस्त करे उसे फांसी न हो , बल्कि सारे मामले ही रफा - दफ़ा कर दिए जाएं . एक ही प्रकार के मामले में दोहरा रवैया अपनाया जाए ... एक को क़ानून का पाठ पढ़ाया जाए और दूसरे को छोड़ दिया जाए या पकड़ा ही न जाए . 
 कहने का मतलब यह है कि जहां-जहां नेताओं-नौकरशाहों के स्वार्थ आड़े आएं , उनको निर्बाध  खेलने का मौका हो, वहां-वहां क्या फांसी या किसी सख्त सजा का कोई प्रावधान नहीं होना चाहिए?  

भ्रष्टाचार भारतीय नेताओं का पुराना शगल है , लेकिन इसमें सज़ा देने के मामले में भारत एकदम फिसड्डी रहा है . कुछ मामलों में कहना पड़ेगा कि ख़ासकर भ्रष्टाचारी  राजनेताओं को चुन - चुनकर बचाया जाता रहा . भ्रष्टाचार के खिलाफ़ मुहिम हर बार बेमानी साबित हुई है . अक्सर शिकायत रही है कि जो भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ने वाला है , जो साफ़ - सुथरी छवि का मालिक है , वही भ्रष्टाचार में गहरे तक लिप्त मिला है . टू जी , कोलगेट जैसे महा घोटालों में फंसी केंद्र सरकार भ्रष्टाचार के नये मामले में बुरी तरह फंस गयी है . उसके ऊपर भ्रष्टाचार का एक और संकट मंडरा रहा है . प्रधानमंत्री डॉ . मनमोहन सिंह के दाहिने हाथ और पाक - साफ़ समझे जानेवाले   
  रेल मंत्री पवन कुमार बंसल के दामन पर इस बार रिश्वत के छींटे पड़े हैं . सीबीआई ने उनके भांजे को 90 लाख रुपए की रिश्वत के साथ गिरफ्तार किया है . भाजपा ने इस मामले को तत्काल लपकते हुए रेल मंत्री से इस्तीफा मांगा है , लेकिन हमारे यहाँ कोई मंत्री जल्दी इस्तीफ़ा नहीं देता है .
मामला रेलवे बोर्ड के नवनियुक्त सदस्य स्टाफ महेश कुमार की नियुक्ति का है . सीबीआई ने इस मामले में रेल मंत्री पवन कुमार बंसल  के भांजे विजय सिंगला और महेश  कुमार को विगत चार मई  गिरफ्तार कर लिया . महेश कुमार पर आरोप है कि उन्होंने रेलवे बोर्ड में सदस्य स्टाफ बनने के लिए विजय सिंगला को 90 लाख रूपए की रिश्वत दी  . सीबीआई ने इस संबंध में चंडीगढ़ में छापा मार कर रिश्वत की राशि बरामद कर ली है .  बताया जाता है, कि सीबीआई दोनों के फोन लगातार टेप कर रही थी, इसी आधार पर इसका खुलासा हो सका . सीबीआई ने इसके बाद मुम्बई, दिल्ली, चंडीगढ़ और बेंगलुरू में कई जगह छापे मारे . सीबीआई ने महेश कुमार और दो अन्य के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया , लेकिन सवाल यह है कि यह घटना बिना रेलमंत्री की सहमति के संभव कैसे हो सकती है ? मगर रेलमंत्री को लगातार बचाया ही जा रहा है . महेश  कुमार ने तीन मई को  रेलवे बोर्ड में सदस्य स्टाफ का पदभार संभाला था। वह इससे पहले मुम्बई में पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक थे . बताया गया है कि उन्हें तीन महाप्रबंधकों की वरिष्ठता को नजरअंदाज करके पदोन्नत किया गया था। रेलवे बोर्ड में छह सदस्य होते हैं . सातवें सदस्य रेल मंत्री स्वयं होते हैं . आज राजनेताओं की अख्लाकी हालत बड़ी ख़राब है . एक ओर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जनचेतना जगाने की कोशिशें की जा रही हैं , दूसरी ओर इस पर रोक लगना तो दूर इसकी रफ़्तार को पंख लगे हुए हैं . अगर मौजूदा कुप्रवृत्ति पर प्रभावी रोक नहीं लगाई गयी , तो वह दिन दूर नहीं , जब नेताओं की कृपा से आतंकवादी जेलों से रिहा कर दिए जाएंगे, उन्हें नेता अपनी गोद में बिठाएंगे और वोट वसूलेंगे . यही उलटी खोपड़ी और भ्रष्टाचार वाली हालत रही,  तो  देश और समाज की ख़ातिर मर-मिटने का जज्बा रखने वाले क्रांतिकारी आतंकवादी बना दिए जाएंगे, फांसी पर वे लटकेंगे, जेलों में जिंदगी वे काटेंगे . क्या अब भ्रष्टाचारी और असली आतंकवादी को इस देश में कोई सजा नहीं मिलने वाली !क्या इसी भारत के लिए देश को आज़ादी मिली थी ?
आखिर वह सपनों का भारत कब सामने आएगा , जिसके लिए देशवासियों ने बेमिसाल कुर्बानियां दी थीं ? यह कहने में संकोच नहीं कि हमारा देश नैतिक और अख्लाकी गिरावट का ज़बरदस्त शिकार है . कोई क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है , जहाँ स्वस्थ मूल्य संचरित हों . भारतीय मीडिया का प्रभावशाली वर्ग भी एक तो ख़ुद भी ' पेड न्यूज़ ' के संगीन दौर से गुज़र रहा है , वहीं दूसरी ओर उसके द्वारा भी कुछ अच्छा करने की दूर - दूर तक आशा नहीं दिखाई पड़ती ! समाज का हर वर्ग अनवरत पतन का शिकार है . बड़े से छोटे तक सभी इसमें लिप्त हैं . देखा जाता है कि जन - जीवन के साथ खिलवाड़ करने एवं गंभीर अपराध करनेवाले अक्सर बच निकलते हैं . नक़ली दवाएं बनानेवाले , 
खाने - पीने की चीजों में मिलावट करनेवाले , नई नस्ल की नसों में जहर भरने वाले अपराधियों को कोई सजा नहीं होगी, क्योंकि वे नेताओं  की गोद में  जा बैठते हैं , और सुरक्षित , निरापद हो जाते हैं . अतः इसकी मांग जनता के बीच से उठनी चाहिए कि भ्रष्टाचारियों और मिलावटखोरों को भी राष्ट्रद्रोहियों और आतंकवादियों की श्रेणी में रखा जाए , और उन्हें भी फांसी या उम्रकैद की सजा मिले . वास्तविकता यह है कि भष्टाचार के प्रति हम गंभीर नहीं हैं और ' दुर्लभ ' रवैया रखते हैं ! दुर्लभ इसलिए भ्रष्टाचारी भी कहता है कि भ्रष्टाचार मत करो , यह जघन्य अपराध है . भ्रष्टाचार पर बहस में न्यूज़ चैनलों पर जो चेहरे दिखाई देते हैं, उनके बारे में पता करिए, सब एक से बढ़ कर एक भ्रष्ट हैं, लेकिन देखिए भ्रष्टाचार के खिलाफ कितने बड़े सत्यवादी  बन कर कैमरे के आगे बैठ जाते हैं . 19 नवम्बर 2005 को  उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में पेट्रोल में मिलावट करने वाले अपराधियों ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के युवा अधिकारी मंजूनाथन की हत्या कर दी थी . हत्यारे पकड़े भी गए . उनके दो अपराध साफ-साफ थे। एक मिलावटखोरी। दूसरा कत्ल। लेकिन मुख्य अभियुक्त [ सत्येन्द्र दुबे ] को फांसी की सजा नहीं दी गई, उसे सिर्फ़ उम्रकैद  की सजा मिली . 
आज चीन तरक्की की ओर क्यों अग्रसर है ? अन्य बातों के साथ उसकी सख्त सज़ा नीति का इसमें बड़ा हाथ है . वहां सज़ा में धांधली और मनमानापन नहीं है . वहां जिस प्रकार दंगाईयों पर दबिश की जाती है , उसी प्रकार अन्य अपराधों के प्रति भी रवैया अपनाया जाता जाता है . अभी कुछ अवधि पहले की बात है , चीन में मिलावट व भ्रष्टाचार के दोषी दो लोगों को फांसी की सज़ा   दी गई . इसी दोष में एक महिला मैनेजर को उम्रकैद की सजा दी गई थी . चीन में एक मिलावटखोर सिंडिकेट द्वारा करीब 600 टन नकली सूखा दूध बनाकर बेचा गया था . इस दूध के सेवन से छह बच्चों की मौत हो गई थी तथा कई बच्चे बीमार पड़ गए थे . मिलावटखोरों को फांसी के बाद पूरे चीन में ऐसा धंधा बंद हो गया था ,  लेकिन हमारे देश में मिलावट के कौन - कौन से धंधे नहीं होते ? मैं ज़हरीली शराब से मौतों का बात नहीं कर रहा हूँ , रोज़ाना हज़ारों लीटर दूध डिटर्जेंट और यूरिया से बन रहा है . खाने के हर सामान में खुलेआम मिलावट हो रही है .  तेल-घी मिलावटी मिल रहा है ,  मसाले मिलावटी हैं ,  सब्जियां-मांस-मछलियां सब घातक केमिकल के सहारे ताजा कर बेची जा रही हैं, खिलाई जा रही हैं . धंधेबाजों की चाँदी  है . नेताओं के पास खाने-पीने का शुद्ध माल पहुंच ही रहा है, फिर क्या चाहिए ? 7 जुलाई 2010 की बात है , प्रधानमंत्री डॉ . मनमोहन सिंह कानपुर के दौरे पर थे , उन्हें मिलावटी माफ़िया का सामना करना पड़ा . उन्हें अशुद्ध और मिलावटी खाना परोसा गया . प्रधानमंत्री ने शिकायत की , तो प्रशासन हरकत में आया और बयालीस लोगों के खिलाफ़ प्राथमिकी दर्ज की गयी , पर बाद में हुआ कुछ नहीं . ममला रिश्वत लेकर रफ़ा - दफ़ा कर दिया गया . अक्सर यह होता है कि सरकारी एजेंसियां छापे मारकर नक़ली खाद्य पदार्थ जब्त करती हैं , मामले दर्ज होते हैं , लेकिन बाद में सब बच निकलते हैं और मिलावट का धंधा बड़े आराम से चलता रहता है . न किसी को सज़ा मिलती है और न दूकान के लाइसेंस ज़ब्त होते हैं . भूल से कभी ज़ब्ती भी हो जाए , तो दूसरे नाम से धंधा चालु हो जाता है . पूरे देश की यही स्थिति है . प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण इस काले कारोबार को फलने - फूलने का भरपूर मौक़ा मिल रहा है . प्रिवेंशन आफ फूड अडल्टरेशन एक्ट 1954 के तहत मिलावट करनेवालों के लिए छह महीने से लेकर छह वर्ष तक की क़ैद का प्रावधान है . सिर्फ़ विशेष परिस्थिति में उम्रकैद की सज़ा भी दी जा सकती है . अरब देशों में जिन अपराधों के लिए फांसी की सज़ा अमलन मिलती है , वे अपराध नाममात्र के होते हैं . यही हालत चीन की है , लेकिन जहाँ तक आर्थिक अपराधों की बात है , भारत एक भष्टाचारी देश के तौर पर उभरता जा रहा है ! इस स्थिति में क्या हमारे देश की जनता वह दिन देख पाएगी , जब  भ्रष्टाचारियों और मिलावटखोरों को फांसी पर लटकाया जाएगा  ? शायद वह दिन कभी आ भी जाए , क्योंकि जनचेतना के आगे बड़ी से बड़ी अधिनायकवादी सरकारों को समर्पण करना पड़ता है . हमारे देश में आर्थिक अपराधों के लिए कानून में मृत्युदंड का प्रावधान करना चाहिए . चीन में आर्थिक अपराध के तहत 68 विभिन्न अपराध पारिभाषित हैं , जिनमें सीधे मृत्युदंड का प्रावधान है . इनमें रिश्वत लेना, वित्तीय अनियमितताएं करना, व्यापारियों द्वारा मिलावट करना जैसे अपराध शामिल हैं . चीन के 'दुई-हुआ फाउंडेशन' की रिपोर्ट बताती है कि चीन में आर्थिक अपराधों के लिए प्रतिवर्ष मृत्युदंड पानेवाले लोगों की संख्या 5000 से 6000 के बीच रहती है .
 चीन में सख्ती का यह हाल है कि भ्रष्टाचार के दोषी दो उप मेयरों तक को फांसी पर चढ़ा दिया गया था . चीन के झेझियांग प्रांत में हांगझोउ के उपमेयर शू मेइयोंग और जियांगसू प्रांत के सुझोउ के उप मेयर जियांग रेन्जी को रिश्वत लेने और धन की हेराफेरी करने का दोषी पाए जाने पर फांसी की सजा दी गई थी . देश को विकास के पथ पर आगे ले जाना है तो दोहरा मापदंड त्यागकर सख्त सज़ा की ओर क़दम बढ़ाना होगा - सत्ता को भी और लोकसत्ता को भी . जिस समय ब्रिटिश उपनिवेशवाद से आजाद हुए थे , तकरीबन उसी समय चीन भी आज़ाद हुआ था . तब वह अपनी तमाम रूढिय़ों और व्याधियों से उबर रहा था , लेकिन आज चीन कहां है और हम कहां हैं ?  चीन सुख-सम्पन्नता ,शक्ति , तरक्की और स्वावलम्बन की जिस ऊंचाई पर चढ़ गया, वह आज अमेरिका जैसे पूर्ण विकसित देश तक के लिए ईर्ष्या - स्पर्धा का विषय बन चुका है . आजादी के बाद से जिन नेताओं को देश के लिए कुछ करना चाहिए था, उन्होंने अपनी ऊर्जा अपनी जेबें भरने में लगा दीं . कौन नहीं जानता है कि आज के राजनेता बड़े धन्नासेठ बन चुके हैं . मगर उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं होता .  नेता हरहाल में बचा ही रहता है ! उसके लिए हमारा देश स्वर्ग सदृश है !

- डॉ. मुहम्मद अहमद  

May 6, 2013

सूखी नदी का चिन्तन - 2



सूखी नदी का चिन्तन - 2
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सूखी नदी का यह दूर तक फैला गवाक्ष 
कभी यहाँ होते थे
फरेंद के हरे - भरे पंक्तिबद्ध वृक्ष !
अपनी सन्तति से लदे हुए 
चन्द्रकान्ता सदृश 
इतने कि पत्ते कम ही दीखते थे /
मैं एक डाल से दूसरी डाल पर जाता 
चुटकी बजाते /
कपि सदृश 
कुछ खाता - कुछ फेंकता 
कुछ नदी के प्रवाह को देता 
जिसे लेकर वह चला जाता 
मैं देर तक / उच्छिष्ट को निहारता रहता 
फरेंद को कदंब समझते हुए ...... 
सखियों और सखाओं के साथ 
पूरा दिन यूँ बीत जाता /
जैसे समय पंख लगाकर उड़ गया हो 
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वैसा आनन्द अब कहाँ ?
' सेखुली ' जैसा ....
नज़र कग गयी इस पर
वन माफ़िया की --
नहीं बची ' सेखुली ' 
' दामिनी ' की तरह !
नदी सूखने के साथ 
यह भी सूख गई 
वृक्षों की यह प्रजाति ही चली गई 
गूलर पुष्प बनकर .....
प्रकृति के दोहन - हनन से रो रही है 
' सेखुली ' की मिट्टी /
उसके जीवन पर जीवन 
बीतते जा रहे हर पल /
इस थिर विश्वास के साथ कि 
वह आएगा ... वह आएगा 
ज़रूर आएगा !
लाएगा वही दिन ....
यह जानते हुए कि 
हर दिन नया होता है
गुज़रा कल , कल ही होता है 
दोबारा आने के लिए नहीं होता ...
पर क्या करें इस विश्वास का ?
जो पर्वत - सा सामने खड़ा है /
साक्षात पर्वत है !
हिमालय की शैवालिक वल्लरियों से घिरा हुआ ...
यह अप्रतिम शान है 
इसकी थाती पर मेरे जैसों के 
अरमानों के नित नए पुष्प खिलते हैं .....
और खिलते रहेंगे !
.......
हों कितने ही संहार 
कितनी बार आए प्रलय !
कितने हों विनाश !
संहार ही संहार हो 
' सेखुली ' नष्ट होकर भी 
मेरे सामने आ खड़ी है ...
विनष्टता उसकी प्रकृति कहाँ 
वह भारत की ' दामिनी ' है 
मनुष्य - संहार पर 
वह मनुष्यता की स्वामिनी है ....
कहने लगी --
तुम लोग मुझे मृत मत समझो !
यह ज़रूर है कि 
फरेंद की जिस डाल पर तुम्हारा बसेरा था 
उस पर ही बैठकर तुम कालीदास बन गए !
मगर यह वृक्ष तो अजर - अमर है /
 भारत है 
बार - बार कटकर भी नहीं कटता !
नहीं सूखता ..
अपने रूप को खोकर भी जीवंत रहता है !
अखंड , अक्षुण्ण रहता है
और रहेगा 
नदी सूखती ही रहती है .....
उसकी जड़ों तक पहुंचने के लिए 
उसे अजस्र ऊर्जा देने के लिए !
........
आज क्या है मेरे पास ?
न वह डाल है , न पात 
किन्तु फल की आस है 
सुदृढ़ विश्वास है ...
जो कभी धराशाई नहीं होता 
क्षण - भंगुरता इस पर छाती नहीं !
मेरे स्थिर - भाव कभी नहीं सूखते 
न कभी सूखेंगे .....
हर क्षरण के बाद सृजन होता है ...
अनवरत .... अनन्तकाल 
एक नदी सूखती है 
दूसरी प्रवाहित होती है .....
जीवन / प्रकृति का यही दस्तूर है /
यही उसके सयानेशान है !!!

- डॉ. मुहम्मद अहमद  

May 5, 2013

चलो आज ज़माने की गिला यूँ दूर करें

चलो आज ज़माने की गिला यूँ दूर करें ,

कंधों पे रखे इस जुए को हटाया जाए |

- डॉ. मुहम्मद अहमद  

अपनी - अपनी बात को सब सच्ची कहते रहे

अपनी - अपनी बात को सब सच्ची कहते रहे ,
यह न सोच सके कि क्या सभी सच्ची ही  हैं .
हम तो फकत यह देखकर दिल को बहलाते रहे ,
दोनों अपनी बातें दमदार तो करते ही हैं .
वे भला क्यों मनाएं शानोशौकत का मातम ! ?
सब जानते हैं झूठ को , खुले जलवागीर ही हैं .
इनकी हकीक़त को किस कदर अपनाएं दोस्त ,
फ़रेबे दिल के ' मोहित ' खयाल अच्छे  ही हैं !
- डॉ. मुहम्मद अहमद 

May 3, 2013

क्या चाहता है चीनी नेतृत्व ?


क्या चाहता है चीनी नेतृत्व ?
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चीन के साथ ढीला - ढाला रवैया इन्तिहाई खतरनाक 
भारत - चीन के सम्बंध लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं . इस हक़ीक़त के बीच यह भी माना जाने लगा है कि कटुता और तनाव के निकट भविष्य में घटने के कोई आसार नहीं हैं . यद्यपि दोनों पक्षों की ओर से कूटनीतिक तौर पर ही सही , संबंध सुधारने की बाक़ायदा क़वायद की जा रही है . अभी अधिक दिन नहीं बीते हैं  चीन के नव निर्वाचित राष्ट्रपति  शी चिनफिंग ने भारत से संबंध सुधारने की खातिर पांच सूत्री फार्मूले की घोषणा  की थी. उस समय उन्होंने यह बात कही   थी  कि भारत और चीन को कूटनीतिक प्रयास जारी रखते हुए द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाना चाहिए. उनके इस बयान से ऐसा लगा कि शायद चीन अब  ' हिंदी - चीनी , भाई - भाई ' बनना चाहता है , लेकिन यह उस वक्त एक भ्रम  साबित हुआ और एक स्वांग जैसा लगा , जब चीनी पीपुल्स लिबरेन आर्मी द्वारा लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी सेक्टर के बुर्थे में भारतीय सीमा में उन्नीस किमी . अंदर घुसकर बंकर बनाने के साथ ही तंबू ताना जाना और अपने जवानों की संख्या लगातार बढ़ाना  इस बात का प्रमाण है कि चीन संगदिल है और वह आक्रामकता में विश्वास करता है . हैरत  और चिंता की बात यह भी है कि अब वह दौलत बेग सहित पूर्वी लद्दाख़ से भारत से पीछे हट जाने की आक्रामक मांग करने लगा है .  चुशूल में दोनों देशों के रक्षा अधिकरियों की गत तीस अप्रैल   को जो बैठक हुई , उसमें चीन ने बड़े अड़ियल रवैये का परिचय दिया है . सेना प्रमुख जनरल विक्रम सिंह ने सरकार और केन्द्रीय मंत्रिमंडल को इस खतरनाक स्थिति से अवगत करा दिया है . 
भारतीय सीमा में चीनी फौज की अवांछित उत्तेजनात्मक कार्रवाई से स्वाभाविक ही तनाव का माहौल है , हालांकि यह भी एक सच्चाई है कि दोनों देशों के सैनिक जब-तब नियंत्रण रेखा को पार करते रहे हैं, मगर दबाव बनने के बाद लौट भी जाते रहे हैं . मगर इस बार एक पहले जैसी बात नहीं है . चीनी सेना की टुकड़ी ने भारतीय सीमा के भीतर घुस कर चौकी बना ली है . इस हरकत के हफ्ते भर बाद उसके दो हेलिकॉप्टर भारतीय वायु सीमा के दस किलोमीटर भीतर चुमार क्षेत्र में उतर आए . चीनी सैनिक अब भी अपनी जगह डटे हुए हैं . चीन कहता है कि उसके फ़ौजी अपनी नियन्त्रण रेखा के भीतर ही हैं , जो किसी भी दृष्टि से सही नहीं है . इस तरह दोनों पक्षों के सैनिक अधिकारियों की बातचीत विफल हो चुकी है . चीन की इस हरकत को कुछ लोग वहां बदले राजनैतिक परिस्थिति के अड़ियल रुख से जोड़ रहे हैं . चीन का प्रमुख विपक्षी दल सरकार को ललकार रहा है . मगर अच्छी बात है कि इस मसले को बातचीत के जरिए निपटाने की कोशिश हो रही है .भारत और चीन के बीच सीमा विवाद पुराना है . दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा करीब चार हजार किलोमीटर लंबी है, जो 1962 के युद्ध विराम समझौते के तहत तय की गई थी . मगर इसमें से करीब तीन हजार किलोमीटर तक भ्रम की स्थिति वर्षों से बनी हुई है .  ' ड्रैगन ' चीन अनेक बार कह चुका है कि वह इस नियंत्रण रेखा को नहीं मानता . 
इसके चलते अक्सर उसकी सेनाएं भारतीय सीमा में घुस आती रही हैं . इसकी बड़ी वजह चीन की पुरानी विस्तारवादी नीति और भारत पर अपना दबदबा बनाए रखने की मंशा भीरही है . मगर अब स्थितियां ऐसी नहीं हैं कि युद्ध के जरिए मसले हल किए जा सकें . यह बात दोनों देश अच्छी तरह समझते हैं .चीन और भारत के बीच विवाद के मुद्दे कई हैं . इनमें से बहुत - से चीन ने पैदा किए हैं. . जैसे - उसका लद्दाख इलाके में अक्साई चिन सड़क बनाना, अरुणाचल पर अपना दावा जताते रहना, ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाना, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को भारत का हिस्सा न मानना आदि .  इन तमाम मसलों पर से ध्यान हटाए रखने के लिए वह नियंत्रण रेखा का विवाद छेड़ देता है . दरअसल, इस तरह वह अपने को ताकतवर देश साबित करने की कोशिश करता है . इसलिए माना जा रहा है कि चीन में उभरा नया नेतृत्व अपने लोगों को यह संदेश देना चाहता होगा कि वह सीमा के मामले में कोई समझौता करने को तैयार नहीं है . इसी बीच चीनी प्रधानमंत्री भारत की यात्रा पर आने वाले हैं . कूटनीतिक क्षेत्रों में यह माना जा रहा है कि घुसपैठ का ताज़ा विवाद जल्दी नहीं सुलझा , तो इसका असर दोनों देशों के व्यापारिक और राजनयिक संबंधों पर भी पड़ेगा. ऐसे में अगली बातचीत के सार्थक नतीजे निकलने की उम्मीद जरुर दिखती है .  भले चीन भारत पर दबदबा बना कर दक्षिण एशिया में अपनी ताकत का लोहा मनवाने की कोशिश करना चाहता हो, मगर वह भी जानता है कि सीमा पर अशांति व्यापारिक दृष्टि से नुकसानदेह साबित होगी . यह भी एक सच है - 
चीन की कथनी और करनी में भारी भेद है और उस पर विश्वास करना घातक सिद्ध होगा. थोड़ी देर के लिए यह मान लें कि चीनी सैनिक वापस नहीं  जाते हैं , तो भारत क्या करेगा ?  क्या इस क्षेत्र को खाली कराने के लिए चीन से युद्ध करेगा? या नरम रुख दिखा बातचीत का अंतहीन सिलसिला जारी रखेगा? आंकड़े बताते हैं कि 2010 से 2011 के बीच वह 750 से अधिक बार अतिक्रमण कर चुका है. 2009 में उसके सैनिकों ने दक्षिण-पूर्वी लद्दाख में प्रवेश कर सड़क निर्माण रुकवा दिया था. जुलाई 2012 में उसके कुछ सैनिकों ने भारतीय सीमा में घुसकर चट्टानों पर चीन-9 लिखा था. लेकिन वर्तमान हालात पहले से भिन्न है. पहले चीनी सैनिक भारतीय सीमा का अतिक्रमण कर वापस लौट जाते थे. लेकिन अबकी बार वे सिर्फ घुसपैठ नहीं किए है बल्कि भारत से टकराव पर आमादा भी है. किंतु आश्चर्य यह है कि उसके द्वारा सीमा पर हरकत तब की जा रही है जब उसके प्रधानमंत्री ली कियांग अगले महीने भारत आने वाले हैं. ऐसे में मौजूदा तनाव और ली कियांग की यात्रा को आपस में जोड़कर देखा जाना गलत नहीं होगा. यह परखा हुआ सच है कि जब भी चीन का शीर्ष नेतृत्व भारत आता है या भारतीय नेतृत्व चीन जाता है उससे पहले चीन द्वारा भारत को दबाव में लेने के लिए इस तरह की हरकतें की जाती है. दरअसल उसका मकसद वार्ता के मेज पर भारत को मनमाफिक नचाना होता है. उसके वर्तमान गतिविधियों को भी इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए. दरअसल चीन को चिंता सता रही है कहीं वार्ता के दौरान भारत तिब्बत मसला न छेड़ बैठे. इसके अलावा उसे डर यह भी है कि भारत ब्रह्मपुत्र मसले पर द्विपक्षीय निगरानी तंत्र की भी मांग कर सकता है. शायद वह इस संभावित स्थिति से निपटने और मोलभाव करने के लिए ही उसने नए विवाद को जन्म दिया है. इसके अलावा यह भी कहा जा रहा है कि अर्थव्यवस्था की डांवाडोल स्थिति, बढ़ती बेरोजगारी, घटती क्रयशक्ति  और कई प्रांतों में सिर उठाता इस आतंकवाद जैसे मसले पर वह जार-बेजार है. व्यवस्था के खिलाफ लोगों का आक्रोश  बढ़ता जा रहा है. ऐसे में उसने जनता का ध्यान बंटाने के लिए जानबबूझकर सीमा विवाद को भड़काने की कोशिश की है. चीन द्वारा सीमा पर तनाव पैदा करने के कई और भी कारण है. दुनिया में भारत की बढ़ती ताकत से वह खासा परेशान है. अमेरिका से भारत की नजदीकियां भी उसकी चिंता को दुगुना कर दी है. उसे लग रहा है कि अमेरिका भारत के द्वारा उसकी राह में रोड़े अटका रहा है. दूसरे, दक्षिणी चीन सागर में वियतनाम के साथ मिलकर भारत द्वारा तेल और गैस निकालने की योजना भी उसे रास नहीं आ रही है. वह कतई नहीं चाहता है कि दक्षिण चीन सागर में भारत की दखल बढ़े. पिछले दिनों उसने धमकी भी दी कि यहां बिना इजाजत के किसी भी प्रकार की खोज की गतिविधि को वह अपनी संप्रभुता पर हमला मानेगा. उसका कहना है कि दक्षिणी चीन सागर और उसके द्वीपों पर सिर्फ उसका अधिकार है. लेकिन भारत उसकी धमकी से डरा नहीं. 
इससे चिंतित चीन अब भारत को घेरने की नई रणनीति बुन रहा है. मौजूदा तनाव के संदर्भ में चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि दोनों पक्षों को सीमा मामले के समाधान के लिए तय ढांचे के तहत कोशिश  करनी चाहिए. लेकिन सच यह है कि चीन सीमा विवाद को सुलझाने की के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है. कई दौर की बातचीत के बाद भी वह अरुणांचल पर अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं है. 90,000 वर्ग किमी क्षेत्र पर अपना दावा आज भी जताता है. यही नहीं अरुणांचल प्रदेश से चुने गये किसी भी जनप्रतिनिधि को चीन जाने का वीजा भी नहीं देता है. पिछले दिनों उसने जम्मू-कश्मीर में जनरल आफिसर कमांडिग इन चीफ के पद पर तैनात बी एस जसवाल को वीजा देने से इंकार कर दिया था. जबकि इसके उलट चीन की इच्छा के मुताबिक भारत कई दशक पहले तिब्बत को उसका हिस्सा मान लिया है. सीमा विवाद सुलझाने की बात 1976 से चल रही है. लेकिन भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए वह दस्तावेजों के आदान-प्रदान में कभी भी अपने दावे के नक़्शे को उपलब्ध नहीं कराता है. लेकिन इसके लिए भारत भी कम जिम्मेदार नहीं है. दरअसल चीन के संदर्भ में भारत की विदेश नीति पंडित नेहरु के समय से ही भटकाव की शिकार रही है. चीन के जवाब में भारत के पास सौदेबाजी की नेहरु काल की बची हुई सीमित ताकत यानी तिब्बत का मसला परवर्ती शासकों ने मुफ्त में गंवा दी. इस उम्मीद में की चीन भारत के प्रति आक्रामक नहीं होगा. इंदिरा गांधी से लेकर डा0 मनमोहन सिंह तक सभी ने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना है. अगर भारत तिब्बत के मसले को जिंदा बनाए रखता तो आज चीन बार-बार आंख दिखाने की हिम्मत नहीं करता. 
चीन की कूटनीतिक सफलता ही कही जाएगी कि वह जब भी भारत से वार्ता को तैयार होता है सबसे पहले भारतीय नेताओं से कबुलवा लेता है कि तिब्बत चीन का हिस्सा है. लेकिन भारतीय रणनीतिकार कभी भी चीन से यह कहलवाने में  सफल नहीं हुए कि कश्मीर भी भारत का अविभाज्य अंग है. भारत सरकार की कूटनीतिक असफलता का ही नतीजा है कि चीन  भारत के अन्य पड़ोसी देशों मसलन नेपाल, बंगलादेश  और म्यांमार में अपना दखल बढ़ा रहा है और भारत सरकार हाथ पर हाथ धरी बैठी हुई है. यह सच है चीन श्रीलंका में बंदरगाह बना रहा है. अफगानिस्तान में वह अरबों डालर का निवेश  कर तांबे की खदानें चला रहा है. म्यांमार की गैस संसाधनों पर कब्जा करने के फिराक में है. खबर तो यह भी है कि वह कोको द्वीप में नौ सैनिक बंदरगाह बना रहा है. चीन भारत को घेरने के लिए नेपाल पर अपना प्रभाव बहुत बढ़ा चुका है . वह पाक अधिकृत कश्मीर में मिसाइल स्टोर करने के लिए 22 सुरंग बनाने की भी फिराक में है. पिछले दिनों ' न्यूयार्क टाइम्स ' द्वारा खुलासा किया गया था कि वहां सामरिक रुप से महत्वपूर्ण गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र पर चीन अपना वर्चस्व बढ़ा रहा है. तकरीबन 10000 से अधिक चीनी सैनिकों की मौजूदगी की बात कही गयी थी. इन क्षेत्रों में वह निर्बाध रुप से हाईस्पीड सड़कें और रेल संपर्कों का जाल बिछा रहा है. सिर्फ इसलिए की भारत तक उसकी पहुंच आसान हो सके. दरअसल उसकी मंशा अरबों रुपये खर्च करके कराकोरम पहाड़ को दो फाड़ करते हुए गवादर के बंदरगाह तक अपनी रेल पहुंच बनानी है, ताकि युद्धकाल में जरुरत पड़ने पर वह अपने सैनिकों तक आसानी से रसद सामग्री पहुंचा सके. लेकिन विडंबना यह है कि भारत सरकार इस ओर अपनी आंख बंद किए हुए है. यह सही है कि चीन भारत पर हमला करने का दुस्साहस नहीं करेगा. उसे पता है कि भारत साठ के दशक  का भारत नहीं है. वह मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम है. लेकिन जिस तरह वह अपनी सामरिक क्षमता को विस्तार दे रहा है वह भारत के लिए इन्तिहाई खतरनाकं है. फिलहाल भारतीय भू-भाग से चीनी सैनिकों को खदेड़ना भारत सरकार के लिए एक बड़ी आजमाइश है . इसके लिए सरकार का इन्तिहाई हलका और ढीला - ढाला  रवैया अपनाना ठीक नहीं होगा , जैसा कि प्रधानमंत्री डॉ . मनमोहन सिंह फरमा रहे हैं . विदेशमंत्री सलमान खुर्शीद नौ मई को चीन जा रहे हैं . उन्हें दो - टूक अंदाज़ में बात करनी चाहिए . भारतीय जनता को भी सरकार पर दबाव बनाना चाहिए कि वह बात न बनने पर चीन से राजनयिक संबंध तोड़े , चीन में अपना दूतावास बंद करे और इस बात के लिए भी दबाव डाले कि चीन के झांसे में न आकर उसके साथ जितने भी विवाद हैं , सबका हल एक मंच पर करे . जनता को चाहिए कि वह चीनी सामानों का बहिष्कार करे . अब वह स्थिति नहीं है कि कोई देश किसी देश पर हिरोशिमा और नागासाकी की पुनरावृत्ति कर सकताहै .
- डॉ . मुहम्मद अहमद