Jun 29, 2013

गिरता रुपया , बढ़ती महंगाई

गिरता रुपया , बढ़ती महंगाई 

बनानी होंगी दीर्घकालिक कारगर नीतियाँ 

  

पेट्रोल , डीज़ल ,रसोई गैस सिलिंडर , सी एन जी और पी एन जी की क़ीमतें दिन - प्रतिदिन  बढती ही जा रही हैं | इससे आम जन अत्यधिक परेशान है और सरकार इसे शायद एक स्वाभाविक चीज़ मानकर चल रही है | अब सत्तासीन कांग्रेस को इसके कारण राजनीतिक हानि भी उठानी पड़ रही है | हमारी सबसे अधिक निर्भरता तो डीजलगैसपेट्रोल और मिट्टी के तेल पर है  जो हर घर में इस्तेमाल हो रहा है। दुनिया में कच्चा तेल भले ही सस्ता हो जाये लेकिन तेल के मूल्य का भुगतान जिस डालर के माध्यम से करते हैं। महंगा होने के कारण अब इन सारी चीजों के दाम बढ़ने की नौबत आ गयी है क्योंकि यह निर्णय लेने के लिए हमने बाजार को निर्णायक बना दिया है इसलिए इंडियन आयल कारपोरेशन और अन्य तेल कम्पनियां बार - बार इनके  दाम बढ़ाती रहती हैं जिसका सीधा प्रभाव रेल और बसों के संचालन के साथ ही बिजली के उत्पादन लागत एवं रोज़मर्रा के इस्तेमाल की चीज़ों  पर भी पड़ता है। हम देश में जितनी वस्तुओं का उपयोग करते हैंउनमें 39000 पेट्रालियम पदार्थों पर आधारित और आश्रित हैं तथा ये हर घरों में पहुंचती हैं। जिस ब्रशब्लेडसाबुन , क्रीम आदि का उपयोग भारतीय करते हैं वे सब विदेशी मुद्रा पर ही आधारित हैं इसलिए इनको भारतीय मुद्रा के घटते दामों के प्रभावों से नहीं बचाया जा सकता । कारोबारियों का मानना है कि भारी पूंजी निकासी और महीने के आखिर में आयातकों द्वारा डालर की बढ़ती मांग से रुपया टूटता चला गया रुपये की परिवर्तनशीलता पर विचार के समय भी यह सवाल उठा था कि हमारी अर्थव्यवस्था ऐसी हो जो इस परिवर्तन को स्वीकार भी करे और मजबूत भी हो लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत !  आयात और निर्यात में संतुलन एक बड़ी समस्या बनी हुई है आयात बढ़ रहा है और इस अनुपात में निर्यात कम हो रहा है। इसका व्यापक  प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ना ही है। भूमण्डलीय व्यवस्था का अभिशाप पूंजीवाद की शक्ल में हमारे सामने मौजूद है देश के बाज़ार विदेशी वस्तुओं से पट गये हैं। हम केवल विदेशी उद्यमों में होने वाली प्रतिस्पर्धा से बड़े ही लाभान्वित हो रहे हैं लेकिन कुल मिलाकर यह अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने वाली नहीं कही जा सकती। भूमंडलीकरण को स्वीकार करने के सवाल पर लगभग सभी राजनैतिक दल सहमत थे लेकिन  विदेशी वस्तुओं को कम करके उन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए देश के भीतर प्रयत्न करने का साहस न तो किसी के पास था और न आज है । यह आशंका पहले से मौजूद रही है कि भूमंडलीकरण जैसे प्रयोग हमारे लिए मुश्किलों और परेशानियों का कारण बन जायेंगे वास्तविकता यह है कि आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं हैजिसमें हम अपने को आत्मनिर्भर कहकर संतोष जता सकें।
  हमारा देश कृषि प्रधान है | हमारी अर्थव्यवस्था मूलतः कृषि पर निर्भर है | यह थोड़े संतोष का विषय है कि कृषि - उत्पादनों से विदेशी निर्भरता अवश्य समाप्त हुई है , लेकिन अभी भी उन्नत बीजों के इस्तेमालरासायनिक उर्वरक और कृषि के औज़ारों पर निर्भरता के मामलों में हम आत्मनिर्भर नहीं हुए हैं। आज भी हम विभिन्न प्रकार के उन्नत बीज विदेशों से आयात कर रहे हैं , लेकिन पेटेंट विदेशों के पास होने से हम इसके उत्पादन को बीज में कन्वर्ट नहीं कर सकते | फिर उसे विदेशों से ही मंगाना पड़ेगा | यहाँ भी पूंजीवाद का ज़हरीला सांप कुंडली मारे बैठा हुआ है | इसी प्रकार सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी अस्पतालों और उद्यमों में प्रयुक्त होने वाली फिल्म और अन्य कुछ चीज़ें अपनी आवश्यकता भर बनाने में हम सक्षम नहीं हैं। हमने जो प्रयोग कियेउन्हें समुन्नत श्रेणी में नहीं शामिल कर सके इसलिए उन्नत व्यापार और औद्योगिक आवश्यकताओं में हम पिछड़ी तकनीक से मुकाबला नहीं कर सकते। इस आधुनिक एवं परिवर्तनशील युग में हम कैसे अपने को जीवन योग्य और सक्षम बनायेंगेयह अभी तय होना बाकी ही है। विदेशी मुद्रा के अर्जन का सवाल बड़ा टेढ़ा है | इसका सर्वमान्य उसूल यही है कि जितना निर्यात बढ़ेगा, उतनी ही विदेशी मुद्रा आयेगी  और इससे हमारा आयात कम हो तो यह संतुलन लाभकारी होगा। यदि आमदनी कम और खर्च अधिक होगा, तो हमारी निर्भरता बढ़ती जायेगी और हम कंगाल होते जायेंगे | विदेशी पूंजी को देश में लाने और इसके विनियोजन के लिए हम प्रयासरत हैं , लेकिन इससे हमारी अर्थव्यवस्था कितनी मज़बूत हुई है , यह गौरतलब विषय है | आज के युग में भी युद्धक अस्त्रों और हथियारों पर सबसे अधिक खर्च होता है | पूंजीवाद ने ऐसी स्थितियां बना दी हैं कि हर देश अपना सबसे अधिक धन इस मद में बहाने के लिए मजबूर है | हमारा देश इसका अपवाद नहीं है , पर सवाल यह है कि हम इसमें कितने आत्मनिर्भर हो सके हैं और इस दिशा में क्या कुछ किया जा रहा है ताकि मद के खर्चे घट सकें | हमारी अर्थव्यवस्था में भी जब तक उत्पादक खर्चे बढ़ेंगे तो वह देश को मजबूत बनाने में सहायक होंगे, लेकिन अनुत्पादक खर्चों का बढ़ना हमारी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा। यह खर्च किस अनुपात में करेंयह भी हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से ही निर्धारित होगा लेकिन यदि युध्द अस्त्रों जैसे अनुत्पादक खर्चों के लिए हमारी विदेशी निर्भरता बढ़ती जायेगी तो अर्थव्यवस्था इससे कमजोर ही होगी,  इसे रोका नहीं जा सकता। हमारे हस्तकलागृह और कुटीर उद्योग लोगों को काम देने में सहायक होंगेइन्हें हमें सुरक्षित करना पड़ेगा लेकिन यदि मुक्त व्यवसाय इनको समाप्त करने में सहायक हो तो देश में बेकारों की संख्या और भी बढ़ेगी। गरीबी और अमीरी का अन्तर तथा बेरोजगारी निरंतर बढ़ती ही जा रही है। क्या यह हमारी योजनाओं में बदलाव का संदेश नहीं देती। विदेशी निर्भरता कैसे कम होइसके लिए वह कौन से प्रयत्न हैं जिन्हें करके हम जनता का उत्साह बढ़ा सकते हैं। यदि हम केवल बाजार के रूप में इस्तेमाल होंगे तो जिनका माल बिक रहा है वे लाभ उठायेंगे।  वैश्विक स्तर पर निवेश सलाहकार सेवा देने वाली कंपनी एटी किरानी के मुताबिक़ ,  करीब 12 वर्षों बाद जहां चीन को पछाड़ते हुए अमेरिका प्रत्यक्षविदेशी निवेश भरोसा सूचकांक के फिर से पहले पायदान पर आ गया है, वहीं भारत 2013 में सूचकांक में दूसरे से गिरकर पाचंवें पायदान पर आ गया | वर्ष 2012 में यह दूसरे स्थान पर था। ये सारे ऐसे अहम सवाल हैं जिन पर हमें अपने देश की अर्थव्यवस्था बचाने के लिए विचार करना ही होगा। हमें मौजूदा आर्थिक नीतियों पर पुनरावलोकन करना होगा और कारगर  दीर्घकालिक नीतियां बनानी होंगी |
- डॉ. मुहम्मद अहमद 

जबसे तुम्हें देखा , किसी और को नहीं देखा

जबसे तुम्हें देखा , किसी और को नहीं देखा ,
                                                 वह बात क्या है , जो अब तक पुरअसरार है ?
                                                    ऐ ख़ुदा , जब मैं तुझे देखूंगा तब देखूंगा ,
                                                   मगर तेरे नूर की अज़मत ही पुर इक़रार है |
                                                             - डॉ. मुहम्मद अहमद  


Jun 28, 2013

इस अमल पर गौर कीजिए

इस अमल पर गौर कीजिए  

  एक तरफ़ उत्तराखंड में बाढ़ , भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं से हज़ारों - हज़ार लोगों की ज़िंदगियाँ छिन गईं | बहुत बड़ा क्षेत्र तबाह व बर्बाद हो गया | पीड़ितजनों के आंसू थम नहीं पा रहे थे , वहीं दूसरी ओर शबे बरआत पर कुछ मुसलमान नवजवान और लड़के  दिल्ली की सड़कों पर जश्न मनाते नज़र आ रहे थे ! यह वह अमल था , जिसकी इस्लाम में कोई सनद नहीं | हाँ , रमज़ान के आने से पूर्व ऐसा माहौल पैदा किया जाना चाहिए , जिसमें इस माह की बरकतों से फ़ायदा उठाना आसान हो जाए | लेकिन हुडदंग , शोरशराबा  और हंगामा पैदा करने को कोई कैसे समर्थन कर सकता है ? 
  खबर है कि दिल्ली के इंडिया गेट पर गत 24 जून को हज़ारों बाइक सवारों ने करीब चार घंटे तक जमकर हुडदंग मचाया | ख़तरनाक स्टंटबाज़ियाँ कीं | पूरे इलाक़े को एक तरह से अपने क़ब्ज़े में ले लिया | उन्होंने वहां से गुज़रनेवालों की परवाह नहीं की | हज़ारों की तादाद में उत्पात मचानेवालों के सामने पुलिसकर्मी असहाय और बेबस हो गए | पुलिस को इन पर काबू पाने में लगभग दो घंटे लग गए | जब बाइक सवार बेरिकेड तोड़ने लगे और उस पर वाहन से टक्कर मारने लगे , तो हुडदंगियों को खदेड़ने के लिए ज़िले के डी सी पी को भारी संख्या में पुलिस बल के साथ सड़कों पर पर उतरकर मोर्चा संभालना पड़ा |
 स्टंटबाज़ी के चलते दिल्ली के एक अन्य स्थान दरियागंज इलाके में तेज रफ्तार बाइक के फिसलने से एक युवक की मौत हो गई, जबकि उसके दो साथी मामूली रूप से घायल हो गए। दोनों घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया, जहां से उन्हें प्राथमिक उपचार के बाद छुट्टी दे दी गई। मृतक की पहचान 30 वर्षीय लोकेश गुप्ता के रूप में की गई है। पुलिस ने आशंका जताई है कि स्टंट के दौरान बाइक फिसलने से यह हादसा हुआ। लोकेश परिवार सहित गाजियाबाद में रहता था। वह अपने दो दोस्तों अकबर और अफजल के साथ जामा मस्जिद जा रहा था। लोकेश बाइक चला रहा था, जबकि अन्य दोनों युवक पीछे बैठे हुए थे। 
  राजघाट के पास पहुंचने पर लोकेश ने अचानक बाइक की रफ्तार तेज कर दी। वहां काफी संख्या में बाइक सवार युवक तेज रफ्तार से गाड़ी दौड़ा रहे थे। लोकेश भी उनके साथ रफ्तार बढ़ाकर बाइक लहराते हुए चलाने लगा। उसी दौरान अचानक उसकी बाइक फिसल गई। हादसे में लोकेश के सिर पर गंभीर चोटें लगी, जिसके चलते उसकी मौत हो गई।
दिल्ली और देश के अन्य स्थानों पर भी हुडदंग का आलम रहा | मुस्लिम नवजवानों के इस अमल को भर्त्सना के साथ उन्हें ऐसे असभ्य व अशालीन हरकतों के प्रति हतोत्साहित किया जाना चाहिए | यह इस्तिकबाल - ए रमज़ान नहीं है , बल्कि ऐसा कोई भी काम जो अशालीन और खुदा की बन्दगी से ख़ाली हो , इस्लामी हुक्म और आचार से बाहर है | वास्तव में इस्तिक़बाल - ए रमज़ान की विभिन्न सरगर्मियों के द्वारा मुस्लिम समाज में ऐसी फ़ज़ा पैदा की जा सकती है , जो नेकियों के लिए साज़गार हो और जिसमें बुराईयाँ मिटने लगें | अफ़सोस और तशवीश की बात यह है कि  रमज़ान से पूर्व उसके लिए जो मंसूबा बनाना चाहिए , वह हमारे समाज में अब कम ही नज़र आता है | हमें इस ओर भी ध्यान देना चाहिए |   
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Jun 27, 2013

हम तो मुस्कुराते हैं अपनी ही बात पर

हम तो मुस्कुराते हैं अपनी ही बात पर ,
ग़ैरों को कहाँ फ़ुर्सत इस छोटी बात पर .
बदनसीबी जिसके गले पड़ी वही जाने ,
हम तो जीते हैं बस अपनी बिसात  पर |
      -----  डॉ . मुहम्मद अहमद 

Jun 22, 2013

सृजन की ओर मुड़ती है हर धार विनाश की

घबराइए नहीं , दुःख निर्मलकर्ता है 
....................................................................................................
 उत्तराखंड जल- प्रलय - सभी कोपभाजित जनों के प्रति हार्दिक समवेदनाओं के साथ -- '' मैं उन सबकी ज़िन्दगी जीता हूँ / मैं मामूली , अकेला ,दुर्दम अनधर / मैं जो हम सब हूँ '' - अज्ञेय 

अभी दो मुक्तकों की रचना की है , जो बाढ़ - भू स्खलन की विभीषिका के शिकार अग्रजों , भाइयों , बहनों सभी को समर्पित कर रहा हूँ ---
मानवता को देख डूबते , अंधकार के आलोक में 
कुपित सलिला उफनाई दुःख - अशांति के शोक में !
मनुजता ही निःशेष  नहीं तो मान्यता किस काम की ?
बीते कोप  बिसार  लगें  हम नव - निर्माण के लोक में |
.......
पौरुष है कहता  , बिखराएं किरण नव - विश्वास की
नित - नूतन आशा , अभिलाषा - अभीप्सा के प्रभास की 
' दुःख सबको मांजता है ' अज्ञेय जी ने है सटीक कहा 
 अन्ततः सृजन की ओर मुड़ती है हर  धार विनाश की |
- अहमद ' मोहित ' 

Jun 21, 2013

काले धन की कब होगी वापसी ?

काले धन की कब होगी वापसी ?


- डॉ . मुहम्मद अहमद 
भारत सरकार ने 21 मई 2012 को काले धन पर श्वेतपत्र जारी किया था , जिससे यह लगा था  कि यूपीए सरकार काले धन की समस्या से निबटने के प्रति गंभीर है | तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा पेश इस दस्तावेज़ में भ्रष्टाचार के मामलों की तेज़ी से जाँच और दोषियों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई के लिए जल्द से जल्द लोकपाल और लोकायुक्त जैसी संस्थाओं का गठन किए जाने की बात कही गयी थी | तत्कालीन वित्तमंत्री ने आयकर विभाग में अभियोजन पक्ष को मज़बूत बनाने और प्रत्यक्ष कर क़ानूनों व नियमों को युक्तिसंगत बनाने की ओर इशारा करते हुए त्वरित अदालतों के गठन एवं अपराधियों को कड़ी सज़ा के प्रावधानों का समर्थन किया था |
 कुल 97 पेज के इस श्वेत पत्र में किसी आर्थिक अपराधी का नाम नहीं लिया गया था और न ही इस बारे में कोई जानकारी दी गयी थी कि दरअसल कितना काला धन विदेशों में है | सरकार ने इस सिलसिले में अन्य एजेंसियों के आकलन शामिल किए थे | हम देखते हैं कि सरकार ने श्वेतपत्र आने के एक साल से अधिक समय गुज़र जाने के बाद आर्थिक अपराधों पर लगाम लगाने के लिए कम से कम उन उपायों पर ध्यान नहीं दिया गया , जिनको अपनाने की बात श्वेतपत्र में कही गयी थी | 
 अब जब लोकसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं , यूपीए सरकार कुछ हरकत में ज़रूर दिखने लगी है | यह बात अलग है कि इस सरकार की ऐसी हरकतें अक्सर दिखावा साबित हुई हैं | भारत सरकार ने कर चोरों की पनाहगाह माने जाने वाले करीब आधा दर्जन देशों से विदेशों में गोपनीय खाते रखने वाले 500 लोगों और इकाइयों की बैंकिंग और अन्य वित्तीय गतिविधियों की जानकारी प्राप्त करने के लिए संपर्क किया है। अमेरिका के एक कार्यकर्ता समूह इंटरनेशनल कंसोर्टियम आफ इन्वेस्टिगिव जर्नलिस्ट(आईसीआईजे)   ने  हाल में ही वैश्विक स्तर  पर गोपनीय खातों का खुलासा किया। भारतीयों द्वारा विदेशी बैंको में चोरी से जमा किया गया धन का निश्चित ज्ञान तो नहीं है किन्तु वरिष्ठ अर्थशास्त्री आर . वैद्यनाथन ने अनुमान लगाया है कि इसकी मात्रा लगभग 7,280,000 करोड रूपये है।
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय मंदी से जूझ रही है और ऐसी आशंका है कि चालू वित्तीय वर्ष के सकल घरेलू उत्पाद में 5.13 लाख करोड़ रुपए का घाटा हो सकता है| अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए फिक्की द्वारा बनाई गई एक 12-बिंदु की योजना में संगठन का कहना है कि उसके आकलन के मुताबिक 45 लाख करोड़ रुपए का काला धन विदेशी बैंकों में जमा है, जो कि भारत के सकल घरेलु उत्पाद का करीब 50 प्रतिशत का हिस्सा है और भारत के वित्तीय घाटे का लगभग नौ गुना है. संगठन का कहना है कि अगर इस काले धन का 10 प्रतिशत हिस्सा भी भारत में आ जाए, तो उससे भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी फायदा हो सकता है.
 इस खुलासे में 505 भारत से संबंधित इकाइयों के नाम व पते शामिल हैं। इनमें उद्योगपति और कंपनियां शामिल हैं। आईसीआईजे के इस खुलासे में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, पुणो, अहमदाबाद, बड़ौदा, सूरत, चंडीगढ़ और कई अन्य भारतीय शहरों की इकाइयों के नाम व पते हैं। सूत्रों ने बताया कि वित्त मंत्रालय के अंतर्गत विदेशी कर और कर अनुसंधान (एफटीएंडटीआर) विभाग ने ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड, केमैन आइलैंड तथा सिंगापुर से कर आदान प्रदान संधि के तहत संपर्क किया है। इसके अलावा एफटीएंडटीआर ने राजनयिक माध्यम  से क्रूक्स  आइलैंड्स और समोआ से भी संपर्क किया है।  कुछ अन्य देशों से भी उनके यहां भारतीयों के गोपनीय खातों के बारे में जानकारी लेने के लिए संपर्क किया गया है। वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जो शुरुआती जानकारी मिली है उससे तस्वीर अधिक साफ नहीं होती और ऐसे में आधिकारिक प्रोटोकाल व्यवस्था तथा मौजूदा संधियों के तहत और ब्योरा मांगा जा रहा है | आईसीआईजे का दावा है कि पिछले तीन दशक में इकाइयों द्वारा करीब एक लाख गोपनीय कंपनियों, ट्रस्टों और कोषों का गठन किया गया। अमेरिका के एक एनजीओ ने किया है इन नामों का खुलासा इनमें 505 नाम भारतीय व्यक्तियों या संस्थाओं के हैं खुलासे में 170 देशों के 2.5 लाख लोगों के नाम हैं शामिल हैं |
 इसका वैश्विक खुलासा आईसीआईजे ने इस साल अप्रैल में किया था, लेकिन नाम और पतों को गत  15 जून  को  सार्वजनिक किया गया। हालांकि, इसके साथ ही आईसीआईजे ने यह भी कहा है कि हो सकता है कि इन विदेशी कंपनियों और ट्रस्टों का कानूनी तरीके से इस्तेमाल किया गया हो। इस सूची का मतलब यह कतई नहीं है कि इन इकाइयों ने कानून तोड़ा है। बताया जाता है कि संबंधित देशों से आवश्यक जानकारी हासिल करने के बाद भारतीय अधिकारी आगे की कार्रवाई करेंगे। कुछ देशों से यह जानकारी दोहरा कराधान बचाव संधि और कर सूचना आदान प्रदान करार के तहत मांगी गई है। कुछ अन्य देशों से ओईसीडी के आपसी कर सहायक प्रोटोकॉल के तहत मांगी गई है।
 पेरिस स्थित आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) ताकतवर देशों के साथ भागीदार कर काले धन तथा कर अपराधों के खिलाफ अभियान चला रहा है। आईसीआईजे के अप्रैल में शुरुआती खुलासे के बाद वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा था कि इस वैश्विक रिपोर्ट में जिन लोगों के नाम है उनके खिलाफ जांच की जा रही है। इस खुलासे में भारत सहित 170 देशों के 2.5 लाख लोगों और इकाइयों का नाम शामिल है। इन इकाइयों ने कर पनाहगाह देशों में कंपनियों का गठन कर कर चोरी की है। आर्थिक अपराध बहुत ही संगीन होते हैं , लेकिन शायद ये सरकार की प्राथमिकता सूची में शामिल नहीं हैं | हम अक्सर सुनते हैं कि सरकार आर्थिक अपराधियों पर नकेल कसेगी और विदेशों से काला धन वापस लाएगी , लेकिन इसे अमली रूप अभी तक नहीं दिया जा सका है | जैसा कि ऊपर कहा गया है कि यदि काला धन वापस ले आया जाए , तो भारतीय अर्थव्यवस्था की बदहाली के दलदल से आसानी से निकाला जा सकता है | सरकार को चाहिए कि थैलीशाहों की थैली की परवाह न करके उनकी काली पूंजी को भारत लाए | लोकपाल विधेयक पारित होने के बाद क्या यह आशा की जाए कि काले धन की वापसी की दिशा में कुछ कार्रवाई हो पाएगी ?

'' समा जाता है / श्वास में श्वास , शेष रहता है / फिर कुछ नहीं ''

'' समा जाता है  / श्वास में श्वास , शेष रहता है / फिर कुछ नहीं ''
वरिष्ठ एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार  विष्णु प्रभाकर जी की ये पंक्तियाँ वास्तव में मेरे लिए धरोहर हैं . आज आपका जन्म दिवस  [ 21 जून ] है . आज ही के दिन  1912 में  मुज़फ़्फ़रनगर (उत्तर प्रदेश) में आपका जन्म  हुआ था. आपका  एक अन्य नाम 'विष्णु दयाल' भी है . आपने साहित्य की सभी विधाओं में लेखन किया .  कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, निबंध, एकांकी, यात्रा-वृत्तांत और कविता आदि प्रमुख विधाओं में  बहुमूल्य रचनाएँ लिखीं . 
यद्यपि आपने  कविताएँ कम लिखीं है , फिर भी इतनी कम नहीं ...  आपका काव्य - संकलन ' [ जनवरी 2010 ] चलता चला जाऊँगा  ' बहुत ही उल्लेखनीय है . आपकी कहानियों का तो कोई जवाब नहीं . आपके  कुंडेवालान [ दिल्ली ] स्थित आवास पर आपसे 1997 में भेंट हुई थी . पहली ही मुलाक़ात में  दो - ढाई घंटे तक बातचीत होती रही . आपने अपने जीवन की कई घटनाओं का उल्लेख किया , जिनमें एक घटना सांप्रदायिक उपद्रव की स्थिति में आपके संयम और उपद्रवियों के हरकतों से निबटने के बारे में थी . 
इसी भेंट में  आपने अपनी  मुंहबोली मुस्लिम बहन , जो उस समय घर पर ही थीं , से परिचय कराया . आपने अपनी चर्चित कृति  ' आवारा मसीहा '  के लेखन से संबंधित  बहुत - सी बातें बतायीं . इसके लेखन के बाबत आपने कई स्थानों का भ्रमण किया था . यह लेखन महान साहित्यकार शरत चन्द्र  के जीवन पर आधारित था .  इसके बाद आपसे अक्सर भेंटें  होती रहीं . काफ़ी हॉउस और आपके निवास पर तो बार - बार मिलना हुआ , जिसके कारण आपसे मैंने बहुत कुछ सीखा .
 मेरा यह मानना है कि आप  इन्सान और इंसानियत को ही सदैव प्राथमिकता देते थे . आप स्पष्टवादी भी थे . जिस वाद या विचारधारा से असहमत होते , बता देते , लेकिन आपका  इंसानियत - प्रेम का परचम सदा सबसे ऊपर रहता . जब मैंने आपसे अपने काव्य - संकलन  ' यथाशा ' के विमोचन का निवेदन किया , तो आपने बड़े ही सहज भाव से कहा , भाई मुहम्मद जी , मैं कवि थोड़े ही हूँ '. मैं कहा , महोदय , आप कवि भी हैं और अच्छे कवि ' आपने कहा , अच्छा तो सुनाओ भाई , मेरी किसी कविता की कुछ पंक्तियां '. मैंने कहा कि बहुत याद नहीं , पर ' निकटता ' शीर्षक कविता की चंद पंक्तियाँ आपकी सेवा में प्रस्तुत करता हूँ - ' त्रास देता है जो / वह हँसता है / त्रसित है जो / वह रोता है / कितनी निकटता है / रोने और हँसने में ! ' आपने कहा , ' हाँ भाई हाँ , यही तो बात है '. 
फिर आपने कुछ दिनों के बाद 29 जनवरी 2001 को ' यथाशा ' का विमोचन किया . आपने ओने आशीर्वचन में कहा कि '' मैं ' यथाशा ' की अभिव्यक्ति को मानव के सहज स्वभाव की अभिव्यक्ति मानता हूँ .... कविता होनी ही ऐसी चाहिए , जसका हमारे मन पर अच्छा और स्वस्थ प्रभाव पड़े . ' यथाशा ' ऐसी ही है . इसमें गज़ल भी हैं , गीत भी हैं , क्षणिकाएं आदि भी हैं  . इसके साथ ही  इन्हें पेश करने का अच्छा सलीक़ा भी है .'' ........ आदरणीय विष्णु प्रभाकर जी अब हमारे बीच नहीं है . मैं एक ऊंचे कदवाले  इन्सान दोस्त को खो चुका हूँ .... शायद  इहलोक ऐसा ही है .......  आपको शत - शत श्रद्धांजलि , अभिवादन . 
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Jun 16, 2013

पिता दिखाए राह नित, दे जीवन का दान


पिता दिखाए राह नित, दे जीवन का दान ,कोई उऋण नहीं हो सकता,

करे कितना प्रतिदान ......


विष को सब पी गए , होने न दिया भान , अमृत ही हमको दिया , मेरे

पिता महान ............ [ पितृ दिवस 16 जून ]

- ' मोहित ' 

Jun 14, 2013

कौन कहता है फ़लक से सितारे आ नहीं सकते

महान कवि दुष्यंत की शैली में 
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कौन कहता है फ़लक से सितारे आ नहीं सकते ,
कभी उन्हें  शिद्दते दिल से पुकारकर देखो  यारो !

- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Jun 11, 2013

बिस्मिल अज़ीमाबादी नहीं , राम प्रसाद बिस्मिल की रचना

बिस्मिल अज़ीमाबादी नहीं , राम प्रसाद बिस्मिल की रचना 
सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है। देखना है ज़ोर कितना, बाज़ु-ए-कातिल में है? वक्त आने दे , बता देंगे तुझे ए आस्माँ ! हम अभी से क्या बतायें, क्या हमारे दिल में है ?  पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की महान रचना | लगभग 27 वर्ष पहले जब मैं पटना में एक बड़े हिंदी दैनिक में मुख्य उपसंपादक था , तब एक सज्जन ने बड़े मनोयोग से एक लेख लिखा था , जिसमें इस महान , ओजस्वी गज़ल का रचनाकार बिस्मिल अज़ीमाबादी को बताया गया था | वे पटना के थे | पटना का  मुस्लिम सत्ताकाल में पुराना नाम अजीमाबाद था | मैंने कहा कि इसे मैं छापूंगा ज़रूर , पर साथ में एक लेख मैंने लिखा , जिसमें वास्तविक रचनाकार पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को बताया | उस लेख में मैंने इस रचना की पृष्ठभूमि भी बताई थी | लिखा था कि  अशफाक उल्लाह खां , आर्य समाज मन्दिर शाहजहाँपुर में बिस्मिल के पास किसी काम से गये हुए थे । संयोग से उस समय अशफाक जिगर मुरादाबादी की यह गजल गुनगुना रहे थे-
"कौन जाने ये तमन्ना इश्क की मंजिल में है।
जो तमन्ना दिल से निकली फिर जो देखा दिल में है।।"
बिस्मिल यह शेर सुनकर मुस्करा दिये तो अशफाक ने पूछ ही लिया-"क्यों राम भाई ! मैंने मिसरा कुछ गलत कह दिया क्या?" इस पर बिस्मिल ने जबाब दिया- "नहीं मेरे कृष्ण कन्हैया ! यह बात नहीं। मैं जिगर साहब की बहुत इज्जत करता हूँ | मगर उन्होंने मिर्ज़ा गालिब की पुरानी जमीन पर घिसा पिटा शेर कहकर कौन-सा बडा तीर मार लिया। कोई नयी रंगत देते तो मैं भी इरशाद कहता।" अशफाक को बिस्मिल की यह बात जँची नहीं; उन्होंने चुनौती भरे लहजे में कहा- "तो राम भाई! अब आप ही इसमें गिरह लगाइये, मैं मान जाऊँगा आपकी सोच जिगर और मिर्ज़ा गालिब से भी परले दर्जे की है।" उसी वक्त पण्डित पंडित बिस्मिल जी ने ये शेर कहा-
"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।
देखना है जोर कितना बाजू ए  कातिल में है?"
यह सुनते ही अशफाक उछल पडे और बिस्मिल को गले लगा के बोले- "राम भाई! मान गये; आप तो उस्तादों के भी उस्ताद हैं।" मैंने अन्य स्रोतों से सिद्ध किया कि यह दावा गलत है | उनके लेख के साथ अपना लेख छापा , जो बहुत चर्चित हुआ | वे सज्जन मेरी बात का खंडन न कर सके | हार्दिक श्रद्धांजलि पंडित जी को |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

जिसे इज़्ज़त न मिली समाज की

जिसे इज़्ज़त न मिली समाज की ,
इज़्ज़ते नफ्स का खयाल अच्छा है |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Jun 9, 2013

जो भी दुश्मनी से हमारे रास्ते में कांटा रखे

   जो भी दुश्मनी से हमारे रास्ते में कांटा  रखे ,
उसकी ज़िन्दगी के चमन का हर फूल बेकांटा खिला रहे |

 [ हम अच्छों के साथ अच्छे और बुरों के साथ भी अच्छे .]
- अहमद ' मोहित '

Jun 8, 2013

रगबत है दिलोदिमाग में

मालूम है कि क़त्ल में शामिल है वो मेरे ,
रगबत है दिलोदिमाग में फिर भी उसी के साथ |
- प्रो . आर , के . शर्मा ' साहिल '


धर्म का असली रंग

धर्म का असली रंग 
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उपनिषदों में कोई रीति - रिवाज या ऊपरी निशानी को धर्म का ज़रुरी अंग नहीं माना गया है . धर्मात्मा वह है , जिसके अंदर लोग दिखें और वह लोगों में दिखे  . ईशोपनिषद में है -
गवा मनेक वर्णनां क्षीरस्यास्त्येकवर्णता |
क्षीरं पश्यते ज्ञानी लिंगिनास्तु  गवा यथा ||
अर्थात , गायें अलग - अलग रंगों की होती हैं , पर सबका दूध एक ही रंग का होता है . जो ज्ञानी लोग हैं वे दूध के रंग को देखते हैं , पर जो ऊपरी निशानियों और रीति - रिवाजों में फंसे हुए हैं , वे गायों के रंग को देखते हैं .
 कुरआन में अल्लाह के रंग को धारण करने की बात आई है . 

- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Jun 6, 2013

जनता से क्यों मुंह मोड़ती हैं राजनीतिक पार्टियाँ ?

जनता से क्यों मुंह मोड़ती हैं राजनीतिक पार्टियाँ ?

 - डॉ . मुहम्मद अहमद 


 केंद्रीय सूचना आयोग के इस फ़ैसले के बाद  कि आरटीआई के दायरे में सभी राजनीतिक दलों को आना चाहिए , लगभग सभी राजनीतिक दलों ने इसके ख़िलाफ़  मोर्चा खोल दिया है . इन सभी को डर है कि इस व्यवस्था से उनकी काली कमाई की पोल खुल जाएगी . क़बीले गौर है कि लगभग सभी राजनीतिक पार्टियाँ पूंजीपतियों एवं अन्य से नम्बर दो की ख़ासी रक़म चंदे के रूप में लेती हैं . कांग्रेस पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी ने साफ़ कहा है कि वह केंद्रीय सूचना आयोग के उस आदेश को अस्वीकार करती है जिसके तहय यह आदेश दिया गया था कि राजनीतिक दल सूचना के अधिकार के तहत आते हैं और उन्हें जनता को जवाब देना चाहिए . उन्होंने कहा कि सारी राजनीतिक पार्टियां किसी कानून से नहीं बनी हैं. यह सरकारी ग्रांट पर नहीं चलती हैं। आम आदमी की जिंदगी में भी सरकारी सहायता की जरूरत होती है | उन्होंने कहा कि यह लोगों की संस्थाएं हैं जो अपने सदस्यों के प्रति जवाबदेह है| ज़ाहिर है , कांग्रेस की यह टिप्पणी हैरत में डालनेवाली तो नहीं है , मगर चिंताजनक ज़रूर है , क्योंकि इसी पार्टी ने आर टी आई बनवाया था | देश की बड़ी साम्यवादी पार्टी माकपा  भी कांग्रेस के साथ है | कहा जाता है कि इस पार्टी को चीन से भारी रक़म मिलती है | उसका कहना है कि वह ऐसा आदेश नहीं मान सकती, जिसमें राजनीतिक दलों को सार्वजनिक संस्था बताया जाए। उसने कहा कि यह  फैसला राजनीतिक दलों के गलत आकलन पर आधारित है। जदयू भी पारदर्शिता के पक्ष में नहीं है | उसने भी केंद्रीय सूचना आयोग के इस फैसले को गलत बताया है। पार्टी को डर है कि अगर राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाया गया तो इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है।
  दूसरी ओर भाजपा ने नर्म रुख अपनाया है | पार्टी के प्रवक्ता कैप्टन अभिमन्यु  ने कहा कि भाजपा  राजनीतिक क्षेत्र में पारदर्शिता और शुचिता के पक्ष में हैं। हम आय कर विभाग और चुनाव आयोग के क़ानूनों का पालन करते हैं। हम सूचना आयोग के निर्देश का पालन करेंगे। हम इसका विरोध नहीं करते हैं। हम हमेशा पारदर्शिता के पक्षधर हैं। इसके खिलाफ अदालत नहीं जाएंगे। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने भी सूचनाधिकार क़ानून की व्यापकता का समर्थन किया है | उन्होंने  कहा कि राजनीतिक दलों को पारदर्शी तरीके से कम करना चाहिए | जनता को उनके कामकाज और उनकर कोष के बारे में जानकारी पाने का अधिकार है | उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस राष्ट्रीय दल के तौर पर उभरते ही पार्टी की सारी सूचनाएं जनता को देगी , चाहे उससे माँगा न जाए , तब भी |
 एसोसिएशन आफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स  ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक केवियट दाख़िल करके सूचना आयोग के इस फ़ैसले पर स्टे न देने की अपील की है , ताकि फ़ैसले पर क्रियान्वयन  रुक न जाए | इस संगठन ने कोर्ट से अनुरोध किया है कि यदि कोई राजनीतिक दल आयोग के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करता है , तो संगठन का पक्ष सुने बिना एकतरफ़ा आदेश न दिया जाए | उल्लेखनीय है कि पिछले 3 जून को मुख्य सूचना आयुक्त सत्यानंद मिश्रा और सूचना आयुक्तों एमएल शर्मा तथा अन्नपूर्णा दीक्षित की आयोग की पूर्ण पीठ ने अपने एक फ़ैसले में  कहा कि छह दल- कांग्रेस, भाजपा, माकपा, भाकपा, राकांपा और बसपा सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकार के मानदंड को पूरा करते हैं। इन दलों से आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई थी।पीठ ने निर्देश किया, ‘इन दलों के अध्यक्षों, महासचिवों को निर्देश दिया जाता है कि छह सप्ताह के अंदर अपने मुख्यालयों पर सीपीआईओ और अपीलीय प्राधिकरण मनोनीत करें। नियुक्त किए गए सीपीआईओ इस आदेश के नतीजतन आरटीआई आवेदनों पर चार हफ्ते में जवाब देंगे।’ पीठ ने उन्हें आरटीआई अधिनियम के अंतर्गत दिए गए अनिवार्य खुलासों से जुड़े खंडों के प्रावधानों का पालन करने का भी निर्देश दिया है। आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल और एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के अनिल बैरवाल की आरटीआई अर्जियों द्वारा  इन दलों द्वारा प्राप्त चंदे आदि के बारे में जानकारी मांगी थी और दानदाताओं के नाम, पते आदि का ब्योरा पूछा था जिसे देने से राजनीतिक दलों ने मना कर दिया था और कहा था कि वे आरटीआई अधिनियम के दायरे में नहीं आते। इसके बाद आयोग की पूर्ण पीठ ने उक्त फ़ैसला सुनाया | यह ऐसा फ़ैसला है , जिसे सभी राजनीतिक दलों को मानना चाहिए | यह चुनाव - सुधार की दिशा में बड़ा क़दम साबित होगा |

Jun 2, 2013

य़े कत्लेआम नहीं ख़ुदकुशी है यारो

इसके लहू में डूब जाएगा सफ़ीना तेरा 

य़े कत्लेआम नहीं ख़ुदकुशी है यारो .

- डॉ . मुहम्मद अहमद 

'' यथाशा '' को दुष्यंत कुमार एवार्ड

'' यथाशा '' को दुष्यंत कुमार एवार्ड 
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मेरे काव्य -संग्रह "यथाशा " [प्रकाशन -जनवरी २००० ]  जिसके लिये  मुझे "दुष्यंत कुमार अवार्ड "प्रदान किया गया था . इसकी एक रचना आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ . अपनी प्रतिक्रिया से अवगत  कराने का कष्ट करें . रचना का शीर्षक है :


 इंसानो  रब को पहचानो 


उठो , तुम अब मत सो जाओ 
गयी गुजरी बातें बिसराओ
जब भी जागो तभी सवेरा 
अपने तम को तुम मिटाओ 
            --
जिसने दिया जीवन हमको 
जीवों में श्रेष्ठतम बनाकर 
उसके उपकार को जानो 
इंसानो रब को पहचानो 
           --
उठो तुम अब  मत हो निराश
दीप आशा के जलाओ 
धैर्य का दमन जब थामो 
दानवता को तुम मिटाओ 
           --
जो देता है शाश्वत जीवन 
थोड़ी - सी उम्र के बदले में 
उसके अहसान को जानो 
इंसानो रब को पहचानो
          --
उठो बेसुध मत हो जाओ  
तमस छोड़ उजास अपनाओ 
मिथ्या , आडम्बर सब त्यागो 
प्रेम  , प्रीति , प्रकाश फैलाओ
           --
जो है प्रतिपालक सबका 
देता है सबको जीविका 
उसके सुगम मार्ग को जानो 
इंसानो रब को पहचानो .
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Jun 1, 2013

हिंदी के साथ अन्याय

पाकिस्तान में हिंदी , वह भी 80 प्रतिशत ! ? , जबकि भारत में 73 .31 प्रतिशत !!??
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  धारवाड़ [ कर्नाटक ] से प्रकाशित हिंदी मासिक पत्रिका ' भारत वाणी ' का मई 2013  अंक मेरे सामने है . इसके पृष्ठ 16 पर प्रकाशित डॉ . कैलाश चंद्र भाटिया  [ अलीगढ़ ] का ' भारत में हिंदी की संप्रेषणीयता सर्वोपरि' ' शीर्षक आलेख कुछ अधिक ही भ्रामक है . कहा गया है कि '' एक अन्य बात यह स्मरण रखनी चाहिए कि भारत में हिंदी को समझने - बोलनेवाले 73 . 31 प्रतिशत हैं | विश्व के लगभग चालीस से अधिक राष्ट्र हैं , जहाँ हिंदी के समझनेवाले हैं | यदि 25 प्रतिशत तक हिंदी की जानकारी वाले राष्ट्र परिगणित किए जाएं तो उनमें से सर्वोपरि नेपाल है , शेष राष्ट्रों के नाम इस प्रकार हैं - पाकिस्तान 80 प्रतिशत , मारीशस 69 प्रतिशत .....'' 
प्रश्न यह है कि पाकिस्तान में हिंदी कहाँ है . वहां तो हिंदी से सख्त नफ़रत है . उर्दू वहां की राष्ट्रभाषा है . मेरा निवेदन मात्र इतना है कि हमें भ्रम में न डाला जाए . सदैव सत्य बातें ही लिखी जाएं .
  किसी भाषा के कुछ शब्दों को जान लेने का मतलब यह नहीं कि जाननेवाला व्यक्ति उक्त भाषा को जानने- समझने वाला है ... कोई पाकिस्तानी यह नहीं कहता कि वह हिंदी जानता है , बल्कि यह कहता है कि उर्दू उसकी भाषा है ..... प्रत्येक भाषा का अपना अस्तित्व / पहचान है . इसीलिए पाकिस्तानी कहता है कि उसकी भाषा उर्दू है ... वैसे भी उसके सामने उर्दू शब्दों के इतर अन्य हिंदी शब्द बोल दीजिए , तो उसकी व्याख्या करनी पड़ती है . भारतीय फिल्मों में लंबे समय तक होता रहा कि उर्दू फिल्मों को हिंदी फिल्म कहकर यथार्थ को छिपाया जाता रहा . मेरा मानना है कि कई भारतीय भाषाओँ को हिंदी के सहारे कम या अधिक समझा जा सकता है . मैं जब धनबाद में पोस्टेड था , तो बंगला भाषा में शामिल हिंदी शब्दों को समझकरबंगलाभाषी का भाव / मन्तव्य समझ लेता था . अब दिल्ली में हूँ , तो पंजाबी भाषी की बात न्यूनाधिक समझ जाता हूँ . एक सज्जन से गुजराती के बारे में जाना , तो हिंदी शब्दों के सहारे उसे कुछ अधिक ही समझने लगा , लेकिन मैं इन सब भाषाओँ के अस्तित्व को कैसे नकार सकता हूँ . उर्दू हिंदी के निकट है , लेकिन उसकी अपनी पहचान है .उसमें हिंदी के शब्द अधिक हैं यह भी मैं नहीं मानता . हाँ फ़ारसी और अरबी के शब्दों को ठूंस - ठूंस कर भरने का जो सिलसिला शुरू हुआ था और है , उसने दोनों में दूरियां बढ़ा दी हैं . आज भी हम हिंदीवाले उर्दू के शब्दों का तो बिना किसी झिझक के प्रयोग कर लेते हैं , पर उर्दूवालों की ओर से ऐसा नहीं है .
मेरा यह मानना है कि कोई भी भाषा किसी अन्य भाषा का स्थान नहीं ले सकती . यह कहना कि पाकिस्तान में भारत की अपेक्षा अधिक हिंदी समझी जाती है , कम से कम यह बात न मैं मान सकता हूँ और न अपने बच्चों को यह पढ़ाऊँगा कि सामान्य ज्ञान में यह बात सही मानें .
- डॉ . मुहम्मद अहमद