Sep 26, 2013

यह कैसी बीमारी ! ?

34 सालों से लाइलाज है यह बीमारी , हर 
साल करोड़ों रुपये फूंके जा रहे हैं !!!
-  डॉ . मुहम्मद अहमद 
गोरखपुर और आसपास के इलाक़ों में पिछले 34 सालों से दिमागी बुखार से हज़ारों लोगों की जानें जा चुकी हैं , जिनमें से अधिकांश बच्चे - बच्चियां हैं | गोरखपुर मण्डल के अपर स्वास्थ्य निदेशक एस के श्रीवास्तव ने बताया कि बाबा राघव दास मेडिकल कालेज में दिमागी बुखार (जापानी इंसेफेलाइटिस तथा एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम) से गत 4 और 5 सितम्बर को  12 बच्चों की मौत हो गयी | उन्होंने बताया कि मेडिकल कालेज में एक जनवरी से अब तक दिमागी बुखार के 1065 मरीज भर्ती कराये गये हैं जिनमें से 236 की मौत हो चुकी है | अस्पताल में रोजाना  नये मरीज भर्ती किये जा रहे हैं इस वक्त ऐसे 249 रोगी भर्ती हैं राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग आगामी 11 सितम्बर से जनसुनवाई का आयोजन किया |आयोग के सदस्य योगेश दुबे ने बताया कि आयोग पूर्वाचल में पिछले 34 साल से हर वर्ष सैकड़ों बच्चों की जान लेने वाले जापानी इंसेफेलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम से हो रही मौतों की जांच पड़ताल तथा उसकी बारीकियों का लगातार अध्ययन किया जा रहा है | वास्तव में केंद्र और प्रदेश सरकार की कागजी योजनाओं के अमल में ना आने से पूर्वांचल में इन्सेफेलाईटिस (जेई) जैसी दशकों पुरानी गंभीर बीमारी पर अंकुश नही लग पा रहा है | अलबत्ता सरकार से मिले धन को मेडिकल कालेज में तैनात जिम्मेदार अधिकारी और मेडिकल कालेज प्रशासन दोनों हाथ से लूट रहा है | अधिकारियों की मनमानी के चलते मेडिकल कालेज में अराजकता की यह स्थिति है कि यहां भर्ती मरीज और उनके परिजनों का आर्थिक और मानसिक शोषण किया जा रहा है | इन्सेफेलाईटिस की रोकथाम के लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकार ने कई पॅकेज की घोषणा कर रखी है | साथ ही दोनों सरकारे लगातार आर्थिक सहायता मुहैया करा रही है, लेकिन जो परिणाम मिलना चाहिए वह परिणाम नही मिल रहा | सरकार प्रति वर्ष करोडो रुपयें का बजट केवल जेई मरीजो की जांच और दवाओं के लिए आवंटित करती है , पर केंद्र और प्रदेश सरकार से आया यह  पैसा किन अधिकारियों और डाक्टरों की जेब में जा रहा है , यह  जांच का विषय है | मेडिकल कालेज के सूत्रों के अनुसार मेडिकल कालेज में भर्ती मरीजों के लिए आवंटित धन की बन्दरबाँट में मेडिकल कालेज प्रशासन से लेकर गोरखपुर मंडल के चिकित्सा विभाग से सम्बंधित बड़े-बड़े अधिकारी तक शामिल है | इस पैसे की बंदरबांट करना भी बहुत आसन है , इन्सेफेलाईटीस उन्मूलन के लिए केंद्र और प्रदेश सरकार कई सौ करोड़ रुपयों का बंदोबस्त टीकाकरण और सालाना छिडकाव के लिए करती हैजिसका इस्तेमाल पूर्वी उत्तर प्रदेश के करीब 20 जिलों और प्रदेश की सीमा से लगे बिहार  के कुछ जिलों में होता है | सालों साल चलने वाले इस कार्यक्रम की हकीक़त यह  है कि कुछ जगहों पर इन्सेफेलाईटीस की रोकथाम के लिए उन्मूलन कार्यक्रम चलाकर स्वास्थ्य विभाग उन करोडो रुपयों की बन्दरबाँट कर लेता है | अगर जमीनी हकीक़त की बात करें तो सबसे ज्यादा पैसा छिडकाव और टीकाकरण के लिए आता है | कागजी कार्रवाई में तो लक्ष्य पूरा कर लिया जाता है | मगर दूसरी ओर हर साल मेडिकल कालेज में आने वाली दिमागी बुखार के मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है और साथ ही साथ मौतों की भी संख्या | मेडिकल कालेज में फैले भ्रष्टाचार का आलम यह है कि सरकार की तरफ से भर्ती की फीस 1 रुपये निर्धारित की गई है पर दिमागी बुखार के मरीज जब दूरदराज के इलाकों से यहाँ भर्ती होने आते है, तो यहाँ के कर्मचारी उनसे भर्ती के नाम पर 100 रुपयें वसूलते है
साथ ही यहाँ के दिमागी बुखार से पीड़ित भर्ती मरीज के परिजनों को मजबूर किया जाता है कि वे अपने मरीज के लिए बाहर से दवाएं खरीद कर लायें |
मेडिकल कालेज के डाक्टरों का मरीज़ों के प्रति व्यवहार भी बड़ा शर्मनाक है | मेडिकल कालेज में आये दिन मरीज और डाक्टरों में मारपीट की घटनाएं आम है | डाक्टर यहाँ हिंसक होकर कभी भी मरीजों और उनके परिजनों पर हमला करते हैं | बात ज्यादा बिगड़ जाती है तो यहाँ के जूनियर डाक्टर बिना किसी से पूछे मरीजों और परिजनों को अस्पताल से बाहर का रास्ता दिखा देते है |विरोध होने पर मरीजों को फेंकवा भी दिया जाता है | नेहरू चिकित्सालय के नाम से मशहूर मेडिकल कालेज का प्रशासन और यहाँ के प्राचार्य अपने नाम को बेचकर दाम कमा रहे है | कालेज के संचालक तो दिमागी बुखार की दवाई "ईमीनोग्लोबलिन" की खरीद में करोडो डकार चुके है | सरकार इन डाक्टरों और गोरखपुर मेडिकल कालेज प्रशासन से हार चुकी है, मासूमो की जान के बदले काली कमाई करने वालों पर कही न कही सरकारी मेहरबानी भी है | स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की लाख शिकायत करने के बावजूद कोई कार्रवाई न होना इस बात का सबूत है की सरकार का ध्यान समस्या से ज्यादा काली कमाई करने वालों को संरक्षण देने पर है | अगर बीते सालों में यहाँ दिमागी बुखार से पीड़ित बच्चो के मृत्यु दर पर नज़र डाली जाए तो 2005 से 2012 के बीच में अभी तक करीब 4225 बच्चे काल के गाल में समा चुके हैं | गौर करने वाली बात यह है कि ये सरकारी आंकड़े हैं | गैर सरकारी आंकड़ो पर नज़र डाले तो रूह कांपने वाली स्थिति है | मेडिकल कालेज में इन्सेफेलाईटिस से लड़ने के लिए सभी आधुनिक साधन मौजूद है, पर कोई भी सकारात्मक परिणाम नज़र नही आता जबकि बच्चो की मृत्यु दर की तुलना अगर जिला अस्पताल से की जाए तो वहा की स्थिति मेडिकल कालेज से बेहतर है | स्वास्थ्य विभाग की नाकामी दिमागी बुखार मसले पर बीते कई सालों से देखी जा रही है | इसकी मुख्य वजह अगर यहाँ के डाक्टर, और इस योजना को संचालित करने वालों की नाकामी है तो एक बड़ी वजह सरकार और राजनीति भी है | धीरे-धीरे विकराल रूप ले रही यह समस्या राजनीति का भी शिकार है, भले ही सरकारे इस समस्या से निपटने के लिए करोडो रुपयों का धन हर साल आवंटित करती है, पर उस पर राजनीति भी खूब होती है | प्रदेश हो या केंद्र की सरकार दोनों में कोई यह  नही चाहता है कि इसका लाभ कोई और ले ले | इस समस्या को जड़ से खत्म  करने पर ध्यान दोनों में से किसी का नही है | यही वजह है कि स्वास्थ्य विभाग की नाकामी और सरकारों की राजनीति इस समस्या को बढ़ाने के अलावा कुछ नही कर पा रही है

सरकार चाहे तो घट सकती है महंगाई

सरकार चाहे तो घट सकती है महंगाई ......
- डॉ . मुहम्मद अहमद
आजकल गरीब ही क्या मध्य वर्ग सभी बढ़ती महंगाई की मार से बुरी तरह प्रभावित है | वह अधमरा हो चुका है | थोक मूल्य सूचकांक में लगातार वृद्धि ही दर्ज हो रही है | हालत यह है कि महंगाई नित नए आयामों को लाँघ रही है | इसका खुदरा मूल्यों पर पड़े असर का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। बाजार में सब्जियों, फलों, दूध और दुग्ध उत्पादों, अंडे,मछली और मीट की कीमतें पिछले साल की तुलना में कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं। बारिश ने फलों और प्याज समेत अन्य सब्ज़ियों की पैदावार को काफ़ी प्रभावित किया है | देश की ख़स्ताहाल और डांवाडोल अर्थव्यस्था का भी इस संकट के बढ़ने में बड़ा दखल है | राजकोषीय घाटा मनमाने ढंग से लगातार बढ़ता जा रहा है , जो सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द बना हुआ है |महंगाई बढ़ने का सबसे बड़ी वजह यही है |
सरकार ने इस घाटे को कम करने के लिए जो क़दम उठाए हैं , वे किसी टोटके से कम नहीं हैं | केंद्र सरकार पर सबकी निगाहें टिकी हैं कि वह रुपए की कीमत बढ़ाने, खाद्य वस्तुओं व अन्य उपभोक्ता सामानों की कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए कोई ठोस कदम उठाए , लेकिन सरकार से यह हो नहीं पा रहा है | यह बात दूसरी है कि वह अपने खर्चों में कमी करके यह जरूर साबित करना चाहती है कि वह अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना चाहती है। इसलिए उसने फ़ैसला किया है कि अब सरकारी बैठकें और सम्मेलन पांचसितारा होटलों में नहीं होंगे। अधिकारी विमान की एक्जीक्यूटिव श्रेणी की जगह इकानामी श्रेणी  में सफर करेंगे।
 सभी मंत्रालयों और विभागों से कहा गया है कि विदेश जाने वाले प्रतिनिधिमंडलों का आकार बेहद छोटा रखें। अगले आदेश तक नया वाहन न खरीदने का आदेश भी सभी मंत्रालयों को भेजा गया है। खर्च में कटौती के इन फौरी उपायों के अलावा सरकार ने जो बड़ा कदम उठाया है, वह है, नई सरकारी नौकरियों और पिछले एक साल से खाली पड़े पदों को भरने पर रोक लगाना। इन तमाम उपायों के जरिए गैर योजनागत व्यय में 10 फीसदी तक कटौती कर राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.8 प्रतिशत तक रखने का सरकार का लक्ष्य है। राज्य सरकारों पर कुछ पाबंदियां केंद्र से लगाई गई हैं। मसलन अब उन्हें केंद्र प्रायोजित योजनाओं का हिसाब हर महीने देना होगा। साथ ही योजनाओं के फंड को दूसरे मदों में इस्तेमाल करने पर रोक लगाई जा रही है।
यहां यह सवाल उठाया जा सकता है कि अब तक हर माह हिसाब क्यों नहीं दिया जाता था ? सरकार ने ये क़दम कोई पहली बार थोड़े ही उठाए हैं , पिछले साल भी एक उल्लेखनीय कटौती का एलान किया गया था , लेकिन नतीजा कुछ ख़ास न निकला | महंगाई लगातार बढ़ती रही और आम आदमी पिसता रहा | कितनी अजीब बात है कि सरकार सीधे तौर पर सामानों और पेट्रोलियम पदार्थों के दाम क्यों नहीं करती ? कारोबारियों पर प्रभावी नियंत्रण क्यों नहीं करती ? एक बार प्रखर समाजवादी राम मनोहर लोहिया ने महंगाई पर चर्चा में भाग लेते हुए लोकसभा में कहा था कि '' क़ानून बनानेवाले सीधे चीज़ों के दाम घटाएं , न कि अपनी तनखाहों को बढ़ाएं| '' उन्होंने सवाल किया कि आप लोग अपनी ताक़त अपनी तनखाहों को बढ़वाने के बजाय चीज़ों के दाम घटाने में क्यों नहीं लगाते हो ?
वास्तविक स्थिति यह है कि बाज़ार में दाम घटते भी हैं , तो भी खुदरा विक्रेता क़ीमत नहीं घटाता | मिसाल के तौर पर प्याज़ मंडी में अब थोड़े सस्ते हुए हैं | खुदरा विक्रेता मंडी से 40 - 45 रुपये प्रति किलो उसे खरीदता है और 70 - 80 के भाव बेचता है | इसी प्रकार देसी चना का थोक रेट 30 रुपये किलो के आसपास है , लेकिन खुदरा विक्रेता 50 - 60 में खुलेआम बेचते हैं | हर खाद्य सामग्री का यही हाल है | इस खतरनाक हालत के मद्देनज़र ज़रा उन 83 करोड़ देशवासियों की दुर्दशा पर गौर कीजिए , जिनकी प्रतिदिन की आय तीस रुपये से कम है |

इस विषम स्थिति में भी सरकार दिल से चाहे तो बढ़ती कीमतों पर काबू पा सकती है , लेकिन इसके लिए उसे कड़े क़दम उठाने होंगे | देखा जा रहा है कि हमारी सरकार के अक्सर क़दम पूंजीवाद को बढ़ावा देनेवाले होते हैं हमारे यहाँ  भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था न होने और परिवहन व्यवस्था भी ठीक न होने के कारण सब्जियाँ, फल, दूध वगैरह ही नहीं खराब होते, बल्कि अनाज तक सड़ जाता है, जो एक अक्षम्य अपराध है। फिर वायदा कारोबार, आयात-निर्यात में दिशाहीनता, जमाखोरी और कालाबाजारी की समस्याएँ भी अपनी जगह हैं। सरकार यहाँ हस्तक्षेप करके इस संगीन हालत पर काबू पा सकती है |

स्वस्थ चिन्तन और मानसिकता

स्वस्थ चिन्तन और मानसिकता को बढ़ावा देने की ज़रूरत
राजनीति और नौकरशाही को पाक करें जरायमपेशा लोगों से !
- डॉ . मुहम्मद अहमद 
केंद्र सरकार राजनेताओं की आपराधिक गतिविधियों पर रोक लगाने में बार - बार अपनी अक्षमता ही  नहीं दिखा रही है , बल्कि अपराधों को बढ़ावा तक दे रही है ! अब सरकार ने  सज़ायाफ्ता सांसदों और विधायकों को अयोग्य करार देने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश को रद्द करने के लिए अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में विगत 24 सितम्बर  को हुई कैबिनेट की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूर किया गया। इस अध्यादेश से अब सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश लागू नहीं हो पाएगा जिसमें कहा गया है कि दो साल या उससे ज्यादा की सजा के प्रावधान वाले अपराधों में दोषी पाए गए सांसदों और विधायकों को अयोग्य करार दिया जाएगा। इसका तत्काल फ़ायदा रशीद मसऊद और राजद सुप्रीमो लालूप्रसाद यादव को पहुंचेगा , जिन्हें सज़ा मिलने की अधिक संभावना है | सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उलटने के लिए सरकार ने संसद के मानसून सत्र में कानून में संशोधन का प्रस्ताव किया था और जन प्रतिनिधित्व (दूसरा संशोधन) विधेयक 2013 राज्यसभा में पेश किया था, हालांकि विधेयक पास नहीं हो सका और इसे संसदीय समिति के पास भेजा गया। शीर्ष अदालत के इस फैसले पर अमल होता तो संसद के कई सदस्य और राज्य विधानसभाओं में कई विधायकों की सदस्यता खत्म हो जाती। यह बात भी साफ़ है कि अध्यादेश की पुष्टि के लिए उक्त विधेयक को संसद से पास कराना होगा |उल्लेखनीय है कि भ्रष्टाचार के एक मामले में कांग्रेस सांसद रशीद मसऊद  के खिलाफ अगले महीने सजा सुनाए के बाद उनकी राज्यसभा से सदस्यता खत्म हो सकती थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत ऐसे मामले में सीट गंवाने वाले वे पहले सांसद होते। इसके अलावा सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे राजद प्रमुख लालू प्रसाद से जुड़े चारा घोटाले मामले का फैसला भी आने वाला है। कांग्रेस के इस फ़ैसले की  आम तौर पर आलोचना हो रही है , सिवाय भाजपा समेत उन राजनीतिक दलों के मुंह सिले हुए हैं , जिनका बड़ा जनाधार गुंडों , आपराधिक एवं असामाजिक तत्वों की हरकतों पर टिका है वहीं  आलोचनाओं से तिलमिलाई कांग्रेस हक्की - बक्की बनी हुई है | पार्टी प्रवक्ता पीसी चाको ने आपराधिक मामले में दोषी पाए गए सांसदों और विधायकों को अयोग्य होने से बचाने के लिए अध्यादेश जारी किए जाने के मुद्दे पर आलोचनाओं को खारिज किया और कहा कि इस तरह का उपाय कोई पिछले दरवाजे का तरीका नहीं है। अध्यादेश जारी किया जाना कोई अलोकतांत्रिक कार्रवाई नहीं है। यह कोई पिछले दरवाजे का तरीका नहीं है। इसे संसद की मंजूरी मिलनी होती है। यह अगले सत्र में संसद के समक्ष आएगा।
गौरतलब है कि इसी साल 10 जुलाई को सुप्रीमकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया जिसके तहत अपराधिक मामलों में जो भी राजनेता दोषी पाए जायेंगे उनको अपने पद से इस्तीफा देना होगा और इस स्थिति में दोषी राजनेता चुनावों में भाग नहीं ले पाएंगे। लिली थॉमस ने सुप्रीमकोर्ट में एक याचिका दायर की थी उसी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था और सुप्रीमकोर्ट ने यह आदेश जारी करते हुए कहा था कि अपराधिक मामलों में जो भी राजनेता दोषी पाए जायेंगे उन्हें अपने पद त्यागने होंगे और उन राजनेताओ के चुनाव में भाग लेने पर भी पाबंदी रहेगी। लिली थॉमस इस तरह के फैसले के लिए 5 वर्षो से लगातार प्रयास कर रही थी, लिली थॉमस के याचिका पर सुप्रीमकोर्ट ने ये महत्वपूर्ण फैसला उनके हक़ में सुनाया। लिली थॉमस केरल की रहने वाली हैं | उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट से वकालत शुरू की और कुछ सालों के  बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करना शरू किया और आज वे आम आदमी के अधिकारो के सवाल को लेकर अभियान चलाती हैं । सरकार के इस अध्यादेश से बहुत आहत हैं | उनका कहना है कि '' सरकार की पुनर्विचार याचिका भी जब निरस्त हो गई , तो उसे इस चोर दरवाज़े का सहारा नहीं लेना चाहिए | सरकार का यह क़दम बहुत निंदनीय है | मैं कभी यह सहन नहीं कर सकती कि देश को भ्रष्ट लोग चलायें | मुझे उम्मीद है कि सरकार इससे संबंधित विधेयक को संसद में नहीं पास करा पाएगी | उनका कहना है कि सरकार जनता के साथ विश्वासघात कर रही है | वह एक ओर तो राजनीति को अपराधीकरण से बचाने की बात करती है , वहीं दूसरी ओर अपराधीकरण को खुलेआम बढ़ावा दे रही है | '' हमारे देश में राजनीति और नौकरशाही को अपराधमुक्त करने की बात कई दशकों से की जा रही है , लेकिन ये सभी बातें और काम अनमने एवं दिखावे के तौर पर ही किए जाते हैं | इसमें सबसे बड़ी रुकावट आपराधिक तत्वों की सियासी जमात ही है | ज्ञातव्य है कि अक्तूबर 1993 में इस विषय पर पूर्व केन्द्रीय गृह सचिव एन एन वोहरा ने अपनी रिपोर्ट दी थी | इस समिति ने रिपोर्ट राजनीति और नौकरशाही का अपराध जगत के साथ ज़बरदस्त गठजोड़ की बात सिद्ध की थी , जिस पर कुछ हो - हल्ला मचा | सरकार ने दोनों को पाक करने का संकल्प लिया , मगर सब दिखावा साबित हुआ !
इसी प्रकार भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश और प्रख्यात न्यायविद् एमएन वेंकटचैलेया की अध्यक्षता में गठित नेशनल कमीशन टु रिव्यू द वर्किंग ऑफ द कंस्टीट्यूशन (एनसीआरडब्ल्यूसी) ने अनुशंसा की थी कि पांच साल से अधिक सजा वाले मामलों में आरोपियों को संसद और विधानसभाओं का चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा देना चाहिए। साथ ही जो लोग हत्या, दुष्कर्म, डकैती और तस्करी जैसे जघन्य मामलों में दोषी ठहराए गए हैं, उन्हें ताउम्र चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए। वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाले दूसरे प्रशासकीय सुधार आयोग ने संस्तुति की थी कि जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 8 में संशोधन कर गंभीर मामलों तथा भ्रष्टाचार के आरोपियों को अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए। विधि आयोग ने 14 साल पहले सुझाव दिया था कि चुनाव संबंधी अपराधों में किसी अदालत में केवल आरोपपत्र दाखिल होना ही किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराने के लायक है। चुनाव आयोग ने 16 साल पहले फैसला लिया था कि संसद और विधानसभाओं में चुनाव के उम्मीदवारों को अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के संबंध में शपथपत्र दाखिल करना होगा। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया था कि निचली अदालत द्वारा दोषी सिद्ध करना ही अयोग्य ठहराने के लिए पर्याप्त होगा। यहां तक कि लंबित अपील में जमानत पर रिहा होने वाले भी चुनाव लड़ने के अयोग्य होंगे। इसके बाद सितंबर 1997 में मुख्य चुनाव आयुक्त ने प्रधानमंत्री को इस संबंध में पत्र लिखा और इस राजनीति के अपराधीकरण पर अंकुश लगाने के लिए तुरंत कानून में सुधार पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 में गंभीर असंगतियां हैं, जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति दुष्कर्म के आरोप में दस साल की सजा काट रहा है, तो वर्तमान कानून के मुताबिक सजा सुनाए जाने के बाद से सिर्फ छह साल के लिए चुनाव लड़ने पर रोक है। यानी वह अपनी सजा के अंतिम चार साल जेल में सजा काटते हुए भी चुनाव लड़ सकता है। आयोग ने कहा कि ऐसे मामलों में दोषी व्यक्तियों को सजा पूरी होने के बाद छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक होनी चाहिए। आयोग के अनुसार क़ानून के तहत एक व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना गया है जब तक उसे अदालत दोषी करार न दे दे। इस प्रकार सख्त कानूनी प्रावधान के अनुसार अपराधी वह है, जिसे अदालत दोषी ठहरा चुकी है। किंतु आम आदमी इसे दूसरे ढंग से देखता है। उसकी नजर में, जिस व्यक्ति पर किसी अपराध में आरोप लगते हैं वह व्यक्ति मामला लंबित होने की स्थिति में भी अपराधी है। आयोग का मानना है कि अगर गंभीर अपराध में किसी व्यक्ति पर मामला चल रहा है, तो उसे तब तक चुनावी प्रक्रिया से बाहर करने में कोई विधायी समस्या नहीं है, जब तक वह अदालत से दोषमुक्त नहीं हो जाता। ऐसे में उसके चुनाव लड़ने के अधिकार पर प्रतिबंध संसद व विधानसभा की शुचिता बनाए रखने के उद्देश्य से उचित जान पड़ते हैं। अपराधियों को चुनावी राजनीति से दूर रखने के चुनाव आयोग के प्रयासों पर पिछले दो दशकों में आईसरकारों ने पानी फेर दिया। सरकार को चाहिए कि विधायिका और नौकरशाही को भ्रष्टाचार से पाक करने के साथ ही पूरे देश एवं समाज में स्वस्थ चिन्तन और मानसिकता को बढ़ावा दे |

Sep 22, 2013

निमेष आयोग की रिपोर्ट पर कब होगी कार्रवाई ?

निमेष आयोग की रिपोर्ट पर कब होगी कार्रवाई ?
 - डॉ . मुहम्मद अहमद

वास्तव में उत्तर प्रदेश सरकार यह नहीं चाहती है कि निमेष आयोग की रिपोर्ट पर कार्रवाई की जाए , इसलिए वह रिपोर्ट पर कछुआ चाल चल रही है | काफ़ी समय के बाद राज्य सरकार ने फैजाबाद, वाराणसी और लखनऊ कचहरियों में नवम्बर 2007 में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोट मामलों में स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) द्वारा खालिद मुजाहिद तथा तारिक क़सिमी की बाराबंकी में गिरफ्तारी की सत्यता की जांच हेतु पूर्व ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश आर. डी. निमेष की अध्यक्षता में गठित आयोग की रिपोर्ट 16 सितम्बर को उत्तर प्रदेश विधानसभा में पेश कर दी। न्यायाधीश निमेष ने पिछले साल 31 अगस्त में यह रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी , जिसे सरकार ने 5 जून 2013 को मंज़ूरी दे दी थी , लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया था | 18 मार्च 2013 को रिहाई मंच ने इसे अपने सूत्रों के ज़रिये हासिल करके सार्वजनिक कर दिया था |  पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने 14 मार्च 2008 को इस आयोग का गठन किया था |
इस रिपोर्ट में एसटीएफ द्वारा मुजाहिद तथा कासमी की बाराबंकी में गिरफ्तारी की सत्यता पर संदेह जाहिर करते हुए कई सवाल उठाये गये हैं और आतंकवाद से जुड़े मामलों में होने वाली गिरफ्तारियों के बारे में कई सुझाव भी दिये गये हैं। साथ ही इस घटनाक्रम में सक्रिय भूमिका निभाकर ‘विधि विरुद्ध’ कार्य करने वाले अधिकारियों तथा कर्मचारियों को चिह्नित करके उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश भी की है। उल्लेखनीय है कि खालिद मुजाहिद की 18 मई 2013 को पेशी से लौटते हुए बाराबंकी में मौत हो गई थी | कहा जाता है कि पुलिस प्रताड़ना के चलते खालिद की मौत हुई | तारिक क़सिमी अभी जेल में हैं |
एसटीएफ की काली करतूतें 
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आयोग ने रिपोर्ट में कहा है कि तारिक क़सिमी  और खालिद मुजाहिद की 22 दिसम्बर 2007 की जिस घटना की आड़ में बाराबंकी से गिरफ्तारी दिखायी गयी है , उसमें इन दोनों की संलिप्तता ‘संदेहजनक’ है। निमेष आयोग ने यह भी कहा है ‘‘चूंकि मामला बाराबंकी जिला न्यायालय में विचाराधीन है। इसलिये इस स्तर पर इस घटना के सम्बन्ध में किसी व्यक्ति के विरुद्ध दायित्व निर्धारित नहीं किये जा सकते।’’ आयोग दोनों बेकसूरों को गिरफ्तार करनेवालों की पहचान तो नहीं कर सका , लेकिन उसने ज़िम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करने की सिफ़ारिश की है |
 लगभग 237 पन्नों की इस रिपोर्ट के मुताबिक बचाव पक्ष की तरफ से तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद समेत 35, अभियोजन पक्ष की तरफ से तत्कालीन पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह और अपर पुलिस महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) बृजलाल समेत 37 तथा 61तटस्थ लोगों ने आयोग के समक्ष हलफनामे दाखिल किये हैं। आयोग ने कहा है, ‘‘सभी तथ्यों के आधार पर कथित आरोपी खालिद मुजाहिद तथा तारिक कासमी की दिनांक 22 दिसम्बर 2007 को सुबह छह बजकर 20 मिनट पर आपत्तिजनक वस्तुओं के साथ गिरफ्तारी संदेहजनक प्रतीत होती है और अभियोजन के साक्षी के बयानों पर पूर्ण रूप से विश्वास नहीं किया जा सकता।’’ स्पेशल टास्क फ़ोर्स ने दोनों मुस्लिम नवजवानों की गिरफ्तारी  22 दिसम्बर 2007 को बताई एवं उनके पास से जिलेटिन की 9 छड़ें , आरडीएक्स और तीन डेटोनेटर बरामद करने का दावा किया था | दूसरी ओर पुलिस के बयान पर सवालिया निशान लगाते हुए गिरफ्तार नवजवानों के परिजनों ने खालिद को 12 और तारिक को 16 दिसम्बर 2007  को गिरफ्तार करना बताया |
आयोग की इस रिपोर्ट के बाद राज्य पुलिस की एसटीएफ की कार्यप्रणाली पर गम्भीर सवाल खड़े हुए हैं। आयोग ने कासमी और मुजाहिद की गिरफ्तारी के दावे की सत्यता पर संदेह जाहिर करते हुए 14 महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं।
आयोग के सुझाव 
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आयोग ने रिपोर्ट में कई सुझाव भी दिये हैं। आयोग ने आतंकवादी घटना में पुलिस से अलग विभाग के किसी राजपत्रित स्तर के अधिकारी को बरामदगी का गवाह बनाने, आरोपियों से पूछताछ की वीडियो रिकार्डिंग करने, पुलिस की किसी दूसरी शाखा के राजपत्रित अधिकारी से ही जांच कराने तथा ऐसी घटनाओं के निस्तारण के लिये विशेष अदालतें गठित करने के सुझाव दिये हैं। आयोग ने आतंकवादी घटना से जुड़े मामलों का अधिकतम दो साल में निस्तारण की व्यवस्था करने तथा हर स्तर की कार्यवाही की समयसीमा तय करने, समय पर निस्तारण नहीं होने पर सम्बन्धित कर्मी के खिलाफ कार्यवाही करने, पीड़ित पक्षों को समुचित मुआवजे का प्रावधान करने, निर्दोष लोगों को झूठे आरोप लगाकर फंसाने पर दायित्व निर्धारित करके सजा दिये जाने का प्रावधान करने की भी संस्तुति की है। 
तारिक ने आयोग के समक्ष प्रस्तुत अपने शपथपत्र में आरोप लगाया है कि उसे आजमगढ़ जिले के शंकरपुर रानी की सराय चेकपोस्ट के पास टाटा सूमो सवार नौ-दस लोगों ने अगवा करके लखनऊ ले जाया गया , जहां उसे ‘थर्ड डिग्री’ की प्रताड़ना दी गयी और खुद को आतंकवादी बताने वाले बयान जबरन रटाये गये, जबर्दस्ती झूठे बयान दिलवाये गये तथा सादे कागज पर दस्तखत कराये गये। बाद में एसटीएफ ने उसकी तथा खालिद मुजाहिद की बाराबंकी रेलवे स्टेशन के पास से गिरफ्तारी का दावा कर दिया।
तारिक ने अपने शपथपत्र में तत्कालीन पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह, अपर पुलिस महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) बृजलाल और सीतापुर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अमिताभ यश का नाम भी बतौर षड्यंत्रकारी लिया है।
खालिद ने अपने शपथपत्र में आरोप लगाया कि वह 16 दिसम्बर 2007 को जौनपुर जिले के मड़ियाहूं स्थित उसके घर के नजदीक वाले बाजार में नील वापस करने गया था , तभी वहां पहुंची गाड़ी से निकले कुछ लोगों ने उसे जबरन अपने वाहन में लाद लिया और रास्ते में उसके हाथ-पैर बांध दिये। खालिद ने शपथपत्र में आरोप लगाया है कि उसे लखनऊ में किसी अज्ञात जगह पर रखा गया और निहायत अमानवीय प्रताड़नाएं दी गयीं। हालांकि, रिपोर्ट में किसी विशेष पुलिस अधिकारी को कठघरे में खड़ा नहीं किया गया है। 
आयोग ने कहा है कि 12 दिसम्बर 2007 को खालिद  को अगवा किये जाने के बाद और उसी साल 22 दिसम्बर को खालिद और तारिक की बाराबंकी से गिरफ्तारी के दावे से पहले के घटनाक्रम में एसटीएफ के अलावा अन्य पुलिस दल का शामिल होना प्रतीत होता है।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘लेकिन साक्ष्यों से यह स्पष्ट नहीं है कि कथित आरोपियों खालिद मुजाहिद और तारिक कासमी को जिन व्यक्तियों ने उठाया, निरुद्ध कर प्रताड़ित किया ,  वे किस दल के व्यक्ति थे और उन्होंने क्या-क्या किया। ऐसे में उन लोगों को चिह्नित करने के बाद ही उनका उत्तरदायित्व निर्धारित किया जा सकता है।’’ सरकार को चाहिए कि रिपोर्ट पर त्वरित कार्रवाई करके तारिक क़ासिमी को तत्काल रिहा करे , दोषियों की शिनाख्त करके उन्हें सज़ा दे और ऐसी घटना दुबारा न हो इसके लिए ठोस क़दम उठाया जाए |  

Sep 21, 2013

सांप्रदायिक दंगों पर कैसे पाएं काबू ?

सांप्रदायिक दंगों पर कैसे पाएं काबू ?
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हमारे देश में वोट की राजनीति के चलते अक्सर दंगे भड़काए जाते  रहे हैं | इसी राजनीति के तहत दंगों के वक्त प्रशासन को भी ढीला छोड़ दिया जाता है। उत्तर प्रदेश के जिन इलाकों में अभी दंगे हुए हैं, वहां जाट और मुस्लिम साथ साथ रहा करते थे और एक साथ ही मतदान भी किया करते थे। यह साफ हो चुकी है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव प्रशासन चलाने में नाकाम रहे हैं। 
सपा केवल एक बात की रट लगाये बैठी है कि इस पूरी घटना में भाजपा और अमित शाह का हाथ है यदि राजनीति की दृष्टि से देखा जाये तो कुछ भी असंभव नहीं है पर जब सरकार को ऐसे कोई संकेत मिल रहे थे तो उसने समय रहते भाजपा के उन दोषियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की और मामला बिगड़ता चला गया | सपा ने भाजपा के कसूरवार विधायकों को पकड़ा तक नहीं | पिछले 18 सितम्बर को भाजपा के आरोपी  विधायक सुरेश राणा, संगीत सोम , हुकुम सिंह और भारतेंदु सिंह लखनऊ स्थित विधानसभा से बाहर निकले और भाजपा दफ़्तर में चले गये | उमा भारती ने इनको यह कहकर संरक्षण दिया कि पुलिस में हिम्मत हो तो गिरफ्तार कर ले | ईंट से ईंट बजा दी जाएगी | पुलिस ख़ामोश तमाशाई बनी रही और ' क़ानून के निर्माता ' क़ानून को तोड़ते रहे | मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पुलिस की पक्षपाती नीतियों का रोना रोकर आख़िरकार चुप हो गए | यह घटना भी अखिलेश की प्रशासन पर ढीली पकड़ का सबूत है | कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक अखिलेश के अब तक कार्यकाल पर गहरा असंतोष प्रकट करते हैं | एक अध्ययन के अनुसार पिछले एक साल से प्रत्येक तीन दिनों में एक साम्प्रदायिक दंगा या तनाव का माहौल बनता है। अखिलेश यादव की छवि पिछले कई महीने  से बहुत ही खराब हो रही है और इसके कारण मुलायम सिंह यादव के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच गई हैं। वे लोकसभा चुनाव के बाद किंग नहीं, तो कम से कम किंगमेकर भी भूमिका में आना चाहते हैं और उसके लिए उत्तर प्रदेश में अधिक सीटों पर अपनी समाजवादी पार्टी को विजयी देखना चाहते हैं। जैसा कि प्रायः हर दंगे में होता आया है, दंगे शुरू होने के लिए एक छोटी सी घटना ही काफी होती है। मुजफ्फरनगर में भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक लड़की के साथ छेड़छाड़ हुई। इसके कारण छेड़छाड़ करने वालों से लड़की के रिश्ते के भाइयों का झगड़ा हुआ। उसमें वह युवक मारा गया। उस युवक के हितैषियों ने उन दोनों भाईयों को भी मार डाला । इसके बाद जो हिंसा और तनाव की तस्वीर उभरी , उससे निबट पाने में अखिलेश यादव पूरी तरह नाकाम साबित हुए | सच बात तो यह है कि यदि प्रशासन ने तत्परता के साथ कार्रवाई की होती, तो बात नहीं बिगड़ती। यदि तीनों युवकों के हत्यारों को पकड़ कर जेल में बंद कर दिया जाता, तो दंगे होते ही नहीं , लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया। उसने पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की और  कुछ आरोपियों को दोषमुक्त घोषित कर दिया। इस काम में पुलिस ने बहुत तेजी दिखाई। पुलिस कार्रवाई का आलम यह है कि उसने पंचायत में भड़काऊ भाषण देने के आरोप में उक्त चारों विधायकों समेत  पूर्व सांसद हरेन्द्र मलिक,सोहन वीर सिंह,पूर्व विधायक अशोक कंसल,पूर्व चेयरमैन कपिल देव अग्रवाल,साध्वी प्राची,श्याम पाल चेयरमैन ,पूर्व प्रमुख वीरेंद्र सिंह कुतुबपुर व भाजपा नेता उमेश मलिक  व सैंकड़ो अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया है । इन सभी के खिलाफ धारा 188,153 A,341,353 के तहत मामला दर्ज किया गया , लेकिन किसी भी उभरी हुई शख्सियत के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई | इसके बावजूद क़ानून - व्यवस्था की दुरुस्तगी की दुहाई दी जा रही है | यदि इनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाती तो हालात हरगिज़ न बिगड़ते | दूसरी ओर प्रशासन द्वारा बसपा सांसद कादिर राणा समेत विधायक मुरसलीन राणा, विधायक मौलाना जमील अहमद कासमी,पूर्व मंत्री सईदुज्ज़मा,सलमान सईद,सुल्तान मुशीर,मुसर्रफ ,असद जमा,नौशाद कुरैशी,अहसान कुरैशी , नूर सलीम राणा समेत लगभग 700 लोगो के खिलाफ धारा 188,153 A,341 IPC में मुकदमा दर्ज़ कराया गया और इनमें से बहुत सी लोगों और उभरी हुई शख्सियतों को गिरफ्तार किया गया |
इन दंगों के कारण कुछ पार्टियों को लाभ होगा, तो कुछ को नुकसान। यहाँ मुख्य रूप से पांच पार्टियों का वजूद है। ये हैं- समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल। इन दंगों का लाभ समाजवादी पार्टी और भाजपा को होता दिखाई देता है ,  जबकि नुकसान कांग्रेस, बसपा और रालोद को होता दिखाई देता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी अनेक लोकसभा सीटों पर 30 फ़ीसद  तक है। समाजवादी पार्टी को लग रहा है कि यदि मुस्लिम ध्रुवीकरण उसके पक्ष में हुआ, तो उसे भारी फायदा होगा और भाजपा को लग रहा है कि यदि उसके पक्ष में हिंदू मतों का ध्रुवीकरण हुआ, तो उसे बहुत लाभ होगा। भाजपा को उत्तर प्रदेश से एक समय 55 सीटें प्राप्त हो चुकी हैं । क़ानून को अपने हाथ में लेनेवाले इंसानियत से सबसे बड़े संहारकों में से एक नरेन्द्र मोदी अगुआई में वह अपने उस प्रदर्शन को दुहराना चाहती है। पिछले लोकसभा  चुनाव में कांग्रेस को यहाँ से अपनी आशा के  विपरीत 22 सीटें हासिल हो गई थीं, लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस एक बार फिर अपनी पुरानी स्थिति पर पहुंच गई। काग्रेस फिर 2009 को वहां दुहराना चाहती है। उसे लगता है कि भले विधानसभा चुनावों में लोगों ने उसे पसंद नहीं किया , लेकिन लोकसभा चुनाव में वे उसे सपा और बसपा से अधिक चाहेंगे | पूरे मामले का एक नया कोण भी है। वह है अजित सिंह का। जिन इलाकों में सांप्रदायिक दंगे हुए हैं, वह अजित सिंह का इलाका है। उस इलाके से अजित सिंह की पार्टी को 5 लोकसभा सीटें मिली हैं। विधानसभा की 9 सीटें भी उनके पास हैं । इस दंगे में मुसलमानों के साथ ही जाटों को भी नुकसान हुआ है , इसलिए वे कांग्रेस और अजित सिंह के साथ पहले जैसा नहीं रह पाएंगे | ऐसे में लगता है कि वे भाजपा के पक्ष में मतदान करेंगे | यदि ऐसा हुआ तो इस क्षेत्र का सामाजिक समीकरण बिगड़ना तय है | भाजपा समाज में शांति और सद्भावना की हमेशा से विरोधी रही है |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Sep 8, 2013

वह मैं ही था !


आज खून जो बहा , लाश जो गिरी वह मेरी ही तो थी ,
हम हिन्दू या मुसलमान का बहाना कब तलक बनाते ?
आज अर्ध रात्रि से थोड़ा  पहले जब सात सितम्बर 2013 जा रहा था , तभी आदरणीय प्रिय मित्र भाई अशोक चैतन्य जी की पोस्ट पढ़ी . मुजफ्फरनगर में जो खूनखराबा हुआ , उसके बारे में जानकर मेरी तो नींद ही उड़ गई ....  अत्यंत दुखद , निंदनीय .... उनकी पोस्ट पर कमेन्ट करने के बाद सोने की नाकाम कोशिश की ... उठ बैठा और अपनी भावनाओं को आप सब तक पहुँचाने के ये पंक्तियाँ टाइप कर रहा हूँ .... सोचता हूँ आख़िर कब तक चलेगा यह हिंसा का तांडव हमारे देश में ? .... इन असामाजिक तत्वों से समाज को कब पाक किया जा सकेगा ? चोरी और ऊपर से सीनाज़ोरी का दौर कब थमेगा ? .... जैसा कि विवरण में आया कि एक लड़की , जो मेरी बेटी / बहन की मानिंद है , उसे छेड़ने का विरोध करने पर एक भीड़ बुलाकर उसके दो सगों की पीट - पीटकर हत्या कर दी गई . यह क्रूरता, अराजकता और सामन्ती मानसिकता बताती है कि ऐसा करनेवाले इन्सान नहीं हो सकते .... ये हत्यारे हर - हाल में कड़े से कड़े दंड के भागी हैं , साथ ही ऐसी मानसिकता का उन्मूलन करना भी नितांत आवश्यक है .... देखा जाता है कि कौम , जाति और सम्प्रदाय के लोग खुली गलती पर भी अपनों के साथ कुकृत्य में शामिल हो जाते हैं और दूसरों का दमन करते हैं .... ज़ाहिर है , यह मानसिकता शांति विरोधी है , जिसका समूल नाश बहुत आवश्यक है . इस दिशा में पहली कोशिश यह होनी चाहिए कि समाज के शांतिप्रिय और प्रभावशाली लोग दोषियों को क़ानून के हवाले करें और शांति की बहाली में भरपूर सहयोग करें ....
         - DR . MUHAMMAD AHMAD