Nov 25, 2013

उ . प्र . में बेक़सूर मुसलमानों की रिहाई की संजीदा कोशिशें की जाएं

उ . प्र . में बेक़सूर मुसलमानों की रिहाई की संजीदा कोशिशें की जाएं
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सपा ने सत्ता में आने से पहले अपने चुनाव घोषणापत्र में कहा था कि उत्तर प्रदेश सरकार की बागडोर संभालते ही वह उन सभी मुसलमानों को रिहा कर देगी , जिन्हें आतंकवाद के झूठे आरोपों के तहत जेलों में क़ैद कर रखा गया है . ऐसे दर्जनों मुस्लिम नवजवान जेलों में बंद हैं . मुसलमानों के मतों के बलबूते सपा सत्ता में आ भी गयी , तब भी उससे यह वादा पूरा नहीं हो पा रहा है , जिसके कारण मुसलमानों में उसके प्रति क्षोभ एवं नाराज़गी का पैदा होना स्वाभाविक है . ऐसा नहीं है कि अखिलेश सरकार कुछ नहीं कर रही है , बल्कि वह दिखावे के तौर पर तारिक़ क़सिमी और खालिद मुजाहिद को रिहा करवाने के लिए बाराबंकी कोर्ट गयी , लेकिन बताया जाता है सरकार की ओर से इस मामले की बड़ी लचर पैरवी की गयी . लिहाज़ा कोर्ट हाल में अपनी सुनवाई के दौरान   वाराणसी, लखनऊ, फैजाबाद में ब्‍लास्‍ट के आरोपी तारिक कासमी और खालिद के ऊपर से मुकदमा वापस लेने की यूपी सरकार की याचिका को कोर्ट ने खारिज किया , जबकि सरकार चाहती तो निमेश आयोग का हवाला देकर इनकी रिहाई - प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकती थी . दरअसल उत्‍तर प्रदेश के प्रमुख सचिव न्‍याय विभाग की तरफ से बाराबंकी डीएम को भेजे गए पत्र में कहा गया था कि तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद के खिलाफ मामला न्‍याय के हिसाब उचित नहीं होगा, इसलिए इसे वापस लेने की अपील कोर्ट में की जाए . अपर जिला शासकीय अधिवक्‍ता की तरफ से बाराबंकी की स्‍पेशल सेशन जज (एससी, एसटी) कल्‍पना मिश्रा की कोर्ट में विगत दस मई को केस वापसी की अपील की गई, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि यह मामला गंभीर है. मामले में चार्जशीट हो चुकी है और ट्रायल अंतिम दौर में है, इसलिए इस समय मामले को वापस लेना जनहित और न्‍यायहित में उचित नहीं है . ट्रायल पूरा हो जाने पर अगर ये निर्दोष हैं तो अपने आप बरी हो जाएंगे . हमारे देश ट्रायल पूरा होने में कितना समय लगता सभी को मालूम है . किसी बेक़सूर को लंबे समय तक यातना देते रहना कहाँ का न्याय है और भरतीय लोकतंत्र क्या इसकी अनुमति देता है ? राज्य सरकार की अपील को खारिज किये जाने के आदेश पर रिहाई मंच की आजमगढ़ ईकाई ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये कहा है कि राज्य सरकार ने सही तथ्य अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं किये बल्कि तथ्यों को छिपाया और केवल कागजी खानापूरी करके मुसलमानों को गुमराह किया है . आजमगढ़ रिहाई मंच के संयोजक मसीहुद्दीन संजरी और तारिक शफीक ने कहा कि मुकदमा वापसी के नाम पर सरकार अदालत में जो नाटक कर रही है उससे पीड़ित परिवारों की भावनाओं को ठेस पहुँच रही है और जिस तरह आज़म खान और कुछ गैर जिम्मेदार उलेमा-मौलाना मुसलमानों को भ्रमित कर रहे हैं उसका जवाब 2014 में सपा को भुगतना पड़ेगा . उन्होंने कहा कि सपा के मुस्लिम विधायक जवाब दें कि वो किस आधार पर मुसलमानों से वादा खिलाफी करने वाली सपा सरकर के साथ हैं . एक तरफ सरकार गोरखपुर से मुकदमे वापसी की बात कर रही है तो दूसरी तरफ आजमगढ़ के मिर्जा शादाब बेग के घर की कुर्की करवा रही है। उन्होंने सवाल किया कि आज जब निमेष आयोग की रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि नीतिगत स्तर पर आईबी और एसटीएफ मुसलमानों को आतंकी वारदातों के आरोप में झूठा फँसाती हैं तो आखिर क्यों नहीं उस रिपोर्ट को सपा सार्वजनिक कर रही है .
आजमगढ़ रिहाई मंच ने कहा कि निमेष आयोग की रिपार्ट मिल जाने के बाद कानूनी रूप से सरकार का यह दायित्व था कि वह 31 मार्च 2013 तक उसे विधान सभा पटल पर रखती और उसमें उठाये गये सन्देह उत्पन्न करते प्रश्नों पर और गवाहों के बयानों के आधार पर अन्तर्गतधारा 173 (8) सीआरपीसी के तहत पूरक रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल करती जिसके आधार पर मुकदमा वापस लिया जाता। परन्तु सरकार ने ऐसा नहीं किया और अन्तर्गत धारा 321 प्रार्थनापत्र दिया जिसके साथ जिला अधिकारी ने अपना शपथ पत्र भी प्रस्तुत नहीं किया और कोई कारण भी मुकदमा वापस लेने का नहीं बताया। इससे साबित होता है कि राज्य सरकार इस पूरे मसले पर ईमानदार नहीं थी और उसने जान बूझ कर न्यायालय को ऐसे बहाने मुहैया कराये जो प्रार्थना पत्र खारिज होने का आधार बने .रिहाई मंच आजमगढ़ ने कहा कि आरडी निमेष आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि विवेचना अधिकारियों ने इन मुद्दों पर जाँच क्यों नहीं की और न ही पुलिस और अभियोजन के गवाहों ने कोई संतोष जनक उत्तर दिया। आयोग ने सवाल किया है कि -1. तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की पुलिस द्वारा 22 दिसम्बर 2007 से पहले ही अपनी गैरकानूनी हिरासत में लिये जाने की अखबारों में छपी खबरों का सत्यापन क्यों नहीं किया ? 2. अजहर अली द्वारा तारिक के अपहरण की रानी सराय थाने पर दिनांक 14 दिसम्बर 2007 को दर्ज करायी रिपोर्ट पर कार्यवाही क्यों नही की ? 3. तारिक की मोबाइल का लोकेशन क्यों नही पता लगाया ? 4. इसी प्रकार तारिक कासमी के अपहरण की रिपोर्टों की जाँच क्यों नहीं की गयी। 5. खालिद को उठाने की खबरें 13 एवं 17 तथा 20 दिसम्बर 2007 को अखबारों में छपीं जिनकी सत्यता का पता क्यों नही लगाया गया जबकि खालिद के चाचा ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को 16 दिसम्बर को ही फैक्स करके सूचित कर दिया था कि एसटीएफ के लोग खालिद को उठा ले गये हैं? मंच के नेताओं ने कहा कि यदि सरकार सचमुच तारिक और खालिद की रिहाई के लिये इमानदार होती तो वह धारा 173 (8) के तहत पुर्नविवेचना करवाती तो नतीजे में जो नये तथ्य व साक्ष्य सामने आते वे मुकदमा वापसी के उचित आधार बनते और दोषी पुलिसकर्मियों के विरूद्ध भी कार्यवाही होती, लेकिन सरकार ने अपने साम्प्रदायिक और अपराधी पुलिसकर्मियों को बचाने के लिये धारा 173 (8) के तहत कोई कार्यवाही नहीं की और धारा 321 के अन्तर्गत कमजोर आधारों पर प्रार्थनापत्र प्रस्तुत कर दिया जिसे खारिज होना ही था. उन्होंने कहा कि यह भी हैरानी की बात है कि माननीय न्यायालय द्वारा अध्यक्ष अधिवक्ता परिषद बाराबंकी तथा एक अन्य संस्था वाद हितकारी कल्याण समिति के प्रार्थनापत्रों की भी सुनवाई  की जो मुकदमा वापसी के प्रार्थनापत्र के विरूद्ध दिये गये थे . न्यायालय द्वारा बिना किसी उचित आधार के इन प्रार्थनापत्रों पर सुनवायी की गयी .  ये प्रार्थनापत्र कब और किस प्रकार रिकॉर्ड पर आये इसका भी पता नहीं चलता. प्रतीत होता है कि सरकारी वकील द्वारा चोर दरवाजे से इन्हें रिकॉर्ड पर लिया गया . तारिक और खालिद के वकीलों को किसी भी प्रार्थनापत्र की प्रति उपलब्ध नहीं करवायी गयी।मंच ने सपा सरकार और और उसके दाग मिटाने वाले मुस्लिम मन्त्रियों, उलेमा-मौलानाओं को नसीहत देते हुये कहा कि बेगुनाहों की रिहाई के सवाल पर सरकार साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कराने की राजनीति से बाज आये क्योंकि मुस्लिम बेगुनाहों की रिहाई का सवाल सिर्फ बेगुनाहों की रिहाई का नहीं बल्कि कि इन आतंकी वारदातों में मारे गये और घायल हुये लोगों के साथ न्याय का भी सवाल है, जो तब तक हल नहीं हो सकता जब तक इन वारदातों के असली दोषियों को पकड़ा नहीं जाता। ऐसे में सरकार शिगूफेबाजी छोड़ कर बेगुनाहों को फँसाने वालों पर कार्यवाई और आतंकी घटनाओं की उच्च स्तरीय जाँच को सुनिश्चित करे . सपा सरकार मुसलमानों की भावनाओं के साथ किस प्रकार खिलवाड़ करती है , रिहाई मंच  के वरिष्ठ नेता और इंडियन नेशनल लीग के राष्ट्रीय अध्यक्ष जनाब मुहम्मद सुलैमान  ने कहा कि प्रदेश के कैबिनेट मंत्री आजम खान द्वारा दिये गये इस बयान कि उनकी सरकार अपील के लिए हाई कोर्ट जाएगी और वहां भी फैसला पक्ष में नहीं आया तो फिर अल्लाह की अदालत की शरण में जायेगी को अगंभीर व मुसलमानों को भ्रमित करने वाला करार दिया है . उन्होंने कहा कि  सरकार अपना राज धर्म नही निभा रही है और उसे आजम खान जैसे लोग मुसलमानों को अल्लाह का वास्ता देकर सरकार को क्लीन चिट देने का वही काम कर रहे हैं जैसा कि उन्होंने कोसी कला दंगे समेत इस सरकार  के कार्यकाल में  हुये 27 बड़े दंगों मे सरकार को क्लीनचिट देकर करते आए हैं  .उन्होंने कहा कि सरकार का राजधर्म यह था कि वे कचहरी धमाकों के आरोप में फंसाए गए तारिक और खालिद की बेगुनाही के सबूत निमेष आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार करके उसे विधानसभा में प्रस्तुत करती और उसके आधार पर दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्यवाही करती जिन्होने तारिक और खालिद का झूठाअभियोजन किया है . सरकार का यह दायित्व था कि वह निमेष आयोग रिपोर्ट के आधार पर स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराकर अदालत के सामने पूरक रिपोर्ट अंतर्गत धारा 173(8) दाखिल कराकर तारिक और खालिद को रिहा करने कीप्रार्थना करती , परन्तु सरकार ने निमेष आयोग की रिपोर्ट को छिपाते हुए और मुसलमानों को गुमराह करते हुए अदालत में अंतर्गत धारा 321 प्रार्थनापत्र प्रस्तुत किया जिसे अदालत को खारिज करना ही था क्योंकि  मुकदमा वापस लेने का कोई मजबूत कारण सरकार ने अदालत को नहीं बताया और न ही जिलाधिकारी द्वारा शपथपत्र प्रस्तुत  किया गया  . रिहाईमंच के महासचिव और पूर्व पुलिस महानिरीक्षक श्री एस आर दारापुरी नेकहा कि जब सरकार द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत किया गया प्रार्थनापत्र ही अधूरा और दोषपूर्ण है तो उस पर पारित आदेश के विरूद्ध अपील भी कमजोर और निरर्थक होगी। उन्हांेने  कहा कि आतंकवाद जैसे गंभीर आरोपों के मुकदमेंमें सरकार द्वारा मुकदमा वापसी का फैसला औचित्यपूर्ण और मजबूत आधार पर होना चाहिए जो कि निमेष आयोग की रिपोर्ट वह सभी तथ्य और साक्ष्य सरकार को उपलबध कराती है जिनके आधार पर मुकदमा वापसी का फैसला जनहित, मानवाधिकार और सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए लाभकारी प्रमाणित होता है . क्योंकि निमेष आयोग की रिपोर्ट यह प्रमाणित करती है कि किस प्रकार एजेंसियां एक विशेष वर्ग के निर्दोष युवकों को आतंकवाद के नाम पर झूठा फंसा रही है। इन हालात में जो सरकार निमेष आयोग की रिपोर्ट पर अमल नहीं कर रही उसे कैसे ईमानदार और राजधर्म का पालन करने वाली सरकार कहा जा सकता है . रिहाई मंच के नेताओं ने कहा कि आजम खां को याद होना चाहिए कि वे बूढ़े और कमजोर लोग जो आतंकवाद के मामलों में झूठे फंसाए गये हैं, किस प्रकार काअमानवीय, यातनापूर्ण और बीमार अवस्था में जेलों के अंदर जी रहे हैं . उत्तर प्रदेश में 254 बेक़सूर मुसलमान विभिन्न जेलों में क़ैद हैं .
- DR . MUHAMMAD AHMAD

Nov 15, 2013

वह सुबह न जाने कब आएगी ?

वह सुबह न जाने कब आएगी, जब दंगों की आग पर रोटियां न सेंकी जाएँगी

- डॉ मुहम्मद अहमद
मुजफ़्फ़रनगर की साम्प्रदायिक हिंसा, शासन, सेना, कर्फ्यू, महापंचायत, दलगत दांव, चुनाव ... सबकी चर्चा हो रही है। लेकिन जहाँ से खून का फव्वारा उठा, उस सिरे की बात मानो भुला दी गई है। एक सम्प्रदाय के लड़के ने दूसरे समुदाय की लड़की से छेड़खानी की, भाइयों का 'स्वाभिमान' भड़का, लड़के को जाकर मारा, लड़के के सम्प्रदाय ने दोनों भाइयों को मार दिया। और देखते-देखते दोनों समुदायों के कुछ लोग  तलवारें-कट्टे तानकर एक-दूसरे की घात में जुट गए। चालीस से ऊपर जानें जा चुकी हैं। कई लोग लापता हैं | कई दर्जन लोग घायल हैं इन पंक्तियों के लिखने तक इलाक़े में तनाव बना हुआ है | तीन सौ से अधिक लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं | पुलिस ने भाजपा के चार विधायकों समेत क़रीब पचास लोगों पर केस दर्ज किया है |पिछले कई दिनों से कई इलाक़ों में कर्फ्यू और सेना का फ्लैग मार्च जारी है |
 छेड़खानी और 'स्वाभिमान' की हिंसा तो एक ही सम्प्रदाय के दो गुटों में भी हो सकती थी। देश में ऐसा कई बार हुआ है। छेड़खानी, प्रेम या विवाह की प्रतिक्रिया में जान पर हमला करने की घटनाओं ने बार - बार देश और समाज का अमन - चैन छीना है |जिन क्षेत्रों में साम्प्रदायिक हिंसा की वारदातें हुईं , वे पहले से ही ' आनर किलिंग ' क्षेत्र रहे हैं ! यहाँ ' स्वाभिमान ' की भावना इतनी हावी और बलवती होती रही है कि अक्सर जान लेकर ही कुछ समय के लिए खामोश होती है | इस बार भी 27 अगस्त की घटना के बाद ख़ामोशी हो गई थी | मगर कुछ सांम्प्रदायिक तत्वों को यह मंज़ूर नहीं था | वोटों की सियासत का भी चक्कर चल गया , जिसने माहौल को इतना बिगाड़ दिया कि सांम्प्रदायिक हिंसा की आग गांवों तक जा पहुंची और ज़ाहिर है कवाल गाँव की मामूली - सी घटना का रूप और दायरा काफ़ी बढ़ गया | सांम्प्रदायिक तत्व मैदान में आ गए और दोषियों के खिलाफ़ कड़ी कार्रवाई की मांग के बहाने अपने स्वार्थ की रोटी सेंकने लगे एक अख़बार में इस आशय की खबर छपी कि पुलिस द्वारा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई न किए जाने से क्षुब्ध इलाके के लोगों ने प्रशासन को चेतावनी देने के बाद सात विगत सितम्बर को नंगला मंदौड़ में महापंचायत आयोजित की थी। पंचायत में जा रहे लोगों पर बसी गांव के लोगों ने पथराव और फायरिंग कर दी। हमले में आधा दर्जन से अधिक लोग घायल हो गए।जैसे ही घायल लोग महापंचायत स्थल पर पहुंचे तो भीड़ में आक्रोश फैल गया। पंचायत स्थल से थोड़ी दूरी पर मिले एक युवक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई।
इसकी सूचना शहर में पहुंची तो शहर के मीनाक्षी चौक, अबूपुरा, किदवईनगर, कृष्णापुरी, खादरवाला, शेरनगर समेत कई स्थानों पर दोनों समुदाय के लोगों में आमने-सामने आ गए और घंटों पथराव और फायरिंग हुई। अबूपुरा में कवरेज करने पहुंचे टीवी चैनल के पत्रकार राजेश वर्मा की गोली लगने से मौत हो गई। इसी दौरान पुलिस द्वारा नियुक्त फोटोग्राफर इसरार को भी मार डाला गया। जौली गंगनहर व मीरापुर के मुझेड़ा के पास भी जमकर फायरिंग और पथराव हुआ।यहां पर चार लोगों की मौत हो गई। जनपद के हालत बिगड़ते देख पुलिस प्रशासन ने शाम पांच बजे शहर में क‌र्फ्यू घोषित कर दिया और बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया , लेकिन इससे हालात नियंत्रित नहीं हुए।   पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक (क़ानून व्यवस्था) राजकुमार विश्वकर्मा भी पिछले दिनों स्वयं मुज़फ़्फ़रनगर में मौजूद थे | उनके अनुसार ''हमारी पूरी कोशिश है कि सांप्रदायिक सौहार्द बना रहे. एक घटना हुई थी जो कि पूर्व नियोजित नहीं थी. इसकी प्रतिक्रिया में हुई घटना के बाद जो नफ़रत की भावनाएं पैदा हुईं वे नहीं होनी चाहिए थीं.''
कस्बे जानसठ से करीब तीन किलोमीटर दूर बसे कवाल गाँव की क़रीब पंद्रह हज़ार की आबादी में हिंदू और मुसलमान लगभग बराबर की तादाद में हैं | यहाँ कई जातियों के हिंदू और मुसलमान हमेशा से मिलजुलकर रहते आए हैं. लेकिन अब कवाल गाँव में सन्नाटा पसरा था और बहुत कम ही लोग नज़र आ रहे थे | सेवानिवृत्त शिक्षक जबर सिंह ने अपना पूरा जीवन यहीं बिताया है | वे मानते हैं कि इस इलाक़े में इतने बुरे हालात कभी नहीं रहे |
हकीक़त यह भी है कि अफ़वाहों और सोशल मीडिया ने स्थिति को काफ़ी बिगाड़ा एक युवक ने अपने सस्ते चाइनीज़ मोबाइल पर एक फर्ज़ी वीडियो दिखाते हुए कहा कि देखिए कितनी बेरहमी से दोनों युवकों को मारा गया है | सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फ़ेसबुक के ज़रिए शेयर किया गया | यह वीडियो लोगों के मोबाइल में पहुँच गया और इसे शेयर किया जाने लगा | पुलिस जाँच में फ़र्ज़ी पाए गए इस वीडियो को शेयर करने के लिए एक भाजपा विधायक सहित कई लोगों पर मामला दर्ज किया गया है |
इस हिंसा के सबसे अधिक शिकार मुसलमान ही हुए हैं | क़रीब दस हज़ार लोगों की अपना घर - बार छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा | कवाल गाँव की मस्जिद के इमाम क़ारी मुहम्मद औसाफ़ क़ासिमी ने आरोप लगाया कि युवकों का अंतिम संस्कार करके लौट रही भीड़ ने 28 अगस्त को धार्मिक स्थलों और घरों में तोड़फोड़ की
ख़ौफ़ में आए मुसलमान अपना घर-बार छोड़कर जा चुके हैं और अब तक नहीं लौटे हैं | पुलिस ने इस हिंसा के मामले में गाँव के पूर्व प्रधान को गिरफ़्तार भी किया है | अपना पूरा जीवन कवाल गाँव में ही बिताने वाले 72 साल के निसार अहमद ने भी पहली बार अपने गाँव में इस तरह का तनाव देखा है | वे कहते हैं, ''दो लोगों के बीच की इस निजी लड़ाई को बाहरी लोगों के कारण सांप्रदायिक रूप दे दिया गया | युवकों के अंतिम संस्कार के बाद भीड़ शांतिपूर्वक तरीक़े से गुज़र रही थी ,लेकिन कुछ लोगों ने तोड़फोड़ शुरू कर दी | वे मेरे घर की खिड़की तोड़ रहे थे तब हिंदू समाज के लोगों ने ही उन्हें रोका |''
 एक मृतक युवक  गौरव के पिता रवीन्द्र सिंह ने भर्राई आवाज़ में कहा, ''हमारा आम आवाम से कोई झगड़ा नहीं है, हम नहीं चाहते की ख़ूनख़राबा हो या कोई नाहक़ मारा जाए | हमारे बच्चों की लाशें पड़ी थी और हम लोगों से ग़ुस्से पर क़ाबू करने की अपील कर रहे थे | हमने कहा कि जो हमारे साथ होना था हो गया |हमारे जो बच्चे मर गए वे मर गए, अब कहीं और किसी बेगुनाह को मारने-मरवाने से क्या होगा ? शांति में ही सबका फ़ायदा है|'' वह सुबह न जाने कब आएगी, जब दंगों की आग पर रोटियां न सेंकी जाएंगी |
यह भी बड़ी सच्चाई है कि उत्तर प्रदेश सरकार से इस गंभीर स्थिति को संभालने में चूक हुई | बक़ौल केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील शिंदे , उन्होंने शुरू में ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को हालात की संगीनी से अवगत करा दिया था | इस पर श्री यादव ने कहा कि इसे संभाल लूँगा | उनसे बड़ी चूक हुई | राज्यपाल बी . एल . जोशी ने केंद्र को भेजी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि राज्य सरकार ने दंगों को रोकने के लिए सही वक्त पर कदम नहीं उठाया। प्रशासनिक नाकामी के चलते भी दंगा भड़का और इतने लोगों की जान गई। सही वक्त पर कार्रवाई होती तो दंगों पर काबू पाया जा सकता था। हालात इतने बेकाबू होना अफसोसजनक है |वास्तव में यह दंगा मुसलमानों के किसी बड़ी त्रासदी से कम नहीं है | जमाअत इस्लामी हिन्द के महासचिव जनाब नुसरत अली ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर ज़िले में सांप्रदायिक सूरतेहाल पर चिंता प्रकट करते हुए वहां की घटनाओं की निंदा की है और इनके लिए राज्य सरकार की प्रशासनिक  मशीनरी को ज़िम्मेदार ठहराया है | उन्होंने कहा कि इस इलाक़े में पिछले क़रीब एक साल से अप्रिय घटनाएं घटित हो रही थीं , बुराई फैलानेवाले सरगर्म थे और अफवाहों का बाज़ार गर्म था , अंततः इसके नतीजे भयानक सांप्रदायिक हिंसा के रूप में सामने आए |
 महासचिव महोदय ने एक वक्तव्य में सेना की तैनाती के कारण स्थिति जल्द सामान्य होने की आशा व्यक्त करते हुए कहा कि सपा की सरकार के दो साल से भी कम अरसे में उत्तर प्रदेश में लगभग पचास छोटी - बड़ी सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं घट चुकी हैं , इसका जवाब राज्य सरकार को देना चाहिए | उन्होंने प्रभावित इलाक़ों के संभ्रांत और ज़िम्मेदार लोगों से अपील की कि स्थिति को सामान्य बनाने के लिए मिल - जुलकर काम करें कई मुस्लिम संगठनों और शख्सियतों ने हिंसा की इन घटनाओं की निंदा की है | जमीअत उलेमा - ए हिन्द के महासचिव मौलाना महमूद मदनी , जमाअत इस्लामी हिन्द के महासचिव जनाब नुसरत अली , आल इंडिया मुस्लिम मजलिस - ए मुशावरत के अध्यक्ष डॉ . जफरुल इस्लाम खान , वेलफ़ेयर पार्टी आफ़ इंडिया के महासचिव जनाब कासिम रसूल इलियास और मिल्ली पालिटिकल कौंसिल आफ़ इंडिया के अध्यक्ष जनाब तस्लीम रहमानी ने गत 11 सितम्बर को नई दिल्ली में एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में मुजफ्फरनगर में हालात पर काबू पाने में अखिलेश यादव सरकार पर लापरवाही और शिथिलता का आरोप लगाया एवं राज्य में राष्ट्रपति शासन लागु करने की मांग की

इल्म और साइंस के मैदान में आगे बढ़ें मुसलमान

इल्म और साइंस के मैदान में आगे बढ़ें मुसलमान

केन्द्रीय अल्पसंख्यक कार्यमंत्री के . रहमान खान अभी हाल में यह दावा किया था कि सच्चर कमेटी की 67 सिफ़ारिशें लागू हो चुकी हैं और सिर्फ़ तीन पर ही क्रियान्वयन बाक़ी रह गया है | इस दावे के बावजूद हकीक़त यह है कि देश के कई राज्यों में मुस्लिम साक्षरता दर बहुत कम है | मानव संसाधन विकास मंत्रालय के ताज़ा आंकड़ों ने यह बात बताई है कि उत्तर प्रदेश , बिहार , पंजाब , पश्चिम बंगाल , दिल्ली और असम में मुस्लिम साक्षरता की दर काफ़ी कम है | देश की लगभग आधी मुस्लिम आबादी इन्हीं प्रदेशों में बसती है , फिर भी यहाँ मुस्लिम साक्षरता राज्य की औसत दर से काफ़ी कम है | आंकड़ों के मुताबिक़ , बिहार की कुल साक्षरता दर 61 . 80 की तुलना में मुस्लिम साक्षरता दर 36 प्रतिशत एवं उत्तर प्रदेश की कुल साक्षरता दर 67 प्रतिशत की तुलना में मुस्लिम साक्षरता दर 37 . 28 प्रतिशत है | इसी प्रकार दिल्ली में कुल साक्षरता 81 . 7 फ़ीसद की तुलना में मुस्लिम साक्षरता 66 . 6 फ़ीसद , पश्चिम बंगाल की कुल साक्षरता दर 69 फ़ीसद की तुलना में मुस्लिम साक्षरता दर 59 फ़ीसद और असम में 72 फ़ीसद साक्षरता दर की तुलना में मुस्लिम साक्षरता दर 48 .4 फ़ीसद है | सच्चर कमेटी रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में मुस्लिम आबादी के 62.2 प्रतिशत के पास कोई जमीन नहीं है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 43 प्रतिशत है। यहां तक कि शहरी इलाकों में 60 प्रतिशत मुस्लिम स्कूलों का मुंह नहीं देख पाते हैं, और ग्रामीण अंचलों में केवल 0.8 प्रतिशत और शहरों में 3.1 प्रतिशत ही स्नातक हैं। शिक्षा और रोजगार में उनकी स्थिति अन्य समुदायों कि तुलना में कमतर है। ग्रामीण इलाकों में गरीबी रेखा से नीचे के 94.9 प्रतिशत मुस्लिम परिवारों को मुफ्त राशन नहीं मिलता है, केवल 3.2 प्रतिशत को ही सब्सिडी वाला लोन मिलता है और मात्र 1.9 प्रतिशत ही सरकारी अनुदान वाले खाद्य कार्यक्रमों से लाभान्वित होते हैं। कमेटी ने जांच में पाया है कि शिक्षा और रोजगार में मुस्लिमों की स्थिति अन्य समुदायों की तुलना में पिछड़ती जा रही है।
2001 की जनगणना के अनुसार मुस्लिमों की आबादी 13.43 प्रतिशत है, लेकिन उनका प्रतिनिधित्व भारतीय प्रशासनिक सेवा में 3 प्रतिशत, भारतीय विदेश सेवा में 1.8 प्रतिशत और भारतीय पुलिस सेवा में 4 प्रतिशत ही है। एक औसत मुस्लिम पुरूष और महिला दूसरे धर्मों के पुरूष और महिला के मुकाबले शिक्षा के मामले में बहुत पीछे है यह स्थिति देश के लगभग सभी राज्यों में है। शहरी मुसलमानों में साक्षरता की दर बाकी शहरी आबादी के मुकाबले 19 प्रतिशत कम है। सन् 2001 में भारत के कुल 7.1 करोड़ मुस्लिम पुरूषों में सिर्फ 55 फीसदी ही साक्षर थे जबकि 46.1 करोड़ गैर मुस्लिमों में यह आंकड़ा 64.5 फीसदी या दूसरी तरफ देश की 6.7 करोड़ मुस्लिम महिलाओं में केवल 41 फीसदी महिलाएं साक्षर थी . जबकि 43 करोड़ गैर मुस्लिम महिलाओं में 46 फीसदी महिलाएं साक्षर थी। स्कूलों में मुसलमान लड़कियों की संख्या अनुसूचित जाति एवं जनजातियों की तुलना में तीन प्रतिशत कम थी। 101 मुस्लिम महिलाओं में से केवल एक मुस्लिम महिला स्नातक है, जबकि 37 गैर-मुस्लिमों में से एक महिला स्नातक है। देश के हाईस्कूल स्तर पर मुसलमानों की उपस्थिति केवल 7.2 प्रतिशत है। गैर मुस्लिमों के मुकाबले 44 प्रतिशत कम मुस्लिम विद्यार्थी सीनियर स्कूल में पढ़ाई कर पाते हैं जबकि महाविद्यालयों में इनका अनुपात 6.5 प्रतिशत है। स्नातक की डिग्री प्राप्त करने वाले मुसलमानों में केवल 16 प्रतिशत ही स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल कर पाते हैं। इस तरह, रिपोर्ट ने मुस्लिम समुदाय के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन को साफ तौर पर सामने लाकर रख दिया है। सच्चर कमेटी  एवं रंगनाथ मिश्र आयोग की अनुशसाओं ने मुस्लिम समुदाय की अवस्था को स्पष्ट तौर पर उजागर करते हुए बेहतरी के लिए काफी संतुलित एवं प्रभावशाली पहल का रास्ता प्रशस्त किया है ।
   एक अध्ययन रिपोर्ट में यह बात भी  सामने आई  है कि मुस्लिम समाज में यह सोच बनी हुई है कि मुस्लिम लड़कियों को युवावस्था से पहले तक ही पढ़ाई करनी चाहिए। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा मुस्लिम महिलाओं की शैक्षणिक प्रगति की योजना तैयार करने के उद्देश्य से बनाई गई इस रिपोर्ट में बताया गया है कि मुस्लिम लड़कियों का उच्च शिक्षा से दूर रहने के सबसे सामान्य कारण उनकी युवावस्था, महिला टीचर की कमी, लड़कियों के लिए अलग स्कूल न होना , धर्मनिरपेक्ष शिक्षा और  जल्दी शादी होना है । अध्ययन के मुताबिक, स्कूल न जाने वाले 6 से 13 साल के मुस्लिम बच्चों के समूह में 45 फीसदी लड़कियां हैं। राजस्थान, झारखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार और उड़ीसा में मुस्लिम लड़कियों की साक्षरता का स्तर सबसे खराब है। दक्षिणी राज्यों में स्थिति कुछ बेहतर है।  इसकी एक बड़ी वजह वहां समाज सुधार आंदोलन तथा तकनीकी और व्यावसायिक शैक्षणिक संस्थानों का अधिक होना है। यह  भी कहा जाता है कि मुस्लिम लड़कियों के उच्च शिक्षित न होने की एक अहम वजह मुस्लिम समाज की यह सोच भी है कि अधिक पढ़ी-लिखी लड़की को योग्य वर नहीं मिलेगा। गरीबी और सरकारी नौकरी के प्रति अलग सोच की वजह से गिने-चुने मुस्लिम लड़के की उच्च शिक्षा प्राप्त करते है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार , देश में मुस्लिम लडकियों की शिक्षा दर भी संतोषजनक नहीं है | केवल महाराष्ट्र , आंध्रप्रदेश , मध्यप्रदेश , कर्नाटक , तमिलनाडु और गुजरात ऐसे राज्य हैं , जहाँ मुस्लिम साक्षरता दर राज्य की कुल साक्षरता दर की तुलना में अधिक है | जनगणना के आंकड़ों के अनुसार , देश की कुल जनसंख्या का 13 .43 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है | दिल्ली में 11 .7 प्रतिशत , झारखंड में 13 . 8 , कर्नाटक में 12 .2 , उत्तर प्रदेश में  18 . 5 और बिहार में 16 . 5 प्रतिशत मुस्लिम आबादी  है | 2009  के एक सरकारी आंकड़े के अनुसार , मुस्लिम समुदाय के 18 . 75 बच्चे - बच्चियां स्कूली शिक्षा के दायरे से बाहर थीं |

केवल भारत ही नहीं , पूरी दुनिया में मुस्लिम - शिक्षा की स्थिति एवं  सूरतेहाल इत्मीनानबख्श नहीं है | विश्व बैंक के  कुछ समय पहले के एक सर्वे में , जो   उत्‍तरी अफ्रीका और मध्‍य पूर्वी देशो पर आधारित था  , बताया गया है कि अरब दुनिया में दूसरे देशों के मुकाबले में शिक्षा का स्‍तर गिरता जा रहा है और इसके लिये तुरंत क़दम उठाने  की जरूरत है , ताकि बेरोज़गारी की समस्‍या पर काबू पाया जा सके। रिपोर्ट कहती है कि अरब दुनिया में 14 प्रतिशत औसतन बेरोज़गारी है, जो कि दुनिया के दूसरे देशो से काफ़ी अधिक है, सिवाय अफ़्रीका के कुछ सहारा प्रक्षेत्र के । फिलिस्‍तीनी इलाके में सबसे ज्‍यादा बेरोजगारी है , जो लगभग 24 प्रतिशत है | अध्ययन में कहा गया है कि फ़िलिस्तीनी क्षेत्र में नवजवानों की जनसंख्‍या बहुत अधिक है।  60 प्रतिशत इलाके में 30 साल से कम उम्र के नवजवान हैं | एक अनुमान के अनुसार बेरोज़गारी की भयावहता से बचने के लिए अगले 10 से 19 सालों मे बढाने की ज़रूरत पडेगी । ट्यूनीसिया की एक संस्‍था ‘अरब लीग एजूकेशनल  कल्‍चरल एण्‍ड साइंटिफिक आर्गनाइजे़शन’ के मुताबिक, अरब दुनिया ने 300 मिलियन (30 करोड) लोगों में 30 प्रतिशत निरक्षर हैं। अतः मुस्लिम दुनिया  विज्ञान और तकनीक के मामले में बहुत पीछे है । रिपोर्ट में यह बात भी बताई गई है कि इन क्षेत्रों की सरकारें शिक्षा - प्रसार की दिशा में बहुत उदासीन रही हैं | यहाँ पिछले चालीस वर्षों में जीडीपी मात्र  पांच प्रतिशत ही अर्जित हो पाई है | इतनी लंबी अवधि में सरकारी बजट का केवल बीस प्रतिशत शिक्षा पर खर्च किया गया है | यह भी सच है कि खाडी के देशों और मिस्र में उल्लेखनीय विकास हुआ है | यहाँ बहुत से बच्‍चो़ं ने अनिवार्य शिक्षा से फायदा उठाया है और उन्‍हें अपनी अनिवार्य शिक्षा को जारी रखने का मौका मिला। वहीं यह भी सच है कि इस इलाके ने आमतौर से अपने संसाधनों का अच्छा  इस्‍तेमाल नहीं किया। स्नातकों में भी बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है | परिवारवादी सरकारें सिर्फ़ अपने पर ही ध्यान दे रही हैं | सउदी अरब का शाही खानदान शापिंग और पारिवारिक विदेश यात्राओं पर हर साल लाखों डालर खर्च करता है । मिस्र का हुस्‍नी मुबारक अपने लोगों से ज्‍़यादा अपने महलों पर खर्च करता था , जबकि जॉर्डन ने ऊर्जा के उत्‍पादन पर अपने लोगों की खुशहाली से ज्‍़यादा खर्च करता है। सारी दुनिया के मुसलमानों को चाहिए कि दीन की शिक्षा के साथ ही आधुनिक विषयों की शिक्षा प्राप्त करें और साइंस एवं टेक्नालोजी के विकास में पर्याप्त योगदान करें |

 - डॉ . मुहम्मद अहमद 

भ्रष्टाचार से कंगाल होता हमारा देश

लोगों में सही ईशभक्ति और ईशभय पैदा किया जाए

भ्रष्टाचार से कंगाल होता हमारा देश

नेशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड [ NSEL ] में घोटाले की खबर अभी आई ही थी कि कोयला ब्लाक आवंटन से जुड़ी फाइलों के गायब होने का नया मामला सामने आ गया | एन एस ई एल के घोटाले से भी सेंसेक्स टूटा , कमज़ोर रुपये ने इसे और बढ़ावा दिया |सरकार ने दोनों जगह लीपापोती की | इन घोटालेबाजों को गिरफ़्त में लाने के लिए आमादा नहीं दिखी | एन एस ई एल में क़रीब चौदह हज़ार निवेशकों के लगभग 56 00 करोड़ रुपये फंसे हुए हैं , जिनमें से   5574 . 31 करोड़ रुपये लौटाने की बात चल रही है | राज्यसभा में पिछले दिनों भाजपा सांसद प्रकाश जावड़ेकर ने इसे नया घोटाला बताते हुए एन एस ई एल पर आरोप लगाया कि उसके एक केन्द्रीय मंत्री के साथ नज़दीकी संबंध हैं | कई निवेशकों ने खाद्य राज्य मंत्री प्रो . के . वी . थामस से मुलाक़ात कर इस संकट को हल करने के लिए विशेषज्ञों की समिति बनाने की मांग की है | एन एस ई एल ने अपना कारोबार रोक दिया है | इस मसले को हल करने के लिए दूर संचार मंत्री मुरली देवड़ा ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है | दूसरी ओर '' कोलगेट '' पर 20 अगस्त को भाजपा ने दोनों ही सदनों में हंगामा और नारेबाजी की एवं प्रधानमंत्री  डॉ . मनमोहन सिंह से बयान की मांग की इससे दोनों सदनों की कार्यवाही कई बार बाधित हुई। लोकसभा और राज्यसभा दोनों की ही बैठक चार-चार स्थगनों के बाद आखिरकार पूरे दिन के लिए स्थगित करनी पड़ी।  राज्यसभा में कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा कि सीबीआई को दिए जाने वाले दस्तावेजों का पता लगाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी जाएगी। उत्तेजित विपक्ष को चुप करने के फेर में वे यहां तक कह गए कि अगर इस मामले में वे दोषी पाए जाते हैं तो कोई भी दंड स्वीकारने को तैयार हैं। यह मुद्दा लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने उठाया। उन्होंने सरकार को याद दिलाया कि प्रधानमंत्री ने पिछले साल 27 अगस्त को सदन में दिए बयान में कोयला मंत्रालय के फैसलों के लिए पूरी जिम्मेदारी ली थी। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल में ही आदेश दिया था कि कोई भी सूचना या सरकारी फाइलें और रिकार्ड बिना किसी देरी के संबद्ध व्यक्ति की ओर से सीबीआई को मुहैया कराया जाए और वह संबद्ध व्यक्ति प्रधानमंत्री हैं। भाजपा सदस्यों के ‘शेम शेम’ और ‘प्रधानमंत्री जवाब दो’  के नारों के बीच सुषमा ने कहा कि गायब फाइलों में कोयला ब्लाकों के लिए आवेदन की फाइलें भी शामिल हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ये फाइलें इसलिए गायब हो गईं क्योंकि कांग्रेस के कुछ बडे नाम इसमें शामिल थे।

सुषमा स्वराज चाहती थीं कि लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार प्रधानमंत्री को सदन में आकर बयान देने का निर्देश दें।उधर राज्यसभा में भी इसी मुद्दे पर जम कर हंगामा हुआ। हालांकि कोयला मंत्री जायसवाल ने इस बारे में बयान देते हुए कहा कि गायब फाइलों के मुद्दे पर विचार के लिए एक समिति का गठन किया गया है और उसकी दो बैठकें हो चुकी हैं। उन्होंने कहा- मैं सदन को आश्वस्त करना चाहता हूं कि मेरा मंत्रालय सीबीआइ की ओर से मांगे गए दस्तावेजों का पता लगाने और उन्हें मुहैया कराने में कोई कसर बाकी नहीं छोडेगा। जायसवाल के बयान से भाजपा सदस्य संतुष्ट नहीं हुए।  विपक्ष के नेता  अरुण जेटली ने सवाल किया कि क्या गायब फाइलों को लेकर कोयला मंत्रालय ने कोई प्राथमिकी दर्ज कराई है ?हकीकत यह है कि इस मामले की कोई प्राथमिकी नहीं दर्ज करायी गई है|     2006 से 2009 के बीच जब कोयला ब्लाकों का आबंटन हुआ था, तब कोयला मंत्रालय का प्रभार प्रधानमंत्री के ही पास था। फ़ाइलें जो गायब हैं , वे 1993 से 2004  के बीच की हैं  | इस अवधि में खदान आवंटन के लिए जिन कम्पनियों ने आवेदन किया था , कोयला मंत्री के अनुसार , उनमें से 8 - 10 या इससे अधिक फ़ाइलें गायब को गई हैं | अंग्रेजी अखबार '' मेल टुडे '' ने सीबीआई के सूत्रों ने दावा किया है कि कोयला घोटाले से जुड़ी जो फाइलें गायब हैं, वो कांग्रेस से जुड़े लोगों से संबंधित हैं। इनमें कांग्रेस सांसद विजय दर्डा की कम्पनी की फ़ाइल भी शामिल है | दर्डा ने बांदेर कोल ब्लाक के लिए सिफ़ारिश की थी , जिसे पी एम ओ आफ़िस ने आगे बढ़ाया था | इस अख़बार के मुताबिक़ ,कोयला घोटाले में 11 कंपनियों को कोल ब्लॉक आवंटन से जुड़ी फाइलें गुम हो चुकी हैं। इन 11 कंपनियों के निदेशकों के नाम एफआईआर में भी है और सीबीआई सूत्रों की मानें तो ये सभी आवंटन यूपीए सरकार ने किए थे। अगर ये फाइलें नहीं मिलती हैं तो सीबीआई का केस कमजोर पड़ जाएगा। अखबार से बातचीत में सीबीआई प्रमुख रंजीत सिन्हा ने कहा है कि फाइलों के गायब होने से इस केस की जांच को झटका लगेगा।एक अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर '' इकोनॉमिक टाइम्स '' को बताया, 'हम इस बात की जांच करने को तैयार हैं कि फाइलें आखिर कैसे गायब हो गईं। ये सभी अहम फाइलें हैं। इनके बिना हम अपनी जांच नहीं पूरी कर पाएंगे।' अधिकारी ने बताया कि सरकार ने अभी तक औपचारिक रूप से सीबीआई को इन फाइल के स्टेट्स के बारे में सूचित नहीं किया है । उल्लेखनीय है कि कोयले पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक [ कैग की रिपोर्ट गत वर्ष 17 अगस्त  को पेश रिपोर्ट में कहा गया था कि 142 कोयला ब्लॉकों की प्रतिस्पर्धी तरीके से नीलामी न कराने की वजह से प्राइवेट कंपनियों को एक लाख 85 हजार 591 लाख करोड़ रुपये का फायदा हुआ और सरकार को इतने का ही नुकसान हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक, मनमानी पूर्ण आवंटन के बजाय इन खदानों की नीलामी की गई होती तो सरकारी खजाने में करीब 1.86 लाख करोड़ रुपये का ज्यादा राजस्व आता। कैग ने अपनी रिपोर्ट में टाटा स्टील, टाटा पावर, भूषण स्टील, जिंदल स्टील ऐंड पावर, हिंडाल्को और एस्सार ग्रुप समेत 25 कॉर्पोरेट घरानों को फायदा मिलने की बात कही थी | साथ ही कैग द्वारा अनिल अंबानी की कंपनी  रिलायंस पावर को करीब 29,033 करोड़ रुपये का फायदा पहुंचाए जाने की बात भी कही गई थी | मगर इस पर बराबर लीपापोती की गई , यहाँ तक कि फ़ाइलें गुम हो गईं | भ्रष्टाचार हमारे देश की इन्तिहाई संगीन समस्या है | अफ़सोस यह भी जिन प्रभावी और कारगर उपायों की ज़रूरत है , उन पर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया जा रहा है | यह समस्या सीधे तौर पर इन्सान की ज़ेहनियत से जुड़ी हुई है | अगर इन्सान के अंदर सही अर्थों में ईशभय पैदा हो जाए और उसमें यह अवधारणा विकसित हो जाए कि अगर भ्रष्टाचार जैसा बुरा कर्म करेगा , तो ईश्वर उसे दंडित करेगा , उसकी पकड़ से कोई नहीं बच सकता , तो वह अवश्य ही भ्रष्टाचार से दूर रहेगा और सुकर्म करके अपने दुनियावी और पारलौकिक जीवन को सफल बनाएगा | ज़रूरत है , इन्सान में इस अवधारणा को भी परवान चढ़ाने की |
- डॉ . मुहम्मद अहमद  

हज - यात्रा को आसान बनाएं

हज कमेटी एक्ट में संशोधन कर हज - यात्रा को आसान बनाएं

सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत हज सब्सीडी में कटौती करने की खबर है | इस साल हज पर जाने वालों को हवाई किराये के तौर पर 28,000 रुपये देने होंगे। यह राशि पिछले साल के मुकाबले आठ हजार रुपये ज्यादा है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को दस साल के अंदर 2022 तक चरणबद्ध तरीके से हज सब्सिडी खत्म करने का आदेश दिया था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में हज यात्रा के किराये में बृद्धि को मंजूरी मिल सकती है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस साल हवाई किराया लगभग 84,891 रुपये प्रति व्यक्ति रहने का अनुमान है। इसमें 28 हजार रुपये यात्री को चुकाने होंगे जबकि 56,891 रुपये सरकार सब्सीडी के तौर पर देगी। मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2012 में हज यात्रा का हवाई किराया करीब 86,925 रुपये था। इसमें से 20 हजार रुपये प्रति हजयात्री ने दिए थे, जबकि 66,925 रुपये का सरकार ने हज सब्सिडी के तौर पर भुगतान किया था। वास्तव में हज सब्सीडी की शुरुआत 1973 में की गई थी , जब हज के लिए जाने की समुद्री यात्रा बंद कर दी गई थी और इसके लिए हवाई यात्रा अनिवार्य की गई | उस समय हवाई यात्रा और समुद्री यात्रा के किराये के अंतर को केंद्र सरकार ने सब्सीडी माना और उसका भुगतान सरकारी कोष से करने लगी | 2010 में एक आर टी आई याचिका के जवाब में विदेश मंत्रालय ने बताया कि हज सब्सीडी 1991 में शुरू की गई और 2005 से 2010 तक 640792 मुसलमानों ने इस सब्सीडी का लाभ उठाया | इस मद में 28917.7 मिलियन रुपये खर्च हुए | यह भी बताया गया कि मुसलमानों को छोड़कर किसी अन्य को धार्मिक यात्रा में सब्सीडी नहीं दी जाती है |  8 मई 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने इस रियायत पर चरणबद्ध तरीक़े से रोक लगाने का निर्देश दिया था | 2008 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करके हज यात्रा को असंवैधानिक बताकर इस पर रोक लगाने की मांग की गई थी | इसकी सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह कहकर  रोक लगाने से इन्कार कर दिया कि जब मान सरोवर यात्रियों को दो सौ रुपये प्रति यात्री की सब्सीडी दी जाती है और पाकिस्तान के ननकाना साहिब जाने पर सब्सीडी मिलती है , तो यह असंवैधानिक नहीं होता , तो आख़िर हज सब्सीडी कैसे असंवैधानिक हो गई ? सुप्रीम  कोर्ट ने याचिका ख़ारिज कर दी | बाद में कोर्ट का नज़रिया बदल गया | वह भी सरकार के इशारे पर ! अगस्त 2010 में विदेश मंत्रालय ने यह कहकर हज सब्सीडी का विरोध किया कि यह इस्लामी शिक्षाओं के अनुकूल नहीं है , हालाँकि यह बात वह सिद्ध नहीं कर सका | फिर भी भारत सरकार ने यह प्रस्ताव किया कि 2017 तक हज सब्सीडी समाप्त कर दी जाएगी और इस दौरान सब्सीडी में कटौती की जाती रहेगी | सुप्रीमकोर्ट ने भी एक व्यवस्था के तहत जीवन में एक बार के हज पर ही सब्सीडी देने का निर्देश दिया | पहले पांच साल में एक बार हज जाने पर सब्सीडी थी | 2012 के फ़ैसले में सब्सीडी पर आगे चलकर रोक लगाने की हिदायत दी गई |
कोर्ट ने  उस आधिकारिक सद्भावना टीम का आकार भी कम किया , जो भारत सरकार हज के लिए सालाना मक्का भेजती  है | कोर्ट ने  30 सदस्यों के बजाय दो कर दी | कोर्ट ने यह भी कहा था कि हज केवल उन्हें ही करना चाहिए, जो उसका खर्च  उठा  सकते हों । ज्यादातर मुस्लिम अपनी यात्रा के खर्चे को लेकर अवगत ही नहीं होगें और अगर सभी तथ्यों को सामने रख दिया जाए, तो ज्यादातर को अच्छा नहीं लगेगा कि उनके हज में खर्च होने वाली अच्छी-खासी रकम सरकार द्वारा वहन की जाती है | कोर्ट ने यह भी कहा कि सब्सीडी के पैसे का समुदाय के शिक्षा और सामाजिक विकास के अन्य क्षेत्र के उत्थान में ज्यादा लाभदायक ढंग से इस्तेमाल किया जा सकता है , लेकिन सरकार ने सुप्रीमकोर्ट की इस हिदायत पर अब तक ध्यान नहीं दिया है |वास्तव में यह सब्सीडी एक लंबे समय से घाटे और नुकसान में चल रही राष्ट्रीय विमानन सेवा एयर इंडिया [ महाराजा ] के लिए राहत पैकेज के रूप में इस्तेमाल होती रही है | अमलन यह हज पर जानेवालों  के लिए कोई सब्सीडी  नहीं है। एयर इंडिया इस तथाकथित सब्सीडी का सीधे तौर पर लाभार्थी है, क्योंकि यह बड़ी रक़म  पैसा बगैर औचित्य के सीधे एयरलाइन्स के खाते में जा रही है | अगर ' महाराजा ' को मदद न पहुंचाई जाए , तो कोई भी एयरलाइन्स उस रक़म से सस्ते में ले जा सकती है , जो सरकार लेती है | इस प्रकार बिना सब्सीडी के सस्ते में हज किया जा सकता है | हज कमेटी इस काम को अंजाम दे सकती है | भारतीय हज कमेटी एक स्वायत्त निकाय है, जो हज से संबंधित बंदोबस्त हेतु भारत सरकार के तत्वावधान में बनाई गई है। इस समस्या का अकेला समाधान हज कमेटी एक्ट में संशोधन है, ताकि हज कमेटी को हवाई यात्रा के लिए वैश्विक टेंडर निकालकर खुद के यातायात संबंधी बंदोबस्त करने की इजाज़त दी जा सके और एयर इंडिया का एकाधिकार समाप्त हो और हज - यात्रा सुगम हो सके |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

  

धूमिल न करें मुसलमानों की छवि

धूमिल न करें मुसलमानों की छवि
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 पिछले कुछ दशकों से देश के मुसलमानों के ख़िलाफ़ पूर्वनियोजित ढंग से ग़लत फहमियां और भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं | विशेषकर स्वदेशी मीडिया ने देश के मुसलमानों की कई भ्रामक छवियाँ बना दी हैं | वरिष्ठ पत्रकार खुशवंत सिंह के मत में एक सामान्य मुसलमान वह है , जिसके 8-10 बच्चे होते हैं, वह बनियान-लुंगी पहन कर गली-मुहल्ले के नुक्कड़ पर पान की पीक थूकता नजर आएगा। एक अन्य लेखिका तवलीन सिंह के विचार में एक सामान्य मुसलमान रूढ़िवादी होता है।  मुसलमानों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आतंकवाद से जोड़ा जाता है और देश की सुरक्षा एजेंसियां भी आतंकवाद के झूठे आरोपों में निर्दोष मुसलमानों को गिरफ्तार करके मुसलमानों की छवि को ख़राब करने में अक्सर संलग्न रहती हैं | उन्हें इस बात की ज़रा भी चिंता नहीं होती कि वे देश के एक समुदाय के साथ अत्याचार कर रही हैं | अदालतों द्वारा ऐसे मामलों में निर्दोष जनों की रिहाई का भी इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता | अमेरिकी यहूदी मीडिया और कुछ बड़े मीडिया घरानों का भारतीय मुसलमानों के बारे में यह निरंतर दुष्प्रचार है कि बहुत से मुसलमान बाबर , बिन लादेन, मुल्ला उमर, मौलाना मसऊद अजहर आदि से प्रभावित  हैं और इनके द्वारा प्रचारित आतंकवाद की हिमायत करने वाले हैं। संघ परिवार के लोग तो मुसलमानों की तुलना गद्दारों से करते हैं और उन्हें देशप्रेमी  नहीं मानते। उनके बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि वे भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले क्रिकेट और हॉकी के मुकाबलों में पाकिस्तान की तरफदारी करते हैं | मीडिया का एक बड़ा वर्ग मुसलमानों के बारे में ऐसा मानता है कि वह जरा - जरा सी बात पर अपनी पत्नी को तलाक़ दे देता है | वह आधुनिक शिक्षा - प्रशिक्षण से दूर रहता है , परिवार नियोजन में विश्वास नहीं रखता , घेटो (एक अलग-थलग बस्ती) में रहने वाले लोगों जैसी मानसिकता रखता है , अंधेरी, बदबूदार, जर्जर बस्तियों में रहना पसंद करता है | एक भ्रामक छवि यह भी बनाई जाती है कि मुसलमान महिलाओं को  समाज में कोई हक नहीं देते, जिससे मुस्लिम महिलाएं लाचारी का जीवन बिताती हैं। मुस्लिम पुरुष जब चाहते हैं, शादी कर लेते हैं और जब चाहते हैं तलाक भी दे देते हैं और यह नहीं सोचते कि तलाक देने से उस औरत का क्या होगा। इन मिथ्या - प्रचारों के साथ ही मुसलमानों की एक और छवि यह  बनाई जाती है कि वे सद्दाम हुसैन, तालिबान, अरब देशों के गुणगान में लगे रहते हैं, जबकि इन देशों को भारतीय मुसलमानों से कोई लेना-देना नहीं । आम मुसलमानों के बारे में एक छवि भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा बनाई गई है। इनके अनुसार सभी मुसलमान अल्पसंख्यकवादी हैं और वे चुनाव में प्राय: मुस्लिम प्रत्याशी को ही वोट देते हैं।वे यह भी मानते हैं कि मुसलमान धर्म के आधार पर मतदान करते हैं | वास्तविकता यह है कि इन सभी छवियों में से मुसलमान की एक भी छवि वास्तविक नहीं है । मुसलमान की बस एक ही छवि रही है और है कि वह अन्तर्हृदय से इस्लाम को चाहने वाला होता है, अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद [ सल्ल . ] से बेपनाह मुहब्बत करता है और अपने धर्म, रसूल पर किसी भी समय मर-मिटने के लिए तैयार रहता है | लेकिन  सच्ची  बात यह भी है कि इन बनी-बनाई भ्रामक छवियों के आधार पर भारत में बसे मुसलमानों का आकलन नहीं हो सकता । जब देश का विभाजन हो रहा था तो उस समय भारत के बहुलतावादी समाज के समर्थक स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद ने जामा मस्जिद की सीढ़ियों से एक ऐसा झकझोर कर देने वाला भाषण दिया था कि पाकिस्तान जाने वाले अनेक लोगों ने अपने बिस्तरबंद खोल दिए थे और मौलाना के इस शेर पर लब्बैक कहा था , 'जो चला गया उसे भूल जा, हिंद को अपनी जन्नत बना।' मुसलमानों ने इन्तिहाई असुरक्षा और विपरीत परिस्थितियों में भी अपने देश को नहीं छोड़ा | चारों ओर वैमनस्यता का आलम था | मुसलमानों में नेतृत्व का भी अभाव था | मौलाना आज़ाद की भी एक सीमा थी | वे कांग्रेस पार्टी में थे , अतः मुसलमान अपने को उपेक्षित समझने लगे और अंततः मुख्यधारा से हटते चले गए , उनका विकास छिन गया , सांप्रदायिकता और फासीवाद की आग ने उनकी परेशानियों में लगातार इज़ाफ़ा किया | आज की स्थिति पहले से बहुत भिन्न नहीं है | अब तो मुसलमानों पर मीडिया के द्वारा दिन - प्रतिदिन हमले करवाए जाते हैं , जिसके कारण उनकी  अच्छी - खासी छवि लगातार धूमिल हो रही है |
भारतीय मुसलमानों के बारे में जो पूर्वाग्रही रवैया बना दिया गया है , उसके ज़िम्मेदार मुसलमान भी हैं | उन्हें चाहिए था और आज भी उन्हें यह करना चाहिए कि अपनी पूरी शक्ति और सामर्थ्य के साथ इस्लाम और मुसलमानों के बारे में वास्तविक शिक्षाएं व बातें देशवासियों तक पहुंचाएं , ताकि भ्रम - प्रचार का अंत के साथ ही देश में दुर्भाव पैदा करने की सोची - समझी साज़िशों का भी समापन हो सके | देश के विवेकशील और मानवता से शुभचिंतकों से भी अपील है कि वे मुसलमानों के बारे में किए जा रहे दुष्प्रचार का अपने स्तर पर उचित जवाब देकर वैमनस्यता फैलाने की घृणित कोशिशों को विराम देने में योगदान करें | सरकार को भी चाहिए कि सद्भावना पैदा करनेवाले आयोजनों को बढ़ावा और इसके लिए अवसरों की खोज करे | इस सन्दर्भ में केन्द्रीय गृहमंत्री श्री सुशील शिंदे का प्रयास सराहनीय और स्वागतयोग्य है | उन्होंने मुसलमानों को जान - बूझकर आतंकवाद से जोड़ने की पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की घिनौनी नीतियों की भर्त्सना की है | सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में उन्होंने निर्दोष मुस्लिम नवजवानों की गिरफ्तारी न करने का निर्देश दिया है | गृहमंत्री ने पत्र में लिखा है कि कई ऐसे मामले प्रकाश में आए हैं , जिनसे पता चलता है कि मुस्लिम युवकों को पुलिस ने गलत तरीक़े से गिरफ्तार किया है | उन्होंने लिखा है ‘‘कुछ अल्पसंख्यक युवाओं को लग रहा है कि उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया गया और उन्हें उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित किया गया | सरकार को यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी बेकसूर व्यक्ति बेवजह प्रताड़ित न हो | ’’ गृहमंत्री ने राज्य सरकारों से कहा कि वे आतंकवाद संबंधी मामलों की सुनवाई के लिए संबद्ध उच्च न्यायालयों के परामर्श से विशेष अदालतें स्थापित करें, विशेष सरकारी वकीलों की नियुक्ति करें और अन्य लंबित मामलों की तुलना में ऐसे मामलों को प्राथमिकता दें | गृह मंत्री ने कहा कि कानून निर्माता एजेंसियां आतंकवाद के खात्मे के लिए पूर्ण असहिष्णुता वाली नीति सुनिश्चित करने के साथ ही सांप्रदायिक और सामाजिक सद्भाव के संदर्भ में संतुष्ट हों | उन्होंने कहा ‘‘जहां अल्पसंख्यक समुदाय के किसी सदस्य की गलत भावना से गिरफ्तारी हो, गलत तरीके से गिरफ्तारी हो वहां ऐसा करने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ कड़ी एवं शीघ्र कार्रवाई की जानी चाहिए | गिरफ्तार व्यक्ति को न केवल तत्काल रिहा किया जाए बल्कि उसे समुचित मुआवजा दिया जाना चाहिए और पुनर्वास किया जाना चाहिए ताकि वह मुख्यधारा से जुड़ सके |’’मई में केंद्र सरकार ने आतंकवाद संबंधी मामलों के लिए एनआईए कानून के तहत 39 विशेष अदालतें स्थापित कीं | अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री के रहमान खान ने भी गृहमंत्री को पत्र लिख कर ‘‘देश के अलग अलग भागों में मुस्लिम युवकों की आतंकवाद संबंधी मामलों में गलत तरीके से गिरफ्तारी’’ को लेकर चिंता जताई थी |
- Dr. Muhammad Ahmad

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मोदी की मुद्दाविहीन रैलियां !


मोदी की मुद्दाविहीन रैलियां , आमजन की बेहतरी व तरक्की  की बातों से कोसों दूर 

भाजपा के घोषित प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की रैलियों का दौर जारी है | उनकी हर रैली बहुत ही साधारण क़िस्म की होती है | उनके पास कुछ भावनात्मक बातें ज़रूर हैं , लेकिन सभी सतही ! उनके पास सामान्य ज्ञान का भी घोर अभाव है | पटना रैली इसका प्रमाण है , जहाँ अमलन बम विस्फोट हुए और वाक - विस्फोट भी !  नरेंद्र मोदी ने अपने सामान्य ज्ञान का निठल्ला प्रदर्शन किया | बहुत - सी असत्य , तथ्यहीन बातें कहीं | मोदी की भाषण - कला भी एक - दूसरे के आरोप - प्रत्यारोप से भिन्न नहीं है | कभी ऐसा लगता है कि घिसी - पिटी बातों का उनका टेप आन हो गया हो | कानपुर रैली में उनका राष्ट्रवाद इस भ्रामक रूप में सामने आया मानो हिन्दू राष्ट्रवाद सेकुलर राष्ट्रवाद है | इसी प्रवाह में वे भारतीय संविधान को धर्म - पुस्तक बताने की गंभीर भूल कर बैठे | काबिले ज़िक्र बात यह भी है कि उनका इंडिया फर्स्ट मोदी फर्स्ट है , तभी उनको गुजरात के वीभत्स नरसंहार पर कोई पछतावा नहीं है , तथापि वे अपनी रैलियों में ' इंडिया फर्स्ट ' की जगह मोदी फर्स्ट का बार - बार प्रदर्शन करते हैं | कुछ समय पहले मोदी ने समाचार एजेंसी रायटर को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि उन्हें 2002 के दंगों को लेकर कोई अपराधबोध या पछतावा नहीं है। दुख जरूर है, दुख तो अगर कुत्ते का बच्चा कार के नीचे आ जाता है तो भी होता है, चाहे कार खुद चला रहे हों या कोई और। इस बयान को लेकर विभिन्न पार्टियों और आम नागरिकों ने कड़ी प्रतिक्रिया जताते हुए इसे एक असंवेदनशील और बेशर्मी भरा बयान करार दिया और मोदी से माफी की मांग की। मगर भाजपा ने रक्षात्मक होते हुए साक्षात्कार को ठीक से पढ़ने की नसीहत दी। इन आलोचनाओं का ही असर था कि मोदी ने बाद में क्षतिपूर्ति के लिए ‘जीव मात्र पर दया’ जैसे शब्द प्रयोग किए। गुजरात में 2002 में हुए दंगों के बारे में कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, संगठनों और पत्रकारों ने अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया कि दंगों के दौरान दंगाइयों को खुली छूट दी गई थी और मुसलमानों को कई दिनों तक उत्पीड़न के लिए छोड़ दिया गया। महिलाओं और बच्चों के साथ नृशंस अत्याचार किए गए। दंगाइयों को रोका नहीं गया था। ऐसे कई वीडियो फुटेज हैं, जिनमें पुलिस निष्क्रिय खड़ी है और दंगाई मुसलमानों पर हमले कर रहे हैं | मोदी की यह ख़ासियत यह भी है कि वे अपने भाषणों में गुजरात की भयानक हिंसा पर कुछ नहीं बोलते | बस कांग्रेस को लक्ष्य कर ' विलाप ' करते रहते हैं |
मौलिक समस्याओं पर बात करना तो लगता है , भाजपावालों ने सीखा ही नहीं | बढ़ती हुई महंगाई उनका मुद्दा नहीं होता , स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से वे चिंतित नहीं होते , जीवन को बेहतर बनाने से उनका कोई वास्ता नहीं होता ! बहराइच में मोदी ने बिजली की समस्या की जो बात की , वह भी राजनीतिक है | उन्होंने कहा कि खान साहब [ राहुल गाँधी ] के इलाक़े में बिजली रहती है , शेष जनता अँधेरे में रहती है | फिर उन्होंने गुजरात में अपने कामों का बखान किया | इसी प्रकार मोदी ने उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों के अब तक न चलने पर जो  चिंता जताई , वह भी अपने कामों की अपने द्वारा ही प्रशंसा करना था | मोदी सही अर्थ में एक विद्रूप पुरुष हैं | कब क्या कहें , कुछ यक़ीनी नहीं | पिछले दिनों उनके एक साक्षात्कार का समाचार क्षेत्रीय अखबारों में बहुत साफ़गोई के साथ प्रकाशित हुआ , जिसमें मोदी ने असभ्यता की हदें पार कर दी थीं , लेकिन  उनके लिए असामान्य कुछ भी नहीं था। कुछ अखबारों के लिए ‘कुत्ते’ शब्द का प्रयोग खटकने वाला था, क्योंकि कुत्ता सम्मान का प्रतीक नहीं माना जाता है। इसलिए उनकी सलाह रही कि ‘वे अगर ऐसा नहीं करते, तो ज्यादा बेहतर होता’, ‘उसकी जगह वे कोई दूसरा शब्द काम में ले सकते थे।’ इन अखबारों के पाठक भी उन खबरों के अनुकूल होते हैं, इसलिए कोई असहज स्थिति नहीं आती है। बल्कि ये मोदीनुकूल अखबार पाठकों का कॉमन सेंस भी वैसा ही तैयार करते हैं। इसका एक दिलचस्प उदाहरण उस वक्त सामने आया जब उत्तराखंड में पंद्रह हजार लोगों को बचा लेने के समाचार से मोदी मजाक के पात्र बने हुए थे। उस समय भी कुछ ऐसे लोग थे, जो सेना से खफा थे कि अगर मोदी एक दिन में इतने लोगों को निकाल लेते हैं तो फिर सेना क्यों नहीं निकाल पा रही है ? अब मोदी के सामाजिक समरसता की विचित्र मानसिकता पर आते हैं | आर एस एस ने सामाजिक समरसता मंच बनाया हुआ है , जिसके बारे में मोदी ने एक पुस्तक लिखी है | इसमें उन्होंने अपने को दलितों का मसीहा होने का दावा किया है , हालाँकि वे अपने भाषणों में दलित उत्थान की बात नहीं करते ! अपनी  इस पुस्तक में मोदी ने यह दावा किया है कि वे दलितों की भलाई के लिए काम करते रहे हैं |

वे लिखते हैं, ‘‘8 नवम्बर, 1989 को भव्य राममंदिर का शिलान्यास किसी महंत या पुजारी ने नहीं किया था | यह काम बिहार के एक दलित ने किया था | उस समय केवल मंदिर की नींव ही नहीं रखी गई थी वरन् सामाजिक समरसता की नींव भी रखी गयी थी | वह एक सांस्कृतिक क्रांति की शुरूआत थी |’’ ज़ाहिर है , यह खुली हुई भ्रांतिपूर्ण बात है , इसीलिए कई दलित विद्वान कहते हैं कि बाबरी मस्जिद को ढहाने के लिए 6 दिसम्बर का दिन इसलिए चुना गया क्योंकि उस दिन डॉक्टर अम्बेडकर की पुण्यतिथि है | इन विद्वानों का मानना है कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति करने वाली ताकतें, दलितों को अपने अधीन रखते हुए भी अपने साथ रखना चाहती हैं |सामाजिक समरसता की अवधारणा में शामिल है विभिन्न जातियों के सदस्यों के बीच सद्भाव. परन्तु जातिप्रथा का अंत, सामाजिक समरसता आंदोलन का लक्ष्य नहीं है | जहां अम्बेडकर जातिप्रथा के सम्पूर्ण उन्मूलन के पैराकार थे वहीं सामाजिक समरसता के झंडाबरदार, हिन्दू समाज को एक रखना चाहते हैं परन्तु उसके जातिगत व वर्ण-आधारित भेदभाव के साथ! इस प्रकार एक सूत्र में बांधे गए हिन्दू समाज का इस्तेमाल मुसलमानों, ईसाइयों व अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ किया जाता है | वास्तव में संघ दर्शन दलित विरोधी भी है | समरसता का नाटक मात्र मृगमरीचिका है जिसका उद्देश्य इन वंचित वर्गों का ध्यान उनकी मूल समस्याओं से हटाना है | मोदी और उनके जैसे अन्य लोग, सामाजिक ऊँच-नीच बनाये रखना चाहते हैं. उनके एजेंडे  में अल्पसंख्यकों का विरोध शामिल है और हमेशा रहेगा | दलितों और उनसे जुड़े मुद्दो पर अंबेडकर व आर.एस.एस.-मोदी की सोच एक दूसरे से एकदम उलट है |जहाँ अंबेडकर जाति के उन्मूलन के पक्षधर थे वहीं आरएसएस-मोदी जातियों के बीच सद्भाव व समरसता की बातें करते हैं | अंबेडकर ने मनुस्मृति को जलाया और भारतीय संविधान के मुख्य निर्माता बने| आरएसएस नेता के. सुदर्शन ने सन् 2000 में कहा था कि भारतीय संविधान, पश्चिमी मूल्यों पर आधारित है इसलिए इसके स्थान पर हिन्दू धर्मग्रंथों पर आधारित संविधान बनाया जाना चाहिए | अतः मोदी की एक इच्छा सुदर्शन की इच्छा की पूर्ति भी है , जो कुछ उच्च जातियों को छोड़कर देश के दलितों , अल्पसंख्यकों और अन्य नागरिकों के लिए अकल्याणकारी , अमंगलकारी और शोषणकारी है
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

मानव का मौलिक जीवन - सिद्धांत और इस्लाम

मानव का मौलिक जीवन - सिद्धांत और इस्लाम
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इस्लाम इन्सान का मौलिक , वास्तविक एवं स्वाभाविक धर्म है | यह केवल एक आस्था नहीं , अपितु जीवन में अनुकरण करने और आत्मसात करने की तीव्र प्रेरणा देनेवाला धर्म है | इस्लाम एक पूरी जीवन पद्धति है | यह इन्सान को जीवन के सभी क्षेत्रों व  गतिविधियों में मार्गदर्शन करता है , और वह भी ईश्वरीय मार्गदर्शन ! यह एक सार्वभौमिक धर्म है , अतयव इसका नाम किसी कौम , जाति , क्षेत्र या अन्य किसी भौतिक पहचान पर नहीं है , अपितु पालनहार प्रभु और उसके बन्दों के मधुर संबंधों पर है | इस्लाम का अर्थ है - ईश्वर की बन्दगी और उसके आगे पूर्ण समर्पण | क़ुरआन कहता है कि अल्लाह की सच्चाई आरंभ से एक है | दुनिया का कोई देश और कोई कोना ऐसा नहीं जहाँ अल्लाह के पैग़म्बर न भेजे गए हों | उन्होंने इंसानों को हक़ और सच्चाई की शिक्षा  दी , परन्तु सदैव ऐसा हुआ कि लोगों ने कुछ समय के बाद अपनी स्वार्थपरता के कारण  कल्पना और अंधविश्वास से विभिन्न मिथकों और झूठी बातों के सहारे वास्तविक धर्म - शिक्षाओं को विकृत कर डाला | महादयालु , कृपाशील अल्लाह ने फिर भी इन्सानों पर कृपा दृष्टि की और अपने अंतिम पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद [ सल्ल . को भेजा | आप [ सल्ल . ] के द्वारा इस्लाम की पूर्ण और प्रमाणिक शिक्षा पेश की | इस्लाम की शिक्षाओं में सर्वप्रथम शिक्षा यह है कि अल्लाह एक है और केवल उसी की बन्दगी की जानी चाहिए |
इसकी शिक्षाएं इंसानियत के लिए सर्वथा हितकारी - कल्याणकारी हैं | ये किसी एक समुदाय या कौम की सम्पत्ति न होकर सार्वभौमिक और सर्वजन की सम्पत्ति हैं | अतः यह सार्वजनिक , जगतव्यापी एवं सर्व कल्याणकारी धर्म है | सहज रूप से अल्लाह की प्रसन्नता , सामीप्य एवं लोक - परलोक की  सफलता प्रत्येक आस्थावान मनुष्य को अभीष्ट है | यह उसी एक जीवन - प्रणाली द्वारा संभव है , जो मानव - जाति के संगठन को अस्त - व्यस्त नहीं करती एवं उसके विचार - व्यवहार को द्वंदात्मक संघर्ष में नहीं ग्रस्त करती तथा जो आख़िरकार मानव - प्रकृति और जगत - प्रकृति से नहीं टकराती | यही इस्लामी जीवन - प्रणाली है | इस्लाम इसलिए नहीं आया कि केवल नैतिक क्षेत्र में आत्मा को संवारे , वह लोगों में मात्र चेतना और अनुभूति बनकर रहे और मस्जिदों में केवल एक उपासना - पद्धति बनकर रह जाए | अपितु यह मानव - जीवन को पूरी तरह अल्लाह के आदेश के अनुरूप ढालना चाहता है | यह लोगों को उनके धर्म से छुड़ाना  चाहता बल्कि उनके वास्तविक धर्म का उनको पुनः अनुगामी बनाना  चाहता है। दुनिया में विभिन्न धर्म हैं | हर धर्मावलंबी समझता है कि सत्य केवल उसी के पास है और बाक़ी सब असत्य पर हैं | यह वास्तविक से परे बात है | सत्य तो केवल एक ही हो सकता है | इस्लाम सत्य में असत्य की मिलावट को दूर कर उसे विशुद्ध और पवित्र बनाता है |

 - DR . MUHAMMAD AHMAD

ओपिनियन पोल्स और भारतीय लोकतंत्र

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव
ओपिनियन पोल्स और भारतीय लोकतंत्र
देश के पांच राज्यों - दिल्ली , राजस्थान , मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ और मिज़ोरम - में इस माह और अगले माह होनेवाले विधानसभा चुनावों के सिलसिले में भाजपा और कांग्रेस के घोषणा पत्रों के आने के साथ ही आरोपों - प्रत्यारोपों का दौर तेज़ हो चुका है | साथ ही ओपिनियन पोल्स भी सामने आ रहे हैं , जो चुनाव नतीजों के आने के पहले ही एक भ्रामक स्थिति पैदा के रहे हैं | ऐसा लगता है कि ये ओपिनियन पोल्स प्रायोजित हैं , वह भी भाजपा के द्वारा ! ज़ाहिर है , इन पर कांग्रेस रोक चाहती है , जबकि भाजपा इसके पक्ष में है | इस मसले पर एक डिबेट शुरू है , क्योंकि चुनाव आयोग ने राजनीतिक पार्टियों से राय तलब किया था | इसी साल विगत 4 अक्टूबर को चुनाव आयोग ने तमाम राजनीतिक पार्टियों से पूछा था कि क्या ओपिनियन पोल पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। 30 अक्टूबर को दिए गए अपने जवाब में कांग्रेस ने चुनाव आयोग के प्रस्ताव का खुलकर समर्थन किया है। कांग्रेस के मुताबिक चंद लोगों की राय पर आधारित सर्वे में विश्वसनीयता की कमी होती है और निहित स्वार्थों के लिए उन्हें तोड़ा मरोड़ा जा सकता है। बी एस पी ने भी कांग्रेस के सुर में सुर मिलाया है | भाजपा का इनके विरोध में वक्तव्य देना फ़ितरी है भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली ने कहा कि भारत में चुनाव विश्लेषण अभी परिपक्वता हासिल ही कर रहा है तथा हो सकता है कि कुछ ओपिनयन पोल गलत हो जाएं , लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उन पर प्रतिबंध लगा दिया जाए।जेटली ने भाजपा की ओर से जारी एक आलेख में कहा कि यदि इस देश में वैध ढंग से  ओपिनियन पोल पर रोक लगा दी जाए तो अगला कदम राजनीतिक टिप्पणीकारों के विश्लेषण करने पर रोक लगाना होगा जो कुछ के पक्ष में जबकि कुछ के विरोध में होता है । उन्होंने कहा कि ओपिनियन पोल हो रहे हैं। कुछ ने विश्वसनीयता हासिल कर ली है जबकि कुछ को आसानी से नजरअंदाज किया जा सकता है। इन पोल की विश्वसनीयता हो या नहीं, क्या इन्हें प्रतिबंधित किया जा सकता है । कांग्रेस की ओर से केन्द्रीय मंत्री राजीव शुक्ला का कहना है कि ये ओपिनियन पोल्स कई बार मनगढ़ंत होते हैं , इसलिए पार्टी ने इनका विरोध करके अच्छा ही किया है | निश्चय ही जब मीडिया पब्लिसिटी करने लगता है , तो लोग उससे प्रभावित होते हैं | यह भी सच है कि भ्रामकता की स्थिति में लोकतंत्र प्रभावित होता है | मिसाल के तौर पर इंडिया टुडे के पोल में मध्य प्रदेश में भाजपा को 143 सीटें देकर शिवराजसिंह चौहान को फिर ताज पहना दिया गया है ! इसी प्रकार वसुंधराराजे सिंधिया को 105 सीटें देकर राजस्थान का मुख्यमंत्री बना दिया गया है | छतीसगढ़ में रमन सिंह को मामूली सीटों से फिर जिताया गया है | कुछ पोल्स में दिल्ली से कांग्रेस के लगभग सफाये की बात की गई है और आप को एक दावेदार ठहराया जा रहा है , जबकि ज़मीनी हकीक़त दूसरी है | माना कि आप को कुछ सीटें मिलेंगी , लेकिन वह सत्ता का दावेदार कैसे बन गया |


रही बात घोषणापत्रों की , तो ये जनता के सामने अपनी भावी रणनीति प्रकट करने का एक माध्यम हैं , जिनका राजनीतिक पार्टियाँ इस्तेमाल करती रही हैं | यह बात अलग है कि इनको पूरा करने में इनकी ईमानदार कभी नहीं रहीं | इस बार कांग्रेस और भाजपा के घोषणापत्र जनता के बीच आ चुके हैं , जिनमें मतदाताओं के लिए आकर्षण ही आकर्षण है। किसे अपनाएं, किसे ठुकराएं, चुनाव घोषणा पत्रों के आधार पर किसी भी जागरूक मतदाता के लिए तय करना आसान नहीं है। आज की राजनीति में यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि किस पार्टी का घोषणा पत्र बेहतर कल के सपने को पूरा करने वाला है। हर पार्टी की यही कोशिश होती है कि वह अधिक से अधिक उन बातों को शामिल करे, जिनसे मतदाता को व्यक्तिगत लाभ होता दिखे और उससे प्रभावित होकर वह उसके पक्ष में मतदान करे। इस कोशिश में लोगों को मुफ्त में चीजें उपलब्ध कराने की होड़ तक शुरू हो गई है। इन घोषणा पत्रों में एकमात्र लक्ष्य दलित , दमित और पिछड़े तबक़े को साधने का है , क्योंकि यही वह तबक़ा है जो सत्ता की चाबी तक पहुंचा सकता है। मगर मुसलमानों समेत अल्पसंख्यक तबक़े की अनदेखी हर विचारवान एवं समाज - देश हितैषी को सालती है | कांग्रेस ने हर परिवार को 35 किलो चावल प्रतिमाह मुफ्त देने की घोषणा है तो भाजपा ने सिर्फ एक रूपए में 35 किलो चावल का वादा किया है। 5 हार्सपावर तक के पंपों को मुफ्त बिजली देने का वादा दोनों पार्टियों ने किया है। छात्र-छात्राओं तथा  बेरोजगारों के लिए भी आकर्षक वादे किए गए हैं। कांग्रेस ने कालेजों की फीस अदा करने का वादा किया  है तो भाजपा ने कालेजों में प्रवेश लेते ही अब लैपटाप व टैबलेट देने की घोषणा की है। महिलाओं के लिए कांग्रेस ने एक अरब रूपए की अलग निधि स्थापित करने तो भाजपा ने नोनी सुरक्षा योजना के तहत 18 साल की उम्र पूरी होने पर एक लाख रूपए देने का ऐलान किया है। किसानों को लक्ष्य करके दोनों ही पार्टियों ने धान की मूल्य दो हजार से इक्कीस सौ रूपए तक करने के वादे किए हैं। भाजपा ने शहरों को मेट्रो और मोनो रेल परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का भी वादा किया है। दोनों ही पार्टियों के ये वादे लोक-लुभावन हैं, लेकिन दूरदर्शिता से कोसों दूर  हैं | शिक्षित बेरोजगारों के लिए उद्यम आधारित गतिविधियों के लिए कम ब्याज दर पर ऋण सुविधा की तो बात कही गई , मगर ऐसे उद्यमों के सफल न होने की स्थितियों की कोई चर्चा नहीं की गई है। पानी, बिजली, चिकित्सा, शिक्षा, रोजगार परिवहन, कृषि क्षेत्र में योजनाओं को लागू करने के मामले में आधारभूत समस्याओं पर भी दोनों ही पार्टियों ने कोई स्पष्ट राय व्यक्त नहीं की है। कृषि उपज की कीमत बढ़ाने की बात तो की गई है, लेकिन कृषि लागत में कमी लाने की चर्चा नहीं की गई है। छत्तीसगढ़ में कभी भुखमरी की समस्या भी थी | धान की नई किस्में आने के बाद अब यह दूर हो चुकी है। लोगों को कोई चीज मुफ्त में देने का लोभ दिखाने की जगह उसे प्राप्त करने के लिए सक्षम बनाने की योजनाओं पर जोर दिया जाए तो यह राज्य के कल के के सपने को पूरा करने में कहीं अधिक कारगर होगा। नागरिकों में स्वावलंबन पैदा करना भी बहुत आवश्यक है |
Dr . Muhammad Ahmad

Nov 2, 2013

फिर भड़की नफ़रत की आग

फिर भड़की नफ़रत की आग

 - डॉ . मुहम्मद अहमद  
आरोपों - प्रत्यारोपों के चल रहे अंतहीन सिलसिले के बीच मुजफ्फरनगर जिले में नफरत की आग फिर भड़क गई है। भौराकलां थाना क्षेत्र के जंगल में विगत 30 अक्तूबर 2013 को दो समुदायों में भिड़ंत हो गई। दोनों तरफ से गोलियां चलीं, जिसमें हुसैनपुर कलां गांव के तीन युवकों की मौत हो गई।
सूचना पर डीएम, एसएसपी मौके पर पहुंचे और शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भिजवाया। वहीं घटना से गुस्साए हजारों लोगों की भीड़ ने बुढ़ाना कोतवाली को घेरकर हंगामा किया। इलाके में टकराव के हालात को देखते हुए आसपास के जिलों से फोर्स मांगाई गई है और सेना को भी तैयार रहने को कहा गया है |
मोहम्मदपुर रायसिंह गांव निवासी एक किसान ( रिटायर्ड फौजी ) शाम अपने खेत में काम करने के लिए गया था। ईंख के खेत में पहले से छिपे 10-11 हथियारबंद लोगों ने राजेंद्र को दबोच लिया और मारपीट शुरू कर दी। इस बीच दूसरे किसान ने फोन पर हमले की सूचना गांव में दे दी।
कुछ ही देर में गांव के लोग और पहले से ही तैनात पीएसी के साथ जंगल की ओर दौड़ पड़े। वहां आमने-सामने की फायरिंग हुई, जिसमें तीन युवकों की मौत हो गई। मृतक एक ही परिवार के बताए जा रहे हैं।
हमले में कई युवकों के घायल होने की सूचना है। डीएम कौशलराज शर्मा और एसएसपी हरिनारायण सिंह पुलिसबल के साथ मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने शव को उठवाकर पोस्टमार्टम के लिए भिजवाया। आईजी ब्रजभूषण और डीआईजी मुथा अशोक जैन भी मौके पर पहुंच गए। संवेदनशील थाना क्षेत्रों भौराकलां, फुगाना और शाहपुर इलाकों में सर्च अभियान चलाया जा रहा है। वहीं बुढ़ाना में हजारों की भीड़ ने कोतवाली घेराव किया | लोगों का आरोप है कि गांव से तीनों युवकों को उठाकर जंगल में ले जाकर मार दिया गया है। 
वारदात के बाद से देहात में तनाव व टकराव के हालात बने हुए हैं। एक अन्य घटना में शामली के फुगाना थाना क्षेत्र में मोटर साइकिल से जा रहे दंपति पर कुछ बदमाशों ने गोली चलाई, जिसमें महिला की मौत हो गई। एडीजी ने कहा कि दोनों वारदात अलग हैं और उनका आपस में कोई लेना-देना नहीं है।
 इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि ये दोनों घटनाएं इस पूरे क्षेत्र में व्याप्त तनाव और क़ानून - व्यवस्था बहाल करने में सरकारी मशीनरियों की लापरवाही का नतीजा हैं | राजनेता भी दंगों की आग पर अपनी - अपनी रोटी सेंकने में व्यस्त हैं | राहुल गाँधी का अजीबोगरीब बयान भी आता है | उन्होंने इंदौर में एक चुनावी सभा में कहा कि खुफ़िया विभाग के एक अफ़सर ने उन्हें बताया कि पाकिस्तान की खुफ़िया एजेंसी आई . एस. आई . मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ितों को वरगलाने की कोशिश में है | वह दंगा पीड़ित युवकों के संपर्क में थी | राहुल के मुताबिक़ , आई . एस आई . के अफ़सरों ने 15 - 20 पीड़ित युवकों से बात की | राहुल के इस आधारहीन बयान की जितनी निंदा की जाए , कम है | यह तो सीधे मुसलमानों की छवि धूमिल करने की कुचेष्टा हुई | क्या राहुल गाँधी को यह नहीं पता कि भारतीय मुसलमानों की पाकिस्तान में रिश्तेदारियां हैं , तो बात स्वाभाविक है , लेकिन यह बात आई . एस . आई . से कैसे हो गई , इस बात का उन्हें स्पष्टीकरण उन्हें देना चाहिए | 
इसी प्रकार की हरकत समाजवादी पार्टी की ओर से हुई | सपा की टीम द्वारा मुज़फ्फरनगर दंगे की सरकार को सौंपी गई रिपोर्ट में कहा गया है कि मदरसों से जुड़े लोग निजी हितों के लिए दंगा पीड़ितों को घर वापस नहीं जाने दे रहे। इस पर दर्जनों मुस्लिम संगठनों की अगुआई करनेवाली संस्था ऑल इंडिया मजलिस-ए-मुशावरत (एआईएमएमएम) ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार सब कुछ सही दिखाने के लिए पीड़ितों को जबरन राहत शिविरों से वापस उनके घर भेजना चाहती है | 
एआईएमएमएम के मुखिया डॉ. जफारुल इस्लाम खान ने कहा कि यह बेहद दुखद है कि सपा की टीम ने दंगा पीड़ितों की मदद करने वाले मदरसों और मस्जिद से जुड़े लोगों पर ओछे आरोप लगाए हैं। वास्तव में राज्य सरकार न केवल पीड़ितों को राहत शिविरों से जबरन हटाना चाहती है, बल्कि उन पर एफआईआर वापस लेने के दबाव भी डाल रही है।
उन्होंने कहा कि राहत शिविरों में ऐसे पीड़ित हैं जिनके रिश्तेदारों की हत्या हुई है अथवा उनके अपने के साथ दुराचार हुआ है। इनके घर जला दिए गए हैं। एफआईआर के बावजूद आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं। राज्य सरकार सुरक्षा का इंतजाम किए बिना इन्हें वापस भेजना चाहती है। इसी बीच अनहद ने एक बयान जारी कर आरोप लगाया है कि अखिलेश सरकार मोदी सरकार के पदचिन्हों पर चल रही है।संस्था ने जोला, जोगिया खेड़ा, लोई और कंदाला में राहत शिविरों के दौरे के बाद दावा किया कि दंगा पीड़ितों को एफआईआर में दर्ज नामों को हटाने के लिए प्रलोभन और धमकियां दी जा रही हैं।
 संस्था ने पीड़ितों के खिलाफ बड़ी संख्या में झूठे मुकदमे भी दर्ज कराए जाने का दावा किया है | हक़ीक़त यह है कि राज्य सरकार द्वारा दंगाईयों पर कठोर कार्रवाई न किए जाने से उनके हौसले बुलंद हैं | हिंसा की ताज़ा घटना इसी का नतीजा है | सांप्रदायिक हिंसा पर काबू पाने के लिए दंगाईयों और हिंसावादियों का दमन करना ही होगा और ख़ासकर दोनों विशेष समुदाय के नेताओं को हर हाल में शांति बनाए रखने एवं हिंसावादियों के नापाक इरादों को नाकाम करने के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार करनी होगी | 

क्या बेलफ़ास्ट समझौते की तर्ज़ पर होगा कश्मीर समस्या का हल ?

क्या बेलफ़ास्ट समझौते की तर्ज़ पर होगा कश्मीर समस्या का हल ?
- डॉ . मुहम्मद अहमद  
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ द्वारा विगत सप्ताह कश्मीर  समस्या का हल तलाश करने के लिए अमेरिका से मध्यस्थ की भूमिका निभाने की अपील करने के बाद इस समस्या पर एक बार फिर विश्व का ध्यान गया है | कुछ समाचार - पत्रों में यह बात छपी है कि इस समस्या का हल आयरलैंड माडल पर तलाशने की कवायद तेज हो गई है। यह बात भी कही जा रहा है कि इसके हल की खातिर केंद्र सरकार , कश्मीरी जनता और जन संगठनों की प्रतिनिधि पार्टी सर्वदलीय हुर्रियत कांफ्रेंस के साथ नागालैंड की तर्ज पर देश व संविधान के बाहर बातचीत करने को भी तैयार हो गई है। यह भी सुखद है कि इस दिशा में दोनों ही पक्षों द्वारा तेजी के साथ कदम उठाए जा रहे हैं , लेकिन अभी यह सुनिश्चित नहीं है कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत कब तक आरंभ हो पाएगी ,हालांकि इसके प्रति संकेत अब मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह देने लगे हैं।
इंग्लैंड की एक पत्रिका के साथ साक्षात्कार में मुख्यमंत्री ने इसका रहस्योद्धाटन किया है कि आयरलैंड माडल के आधार पर कश्मीर समस्या का हल खोजा जा रहा है। दूसरी ओर सर्वदलीय हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं ने भी इसकी पुष्टि की है कि कश्मीर समस्या के हल की खातिर उसके घटक दलों को आयरलैंड माडल स्वीकार्य है। उनका कहना है कि बस चिंता इस बात की है कि भारत सरकार के साथ होने वाली बातचीत जल्द आरंभ होनी चाहिए , ताकि कोई तीसरा पक्ष बातचीत में अड़ंगा न डालने पाए। हुर्रियत पाकिस्तान के साथ त्रिपक्षीय बातचीत कर कश्मीर समस्याका हल तलाशने पर ज़ोर देती रही है | उसने अपने ताज़ा बयान में कहा है कि वह आयरलैंड माडल के तहत कश्मीर समस्या का हल तलाशने की संभावनाओं पर अगले कुछ दिनों में हुर्रियत कार्यकारिणी की महत्वपूर्ण बैठक बुलाएगी । अगले कुछ दिनों में हुर्रियत की होने वाली बैठक में आयरलैंड माडल अर्थात बेलफास्ट समझौते पर चर्चा करने का प्रस्ताव लाया जाने वाला है। यह खबर भी छपी है कि हुर्रियत कांफ्रेंस अब बातचीत में पाकिस्तान को शामिल करने का जोर नहीं डाल रही। पहले ही इस पर हुर्रियत के भीतर मंथन हो चुका है | यह बात उसने स्पष्ट शब्दों में तो नहीं कही है , मगर यह इशारा जरूर किया है कि अगर बातचीत में देरी की गई तो कुछ ताकतें उसमें अड़ंगा डाल सकती हैं। असल में हुर्रियत को डर है कि पाकिस्तान उसकी पेशकश से तिलमिला उठेगा और वह हुर्रियत नेताओं की हत्याएं करवा कर कश्मीर में हवा के रूख को बदलने  की कोशिश कर सकता है। यह दुर्भाग्य की बात है कि कश्मीर जब अपेक्षाकृत शांत रहता है, तब उस पर न तो बातचीत की जाती है और न लेख लिखे जाते हैं। जब कश्मीर का तापमान बढ़ता है, तब सभी चिंतित होने लगते हैं। इसी समय कश्मीर के आंदोलनकारियों को बातचीत का निमंत्रण भी दिया जाने लगता है। जैसे ही तनाव कुछ कम होता है, कश्मीर के प्रति पुरानी उदासीनता लौट आती है। यह भारतीय राजनीति का पुराना चलन रहा  है, जिसके फलस्वरूप देश की कोई भी बड़ी समस्या हल नहीं हो पा रही है। 
इसे एक उदहारण से भी समझा जा सकता है | केंद्र सरकार ने जम्‍मू-कश्‍मीर में सभी वर्गों के लोगों के साथ बातचीत के लिये 13 अक्तूबर 2010 को वार्ताकारों का समूह नियुक्‍त किया था। इस समूह में राधा कुमार, एमएम अंसारी और दिलीप पाडगांवकर को सदस्य बनाया गया था. इस समूह ने राष्‍ट्रीय और  राज्य स्तर पर जम्‍मू-कश्मीर की सरकार, राजनीतिक दलों व संबंधित नागरिक वर्ग के साथ व्‍यापक विचार - विमर्श किया एवं अपनी रिपोर्ट 12 अक्तूबर 2011 को सौंप दी | सरकार ने अब तक रिपोर्ट पर कोई निर्णय नहीं लिया है | गृह मंत्रालय ने कहा था कि इस रिपोर्ट पर पूरे देश में बहस होगी और उसके बाद ही कोई फैसला लिया जाएगा , लेकिन अब तक किसी प्रकार की बहस नहीं की गई | इस प्रयास में वार्ताकारों के समूह ने बहुत दिलचस्प सच्चाई को उजागर किया था | उनका कहना था कि कश्मीर में समस्या के हल के लिए एक संवैधानिक कमेटी का गठन किया जाना चाहिए, जिसमें कश्मीर के हवाले से केंद्र राज्य संबंधों पर फिर से नज़र डाला जाना चाहिए | इस समूह ने कहा था कि कुछ ऐसे बिंदु हैं जिन पर पूरी तरह से आम सहमति है | मसलन जम्मू-कश्मीर का राजनीतिक हल निकाला जाना चाहिए और इसके लिए केवल बातचीत का रास्ता ही अपनाया जाना चाहिए | समूह ने कहा था  कि जो लोग मुख्यधारा में नहीं हैं उनसे भी बातचीत की जानी चाहिए | वार्ताकारों ने कहा कि इस बात पर राज्य में चिंता जताई गयी कि संविधान के अनुच्छेद 370 को धीरे-धीरे ख़त्म कर दिया गया है और उसको अपनी सूरत में बहाल किया जाना चाहिए | इस समूह ने साफ़ कहा था कि जो लोग राज्य में व्याप्त हिंसा के कारण अपना घर-बार छोड़ने के लिए मजबूर हो गए थे उनको हर हाल में अपने घरों को सुरक्षा में वापस भेजा जाना चाहिए और उनकी शिरकत के बिना कोई भी हल टिकाऊ नहीं होगा , लेकिन इस दिशा में भी कोई प्रयास नहीं किए गए | समूह ने ये सुझाव भी दिए थे कि राज्य के आर्थिक विकास के लिए केंद्र सरकार को विशेष पैकेज देना चाहिए एवं नियंत्रण रेखा और उस पार के लिए सामान और लोगों के आवाजाही को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए | समूह ने अपने सुझावों में कहा था कि लोग पिछले 20 वर्षों  से जारी आतंक से ऊब चुके हैं , इसलिए प्रशासन और कानून के राज  की लालसा सब के मन में है , हालांकि आम तौर पर लोग मानते हैं कि सरकारें अपना काम ठीक से करने में नाकाम रही हैं | सरकारें गैर ज़िम्मेदारी से काम कर रही हैं | समूह ने साफ़ किया था कि इस समस्या के हल हेतु राजनीतिक स्तर पर बातचीत की ज़रूरत है और उसे फ़ौरन शुरू किया जाना चाहिए , लेकिन समूह की ये सारी सिफ़ारिशें ठंडे बस्ते में डाल दी गईं | वास्तव में कश्मीर समस्या को समझने के लिए सबसे पहले राज्य के मुसलमानों की मनस्थिति को समझने की जरूरत है। इसके लिए इतिहास में जाना पड़ेगा। जम्मू और कश्मीर के सबसे बड़े नेता शेख अब्दुल्लाह ने, जिन्होंने लंबे जन संघर्ष के द्वारा प्रतिक्रियावादी डोगरा शासन से कश्मीर को मुक्त कराया और भारत में कश्मीर के विलय को संभव किया | उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘आतिशे चिनार’ में कश्मीर के इतिहास की ऐसी बहुत-सी बातों का जिक्र किया है जिनसे कश्मीर की पीड़ा और क्षोभ को महसूस किया जा सकता है। बहुत कम लोगों को पता होगा कि कश्मीर के दमन का सिलसिला अकबर के समय में ही शुरू हो गया था। अकबर ने एक फरमान के जरिए कश्मीरियों को हथियार बांधने से मना कर दिया। इस फरमान का उद्देश्य यही था कि कश्मीरी अपनी खोई हुई आजादी को प्राप्त करने की चेष्टा न करें। कश्मीर के परवर्ती शासकों – पठानों, सिखों और डोगरों – सभी ने अकबर के इस फरमान को जारी रखा। कश्मीरियों की निरुपायता की यह प्रक्रिया विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए डोगरा शासन में अमानवीयता की सीमा छूने लगी। डोगरों ने कश्मीर को अपने बाहुबल से हासिल नहीं किया था , बल्कि अमृतसर संधि के तहत खरीदा था, अतः वे निवेशित पूंजी की जल्दी से जल्दी वसूल करना चाहते थे। शाल बुनकरों के किसी और धंधे में जाने की मनाही कर दी गई। साथ ही डोगरा शासकों ने अनेक कानूनी बारीकियों एवं विधानों द्वारा कश्मीरी मुसलमानों के उच्च शिक्षा प्राप्त करने पर पाबंदियां लगा दीं। शिक्षा की तरह नौकरियों के द्वार भी मुसलमानों के लिए बंद थे। उच्च शिक्षा के लिए उन्हें लाहौर और अलीगढ़ की राह नापनी पड़ती थी। खुद शेख अब्दुल्लाह  को पहले लाहौर, फिर अलीगढ़ जाना पड़ा था। कश्मीर के कॉलेजों के दरवाजे उनके लिए बंद थे। शेख अब्दुल्ला ने अपने सामंतवाद विरोधी आंदोलन के जरिए मानवीय के मूल्यों की स्थापना भी की। शेख साहब लिखते हैं, ‘हमारे आंदोलन का दायरा पहले तो मुसलमानों तक सीमित रहा। लेकिन जब आंदोलन के दरवाजे सब धर्मों के लिए खोल दिए गए तो एक संयुक्त मोर्चे की आवश्यकता महसूस हुई। यह मात्र धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक कोटि की ही हो सकता था। जीवन और आंदोलन के अनुभव ने हमें कायल कर दिया था कि अवाम के विभिन्न वर्गों में बुनियादी टकराव धर्मों का नहीं, बल्कि हितों का है। एक तरफ शोषण करने वाले थे और दूसरी तरफ वह जो शोषण का शिकार थे। हमारी लड़ाई की मंशा व मकसद मजलूम की हिमायत और जालिम की मुखालफत था।’ इसी वजह से मुस्लिम कांफ्रेंस का विस्तार कर उसे नेशनल कांफ्रेंस बना दिया गया। यही कश्मीर आंदोलन आज एक अलगाववादी संघर्ष में बदल गया है, तो इसके कारणों पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है। 
जब पाकिस्तान की शह पर कबायलियों ने कश्मीर पर हमला किया और शेख साहब और उनके साथी - समर्थक बहादुरी से उनका मुकाबला कर रहे थे, उस कठिन समय में महाराजा हरी सिंह ने क्या किया ? शेख़ अब्दुल्लाह के खयालों को कलमबंद करते हुए शीस खान अपने सारांश में लिखते हैं, ‘महाराज हरि सिंह का हीरे-जवाहरात से लद-फंद कर सौ से अधिक मोटरगाड़ियों के काफिले के साथ सपरिवार जम्मू भाग जाना, अपनी कश्मीरी प्रजा को विपत्ति के समय उसके हाल पर छोड़ देना, महाराजा और महारानी तारा देवी का जम्मू के उग्रवादियों को वहां के मुसलमानों के कत्ले-आम के लिए भड़काना, पाकिस्तान भेजने के झांसे से मुसलमानों को एक पार्क में इकट्ठा करवा कर , उसके बाद उन्हें एक ट्क में भर कर एक पहाड़ी के पास उतरवा कर मशीनगनों से उड़ा देना जैसी घटनाएं शेख अब्दुल्ला और उनके आंदोलन को झुलसाने के लिए काफी थीं।’ शेख साहब का कहना है कि 1953 से फरवरी 1964 तक उन्हें अकारण जेल में सड़ाने और उनकी अवामी नेतृत्व शक्ति को बर्दाश्त न कर सकने की पृष्ठभूमि में पं. नेहरू का दोहरा व्यक्तित्व था जो उनकी ग्रेटर इंडिया की परिकल्पना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच दंगल का अखाड़ा बना रहा। वह दोस्तबाजी में अतिवाद की सीमा तक जा सकते थे, किंतु केवल उस स्थिति में जब उन्हें अपने राष्ट्र और अपने व्यक्तिगत हितों पर आंच लगती न मालूम होती थी। वे अपने अंतिम दिनों में अपनी गलतियों का प्रायश्चित करने की बड़ी अभिलाषा रखते थे। उन्होंने 1964 में शेख की रिहाई के बाद अपने रंज और पछतावे की अभिव्यक्ति की। वे सच्चे दिल से कश्मीर की गुत्थी सुलझाने के लिए शेख की मदद हासिल करना चाहते थे , लेकिन इसके पहले ही मौत ने हस्तक्षेप कर दिया और उनकी दिल ही रह में रह गई। दुर्भाग्य यह है कि नेहरू के चले जाने के बाद भारत की किसी भी सत्ता ने कश्मीर समस्या को सुलझाने की दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं की। फलतः कश्मीर समस्या में नए-नए पेंच जुड़ते चले गए। एक बार तो सरदार पटेल ने शेख अब्दुल्ला से यहां तक कह दिया, ‘बेहतर यही है कि हम एक-दूसरे से अलग हो जाएं।’ इस पर शेख साहब का जवाब था, ‘कश्मीर के लोगों ने आपके साथ उद्देश्य की समकक्षता के आधार पर हाथ मिलाया है। आप अब अपना हाथ खींच लेना चाहते हैं, तो आपका अधिकार है। लेकिन हमने आपसे व्यक्तिगत तौर पर हाथ नहीं मिलाया, बल्कि हिंदुस्तानी अवाम के साथ रिश्ता जोड़ा है। यह सवाल उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए। हम भी अपना केस उनके सामने रखेंगे। आप भी अपना दृष्टिकोण उनके सामने रखिए। जो उनका फैसला होगा, वह हमें मंजूर होगा।’ भारत सरकार को चाहिए कि इस समस्या के हल के लिए संजीदा कोशिश करे |