Dec 31, 2013

मंगलकारी हो नववर्ष


नव वर्ष 2014 आप सभी के जीवन में नई खुशियाँ लेकर आए , मंगलकारी हो ..... इस सुअवसर पर हम समभाव के उस संस्कार को विस्तृत आधार देने का संकल्प करें , जिसका आह्वान कबीर ने सदियों पूर्व किया था -
एक बूंद एकै मलमूतर , एक चाम इक गूदा ,
एक जाति से सब उतपना , कौन ब्राह्मण कौन सूद्र ,
एकै पवन एक ही पानी , एक जाति संसार 
एक ही खाक घड़े सब भांड़ , एक ही सिरजनहारा |
......  पुनश्च बधाइयां , शुभकामनाएं !    

लोग अपने होंठ सीकर निश्चिंतता समेटते रहे


लोग अपने होंठ सीकर निश्चिंतता समेटते रहे , 
इक हम हैं कि सच बोल - बोलकर दिल दुखाते रहे ,
मैं अकेला चला अपनी यादों का गठ्ठर लेकर ,
रहज़नों को लाल  बताकर मुसीबतें बढ़ाते  रहे | 
 - अहमद ' मोहित '

Dec 29, 2013

बेकसूरी का ऐलान

बेकसूरी का ऐलान , फिर भी जेल में !


उत्तर प्रदेश में नवम्बर 2007 के  लखनऊ, बनारस और फैजाबाद के कचहरी बम धमाकों में गिरफ्तार तथाकथित  मुख्य आरोपी आजमगढ़ के तारिक कासिमी और जौनपुर के खालिद मुजाहिद मामले में गठित जस्टिस आरडी  निमेष जाँच आयोग  ने  साफ़ किया है कि इन दोनों आरोपियों की गिरफ़्तारी फर्ज़ी है . इनके सिलसिले के घटनाक्रमों में बहुत सारे विरोधाभास हैं , जो पुलिस बल की ग़ैरज़िम्मेदाराना कार्यशैली की कहानी बयान करते हैं . पुलिस प्रताड़ना से खालिद की 18 मई 2013 को मृत्यु हो चुकी है .
 यह भी कहना उचित होगा कि उत्तर प्रदेश की सपा सरकार की कार्यशैली भी विगत अन्य सरकारों से भिन्न नहीं है . लगभग सात  महीने पहले मिस्टर आरडी निमेष ने अपनी जाँच - रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी , जिसे अखिलेश सरकार दबाये बैठी हुई थी . सपा के चुनाव घोषणापत्र में बेक़सूर मुस्लिम नवजवानों की रिहाई के लाख दावे किये गये हों , पर अमलन कुछ नहीं हो सका .
 पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ज़बानी तौर पर  चार सौ बेक़सूर मुस्लिम नवजवानों  को रिहा करने की घोषणा कर चुके हैं , किन्तु अमलन एक की भी रिहाई नहीं हो पाई है .  दरअसल बात यहाँ इच्छाशक्ति की है . अखिलेश सरकार चाहती तो निमेष आयोग की रिपोर्ट का हवाला देकर तारिक और खालिद को रिपोर्ट के आने फ़ौरन बाद रिहा कर सकती थी , लेकिन उसने ऐसा न करके रिपोर्ट को ही दबा दिया . अब कुछ मानवाधिकारवादी स्वयंसेवी , सामाजिक  संगठनों की कोशिशों से निमेष आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक हो गयी है . 
अतः सरकार को चाहिए कि वह तारिक और खालिद को फ़ौरन रिहा करने के साथ अन्य बेक़सूर कैदियों के मामलों की समीक्षा करके उन्हें रिहा करे . ' आतंकवाद के नाम पर क़ैद बेकसूरों के रिहाई मंच ' ने बार - बार अखिलेश सरकार से मांग की है कि बेकसूरों को अविलम्ब छोड़ा जाए . 
इस मंच ने विगत वर्ष तीस जून को  लखनऊ विधानसभा के बाहर ' वादा निभाओ ' धरने का भी आयोजन करके  इस सिलसिले में सरकार को  आठ सूत्रीय ज्ञापन भी सौंपा था , मगर सरकार सोती रही . जमाअत इस्लामी हिन्द ने भी ठोस प्रयास किये और इस दिशा में आज भी प्रयास जारी है . जमाअत के केन्द्रीय नेताओं का एक प्रतिनिधि मंडल पिछले वर्ष दस अक्तूबर को केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे से मिला और और बेकसूरों को फ़ौरन रिहाई की मांग की थी .   
 उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पिछले वर्ष पन्द्रह मार्च को  पदभार ग्रहण करने के बाद ही तारिक और खालिद के मामले की फ़ाइलें मंगाई थीं और रिहाई के सिलसिले में गौर किया था . मगर भाजपा जैसी कुछ पार्टियों द्वारा विरोध जताने के बाद रिहाई की दिशा में कोई प्रगति नहीं हो पाई , यहाँ तक कि निमेष आयोग की रिपोर्ट को भी दबा दिया गया . अभी हाल में अखिलेश सरकार ने अपने कार्यकाल के एक साल पूरे किये हैं , मगर उसे अपने वादे का ज़रा भी खयाल नहीं है . इस सरकार से यह भी आशा की गयी थी कि यह सांप्रदायिक ताक़तों को काबू में रखेगी , जिसके नतीजे में प्रदेश में शांति और अम्नोअमान की फ़ज़ा बनेगी , लेकिन हुआ इसके बिलकुल उल्टा .  गुज़रे एक साल में छोटे - बड़े 27 दंगे हुए . इन दंगों के सर्वाधिक शिकार मुसलमान ही हुए . मतलब यह कि सपा सरकार मुसलमानों के हितार्थ कोई भी पोज़िटिव क़दम उठाने में नाकाम रही है .
निमेष जाँच आयोग पुलिस और सरकार दोनों की पक्षपाती भूमिका को उजागर करने में सक्षम है . यह दोनों को कटघरे में खड़ा करती है . आरोपियों के  मोबाइल नंबरों की जांच में लापरवाहियों और दोनों आरोपियों के अपहरण की सूचना परिजनों और स्थानीय नेताओं द्वारा दर्ज कराये जाने के बावजूद जांच का न होना भी आंतकवाद आरोपियों को फंसाये जाने की ओर इशारा करता है. जांच आयोग ने गिरफ्तारी के अनियमितता और झोल को कुल 14 बिंदुओं में समेटा है.
रिपोर्ट के 14वें हिस्से में कहा गया है कि कथित आरोपी तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की 22 दिसंबर 2007 को सुबह 6.20 बजे आपत्तिजनक वस्तुओं के साथ गिरफ्तारी संदेहजनक प्रतीत होती है और अभियोजन के गवाहों पर पूर्णरूप से विश्वास नहीं किया जा सकता.’ जांच आयोग ने अपने 12 सूत्रीय सुझावों में कई महत्वपूर्ण सुझाव आतंकवाद मामलों में होने वाली गिरफ्तारियों को लेकर दिये हैं, जिनमें सुझाव संख्या 8 और 11 बेहद महत्वपूर्ण हैं. सुझाव आठ में कहा गया है कि ऐसे मुकदमों के निर्धारण की सीमा अधिकतम 2 साल् होनी चाहिए. केस समय पर निस्तारण न होने पर समीक्षा होनी चाहिए और संबंधित व्यक्ति के विरूद्ध कार्यवाही होनी चाहिए.वहीं सुझाव संख्या 11 में झूठे मामलों में फंसाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाहीऔर सुझाव 9 में गिरफ्तार बेक़सूर लोगों को मुआवज़ा देने की बात कही गयी है. 
135 पन्नों की यह रिपोर्ट एक सदस्यीय जाँच आयोग के अध्यक्ष और पूर्व न्यायाधीश आरडी निमेष ने 31 अगस्त को ही सरकार को सौंप दी थी , लेकिन सरकार रिपोर्ट जारी करने को तैयार नहीं थी. सरकार जानती थी कि रिपोर्ट जारी होते ही मानवाधिकार संगठन और मुस्लिम समुदाय निर्दोषों को छोड़ने, फंसाने वाले पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई  करने को लेकर दबाव बनायेंगे .  अखिलेश सरकार को न चाहते हुए भी अब ठोस कार्रवाई  करनी होगी . 2007 में हुई गिरफ्तारियों को लेकर यूपी एसटीएफ के दावों पर उठे सवालों पर तत्कालीन बसपा सरकार ने मार्च 2008 में आरडी निमेष आयोग का गठन किया था.  प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्त्ता संदीप पाण्डेय और अन्य ने इस रिपोर्ट को हाल में ही  सोशलिस्ट पार्टी के लखनऊ स्थित कार्यालय से जारी किया. इस रिपोर्ट पर सरकार अब भी खामोश है . 
इस जाँच रिपोर्ट के आने 6 साल लग गए. मामला बाराबंकी कोर्ट में लंबित होने के कारण अपनी कानूनी सीमाओं का हवाला देते हुए जांच आयोग ने कहा है कि वह किसी व्यक्ति के  ख़िलाफ़  कार्रवाई  को निर्धारित नहीं कर सकता, लेकिन आयोग की रिपोर्ट ने अब तक हुई पुलिसिया जांच को उलट कर रख दिया है. रिपोर्ट में निष्कर्ष के तौर पर साफ़ तौर पर कहा   गया है कि उत्तर प्रदेश कचहरी बम ब्लास्ट मामले में वर्ष 2007 में आजमगढ़ जिले के तारिक कासमी और जौनपुर जिले के खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी संदेहास्पद है.
  निमेष आयोग ने गिरफ्तारियों पर संदेह का आधार गिरफ्तारियों के दिन के अखबारों में छपी रिपोर्टों और पुलिसिया कहानी के गंभीर अंतर को बनाया है . यह पूरा मामला खुले झूठ पर टिका है , फिर भी उक्त दोनों नवजवान की यातना झेलने के लिए अभिशप्त हैं  . जेल में यातना और उत्पीड़न का दौर अलग से चलता है . 
वाकिया यह है कि तारिक का अपहरण 12 दिसंबर 2007 को दिन में किया जाता है, अखबार 13 को खबर प्रकाशित करते हैं और पुलिस गिरफ्तारी के दस दिन बाद 22 दिसंबर को बाराबंकी से इन दोनों आरोपियों की गिरफ्तारी गोला-बारूदों के साथ दिखाती है. वह भी गिरफ्तारी तब दिखाती है जब नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष चौधरी चरण पाल राज्यपाल को यह ज्ञापन देते हैं कि अगर 22 दिसंबर को तारिक कासमी को उनके परिजनों को नहीं सौंपा गया तो वह दिन के 22 दिसम्बर को ही 2 बजे कोटला मदरसे  के सामने आत्मदाह कर लेंगे . साथ ही तारिक के दादा ने एसटीऍफ़ की  इस ग़ैरकानूनी हरकत की लिखित सूचना 14 दिसम्बर 2007 रानी की सराय थाने को दी थी . 
पीपुल्स विजलेंस  कमेटी आन ह्यूमन राइट्स [ PVCHR] के महासचिव डॉ . लेनिन रघुवंशी का कहना है कि इस मामले में  पुलिस ने जिन सामानों की बरामदगी दिखाई , उन्हें अमलन पेश नहीं किया . सिर्फ़ कागज़ों में ही डिस्पोज़ल किया गया . उ . प्र . एसटीएफ ने उक्त दोनों नवजवानों के खिलाफ़ कार्रवाई उनके इक़बालिया बयानों के आधार पर की थी और इन बयानों को पुलिस ने अपने मन से लिखा था . डॉ . रघुवंशी के अनुसार , उ . प्र . के तत्कालीन पुलिस प्रमुख विक्रम सिंह और एसटीएफ प्रमुख बृज लाल ने ने योजनाबद्ध  तरीक़े से मुस्लिम नवजवानों को आतंकी घटनाओं में निरुद्ध किया था . निमेष आयोग ने दोषी पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की भी सिफ़ारिश की है . 
- डॉ . मुहम्मद अहमद       

वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता...

वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता...



हमारे देश में साम्प्रदायिक दंगों का बड़ा ही दुखद इतिहास रहा है । आमतौर पर देखा गया है कि इन दंगों की रिपोर्ट मंज़रेआम पर नहीं आ पाती । फैज़ाबाद, रुदौली और आसपास के इलाकों  में  अक्तूबर 2012  में बड़े पैमाने पर मुस्लिम विरोधी  हिंसा हुई, जो पूरी तरह सुनियोजित थी । भारतीय प्रेस परिषद के  अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने इसकी जांच के लिए जो आयोग बनाया था, उसकी रिपोर्ट में अस्ल दंगाइयों को रेखांकित किया ही गया था | वरिष्ठ पत्रकार  शीतला सिंह की अध्यक्षता में गठित आयोग ने इसमें सांप्रदायिक ताकतों  के मज़बूत गठजोड़ को जि़म्मेदार माना है और मीडिया की भूमिका को सांप्रदायिक क़रार दिया है । स्थानीय अख़बारों ने एक समुदाय विशेष पर ही जान-बूझकर निशाना साधकर उनकी मुसीबतें बढायीं । आयोग की रिपोर्ट ने सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के इस झूठ का पोल खोल दिया है कि दंगा हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच अविश्वास फैलाने या सरकार को बदनाम करने के षड्यंत्र के तहत  हुआ । आयोग ने साफ कहा है कि यह सुनियोजित था और भाजपा के फिरकापरस्त  नेताओं और कथित सेकुलर  सरकार की प्रशासनिक मिलीभगत से हुआ । उल्लेखनीय है कि ‘कंबट कम्युनलिज़्म’ की को- एडीटर तीस्ता सीतलवाड की अपील पर प्रेस आयोग ने जांच हेतु उक्त आयोग गठित किया था ।

शीतला सिंह आयोग ने कहा है कि रुदौली के भाजपा विधयक रामचन्द्र यादव और पूर्व भाजपा विधयक लल्लू सिंह तो दंगे के षड्यंत्रकर्ता तो थे ही, योगी आदित्य नाथ ने भी दंगे को भड़काया । वरिष्ठ प्रशासनिक अफ्सरों  तत्कालीन डी॰एम॰ दीपक अग्रवाल, तत्कालीन एस॰एस॰पी॰ रमित शर्मा, तत्कालीन एस॰पी॰ रामजी सिंह यादव और तत्कालीन ए॰डी॰एम॰ सिटी श्रीकांत मिश्र समेत पूरा पुलिस अमला इस मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक हिंसा में शामिल था । शीतला सिंह आयोग ने तत्कालीन डी॰एम॰ दीपक अग्रवाल के कर्फ्यू  संबंधी आदेश को सांप्रदायिक मानसिकता का परिचायक बताते हुए सभी अधिकारियों पर कर्तव्यों की अवहेलना, अकुशलता  और इच्छाशक्ति के अभाव का आरोप लगाते हुए उन्हें दंडित करने और भविष्य में निर्णायक पदों पर नियुक्त न किये जाने की बात कही है । साथ ही आयोग ने यह सिप़फारिश भी की है कि सभी दोषी अधिकारियों को राज्य सरकार द्वारा तत्काल प्रभाव से उनको पदमुक्त किया जाए । आयोग ने सिफारिश की है कि दंगे की जांच न्यायिक या स्वतंत्र आयोग से करायी जाए ।
उत्तर प्रदेश में सक्रिय रिहाई मंच ने प्रेस परिषद द्वारा गठित फैज़ाबाद दंगे की जांच रिपोर्ट का स्वागत करते हुए कहा कि सपा सरकार में थोड़ी भी शर्म बची हो तो उसे इस घटना की सी॰बी॰आई॰ जांच का आदेश दे देना चाहिए। आवामी काउंसिल में राष्ट्रीय महासचिव असद हयात व रिहाई मंच के प्रवक्ता राजीव यादव और शाहनवाज़ आलम ने कहा कि दंगे के बाद सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि फैज़ाबाद का दंगा हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच अविश्वास के चलते हुआ था , तो वहीं उनके मुख्यमंत्री बेटे अखिलेश यादव ने कहा था कि दंगा सरकार को बदनाम करने के लिए किया गया था , लेकिन प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय  काटजू द्वारा गठित शीतला सिंह आयोग की रिपोर्ट ने सपा मुखिया और मुख्यमंत्री के झूठ का पोल खोल दिया है कि दंगा हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अविश्वास फैलने या सरकार को बदनाम करने के षड्यंत्र के तहत नहीं हुआ, जिसमें सपा सरकार के लोगों की प्रत्यक्ष या परोक्ष सहमति थी । रिहाई मंच ने कहा कि फैज़ाबाद में 24 अक्तूबर 2012 को हुई मुस्लिम विरोधी हिंसा सपा और भाजपा के राजनीतिक रणनीति का हिस्सा थी| ऐसे में इस घटना की तत्काल सी॰बी॰आई॰ जांच करवायी जाए।    
उल्लेखनीय है कि रिहाई मंच के जांच दल ने पहले ही प़ैफजाबाद के दशहरा स्थित भदरसा गांव का भी दौरा किया था, जो हिंसा प्रभावित था । जांच दल ने पाया था कि भदरसा में हुई हिंसा पूरी तरह सुनियोजित थी,  जिसे साम्प्रदायिक तत्वों और प्रशासन की मिलीभगत से अंजाम दिया गया । इसमें मीडिया की भूमिका भी संदिग्ध थी । जांच दल ने यह भी पाया था कि प्रशासन की तरफ से आगज़नी से पीडि़त परिवारों से घटना के साक्ष्य जबरन मिटवाये गए , जबकि पीडि़तों को न तो उचित मुआवज़ा मिला है और न ही समुचित रूप से  एफ॰आई॰ आर॰ दर्ज किये गये हैं ।
रिहाई मंच ने भदरसा के अपने दौरे में पाया कि 24 और 26 अक्तूबर की देर शाम को हज़ारों की संख्या में दंगाइयों ने भदरसा स्थित मुस्लिम कस्बे को चारों ओर से घेर लिया और उत्तेजक नारों के  साथ हमला करते हुए आगज़नी और लूटपाट की घटनाओं को अंजाम दिया, जिसमें सौ से अधिक घर जला दिये गये थे । यह  हमला इस क़दर प्रायोजित था कि दंगाई मुस्लिमों की बस्ती को जलाने के लिये पेट्रोल बम भी साथ लेकर के आये थे । जांच दल को स्थानीय निवासियों ने दबी जबान में बताया कि दंगे से पूर्व अधिकारियों और पुलिस वालों ने भदरसा के चारों कोटेदारों से भारी मात्रा में कैरोसीन तेल थाने पहुंचाने का आदेश दिया था| दूसरी ओर स्थानीय मीडिया विनय कटियार जैसे नेताओं के हवाले से यह ख़बर प्रचारित कर रही थी कि प्रत्येक मुसलमान के घर पांच-पांच लीटर तेल बांटे गये ।
 इसे सच मानकर पुलिस ने केवल  मुसलमानों को गिरफ़्तार  किया। एक बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि मुसलमान दंगों में शामिल थे तो बड़े पैमाने पर सिर्फ़  उन्हीं के घर क्यों जले। जांच दल ने पाया कि मुसलमानों  के घरों को पूरी तरह जलाने के लिये उनके बिस्तरों और कपड़ों का भी इस्तेमाल किया, जिसकी मौके पर जाकर शिनाख़्त की गयी। जांच दल ने यह भी पाया कि इस पूरी घटना के  दौरान पी॰ए॰सी॰ आतताइयों के  पक्ष में मूकदर्शक बनी रही ।  घटना के बाद जब पीडि़त परिवारों ने थाने में रिपोर्ट लिखाने की कोशिश की, तो उन्हें भगा दिया गया और कहा गया कि रिपोर्ट तभी दर्ज होगी जब इसमें से प्रशासन पर लगाए आरोपों को हटा लिया जाएगा । 
जांच दल ने पाया कि पूरी तरह से जल चुके मुस्लिम घरों वाले इस मुहल्ले में आगज़नी और हमलों के  साक्ष्यों को मिटाने के लिये प्रशासनिक अमले के इशारे पर फत्तेपुर के ग्राम प्रधान पतिराम ने पुलिस के सहयोग से जबरिया मलवे को हटवाने के लिये लोगों पर दबाव डाला । जांच दल ने यह भी पाया कि स्थानीय लेखपाल राजेश कुमार सिंह ने मुआवज़ा निर्धारण करने की प्रक्रिया में भारी अनियमितता बरती है । इस हिंसा में जिन लोगों की कई लाख रुपये का नुकसान हुआ , उन्हें चंद हज़ार रुपये बतौर राहत दिया गया । साथ ही जो ग़रीब, विधवा  और पूरी तरह निराश्रित थे उन्हें मुआवज़े के योग्य ही नहीं समझा गया ।लेखपाल ने साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर मुआवजे़ से वंचित रह गये लोगों से यह भी कहा कि आपको अपने जान-माल की सुरक्षा स्वयं करनी चाहिए थी। जांच दल ने पाया कि फैज़ाबाद की तर्ज पर ही भदरसा में भी राहत और बचाव दल को तय समय पर पहुँचने से रोकने की सचेत कोशिश के तहत फायर ब्रिगेड, पुलिस की जीप और परिवहन विभाग के एक बस को जला दिया गया । साजि़श का पता इस बात से भी चलता है कि अव्वल तो फायर ब्रिगेड पहुंचे  ही नहीं और  पहुंचे  भी तो उनके  पास पानी ही नहीं था । अर्ध सैन्य बल और पुलिस के आला अधिकारियों का भदरसा मौके  पर न पहुंचना  भी प्रशासनिक भूमिका को संदिग्ध् बनाती है । जबकि भदरसा फैज़ाबाद मुख्यालय से मात्रा 17 किलोमीटर दूरी पर स्थित है । 
जांच दल ने यह भी सवाल उठाया कि 24 अक्तूबर के साम्प्रदायिक हिंसा के बाद 25 अक्तूबर को तो शांति बनी रही लेकिन फिर  26 तारीख़ को और भी बड़े पैमाने पर हिंसा कैसे हो गयी ? जबकि 24 की हिंसा के बाद ही उसे मुस्तैद हो जाना चाहिये था ।
जांच बल ने पाया कि भदरसा के पूर्व चेयरमैन और भाजपा नेता रामबोध सोनी , भोला मास्टर, व्यापार मंडल के अध्यक्ष दयालू, वीरेन्द्र हलवाई, जगदम्बा प्रसाद, सुरेंद्र मौर्य, नयिकापुर के प्रधान गोपीनाथ उर्फ़ गुप्पी, प्रधान बाबूलाल यादव और उनके  दो लड़कों के साथ केशवपुर, राजेपुर, बनईयापुर, केवटहिया, निमोलिया, लालपुर आदि गांव के हज़ारों लोग इस सुनियोजित दंगे में शामिल रहे । पुलिस की साम्प्रदायिक कार्यप्रणाली को समझने के लिये अभियुक्त बनाए गये पचहत्तर वर्षीय हाजी इफ्तिख़ार के खि़लाफ दर्ज हत्या का आरोप ही काफी होगा । वे लकवाग्रस्त हैं | उनके अंग भी ठीक से काम नहीं कर पाते हैं । जिन बीड़ी मज़दूरों के घर साम्प्रदायिक हिंसा की भेंट चढ़ गये पुलिस ने उन्हीं लोगों को बंदूकों से बट  से पीटा, महिलाओं के  साथ अभद्रता की और उन्हीं के  घरों के  बच्चों को गिरफ़्तार  करके  भी ले गयी , यहां तक कि  आक़िब जैसे चौदह साल के नाबालिग़ बच्चे को भी पुलिस ने नहीं छोड़ा और दंगाई बता कर जेल में डाल दिया । इन  विषम परिस्थितियों की मांग है कि इस पूरे हिंसा-कांड की ठीक से जांच कराई जाए । अतः शीतला सिंह आयोग की सिफारिशों को मानकर सरकार को न्यायिक या सी॰बी॰आई॰ जांच करानी चाहिए ।
 - डॉ . मुहम्मद अहमद 

Dec 27, 2013

जब आदमी के हाथ से इंसां हो सुर्खुरू

जब आदमी के हाथ से इंसां  हो सुर्खुरू
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' आप ' की ताजपोशी [ 28 दिसम्बर 2013 ] पर मैं अपने करीबी मित्र , सुख्यात पत्रकार एवं कवि जनाब रिज़वानुल्लाह के दो शेअर उन्हीं की पुस्तक से आप सम्मानित मित्रों की सेवा में पेश कर रहा हूँ | भाई रिज़वान से मेरी अक्सर भेंट होती रहती है , लेकिन मैंने अभी उन्हें नहीं बताया कि उनके शेअर मेरी फ़ेसबुक वाल की शोभा बढ़ाने जा रहे हैं | कोशिश करूंगा कि उनके शेअरों पर आपकी प्रतिक्रियाओं समेत उन्हें सप्राइज़ दूँ | 
' आप ' की ताजपोशी  ' सिर मुड़ाने से पहले ही ओले गिरने '  के बीच सम्पन्न होने जा रही है | केजरीवाल जी की ताजपोशी की पूर्व संध्या पर सी एन जी और पी एन जी की मूल्य वृद्धि और निगम द्वारा इस कड़ाके की ठंड में झुग्गी - झोंपड़ियों को जमकर उजाड़ा जाना उनके लिए अशुभ संकेत लेकर आया  | उल्लेखनीय है कि ऑटो चालक बन्धुओं और टेंटों में रहनेवाले भाइयों - बहनों  ने ' आप ' को 28 सीटें दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | 
अब्तर बहुत दिनों से है दुनिया - ए रंग व बू 
फिरते हैं सरबराह व सलातीन को बकू |
लेकिन सवाल यह है कि आएगा दिन वह कब 
जब आदमी के हाथ से इंसां  हो सुर्खुरू |
 [ ' अक्से खयाल ' , पृष्ठ 99 ]
Colourful and smelling world is in a bad shape for a long time , Rulers and king are wandering around in streets.
But the question is : When that day will will come . When the man will be glorified by man ?   
- Dr . Muhammad Ahmad 

मन तुलसी का दास हो

मन तुलसी का दास हो अवधपुरी हो धाम।
सांस उसके सीता बसे, रोम-रोम में राम।।
मैं खुसरों का वंश हूँ, हूँ अवधी का सन्त।
हिन्दी मिरी बहार है, उर्दू मिरी बसन्त।।
काँटों बीच तो देखिए, खिलता हुआ गुलाब।
पहरा दुख का है लगा, सुख पर बिना हिसाब।।
पैसे की बौछार में, लोग रहे हमदर्द।
बीत गई बरसात जब, आया मौसम सर्द।।
उम्र बढ़ी तो घट गये, सपनों के दिन-रात।
अक्किल बगिया फल गई, सूख गये जज़्बात।।
सूरज शाम की नाव से, उतर गया उस पार।
अम्बर ओढ़ के सो गया, धरती पर संसार।।
- बेकल उत्साही 

पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे

पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे
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साखू की डाल पर उदासे मन
उन्मन का क्या होगा
पात-पात पर अंकित चुम्बन
चुम्बन का क्या होगा
मन-मन पर डाल दिए बन्धन
बन्धन का क्या होगा
पात झरे, गलियों-गलियों बिखरे
कोयलें उदास मगर फिर-फिर वे गाएँगी
नए-नए चिन्हों से राहें भर जाएंगी
खुलने दो कलियों की ठिठुरी ये मुट्ठियाँ
माथे पर नई-नई सुबहें मुस्काएँगी
गगन-नयन फिर-फिर होंगे भरे
पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे |
- ठाकुर प्रसाद सिंह 

दुनिया में बादशाह है, सो है वह भी आदमी


दुनिया में बादशाह है, सो है वह भी आदमी
और मुफ़लिसो गदा है, सो है वह भी आदमी
नेअमत जो खा रहा है, सो है वह भी आदमी
टुकड़े चबा रहा है, सो है वह भी आदमी।
- ‘नज़ीर’ अकबराबादी [ ‘आदमीनामा ' से]

अहिंसा के प्रवर्तक का जन्म कल्याणक महोत्सव

अहिंसा के प्रवर्तक का जन्म कल्याणक महोत्सव 


आज चौबीसवें [ अंतिम ] तीर्थंकर वर्धमान महावीर स्वामी जी का 2612 वां जन्मदिवस है . आप अहिंसा के प्रवर्तक माने जाते हैं . आपका जीवन काल पांच सौ ग्यारह से पांच सौ सत्ताईस ईस्वी ईसा पूर्व तक माना जाता है. आपके समय में हिंसा अपने चर्मोत्कर्ष पर पहुँच चुकी थी.लोग धर्म के नाम पर बलि देते थे। धर्म के नाम पर लड़ाई-झगड़ा, दंगा-फसाद एवं अत्याचार हो रहा था . तभी आपने जगह-जगह घूमकर जैन धर्म का प्रचार-प्रसार किया था तथा सत्य-अंहिसा पर अत्याधिक जोर दिया . आपका शत - शत अभिवादन ... वन्दन
इस अवसर पर मैं अर्पण स्वरूप ' अहिंसा और इस्लाम ' शीर्षक आलेख प्रस्तुत कर रहा हूँ . आशा है , मेरे सारे मित्रों और शुभेच्छुओं को यह पसंद आएगा ----
अहिंसा और इस्लाम
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वामन शिवराम आप्टे ने ‘संस्कृत-हिन्दी-कोश’ में ‘अहिंसा का अर्थ इस प्रकार किया है—अनिष्टकारिता का अभाव, किसी प्राणी को न मारना, मन-वचन-कर्म से किसी को पीड़ा न देना (पृष्ठ 134)। मनुस्मृति (10-63, 5-44, 6-75) और भागवत पुराण (10-5) में यही अर्थापन किया गया है । ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का वाक्य इसी से संबंधित है । प्रसिद्ध जैन विद्वान श्री वल्लभ सूरी ने अपनी पुस्तक ‘जैनिज़्म’ (Jainism) में ‘अहिंसा’ की व्याख्या इन शब्दों में की है—
‘‘जैन धर्म के संतों ने अहिंसा को सदाचार के एक सिद्धांत के रूप में ज़ोर देकर प्रतिपादित किया है । ‘अहिंसा’ की संक्षिप्त परिभाषा यह है कि जीवन सम्मानीय है चाहे वह किसी भी रूप में मौजूद हो । पर एक व्यक्ति कह सकता है कि जीवन के सभी रूपों को हानि पहुंचाने से पूर्णतः बचते हुए संसार में जीवित रहना लगभग असंभव है, इसलिए जैन धर्म विभिन्न प्रकार की हिंसाओं में हिंसा करने वाले की मानसिक प्रवृत्ति के अनुसार अन्तर करता है...यह बात मानी हुई है कि प्रतिदिन के कार्य, चलने-फिरने, खाना पकाने और कपड़े धोने एवं इस प्रकार के दूसरे कार्यों से बहुत कुछ हिंसा होती है। कृषि और उद्योग-धंधों के विभिन्न कार्य भी हिंसा का कारण बनते हैं । इसी प्रकार स्वयं की अथवा धन-संपत्ति की प्रतिरक्षा के सिलसिले में भी हमलावर से जीवन को हानि पहुंच सकती है या वह नष्ट हो सकता है । अतः जैन धर्म इस सामान्य और समग्र सैद्धांतिकता के बावजूद, जो इसके सभी सिद्धांतों की एक विशेषता है, एक गृहस्थ की हिंसा के इन तीन प्रकार को करने से नहीं रोकता है, जिन्हें सांयोगिक, व्यावसायिक और प्रतिरक्षात्मक कह सकते हैं। गृहस्थ को ऐसी हिंसा से बचने का परामर्श दिया गया है जो हिंसा के लिए हो, जो मात्र रस, प्रसन्नता और मनोविहार के रूप में हो या कोई उद्देश्य प्राप्त करना अभीष्ट न हो ।’’ (पृष्ठ 8-10)
इस्लाम व्यावहारिक मानव-जीवन के प्रत्येक अंग के लिए एक प्रणाली है। यह वह प्रणाली है जो आस्था-संबंधी उस कल्पना को भी अपने में समाहित किये हुए है, जो जगत की प्रकृति की व्याख्या करती और जगत में मानव का स्थान निश्चित करती है, जिस प्रकार वह मानव अस्तित्व के मौलिक उद्देश्य को निश्चित करने का कार्य करती है । इसमें सिद्धांत और व्यावहारिक व्यवस्थाएं भी शामिल हैं, जो इस आस्थात्मक कल्पना से निकलती एवं इसी पर निर्भर करती हैं और इसे वह व्यावहारिक रूप प्रदान करती मानव-जीवन में चित्रित होता है ।
‘इस्लाम’ अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है—
‘‘शांति में प्रवेश करना। यह संधि कुशलता, आत्मसमर्पण, आज्ञापालन और विनम्रता के संदर्भ में भी प्रस्तुत होता है। इस्लाम अर्थात् वह धर्म जिसके द्वारा मनुष्य शांति-प्राप्ति के लिए अल्लाह की शरण लेता है और क़ुरआन एवं हदीस (हज़रत मुहम्मद सल्ल॰ के वचन एवं कर्म) द्वारा निर्दिष्ट सिद्धांतों के आधार पर अन्य मनुष्यों के प्रति प्रेम और अहिंसा का व्यवहार करता है।’’ (शॉरटर इन्साइक्लोपीडिया ऑफ इस्लाम, पृष्ठ 176)
इस्लाम मनुष्य को शांति और सहिष्णुता का मार्ग दिखाता है। यह सत्य, अहिंसा, कुशलता का समर्थक है । इसका संदेश वास्तव में शांति का संदेश है। इसका लक्ष्य शांति, सुधार और निर्माण है । वह न तो उपद्रव और बिगाड़ को पसन्द करता है और न ही ज़ुल्म-ज़्यादती, क्रूरता, अन्याय, अनाचार, अत्याचार, असहिष्णुता, पक्षपात और संकीर्णता आदि विकारों व बुराइयों का समर्थक है। ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने कहा कि जो व्यक्ति भी इस्लाम में आया, सलामत रहा ।
इतिहास में झांकें तो यह तथ्य स्पष्टतया सामने आता है कि हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) से पूर्व अरबवासी सभ्यता और मानवोचित आचार-व्यवहार से कोसों दूर थे, इसीलिए इस युग को ‘ज़माना-ए-जाहिलीयत’ (अज्ञानकाल) कहा जाता है (द्रष्टव्य-लिटररी हिस्ट्री ऑफ अरब्स-आर॰ए॰ निकल्सन, कैम्ब्रिज यूनीवर्सिटी, पृष्ठ 25)। उस युग में चारों ओर अज्ञान, अनाचार, अशांति, अमानवीय कृत्यों और वर्गगत विषमताओं का साम्राज्य था । अरबों में अधिकतर बद्दू थे, जो प्रायः असभ्य होने के साथ-साथ अत्यंत पाषाणहृदय भी थे । इनके बारे में पवित्र कु़रआन में कहा गया है—‘‘ये बद्दू इन्कार और कपटाचार में बहुत ही बढ़े हुए हैं ।’’
इस्लाम ने उन सभ्य आचार-विचार से रहित बद्दुओं को सन्मार्ग दिखाया और उन्हें पशुत्व से ऊपर उठाकर मानवता के श्रेष्ठ मूल्यों से परिचित कराया, बल्कि उन्हें दूसरों के पथ-प्रदर्शक एवं अल्लाह के धर्म का आवाहक बना दिया । हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने लोगों को सदाचार और नैतिकता की शिक्षा दी। उन्हें प्रशिक्षित कर आत्मशुद्धि का मार्ग दिखाया और समाज को तथ्यहीन रीति-रिवाजों से मुक्त कर उच्च कोटि के नैतिक व्यवहार, संस्कृति, सामाजिकता और अर्थ के नये नियमों पर व्यवस्थित कर सुसंगठित किया। पवित्र क़ुरआन में हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के बारे में अल्लाह ने कहा है—‘‘हमने तुम्हें सारे संसार के लिए बस सर्वथा दयालुता बनाकर भेजा है।’’ (21:107)। स्पष्ट है, जो सारे संसार के लिए दयालुता का आगार हो, उसकी शिक्षा हिंसात्मक कदापि नहीं हो सकती । हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने कहा है—‘‘अल्लाह ने मुझे नैतिक विशेषताओं और अच्छे कार्यों की पूर्ति के लिए भेजा है।’’ (शरहुस्सुन्नह)। क़ुरआन में है—‘‘निस्सन्देह तुम (हज़रत मुहम्मद सल्ल॰) एक महान नैतिकता के शिखर पर हो।’’ (68:4)
इस्लाम के विरोधी लोग और ऐसे कुछ लोग भी जो इस्लाम की शिक्षाओं से अनभिज्ञ हैं, यह दुष्प्रचार करते हैं कि यह हिंसा और आतंकवाद का समर्थक है । ये शब्द इस्लामी शिक्षाओं के विपरीतार्थक शब्द हैं, जिनका इस्लाम से दूर-दूर का भी कोई संबंध नहीं है। यदि कहीं कुछ मुसलमान अपने व्यक्तिगत हित के लिए हिंसा और आतंकवाद का मार्ग अपनाएं और इन्हें बढ़ावा दें, तो भी किसी प्रकार इनका संबंध इस्लाम से नहीं जुड़ सकता, बल्कि यह धर्म-विरुद्ध कार्य होगा और इसे धर्म के बदतरीन शोषण की संज्ञा दी जाएगी। इस्लाम दया, करुणा, अहिंसा, क्षमा और परोपकार का धर्म है । इसके कुछ सुदृढ़ प्रमाणों पर यहां चर्चा की जाएगी ।
क़ुरआन का आरंभ ‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम’ से होता है । क़ुरआन की सभी सूरतों (अध्यायों) का प्रारंभ इन्हीं शब्दों से होता है और इन्हीं शब्दों के साथ मुसलमान अपना प्रत्येक कार्य प्रारंभ करते हैं। इनका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है—‘अल्लाह के नाम से जो अत्यंत करुणामय और दयावान है।’ (‘याल्लाह नाम जापं योल्लाहो दयी हितैष्यपि’—संस्कृत अनुवाद)। इस वाक्य में अल्लाह की दो सबसे बड़ी विशेषताओं का उल्लेख किया गया है । वह अत्यंत करुणामय है और वह अत्यंत दयावान है। उसके बन्दों और भक्तों में भी ये उत्कृष्ट विशेषताएं अभीष्ट हैं। उसके बन्दों की प्रत्येक गतिविधि उसकी कृपा और अनुग्रह की प्राप्ति के लिए होती है । क़ुरआन में है—‘अल्लाह का रंग ग्रहण करो, उसके रंग से अच्छा और किसका रंग हो सकता है ? और हम तो उसी की बन्दगी करते हैं ।’ (क़ुरआन 2:138)
अल्लाह की कृपाशीलता और उसकी दयालुता का ज़िक्र (बखान) अल्लाह का बन्दा प्रत्येक नमाज़ में बार-बार करता है और अपनी परायणता व विनयशीलता की अभिव्यक्ति बार-बार करता है। यह उसकी सहिष्णुता का द्योतक भी है । पवित्र क़ुरआन के प्रथम अध्याय का पाठ अल्लाह का बन्दा प्रत्येक नमाज़ में अनिवार्यतः करता है, क्योंकि यह नमाज़ का महत्वपूर्ण भाग है, जिसके अभाव में नमाज़ का आयोजन पूर्ण नहीं हो सकता। यहां इस अध्याय का हिन्दी अनुवाद किया जा रहा है, ताकि सन्दर्भित विषय भली-भांति स्पष्ट हो सके—
‘‘प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है जो सारे संसार का प्रभु है, बड़ा कृपाशील और दया करने वाला है, बदला दिये जाने के दिन का मालिक है । हम तेरी ही बन्दगी करते हैं और तुझी से मदद मांगते हैं । हमें सीधा मार्ग दिखा, उन लोगों का मार्ग, जो तेरे कृपापात्र हुए, जो प्रकोप के भागी नहीं हुए, जो भटके हुए नहीं हैं ।’’ (क़ुरआन, 1:1-7)
इस्लाम की शांति, सहिष्णुता, सद्भावना की शिक्षाएं समझने के लिए पवित्रा क़ुरआन की कुछ आयतों के अनुवाद यहां प्रस्तुत हैं—
‘‘जब कभी उनसे कहा गया कि धरती पर फ़साद (अशांति, बिगाड़) न पैदा करो, तो उन्होंने यही कहा कि ‘हम तो सुधार करने वाले हैं।’ सावधान, वास्तव में यही लोग फ़साद पैदा करते हैं, किन्तु ये जान नहीं पा रहे हैं ।’’ (क़ुरआन, 2:11,12)
‘‘अल्लाह का दिया हुआ खाओ-पियो और धरती में बिगाड़ न फैलाते फिरो।’’ (क़ुरआन, 2:60)
‘‘जब उसे सत्ता मिल जाती है तो धरती में उसकी सारी दौड़-धूप इसलिए होती है कि अशांति फैलाए, खेतों को नष्ट और मानव-संतति को तबाह करे—हालांकि अल्लाह बिगाड़ कदापि नहीं चाहता—और जब उससे कहते हैं कि अल्लाह से डर, तो अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान उसको गुनाह पर जमा देता है । ऐसे व्यक्ति के लिए तो बस नरक ही पर्याप्त है और वह बहुत बुरा ठिकाना है ।’’ (क़ुरआन, 2:205-206)
‘‘वे लोग जो ख़ुशहाली और तंगी की प्रत्येक अवस्था में अपने माल ख़र्च करते रहते हैं और क्रोध को रोकते हैं और लोगों को क्षमा करते हैं—और अल्लाह को भी ऐसे लोग प्रिय हैं, जो अच्छे से अच्छा कर्म करते हैं ।’’ (क़ुरआन, 3:134)
‘‘ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, आपस में एक-दूसरे के माल ग़लत ढंग से न खाओ, लेन-देन होना चाहिए आपस की रज़ामंदी से और अपने प्राणों (अर्थात, आत्महत्या और दूसरों के प्राणों) की हत्या न करो ।’’ (क़ुरआन, 4:29)
‘‘अपने प्रभु को गिड़गिड़ाकर और चुपके-चुपके पुकारो। निश्चय ही वह हद से आगे बढ़ने वालों को पसन्द नहीं करता। और धरती में उसके सुधार के पश्चात् बिगाड़ न पैदा करो। भय और आशा के साथ उसे पुकारो। निश्चय ही, अल्लाह की दयालुता सत्कर्मी लोगों के निकट है ।’’ (क़ुरआन, 7:55,56)
‘‘ऐ नबी, नरमी और क्षमा से काम लो, भले काम का हुक्म दो और अज्ञानी लोगों से न उलझो।’’ (क़ुरआन, 7:199)
‘‘और वे क्रोध को रोकने वाले हैं और लोगों को क्षमा करने वाले हैं। और अल्लाह को ऐसे लोग प्रिय हैं जो अच्छे से अच्छा कर्म करते हैं।’’ (क़ुरआन, 3:134)
‘‘निश्चय ही अल्लाह न्याय का और भलाई का एवं नातेदारों को (उनके हक़) देने का आदेश देता है और अश्लीलता, बुराई एवं सरकशी से रोकता है। वह तुम्हें नसीहत करता है, ताकि तुम शिक्षा लो।’’ (क़ुरआन, 16:90)
क़ुरआन की इन आयतों से इस्लाम की शांति, कुशलता और सदाचरण की शिक्षाएं स्पष्ट तथा परिलक्षित होती हैं और लोगों को सफल जीवन के लिए आमंत्रित करती हैं। वास्तव में शांति, प्रेम, अहिंसा और सदाचरण इस्लाम की महत्वपूर्ण शिक्षाएं हैं, लेकिन इस्लाम अहिंसा को इस अर्थ में नहीं लेता कि मानव-उपभोग की वे चीज़ें बहिष्कृत कर दी जाएं, जिनमें जीव-तत्व हो। इस आधार पर ही कोई व्यक्ति फल, सब्ज़ियां और दही, अनाज आदि का सेवन नहीं कर सकता, क्योंकि विज्ञान ने इनमें जीव-तत्व सिद्ध कर दिया है और न ही कोई व्यक्ति इस आधर पर एंटी बायोटिक औषधि का सेवन कर सकेगा, क्योंकि इससे जीवाणु मर जाएंगे। इस्लाम की शिक्षाएं मानव-जीवन के लिए पूर्णतः व्यावहारिक हैं। इस्लाम को यह भी अभीष्ट है कि जहां सत्य-असत्य के बीच संघर्ष हो, वहां सत्य का साथ दिया जाए और उसके लिए जी तोड़ प्रयत्न किया जाए। यह अहिंसा के विरुद्ध नहीं है। इस्लाम ने असत्य के विरुद्ध युद्ध का आदेश तो दिया है, लेकिन विभिन्न प्रकार के प्रतिबंधों के साथ ताकि आदेश कहीं ‘हिंसा’ की परिभाषा में न आ जाए। इस संबंध में क़ुरआन की कुछ आयतें दृष्टव्य हैं—
‘‘जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद (हिंसा और उपद्रव) फैलाने के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इन्सानों की हत्या कर डाली। और जिसने किसी की जान बचाई उसने मानो सारे इन्सानों को जीवन-दान दिया।’’ (क़ुरआन, 5:32)
‘‘और अल्लाह के मार्ग में उन लोगों से लड़ो जो तुमसे लड़ें, किन्तु ज़्यादती न करो। निस्सन्देह, अल्लाह ज़्यादती करने वालों को पसन्द नहीं करता ।’’ (क़ुरआन, 2:190)
इस्लाम ने युद्ध के दौरान वृद्धजनों, स्त्रियों, बच्चों और उन लोगों पर जो इबादतगाहों में शरण लिए हों (चाहे वे किसी भी धर्म के अनुयायी हों) हाथ उठाने से मना किया है और अकारण फलदार व हरे-भरे वृक्षों को काटने से रोका है ।
‘‘किसी जीव की हत्या न करो, जिसे (मारना) अल्लाह ने हराम ठहराया है। यह और बात है कि हक़ (न्याय) का तक़ाज़ा यही (अर्थात् हत्या करना ही) हो।’’ (क़ुरआन, 17:33)
‘‘तुम्हें क्या हुआ है कि अल्लाह के मार्ग में और उन कमज़ोर पुरुषों, औरतों और बच्चों के लिए युद्ध न करो, जो प्रार्थनाएं करते हैं कि हमारे रब! तू हमें इस बस्ती से निकाल, जिसके लोग अत्याचारी हैं और हमारे लिए अपनी ओर से तू कोई समर्थक नियुक्त कर और हमारे लिए अपनी ओर से तू कोई सहायक नियुक्त कर।’’ (क़ुरआन, 4:75)
‘‘इन्साफ़ की निगरानी करने वाले बनो और ऐसा न हो कि किसी गिरोह की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम इन्साफ़ करना छोड़ दो।’’ (क़ुरआन, 5:8)
यदि किसी के व्यवहार से किसी के मर्म (दिल) को पीड़ा पहुंचती है, तो यह भी हिंसा है। आइए, हम ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के कुछ पवित्र वचनों का अध्ययन करते हैं, जिनसे लोगों के साथ अच्छे व्यवहार, शील-स्वभाव और सदाचरण की शिक्षा मिलती है।
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि॰) से रिवायत (उल्लिखित व वर्णित) है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल॰) ने कहा—‘किसी सिद्दीक़ (अत्यंत सत्यवान व्यक्ति) के लिए उचित नहीं कि वह लानत करे।’ एक अन्य हदीस में है—‘लानत करने वाले क़ियामत (प्रलय) के दिन न तो सिफ़ारिश कर सकेंगे और न गवाही देने वाले होंगे ।’ (मुस्लिम)
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि॰) से रिवायत है कि नबी (सल्ल॰) ने कहा—‘‘आदमी को झूठे होने के लिए यही पर्याप्त है कि वह जो बात सुन पाये (सच होने का विश्वास पाए बिना) उसको बयान करता फिरे। (मुस्लिम)
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि॰) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल॰) ने कहा—‘‘मोमिनों में ईमान की दृष्टि से सबसे पूर्ण वह व्यक्ति है, जो उनमें शील-स्वभाव की दृष्टि से सबसे अच्छा हो। और तुममें अच्छे वे हैं जो अपनी स्त्रियों के प्रति अच्छे हों।’’ (तिरमिज़ी)
एक अन्य हदीस में है—‘‘पड़ोसियों में सबसे अच्छा पड़ोसी अल्लाह की दृष्टि में वह है जो अपने पड़ोसियों के लिए अच्छा हो।’’ एक-दूसरी हदीस में है—‘‘सारी मख़्लूक़ (संसार के लोग) अल्लाह का परिवार है। तो अल्लाह को सबसे अधिक प्रिय वह है, जो उसके परिवार के साथ अच्छा व्यवहार करे।’’
हज़रत आइशा (रज़ि॰) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल॰) ने कहा—‘निस्सन्देह अल्लाह नर्म है। वह हर एक मामले में नरमी को पसन्द करता है ।’’ (बुख़ारी, मुस्लिम)
हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने इन्सानों के प्रति उदारता, क्षमाशीलता और दयालुता का व्यवहार किया और इनकी शिक्षा दी। साथ ही, पशु-पक्षियों पर भी दया करने की शिक्षा दी। आप (सल्ल॰) सारे जीवधारियों के लिए रहमत बनाकर भेजे गए थे। पशु-पक्षी भी इससे अलग न थे। आप अत्यंत बहादुर थे और अत्यंत नर्मदिल भी। आपने जानवरों के साथ नरमी करने, उनको खिलाने-पिलाने का हुक्म दिया और सताने से रोका। इस्लाम के आगमन से पूर्व अरबवासी निशानेबाज़ी का शौक़ इस तरह किया करते थे कि किसी जानवर को बांध देते और उस पर निशाना लगाते। आप (सल्ल॰) ने इसको सख़्ती से मना किया। एक बार आपकी नज़र एक घोड़े पर पड़ी, जिसका चेहरा दाग़ा गया था। आप (सल्ल॰) ने कहा—‘‘जिसने इसका चेहरा दाग़ा है, उस पर अल्लाह की लानत हो।’’ (तिरमिज़ी)
आपने जानवरों को लड़ाने से भी मना फ़रमाया है। आपके दयाभाव की एक मिसाल देखिए। एक सफ़र में आप (सल्ल॰) के साथियों ने एक पक्षी के दो बच्चे पकड़ लिए, तो पक्षी अपने बच्चों के लिए व्याकुल हुआ। आपने देखा, तो कहा—‘‘इसको किसने व्याकुल किया?’’ सहाबा ने कहा—‘‘हमने इसके बच्चे पकड़ लिए।’’ आपने उन्हें छोड़ने का हुक्म दिया। (अबू दाऊद)
इसी से मिलती-जुलती एक घटना यह है कि आप (सल्ल॰) के पास एक व्यक्ति आया और उसने कहा कि एक झाड़ी में चिड़िया के ये बच्चे थे, मैंने निकाल लिये। उनकी मां मेरे ऊपर मंडराने लगी। आपने कहा—‘‘जाओ और जहां से इन बच्चों को उठाया है, वहीं रख आओ ।’’ (अबू दाऊद)
एक रिवायत में है कि एक ऊंट भूख से बेहाल था। आप (सल्ल॰) को देखकर वह बिलबिला उठा। आप (सल्ल॰) ने उसके मालिक को, जो एक अंसारी थे, बुलाकर चेतावनी दी—‘‘क्या तुम इन जानवरों के मामले में अल्लाह से नहीं डरते ?’’ (अबू दाऊद)
हज़रत इब्ने उमर (रज़ि॰) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल॰) ने कहा—‘‘एक स्त्री को एक बिल्ली के कारण यातना दी गयी, जिसको उसने बन्द रखा यहां तक कि वह मर गयी, तो वह स्त्री नरक में प्रविष्ट हो गयी। उसने जब उस बिल्ली को बन्द कर रखा था तो उसे न तो खिलाया और न उसे छोड़ा कि धरती के कीड़े-मकोड़े आदि ही खा लेती।’’ (बुख़ारी, मुस्लिम)
जानवरों के साथ बेरहमी और निर्दयतापूर्वक व्यवहार करने के अनेक मामले इस्लाम के पूर्व अरब में पाये जाते थे। हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने उनके साथ की जा रही ज़्यादतियों का पूर्णतः निषेध कर दिया।

सुखद - स्मृति

सुखद - स्मृति


 वरिष्ठ साहित्यकार एवं श्रीराम साहित्य के विशेषज्ञ आचार्य श्री सोहनलाल रामरंग जी के साथ अखिल भारतीय साहित्य , कला संगम , नई दिल्ली के एक कार्यक्रम में | आपके आशीर्वचन एवं आत्मीयता रूपी करकमल मेरे स्कन्द पर .... साथ में हैं संगम के संयोजक स्व. गोपाल साहनी जी | 2001 में आयिजित इस कार्यक्रम की तिथि याद नहीं रही | 

अतीत के पल


अतीत के पल : सुप्रसिद्ध सामाज सेविका , प्रख्यात गाँधीवादी चिन्तक स्वर्गीया निर्मला देशपाण्डेय के साथ अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम में ...... एक साक्षात्कार का दृश्य | 

आर्थिक न्याय

आर्थिक न्याय


प्रसिद्ध चिंतक डॉ. के. एन .गोविन्दाचार्य जी इकोनामिक जस्टिस फोरम के नई दिल्ली कार्यालय के उद्घाटन समारोह में आज [ 25 मई 2013 ] कुछ पल मेरे साथ ...... इसके कार्यक्रम में भाई गोविन्द जी ने इसे व्यापक आधार दिए जाने पर बल दिया , तो इसके संस्थापक श्री रोशनलाल अग्रवाल जी [ जो चित्र में दिखाई पड़ रहे हैं ] ने सही आर्थिक न्याय के मिलने तक संघर्ष जारी रखने का संकल्प व्यक्त किया | मैंने लक्ष्य प्राप्ति के लिए लगन और तन्मयता के साथ अपनी पूरी ऊर्जा को इस काम में झोंक देने का आह्वान किया | 

सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है

सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है
सदियों की ठंडी—बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्‌टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर—नाद सुनो,
सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है ।

जनता ? हां, मिट्‌टी की अबोध मूरतें वही,
जाड़े - पाले की कसक सदा सहनेवाली;
जब अंग—अंग में लगे सांप चूस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली ।
जनता ? हां, लम्बी - बड़ी जीभ की वही क़सम,
‘जनता, सचमुच ही, बड़ी वेदना सहती है।'
सो ठीक,मगर आख़िर इस पर जनमत क्या है ?
‘है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है ?'
मानो, जनता ही फूल  जिसे एहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;
अथवा कोई दुधमुंही जिसे बहलाने के ,
जन्तर—मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में ।
लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढ़ाती है;
दो राह, समय के रथ घर्घर—नाद सुनो,
सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है।
-  राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह ' दिनकर '



बढ़ता कुपोषण - किसी कलंक से कम नहीं !

 बढ़ता कुपोषण - किसी कलंक से कम नहीं !


बच्चे किसी भी देश का भविष्य होते हैं | उनका शिक्षा - दीक्षा और स्वास्थ्य पर जितना अधिक ध्यान दिया जाएगा , उतना ही अधिक भविष्य समृद्ध , ख़ुशहाल , शांतिमय और सुरक्षित होगा | अफ़सोस की बात यह है कि अन्य समस्याओं के साथ ही उन्हें कुपोषण की गंभीर दशा का सामना करना पड़ रहा है | हमारे यहाँ गरीबी उन्मूलन एवं खाद्य सहायता कार्यकमों पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं , फिर भी कुपोषण की भयावह समस्या कम होने का नाम तक नहीं ले रही है | दूसरी ओर हमारे  देश में हर साल हज़ारों टन अनाज गोदामों में सड़ जाता है | एक आंकड़े के अनुसार , पूर्व खाद्य मंत्री के . वी . थामस ने राज्यसभा में बताया था कि 2011 - 2012 के दौरान पंजाब में 7676 2 टन और हरियाणा में 10456 टन गेहूं सड़ गया | ऐसा ही हर साल होता है | अगर सुप्रबंध हो , तो निश्चिय ही इसे भूखे लोगों तक पहुँचाकर इस समस्या पर कुछ काबू ज़रूर पाया जा सकता है |  उल्लेखनीय है कि भारत में कुपोषण की व्यापकता बताने वाले कई अध्ययन सामने आ चुके हैं। इन सबमें यह बात है कि देश के चालीस से पैंतालीस फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से ताल्लुक रखने वाली अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘लांसेट’ ने विश्व भर में कुपोषण की स्थिति पर पिछले दिनों विस्तृत जानकारी प्रकाशित की है। यह अध्ययन बताता है कि भारत में पंद्रह साल से कम उम्र के अड़तीस फीसद बच्चों का कद उम्र के मुताबिक विकसित नहीं हो पाता, लेकिन कुपोषण के कारण शारीरिक और मानसिक  विकास अवरुद्ध होने का यह सिर्फ एक पहलू है। हकीक़त यह है कि जिन बच्चों को ठीक-ठाक खाना नहीं मिलता, उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता की कमी हो जाती है | वे आसानी से बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। इससे भी गंभीर स्थिति गर्भवती स्त्रियों, नवजात शिशुओं और पांच साल से कम आयु के बच्चों के मामले में हैं। संपन्न तबके को छोड़ दें, तो उन्हें जरूरी पोषाहार नहीं मिल पाता। गर्भावस्था के दौरान पोषक आहार न मिलने का अत्यधिक असर पेट में पल रहे बच्चे पर भी पड़ता है। कुपोषण के शिकार बच्चों का मानसिक विकास इस तौर पर भी बाधित होता है कि उनका पढ़ाई-लिखाई में बहुत कम मन लगता है।  कुछ दिन पहले ‘लांसेट’ ने यह तथ्य भी उजागर किया था कि पांच साल से कम आयु में होने वाली पैंतालीस फीसद मौतें कुपोषण की वजह से होती हैं।  पिछले साल स्वयंसेवी संगठन ‘नांदी फाउंडेशन’ की एक रिपोर्ट का लोकार्पण करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कुपोषण को राष्ट्रीय कलंक कहा था ,लेकिन यह कलंकपूर्ण स्थिति क्यों है, जबकि उनकी सरकार को नौ साल हो चुके हैं ? प्रधानमन्त्री पद का ख़्वाब देखनेवाले नरेंद्र मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में लगभग  बारह बर्ष से अधिक हो चुके हैं  | भाजपा के लोग उन्हें ' विकास पुरुष ' कहते हैं , लेकिन गुजरात में किसका विकास हो रहा है , पता नहीं चलता ! कुपोषण के मामले में गुजरात की स्थिति किसी भी पिछड़े राज्य से अलग नहीं है। इस समस्या के हल हेतु केंद्र और राज्य स्तर पर कई योजनाएं क्रियान्वित की जा रही हैं , पर उनका सुपरिणाम नहीं दिखाई पड़ रहा है |  सरकार को इन योजनाओं की समीक्षा करनी चाहिए और भ्रष्टाचार समेत सभी अनियमितताओं को दूर करना चाहिए |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Dec 26, 2013

मैं गन्ना हूँ ...... मैं फूल हूँ ...


मैं गन्ना हूँ , पेरा जाना ही मेरा मुक़द्दर है ,
मैं वह फूल हूँ , जिसकी खुशबू जाती नहीं है |
- अहमद ' मोहित '



आपकी ज़िम्मेदारी देश बचाने की

आपकी ज़िम्मेदारी देश बचाने की 
 
आज हमारा प्यारा देश चौतरफ़ा समस्याओं से घिरा हुआ है | गरीबी , बेरोज़गारी , महंगाई, भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं ने आम आदमी की मुश्किलें बहुत बढ़ा दी हैं | आख़िर इन समस्याओं का मूल कारण क्या है ? इन्सान की विकृत मानसिकता , नैतिक पतन के साथ ही पूंजीवाद और पूंजीवादी स्वार्थपरक मानसिकता ही इसका मूल कारण है | आज देश का लगभग हर नेता हर हाल में अपने खाने - कमाने में मशगूल है | ज़ाहिर है , बिना पूंजीवाद का दमन थामे यह संभव नहीं है! अतएव आज सामान्य रूप से देखा जा रहा है कि देश को पूंजीवादी साम्राज्यवाद की आग में झोंकने का काम सत्ताधारी वर्ग और प्रतिपक्षी दोनों कर रहे हैं | 
देश के राजनीतिक दल इस घिनौने काम में बुरी तरह पारंगत हो चुके हैं | सभी जानते हैं कि ये ही देश की व्यवस्थापिका का निर्माण करते हैं | फिर कार्यपालिका में अपने जैसी मानसिकता रखनेवालों का प्रोत्साहन एवं संवर्धन करते हैं , जिसके नतीजे में  अधिकारियों और कर्मचारियों का पूरा गिरोह रिश्वतखोरी , कामचोरी और भ्रष्टता में बेख़ौफ़ तरीक़े से लिप्त हो जाता है !
फिर हालत यह हो जाती है कि हर छोटे - बड़े सभी कामों और सौदों में छोटी रक़म से लेकर अरबों - खरबों की धनराशि कमीशन या रिश्वत के तौर पर ली जाती है !
हमारे देश बड़े - बड़े घोटाले करने का श्रेय और गर्व प्राप्त है ! इनके अनगिनत नाम हैं | टू जी स्पेक्ट्रम , राष्ट्रमंडल खेल घोटाला , बोफ़ोर्स ,  चारा घोटाला , ताबूत और हेलीकाप्टर - खरीद घोटाला आदि ऐसे काण्ड एवं ' आमालनामे ' हैं , जो देश के कर्णधारों  के चाल - चलन को पूरी तरह उजागर कर देते हैं | केंद्र और राज्य सरकारों का यही हाल है | एक छोटे - से क्लर्क के पास से करोड़ों की काली कमाई निकलती है ! सरकारी कार्यालय भ्रष्टाचार के ' जीवंत ' केंद्र बने हुए हैं | हालत इतनी बदतर है कि किसी को भी अपना काम कराने के लिए रिश्वत देने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं है |
 गरीबों को उनका जायज़ हक़ रिश्वत , पक्षपात  और प्रदूषित मानसिकता के कारण नहीं मिलता | अभी चंद रोज़ पहले एक न्यूज़ चैनल पर यह खबर आई कि मुज़फ्फरनगर दंगा पीड़ितों को राहत - राशि का चेक देने के लिए उनसे बीस - दस हज़ार रुपये की रिश्वत मांगी जा रही है | क्या कैंपों में तिल - तिल कर ज़िन्दगी गुज़ार रहे लोग इस बड़ी रक़म का इन्तिज़ाम कर सकते हैं ? ऊपर से मुलायम सिंह यादव कैंपों में खस्ताहाली - बदहाली की ज़िन्दगी बिता रहे मुसलमानों को षड्यंत्रकारी कहकर अपनी पहलवानी का प्रदर्शन करने से नहीं चूक रहे हैं | राहुल गाँधी को यहाँ के मुस्लिम नवजवान आई एस आई का एजेंट नज़र आ चुके हैं | कितना बड़ा झूठ और मज़ाक़  है यह ! 
 देश की आज़ादी के लिए जो लड़ाई हिन्दू - मुसलमान और अन्य लोगों ने मिलकर लड़ी थी , उनमें आज दूरी पायी जाती है | सांप्रदायिक दंगों में जो लगातार वृद्धि हो रही है , वह भी दुरी और बदगुमानी का कूपरिणाम है | इस सूरतेहाल में सांप्रदायिक और फ़ासीवादी तत्वों को अपना काम करने का ' सुअवसर ' प्राप्त होता है | ये तत्व देश की सत्ता - राजनीति पर क़ाबिज़ होना चाहते हैं और इसके लिए अंग्रेज़ों की ' फुट डालो . राज करो ' की नीति को पूरी तरह अपना रखा है | इनकी पहुँच पुलिस , प्रशासन , मीडिया और न्यायपालिका तक है , जिसे कारण देश के अल्पसंख्यक और कमज़ोर वर्गों को अपने भौतिक एवं आस्थागत अस्तित्व को बचाना बहुत कठिन हो गया है | वास्तव में नागरिक और मानवीय अधिकारों की पामाली हमारे देश में एक बड़ी समस्या बनी हुई है | 
 आतंकवाद के नाम पर पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियां मुस्लिम नवजवानों को बेबुनियाद और मनगढ़ंत आरोपों के तहत झूठे मुक़दमों में फंसाकर जेलों में झोंक रही हैं | स्थिति यह है कि जब तक इनकी बेगुनाही अदालत में साबित होती है , तब तक ये अपनी उम्र का बड़ा हिस्सा जेलों में गुज़ार चुकते हैं | यह अन्यायपूर्ण स्थिति भी ज़रूर बदलनी चाहिए | ज़रूरत इस बात की है कि शांति प्रिय , न्याय प्रिय और देश व समाज हितैषी हर व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारी महसूस करे , मौलिक धार्मिक और नैतिक मूल्यों को अपनाए एवं देश को इन समस्याओं के हल तथा चरित्रहीन व मलिन राजनीति से देश को पाक करने के लिए आगे आए | क्या ' आप ' से भ्रष्टहीन राजनीति की आशा की जा सकती है ? 
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

आडम्बर एवं पाखंड

आडम्बर एवं पाखंड
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  ईशभक्ति अब भक्ति न रही , दिखावा और प्रदर्शन बन गयी है ....... इनमें जो आगे है , वही सफल है ?! वास्तव में यह स्थिति बड़ी गंभीर है कि जीवन में दिखावा , आडम्बर और पाखंड हो ..... और वह भी ईशभक्ति जैसे जीवन के नितांत महत्वपूर्ण पक्ष के प्रति !!! ईशभक्ति तो जीवनामृत है , इसमें दिखावा कैसा ? श्रीमद भागवत [ ६ - १२ -२२ ] में है -
यस्य भक्तिर्भगवति हरौ निहश्रेयसेश्वरे ,
विक्रीड्तो अमृताम्भोधौ किं क्षुद्रै : खातकोदकै : - अर्थात , जो परम कल्याण के स्वामी ईश्वर की भक्ति करता है , वह समुद्र के अमृत में क्रीड़ा करता है . गढैया में भरे हुए मामूली गंदे जल के समान किसी भी भोग में उसका मन चलायमान नहीं होता . [ श्री शुकदेव जी ऐसा कहते हैं . ]
भक्त तो बस ईश्वर का प्रेम चाहता है . उसी से लौ लगाता है और दिनानुदिन इसमें वृद्धि चाहता है . रामचरित मानस की ये पंक्तियाँ कितनी प्रासंगिक हैं -
चहौं न सुगति सुमति संपति कछु रिधि - सिधि विपुल बड़ाई ,
हेतुरहित अनुरागु रामपद बढू अनुदिन अधिकाई .
भक्त का मन सदा प्रभु - प्रेम में ऐसा तल्लीन रहता है कि आधे क्षण भर के भी अन्य पदार्थ में नहीं रमता .
प्रभु - प्रेम सब उपलब्धियों से बढ़कर है . हृदय की सरलता और निर्मलता ईश्वर - ज्योति है . इस ज्योति में ही ईश्वर का मार्ग दीखता है , जो मानवता को कल्याण एवं त्राण की ओर ले जाता है . मानव में बहुगुण भरता है . उसमें प्रेम , दया , क्षमा जैसे उच्च गुण हो जाते हैं , जो मूलतः ईश्वर की ओर ही आकर्षित करते हैं , उसी से लौ लगाने को प्रेरित करते हैं . प्रभु का भय पाप से निवृत्ति करता है और प्रभु - महिमा का गान सत्य - मार्ग का सुगामी बनाता है . वास्तव में प्रभु - प्रेम अनमोल है . एक कवि के शब्दों में -
प्रेम हृदय की वस्तु , परम - सुख अनमोल ,
कथनी में आवै नहीं , सकै न कोऊ तोल .
रसमय आनंदमय विमल , दुर्लभ यह उन्माद ,
अकथनीय , पै अति मधुर , गूंगे को सो स्वाद .
- ' प्रेम शतक ' से
श्री कृष्ण जी का सन्देश है -
होता मुक्त सकल कल्मष से ,
योगाभ्यास निरत रहकर ,
ईश्वर - प्राप्ति रूप सुख से ,
अति आनद मिला करता .
 आडम्बर और दिखावे के लिए भक्त के पास समय ही नहीं होता . रामचरित मानस में है -
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि मन करहिं विरोध .
मन और बुद्धि से प्रभु का हो जाना ही भक्ति है . इसमें दिखावे और आडम्बर के लिए लेशमात्र भी स्थान नहीं है . श्रीमद भगवद गीता में श्रीकृष्ण जी कहते हैं -
संतुष्ट : सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चय :
मय्यपितमनोबुद्धियों मदभक्त : स मे प्रिय :
अर्थात , जो सदा संतुष्ट है , मन और इन्द्रियों को जीते हुए है , मुझमें दृढ निश्चयी है एवं जिसने अपने मन - बुद्धि को मुझे सौंप रखा है , वह भक्त मुझे प्रिय है . [ '' संतुष्ट ,मन व इन्द्रिय को ,अपने वश में किये हुए , मेरे में दृढ निश्चय वाला ,मेरे को अर्पण किये हुए , अपना मन ,बुद्धि सब कुछ , ऐसे भक्त मुझे प्रिय हुए '' ]
कहा गया है - एकांत [ अनन्य ] भक्ति ही श्रेष्ठ है - भक्ता एकांतिनो मुख्या : [ ' नारद भक्तिसूत्र ' ,६७ ]
यह वह भक्ति है , जिसमें मनुष्य एकाग्र होकर परमेश्वर का हो जाता है . तन , मन , धन सब कुछ उसी का हो जाता है . रहीम कहते हैं - ' प्रीतम छवि नैनन बसी , पर छवि कहाँ समाय , भरी सराय ' रहीम ' की लखि , आप पथिक फिरि जाय .
जो आडम्बर और दिखावा करते हैं , पालनहार - प्रभु की भक्ति से दूर ही रहते हैं .पवित्र कुरआन में है - ' [ मिथ्याचारी नमाज़ के लिए खड़े होते हैं तो ] लोगों को दिखाने के लिए , और अल्लाह को थोड़े ही याद करते हैं .' [ ४ : १४२ ] एक और स्थान पर है - ' और उन्हें आदेश इसी का तो दिया गया था कि अल्लाह की इबादत करें , दीन [ धर्म ] को उसी कर लिए विशुद्ध करके एकाग्र होकर ' [ कुरआन , ९८ :५ ] - जीवन के अन्य कर्मों में भी दिखावा वर्जित है . एक प्रमाणिक हदीस [ हज़रत मुहम्मद सल्ल . का वचन / कर्म ] में है - ' क़यामत के दिन पहला व्यक्ति जिसके बारे में फ़ैसला किया जाएगा [ कि वह झूठा है ] वह व्यक्ति होगा , जिसको शहीद कर दिया गया था . जब उसको पेश किया जाएगा , तो अल्लाह उसे अपनी नेमतें याद दिलाएगा और वह उनको स्वीकार करेगा . फिर अल्लाह कहेगा , तुमने इनके बदले में क्या कर्म किया ? वह कहेगा , मैं तेरी राह में यहाँ तक लड़ा कि शहीद हो गया . अल्लाह कहेगा , तुम झूठे हो , तुम इसलिए लड़े थे कि तुमको लोग वीर कहें . फिर उसके बारे में हुक्म हो जायेगा और उसे मुंह के बल घसीट कर ले जाया जायेगा , यहाँ तक कि आग [ नरक ] में डाल दिया जायेगा . फिर वह व्यक्ति होगा , जिसने इल्म हासिल किया और दूसरों को उसकी शिक्षा दी एवं कुरआन पढ़ा . जब उसको पेश किया जायेगा , तो अल्लाह उसे अपनी नेमतें याद दिलाएगा और वह उनको स्वीकार करेगा . फिर अल्लाह कहेगा , तुमने इनके बदले में क्या कर्म किया ? वह कहेगा , मैंने इल्म हासिल किया और दूसरों को उसकी शिक्षा दी एवं तेरे लिए कुरआन पढ़ा . अल्लाह कहेगा , तुम झूठे हो , तुमने तो इल्म इसलिए हासिल किया था कि लोग तुम्हें आलिम कहें एवं कुरआन इसलिए पढ़ा था कि लोग तुम्हें क़ारी कहें . अतएव तुम्हें आलिम और क़ारी कहा गया . फिर उसके बारे में हुक्म हो जायेगा कि उसको मुंह के बल घसीट कर ले जाया जायेगा , यहाँ तक कि आग [ नरक ] में डाल दिया जायेगा . फिर वह व्यक्ति होगा , जिसको अल्लाह ने रोज़ी में कुशादगी दी थी और उसे हर तरह का माल दिया था . जब उसको पेश किया जायेगा , तो उ से अपनी नेमतें याद दिलाएगा और वह उनको स्वीकार करेगा . फिर अल्लाह कहेगा , तुमने इनके बदले में क्या कर्म किया ? वह कहेगा , मैंने हरेक ऐसी राह में तेरे लिए अपना माल ख़र्च किया , जिसमें माल ख़र्च करना तुझे पसंद था और कोई ऐसी राह मैंने छोड़ी नहीं . अल्लाह कहेगा , तुम झूठे हो , तुमने यह इसलिए किया था कि [ लोगों में तेरे बारे में ] कहा जाए कि वह बड़ा दानी है . वह तो कहा जा चुका . फिर उसके बारे में हुक्म हो जायेगा और उसको मुंह के बल घसीट कर ले जाया जायेगा , यह तक कि आग [ नरक ] में डाल दिया जायेगा .  [ 'मुस्लिम ' ]इस्लाम कर्मप्रधान धर्म है . एक हदीस में है - निःसंदेह अल्लाह तुम्हारे शरीरों को नहीं देखता और न तुम्हारी सूरतों को , बल्कि वह तुम्हारे दिलों एवं तुम्हारे कर्मों को देखता है - [ मुस्लिम ] . इस्लाम सद्कर्मों के लिए उद्बोधित करता है , जिसमें नीयत मुख्य है . कर्म की नीयत की गयी , पर वह संभव न हुआ ,तो इसका सवाब बन्दे [ भक्त ] को मिलेगा . इसलिए कहा गया - सारे कर्म नीयतों ही पर निर्भर करते हैं .- [ हदीस , मुस्लिम ]
 = डॉ . मुहम्मद अहमद

तू मेरा मार्गदीप बन जा


तू मेरा मार्गदीप बन जा 
है तम बहुत संदीप बन जा 
 झंझावात रहेंगे निस दिन 
जीवन का प्रदीप बन जा |
- अहमद ' मोहित '  

Dec 24, 2013

कांग्रेस का आम आदमी

कांग्रेस का आम आदमी : कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए , मैंने पूछा नाम तो बोला हिंदुस्तान है !!!
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विधानसभाओं के हालिया चुनावों ने सत्तामदी कांग्रेस को कुछ जगा दिया है | अब वह आम आदमी बनने के लिए तैयार दिखती है | आम चुनाव के मद्देनज़र अब वह उसी तरह का घोषणापत्र बनाने जा रही है , जैसा समाजवादी पार्टी का था और हाल के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी का था | इस बाबत कांग्रेस की ओर से 23 दिसंबर 2013 को नई दिल्ली में अल्पसंख्यकों की एक मीटिंग बुलाई गई , जिसमें  मुसलमान , सिख, ईसाई, जैन व बौद्ध समुदाय से जुड़े संगठन और नागरिक समाज के सदस्य भी इसमें मौजूद थे। सभी ने अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों और समस्याओं को उठाया को उठाया अपने - अपने सुझाव दिए। मुसलमानों ने आतंकवाद की आड़ में लगातार की जा रही बेक़सूर मुस्लिम नवजवानों की गिरफ्तारियों का प्रभावी ढंग से अहम मुद्दा उठाया , जिस पर कहा जाता है कि यह राय बनी कि पार्टी अपने घोषणापत्र में इस गंभीर समस्या को शामिल करेगी और इस तरह की शिकायतों के निपटारे की दिशा में उठाए जाने वाले कदमों का ब्योरा भी देगी। तीन सत्र में खत्म हुई बैठक में भोजनावकाश के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी शामिल हुए। ऐसा लगा कि अब वे भी पार्टी की डूबती किश्ती को बचाने की कुछ पाज़िटिव सोचने के लिए मजबूर हो गए हैं | उन्होंने बड़ी संजीदगी के साथ मुसलमानों समेत अल्पसंख्यकों से जुड़ी समस्याओं को सुना | कांग्रेस घोषणापत्र पर चर्चा के लिए कुछ दिनों पहले दलितों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के लिए खुली बहस का आयोजन कर चुकी है। राहुल गाँधी इस बैठक में शामिल होने के एक दिन पहले ही मुजफ्फरनगर और शामली में दंगापीड़ितों से मिलने गए थे | कैंपों में रह रहे ये दंगापीड़ित सिर्फ़ मुसलमान हैं | अभी हाल इन कैंपों में कड़ाके की ठंड से पचास से अधिक मुस्लिम बच्चों की मौत हो गई थी | उल्लेखनीय है कि मुज़फ्फरनगर दंगे के वक्त राहुल गाँधी ने यह कहा थी कि वहां के कुछ मुस्लिम नवजवान पाकिस्तान की खुफ़िया एजेंसी आई एस आई के संपर्क में हैं | इस बेबुनियाद आरोप की ख़ासकर मुस्लिम नेताओं द्वारा कड़ी निंदा की गई | इसी तरह की झूठी बयानबाज़ी से लोगों में ग़ुस्सा बरक़रार है , जिसका इज़हार उन्होंने राहुल को काले झंडे दिखाकर किया और कई जगहों पर उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा | वहां राहुल गाँधी ने कहा कि दंगापीड़ितों का कोई पुरसानेहाल नहीं है | राहत शिविरों में बच्चे मर रहे हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव यहां के हालात पर ध्यान दें। उन्होंने शिविरों में रह रहे लोगों के साथ चाय की चुस्कियों के साथ नमकीन खाई और कहा कि सभी को न्याय मिलेगा। उन्होंने शिविरों में रह रहे लोगों से अपील की कि वे अपने घरों को लौट जाएं। जो लोग दंगा कराना चाहते हैं उनकी भी यह चाहत है कि शिविरों में रह रहे लोग कभी भी वापस न लौटें। हर समुदाय के लोग दिल से भाईचारा चाहते हैं। कुछ मुट्ठी भर लोग ही समाज में ज़हर घोलना चाहते हैं | उन्होंने इसी तरह की बात नई दिल्ली की मीटिंग में कही , लेकिन आतंकवाद की आड़ में पकड़े जा रहे मुस्लिम नवजवानों के मुद्दे पर वे ख़ामोश ही रहे |, हालांकि सलमान ख़ुर्शीद का कहना था कि यह चिंताजनक बात है |उनके अनुसार जब यह मुद्दा उठा , तो उस वक्त राहुल गाँधी वहां मौजूद नहीं थे | इस बैठक में अन्य बातों के अलावा राहुल गाँधी ने अपने मुजफ्फरनगर दौरे का जिक्र करते हुए कहा कि शामली में एक राहत शिविर में उन्हें एक लड़का मिला जिसने उनसे कहा कि उसे अपने वापस जाने में डर लगता है। राहुल गांधी ने इस पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को चाहे वह किसी जाति का, धर्म का हो, भारत में भयभीत नहीं रहना चाहिए। यह धर्मनिरपेक्ष राज्य है।
 मुस्लिम नेताओं ने आतंकवाद के आरोप में पकड़े गए युवकों के खिलाफ चलने वाले मुकदमों को लेकर आवाज उठाई। उनका कहना था कि आतंकवाद के आरोप में कई बेगुनाह, पढ़े लिखे युवकों को पकड़ लिया गया है। उन्हें लंबे समय से जेल में रखा गया है। अगर वे गुनहगार हैं तो उनको सजा मिलनी चाहिए , मगर आरोप तय किए बिना और मुकदमा चलाए बिना उन्हें लंबे समय तक केवल संदेह के आधार पर जेल में रखे जाना सरासर अन्याय है | इससे मुसलमानों में काफी नाराजगी और आक्रोश है। सांप्रदायिक हिंसा विरोधी विधेयक की बात भी उठी। ज्यादातर लोगों का मानना था यह विधेयक जल्द से जल्द पास हो जाना चाहिए था। जबकि वास्तविकता यह है कि केंद्र सरकार इस विधेयक को पास कराने की इच्छाशक्ति ही नहीं रखती ! बैठक के बाद सलमान खुर्शीद ने कहा कि यह तय है कि 2014 के घोषणापत्र में यह मुद्दा रखा जाएगा। यह भी तय हुआ कि घोषणापत्र से अलग इस मुद्दे पर जल्द ही केंद्र सरकार कदम उठाएगी। बेगुनाही साबित होने पर मुआवजा देने के सुझाव को भी पार्टी ने माना है। बैठक की अध्यक्षता कांग्रेस अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष खुर्शीद अहमद सैयद ने की। बैठक में केंद्रीय मंत्री आस्कर फर्नांडीज और जयराम रमेश भी मौजूद थे। बैठक का मूल विषय था - अल्पसंख्यकों के लिए क्या होना चाहिए ? खुर्शीद अहमद सैयद अब तक इसी भाव का बयान देते आए हैं  कि अगर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होती तो हम काफी कुछ कर सकते थे, केंद्र सरकार बहुत कुछ नहीं कर सकती क्योंकि राज्य में दूसरी पार्टी का शासन है। दरहकीकत यह सब एक दिखावा है कांग्रेस का | यह देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है | यह सबकी समस्याओं से अवगत है , फिर भी आमजन को भ्रमित करने के लिए वह कभी सच्चर समिति बनाती है , तो कभी रंगनाथ मिश्र आयोग , मगर व्यवहार उसका वही पुराना ढर्रा है , जिसपर वह चलती है ! यही कारण है कि सदियों से वह गरीबी हटाने का नाटक कर रही है | बार - बार नारे लगा चुकी , इसी प्रमुख मुद्दे पर उसने कई आम चुनाव भी लड़े , मगर गरीबी बढ़ती ही रही तेज़ रफ़्तार से ! इस स्थिति में बदलाव की ज़रूरत है | देश का आम आदमी चीथड़े लपेटे पहले भी खड़ा था और आज भी खड़ा है | वर्तमान स्थिति में भी दुष्यंत कुमार जी की ये पंक्तियाँ उतनी ही प्रासंगिक हैं , जितनी पंडित नेहरू और इंदिरा गाँधी के ज़माने में थीं - कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए , मैंने पूछा नाम तो बोला हिंदुस्तान है |
- डॉ . मुहम्मद अहमद