Dec 31, 2014

बलात्कार की बढ़ती घटनाएं , इंसानियत पर कलंक

बलात्कार की बढ़ती घटनाएं , इंसानियत पर कलंक 

16 दिसंबर 2014 को दिल्ली के मुनरिका में दामिनी [ ज्योति सिंह पाण्डेय ] रेप कांड हुआ था , जिसको लेकर काफ़ी जनचेतना जगी थी , लेकिन इसमें राजनीतिक पुट आ जाने से मानसिकता में बदलाव की जो गति होनी चाहिए , वह नहीं आ सकी | फ़ास्ट ट्रैक सुनवाई के बावजूद बलात्कारियों को फांसी की सज़ा पर अभी तक अमल नहीं हो सका है ! यह और बात है कि राम सिंह नामक एक आरोपी ने 11 मार्च 2013 को जेल में ही आत्महत्या कर ली | बचाव पक्ष के वकील ने इसे हत्या क़रार दिया | सज़ा में विलंब और शिक्षाप्रद सज़ा के अभाव के कारण भी महिला विरोधी हिंसाचार में कमी नहीं आ सकी और देश के अन्य भागों की तरह राजधानी दिल्ली में भी ऐसे आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं | विगत पांच दिसंबर को दामिनी कांड की तरह की घटना घटी | 27 साल की महिला से बलात्कार के आरोपी अमेरिकी कैब कंपनी उबर के ड्राइवर को सात दिसंबर को मथुरा से गिरफ्तार कर लिया गया। साथ ही टैक्सी मुहैया कराने वाली इस कंपनी को दिल्ली पुलिस ने मामले की जांच में शामिल होने का निर्देश दिया है | आगरा रेंज की डीआइजी लक्ष्मी सिंह के नेतृत्व में गठित वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मंजिल सैनी की टीम ने दिल्ली पुलिस के साथ मिलकर मथुरा निवासी 32 साल के टैक्सी ड्राइवर शिव कुमार यादव को गिरफ्तार कर लिया। उसे मथुरा के सदर पुलिस थाने के तहत दिल्ली-आगरा राजमार्ग पर एक मैरिज हॉल के पास से गिरफ्तार किया गया। डीआइजी के मुताबिक, जिस टैक्सी में यह अपराध हुआ है, वह यादव की थी और उसके मोबाइल नंबर के जरिए उसका पता लगाया गया। वैसे यह बलात्कार की अकेली घटना नहीं है | दामिनी कांड से इसकी कुछ समानता होने के कारण मीडिया ने इसे थोड़ा महत्व दिया | कितनी चिंता और आश्चर्य की बात है कि देश की राजधानी दिल्ली में महिला अपराध घट नहीं रहे | आंकड़ों के मुताबिक़ , यहाँ महिला विरोधी हिंसा के प्रतिदिन चालीस मामले दर्ज होते हैं , जिनमें बलात्कार के चार मामले होते हैं | इन मामलों में 15 . 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है | दिल्ली में 17 फ़रवरी 2014 से राष्ट्रपति शासन लागू है | आंकड़ों के मुताबिक़ , दिल्ली में पिछले दस महीनों के दौरान बलात्कार की उन्नीस सौ घटनाएं हुई हैं , जो कि एक रिकार्ड है |  स्थिति बिगड़ती जा रही है ..... महिलाओं का मान - सम्मान धूल - धूसरित हो रहा है | 
यह हकीक़त भी  लोगों को पता है कि इन घटनाओं के साथ ही  कन्या - भ्रूण हत्या और विभिन्न रूपों में महिला - शोषण जारी है ! आज इधर - उधर की बातें बहुत की जा रहीं हैं | महिला - दिवस भी मनाया जाता है ... हर साल बड़े धूम - धाम से आलमी सतह पर .... पर महिला आज भी बहुल भावना और विचार के यथार्थ धरातल पर दोयम दर्जे पर है . उसके प्रति सामाजिक सोच में दोहरापन मौजूद है , यानी महिला होने के कारण वह अपने नैसर्गिक एवं फ़ितरी अधिकारों से वंचित है | अभी पिछली सदी में महिलाओं के प्रति जागरुकता का परिचय देते हुये अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने आह्वान किया और 8 मार्च का दिन महिलाओं के सशक्तीकरण के रूप में मनाया जाने लगा | सबसे पहले 28 फरवरी 1909 ई. को अमेरिका में यह दिवस मनाया गया, लेकिन जिन उद्देश्यों को लेकर इसकी शुरुआत की गई थी, वह बहुत पहले ही खत्म हो गया था | बस औपचारिकता अब तक बाक़ी है | आज दुनिया के सभी तथाकथित विकसित और विकासशील देशों में भी महिलाओं को लेकर लगभग एक जैसी दुखद  स्थिति बनी हुई है | भौतिक रूप से समाज और देश ने भले ही खूब तरक्की कर ली हो, लेकिन इस बात से इन्कार करना मुश्किल है कि महिलाओं के प्रति हमारा नजरिया सकारात्मक नहीं है | सृष्टि में उसकी रचना भी उन्हीं गुणों और तत्वों के आधार पर हुई है, जिससे पुरुष बना है, किन्तु सामाजिक और पारिवारिक दृष्टि से महिला अभी भी न्याय की राह तक रही है | उसे न्याय नहीं मिल सका है | सामाजिक, आर्थिक आदि स्तरों पर महिलाएं आज भी बहुत पिछड़ी हैं | सोचा तो यह भी गया था कि हमारे सामाजिक नजरिये में व्यापक बदलाव आयेगा और समाज अपने अभिन्न अंग को स्वयं के बराबर का दर्जा दे सकेगा, लेकिन ऐसा केवल पुस्तकीय ज्ञान और मंचीय भाषण तक सीमित होकर रह गया | ऐसे में यह विचार करना होगा कि साल में एक दिन महिलाओं के विषय में चिन्ता करना क्या पर्याप्त है या हमें उनके प्रति बाकी दिनों में भी चिन्ता करनी  चाहिये | संबंधों की बुनियाद पर आज किसी भी महिला को दहेज की दहलीज पार करनी पड़ती है , अन्यथा उसके साथ जो हश्र होता है वह किसी से छिपा नहीं है | हकीक़त यह है कि आज शिक्षा का प्रतिशत बढऩे के साथ ही नैतिकता का स्तर काफी गिरा है | दहेज  के कारण हत्याएं, मुकदमेबाजी, तलाक, बलात्कार जैसी घटनाओं ने तो मानवता के मुख पर कालिख ही पोत दी है . बिना किसी पूर्वाग्रह के बात करें तो शहरों की स्थिति बड़ी नाजुक है, जो जितना अधिक उच्च शिक्षित, बड़े सामाजिक दायित्व वाला है, वह उतना ही अनैतिक आचरण करते सुना जाता है | वास्तव में महिला - सम्मान की बात केवल भाषणों तक सीमित होकर रह जाती है | महिलाओं की मानसिक और वैचारिक स्थिति का यदि नैतिकता के आधार पर अध्ययन किया जाए तो ऐसे आंकड़े सामने आएंगे, जो हमारे सामाजिक खोखलेपन को रेखांकित करेंगे | कुछ समय पहले राष्ट्रीय स्तर पर जारी एक रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि एशिया में प्रतिवर्ष 10 लाख से ज्यादा लड़कियों को वेश्यावृत्ति के धंधों में उतारा जाता है | यह आंकड़ा कोलकाता, दिल्ली आदि महानगरों में ज्यादा है | इसी प्रकार से विदेशों में भारत से भेजी जाने वाली घरेलू कामकाजी महिलाओं की स्थिति तो और भी लज्जास्पद है | अखबार और टेलीविजन के पर्दे पर जब कभी कोई महिला यदि रोते बिलखते अपनी पीड़ा लेकर आती है , तब हम सामाजिक न्याय के झंडे उठा लेते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे कितनी जिन्दगियां सिसकते आंसुओं के सैलाब में अपना गुजर कर रही हैं | उनका तो कोई पुरसानेहाल नहीं हैं . अतः जरूरी है कि सामाजिक संदर्भों में हमें महिलाओं  के प्रति अपनी दृष्टि को और व्यापक , पारदर्शी और उदार बनाएं | इस्लामी शिक्षाओं की ओर रुजू करें , जो महिला - समस्याओं का भी प्रभावी हल पेश करती हैं |

कब रुकेगा धार्मिक अल्पसंख्यकों का दमन ?

कब रुकेगा धार्मिक अल्पसंख्यकों का दमन ?
उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने अभी कुछ ही दिन पहले देश के धार्मिक अल्पसंख्यकों पर बढ़ रही दमनकारी घटनाओं पर चिंता जताई थी |  ' राज्य और नागरिकों के नियमों ' विषय पर आठवें तारकंडे मेमोरियल व्याख्यान देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि देश के धार्मिक अल्पसंख्यकों को लगातार हिंसा और भेदभाव का निशाना बनाया जा रहा है हालांकि संविधान और कानून में उन्हें जमानतें प्राप्त हैं। संगठित तरीके से नफरत और विभाजन की राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है और ज्यादातर मामलों में इसके पर्याप्त उदाहरण हैं। मगर  उपराष्ट्रपति महोदय की चिंता का कोई असर नहीं दिखा |
' घर वापसी ' अभियान चला रहे विश्व हिन्दू परिषद [ वी एच पी  ] ने मध्य प्रदेश में कैथलिक मिशनरियों को एक बार फिर अपना निशाना बनाया और उन पर जबरन अपना एजेंडा थोप दिया | लिहाज़ा बस्तर इलाके के कैथलिक मिशनरी वीएचपी के दबाव में अपने स्कूलों के प्रिंसिपल को फादर के बदले अब प्राचार्य और उपप्राचार्य कहेंगे। वीएचपी ने कहा था कि मिशनरीज स्कूलों में जिन्हें फादर कहा जाता है उन्हें प्राचार्य , उपप्राचार्य या सर कहा जाए। अंग्रेजी अखबार 'इंडियन एक्सप्रेस' की खबर के मुताबिक वीएचपी के दवाब में मिशनरी स्कूलों में सरस्वती की तस्वीर लगाने के लिए भी राजी हो गए हैं।
 इसके साथ ही ये वीएचपी द्वारा सुझाए उन महापुरुषों की भी तस्वीर लगाएंगे जिनका राष्ट्र हित में शिक्षा के क्षेत्र में योगदान रहा है। आदिवासी बहुल बस्तर जिले में कैथलिक मिशनरियों के 22 स्कूल हैं। एक खास इलाके में केरल से ज्यादा यहां मिशनरी का विकास हुआ है। बस्तर के जगदलपुर में एक बयान में के जरिए बताया गया है कि मिशनरी और वीएचपी के बीच इन मुद्दों पर सहमति बन गई है। दोनों पक्षों के नेताओं के बीच पिछले दिनों औपचारिक बातचीत हुई थी | 
बताया जाता है कि बस्तर जिले के वीएचपी अध्यक्ष सुरेश यादव और बस्तर कैथलिक कम्युनिटी के प्रवक्ता अब्राहम कन्नामपला ने इस समझौते पर संयुक्त रूप से हस्ताक्षर किए हैं। दोनों के संयुक्त बयान के मुताबिक, 'नोटिस बोर्ड और बस्तर के सभी कैथलिक शिक्षण संस्थाओं को सूचित कर दिया गया है कि फादर को प्राचार्य, उपप्राचार्य या सर से संबोधित किया जाए। केवल इतना ही नहीं ईसाइयों से माफ़ी भी मंगवाई गयी है | प्रपत्र में उनकी ओर से यह वाक्य भी जोड़ा गया है कि '' कैथलिक कम्युनिटी की वजह से यदि कोई समुदाय, मजहब और सोसायटी को दुख पहुंचा है तो हमें खेद है।'' 
उल्लेखनीय है कि जगदलपुर के बिशप जोसेफ़ कोल्लमप्रमपिल के उस बयान पर काफी विवाद हुआ था जिसमें उन्होंने कहा था कि इस क्षेत्र में हर मिशनरी स्कूल को चर्च बनाना चाहिए। वी एच पी ने इस बयान पर कड़ा ऐतिराज़ किया और बस्तर के कमिश्नर , मुख्यमंत्री डॉ .रमन सिंह और छतीसगढ़ के राज्यपाल को  पत्र भेजकर बिशप के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की|  वीएचपी ने बिशप के बयान को सांप्रदायकिता बढ़ाने वाला क़रार दिया था और यह आरोप भी लगाया गया था कि मिशनरी द्वारा  हिन्दू सोसायटी पर शिक्षा के बहाने अलोकतांत्रिक दबाव बनाया रहा हैं। मिशनरी ने सफाई दी थी उनके निर्देशों को अपनाने का हमारा कोई इरादा नहीं है, फिर भी ज़ोर - ज़बरदस्ती से काम लिया गया और दमन किया गया , जो प्रत्येक दृष्टि से निंदनीय है |

Dec 28, 2014

भ्रामक और अविश्वसनीय रिपोर्ट

भ्रामक और अविश्वसनीय रिपोर्ट 
जस्टिस जी टी नानावती और जस्टिस अक्षय एच मेहता के नेतृत्व वाले  दो सदस्यीय जाँच आयोग ने गुजरात दंगे के 12 साल बाद विगत 18 नवंबर को अपनी रिपोर्ट गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल को सौंप दी है , लेकिन यह संगीन अपराध से कम नहीं है , क्योंकि यह मुस्लिम विरोधी हिंसा की खुली लीपापोती का जीवंत प्रयास है ! आयोग ने दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनके मंत्रिमंडल के साथियों, राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों या किसी अन्य के किसी प्रकार शामिल होने से इन्कार किया कर दिया है। बताया जाता है कि इस आयोग ने 2002 के गुजरात दंगों में तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका की भी जांच की। टर्स्म ऑफ रिफ्रेंस के आधार पर तब की प्रदेश मोदी कैबिनेट, सीनियर सरकारी पुलिस ऑफिसर और दक्षिणपंथी संगठनों की भूमिका की भी जांच की गई , लेकिन इन सबको क्लीन चिट दे दी गयी | यह आयोग 18 सितंबर 2008 में अंतरिम रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप चुका है , जिसमें भी सरकारी पक्ष की भूमिका को नकारा गया था | बताया जाता है कि आयोग को तत्कालीन सरकार की निष्क्रियता या धार्मिक नेताओं और नेताओं की सक्रियता के कोई सबूत नहीं मिले हैं। गोधरा में नृशंस वारदात के बाद लोगों का गुस्सा फूटा। जिस वजह से दंगे हुए। इस तरह आयोग ने मोदी की एक्शन-रिएक्शन थ्योरी को ही सपोर्ट किया है। सेना को बुलाने में देरी पर भी आयोग ने तत्कालीन मोदी सरकार को क्लीन चिट दी है। 
आयोग का कहना है कि राज्य सरकार के कहने पर बैरक में से निकलते ही सैनिक गली-कूचे में तैनात नहीं हो सकते। दंगों के वक्त यह नहीं कहा जा सकता कि- दंगों के समय सेना तैनात करने में सरकार ने इरादे के साथ विलंब किया। इस आयोग को 12 साल के कार्यकाल में 25 बार सेवा विस्तार मिला। 46,494 शपथपत्रों की जांच की गई। 6 मार्च 2002 को इस आयोग का गठन तत्कालीन मोदी सरकार ने किया था | बताया जाता है कि  आयोग तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी समेत अन्य मंत्रियों से पूछताछ कर सकता था , लेकिन कोई सबूत नहीं मिला, जिसके आधार पर किसी को समन भेजा जाए। हालांकि, आयोग ने यह भी कहा है कि सरकार और आयोग के बार-बार कहने के बाद भी बड़े अधिकारियों ने शपथ-पत्र नहीं दिए। हालांकि, आयोग ने अखबारों और टीवी चैनलों की आलोचना की है। कई घटनाओं को बेवजह तूल दिया गया, जिससे हालात और बिगड़े।जस्टिस नानावती ने कहा, 'मैंने 2,000 पन्नों में मुख्यमंत्री को फाइनल रिपोर्ट सौंप दी है।' ' इंडियन एक्सप्रेस ' द्वारा यह पूछे जाने पर कि उन्होंने मोदी को पूछताछ हेतु क्यों नहीं बुलाया ? उन्होंने कहा कि क्या हर व्यक्ति को बुलाना न्यायोचित है ? जस्टिस नानावती ने पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन के इस आरोप कि गुजरात दंगे केंद्र और राज्य सरकार की साज़िश का नतीजा थे , उन्होंने कहा कि ' यदि ऐसा है तो उन्हें सबूत देता चाहिए , लेकिन मुझे पता है कि सबूत नहीं दिया जा सकता | ' सन 2005 में मलयालम पत्रिका ' मानव संस्कृति ' को दिए गये इन्टरव्यू में पूर्व राष्ट्रपति ने कहा था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को गुजरात में बिगड़ते हालात को संभालने के लिए कई पत्र लिखे थे , मगर उन पर ध्यान नहीं दिया गया | बताया जाता है कि इन पत्रों को नानावती आयोग ने राष्ट्रपति भवन से तलब किया था , मगर सुरक्षा कारणों से उसे उपलब्ध नहीं कराया गया | फिर भी पूर्व राष्ट्रपति ने आठ अप्रैल 2005 को आयोग को पत्र लिखकर पत्र के सभी विवरणों से अवगत कराया | इसके बावजूद इस तथ्य की जाँच नहीं हो पाई !इस प्रकार यह रिपोर्ट कई दृष्टियों से अपूर्ण , अविश्वसनीय और भ्रामक है | 

बाबरी मस्जिद की शहादत और इन्साफ के तक़ाज़े

बाबरी मस्जिद की शहादत और इन्साफ के तक़ाज़े 


6 दिसंबर 2014 को बाबरी मस्जिद की शहादत के 22 साल पूरे हो चुके हैं | इस दुखद और निंदनीय घटना ने देश की राजनीति और समाज को एक लंबे अरसे से प्रभावित किया है, लेकिन न्याय करने एवं समस्या के समाधान में देश की सम्मानित न्यायपालिका , केंद्र और राज्य सरकारें अभी तक नाकाम रही हैं | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे पर खामोशी बनाए रखी है , जबकि उन पर उन लोगों का ज़बरदस्त दबाव है , जो कट्टर हिन्दुत्ववादी हैं | कुछ राजनीतिक प्रेक्षक यह भी मानते हैं कि आने वाले दिनों में इस विवाद को हल करने का लिए उन पर दबाव बढ़ता जाएगा क्योंकि सरकार को पूर्ण बहुमत हासिल है और उससे जुड़े हिंदुत्ववादी संगठन इसे एक अवसर के रूप में देख रहे हैं | अदालत में इसका मुक़दमा 1949 से चल रहा है | मुसलमानों की ओर से इसके एक प्रमुख पक्षकार हाशिम अंसारी हैं , जो भूमि के मालिक़ाना हक़ का मुकदमा लड़ते-लड़ते 92 साल के हो चुके हैं | उनका भी यह मानना है कि इसका फ़ैसला न्यायालय को जल्द करना चाहिए | यह विवाद अंतिम फ़ैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट में है | इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जो फ़ैसला सुनाया है उसे इस केस के तीनों पक्षों ने चुनौती दे रखी है | हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को अपने फ़ैसले में बाबरी मस्जिद के बाहरी आँगन में स्थित राम चबूतरे और सीता रसोई पर निर्मोही अखाड़ा का दीर्घकालीन कब्ज़ा मानते हुए उसे देने का निर्णय किया था | इसके अलावा मुख्य गुम्बद के नीचे की ज़मीन रामजन्म भूमि मानते हुए राम लला को देने का आदेश किया था | लगभग 1500 वर्ग मीटर विवादित भूखंड का एक तिहाई मुस्लिम पक्षकारों को देने का फ़ैसला किया गया था , जिसमे सुन्नी वक्फ बोर्ड एवं अयोध्या के कुछ मुस्लिम नागरिक शामिल हैं |
 मुसलमान इस फ़ैसले से संतुष्ट नहीं थे , इसलिए उन्होंने भी इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी | मुसलमानों की ओर से एक और प्रमुख पक्षकार एडवोकेट ज़फ़रयाब जीलानी ने कहा था , '' उनकी अपील के मुख्यतः तीन आधार हैं | एक तो हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में श्रद्धा और विश्वास को तरजीह दी , जो सबूत की श्रेणी में नहीं आता | सबसे बड़ा सवाल यही है | दूसरा यह कहा गया कि ये स्थल हिंदू और मुसलमानों का साझा कब्ज़े वाला था , जबकि बाबरी मस्जिद पर मुसलमानों का कब्ज़ा था और निर्मोही अखाड़े का बाहरी हिस्से पर | तीसरी बात यह कही गयी कि वहाँ जुमे को ही नमाज पढ़ी जाती थी , जबकि वहाँ पांचों वक्त नमाज होती थी | ''6 दिसंबर 1992 को कट्टर हिंदुत्ववादियों ने बाबरी मस्जिद को शहीद कर दिया था | विश्व हिन्दू परिषद , बजरंग दल , भाजपा और शिव सेना के लोगों ने इस बर्बर घटना को अंजाम दिया | इस दिन हजारों की संख्या में कार सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढाह दिया, जिसके बाद देश के कई स्थानों पर सांप्रदायिक दंगे हुए , जिसमें सैकड़ों लोग मारे गये। अस्थाई रूप से राम मंदिर बना दिया गया। प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने मस्जिद के पुनर्निर्माण का वादा किया, जो अब तक अधूरा है | 5 दिसंबर 1992 को ही अयोध्या में लाखों की संख्या में भीड़ इकट्ठा हो गयी थी। राज्य सरकार सारे घटनाक्रम से अवगत थी , फिर भी एहतियाती क़दम नहीं उठाये गये | दूर - दूर से लोग इसमें हिस्सा लेने अयोध्या पहुँचते रहे। कारसेवको का नारा बार-बार गूंज रहा था '' मिट्टी नहीं सरकाएंगे, ढांचा तोड़ कर जाएंगे '' । यह तैयारी एक दिन पहले की गयी थी |कारसेवकों की भीड़ ने अगले दिन 12 बजे का वक्त कारसेवा शुरू करने का तय किया था , जो अहिस्ता - अहिस्ता उन्माद की शक्ल इख़्तियार कर रहा था | 
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार 6 दिसंबर को सुबह 11 बजते ही कारसेवकों के एक बड़ा जत्था सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश करता है, लेकिन उसे पीछे धकेल दिया जाता है। तभी वहां कारसेवकों से घिरे हुए वीएचपी नेता अशोक सिंघल नज़र आते हैं कारसेवकों से घिरे हुए और वो उन्हें कुछ समझाते हैं। थोड़ी ही देर में उनके साथ बीजेपी के बड़े नेता मुरली मनोहर जोशी भी इन कारसेवकों से जुड़ जातें हैं। तभी भीड़ में एक और चेहरा नजर आता है लालकृष्ण आडवाणी का। सभी सुरक्षा घेरे के भीतर मौजूद हैं और लगातार बाबरी मस्जिद की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। कारसेवकों के नारे वातावरण में गूंज रहें हैं। इसी बीच वहां पीली पट्टी बांधे कारसेवकों का आत्मघाती दस्ता आ पहुंचता है। उसने पहले से वहां मौजूद कारसेवकों को कुछ समझाया। सबके चेहरे के भाव से लगता है कि वे किसी बड़ी घटना के लिए सबको तैयार कर रहे हैं। तभी एक चौकाने वाली घटना होती है। बाबरी मस्जिद की सुरक्षा में लगी पुलिस की इकलौती टुकड़ी धीरे धीरे बाहर निकल जाती है। न कोई विरोध, न मस्जिद की सुरक्षा की परवाह। पुलिस के निकलते ही कारसेवकों का दल मस्जिद को मिस्मार कर देता है |1990 बैच की आईपीएस अधिकारी अंजू गुप्ता 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने के समय फैजाबाद जिले की असिस्टेंट एसपी थीं | उन्हें आडवाणी की सुरक्षा का जिम्मा दिया गया था। 2010 में उन्होंने एक बयान में कहा कि घटना के दिन आडवाणी ने मंच से बहुत ही भड़काऊ भाषण दिया था। 
इसी भाषण को सुनने के बाद कार सेवक और उग्र हो गए थे। अंजू गुप्ता का कहना था कि वे भी मंच पर करीब 6 घंटे तक मौजूद थी | इसी 6 घंटे में मस्जिद को शहीद किया गया था , लेकिन उस वक़्त मंच पर आडवाणी मौजूद नहीं थे। वे मस्जिद को मिस्मार करवाने में लगे रहे | उस समय वहां कल्याण सिंह की सरकार थी , जिसे बर्खास्त कर दिया गया | कल्याण सिंह को सुप्रीमकोर्ट ने सांकेतिक सज़ा दी | हैरत और चिंता की बात यह भी है कि बाबरी मस्जिद की शहादत और इसके नतीजे में देश के कई हिस्सों में हुई सांप्रदायिक दंगे के मुख्य आरोपियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं हो पाई !  

शरीया इंडेक्स से देश की अर्थव्यवस्था को पंख लगे

शरीया इंडेक्स से देश की अर्थव्यवस्था को पंख लगे 

एस . बी . आई . के शरीया रोके जाने के फ़ैसले से देश के मुसलमान एक बार आहत हुए हैं , जबकि इससे देश की अर्थव्यवस्था ही और मज़बूत होनेवाली थी | शायद यह प्रस्तावित लोकहितकारी फण्ड धर्मान्धता के हत्थे चढ़ गया | इस फण्ड से देश की आर्थिक तरक्की को चार चाँद लगनेवाले थे | शरीया इंडेक्स इसका सबूत है , जिसमें मुसलमानों की उल्लेखनीय भागीदारी है | निश्चय ही इससे भी देश की अर्थव्यवस्था मज़बूत हुई है | वर्तमान सरकार की आर्थिक नीतियों का इसमें दखल है ही | देश का विदेशी पूंजी भंडार 12 दिसंबर को समाप्त हुए सप्ताह में 2.1721 अरब डॉलर बढ़कर 316.8338 अरब डॉलर दर्ज किया गया, जो 19,778.3 अरब रुपये के बराबर है। भारतीय रिजर्व बैंक ने जो आंकड़े जारी किए, उसके अनुसार, विदेशी पूंजी भंडार का सबसे बड़ा घटक विदेशी मुद्रा भंडार आलोच्य सप्ताह में 2.4057 अरब डॉलर बढ़कर 292.3604 अरब डॉलर हो गया, जो 18,259 अरब रुपये के बराबर है। विदेशी मुद्रा भंडार को डॉलर में व्यक्त किया जाता है और इस पर भंडार में मौजूद पाउंड स्टर्लिग, येन जैसी अंतर्राष्ट्रीय मुद्राओं के मूल्यों में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर पड़ता है। आलोच्य अवधि में देश के स्वर्ण भंडार का मूल्य बिना किसी बदलाव के 18.9852 अरब  डॉलर बरकरार रहा, जो 1,176.6 अरब रुपये के बराबर है। इस दौरान देश के विशेष निकासी अधिकार (एसडीआर) का मूल्य 1.99 करोड़ डॉलर बढ़कर 4.2282 अरब डॉलर दर्ज किया गया, जो 264 अरब रुपये के बराबर है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) में मौजूद देश के भंडार का मूल्य उक्त अवधि में 25.35 करोड़ डॉलर घटकर 1.26 अरब डॉलर दर्ज किया गया, जो 78.7 अरब रुपये के बराबर है। शरीया इंडेक्स शुरू होने के बाद वित्तीय क्षेत्र में मुसलमानों की भागीदारी बढ़ी है और वे अपने निवेश पर बेहतर रिटर्न पा रहे हैं | इस्लामी कानून में बैंकिंग, शराब, तंबाकू और नशीले पदार्थो समेत कई ऐसी वस्तुओं व सेवाओं का करोबार करने की सख्त मनाही है | इन्हें इस्लामी शरई कानून में हराम और अवैध ठहराया गया है। इसके चलते मुस्लिम समुदाय के लोग वित्तीय क्षेत्र जैसे शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड इत्यादि में निवेश नहीं कर पाते थे। 
इस्लामी कानून में बैंक अथवा किसी अन्य वित्तीय संस्थान से ब्याज का लेनदेन करना या उन चीजों का कारोबार करना जिसकी शरीयत में मनाही है, को हराम करार दिया गया है। इसके चलते जहां कई तरह के कारोबार में मुसलमानों की उपस्थिति नगण्य हो गई थी |  इसी को देखते हुए वर्ष 2008 में बंबई शेयर बाजार के प्रबंधन ने तक़वा एडवाइजरी एंड शरीया इन्वेस्टमेंट साल्यूशंस (तासिस) के सहयोग से बीएसई शरीया-50 इंडेक्स शुरू करने का ऐलान किया।  बीएसई शरीया इंडेक्स-50 इस्लामी या शरीया कानून में ब्याज के लेनदेन, सुअर, शराब, तंबाकू, नशीले पदार्थ, सिनेमा, होटल व पारंपरिक वित्तीय सेवाओं जैसे बीमा, बैंक एफडी इत्यादि का कारोबार करने या इसमें अन्य किसी माध्यम से धन लगाकर मुनाफा अर्जित करने पर पूरी तरह से रोक है। शरीयत के इन्हीं नियमों के चलते वित्तीय क्षेत्र में मुसलमानों की घटती भागीदारी को देखते हुए तक़वा एडवाइजरी एंड शरीया इन्वेस्टमेंट साल्यूशंस (तासिस) ने बंबई शेयर बाजार के पास एक ऐसा प्रस्ताव भेजा ताकि शेयर बाजार और  देश के अन्य वित्तीय क्षेत्रों में मुसलमानों की भागीदारी बढ़ाई जा सके। इस प्रस्ताव के तहत बंबई शेयर बाजार में सेंसेक्स, मिडकैप और स्मालकैप की तरह एक शरीया इंडेक्स बनाने का सुझाव दिया गया। इस इंडेक्स में ऐसा कारोबार करने वाली कंपनियों को शामिल किया गया , जिनका कारोबार शरीया कानून में वैध है। इस इंडेक्स में बुनियादी ढांचा, कपड़ा, कैपिटल गुड्स,एफएमसीजी, आईटी और टेलीकाम क्षेत्र की कंपनियों को शामिल किया गया।
 इस इंडेक्स को तासिस ने कई इस्लामी विद्वानों [ उलमा हज़रात ] की सहमति से तैयार किया। मौजूदा समय में दुनिया भर के शेयर बाजारों की तुलना में बंबई शेयर बाजार के शरीया इंडेक्स में सबसे ज्यादा कंपनियां शामिल हैं। इस्लामी देशों में भी शेयर बाजारों में इस प्रकार के इंडेक्स में मुस्लिम समुदाय के लोग शेयर कारोबार में लगे हैं। इस्लामी आलिमों का कहना है कि शरीयत में वैध बताए गए कारोबार को करना या उस कारोबार को करने वाली कंपनियों के शेयरों में लेनदेन करने से शरीयत कानून का उल्लंघन नहीं होता। बांबे स्टाक एक्सचेंज (बीएसई) शरीया इंडेक्स पर खास नजर रखता है और यह देखता है कि अगर कोई कंपनी शरीया कानून से हटकर अपना धन किसी ऐसी योजना या कारोबार में लगाती है जिसकी शरीया कानून में मनाही है तो उस कंपनी को शरीया इंडेक्स से हटा दिया जाता है। एसएंडपी बीएसई 500 शरीया इंडेक्स ने पिछले पांच साल में निवेशकों को लगभग 14 फीसद का रिटर्न दिया है। हालांकि मौजूदा समय में शेयर बाजार में शरीया इंडेक्स वाले शेयरों में निवेशकों की संख्या में इजाफा हुआ है ,लेकिन निवेशकों का रुझान इंट्रा ट्रेडिंग की जगह लंबी अवधि के शेयरों में निवेश के प्रति ज्यादा है। इससे शेयरों का ट्रेडिंग वाल्यूम बहुत ज्यादा नहीं रहा है। शरीया इंडेक्स में सिर्फ मुस्लिम ही नहीं बल्कि अन्य निवेशकों ने भारी मात्रा में धन निवेश किया है। इससे पता चलता है कि इस इंडेक्स की लोकप्रियता बढ़ी है। वित्तीय समावेशन में काफ़ी मददगार शरीया इंडेक्स के जरिए वित्तीय क्षेत्र में मुसलमानों की भागीदारी और बढाई जानी चाहिए | शरीया आधारित अन्य उत्पाद भी लांच किये जाने चाहिए | संकीर्णता का त्याग करके सरकार को चाहिए कि एस . बी . आई . का शरीया फण्ड तत्काल लांच करे | 

हिन्दू कौन और राष्ट्र क्या ?

हिन्दू कौन और राष्ट्र क्या ?

भाजपा के केन्द्रीय सत्ता में आते ही भाजपा नेताओं ने हिन्दू राष्ट्र का जो राग छेड़ा था , वह दिन प्रतिदिन तेज़ होकर अलाप की शक्ल इख़्तियार कर चुका है | यह अच्छा ही हुआ कि कुछ हफ़्ते पहले गोवा के उपमुख्यमंत्री फ्रांसिस डिसूजा जो अपने को ईसाई हिंदू बताने के साथ ही देश को हिंदू राष्ट्र बता रहे थे, उन्होंने अपने बयान पर माफी मांग ली। अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी इसी बात पर अपनी जुबान खोली है और कई उत्तेजक , भ्रामक एवं आपत्तिजनक बातें कही हैं  , मगर क्या वे भी माफ़ी मागेंगे ? भागवत ने गत 20 दिसंबर 2014 को कोलकाता में विश्व हिंदू परिषद के एक सम्मेलन में कहा कि जवानों की जवानी जाने से पहले देश को हिंदू राष्ट्र बना दिया जाएगा। उन्होंने पाकिस्तान को भी भारत की भूमि बताया।
 मोहन भागवत ने कहा कि लोगों के देखते-देखते हिंदू राष्ट्र बनाने का सपना पूरा हो जाएगा, अब इसमें ज्यादा देर नहीं है। हिंदू समाज अब जाग गया है और किसी को डरने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा, 'हम किसी का परिवर्तन नहीं करते, भूले भटकों को वापस लाते हैं। हमारे ऐसे ही गए थे। लोभ-लालच से लूट लिए गए। हमारा माल लूट लिया गया है, हम अपना माल वापस ले रहे हैं। किसी को क्या दिक्कत है? आपको पसंद नहीं है तो कानून लाओ।' हिंदू बिना किसी का कल्याण नहीं हो सकता। उन्होंने कहा, 'हम किसी का परिवर्तन नहीं करते लेकिन हिंदू बदलाव नहीं लाएंगे तो हिंदुत्व नहीं बदलेगा। हम इस मुद्दे पर सख्ती से कायम हैं। हम सिर काटने वालों से लोगों को बचाएंगे।'
 संघ प्रमुख के इस बयान से साफ़ है कि आनेवाले दिनों में इस मुद्दे पर अन्य गतिविधियाँ सामने आएँगी | भाजपा की केंद्र सरकार बनने के तत्काल पहले और बाद में भाजपा और संघ परिवार के कुछ लोग हिन्दू राष्ट्र एवं हिंदुत्व की बांगबाज़ी करनेवाले नेताओं को मोदी के चुप कराया था , मगर संघ प्रमुख को कौन चुप करा सकता ? यहाँ तक किहिंदुत्व-रक्षा के नाम पर हमेशा आक्रामक तेवर में रहने वाले प्रवीण तोगड़िया भी थोड़ा खामोश थे । चुनावों में जो लोग हिंदू राष्ट्र के नाम पर वोट मांगना चाहते थे उन्हें तो पहले ही चुप करा दिया गया था, वे भी इस दिशा में आगे नहीं बढ़ रहे थे । लेकिन अब मोहन मोहन भागवत के बयान ने उन्हें ख़ामोश न रहने की हिदायत दी है ! 
यह सौ फ़ीसदी सच है कि देश के भावी स्वरूप और भविष्य का निर्धारण देश की जनता को करना है। यह हथियारों के बल पर या धौंस - धांधली के बल पर संभव नहीं | होगा भी तो क्षणिक - सामयिक ही होगा | संविधान परिवर्तन आसान नहीं | प्रभावी जनशक्ति से ही यह संभव है। भाजपा के पास प्रभावी जनशक्ति नहीं है | आज भी राज्यसभा में उसे बहुमत प्राप्त नहीं है | अतः अपने फ़ैसलों के लिए वह अध्यादेशों की ओर देखने लगी है | संवैधानिक दृष्टि से सरकार को ही भावी स्वरूप निर्धारित करने का अधिकार है- संवैधानिक निष्ठा की शपथ के माध्यम से शासन संभालने वाले, जिन्हें लोकसभा के प्रति जवाबदेह माना गया है। उसी संसद को जिसमें लोकसभा और राज्यसभा दोनों आती हैं, संविधान में परिवर्तन और परिवर्धन का भी अधिकार है। अब यह बाधा भी सर्वोच्च न्यायालय ने दूर कर दी है | पहले किसी खंडपीठ का यह निर्णय था कि संसद को मूल अधिकारों और संविधान के बुनियादी स्वरूप में परिवर्तन करने का अधिकार नहीं है। 
मूल अधिकारों में से जब संपत्ति का अधिकार समाप्त करने संबंधी परिवर्तन संसद ने सरकार की इच्छा से किया और बहुमत से वह पारित भी हो गया, राष्ट्रपति ने उसे स्वीकृति भी प्रदान कर दी, तब सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसे संविधानेतर नहीं माना। जब यह मान लिया गया कि संविधान के किसी अंग को संसद द्वारा संशोधित किया जा सकता है, बाध्यता यही होगी कि यह संशोधन किसी अन्य प्रसंग में विरोधाभासी न हो या उसके विपरीत अर्थ न निकाले जाएं जिससे संविधान में एकरूपता के बजाय दोहरापन दिखाई दे। 
जहां तक हिंदू राष्ट्र का प्रश्न है, इसमें दोनों शब्दों को पुनर्परिभाषित करना पड़ेगा। राष्ट्र शब्द भी शासन या सत्ता का परिचायक नहीं बल्कि अंग्रेजी के नेशन या कौम का परिचायक है, इस कौम की पहचान जाति या धर्म नहीं है। अंग्रेजी शब्दकोशों के अनुसार, राष्ट्र का अर्थ है जहां एक भाषा, धर्म, संस्कृति, जीवन पद्धति और दर्शन वाले लोग रहते हों। यूरोप 28 देशों में विभाजित है लेकिन उसे राष्ट्र माना जाता है क्योंकि उसके अंतर्गत ये अपेक्षित समानताएं हैं। लेकिन यह बात भारत के बारे में नहीं कही जा सकती, जहां विभिन्न संस्कृतियां, जीवन दर्शन, मान्यताएं, धर्म, आस्थाएं विद्यमान हैं, जहां अलग-अलग समुदायों के लोग विभिन्नताओं के फलस्वरूप रहते हों। 
शासकीय दृष्टि से तो कभी बर्मा और लंका भी इस देश के अंग थे। आज भी ब्रिटेन में जिन्हें सामान्य रूप से इंडियन कहा जाता है उनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमा के लोग भी आते हैं। लेकिन क्या इनकी एकता संभव है? हिंदुत्व अगर संयोजक तत्त्व होता तो पड़ोसी नेपाल इसका अंग होता, जिसे विश्व हिंदू परिषद के लोग भी हिंदू राष्ट्र बताते हैं। लेकिन वहां भी अब इस स्थिति में परिवर्तन आया है, भारत में मिलने के लिए न वह पहले तैयार था और न आज है । जब इस देश का विभाजन हुआ तो वह भी धर्मों पर आधारित नहीं था। ब्रिटिश संसद ने जिस विभाजन को मंजूरी दी थी उसका आधार यह था कि जहां मुसलिम लीग जीती है उसे पाकिस्तान और जहां कांग्रेस जीती है उसे इंडिया या भारत मान कर अलग किया जाए। अतः यह कहा जा सकता है कि राष्ट्र का अर्थ किसी धर्म या विचारधारा का देश नहीं , बल्कि वहां रहनेवालों का देश , चाहे वे जिस धर्म या विचारधारा को मानते हों | 
अब  ' हिन्दू ' शब्द पर भी गौर करना आवश्यक है | यह शब्द हिन्दू धार्मिक पुस्तकों में नहीं मिलता |  संघ और विहिप के नेता कहते हैं कि जिसे हिंदू कोड बिल में हिंदू माना गया है वे सब हिंदू हैं। यह बात किसी की समझ में नहीं आ सकती | कोड में तो सिख भी आते हैं, बौद्ध और जैन भी आते हैं। बौद्धों को देश से बाहर करने के लिए जो अभियान कभी चला था, इतिहास में वह भी दर्ज है और दुनिया उसे जानती है। बौद्ध देश या बौद्ध समुदाय क्या हिंदू राष्ट्र बनने के लिए तैयार हैं? बौद्धों की संख्या दुनिया में तीसरे नंबर पर है और जिन्हें हिन्दू बताते हैं उनकी चौथे नंबर पर। सिखों की भी अपनी अलग पहचान है |
सच्ची बात तो यह है कि देश को हिन्दू राष्ट्र बनाया ही नहीं जा सकता | इसकी परिकल्पना में हिन्दू कहलाने वाले लोगों के लिए ही स्थान नहीं , तो अन्य धर्म के माननेवालों की बात बहुत दूर की है | देश के पूर्वोत्तर में कई राज्य ईसाई बहुल हैं, और कश्मीर का वह हिस्सा जो भारत के पास है वह मुस्लिम बहुल है। आर्य - अनार्य - द्रविड़ के साथ शैव - वैष्णव आदि मत - मतान्तर हिन्दू कहलानेवाले लोगों के बीच है | हिंदुत्व के नाम पर आज भी इनमें वास्तविक एका का अभाव ही है | अतः हिंदी राष्ट्र की बात बेमानी और अव्यावहारिक है |

क्यों रुका शरीया फंड ?

क्यों रुका शरीया फंड ?
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में शरीया आधारित कंपनियों का अलग से इंडेक्स है , जो 27 दिसंबर 2010 को लांच किया गया था । ये कंपनियां एस एंड पी बीएसई 500 शरीया इंडेक्स में लिस्टेड हैं। एनएसई में सीएनएक्स निफ्टी शरीया इंडेक्स भी है।शरिया इंडेक्स की ग्रोथ बीएसई में बेहतर है। ईडी एसबीआई एफएम डीपी सिंह के मुताबिक़ , जहां बीएसई के अन्य इंडेक्स ने रिटर्न करीब 14 फीसदी दिया है। वहीं शरिया इंडेक्स का रिटर्न 18 फीसदी रहा है। इसमें निवेश के फ़ायदे और धन - संग्रहण में इसकी महती भूमिका को देखते हुए सेबी ने एस बी आई को इस्लामिक इक्विटी फंड लाने की इजाज़त दी थी , जिसे एक दिसंबर 2014 से लागू किया जाना था , मगर बाह्य दबाव के चलते एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट ने इसे टाल दिया गया है। 
 बताया जाता है कि हिन्दुत्ववादी इस क़दम से बेहद नाराज़ थे | इसे तुष्टीकरण तक बता दिया गया | कुछ अख़बारों ने इसके ख़िलाफ़ मुहिम चला रखी थी | यह विवाद पैदा किया जा रहा था कि क्या इस्लामिक फंड के बाद जैन, सिख, ईसाई फंड भी लाए जाएंगे? ज़ाहिर है , सार्वजनिक क्षेत्र के अग्रणी भारतीय स्टेट बैंक द्वारा इस्लामिक इक्विटी फंड जारी हो जाता तो देशभर के 17 करोड़ मुसलमानों के लिए निवेश के लिए अच्छा अवसर होता और देश का वित्तीय घाटा कम होता , तो निश्चित रूप से देश की अर्थव्यवस्था और मज़बूत होती | बैंक के एक अधिकारी के अनुसार , इस फंड में एक अरब रूपए की राशि का निवेश होता |
 साथ ही अगर यह फंड लॉन्च होता तो ब्रिटेन के बाद भारत विश्व में दूसरा ऐसा गैर- मुस्लिम  देश बन जाता, जिसके किसी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक की सहायक कंपनी शरीया बॉन्ड लेकर आती। 
आज देश में निजी क्षेत्र में अमेरिका की गोल्डमैन सैक्स, टोरस और टाटा के शरीया फंड हैं , लेकिन सरकारी स्तर पर इसे लांच होने से लोग बढ़ - चढ़ कर इसमें निवेश करते , भले ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया शुरू से ही कहता रहा हो कि यह फंड वह नहीं, बल्कि एसबीआई एफएम ला रही है। यह एसबीआई की ही सहयोगी कंपनी है, जो एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड के नाम से रजिस्टर्ड है। 
 यह संयुक्त भागीदारी वाली कंपनी है। इसमें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की 63 फीसदी और फ्रांस की कंपनी अमूंडी की 37 फीसदी हिस्सेदारी है। इसके साथ ही एसबीआई की सीएमडी अरुंधति भट्‌टाचार्य एसबीआई एफएम कंपनी की बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स- एएमसी (असेट मैनेजमेंट कंपनी) की चेयरपर्सन और एसोसिएट डायरेक्टर हैं। वास्तव में यह सरकारी प्रयास था , जिसे सांप्रदायिकों ने नाकाम बना दिया |एसबीआई एफएम सरकारी म्यूचुअल फंड कंपनी है।
 डी पी सिंह [ ईडी, एसबीआई एफएम ] का यह कहना सही नहीं मालूम होता है कि मीटिंग में रिटर्न, कंपनी कमीशन आदि मुद्दों को दोबारा देखने की आवश्यकता के कारण शरिया फंड को टाल  दिया गया है। 
रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन शुरू से ही इस फंड के पक्षधर रहे हैं , जबकि केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने इससे पल्ला झाड़ लिया था , जिसके कारण इसे लांच नहीं किया जा सका | अब भाजपा के केन्द्रीय शासन के दौरान ऐसे किसी सकारात्मक क़दम की उम्मीद भी नहीं की जानी चाहिए | वित्तमंत्री महोदय ने यह फरमा दिया था कि ''कोई भी बैंक आरबीआई के मानकों के मुताबिक कैसी भी योजना शुरू कर सकता है। मैं यह भी साफ कर देना चाहता हूं कि वित्त मंत्रालय का इस प्रोजेक्ट विशेष से कोई लेना-देना नहीं है। '' 
 दूसरी ओर भाजपा के ही पूर्व केन्द्रीय वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा आगे बढ़कर इसे ग़ैर क़ानूनी बताने से भी नहीं चूके |उन्होंने फ़रमाया कि '' मुझे आश्चर्य है कि ऐसा बॉन्ड या पेपर एसबीआई की कोई कंपनी ला रही है। धर्म या संप्रदाय के आधार पर फंड लाना कानून के खिलाफ भी होगा। सेबी को भी इसे देखना चाहिए और इसे प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। '' अब बैंक की यह बात भ्रामक ही मानी जाएगी कि इसे अच्छे , आकर्षक ढंग से लागू किया जायेगा | 
 एसबीआई एफएम के ईडी और चीफ मार्केटिंग ऑफिसर डीपी सिंह ने भास्कर को बताया कि हमने ओपन इंडेक्स शरीया म्यूचुअल फंड को लाने के लिए इस वर्ष मई 2014 में सेबी को एप्लाई किया था। जुलाई 2014 में हमें सेबी से अनुमति मिल गई थी। इसके बाद हमने एक दिसंबर को इसे लाने का फैसला किया था। एसबीआई म्युचुअल फंड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी दिनेश खारा ने कहा कि यह ऎसा इक्विटी फंड होगा जिसमें छोटे मध्यम और बड़े आकार के कैपिटल फंड होंगे। यह  लगभग 17 करोड़ भारतीय मुसलमानों और देश की अर्थव्यवस्था के हित में उचित होगा कि इसे सांप्रदायिक चश्मे से न देखा जाए और जल्द से जल्द लागू किया जाए |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 
 

इस्लाम की छवि धूमिल न करें

तवलीन सिंह की गलतबयानी 

इस्लाम की छवि धूमिल न करें 
मशहूर पत्रकार तवलीन सिंह ने ' जनसत्ता ' में अपने रविवारीय कालम ' वक़्त की नब्ज़ ' [ 2 नवंबर 2014 ] में अनजाने में ही सही मगर इस्लाम पर अनुचित , गलत और भ्रमकारी टिप्पणियाँ की हैं | वे लिखती हैं , '' समझे होते संघ के बुद्धिजीवी तो कभी न करते हिन्दू धर्म के इस्लामीकरण की बातें | वह भी ऐसे समय जब जब दुनिया भर में उन मज़हबों को नकारा जा रहा है , जिनका आधार है किसी रसूल द्वारा पाया गया ऐसा धार्मिक ग्रन्थ जिसमें एक शब्द भी नहीं बदला जा सकता है , क्योंकि ' भगवान की वाणी ' को कैसे कोई बदले ? सीरिया के रेगिस्तान में जब पत्रकारों की गर्दनें काटी जाती हैं और उनके वीडियो दिखाए जाते हैं इंटरनेट पर अल्लाह के नाम पर | और जब किसी औरत को खड्डे में बिठाकर पत्थरों से मारा जाता है वह भी अल्लाह के नाम पर | '' वास्तव में यह अनुचित टिप्पणी सिर्फ़ इस्लाम पर नहीं , उन सभी धर्मों पर है जो अल्लाह के पैगंबरों से मंसूब हैं अर्थात ईसाई , यहूदी धर्म | यह उन धर्मों के ख़िलाफ़ है , जो किसी एक व्यक्तित्व से संबद्ध हैं , जैसे पारसी , बौद्ध , सिख , जैन आदि धर्म | मगर तवलीन जी की आगे की इबारत बता रही है कि उनकी प्राथमिक टिप्पणी इस्लाम धर्म के विरुद्ध है ! तवलीन जी को यह पता होना चाहिए कि किसी व्यक्ति के निजी कृत्य यह आवश्यक नहीं कि उसके धर्म की शिक्षाओं के अनुरूप हों | इसी प्रकार मुसलमानों के अपने कर्म आवश्यक नहीं कि इस्लाम की शिक्षाओं के अनुसार हों | हो भी सकते हैं और नहीं भी | जहाँ तक बदलाव की बात है , तो बदलाव में वास्तविक धर्म कहाँ रह जाता है ?
 तवलीन जी की बात को स्वीकार करने का मतलब है , गलत कृत्यों को धर्म से जोड़ना ! इसे किसी भी धर्म से संबद्ध नहीं किया जा सकता | जहाँ तक इस्लाम की बात है , तो इसकी शिक्षाएं मानवता के लिए सदा कल्याणकारी एवं रहमत हैं |   इस्लाम शब्द का अर्थ ‘शान्ति व सुरक्षा’ और ‘समर्पण’ है। इस प्रकार इस्लामी परिभाषा में इस्लाम नाम है, ईश्वर के समक्ष, मनुष्यों का पूर्ण आत्मसमर्पण; और इस आत्मसमर्पण के द्वारा व्यक्ति, समाज तथा मानवजाति के द्वारा ‘शान्ति व सुरक्षा’ की उपलब्धि का। यह अवस्था आरंभ काल से तथा मानवता के इतिहास हज़ारों वर्ष लंबे सफ़र तक, हमेशा मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता रही है। महादयालु , कृपाशील अल्लाह ने फिर भी इन्सानों पर कृपा दृष्टि की और अपने अंतिम पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद [ सल्ल . ]  को भेजा | आप [ सल्ल . ] के द्वारा इस्लाम की पूर्ण और प्रमाणिक शिक्षा पेश की | इस्लाम की शिक्षाओं में सर्वप्रथम शिक्षा यह है कि अल्लाह एक है और केवल उसी की बन्दगी की जानी चाहिए | इसकी शिक्षाएं इंसानियत के लिए सर्वथा हितकारी - कल्याणकारी हैं | ये किसी एक समुदाय या कौम की सम्पत्ति न होकर सार्वभौमिक और सर्वजन की सम्पत्ति हैं | अतः यह सार्वजनिक , जगतव्यापी एवं सर्व कल्याणकारी धर्म है | सहज रूप से अल्लाह की प्रसन्नता , सामीप्य एवं लोक - परलोक की  सफलता प्रत्येक आस्थावान मनुष्य को अभीष्ट है | यह उसी एक जीवन - प्रणाली द्वारा संभव है , जो मानव - जाति के संगठन को अस्त - व्यस्त नहीं करती एवं उसके विचार - व्यवहार को द्वंदात्मक संघर्ष में नहीं ग्रस्त करती तथा जो आख़िरकार मानव - प्रकृति और जगत - प्रकृति से नहीं टकराती | यही इस्लामी जीवन - प्रणाली है | 
    

APCR के सेक्रेटरी डॉ . शकील अहमद से बातचीत

असुरक्षा , बेरोज़गारी से त्रस्त मुसलमान गुजरात छोड़ने को मजबूर  

लगभग बारह साल पुराने गुजरात दंगों का दंश अभी तक बरक़रार है | हज़ारों विस्थापित बदहाली का जीवन बिताने के लिए अभिशप्त हैं | कोई उनका पुरसानेहाल नहीं है | कुछ मानव हितकारी संगठन गाहे - बगाहे उनकी कुछ मदद ज़रूर कर देते हैं , जो नाकाफ़ी है | यह हक़ीक़त भी है कि जब सरकार की ओर उनकी ओर ध्यान न हो , तो ये कोशिशें लंबे समय तक प्रभावी रूप से नहीं जारी रह सकतीं |
नतीजा यह है कि आज भी गुजरात के मुसलमान तरह - तरह की समस्याओं के शिकार हैं | उनके मौजूदा हालात पर ' कान्ति ' के संपादक डॉ . मुहम्मद अहमद ने एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ सिविल राइट्स [ APCR ] के सेक्रेटरी एवं  इस्लामिक रिलीफ़ कमेटी , गुजरात के प्रभारी तथा जमाअत इस्लामी हिन्द , गुजरात के अध्यक्ष डॉ . शकील अहमद से बातचीत की | प्रस्तुत हैं इस बातचीत के कुछ प्रमुख अंश -
सवाल - 2002 की गुजरात हिंसा के विस्थापितों के वर्तमान हालात कैसे हैं ? क्या वे पहले की तरह सामान्य जीवन जी पा रहे हैं ?
जवाब - अभी 38 - 40 हज़ार विस्थापित मुसलमान ऐसे हैं , जिन्हें मजबूरन कैंपों में रहना पड़ रहा है |साथ ही लगभग इतने ही लोग और हैं , जो कैंपों में न रहकर जहाँ - तहां रहते हैं , लेकिन अपने अस्ल घरों को वापस नहीं जा पाए हैं | इनकी अनगिनत समस्याएं हैं | इनमें से जो श्रमिक वर्ग से संबंध रखते हैं , वे अपने काम पर इसलिए लौट नहीं पा रहे हैं , क्योंकि अब उन्हें काम नहीं मिल पाता | जिन विस्थापितों के पुश्तैनी घर और अन्य जायदादें हैं , वे इतने लंबी अवधि के बाद घर इसलिए नहीं लौट पा रहे हैं , क्योंकि वहां पहले जैसा सद्भावपूर्ण माहौल नहीं है | लोगों की तरफ़ से रहने के लिए उटपटांग शर्तें अलग से रखी जाती हैं , जिन्हें मानना मुमकिन नहीं होता | ऐसी भी शिकायतें मिली हैं कि मुसलमानों के न रहने के कारण उनकी कुछ कब्रिस्तानों पर क़ब्ज़ा कर लिया गया है |
रही बात उनके सामान्य जीवन की , तो यह अभी तक संभव नहीं हो पाया है | कैंपों में रह रहे विस्थापितों की बड़ी दयनीय दशा है | साफ़ पानी , हवा , सफ़ाई - सुथराई का घोर अभाव है | गंदगी का साम्राज्य है | जिन आराजी पर कैंप बने हैं , उनमें से कुछ की मिल्कियत पर सवालिया निशान लगाये जा रहे हैं |    
सवाल - इनकी और गुजरात के अन्य मुसलमानों की रोज़गार की स्थिति क्या है ?
जवाब - रोज़गार की बड़ी दयनीय और अफ़सोसनाक स्थिति है | मगर विस्थापितों की मुश्किलें ज़्यादा हैं | वस्तुस्थिति यह है कि लोग यहाँ से पलायन करने को मजबूर हैं | आज गुजरात के मुसलमान इस दिशा में सोचने को अभिशप्त हैं कि देश से बाहर जाकर रोज़गार से जुड़ा जाए या कम से कम देश में गुजरात छोड़कर अन्यत्र रहा जाए |
सवाल - क्या गुजरात में सांप्रदायिक सद्भावना पहले से बढ़ी है ?
जवाब - नहीं , ऐसी बात नहीं है | सामान्यतः लोगों को अपने किये पर कोई ग्लानि नहीं है | वे अपने दुष्कर्मों को सही ठहराने की कोशिश करते हैं | हालत यह है कि राजकोट जहाँ पर गुजरात कांड के दौरान हिंसा की घटनाएं नहीं घटीं , वहां भी सद्भाव का माहौल बिगड़ा हुआ है | राज्य की कमोबेश यही स्थिति है , लेकिन राजकोट में भी कोई मुसलमान किसी गैर मुस्लिम की ज़मीन - जायदाद नहीं खरीद सकता | 
सवाल - वर्तमान समय में गुजरात में मुसलमानों के प्रति सुरक्षा का क्या माहौल है ? दूसरे शब्दों में राज्य में क्या मुसलमान अपने को सुरक्षित महसूस करते हैं ?
जवाब - सब चिंतित रहते हैं | राज्य से बाहर के मुसलमान भी यहाँ नौकरी नहीं करना चाहते | मजबूरी में करते हैं | अभी पिछले दिनों बिहार के एक सज्जन को अपने बेटी - दामाद से मिलने अहमदाबाद आना था | वे सुरक्षा के प्रति इतने चिंतित थे कि बार - बार फोन करके हाल मालूम कर रहे थे | मुसलमानों में असुरक्षा की भावना आम बात बन गयी है | 
सवाल - राज्य के मुसलमानों का वर्तमान में शिक्षा के प्रति क्या सरोकार है ?
जवाब - वे पहले के मुक़ाबले शिक्षा के प्रति अवश्य आकृष्ट हुए हैं , लेकिन अफ़सोसनाक बात यह है कि पब्लिक स्कूलों में मुसलमान बच्चे - बच्चियों को दाख़िला नहीं मिल पाता | पक्षपात आम है |
सवाल - राज्य की राजनीति पर कुछ प्रकाश डालिए ? क्या सेकुलर होने का दावा करनेवाली कांग्रेस मुसलमानों के सामान्य हितों के साथ है ?
जवाब - हाल के उपचुनावों से उसका अस्तित्व फिर सामने आया है | लेकिन लगता है कि सांप्रदायिक कार्ड से ही यह संभव हो पाया है | कांग्रेस में एक बड़ी संख्या ऐसी है जो भाजपा के हिंबेहतरी के लिए ज़रुरी है कि उसके सदस्यों के चरित्र और किरदार को ऊँचा उठाया जाए | जो नवयुवक अपने कैरियर के सिलसिले में जागरूक हैं , उन्हें समाज - निर्माण के कार्यों के प्रति भी ध्यान देना चाहिए | हमें समाज के अन्य बदहाल लोगों के साथ मिलकर काम करना चाहिए | सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का फ़ायदा उठाने की कोशिश करनी चाहिए | इस सिलसिले में नागरिक विकास केंद्र का गठन किया दुत्व के एजेंडे को उचक लेने में यक़ीन रखती है | इस विषम स्थिति में मुसलमानों के लिए उसके पास कहाँ जगह बचती है | वह मुसलमानों के हितार्थ कुछ बोलने से परहेज़ करती है | 
सवाल - आपकी दृष्टि में गुजरात की बदली हुई प्रतिकूल परिस्थिति से उबरने के लिए मुसलमानों को क्या - क्या करना चाहिए ?
जवाब - इस सिलसिले में हम एक सर्वे कर रहे हैं | लोगों के सामने दस सवाल रखे गये हैं | उन्हें लिखकर जवाब देना है | यह काम अंतिम चरण में है | मेरा मानना है कि किसी भी समाज की गया है | मुसलमानों को अपने स्कूलों के स्तरीकरण की ओर भी ध्यान देना चाहिए और उच्च शिक्षण संस्थान भी क़ायम किये जाने चाहिए | 
            

Nov 12, 2014

आतंक का एक और सबूत !


आतंक का एक और सबूत !


25 सितंबर 2014 | बड़ोदरा का याकूतपुरा इलाक़ा | अचानक पुलिसवालों का काफ़िला आ गया ! देखते ही देखते मीनार मस्जिद फ़ालिया , पटेल फ़ालिया 1 और  2 में खड़े वाहनों की तोड़फोड़ शुरू कर दी | पुलिसवाले पूरी तैयारी के साथ आये थे | लगभग सत्तर वाहनों जिनमें कार , ऑटो रिक्शा , मोटर साइकिलें थीं , सबको बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर डाला | साथ ही कई घरों के दरवाज़े तोड़ डाले और कुछ खिड़कियों पर हाथ साफ़ किया | जब महिलाओं [ मुस्लिम ] ने इस उत्पात का कारण जानना चाहा , तो उन्हें गंदी , आपत्तिजनक गलियाँ दीं और उनके दुपट्टों को खींचा , जिसके चलते उनके गलों पर दबाव पड़ने से उनका दम घुटने लगा | पुलिसवालों ने इतने पर बस नहीं किया | कुछ महिलाओं पर लाठीचार्ज भी किया | बच्चों को भी नहीं बख्शा | दसवीं कक्षा के एक छात्र को जो ट्यूशन से लौट रहा था , बुरी तरह पीट डाला | पुलिस की ये आतंकी हरकतें आसानी से खत्म नहीं हुईं ! आंसूगैस के 20 से 25 गोले छोड़े गये और पांच - छह राउंड फ़ायरिंग भी की गयी |
जब महिलाएं इसकी रिपोर्ट लिखवाने थाने गयीं , तो उन्हें भगा दिया गया | उन्हें अपशब्द कहे गये | लोगों ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज [ PUCL ] की तथ्य अन्वेषक टीम को बताया कि पुलिस ने इलाक़े के 40 - 50 नवजवानों को उनके घरों का दरवाज़ा खटखटा कर गिरफ्तार किया और उन्हें थाने के लाकअप में बंद कर दिया | इलाक़े के लोगों ने बताया कि पुलिस ने यह सब इसलिए किया ताकि मुसलमान इंटरनेट और सोशल मीडिया पर धर्म विरुद्ध डाली गयी सामग्री - वीडियो / फ़ोटो आदि का विरोध न करें | गिरफ्तार नवजवानों को इसी शर्त पर छोड़ा गया कि वे प्रतिक्रिया में कोई कार्रवाई नहीं करेंगे | वीडियो / फोटो नेट पर नहीं डालेंगे | बड़ोदरा में पुलिस ने पहले भी ऐसी कार्रवाइयां की हैं | कभी वह दंगाइयों के सहायक के तौर पर आती रही है , तो कभी मूकदर्शक बनी रहती है | ऐसे ही 2002 की सांप्रदायिक हिंसा के दौरान हुआ | तोड़फोड़ . आगज़नी , नवजवानों को पीटने , महिलाओं को अपमानित करने एवं हिंसा - प्रताड़ना की अन्य घटनाएं सामने आयीं | स्थानीय लोगों के अनुसार , पुलिस हिंसा को उकसाने और फैलाने के लिए ऐसा करती रही है |
पुलिस इस इस हरकत से मुसलमान सहज रूप से आहत और क्रुद्ध थे | जब उन्होंने कुछ किया ही नहीं , तो उन्हें किस बात की सज़ा दी गयी ? यह सवाल सामने ज़रूर था | लिहाज़ा PUCL से संपर्क किया और मानवाधिकार उल्लंघन के इस इस गंभीर मामले में मुसलमानों के एक प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस कमिश्नर से मुलाक़ात की | प्रतिनिधिमंडल को साफ़ महसूस हुआ कि उन्हें इंसाफ़ नहीं मिलनेवाला | PUCL के प्रयासों से पुलिस कमिश्नर राधा कृष्णन दिखावे के तौर पर पुलिस के हरकतों की जाँच करवाने का आदेश दिया | फिर भी पुलिस की आतंकी कार्रवाइयां 27 सितंबर की रात तक जारी रहीं | पुलिसवालों ने ताईवाडा और सत दरगाह इलाकों में भी आतंक मचाया | PUCL की तथ्य अन्वेषक टीम ने इन इलाक़ों से भी पुलिस अत्याचार के कई सबूत जुटाए हैं | टीम में सर्व श्री अशोक गुप्ता , तपन दास गुप्ता , रेशमा वोहरा , कमल ठाकर , युसूफ शेख़ , तृप्ति शाह , हार्दिक रत्न , हमीदा चन्दोल , नागिन भाई पटेल , सबीहा हाकिम और शौक़त इन्दौरी शामिल थे | pucl की इस बड़ोदरा इकाई ने अपनी रिपोर्ट मानवाधिकार आयोग , गुजरात के गृह विभाग और डी आई जी , गुजरात को भेजी है और दोषी पुलिसवालों के ख़िलाफ़ फ़ौरन कड़ी कार्रवाई की मांग की है |          

Nov 8, 2014

आस्था का सवाल ?

आस्था का सवाल ?
विदेशों में जमा काले धन की वापसी का मसला अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आस्था का सवाल बन गया है | अपने ' मन की बात ' बताते हुए उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर सही दिशा में बेहतर काम कर रही हैं। कालाधन वापस लाना उनकी आस्था का सवाल है और इस बारे में कोई कोताही नहीं बरती जाएगी। पाई-पाई वापस लाया जाएगा , लेकिन यह कालाधन कितना है, इसका सही अनुमान सरकार के पास नहीं है। मोदी जी की इसी बात के अनुवर्तन में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण तथा पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि यह सुनिश्चित करने के प्रयास होने चाहिए कि कोई भी अवैध बैंक खाता अस्तित्व में ही ना आए और उम्मीद जतायी कि ऐसा वर्तमान सरकार के तहत होगा। 
सभी जानते हैं कि काले धन के ख़िलाफ़ पिछली यूपीए सरकार ने भी काफ़ी हो - हल्ला लिया था | उसने  21 मई 2012 को काले धन पर श्वेतपत्र जारी किया था , जिससे यह लगा था कि यूपीए सरकार काले धन की समस्या से निबटने के प्रति गंभीर है | वर्तमान राष्ट्रपति एवं  तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा पेश इस दस्तावेज़ में भ्रष्टाचार के मामलों की तेज़ी से जाँच और दोषियों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई के लिए जल्द से जल्द लोकपाल और लोकायुक्त जैसी संस्थाओं का गठन किए जाने की बात कही गयी थी | तत्कालीन वित्तमंत्री ने आयकर विभाग में अभियोजन पक्ष को मज़बूत बनाने और प्रत्यक्ष कर क़ानूनों व नियमों को युक्तिसंगत बनाने की ओर इशारा करते हुए त्वरित अदालतों के गठन एवं अपराधियों को कड़ी सज़ा के प्रावधानों का समर्थन किया था |
 कुल 97 पेज के इस श्वेत पत्र में किसी आर्थिक अपराधी का नाम नहीं लिया गया था और न ही इस बारे में कोई जानकारी दी गयी थी कि दरअसल कितना काला धन विदेशों में है | सरकार ने इस सिलसिले में अन्य एजेंसियों के आकलन शामिल किए थे | उल्लेखनीय है कि यूपीए सरकार ने अपने पूरे कार्यकाल में आर्थिक अपराधों पर लगाम लगाने के लिए कम से कम उन उपायों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया , जिनको अपनाने की बात श्वेतपत्र में कही गयी थी | 
कुछ आर्थिक जानकारों का मानना है कि यह हल्ला - गुल्ला भी पूंजीपतियों के फ़ायदे के लिए किया जाता है , ताकि वे अपने काले धन को समेट सकें | ऐसा हुआ भी है | पूंजीपति अपने काले धन को विदेशी बैकों से लगातार सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने में व्यस्त हैं | एक आर्थिक चिंतक का कहना है कि लोग बेमतलब सरकार पर शक कर रहे हैं कि सरकार को साँप सूँघ गया ! हो सकता है कि काले धन को ही साँप सूँघ गया हो, इसलिए अब वह किसी विदेशी बैंक में दिख नहीं रहा है !
काले धन की वापसी को लेकर मोदी सरकार से जनता की बड़ी उम्मीदें हैं | इस सिलसिले में सरकार के पास तो बस एक लिस्ट थी, जो उसे पिछली सरकार से मिली थी। 
सुप्रीम कोर्ट के कहने पर सरकार ने अपना काम सँभालते ही जून में एसआईटी बना दी और लिस्ट उसे सौंप दी ! इस क़दम का लोगों ने स्वागत किया | छह महीने बाद गत 29 अक्तूबर 2014 को  सुप्रीम कोर्ट के कहने पर सरकार ने बड़ी ना-नुकुर के बाद फिर वही पुरानी लिस्ट कोर्ट में जमा कर दी। वाया सुप्रीम कोर्ट वही लिस्ट फिर से एसआईटी के पास पहुँच गयी !
इस बार हुआ सिर्फ़ इतना है कि अब ब्लैक लिस्ट की पोल खुल चुकी है | यही कि लिस्ट में आधे तो एनआरआई ही हैं, जिन पर देश के टैक्स कानून तो लागू ही नहीं होते | बाकी बची लिस्ट में बहुत-से खातों में एक दमड़ी भी नहीं है। सारा पैसा बरसों पहले ही कहीं और ठिकाने लगाया जा चुका है। बाकी बचे कुछ खातों में कुछ तो कानूनी रूप से बिल्कुल सही बताये जा रहे हैं, कुछ पर कार्रवाई होकर पहले ही जुर्माना वगैरह वसूला जा चुका है और जो बचे-खुचे ‘काले’ खाते हैं भी, उनमें कुछ ज्यादा बड़ी रकम नहीं है ! तो फिर किस बात के लिए आस्था का सवाल खड़ा किया जा रहा है ?

लाजपत नगर पोस्ट आफिस में जबरन दिए जा रहे प्रतिबंधित नोट

रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने उन नोटों के लेन  - देन पर रोक लगा रखी है , जो 2005 से पूर्व जारी किये गये थे और जिन पर सन अंकित नहीं है | एक अप्रैल 2014 से इन्हें सिर्फ़ बैंकों में वापस किया जा सकता है | इसके लिए भी आवश्यक है कि बैक में एकाउंट हो | मगर नई दिल्ली के लाजपत नगर स्थित पोस्ट आफिस इन नोटों को लेने के लिए उपभोक्ताओं को बाध्य कर रहा है और न लेने पर डाक कर्मी अशिष्टता पर उतर आते हैं | मैंने विगत पांच नवंबर को उक्त पोस्ट आफिस से अपने एकाउंट से बारह हज़ार रुपये निकाले , जिसमें एक - एक हज़ार के चार नोट 2005 के पूर्वकाल के थे , जिन्हें बदलने के लिए विंडो पर मौजूद महिला डाककर्मी महोदया से जब मैंने निवेदन किया , तो वे भड़क उठीं और कहा कि सब नोट सही हैं | अभद्र शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि तुम्हें किसने बता दिया कि जिन नोटों पर सन मुद्रित नहीं है , वे नोट व्यावहारिक चलन से बाहर हैं | मैंने उन्हें रिज़र्व बैंक की हिदायत का हवाला दिया , फिर भी उन्होंने सिर्फ़ एक हज़ार के एक नोट के पांच - पांच सौ कर दिए , जिनमें भी एक पांच सौ का नोट 2005 से पूर्व का था | उन्होंने शेष तीन हज़ार के साथ ही उस पांच सौ के नोट को वापस लेने से इन्कार कर दिया | यह भी साफ़ कह दिया कि जो नोट उपलब्ध हैं , वही मिलेंगे | उन्होंने कहा ' घर से लाकर थोड़े ही दूंगी | ' डाक विभाग के उच्च अधिकारियों से अनुरोध है कि प्रतिबंधित नोट उपभोक्ताओं को न प्रदान करें और कर्मचारियों को निर्देश दें कि उपभोक्ताओं से सदा शिष्ट व्यवहार करें |
- मुहम्मद अहमद 
संपादक ' कान्ति ' साप्ताहिक / मासिक 
D- 314 ,दावत नगर , अबुल फज्ल इन्क्लेव 
जामिया नगर , नयी दिल्ली  - 110025

Oct 26, 2014

इस मुहिम को कामयाब बनाएं

इस मुहिम को कामयाब बनाएं 
स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ वातावरण बनाने का आह्वान किया था | लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि इस ओर ध्यान नहीं दिया गया | नतीजतन पूरे देश में सांप्रदायिकता की बाढ़ आ गयी है | सहज रूप से देश - समाज हितैषी लोग चिंतित हैं | वे चाह रहे हैं कि यह विषम स्थिति जितनी जल्दी बदल जाए और देश में सांप्रदायिक सौहार्द व भाईचारे की खुशगवार फजा बने , उतना ही देशवासियों के लिए अच्छा है | ऐसी ही सदिच्छा रखनेवाले कुछ लोग पिछले दिनों लखनऊ में जुटे |  देश में बढ़ती सांप्रदायिकता और कौरपोरेट लूट के खिलाफ विभिन्न राजनीतिक दलों व जन संगठनों की बैठक विधानसभा मार्ग लखनऊ स्थित माकपा कार्यालय पर हुई। बैठक में माकपा, भाकपा माले, भाकपा, आईपीएफ, नागरिक परिषद और रिहाई मंच के नेताओं ने आने वाले दिनों में इस जहरीले वातावरण के खिलाफ जन अभियान’ चलाने का फैसला किया | 
इस आयोजन में कई नामचीन नेताओं ने कहा कि कभी ‘लव जिहाद’ के नाम पर अफवाह फैलाकर, तो कभी लाउड स्पीकर जैसे छोटे-छोटे मुद्दों का सांप्रदायिकरण करके संघ परिवार और उससे जुड़े संगठनों ने पिछले चार महीनों में पूरे देश में अराजकता और असुरक्षा का माहौल पैदा कर दिया है। इनमें संघ परिवार और भाजपा नेताओं की भूमिका कई बार खुले तौर पर उजागर भी हो चुकी है , लेकिन उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं की जा रही है | उन्हें शासन-प्रशासन के स्तर पर खुली छूट और संरक्षण प्राप्त हैं ! 
इन नेताओं ने केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों की भी नुक्ताचीनी करते हुए कहा कि देशी-विदेशी बड़े पूंजीपतियों और काॅरपोरेट निगमों के मफ़ाद व हित में श्रम कानूनों में बदलाव की जो कोशिश की जा रही है , वह निंदनीय एवं भर्त्सनीय है | इनके द्वारा बड़े पैमाने पर श्रमिकों का शोषण किया जा रहा है | आज अजीब सूरतेहाल है | देश के संसाधनों और प्राकृतिक खनिजों की लूट के लिए आमंत्रित कर देश को तबाह करने वाली आर्थिक नीतियों को बढ़ावा दिया जा रहा है ! हाइब्रिड बीजों और रासायनिक खादों व अन्य रसायनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देकर पहले से ही खेती - किसानी को चौपट कर रखा गया है , अब दवाओं का कारोबार भी इन्हीं धन्नासेठों के हवाले कर दिया गया है , जिसके कारण जीवन रक्षक दवाइयों की कीमतें कई गुना बढ़ गई हैं , यहां तक की कैंसर की जो ग्लेवेक नामक दवा साढ़ें आठ हजार की थी , उसकी कीमत अब मोदी के अमेरिका दौरे के बाद एक लाख आठ हजार हो गई है। इन नेताओं ने संकल्प लिया कि इस परिस्थिति के ख़िलाफ़ सघन अभियान चलाया जायेगा |
- डॉ . मुहम्मद अहमद

Sep 23, 2014

एकता , अखंडता को भंग करने का मंसूबा !

एकता , अखंडता को भंग करने का मंसूबा !
संघ प्रमुख मोहन भागवत को सिख समाज को हिन्दू धर्म का हिस्सा बताना भारी पड़ गया | विरोध में सैकड़ों सिख भाइयों और बहनों ने पिछले 6 सितंबर को नयी दिल्ली स्थित संघ कार्यालय के बाहर प्रदर्शन करके उनके दावे को चुनौती दी | इस प्रदर्शन में शिरोमणि अकाली दल , दिल्ली के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में शामिल हुए | उल्लेखनीय है कि संघ प्रमुख ने गत दिनों कहा था कि संघ सिख धर्म को पृथक और अलग पहचान वाला नहीं मानता है | वह इसे हिन्दू धर्म का हिस्सा मानता है | इस बयान पर  सिखों की ओर से तीखी प्रतिक्रिया हुई | प्रदर्शनकारियों ने इसे सिख धर्म के विरुद्ध और सिखों  के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप क़रार दिया | उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि सिखों को किसी हिन्दू धार्मिक संगठन और वह फासीवादी - के प्रमाण - पत्र की ज़रूरत नहीं है | सिखों ने कहा कि हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि इस तरह के आक्रामक बयानों को सिख और सिख समुदाय सहन नहीं करेगा | 
प्रदर्शनकारी काले झंडे लिए हुए थे और मोहन भागवत के बयान के विरुद्ध नारे लगा रहे थे | संघ समर्थित शिरोमणि अकाली दल [ बादल ] ने इस प्रदर्शन में हिस्सा नहीं लिया | शिरोमणि अकाली दल और अन्य सिख संगठनों ने इसमें हिस्सा लिया | पुलिस ने तरसेम सिंह खालसा , भजन वालिया सहित शिरोमणि अकाली दल के कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया , लेकिन बाद में इन्हें छोड़ दिया गया | प्रमुख सिख नेता , शिरोमणि अकाली दल दिल्ली के अध्यक्ष परमजीत सिंह सरना भी प्रदर्शन में सम्मिलित हुए | पुलिस ने अवरोध खड़े करके प्रदर्शनकारियों को संघ कार्यालय की ओर बढने से रोकने की कोशिश की | 
सिख भाइयों ने संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान का भी विरोध किया है , जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत में रहनेवाले सभी हिन्दू हैं | शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी , अमृतसर के मुखपत्र '' गुरूमति ज्ञान ''  [ सितंबर 2014 . पृष्ठ 56 ] में छपे एक वक्तव्य में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी के अध्यक्ष जत्थेदार अवतार सिंह ने भागवत के बयान को देश की एकता और अखंडता को भंग करनेवाला क़रार देते हुए इसकी कड़े शब्दों में निंदा की है | 
श्री सिंह ने कहा कि ' भारत एक बहुभाषी , बहुधर्मी देश है | इसमें हिन्दू , मुसलमान , सिख , ईसाई व अन्य धर्मों के लोग बसते हैं , जिनके अपने - अपने रीति - रिवाज तथा संस्कार हैं | भारतीय संविधान के अनुसार , प्रत्येक धर्म के लोगों को अपने - अपने धर्म व रीति - रिवाजों के अनुसार रहने का पूर्ण अधिकार है |
उन्होंने कहा कि मोहन भागवत की यह दलील कि अमेरिका , इंग्लैंड में रहनेवाले लोग अंग्रेज़ , जर्मनी में रहनेवाले जर्मन हैं आदि बड़ी उपहासस्पद बात है , क्योंकि अमेरिका में ईसाई गोरे लोगों के अलावा मुसलमान , सिख व हिन्दू भाई भी बड़ी संख्या में रह रहे हैं | इसी तरह दूसरे देशों में भी है , परन्तु किसी ने कभी भागवत जैसी संकुचित सोच का प्रकटन नहीं किया |
श्री सिंह ने कहा कि किसी भी देश में रहनेवाले लोग वहां के निवासी एवं राष्ट्रीयता के नाम से जाने जा सकते हैं , अर्न्तु एकधर्मी नहीं | इससे पहले भी भागवत ने कई विवादकारी बयान दिए हैं | उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यक या दूसरे धर्मों का अपमान कर देश की कोई धारा  तरक्की , ख़ुशहाली का सपना पूरा नहीं कर सकती | 
जत्थेदार अवतार सिंह ने कहा कि भागवत के इस सांप्रदायिक बयान से देश में बसनेवाले अन्य धर्मों के लोगों के मन को भारी ठेस पहुंची है | ऐसे बयान राष्ट्रहित में नहीं हैं | उन्होंने भारत सरकार से ज़ोर देकर कहा कि शांतिपूर्ण भारत की एकता व अखंडता को भंग करने के मंसूबे बनानेवाले भागवत के विरुद्ध क़ानूनी कार्रवाई करनी चाहिए |  
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

पलटिए , अपने रब की तरफ़

स्टीफन हाकिंग ने ' गॉड पार्टिकल्स ' को पूरी दुनिया को खत्म करनेवाला बताया 
पलटिए , अपने रब की तरफ़ 
इस्लाम क़यामत के आने पर पूर्ण धारणा रखने की शिक्षा देता है | क़यामत का अर्थ है महाप्रलय , पुनरुत्थान | यह ऐसा दिन है जब मौजूदा सांसारिक व्यवस्था छिन्न - भिन्न हो जाएगी | सारे जीवधारी मर जायेंगे | इसके बाद अल्लाह एक दूसरी सृष्टि की रचना करेगा | सारे लोग पुनः ज़िन्दा करके उठाये जायेंगे और उन्हें उनके अपने कर्मों का  बदला दिया जायेगा | यही क़यामत का दिन होगा | पवित्र कुरआन में है - '' [ इन्सान ] पूछता है , ' आख़िर क़यामत का दिन कब आएगा? तो जब निगाह पथरा जाएगी और चन्द्रमा प्रकाशहीन हो जायेगा , और सूर्य , चन्द्रमा मिलाकर एक कर दिए जायेंगे | उस दिन इन्सान कहेगा कहाँ भागकर जाऊं ? कदापि नहीं , वहां शरण लेने की कोई जगह न होगी | उस दिन तेरे रब ही के सामने जाकर ठहरना होगा | [ 75 : 6 - 12 ] क़यामत अचानक आएगी , मगर कब आएगी , सिर्फ़ अल्लाह को मालूम है | लेकिन इसके लक्षण ज़रूर हैं , जिनके आधार पर क़यामत की कल्पना की जाती है | इन्सान अपनी करतूतों से प्रकृति के उपादानों का विनाश कर रहा है , जो भी बिगाड़ और विनष्टीकरण का कारण है | आज इंसान ख़ुद प्राकृतिक संसाधनों को मिटाने पर लगा हुआ है | लगातार प्रकृति के कार्यों में हस्तक्षेप कर इंसान ने खुद को प्रकृति के सामने ला खड़ा किया है जहां प्रकृति उसका विनाश कर सकती है.... जंगलों की कटाई कर असंतुलन पैदा किया जा रहा है.... हवा को प्रदूषित कर कर दिया गया है तो  जल को भी इंसान ने नहीं बख्शा | जब से पृथ्वी बनी हैं, छिटपुट विनाश के कई चरण हुए हैं, कई प्रजातियां विलुप्त हुई और कई नई आई हैं. | भूगर्भीय साक्ष्य भी पृथ्वी पर कई प्राचीन विनाशकारी हलचल को दर्शाते हैं., चाहे वे भूकम्प के रूप में ,  ज्वालामुखी के रूप में ,  या फिर बाढ़ के रूप में जिसकी परिणति इससे पहले कई बार  हिमयुग के रूप में हुई है तो कई बार भयंकर बाढ़ , तूफ़ान आदि के रूप में | यह अल्लाह की चेतावनियाँ और उसके वजूद की निशानियाँ भी हैं | वही स्रष्टा है और संहारक भी | अब विज्ञान भी इस तथ्य को मानने लगा है | भौतिकी और ब्रह्मांड विज्ञान के मशहूर प्रफेसर स्टीफन हॉकिंग ने पिछले दिनों दुनिया को चेतावनी दी है कि जिस 'गॉड पार्टिकल्स' ने सृष्टि को स्वरूप और आकार दिया है, उसमें पूरी दुनिया को खत्म करने की भी क्षमता है। प्रफेसर हॉकिंग की ' संडे टाइम्स ' [ लन्दन 7 सितंबर 2014 ] को दी इस रिपोर्ट ने विज्ञान जगत में खलबली मचा दी है। वैज्ञानिक इस विषय को लेकर काफी रोमांचित हैं। हॉकिंग का कहना है कि अगर वैज्ञानिक गॉड पार्टिकल्स को हाई टेंशन (उच्च तनाव) पर रखेंगे तो इनसे 'कैटास्ट्रॉफिक वैक्यूम' तैयार होगा। यानी इससे बुलबुलानुमा गैप तैयार होंगे। इससे ब्रह्मांड में गतिमान कण टूट-टूटकर उड़ने लगेंगे और आपस में टकराकर चूर-चूर हो जाएंगे। हॉकिंग ने कहा कि हिग्स बोसोन १०० अरब गीगा इलेक्ट्रॉन वोल्ट से अधिक की ऊर्जा पर अति स्थिर हो सकता है। ऐसी स्थिति में एक विनाशकारी निर्वात (वैक्यूम) बन जाएगा। बुलबुले के रूप में बना यह निर्वात प्रकाश की गति से विस्तार लेगा और पूरे ब्रह्मांड के विनाश का कारण बन जाएगा |
हालांकि भौतिकविदों ने इस मसले को आपदा की आशंका मानकर किसी तरह का प्रयोग नहीं किया है। लेकिन प्रफेसर हॉकिंग ने दुनिया के वैज्ञानिकों को सचेत जरूर किया है। सैद्धांतिक भौतिकीविदों ने हिग्स बॉसन के बारे में लिखा है कि उनकी नई किताब स्टारमस में नील आर्मस्ट्रॉन्ग, बज़ एलड्रीन, क्वीन गिटारिस्ट ब्रायन मे आदि के लेक्चर्स का चयन है। इसी साल नवंबर में यह किताब आने वाली है। इसमें भी गॉड पार्टिकल्स से जुड़ी जानकारियां होंगी। यूनिवर्स की हर चीज (तारे, ग्रह और हम भी) पदार्थ से बनी है। मैटर अणु और परमाणुओं से बना है और मास वह फिजिकल प्रॉपर्टी है, जिससे इन कणों को ठोस रूप मिलता है। मास जब ग्रैविटी से गुजरता है, तो वह भार की शक्ल में भी मापा जा सकता है, लेकिन भार अपने आप में मास नहीं होता, क्योंकि ग्रैविटी कम-ज्यादा होने से वह बदल जाता है। मास आता कहां से आता है, इसे बताने के लिए फिजिक्स में जब इन तमाम कणों को एक सिस्टम में रखने की कोशिश की गई तो फॉर्म्युले में गैप दिखने लगे। इस गैप को भरने और मास की वजह बताने के लिए 1965 में पीटर हिग्स ने हिग्स बोसोन या गॉड पार्टिकल का आइडिया पेश किया। 
क़यामत की धारणा धर्मग्रन्थों में मौजूद है | इस विषय पर इस्लाम में विशद विवरण है | ईसाई धर्म में भी क़यामत की धारणा विद्यमान है | हिन्दू धर्म में भी महा प्रलय का उल्लेख है | अन्य धर्मग्रन्थों के साथ ही महाभारत में कलियुग के अंत में प्रलय होने का जिक्र है, लेकिन यह किसी जल प्रलय से नहीं बल्कि धरती पर लगातार बढ़ रही गर्मी से होगा। महाभारत के वनपर्व में उल्लेख मिलता है कि सूर्य का तेज इतना बढ़ जाएगा कि सातों समुद्र और नदियां सूख जाएंगी। संवर्तक नाम की अग्रि धरती को पाताल तक भस्म कर देगी। वर्षा पूरी तरह बंद हो जाएगी। सबकुछ जल जाएगा, इसके बाद फिर बारह वर्षों तक लगातार बारिश होगी। जिससे सारी धरती जलमग्र हो जाएगी। लगभग ढाई सौ पहले के चर्चित भविष्यवक्ता नास्त्रेस्देमस की इस बारे में भविष्यवाणी मौजूद है | नास्त्रेस्देमस ने प्रलय के बारे में बहुत स्पष्ट लिखा है कि मै देख रहा हूँ,कि एक आग का गोला पृथ्वी की ओर बढ़ रहा है,जो धरती से मानव के काल का कारण बनेगा । एक अन्य जगह वे लिखते हैं कि एक आग का गोला समुद्र में गिरेगा और पुरानी सभ्यता के समस्त देश तबाह हो जाएंगे। माया कलेंडर के अनुसार , 21 दिसंबर 2012 के बाद दुनिया को नहीं होना चाहिए , हालाँकि यह भविष्यवाणी गलत साबित हो चुकी है | साउथ ईस्ट मेक्सिको के माया कैलेंडर में 21 दिसंबर 2012 के बाद की तिथि का वर्णन नहीं है। कैलेंडर उसके बाद पृथ्वी का अंत बता रहा है। माया कैलेंडर के मुताबिक 21 दिसंबर 2012 में एक ग्रह पृथ्वी से टकराएगा, जिससे सारी धरती खत्‍म हो जाएगी। करीब 250 से 900 ईसा पूर्व माया नामक एक प्राचीन सभ्यता स्थापित थी। ग्वाटेमाला, मैक्सिको, होंडुरास तथा यूकाटन प्रायद्वीप में इस सभ्यता के अवशेष खोजकर्ताओं को मिले हैं। कहा जाता है कि माया सभ्यता के काल में गणित और खगोल के क्षेत्र उल्लेखनीय विकास हुआ था। अपने ज्ञान के आधार पर माया लोगों ने एक कैलेंडर बनाया था। कहा जाता है कि उनके द्वारा बनाया गया कैलेंडर इतना सटीक निकला है कि आज के सुपर कम्प्यूटर भी उसकी गणनाओं में 0.06 तक का ही फर्क निकाल सके और माया कैलेंडर के अनेक आकलन, जिनकी गणना हजारों सालों पहले की गई थी, सही साबित हुए हैं। मगर क़यामत की तारीख़ के सिलसिले में माया कलेंडर असफल सिद्ध हो चुका है | फिर भी अमेरिका के कुछ वैज्ञानिकों ने कुछ समय पहले घोषणा की है कि 13 अप्रैल 2036 को पृथ्वी पर प्रलय हो सकता है। खगोलविदों के अनुसार अंतरिक्ष में घूमने वाला एक ग्रह एपोफिस 37014.91 किमी/ प्रति घंटा) की रफ्तार से पृथ्वी से टकरा सकता है। इस प्रलयंकारी भिडंत में हजारों लोगों की जान भी जा सकती है। हालांकि नासा के वैज्ञानिकों का कहना है कि इसे लेकर घबराने की कोई जरूरत नहीं है। हकीक़त यह है कि क़यामत का आना यक़ीनी है , मगर यह कब आएगी , इसका ज्ञान सिर्फ़ अल्लाह को है | अतः परलौकिक जीवन को सफल बनाने के लिए अनिवार्य है कि इन्सान इस दुनिया सुकर्म करे , जिससे पालनकर्ता प्रभु उससे राज़ी हो |
Dr. Muhammad Ahmad

केंद्र सरकार सांप्रदायिकता पर रोक लगाकर राजधर्म का पालन करे

केंद्र सरकार सांप्रदायिकता पर रोक लगाकर राजधर्म का पालन करे
देश के शुभचिंतकों , हितैषियों और विवेकशील लोगों को इस बात का शिद्दत से अहसास है कि हमारा प्रिय देश इस समय सांप्रदायिकता की आग में जलने लगा है | उन्हें इस बात की काफ़ी चिंता भी है कि अगर इस नकारात्मक प्रवृत्ति पर फ़ौरन रोक नहीं लगाई गयी , तो स्थिति गंभीर हो सकती है | जमाअत इस्लामी हिन्द के महासचिव जनाब नुसरत अली ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को लिखे पत्र में यह चिंता जताई गयी है कि भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद से अल्प संख्यकों, खासकर मुसलमानों के खिलाफ़ भगवा घृणास्पद आंदोलन में तेज़ी आयी है। विगत 10 सितंबर को लिखे अपने पत्र मे उन्होंने कहा कि यह घृणास्पद आंदोलन न केवल देश  के बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष  ढांचे को नुक़सान पहुंचाएगा , बल्कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की विकास योजना में भी बाधा उत्पन्न करेगा | पत्र में कहा गया है कि पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान देश  ने घृणित राजनीतिक आंदोलन देखा। एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार से आशा की जा रही थी कि इस घृणित आंदोलन पर लगाम लगेगा, लेकिन मामला और भी बीभत्स और व्याकुल करने वाला है। ऐसा लगता है कि आंदालनकारियों को और पंख लग गए हैं। जमाअत के महासचिव ने अपने पत्र में यह भी लिखा कि ‘लव जिहाद’, ‘सांप्रदायिक बलात्कार’ और ‘बलात् धर्म परिवर्तन’ जैसी नई - नई  शब्दावलियों का ईजाद कर फ़र्जी दुष्प्रचार का नया सिलसिला क़ायम किया गया है। देशवासियों विशेषकर अल्पसंख्यकों के लिए यह अत्यंत निराशाजनक है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के नेतागण जैसे योगी आदित्यनाथ, अशोक सिंघल और प्रवीण भाई  तोगडि़या निरंतर उत्तेजक, विषाक्त और घृणास्पद वक्तव्य दे रहे हैं , लेकिन उनके खि़लाफ़ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। महासचिव ने यह भी कहा कि केवल यह कहकर कि कानून और व्यवस्था का मामला राज्य सरकार का है, केंद्र को चुप नहीं बैठना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह सही है कि क़ानून और व्यवस्था की जि़म्मेदारी राज्य सरकार की है लेकिन अगर राज्य सरकार क़ानून और व्यवस्था को क़ायम रखने में असफल रहती है और घृणास्पद आंदोलन एक बड़ा सांप्रदायिक तनाव पैदा करता है तो केंद्र को चुप नहीं बैठना चाहिए। उन्होंने सरकार से राज धर्म पालन करने का अनुरोध किया।
यह केंद्र एवं राज्य दोनों सरकारों का दायित्व ही नहीं बल्कि उनकी अनिवार्यता है कि संविधान प्रदत्त देश के सभी नागरिकों, समूहों और समुदायों बसमूल अल्पसंख्यकों के अधिकारों, सम्मान और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए राज धर्म का पालन करें। जमाअत ने प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के विकास योजनाओं की प्रशंसा करते हुए इसकी सफलता पर संशय ज़ाहिर किया कि अगर विभाजनकारी आंदोलन इसी तरह जारी रहा तो यह समाजिक एकता और शांति के लिए खतरा होगा। उन्होंने सरकार से अनुरोध किया कि लोगों ने वोट चाहे पक्ष में डाले हैं या विरोध में, सरकार सभी समुदायों को एक साथ लेकर चले और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और सांप्रदायिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए कठोर कार्रवाई करे। जनाब नुसरत अली ने कहा कि कुछ विषयों पर मत विभिन्नताएं हो सकती हैं, बावजूद इसके जमाअत सरकार के प्रत्येक अच्छी पहल का हमेशा समर्थन करेगी | देश में बढ़ रही सांप्रदायिकता से राजनीतिक दल भी चिंतित हैं | कांग्रेस के क़द्दावर नेता एवं महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर सांप्रदायिकता फैलानेवालों के ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई की मांग की है | उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई है कि गृहमंत्री को 'लव जिहाद' का मतलब नहीं पता। दिग्विजय ने कहा है कि जब भाजपा के तमाम नेता जगह-जगह 'लव जिहाद' को लेकर तीखी बयानबाजी कर रहे हैं तो ऐसे आपको कैसे नहीं पता कि लव जिहाद क्या होता है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री लालकिले की प्राचीर से सांप्रदायिक सद्भाव की अपील करते हैं ! उल्लेखनीय है कि सरकार के सौ दिन पूरे होने पर अपने मंत्रालय की उपलब्धियों पर आयोजित पत्रकार वार्ता में 'लव जिहाद' के बारे में पूछे जाने पर राजनाथ सिंह ने कहा था कि यह क्या होता है। गृहमंत्री को लिखे पत्र में दिग्विजय सिंह ने कहा है कि 'प्रिय राजनाथ सिंह जी, मैंने आपकी वह पत्रकार वार्ता देखी जिसमें आपके द्वारा लव जिहाद की जानकारी से इन्कार किया गया। मुझे यह विश्वास नहीं होता कि जबकि आपके गृह प्रदेश के भारतीय जनता पार्टी के प्रांतीय अध्यक्ष कई दिनों से यह बयान दे रहे हैं और विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर इसे प्रचारित कर रहे हैं, ऐसे में आपको इसकी जानकारी नहीं है।'यही नही कांग्रेस नेता ने संघ के मुखपत्र माने-जाने वाले समाचारपत्रों को भी घेरे में लेते हुए कटाक्ष करते हुए लिखा है कि 'शायद आजकल आप ' पांचजन्य ' और ' ऑर्गनाइजर '  नहीं पढ़ रहे हैं , जिनके मुखपृष्ठ पर इसके बारे में लेख छपे हैं।' दिग्विजय ने प्रधानमंत्री की मंशा को पूरा करने के लिए गृह मंत्री से अपील की है कि वे राज्य सरकारों को सांप्रदायिकता फैलाने वाले तत्वों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दें एवं सांप्रदायिकता पर काबू पाएं।
Dr. Muhammad Ahmad

Aug 23, 2014

राहुल गाँधी ने दुखती रग पर हाथ रखा

 महिला - सम्मान के लिए मानसिकता में बदलाव की ज़रूरत 

कांग्रेस अपनी हार से तिलमिलाई हुई है | उसके सभी नेता अपने पुराने जनाधार की खोज में ऊलजलूल बयानबाज़ी पर भी आमादा दिख जाते हैं | वे जनता के बीच अपनी पकड़ बहाल करने के लिए कुछ आयोजन भी कर डालते हैं | ऐसे ही एक आयोजन महिला कांग्रेस का हुआ | विगत 20 अगस्त को दिल्ली के ताल कटोरा स्टेडियम में राजीव गांधी की 70 वीं जयंती के अवसर पर आयोजित महिला कांग्रेस के कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने विवादस्पद किन्तु यथार्थवादी बयान दिया , लेकिन इसी मौक़े पर एक अनुभवी कांग्रेसी मणि शंकर अय्यर ने मोदी विरोध में यहाँ तक कह दिया कि ' यदि आप सार्वजनिक जीवन में सक्रिय ऐसी महिलाओं को कांग्रेस में लाते हैं , तो मोदीजी को कल तक गाँधी नगर जाना पड़ेगा और फिर हम उन्हें समंदर में पहुंचा देंगे | ' इससे पूर्व वे मोदी को कांग्रेस सम्मेलनों में चाय बेचने की मुफ्त राय भी दे चुके हैं| इस वर्ष के आम चुनाव प्रचार के दौरान भी अय्यर ने मोदी को ' नया लड़का ' की उपाधि दी थी और कहा था कि जोश में आकर इसकी जुबान फिसल जाती है ! राहुल गाँधी ने एक कडुई सच्चाई उजागर करते हुए कहा कि जो लोग आपको माता और बहन कहते हैं, जो मंदिरों में मत्था टेकते हैं, देवी की पूजा करते हैं, वही बसों में आपके साथ छेड़छाड़ करते हैं | उन्होंने कहा कि समाज में महिला विरोधी मानसिकता इस कदर व्याप्त है कि पूरे देश में हर महिला को दबाया जाता है | उन्होंने कहा कि समाज महज कानून से नहीं बदलता है | समाज में महिलाओं के प्रति सोच बदलने की जरूरत है| जब तक लोगों की सोच नहीं बदलेगी तब तक समाज को बदलना आसान नहीं है| कांग्रेस के युवा नेता की इस बात से इन्कार नहीं कि समाज में आमूलचूल परिवर्तन हेतु सोच में बदलाव लाना एक बड़ी चुनौती है , लेकिन राहुल गाँधी ने महिला अनुकूल मानसिकता के निर्माण की ज़िम्मेदारी स्वयं महिलाओं पर डालकर अपने संभाषण का गला घोंट डाला | उन्होंने बलात्कार और महिला अत्याचार की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि कमी सोच की है | पुलिस और क़ानून से यह सब ठीक नहीं होगा | इसे महिलाएं ही ठीक कर सकती हैं | पुरुषों की सोच वे ही बदल सकती हैं |बाबा राहुल के इस बयान के विपरीत उनकी माँ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने पिछले वर्ष मार्च में इस आशय का बयान दिया था कि देश में महिलाओं के साथ बलात्कार और हिंसा की लगातार हो रही घटनाओं से हमारे सिर शर्म से झुक गए हैं |  उन्होंने इनके उपाय के तौर पर घोषणा की थी कि कन्या भ्रूणहत्या और महिलाओं के प्रति बढ़ रही चिंताजनक घटनाओं पर क़ाबू पाने के लिए जल्द ही कड़ा क़ानून बनाया जाएगा |  वास्तव में महिलाओं के प्रति आपराधिक घटनाओं में तेज़ी आई हुई है या यूँ कहें कि 16 दिसम्बर 2012 को 23 वर्षीया ज्योति की गेंगरेप के बाद हुई हत्या की हृदय विदारक घटना के बाद वे घटनाएं भी सामने आ जाती हैं , जो पहले दब - दबा जाती थीं | देश में बलात्कार की रोज़ाना अनेक घटनाएं घटित हो रही हैं | कुल मिलाकर स्थिति बिगड़ती जा रही है और महिलाओं का मान - सम्मान धूल - धूसरित हो रहा है
यह हकीक़त भी लोगों को पता है कि इन घटनाओं के साथ ही  कन्या - भ्रूण हत्या और विभिन्न रूपों में महिला - शोषण जारी है ! आज इधर - उधर की बातें बहुत की जा रहीं हैं | महिला - दिवस भी मनाया जाता है ... हर साल बड़े धूम - धाम से आलमी सतह पर .... पर महिला आज भी बहुल भावना और विचार के यथार्थ धरातल पर दोयम दर्जे पर है | उसके प्रति सामाजिक सोच में दोहरापन मौजूद है , यानी महिला होने के कारण वह अपने नैसर्गिक एवं फ़ितरी अधिकारों से वंचित है | अभी पिछली सदी में महिलाओं के प्रति जागरुकता का परिचय देते हुये अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने आह्वान किया और 8 मार्च का दिन महिलाओं के सशक्तीकरण के रूप में मनाया जाने लगा | सबसे पहले 28 फरवरी 1909 ई. को अमेरिका में यह दिवस मनाया गया, लेकिन जिन उद्देश्यों को लेकर इसकी शुरुआत की गई थी, वह बहुत पहले ही खत्म हो गया था | बस औपचारिकता अब तक बाक़ी है | आज दुनिया के सभी तथाकथित विकसित और विकासशील देशों में भी महिलाओं को लेकर लगभग एक जैसी दुखद  स्थिति बनी हुई है | भौतिक रूप से समाज और देश ने भले ही खूब तरक्की कर ली हो, लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि महिलाओं के प्रति हमारा नजरिया सकारात्मक नहीं है | सृष्टि में उसकी रचना भी उन्हीं गुणों और तत्वों के आधार पर हुई है, जिससे पुरुष बना है, किन्तु सामाजिक और पारिवारिक दृष्टि से महिला अभी भी न्याय की राह तक रही है |  उसे न्याय नहीं मिल सका है |  सामाजिक, आर्थिक आदि स्तरों पर महिलाएं आज भी बहुत पिछड़ी हैं | कल्पना तो यह भी गई  थी कि हमारे सामाजिक नजरिये में व्यापक बदलाव आयेगा और समाज अपने अभिन्न अंग को स्वयं के बराबर का दर्जा दे सकेगा, लेकिन ऐसा केवल पुस्तकीय ज्ञान और मंचीय भाषण तक सीमित होकर रह गया | ऐसे में यह विचार करना होगा कि साल में एक दिन महिलाओं के विषय में चिन्ता करना क्या पर्याप्त है या हमें उनके प्रति बाकी दिनों में भी चिन्ता करनी  चाहिये | संबंधों की बुनियाद पर आज किसी भी महिला को दहेज की दहलीज पार करनी पड़ती है , अन्यथा उसके साथ जो हश्र होता है वह किसी से छिपा नहीं है | हकीक़त यह है कि आज शिक्षा का प्रतिशत बढऩे के साथ ही नैतिकता का स्तर काफी गिरा है | दहेज  के कारण हत्याएं, मुकदमेबाजी, तलाक, बलात्कार जैसी घटनाओं ने तो मानवता के मुख पर कालिख ही पोत दी है |  बिना किसी पूर्वाग्रह के बात करें तो शहरों की स्थिति बड़ी नाजुक है, जो जितना अधिक उच्च शिक्षित, बड़े सामाजिक दायित्व वाला है, वह उतना ही अनैतिक आचरण करते सुना - देखा जाता है | वास्तव में महिला - सम्मान की बात केवल भाषणों तक सीमित होकर रह जाती है | महिलाओं की मानसिक और वैचारिक स्थिति का यदि नैतिकता के आधार पर अध्ययन किया जाए तो ऐसे आंकड़े सामने आएंगे, जो हमारे सामाजिक खोखलेपन को रेखांकित करेंगे | राष्ट्रीय स्तर पर जारी एक रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि एशिया में प्रतिवर्ष 10 लाख से ज्यादा लड़कियों को वेश्यावृत्ति के धंधों में उतारा जाता है | यह आंकड़ा कोलकाता, दिल्ली आदि महानगरों में ज्यादा है | इसी प्रकार से विदेशों में भारत से भेजी जाने वाली घरेलू कामकाजी महिलाओं की स्थिति तो और भी लज्जास्पद है | अखबार और टेलीविजन के पर्दे पर जब कभी कोई महिला यदि रोते बिलखते अपनी पीड़ा लेकर आती है , तब हम सामाजिक न्याय के झंडे उठा लेते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे कितनी जिन्दगियां सिसकते आंसुओं के सैलाब में अपना गुजर कर रही हैं. उनका तो कोई पुरसानेहाल नहीं हैं | अतः जरूरी है कि सामाजिक संदर्भों में हम महिलाओं  के प्रति अपनी दृष्टि को और व्यापक , पारदर्शी और उदार बनाएं |