Jan 31, 2014

राह पकड़ तू एक चला चल

राह पकड़ तू एक चला चल 


मदिरालय जाने को घर से
चलता है पीनेवाला,
'किस पथ से जाऊँ?'
असमंजस में है वह भोलाभाला;
अलग-अलग पथ बतलाते सब
पर मैं यह बतलाता हूँ-
'राह पकड़ तू एक चला चल,
पा जाएगा मधुशाला'।
पौधे आज बने हैं साकी
ले-ले फूलों का प्याला,
भरी हुई है जिनके अंदर
परिमल-मधु-सुरभि त हाला,
माँग-माँगकर भ्रमरों के दल
रस की मदिरा पीते हैं,
झूम-झपक मद-झंपित होते,
उपवन क्या है मधुशाला!
एक तरह से सबका स्वागत
करती है साकीबाला,
अज्ञ-विज्ञ में है क्या अंतर
हो जाने पर मतवाला,
रंक-राव में भेद हुआ है
कभी नहीं मदिरालय में,
साम्यवाद की प्रथम प्रचारक
है यह मेरी मधुशाला।
छोटे-से जीवन में कितना
प्यार करूँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में
कहलाया 'जानेवाला',
स्वागत के ही साथ विदा की
होती देखी तैयारी,
बंद होने लगी खुलते ही
मेरी जीवन-मधुशाला !
- हरिवंश राय बच्चन

आख़िर जिस बात का गम था ,तन्हाई थी

आख़िर जिस बात का गम था ,तन्हाई थी 
वो बेकसी आँखों में उतर आई थी ,
कब तलक इन्तिज़ार करते उस मसीहा का 
सब  मसरूफ़ थे , मगर कहीं बीनाई थी !
- अहमद ' मोहित '

भूख के एहसास को ....

भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो
या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो

जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाक़िफ़ हो गई
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो

मुझको नज़्मो-ज़ब्‍त की तालीम देना बाद में
पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो

गंगाजल अब बुर्जुआ तहज़ीब की पहचान है
तिश्नगी को वोदका के आचरन तक ले चलो

ख़ुद को ज़ख्मी कर रहे हैं ग़ैर के धोखे में लोग
इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो |


- अदम गोंडवी 

                                                                                            

ख़ाक-ए-वतन का मुझको हर ज़र्रा देवता है

ख़ाक-ए-वतन का मुझको हर ज़र्रा देवता है 
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सच कह दूं ऐ बिरहमन गर तू बुरा ना माने 
तेरे सनमक़दों के बुत हो गए पुराने 

अपनों से बैर रखना तूने बुतों से सीखा 
जंग-ओ-जदल सिखाया वाइज़ को भी ख़ुदा ने 

तंग आके मैंने आखिर दैर-ओ-हरम को छोड़ा 
वाइज़ का वाज़ छोड़ा, छोड़े तेरे फ़साने 

पत्‍थर की मूरतों में समझा तू ख़ुदा है 
ख़ाक-ए-वतन का मुझको हर ज़र्रा देवता है 

आ ग़ैरियत के परदे एक बार फिर उठा दे 
बिछड़ों को फिर मिला दे, नक्‍श-ए-दुई मिटा दे 

सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्‍ती 
आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें 

दुनिया के तीरथों से ऊंचा हो अपना तीरथ 
दामान-ए-आस्‍मां से इसका कलस मिला दे 

हर सुबह उठ के गायें मंतर वो मीठे मीठे 
सारे पुजारियों को मय पीत की पिला दे 

शक्ति भी शांति भी भक्‍तों के  गीत में है 
धरती के वासियों की मुक्ति पिरीत में है
 .

-  डा . मुहम्मद इकबाल 

मैंने बीते हुए युग की .......

विष्णु प्रभाकर

मैंने बीते हुए युग की
कथा लिखी थी
वह सच नहीं हुई
तुम आनेवाले क्षण की कहानी लिख रहे हो
वह भी सच नहीं होगी,
काल सबको ग्रस लेगा
शेष रह जायेगा दंभ
मेरा, तुम्हारा, उसका
तुम जानते हो किसका
बोलो नहीं, क्योंकि…
जो भी तुम बोलोगे
                                            झूठ होगा सब

'' पहली दूब '' - यथार्थपूर्ण जीवन - स्पंदन

 
'' पहली दूब '' - यथार्थपूर्ण जीवन - स्पंदन 
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कविता जीवन का स्पंदन है . इसकी ठीक - ठीक  अनुभूति - अभिव्यक्ति कविता को जीवंत बनाती है , जो कवि ऐसा नहीं कर पाते , वे कविता की सार्थकता को नहीं सिद्ध कर सकते . यह भी एक बात है कि जो लोग काव्य को जीवन से बाक़ायदा नही जोड़ पाते , वे आज की हिंदी कविता पर यह आरोप लगाकर अपनी इतिकर्तव्यता समझ लेते हैं कि उसमें काव्यानुभूति की प्रमाणिकता के अभाव के साथ ही अवास्तविकता का एक संसार बसा हुआ है . रचना त्यागी ' आभा ' का रचना - संसार जीवंत कविता का संसार है , जहाँ सर्वत्र यथार्थबोध है . रचना जी के पहले काव्य - संग्रह ' पहली दूब में संग्रहीत सभी छत्तीसों कविताएँ हमारे अन्तस् को जगाती एवं जीवन की वास्तविकताओं से साक्षात्कार कराती हैं . साथ ही इन्सान के चेहरे पर चढ़ी हुई नक़ाब को धीरे - धीरे किन्तु साहस के साथ उघाड़ने का दावा भी करती हैं . आस्वादन कीजिए  ' कलम ' शीर्षक एक ऐसी ही कविता की कुछ पंक्तियों का -  
ईमान की स्याही सूख गयी 
खुद्दारी की निब टूट गयी 
इसकी बोली अब लगती है 
जैसे सत्ता व्यापारों में . [ पृष्ठ ३१ ]
यह एक प्रायः सर्वमान्य हकीक़त है कि आज भी हिंदी कविता के सिरमौर पहले के सम्मान्य कवि गण ही हैं . आज भी प्रतिनिधि कवि सूरदास, तुलसीदास, कबीर, मीरा, रसखान,रहीम, निराला, बच्चन, प्रसाद, महादेवी, दिनकर , जय शंकर प्रसाद और मैथिलीशरण ही हैं. 
नई कविता अपनी पहचान इसलिए नहीं बना पाई , क्योंकि वह जमीन से नहीं जुड़ सकी . रचना ' आभा ' जी की प्रत्येक कविता मानव - जीवन बहुत गहरे जुड़ती है .द्रष्टव्य हैं  ' पड़ोसी ' शीर्षक रचना की ये पंक्तियाँ - 
'' न उलझ हमसे पड़ोसी 
तू भी अपना हिस्सा है .
नक्शे जुदा कैसे हुए 
अब ये पुराना क़िस्सा है ''. [ पृष्ठ २५ ]
अब तक आधुनिक हिंदी कविता अपने दुराग्रहों के कारण पाठकों से किसी भी प्रकार का संबंध बनाने में असफल रही है . दूसरे शब्दों में इसमें कवियों की भी असफलता निहित है . इस विषम स्थिति को तोड़ने का सफल प्रयास किया है रचना जी ने '' पहली दूब '' के माध्यम से . इसमी जीवन के विविध रंग दिखाई पड़ते हैं . नारी - व्यथा पर कवयित्री का यह कथन बहुत सार्थक है कि इस आधी आबादी के लिए अभी आज़ादी का दिन नहीं आया . उस पर ज़ुल्म के पहाड़ अनवरत तोड़े जा रहे हैं . प्रस्तुत हैं चंद पंक्तियाँ - 
'' क्या अब भी ये कहते हो 
आज़ादी का दिन आया ?
नहीं , तब तलक नहीं 
जब तलक है उस पर काला साया '' . [ पृष्ठ ४० ]  
निश्चय ही '' पहली दूब '' जीवन का स्पंदन है . इसे मैं पहला स्पंदन कह सकता हूँ , क्योंकि इसकी कई अनुभूतियाँ और संवेदनाएं प्रवाह एवं आघात से उत्पन्न नवीन मनः स्थितियों का परत - दर - परत अंकन करने में सक्षम हैं . देखिए कुछ और पंक्तियाँ -
'' रोज़गार दुश्वार हुआ अब 
धरी रह गयी शिक्षा 
या अपना व्यापार जमाओ 
या फिर मांगो भिक्षा '' . [ पृष्ठ २८ ] 
'' घर में हैं पैवंद लगे 
बाहर  करता दान .
ऐसी भी क्या तृष्णा है 
जो दर झूठा सम्मान '' . [ पृष्ठ ४८ ]
गगन स्वर बुक्स द्वारा प्रकाशित '' पहली दूब '' का आवरण बहुत सुंदर है . छपाई दोषमुक्त है , पर कहीं - कहीं प्रूफ की त्रुटियाँ खटकती हैं .

समीक्षा - डॉ. मुहम्मद अहमद 

Jan 30, 2014

आख़िर मैं सच कहूँ किसकी बात को


आख़िर मैं सच कहूँ किसकी बात को 
हर मदारी के अपने कारनामे हैं |
चराग जब तक जलता है जलने दो 
हरेक हस्ती के अपने पैमाने हैं |
ज़माना चाहकर साथ नहीं देता 
ज़मीं में उसके अपने तहखाने हैं |
कोई उड़ता है तो उसे मत रोको 
हरेक शख्स के अपने परवाने हैं |
जब देखता हूँ वह नज़र नहीं आता 
हरेक शख्स के अपने दीवाने हैं |
अफ़साना यूँ नहीं बन जाता मगर 
 नित ' मोहित ' के अपने फसाने हैं |
- अहमद ' मोहित '


जो जलते हैं वो जलते रहें


जो जलते हैं वो जलते रहें 
मैं दीपक हूँ जलता रहूँगा |
जो देख नहीं सकते देखा करें 
मैं दरिया हूँ बहता रहूँगा |
हर तरफ़ छाए द्वेष घनेरे 
मैं नूर हूँ जगमगाता रहूँगा 
वो बेबात है दिल चुभोती 
मैं समुन्दर हूँ समोता रहूँगा |
- डॉ . मुहम्मद अहमद  


दुनिया है , इक जीस्त है


दुनिया है , इक जीस्त है , इक ठिकाना है मेरे दोस्त ,
पल - पल का सीना है , जीना है , मरना है मेरे दोस्त |
- अहमद ' मोहित '

Real Approach of Supreme Court

जनभावनाओं का इज़हार 
समलैंगिकता पर सुप्रीमकोर्ट का क़दम एक बार फिर सराहनीय , प्रशंसनीय और स्वागतयोग्य है | उसका यह क़दम जनभावनाओं को सही शक्ल में पेश करता है | उसने दफा 377 की वैधता पर मुहर लगाने वाले और समलिंगी यौन संबंधों को जुर्म बताने वाले अपने फैसले को पलटने से इन्कार कर दिया। न्यायमूर्ति एचएल दत्तू और न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की खंडपीठ ने चैंबर में कार्यवाही के दौरान 11 दिसंबर, 2013 के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार, गैर सरकारी संगठन नाज फाउंडेशन और प्रख्यात फिल्म निदेशक श्याम बेनेगल सहित समलैंगिक अधिकारों के समर्थकों की पुनर्विचार याचिकाएं खारिज बड़ा साहसिक क़दम उठाया है | अदालत ने एक स्वर में कहा कि ‘हमने पुनर्विचार याचिकाओं और संबंधित दस्तावेजों का अवलोकन किया है। हमें अदालत के आदेश में हस्तक्षेप का कोई कारण नजर नहीं आता। इसलिए पुनर्विचार याचिकाएं खारिज की जाती हैं।’ इस अप्राकृतिक कृत्य के पैरोकारों के पास सिर्फ क्यूरेटिव (सुधारात्मक) याचिका दायर करने का विकल्प बचा है।
उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार के कर्ता - धर्ता सुप्रीमकोर्ट कोर्ट के समलैंगिकता विरोधी अप्रोच से बहुत परेशान हैं  | वे हरगिज़ नहीं चाहते कि समलैंगिकता की लानत पर किसी प्रकार का कुठाराघात लगे | सुप्रीमकोर्ट ने 11 दिसंबर, 2013 को दिल्ली हाई कोर्ट का दो जुलाई, 2009 का फैसला निरस्त करते हुए कहा था कि अप्राकृतिक यौन संबंध को दंडनीय अपराध बनाने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 377 असंवैधानिक नहीं है। 
अदालत ने कहा था कि अगर संसद चाहे तो संबंधित कानून में संशोधन कर सकती है। हाई कोर्ट ने धारा 377 के तहत  प्रावधानों को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था। बहरहाल धारा 377 के तहत प्रकृति के नियम के विपरीत किसी महिला, पुरुष, या जानवर के साथ मैथुन करना दंडनीय अपराध है और इसके लिए दस साल तक की सजा हो सकती है।11 दिसंबर 2013 को जब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करने वाला निर्णय दिया था, तो समलैंगिकों के संगठनों ने इस फैसले पर नाराजगी जताते हुए इसे दकियानूसी और मानवाधिकार विरोधी और अलोकतांत्रिक करार दिया था। केंद्र सरकार ने भी अदालती फैसले पर निराशा जताते हुए फिर से याचिका दायर करने का फैसला किया था। लेकिन अब वह सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फैसले के बाद वह संसद के रास्ते कानून बदलवाने पर गौर कर सकती है। राहुल गाँधी इस ओर संकेत दे चुके हैं |
दूसरी ओर देश के कई सामाजिक और धार्मिक संगठन सरकार के समलैगिकता समर्थक रवैये का बार - बार विरोध कर जनता में एक सकारात्मक चेतना पैदा करने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं | नई दिल्ली स्थित इंडिया इस्लामिक सेंटर में पिछले दिनों आयोजित एक संगोष्ठी में विभिन्न समुदाय के धार्मिक रहनुमाओं और मार्गदर्शकों ने एक स्वर से समलैंगिकता का खुलकर विरोध किया तथा इस कुप्रवृत्ति को मानवता के लिए सर्वथा हानिकारक बताया | 
शंकराचार्य ओंकारानन्द सरस्वती जी ने कहा कि यह ईश्वरीय व्यवस्था के विरुद्ध है | यह मानसिक विकार है | जो लोग इसका समर्थन करते हैं , वे मानवता को विनाश के अंधकूप में जबरन धकेल रहे हैं | जमाअत इस्लामी हिन्द के अध्यक्ष मौलाना जलालुद्दीन उमरी ने कहा कि यह बहुत घिनौना कृत्य है , जिससे सभी को हरहाल में बचना चाहिए | इस्लाम इसकी हरगिज़ इजाज़त नहीं देता | उन्होंने कहा कि इस सिलसिले में भी जनमानस को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए | वास्तव में काम - भावना के दो ही उद्देश्य होते हैं - पहला सकून - शान्ति और आनन्द एवं दूसरा सन्तति वृद्धि | इस अस्वाभाविक कृत्य से दोनों में से कोई भी हासिल नहीं होता | उन्होंने कहा कि इस कृत्य के समर्थन में केंद्र सरकार कोई विधेयक लाएगी , तो उसका विरोध किया जाएगा |
 प्रख्यात जैन संत लोकेश मुनि जी ने कहा कि यह पश्चिमी देशों का अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र है | पूंजीपति लोगों को इसमें लिप्त करके अपने कारोबार को बढ़ाना चाहते हैं | उन्होंने कहा कि यह कृत्य अमानवीय है , जिसे सहन नहीं किया जाएगा | रज़ामंदी को क़ानूनी दर्जा नहीं मिल सकता |इस बीच दारूल उलूम देवबंद के मोहतमिम मुफ्ती अबुल कासिम नौमानी ने अप्राकृतिक यौनाचार मामले पर केंद्र सरकार के रुख की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए कहा कि उसे समाज की मान्यताओं का खयाल रखना चाहिए। मुफ्ती अबुल कासिम ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के समलैंगिकता पर दायर पुनर्विचार याचिका को रद्द किए जाने का स्वागत करते हुए कहा कि दारूल उलूम का यह साफ मत है कि अप्राकृतिक यौनाचार को दंडनीय अपराध माना जाना चाहिए। भारतीय समाज समलैंगिकता को अपनी स्वीकृति नहीं दे सकता है।
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Jan 29, 2014

Inner Voice

अंतःकरण के स्वर 

बितरसम मन अज़ किरद गाहे जहाँ ,
कि दानद हमीं आशकारो निहाँ |
- फ़ारसी कवि फ़िरदौस तूसी 
अर्थात , हे ईश्वर , तू मेरे अंतःकरण के भेद को जानता है | तू मेरे मन के भीतर जो कुछ है , सब देख रहा है |
इस अहसास के साथ मनुष्य को अपने अंतःकरण के स्वर को सुनना चाहिए | गुरु नानक जी कहते हैं -
जै - जै सबदु अनाहदु बाजै ,
सुनि - सुनि अनद करें प्रभु गाजै |
अर्थात , धन्य है वह जो अनहद [ अर्थात , असीम शब्द या विचार अथवा असीम चेतना ] को सुन सकता है और जिसके नाद को सुनकर [ अर्थात , जिसके स्पर्श को या जिसको प्राप्त करके ] वह असीम सुख का भोग करता है |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Jan 28, 2014

Human Rights

ऐसे नहीं होगी मानवाधिकारों की रक्षा  

अभी कुछ ही दिन पहले ' आप ' नेता प्रशांत भूषण के कश्मीर संबंधित बयान को स्वार्थी तत्वों द्वारा तोड़ - मरोड़कर पेश किया जा रहा था , जबकि उनका बयान बहुत प्रासंगिक है . उन्होंने राज्य में सेना की मौजूदगी पर जनमत संग्रह की बात कही थी , क्योंकि उसके बढ़े हुए अधिकारों के कारण मानवाधिकारों हनन की घटनाएं घटती और मीडिया की सुर्खियाँ बनती हैं . अब पथरीबल हत्याकांड की जाँच बंद करने के सेना के फ़ैसले पर खुद सवाल उठने लगे हैं . लोग सेना के उन दावों की आलोचना कर रहे हैं , जिनमें कहा गया था कि सेना मानवाधिकारों के प्रति अत्यधिक चौकस है . भारतीय सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह ने हाल में सेना के रुख़ को दोहराया था कि मानवाधिकार उल्लंघन के सिलसिले में सेना जीरो टॉलरेंस नीति का पालन करेगी यानी उल्लंघन के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी , लेकिन पथरीबल के मामले को जिस तरह बंद किया गया है, उससे सेना के रुख़ पर कई सवाल उठे हैं. एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने मांग की है कि सरकार पथरीबल के आरोपियों के ख़िलाफ़ किसी तटस्थ अदालत में मुक़दमा चलाए. इन संगठनों का कहना है कि मामला बंद करके सीबीआई जांच को दबाया नहीं जा सकता. मानवाधिकार संगठन यह मांग कर रहे हैं कि कश्मीर और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम हटा लिया जाए जिसके तहत सेना को असीमित शक्तियां मिली हुई हैं . राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ताज़ा घटनाक्रम से खासे नाराज़ हैं . वे कांग्रेस से पहले से ही खफ़ा चल रहे हैं . दो सरपंचों की पिछले दिनों हुई हत्या से कांग्रेस नेता राहुल गाँधी भी अपनी नाराज़ी प्रकट कर चुके हैं . वैसे दोनों पार्टियों में आम चुनाव और इसी साल होनेवाले जम्मू - कश्मीर विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र उमर लगभग सात सौ प्रशासनिक इकाइयाँ बनाना चाहते हैं , जो कांग्रेस को नापसंद है . अब पथरीबल कांड की जाँच बंद होने से दोनों पार्टियों में दूरी और बढ़ गई है . पथरीबल में भारतीय सेना [ राष्ट्रीय राइफल्स ] के पांच अधिकारियों पर मार्च 2000 में पांच स्थानीय ग्रामीणों को विदेशी आतंकवादी बताकर उनकी हत्या करने का आरोप है . सेना ने दावा किया था कि मारे गए लोग सीमापार से आए आतंकवादी थे और छत्तीसिंहपुरा के हत्याकांड को उन्होंने ही अंजाम दिया था। लेकिन फौज के इस दावे पर शुरू से ही सवाल उठने लगे थे . फौज की बताई कहानी पुलिस के भी गले नहीं उतरी थी . मामला तूल पकड़ा गया . ज़बरदस्त सार्वजनिक दबाव के परिणामस्वरूप सरकार को पांचों मृत लोगों के शव कब्र से निकालने पड़े और उनकी पहचान के लिए उनके डीएनए के नमूने लिए गए. इसी बारे में जब स्थानीय निवासियों ने एक सप्ताह बाद इस घटना का विरोध करने के लिए उपायुक्त कार्यालय के सामने मार्च निकालने की कोशिश की तो पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाईं और नौ प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई. कई लोग गोली लगने से हमेशा के लिए विकलांग हो गए. 2003 में सीबीआई को सौंप दिया गया था . तीन साल बाद सीबीआई ने पूरे सबूतों और प्रमाणों के साथ सेना की राष्ट्रीय राइफल्स के पांच अधिकारियों के ख़िलाफ़ पांच निर्दोष लोगों की हत्या और अपहरण का मुक़दमा दर्ज किया .
अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया , लेकिन सेना शुरू से ही इसके ख़िलाफ़ रही . सेना ने अदालत में मामला आगे नहीं बढ़ने दिया . यह कह कर मामला नहीं चलने दिया कि उसे सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून के तहत अदालती प्रक्रिया से छूट हासिल है . अगर मुक़दमा चल भी सकता है तो केंद्र सरकार की अनुमति से ही यह संभव है . फिर सुप्रीमकोर्ट ने सेना को आरोपियों के खिलाफ ‘कोर्ट ऑफ़ इन्क्वायरी’ बिठाने को कहा था  जिसे भी मानने से सेना ने अमलन इन्कार कर दिया .उसने मामला बंद करने की घोषणा करते हुए कहा है कि आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई साक्ष्य नहीं है , लेकिन यह नहीं स्पष्ट किया कि सीबीआइ जांच से सामने आए तथ्य उसकी निगाह में सबूत क्यों नहीं हैं ? उल्लेखनीय है कि सेना इस मामले को रुकवाने के लिए सत्र न्यायालय और फिर हाईकोर्ट गई. वहां भी उसकी हार हुई , लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2012 में आवेदन को स्वीकार कर लिया और मामले को सेना के हवाले कर दिया गया . पिछले महीने सेना ने माछिल फर्जी मुठभेड़ मामले में एक कर्नल और एक मेजर सहित छह फौजियों के खिलाफ कोर्ट मार्शल का फैसला सुनाया था , जिसका  यह सकारात्मक संदेश कि सेना अब मानवाधिकार हनन के मामलों को गंभीरता से ले रही है , लेकिन पथरीबल मामले पर उसके रुख से सभी हतप्रभ हैं . कुछ मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि मामला बंद करके सीबीआई जांच को दबाया नहीं जा सकता. मानवाधिकार संगठन यह मांग कर रहे हैं कि कश्मीर और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम हटा लिया जाए जिसके तहत सेना को असीमित शक्तियां मिली हुई हैं. कुछ दिनों पूर्वोत्तर राज्यों के मुख्यमंत्रियों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्र सरकार से अपील की है कि वहाँ से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम हटाया जाए. उनका कहना था कि इन राज्यों में स्थिति सामान्य हो चुकी हैं और इस तरह के क़ानून से नागरिकों को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह भी इस क़ानून को हटाने की मांग कर चुके हैं. लेकिन सेना इस क़ानून को हटाने का विरोध कर रही है. जम्मू - कश्मीर समेत विभिन्न राज्यों में फर्ज़ी मुठभेड़ एक बड़ी समस्या हैं . मणिपुर में फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए लोगों के परिजनों के संघ ने ऐसे करीब डेढ़ हजार मामलों का ब्योरा जमा किया है . उनकी याचिका पर कुछ महीने पहले सर्वोच्च अदालत ने छह मामलों की जांच का जिम्मा न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े की अध्यक्षता में बनी समिति को सौंपा था . समिति ने सभी छह मामलों में आरोपों को सही पाया . पथरीबल  कांड भी फर्ज़ी मुठभेड़ की संगीन घटना है . इस फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारे गए पांच लोगों में से एक ज़हूर अहमद की मौत कैसे हुई इस बारे में उनके रिश्तेदार नज़ीर अहमद का बयान है कि ''उस दिन वह हमारे दुकान पर हमारे ही घर पर था, हमारा भांजा है. हमारी बहन का एक ही लड़का था ज़हूर अहमद. उसकी उम्र लगभग 20-21 साल थी. उसने गाड़ी गराज में खड़ी की . वहाँ से बाहर गए. बाहर टॉस्क फ़ोर्स वाले आए थे. मैरून कलर की कार में उसको उठा लिया. हम ढूंढते रहे उसको . एक-दो दिन उसके बाद हमें पता चला कि उसको ले जाकर एनकाउंटर किया गया . '' इस समस्या पर काबू पाने के लिए भारत सरकार को लोकतांत्रिक रवैया अपनाना चाहिए और उचित क़दम उठाना चाहिए . .
 - Dr. Muhammad Ahmad

Jan 27, 2014

जिंदगी काहे को है , खाब है दीवाने का

है तजल्ली तेरी सामाने वजूद 


जिंदगी काहे को है , खाब है दीवाने का
मनुष्य जब सृष्टि के आयामों - उपादानों एवं उसके सौन्दर्य को देखता है तो उसके मन में कभी यह विचार आता ही है कि यह सब क्या और क्यों है ? मिर्ज़ा ग़ालिब सहज ही कह उठते हैं -
ये परी चेहरा लोग कैसे हैं ?
गमज़ा व इशवा व अदा क्या है ?
शिकने ज़ुल्फे अंबरी क्या है ?
निगहे चश्मे सुरमा- सा क्यों है ?
सब्ज़ा व गुल कहाँ से आये हैं ?
अब्र क्या चीज़ है , हवा क्या है ?
कुछ लोग जीवन के नाना रूपों को देखते हैं , किन्तु उन्हें यथार्थ - बोध नहीं होता . ग़ालिब के शब्दों में -
इक मुअम्मा है समझने का , न समझाने का
जिंदगी काहे को है , खाब है दीवाने का |
कुछ लोग इसे सच्चाइयों का बोलता हुआ साज़ बताने लगने हैं -
महरम नहीं है तू ही नवा -हाए-राज़ का
यां वरना जो हिजाब है पर्दा है साज़ का |
लेकिन कुछ की नज़रें इनके पीछे वास्तविक प्रिय के जलवों की अनुभूति कर लेतीं हैं -
है तजल्ली तेरी सामाने वजूद
ज़र्रा -बे परतवे खुर्शीद नहीं |

- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Jan 26, 2014

मुहम्मद साहब का आखिरी संदेश

मुहम्मद साहब का आखिरी संदेश
- सृजन शिल्पी 

आप सभी को ईद मुबारक! ईद के पावन अवसर पर आज मैं हज़रत मुहम्मद द्वारा हिजरत के दसवें साल में अपने अंतिम हज के अवसर पर मक्का में दिए गए आखिरी संदेश के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ। मुहम्मद साहब के इस ऐतिहासिक अभिभाषण में सारी मानवता के कल्याण की शिक्षाएँ निहित हैं। यह इस्लामी आचार-विचार का घोषणा पत्र है।हज़रत मुहम्मद साहब ने कहा:
प्यारे भाइयो! मैं जो कुछ कहूँ, ध्यान से सुनो, क्योंकि हो सकता है इस साल के बाद मैं तुमसे यहाँ न मिल सकूँ।
ऐ इंसानो! तुम्हारा प्रभु भी एक है और तुम्हारा पिता भी एक है।
अल्लाह की किताब और उसके रसूल की सुन्नत को मजबूती से पकड़े रहना। लोगों की जान-माल और इज़्ज़त का ख़याल रखना।…..कोई अमानत रखे तो उसमें ख़यानत न करना, ख़ून-ख़राबे और ब्याज के क़रीब न फटकना।
किसी अरबी को किसी अजमी (ग़ैर अरबी) पर कोई प्राथमिकता नहीं, न किसी अजमी को किसी अरबी पर, न गोरे को काले पर, न काले को गोरे पर, प्रमुखता अगर किसी को है तो सिर्फ तक़वा व परहेज़गारी से है अर्थात् रंग, जाति, नस्ल, देश, क्षेत्र किसी की श्रेष्ठता का आधार नहीं है। बड़ाई का आधार अगर कोई है तो ईमान और चरित्र है।
हाँ, तुम्हारे ग़ुलाम, तुम्हारे ग़ुलाम, जो कुछ ख़ुद खाओ, वही उनको खिलाओ और जो ख़ुद पहनो, वही उनको पहनाओ।
अज्ञानता के तमाम विधान और नियम मेरे पाँव के नीचे हैं, अर्थात् उनको ख़त्म किया जा रहा है।
इस्लाम आने से पहले के तमाम ख़ून खत्म कर दिए गए। (अब किसी को किसी से पुराने ख़ून का बदला लेने का हक़ नहीं) और सबसे पहले मैं अपने ख़ानदान का ख़ून–रबीआ इब्न हारिस का ख़ून– ख़त्म करता हूँ।
अज्ञानकाल के सभी ब्याज ख़त्म किए जाते हैं और सबसे पहले मैं अपने ख़ानदान में से अब्बास इब्न मुत्तलिब का ब्याज ख़त्म करता हूँ।
औरतों के मामले में अल्लाह से डरो। तुम्हारा औरतों पर और औरतों का तुम पर अधिकार है।
औरतों के मामले में मैं तुम्हें वसीयत करता हूँ कि उनके साथ भलाई का रवैया अपनाओ।
लोगो! याद रखो, मेरे बाद कोई नबी नहीं और तुम्हारे बाद कोई उम्मत (समुदाय) नहीं। अत: अपने रब की इबादत करना, प्रतिदिन पाँचों वक़्त की नमाज़ पढ़ना। रमज़ान के रोज़े रखना, खुशी-खुशी अपने माल की ज़कात देना, अपने पालनहार के घर का हज करना और अपने हाकिमों का आज्ञापालन करना। ऐसा करोगे तो अपने रब की जन्नत में दाख़िल होगे।
ऐ लोगो! क्या मैंने अल्लाह का पैग़ाम तुम तक पहुँचा दिया!
(लोगों की भारी भीड़ एक साथ बोल उठी–)
हाँ, ऐ अल्लाह के रसूल!
(तब मुहम्मद साहब ने तीन बार कहा–)
ऐ अल्लाह, तू गवाह रह।
(उसके बाद क़ुरआन की यह आखिरी आयत उतरी–)
आज मैंने तुम्हारे लिए दीन (धर्म) को पूरा कर दिया और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म की हैसियत से पसन्द किया।
(साभार: हज़रत मुहम्मद सबके लिए, लेखक- डॉ. मुहम्मद अहमद, प्रकाशक- मधुर संदेश संगम, नई दिल्ली)
(साभार: हज़रत मुहम्मद सबके लिए, लेखक- डॉ. मुहम्मद अहमद, प्रकाशक- मधुर संदेश संगम, नई दिल्ली)
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हार्दिक शुभकामनाएं

हार्दिक शुभकामनाएं


गणतन्त्र दिवस के सुअवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं -
आज फिर स्व . रामचन्द्र राव होशिंग की दो कविताएं याद आ रही हैं , जिनमें से एक का शीर्षक है -
'' गणतन्त्र दिवस की पूर्व संध्या ''
गणतन्त्र दिवस की पूर्व संध्या 
विशाल परेड -
पूर्वाभ्यास - और डूबता सूरज ,
एक गरजता संदेश पंचरंगी 
हवा में तैरता -
राष्ट्र के नाम 
आवेष्ठित ' जन गण मन ' से ,
जनहित में 
पूर्ण विश्वास का झूठा दावा ,
ज्ञात - अज्ञात -
सैनिक - शहीदों को 
मौखिक श्रद्धांजलि 
करोड़ों मरी जनता के 
अदम्य कर्तव्यों में विश्वास ?
नए कर्तव्यों की याद में 
हमलों का पुराना रोना 
और लोकतंत्र की आस्था में 
पुनः खो जाना 
हर साल की कहानी है | 
श्री होशिंग जी की दूसरी कविता से बात पूरी होती है , जिसका शीर्षक है -
'' गणतन्त्र दिवस की सुबह ''
इतिहास की प्राचीर पर 
खड़े होकर 
बापू के नाम पर दो आंसू 
रामराज्य के क़ब्र में दो मुट्ठी माटी 
गुलाब की बिखरती पंखुड़ियों से 
परकटे कबूतरों का 
उड़ने के प्रयास में गिरना 
जयहिंद के नारों में ओझल हो जाता है |
वफ़ादारी की 
हर साल नई क़सम 
रस्मों की अदायगी में दफ़न 
चमकती परेड 
शास्त्रायुधों की घरघराहट 
झांकियों की चकाचौंध 
तोपों की सलामी में समा जाती है |
बच्चियों की परेड 
अंगरक्षकों की दमक 
बैंडों की ऊंची ध्वनियों में 
गरीब देश का 
प्रजातंत्र खो जाता है | 

Jan 25, 2014

पत्रकारी ' गंदगी ' दूर करने का सही समय कब आएगा ?

पत्रकारी ' गंदगी ' दूर करने का सही समय कब आएगा ?

रिश्वतखोरी के गंभीर मामले में' ज़ी न्यूज़ ' के दो नामचीन संपादकों - सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया की गिरफ़्तारी [ दिसम्बर 2012 ] ने भारतीय प्रेस में आए किरदार के संकट को एक बार फिर बेनक़ाब कर दिया था . इसी के मद्देनज़र प्रेस काउन्सिल के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने अपनी त्वरित टिप्पणी में भारतीय पत्रकारिता ने गिरते स्तर पर चिंता प्रकट करते हुए कहा था कि हमारे यह इस क्षेत्र में बड़ी गंदगी है , जिसकी सफ़ाई होनी चाहिए . उनका ठीक ही कहना है कि वो प्रेस की आज़ादी के पक्ष में ज़रूर हैं , लेकिन प्रेस की अपनी कुछ जिम्मेदारियां भी होनी चाहिए . जस्टिस काटजू का यह भी खयाल है कि "उन्हें [ पत्रकारों को ] पूरी आज़ादी नहीं देनी चाहिए. हमने प्रेस की आज़ादी के लिए खुद आवाज़ उठायी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं." ज़ी न्यूज़ के सम्पादक सुधीर चौधरी और ज़ी बिजनेस के सम्पादक समीर आहलूवालिया पर आरोप लगे कि उन्होंने कांग्रेस सांसद और उद्योगपति नवीन जिंदल के ग्रुप से इस आधार पर 100 करोड़ रुपए मांगे थे कि वे नवीन ज़िंदल की कम्पनी और कोयला घोटाले को जोड़ कर कोई रिपोर्ट नहीं करेंगे.
जस्टिस काटजू की बात ऐसी है , जिस पर भारतीय मीडिया को चितन - मनन ही नहीं , बल्कि अमली तौर पर इसे पाक - साफ़ रखने की ठोस पहल एवं कोशिश करनी चाहिए थी , जो अब तक नहीं हो सकी . काफ़ी लम्बे समय से भारतीय मीडिया की गैर ज़िम्मेदाराना हरकतें सामने आ रही हैं , जो लोकतंत्र और उसकी चतुर्थ सत्ता प्रेमियों को चिंता में डालती रही है . एडमंड बर्क ने इसे चतुर्थ सत्ता तो क़रार दिया ही था , साथ ही इसकी ज़िम्मेदारियाँ भी गिनाईं थीं , लेकिन अफ़सोस पत्रकारिता से जुड़े लोगों को ' चतुर्थ सत्ता ' ही याद रही . वे अपनी ज़िम्मेदारियाँ भूले ही नहीं , निरंकुश हो गये , जिसके लिए लोकतंत्र में कोई जगह नहीं होती .
= डॉ . मुहम्मद अहमद
 

Jan 23, 2014

कांग्रेस को डुबाने का एक और नुस्खा !

कांग्रेस को डुबाने का एक और नुस्खा !

रोज़मर्रा इस्तेमाल की चीज़ों के बढ़ते दाम , बढ़ती पेट्रोल , डीज़ल और रसोई गैस की कीमतें , सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति के वावजूद गैस सब्सीडी हेतु ' आधार ' की अनिवार्यता , विभिन्न मदों के साथ अंधाधुंध करारोपण आदि के बाद अब नई बाध्यता ! भारतीय रिजर्व बैंक ने 2005 से पहले जारी सभी करंसी नोट वापस लेने का फैसला किया है। इसके तहत दस रुपये से लेकर 500 और 1000 रुपए सहित सभी मूल्य के नोट वापस लिए जाएंगे। यह काम एक अप्रैल से शुरू  हो जाएगा। रिजर्व बैंक ने 22 जनवरी 2014 को  जारी एक बयान में कहा कि रिजर्व बैंक 31 मार्च के बाद 2005 से पहले के सभी बैंक नोट वापस ले लेगा।
एक अप्रैल से लोगों को इस तरह के नोट बदलने के लिए बैंकों से संपर्क करना होगा। केंद्रीय बैंक ने यह कदम कालेधन और जाली नोटों की समस्या पर काबू पाने के लिए उठाया है। लोग आसानी से 2005 से पहले जारी करंसी नोट की पहचान कर सकते हैं। ऐसे नोट के पिछले हिस्से में प्रकाशन का साल नहीं छपा है। 2005 के बाद जारी सभी करंसी नोट के पिछले भाग के नीचे मध्य में प्रकाशन का साल छपा है। बताया गया कि यह  क़दम कालेधन और जाली नोटों की समस्या पर काबू पाने के लिए उठाया गया है |
वैसे तो रिजर्व बैंक ने इस मामले में  लोगों से किसी तरह की हड़बड़ी नहीं करने और वापसी प्रक्रिया में सहयोग करने की अपील की है , लेकिन है यह आमजन की परेशानी बढ़ानेवाला जनविरोधी क़दम ! इससे सरकार की विभिन्न शोषणकारी नीतियों की मारी और सताई जनता एक बार फिर अनावश्यक क़ानूनी प्रक्रिया के चंगुल में फंस गई है | अभी तक वह बार - बार बढ़ती महंगाई और आधार कार्ड बनवाने की अनिवार्यता  के क़ानूनी पचड़े में उलझी हुई है |
अब वह पुराने नोटों को बदलवाने बैंक जाएगी , अन्यथा उसके नोट नहीं चल पाएंगे | देश की साक्षर और निरक्षर जनता अब नोट लेने से पहले यह तो देखेगी ही नोट कटा - फटा और नक़ली तो नहीं है , यह भी देखेगी कि 2005 के पहले का छपा हुआ तो नहीं है | अब सवाल यह है कि निरक्षर जनता जो रंग - रूप से अब तक नोटों को पहचानती रही है , नोट की वैधता कैसे समझ पाएगी ? पढ़े - लिखे लोगों के लिए भी मुसीबतें बढ़ेंगी और लिए भी अनावश्यक तनाव बढ़ेगा | ऐसे में यू पी ए सरकार का यह क़दम कांग्रेस के लिए एक और वाटरलू साबित होगा |
क्या कांग्रेस इसके नतीजे से अवगत नहीं है ? अगर है , तो यह क़दम क्यों ? क्या कांग्रेस के कुछ लोग ही कांग्रेस का भला नहीं चाहते और राहुल के अभ्युदय से उनकी कुर्सी का स्वरुप बिगड़ने वाला है ? कुछ असंभव नहीं ! रिज़र्व बैंक के इस क़दम की टाइमिंग कुछ ऐसी ही कहानी बयान कर रही है |  सच है , देश में कालेधन और नक़ली नोटों की समस्या है , जो एक लंबे समय से बनी हुई है | इसके उपाय का यही एक टाइमिंग क्यों ? सत्ता के गलियारों में यह बात भी कही जा रही है कि यह क़दम भाजपा के मोदी - रामदेव मिशन का तोड़ है | काबिले गौर है कि रामदेव अपने अर्थशास्त्र के साथ मोदी के साथ खड़े हैं , जिसका जवाब कांग्रेस की ओर से दिया गया है , लेकिन यह बात आसानी से समझ में आनेवाली नहीं है |
दरअसल बात यह है कि देश में पिछले कई सालों से पूंजीवाद - प्रोत्साहक सरकार है | हर काम पूंजीवादियों को ख़ुश करनेवाला हो , इसकी ओर ही ख़ास ध्यान है | दूसरे शब्दों में आम जनता को इस क़दम से आम जनता को इसके लिए मजबूर किया जा रहा है कि वह माल्स से ही ए टी एम , क्रेडिटकार्ड से ही सामान खरीदे , जिसे पूंजीपति चलाते हैं | 2016 तक सभी नागरिकों के बैंक एकाउंट खोलवाने का लक्ष्य भी इसी के पेशेनज़र है | अतः कांग्रेस को अगर मौक़ा मिला तो इसी रास्ते पर देश को ले जाएगी और पूंजीपतियों को ही बचाएगी | इस बात को एक मिसाल से ज़रा डिटेल में समझते हैं |
भारत सरकार ने 21 मई 2012 को काले धन पर श्वेतपत्र जारी किया था , जिससे यह लगा था  कि यूपीए सरकार काले धन की समस्या से निबटने के प्रति गंभीर है | तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा पेश इस दस्तावेज़ में भ्रष्टाचार के मामलों की तेज़ी से जाँच और दोषियों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई के लिए जल्द से जल्द लोकपाल और लोकायुक्त जैसी संस्थाओं का गठन किए जाने की बात कही गयी थी | तत्कालीन वित्तमंत्री ने आयकर विभाग में अभियोजन पक्ष को मज़बूत बनाने और प्रत्यक्ष कर क़ानूनों व नियमों को युक्तिसंगत बनाने की ओर इशारा करते हुए त्वरित अदालतों के गठन एवं अपराधियों को कड़ी सज़ा के प्रावधानों का समर्थन किया था , लेकिन हुआ कुछ नहीं ! कालाधन रखनेवाले सभी पूंजीपति और राजनेता सदा बचते रहे ! सवाल यह भी है कि किस पूंजीपति के पास कालाधन नहीं है ?
 कुल 97 पेज के इस श्वेत पत्र में किसी आर्थिक अपराधी का नाम नहीं लिया गया था और न ही इस बारे में कोई जानकारी दी गयी थी कि दरअसल कितना काला धन विदेशों में है | सरकार ने इस सिलसिले में अन्य एजेंसियों के आकलन शामिल किए थे | हम देखते हैं कि सरकार ने श्वेतपत्र आने के एक साल से अधिक समय गुज़र जाने के बाद आर्थिक अपराधों पर लगाम लगाने के लिए कम से कम उन उपायों पर ध्यान नहीं दिया गया , जिनको अपनाने की बात श्वेतपत्र में कही गयी थी |
 अब जब लोकसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं , यूपीए सरकार कुछ हरकत में ज़रूर दिखने लगी है | यह बात अलग है कि इस सरकार की ऐसी हरकतें अक्सर दिखावा साबित हुई हैं | भारत सरकार ने कर चोरों की पनाहगाह माने जाने वाले करीब आधा दर्जन देशों से विदेशों में गोपनीय खाते रखने वाले 500 लोगों और इकाइयों की बैंकिंग और अन्य वित्तीय गतिविधियों की जानकारी प्राप्त करने के लिए संपर्क किया है। अमेरिका के एक कार्यकर्ता समूह इंटरनेशनल कंसोर्टियम आफ इन्वेस्टिगिव जर्नलिस्ट(आईसीआईजे)   ने  हाल में ही वैश्विक स्तर  पर गोपनीय खातों का खुलासा किया। भारतीयों द्वारा विदेशी बैंको में चोरी से जमा किया गया धन का निश्चित ज्ञान तो नहीं है किन्तु वरिष्ठ अर्थशास्त्री आर . वैद्यनाथन ने अनुमान लगाया है कि इसकी मात्रा लगभग 7,280,000 करोड रूपये है।
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय मंदी से जूझ रही है और ऐसी आशंका है कि चालू वित्तीय वर्ष के सकल घरेलू उत्पाद में 5.13 लाख करोड़ रुपए का घाटा हो सकता है| अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए फिक्की द्वारा बनाई गई एक 12-बिंदु की योजना में संगठन का कहना है कि उसके आकलन के मुताबिक 45 लाख करोड़ रुपए का काला धन विदेशी बैंकों में जमा है, जो कि भारत के सकल घरेलु उत्पाद का करीब 50 प्रतिशत का हिस्सा है और भारत के वित्तीय घाटे का लगभग नौ गुना है. संगठन का कहना है कि अगर इस काले धन का 10 प्रतिशत हिस्सा भी भारत में आ जाए, तो उससे भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी फायदा हो सकता है.
 इस खुलासे में 505 भारत से संबंधित इकाइयों के नाम व पते शामिल हैं। इनमें उद्योगपति और कंपनियां शामिल हैं। आईसीआईजे के इस खुलासे में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, पुणो, अहमदाबाद, बड़ौदा, सूरत, चंडीगढ़ और कई अन्य भारतीय शहरों की इकाइयों के नाम व पते हैं। सूत्रों ने बताया कि वित्त मंत्रालय के अंतर्गत विदेशी कर और कर अनुसंधान (एफटीएंडटीआर) विभाग ने ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड, केमैन आइलैंड तथा सिंगापुर से कर आदान प्रदान संधि के तहत संपर्क किया है। इसके अलावा एफटीएंडटीआर ने राजनयिक माध्यम  से क्रूक्स  आइलैंड्स और समोआ से भी संपर्क किया है।
 कुछ अन्य देशों से भी उनके यहां भारतीयों के गोपनीय खातों के बारे में जानकारी लेने के लिए संपर्क किया गया है। वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जो शुरुआती जानकारी मिली है उससे तस्वीर अधिक साफ नहीं होती और ऐसे में आधिकारिक प्रोटोकाल व्यवस्था तथा मौजूदा संधियों के तहत और ब्योरा मांगा जा रहा है |
आईसीआईजे का दावा है कि पिछले तीन दशक में इकाइयों द्वारा करीब एक लाख गोपनीय कंपनियों, ट्रस्टों और कोषों का गठन किया गया। अमेरिका के एक एनजीओ ने किया है इन नामों का खुलासा इनमें 505 नाम भारतीय व्यक्तियों या संस्थाओं के हैं खुलासे में 170 देशों के 2.5 लाख लोगों के नाम हैं शामिल हैं |
 इसका वैश्विक खुलासा आईसीआईजे ने इस साल अप्रैल में किया था, लेकिन नाम और पतों को गत  15 जून  को  सार्वजनिक किया गया। हालांकि, इसके साथ ही आईसीआईजे ने यह भी कहा है कि हो सकता है कि इन विदेशी कंपनियों और ट्रस्टों का कानूनी तरीके से इस्तेमाल किया गया हो। इस सूची का मतलब यह कतई नहीं है कि इन इकाइयों ने कानून तोड़ा है। बताया जाता है कि संबंधित देशों से आवश्यक जानकारी हासिल करने के बाद भारतीय अधिकारी आगे की कार्रवाई करेंगे। कुछ देशों से यह जानकारी दोहरा कराधान बचाव संधि और कर सूचना आदान प्रदान करार के तहत मांगी गई है। कुछ अन्य देशों से ओईसीडी के आपसी कर सहायक प्रोटोकॉल के तहत मांगी गई है।
 पेरिस स्थित आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) ताकतवर देशों के साथ भागीदार कर काले धन तथा कर अपराधों के खिलाफ अभियान चला रहा है। आईसीआईजे के अप्रैल में शुरुआती खुलासे के बाद वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा था कि इस वैश्विक रिपोर्ट में जिन लोगों के नाम है उनके खिलाफ जांच की जा रही है। इस खुलासे में भारत सहित 170 देशों के 2.5 लाख लोगों और इकाइयों का नाम शामिल है। इन इकाइयों ने कर पनाहगाह देशों में कंपनियों का गठन कर कर चोरी की है। आर्थिक अपराध बहुत ही संगीन होते हैं , लेकिन शायद ये सरकार की प्राथमिकता सूची में शामिल नहीं हैं |
हम अक्सर सुनते हैं कि सरकार आर्थिक अपराधियों पर नकेल कसेगी और विदेशों से काला धन वापस लाएगी , लेकिन इसे अमली रूप अभी तक नहीं दिया जा सका है | जैसा कि ऊपर कहा गया है कि यदि काला धन वापस ले आया जाए , तो भारतीय अर्थव्यवस्था की बदहाली के दलदल से आसानी से निकाला जा सकता है | सरकार को चाहिए कि थैलीशाहों की थैली की परवाह न करके उनकी काली पूंजी को भारत लाए | लोकपाल विधेयक पारित होने के बाद क्या यह आशा की जाए कि काले धन की वापसी की दिशा में कुछ कार्रवाई हो पाएगी ?
 - डॉ . मुहम्मद अहमद 

Jan 22, 2014

चौतरफ़ा भ्रष्टाचार में घिरा आम आदमी

चौतरफ़ा भ्रष्टाचार में घिरा आम आदमी 

आज का आम आदमी दिनानुदिन भ्रष्टाचार के चंगुल में फंसता चला जा रहा है | पूरे देश में यही हालत है | कुछ दशकों पहले सरकारी महकमे के लोग बिना रिश्वत के बहुत - सा काम करते थे | उनमें कर्तव्यपरायणता का कुछ बोध पाया जाता था , लेकिन देखा गया और देखा जा रहा है कि देश की आज़ादी की उम्र जैसे - जैसे बढ़ी , कर्तव्य भाव गायब होता गया और हर छोटे से छोटे काम के लिए रिश्वतखोरी का चलन बढ़ता गया | यह कुप्रवृत्ति आज भी फलती - फूलती जा रही है |
  समूचा शासनतंत्र इसमें लिप्त है , न्यूनाधिक का सवाल अलग है | पूर्व केन्द्रीय गृह सचिव आर . के . सिंह ने गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे पर  आई पी एल घोटाले की जाँच को प्रभावित करने साथ ही अन्य आरोपों में यह आरोप भी लगाया है कि दिल्ली पुलिस में नियुक्ति और ट्रांसफर में वे दखल देते हैं और संभवतः रुपयों का लेन  - देन भी होता है | यह कोई नई बात भी नहीं ! 
आख़िर यह भी तो हमारे देश का ही विभाग है , वह भी अनिवार्य सेवा का ....  जब हर में रिश्वतखोरी चलती है , तो यह विभाग अछूता कैसे रह सकता है ? ! सभी जानते हैं कि हमारे प्रिय देश में कोई भी नियुक्ति बिना रिश्वत दिए / ऊपरी पहुंच बनाए संभव नहीं ! कभी इनके अभाव में कुछ हो जाए , तो उसे चमत्कार ही समझना चाहिए | अक्सर यह भी सुनने में आता है कि किसी प्रकार से रिश्वत की रक़म का जुगाड़ लगा लेंगे , फिर नौकरी पाते ही कई गुना वसूल कर लेंगे | 
ऐसा होता भी है | नौकरी पाते ही रिश्वतखोरी का खुला खेल शुरू हो जाता है , जिसमें ऊपर से नीचे तक के सभी अधिकारी - कर्मचारी शामिल होते हैं | इस ' आयोजन ' से कोई अछूता नहीं , विभाग कोई भी हो , फ़र्क नहीं पड़ता ! आज का माहौल इतना जटिल और विचित्र बन गया कि ईमानदारों के लिए पूरे सिस्टम में कोई जगह नहीं है | ईमानदारों को हाशिए पर डाल दिया जाता है | न उनकी प्रोन्नति और न ही किसी प्रकार की हौसलाअफजाई ! भ्रष्टाचार के आगे नियम - क़ानून सब बेबस और लाचार हैं | 
संविधान और क़ानून की दुहाई देनेवालों का ध्यान इस ओर क्यों नहीं जाता ? इसका ठीक - ठीक जवाब वे लोग ही दे सकते हैं | इस विषम एवं चिंताजनक माहौल में आम आदमी पार्टी का अभ्युदय आम आदमी के लिए आशा की किरण है , क्योंकि इस पार्टी ने देश चल रही भष्टाचार की ' पुरातन परंपरा ' से अलग हटकर आमजन को मुक्त करने का अमली बीड़ा उठाया है , जिसके कारण  ' आप ' इन ' पुरातनपंथियों ' के निशाने पर है और आनेवाले वर्षों में भी रहेगी , ऐसा सहज ही अनुमान किया जा सकता है | वास्तव में भ्रष्टाचार की ' पुरातन परंपरा ' को बनाए रखने की ज़िद और हठधर्मिता  भी भ्रष्टाचार है |
 इसी भ्रष्टाचार और जनविरोधी नीतियों और कार्यों के चलते दिल्ली के आम आदमी ने कांग्रेस के कुशासन को साफ़ किया और कांग्रेस के ही समर्थन से ' आप '  की सरकार बन गई ! ' आप ' को ' पाप ' समझनेवालों की अब कोशिश यह है कि भ्रष्टाचार की पुरातन परंपराओं पर झाड़ू न लगने पाए ! दूसरी ओर ' आप ' है कि झाड़ू - बुहारू में ही यक़ीन रखती है | दिल्ली में सत्ता संभालते ही उसने भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी मशीनरी को साफ़ करना शुरू किया | स्टिंग आपरेशन में घूस लेते दिखाए जाने के बाद चीफ़ वाटर एनालिस्ट विनोद कुमार समेत तीन मुलाज़िमों को निलंबित करने के साथ ही विगत सात जनवरी को आठ सौ कर्मचारियों का तबादला कर दिया गया | 
संसद मार्ग स्थित कोआपरेटिव ग्रुप हाउसिंग में तैनात असिस्टेंट रजिस्ट्रार को भी घूस लेते पकड़ा गया | दिल्ली सरकार ने भ्रष्टाचार उन्मूलन हेतु एक खास हेल्पलाइन नंबर [ 1031 ] भी दिया है , जिस पर भ्रष्टाचार - रिश्वतखोरी की शिकायत की जा सकती है | इस हेल्पलाइन नंबर पर आपकी समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि अफसरों की एक टीम यह बताएगी कि स्टिंग कैसे कीजिए ताकि आरोपी को पकड़ा जा सके। सरकार की सतर्कता टीम सबूत मिलने के बाद मामले को आगे बढ़ाएगी। इस नम्बर पर पुलिस द्वारा की जा रही रिश्वतखोरी की शिकायत मिलने पर 11 जनवरी को दो सिपाहियों को विजलेंस डिपार्टमेंट  रंगेहाथ पकड़ा | 
यह बात शायद गनीमत थी , लेकिन 16 जनवरी को एक सब इंस्पेक्टर [ जोसेफ़ जॉन ] को रिवाल्वर लाइसेंस जारी करने के एवज़ में नौ हज़ार रुपये रिश्वत लेते पकड़ाया , तो पुलिसवालों का पारा चढ़ गया | वे ' आप ' सरकार के मंत्रियों से ' नाखुश ' हो गए | फिर क्या था , दिल्ली के क़ानून मंत्री सोमनाथ भारती ने खिड़की एक्सटेंशन में चल रहे सेक्स रैकेट और नशीले पदार्थों के धंधे के कारोबार के ख़िलाफ़ जब अपनी आवाज़ बुलंद की , तो पुलिस ने सर्च वारेंट का बहाना बनाकर सहयोग करने से इन्कार कर दिया और मंत्री के साथ अशिष्टता की | 
वैसे इस मामले में मंत्री महोदय पर भी आरोप हैं , जिनकी जांच कर समुचित कार्रवाई की जनि चाहिए |  इसी प्रकार दिल्ली की महिला और बाल विकास मंत्री राखी बिड़ला ने सागरपुर में एक विवाहिता की जलाकर की गई हत्या में हत्यारों के ख़िलाफ़ पुलिस कार्रवाई की बात कही , तो संबंधित थाना प्रभारी ने अशिष्टता का ही परिचय देते हुए कहा कि हिम्मत है तो मेरा ट्रांसफर करा दो [ लेकिन कोई कार्रवाई नहीं करनी ! ] | 
इस उद्दंडता पर ही मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने धरना दिया , जो 32 घंटे में समाप्त हो गया | दो पुलिसवालों को छुट्टी पर भेजा गया |  केजरीवाल का यह बयान सराहनीय है , जिसमें उन्होंने कहा था कि वे दिल्ली पुलिस को जवाबदेह बनाने के अपना प्रयास जारी रखेंगे। उन्होंने दावा किया कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लक्ष्य की ओर यह पहला कदम है। केजरीवाल ने पुलिस अधिकारियों पर ड्यूटी में लापरवाही का आरोप लगाते हुए पांच अधिकारियों के निलंबन की मांग की थी। स्पष्ट है कि दिल्ली की नई सरकार की कार्यशैली आमजन वाली ही है , पूर्व की भांति राजसी , वैभववाली नहीं | 
कोई ऐसा मुख्यमंत्री नहीं हुआ होगा , जो पुलिस अत्याचार के ख़िलाफ़ आन्दोलन करे और रात  फुटपाथ पर गुज़ारे | अब ज़रा एक नज़र डालें पुरातनपंथियों , यथास्थितिवादियों और 'आप ' के राजनीतिक विरोधियों पर , जिन्हें केजरीवाल अराजकतावादी नज़र आ रहे थे -- कहा गया कि कोई मुख्यमंत्री आन्दोलनकारी नहीं हो सकता , लेकिन इस हकीक़त को भुलाया जाता रहा कि निर्वाचित सरकार से पुलिस क्या बड़ी हो गई ? 
केजरीवाल ने ख़ुद कहा कि गृहमंत्री के घर के शीशे टूटने पर 12 पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया जाता है , लेकिन मंत्रियों की उचित बात नहीं मानी जाती | यह कहा गया कि पुलिस बिना वारेंट छापा नहीं डाल सकती | इसलिए मंत्री की बात नहीं मानी गई | बड़ा सवाल यह है कि जब बहुत - से  लोग महिला को घेरे हुए हों , तो उसे बचाने के लिए हीलहुज्जत क्यों ? क्या पुलिस अपने नैतिक - अनैतिक कामों के लिए अदालती आदेश लेती है ? कतई नहीं | दिल्ली पुलिस का स्पेशल सेल कुख्यात है | 
मुसलमानों के सिलसिले में बटला हॉउस इन्काऊँटर से लेकर छोटी से छोटी कार्रवाई में अदालती आदेश का लिहाज़ नहीं किया जाता | केजरीवाल की यह बात भी सच है कि राजधानी में देह - व्यापार और नशे के धंधे के कारोबार पुलिस की मिलीभगत से चल रहे हैं | इसलिए भी पुलिस सुधार की बात होनी चाहिए , जिसके लिए अदालतों के आदेश हैं , लेकिन सबसे बड़ा सवाल भष्टाचार मिटाने का है | इसे लेकर आम आदमी बहुत चिंतित है | अतः ' आप ' के कुछ क़दम उसे बहुत भा रहे हैं | स्टिंग कराने का फैसला भी लोग पसंद कर रहे हैं | माना जा रहा है कि इससे भ्रष्टाचार खत्म हो न हो, लगाम जरूर लगेगी , लेकिन यहाँ कुछ बातों की और ज़रूरत है | 
पहली यह कि लोग किसी भी सूरत में रिश्वत न दें | दूसरी ,  कोई भी स्टिंग फर्जी और दुर्भावना से प्रेरित नहीं हो | तीसरी , जो व्यक्ति स्टिंग करने या कराने में सक्षम न हो , उसके लिए भी सरकार कोई मुनासिब व्यवस्था करे | और चौथी बात क़ानूनी पहलू कि ये स्टिंग अदालत में कितने खरे उतरेंगे ? इन स्टिंग के फुटेज से छेड़छाड़ या फर्जीवाड़े के आरोपों से कैसे निपटा जाएगा ? यही नहीं, इन स्टिंग ऑपरेशनों की जांच कौन करेगा ? क्या सरकार के पास ऐसा तंत्र है ? 
इसकी अनुपस्थिति शायद ईमानदारों को भी ईमानदारी से काम करने से रोके। वास्तव में रिश्वत लेना और देना दोनों अपराध है | दोनों  स्थितियों से हर हाल में बचा जाना चाहिए |यह धुएं की तरह नहीं बल्कि झरने की तरह होता है अर्थात , नीचे से ऊपर को नहीं बल्कि ऊपर से नीचे आता है। ऐसे में ऊपर बैठे शख्स का काम सिर्फ यह नहीं कि वह खुद ईमानदार रहे। उसका कर्तव्य यह भी है कि वह अपने नीचे भी इसे रोके।  दिल्ली की आम आदमी  सरकार की यह जिम्मेदारी है और इस मामले में वह सिर्फ जनता के भरोसे न बैठे, बल्कि खुद भी नजर रखे | यह कोशिश होनी चाहिए कि आदमी का आदमी पर भरोसा बढ़े | भ्रष्टाचारी से व्यक्ति के रूप में नफ़रत कदापि नहीं होनी चाहिए | 
उसे भ्रष्टाचार - कर्म से नफ़रत होनी चाहिए | साथ ही भ्रष्टाचार की मानसिकता के त्याग के लिए उसे मानसिक रूप से प्रशिक्षित करना चाहिए | इसके लिए वास्तविक धार्मिक शिक्षाओं की ओर रुजू करना चाहिए | यह चिंताजनक बात है कि भारत का लगातार नैतिक पतन हो रहा है | ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की सबसे ईमानदार देशों की सूची में डेनमार्क और न्यूजीलैंड पहले पायदान पर हैं। इसके बाद फिनलैंड, स्वीडन और नार्वे का नंबर है। इंग्लैंड चौदहवें नंबर पर तो अमेरिका उन्नीसवें नंबर पर है। भारत का नंबर 94 है। चीन भी भारत से आगे, अस्सीवें नंबर पर है। 2007 के बाद से भारत अब तक बाईस पायदान नीचे फिसल चुका है। यह स्थिति बदलनी चाहिए |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Jan 21, 2014

अजस्र ज्योति जलती रहे

अजस्र ज्योति जलती रहे


धन्य जीवन है वही जो ,दीप बनकर जल रहा ,
शुष्क भू की प्यास हरने , स्रोत बनकर चल रहा .
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जग में जीवन श्रेष्ठ वही , जो फूलों - सा मुस्काता है ,
अपने गुण - सौरभ से , कण - कण को महकाता है .
 मैं बहुआयामी प्रतिभा के धनी , हिन्दी साहित्य के अन्तरराष्ट्रीय सशक्त एवं सुपरिचित हस्ताक्षर डॉ . रामनिवास ' मानव ' जी को मैं बरसों से नहीं दशकों से जानता हूँ . 1997 ई . में आपके संपर्क में  आया , यद्यपि आपसे भेंट नहीं हुई है , परन्तु फोन पर होती रही बातों और आपके अत्यंत मृदु , सौम्य एवं मानवोचित सुव्यवहार के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि उक्त चार काव्य पंक्तियाँ बहुत कम शब्दों में आपके जीवन का परिचय करा देती हैं . आपके जीवन का महान लक्ष्य है , वह है लेखनी के द्वारा ही नहीं , जनसेवा के अन्य उपादानों के द्वारा भी , जो आपको उच्चता की ही ओर ले जाता है .
 आपका सारा जीवन विशुद्ध रूप से जनहितार्थ है . आप मरणोपरांत अपने शरीर को मेडिकल कालेज को दान करने की घोषणा पहले ही कर चुके हैं . लगभग 25 वर्ष पूर्व ही आप अपनी सारी संपत्ति साहित्य एवं समाजसेवा के कार्यों में लगाने की वसीयत कर चुके हैं .
व्यावहारिक जीवन में अनथक प्रयास करके  इस  लक्षित उद्देश्य तथा कार्य को  मूर्त रूप दे रहे हैं , जो विरले ही कर पाते हैं . साहित्य की लगभग सभी विधाओं पर आपका अधिकार है . सैकड़ों , हज़ारों रचनाएं हैं . चालीस से अधिक महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं . आपकी विविध रचनाओं के अनुवाद देश - विदेश की भाषाओँ और बोलियों में हो चुके हैं . डाक्टर साहब के बेशकीमती साहित्य पर एम . फिल हेतु 48 और पी - एचडी हेतु एक दर्जन बार शोधकार्य संपन्न हो चुके हैं . आपके व्यक्तित्व और कृतित्व पर कई पुस्तकें प्रकाशित हैं . आप देश - विदेश की डेढ़ सौ से अधिक प्रमुख संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत हैं . 
डाक्टर साहब  पांच सौ से अधिक राज्य - राष्ट्रीय कार्यक्रमों और आयोजनों का सफल आयोजन कर चुके हैं .  आप उच्च कोटि के साहित्यकार ही नहीं महान मानववादी हैं . 
बेहद सादा तबियत के हैं . आप उदार हृदयी तथा सज्जनता की प्रतिमूर्ति  हैं और आपके जीवन में धर्म , सम्प्रदाय को लेकर कोई कटुता , संकीर्णता और पक्षपात लेशमात्र भी नहीं .  नवोदितों को उभारना आपका एक विशेष गुण है . मुझे याद आता है , जब मैंने सन 2000 के आरंभिक दिनों में आपकी सेवा में  दो शब्द लिखने के निवेदन के साथ अपने पहले काव्य संग्रह ' यथाशा ' का मसविदा भेजा . उस समय आप हिसार [ हरियाणा ] स्थित  सी . आर . एम . जाट कालेज के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग के अध्यक्ष थे . 
आपने पूरी पुस्तक पढ़ी और स्नेह - शब्दों के साथ समीक्षात्मक भूमिका लिखी , जिसके लिए मैं आपका सदैव आभारी , ऋणी हूँ और रहूँगा .  वास्तव में आपकी रचनाएं बड़े क़द्र की निगाह से देखी जाती हैं , क्योंकि इनकी सृजना में   सतत मानव कल्याण निहित है . सभी में प्रभावकारी संदेश है . सबसे पहले आपकी बाल कविताओं पर एक नज़र डालते हैं और इनके संदेश को सुनते हैं -
खुले जगत में जीना सीखो 
ताज़ा हो सब दाना - पानी ,
इतना कहकर , फुदक ज़रा - सा 
फुर्र हो गई चिड़िया रानी .
[ ' चिड़ियारानी ' शीर्षक से ]
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' मिस्टर चूहेराम ' नामक कविता में यह संदेश है -
बोले , काम करो सब ख़ूब 
सीखो सहना सर्दी - धूप ,
कभी न आलस का लो नाम 
करो दूर से इसे प्रणाम .
डाक्टर साहब के कुछ दोहे भी मुलाहिज़ा फरमाएं -
ये पत्थर की मूर्तियाँ , ये पाहन के देव 
इनकी पूजा - अर्चना , मुझको लगे कुटेव .
 शुद्ध हवा-पानी मिलें, उजली-निर्मल धूप
निखरे सारे विश्‍व में, तब-जीवन का रूप .
अग्‍नि, जल, वायु औ' धरा, जीवन के आधार
इनके ही संयोग से, निर्मित यह संसार .
डॉ . रामनिवास ' मानव ' जी उच्चकोटि के कवि भी हैं , लेकिन आपकी सादगी निराली है . एक कविता की कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं -
जैसे कोई शिल्पी 
गढ़ता रहे शब्द सुंदर 
या रचता रहे छंद टकसाली 
पर शब्द या छंद की 
रचना के बाद भी 
कितना मुश्किल है कवि होना .
[ ' कितना मुश्किल है ? ' शीर्षक से ]
ईश्वर से प्रार्थना है कि डॉ . रामनिवास ' मानव ' जी  का व्यक्तित्व और कृतित्व और निखरे एवं  प्रांजल हो. आपकी षष्टिपूर्ति और सृजन की अर्द्धशती के सुअवसर पर बहुत - बहुत हार्दिक शुभकामनाएं .और बधाइयां . 
   -  डॉ. मुहम्मद अहमद 

Jan 19, 2014

सुनहरी सरजमीं की खुशबू है चचा बेकल की साहित्य सर्जना

सुनहरी सरजमीं की खुशबू है चचा बेकल की साहित्य सर्जना 



सुनहरी सरज़मीं मेरी, रुपहला आसमाँ मेरा
मगर अब तक नहीं समझा, ठिकाना है कहाँ मेरा ,
किसी बस्ती को जब जलते हुए देखा तो ये सोचा
मैं ख़ुद ही जल रहा हूँ और फैला है धुआँ मेरा |
ये भावपूर्ण शब्द हैं पद्मश्री बेकल उत्साही के , जिनके कलाम का कोई जवाब नहीं . मैं यह बात इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि चचा बेकल मेरे शहर के हैं और न इसलिए कि मेरा उनसे बड़ा ही आत्मवत संबंध है , अपितु मेरे चचा हैं ही ऐसे ! एक महान कवि और शायर ....  आप वर्तमान समय के सबसे वरिष्ठ और लोकप्रिय कवियों में एक हैं.  खड़ी बोली हिंदी के साथ ही सोंधी मिट्टी की भाषा अवधी और  उर्दू तीनों भाषाओँ में उनकी निपुणता है . इन सभी उनकी काव्यधारा का सम - प्रवाह है , लेकिन अवधी के प्रति उनका बेइंतिहा लगाव है . अवधी के विकास और प्रचार प्रसार के लिए  चचा बेकल सदैव तत्पर और कटिबद्ध रहे हैं . मगर इस सच्चाई के बावजूद वे अपने को तुलसी और कबीर के बीच पाते हैं . एक शेअर देखिए -
 छिड़ेगी दैरो हरम में ये बहस मेरे बाद,
कहेंगे लोग कि बेकल कबीर जैसा था .
कभी चचा कहते हैं -
मन तुलसी का दास हो अवधपुरी हो धाम ,
साँस उसके सीता बसे , रोम - रोम में राम .
फिर कहते हैं -
मैं ख़ुसरो का वंश हूँ , हूँ अवधी का संत ,
हिंदी मिरी बहार है , उर्दू मिरी बसन्त .
काव्य की शायद कोई ऐसी विधा नहीं , जिसमें चचा बेकल ने कलम न चलाई हो , और वह भी पूरे मनोयोग से . यद्यपि बलरामपुर ने कई रचनाकार दिए हैं , किन्तु आपका कोई सानी नहीं .... अली सरदार जाफ़री भी नहीं ! उनकी विविध विधाओं की रचनाएं सब पर भारी हैं . सन 1923 में  बलरामपुर के रमवापुर [ उतरौला ] में एक ज़मीदार परिवार मुहम्मद शफी खां के रूप में जन्मे चचा बेकल को बचपन से ही फकीराना तबीयत मिली . जब भी मिलते सादगी का सहज इज़हार करते . मेरे जैसे छोटे रचनाकारों को प्रोत्साहित करते . मेरे बलरामपुर वास के दौरान अक्सर पूछते - ' यहर का - का लिखेव है ? '
 ज़मीदारी और संपन्नता का कभी कोई प्रदर्शन नहीं , बल्कि इससे बचने के लिए आपने अपनी बहुत - सी चल - अचल संपत्तियों को जरुरतमंदों के बीच बाँट दिया था . उन्होंने यह काम युवावस्था के पूर्व ही कर लिया था , ताकि काव्य - रचना सृजन में कोई बाधा न आए . वे ज़मींदारी को शोषण का ही एक रूप मानते थे .
अरबी,फारसी, उर्दू और हिन्दी के गहन अध्येता चचा बेकल ने अपनी कविता की शुरूआत अवधी से की और आज 91 साल की उम्र में भी उनका लेखन अनवरत जारी है.  1952 से मंचों पर आपकी उपस्थिति अब तक बरक़रार है . हाँ , अब उम्र के लिहाज़ से बारम्बारता में अवश्य कमी आई है . एक ज़माने में अवधी के बड़े कवि रमई काका [ चंद्र भूषण त्रिवेदी ] के साथ मंचों पर उनकी उपस्थिति अवधी में मधुर रसधार घोल देती थी .  [ पंडित चन्द्रभूषण त्रिवेदी रमई काका अवधी के महान कवियन मा से रहे . काका कै कलम  बैसवाड़ी अवधी मा बड़ी  धार से चलत रही . काका कै जनम सन 1915  ई0 मा  उत्तरप्रदेश के उन्नाव ज़िला  के रावतपुर गाँव मा भवा रहै . आप आकाशवाणी लखनऊ-इलाहाबाद मा सन् 1940 ई0 से 1975 ई० तक काम किहिन रहए काका सिरिफ कवितन तक नहीं सीमित रहे . ]
चचा बेकल पहले अवधी सम्राट बंशीधर शुक्ल के साथ भी मंचों पर दिखते ...... एक समा - सा  बंध जाता . शुक्ल जी के साथ उन्हें सुनने का लुत्फ़ कुछ अलहिदा ज्ररूर होता . शुक्ल जी का खड़ी बोली के साथ अवधी के अल्फ़ाज़ का सितारों की भांति टांकना बहुत मशहूर है . जैसे -
 ' है आज़ादी ही लक्ष्य तेरा
उसमें अब देर लगा न जरा
जब सारी दुनियां जाग उठी
तू सिर खुजलावत रोवत है . '
गोपाल सिंह नेपाली और मोती बी.ए . कर साथ भी चचा बेकल अक्सर दिखते थे .
5 अगस्त 2011 को   ' तुलसी अवध स्री ' सम्मान के प्रथम प्रापक चचा बेकल विशुद्ध अवधी को अपनी अवधी कविता का आभूषण बनाया . कुछ उदहारण देखिए -
 खारी पानी बिसैली बयरिया
 बलम बम्बइया न जायो .
दूनौ जने हियाँ करिबै मजूरी
घरबारी से रहियये न दूरी
हियैं पक्की बनइबै बखरिया
बलम बम्बइया न जायो .
हमरे गाँव  मा  कौन  कमी  है
स्वर्ग लागत है हमरी नगरिया,
बलम बम्बइया न जायो .
उनकी एक और अवधी कविता की कुछ पंक्तियाँ पढिए -
नाचै ठुमुक ठुमुक पुरवाई
खेतवन बाँह लियत अँगराई
देवी देउता सोवैं फूल की सेजरिया,
निराला मोरा गाँव सजनी।
बन उपवन हरियाली हुमसै
माटी सुघर बहुरिया।
बँसवाटी लौचा झकझोरै
यौवन मस्त बयरिया।
पेड़न पंछी चाँदी टोरै
नदिया बीच मछरिया
बरसै झूम झूम के सोने कै बदरिया,
निराला मोरा गाँव सजनी।
चचा बेकल की रचनाओं में ग्राम्य जीवन का बेहतरीन चित्रण है . गांव, खेत-खलिहान, किसानी संस्कारों से परिपूर्ण है . ग्राम्य गौरव पर उनके दो शेअर पेशे ख़िदमत हैं -
फटी कमीज नुची आस्तीन कुछ तो है
गरीब शर्मो हया में हसीन कुछ तो है .
लिबास कीमती रख कर भी शहर नंगा है
हमारे गाँव में मोटा महीन कुछ तो है .
लगे हाथ अब यह भी जान लेते हैं कि चचा मुहम्मद शफी खां  ' बेकल उत्साही ' कैसे बने ? 1952 में एक कवि सम्मेलन में मौजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री पं . जवाहर लाल नेहरू ने उनकी अवधी कविता की प्रशंसा की और उन्हें उनका कलमी नाम ' बेकल उत्साही ' प्रदान किया . वैसे भी चचा  बेकल , पंडित नेहरू के बेहद करीब रहे हैं . देश  के एक और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी उनके करीबी मित्र हैं . दोनों का बीस से अधिक मंचों पर साथ रहा , किन्तु चचा तो ठहरे सच्चे कांग्रेसी . उन्होंने 1962 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के बलरामपुर क्षेत्र के प्रत्याशी बलराज साहनी को अटल बिहारी वाजपेयी के मुक़ाबले मदद की . साहनी चचा बेकल के घर ठहरे थे  . अटल जी इस चुनाव में बलराज साहनी से हार गए थे . वे 1986 में कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य भी बन चुके हैं . गीत, ग़ज़ल, नज़्म, मुक्तक, रूबाई, दोहा आदि विविध काव्य विधाओं में उनकी बीस से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. उन्हें अनेक सम्मान मिल चुके हैं जिनमें से 1976 में मिला पद्मश्री उल्लेखनीय है. 
 पं . नेहरू की यह दिली इच्छा थी कि चचा बेकल विशेषकर अवधी के रचनाधर्मी बनें . ऐसा हुआ भी . चचा बेकल अवधी के लिए सदा प्रयासरत रहे हैं . 
दक्षिण भारत तक को  उस समय परिचित कराया , जब वहां हिंदी विरोधी लहर चल रही थी . उनका कहना है कि सरकार अवधी के विकास के लिए गंभीरता से काम करे. ताकि अपने घर की जुबान के प्रति हमारा गौरव-बोध मजबूत हो. लखनऊ में अवधी के अध्ययन के लिए विश्व स्तर का संस्थान बने जिसमें एक साहित्यिक संग्रहालय और पुस्तकालय भी हो. साथ ही भोजपुरी की तरह अवधी की भी एक फिल्म इंडस्ट्री स्थापित हो जिसका कि केंद्र लखनऊ में हो . ' तुलसी अवध स्री ' पुरस्कार प्राप्त करते समय उन्होंने कहा था , “अवधी भासा के बिकास के लिए सरकारी परयास कै बहुत जरूरत है। जैसे सरकार की तरफ से हिन्दी अउर उरदू के बिकास के ताईं तमाम संस्थै बनायी गयी हैं, वही चाल पै अवधिउ का पहिचान मिलै कै जरूरत है। दुखद ई है कि हम खुद अपनी भासा का बोलै से हिचकिचात हन। हमैं लोगन का यहिके लिए जगावै क चाही। राजनीति अवधी का चौपट किहिस है। हमैं सचेत रहै क चाही। नयी पीढ़ी अवधी क आगे लैके आए, फिलहाल हम इहै सोच के खुस अहन।”
चचा बेकल का इस अवस्था में भी सक्रिय हैं , आप साहित्य को और भी नवाज़ें , इसी आशा के साथ .....
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

हमें चाहिए इन सवालों के जवाब ......

हमें चाहिए इन सवालों के जवाब ......

इस साल होने वाले आम चुनाव के मद्देनज़र तथाकथित हिन्दू राष्ट्र बनाने की दिशा में एक बार फिर हिन्दुत्व का नारा लगाया जा रहा है . इस बाबत धर्म संसद ने भी नरेन्द्र  दामोदरदास मोदी को ' प्रधानमंत्री घोषित कर दिया है . इस कदम का समर्थन संघ प्रमुख मोहन भागवत  ने तत्काल करके संघ समर्थकों से इस लक्ष्य की प्राप्ति में जुट जाने का आह्वान किया . उनका कहना था कि हिन्दू भाव को समझनेवाला व्यक्ति ही प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे . धर्म संसद में मोदी पर मुहर लगने के साथ ही अयोध्या में मन्दिर बनाने हेतु संकल्प व्यक्त किया गया . इसे लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रभावकारी हथियार माना जा रहा है . अब यह कहा जा रहा है कि इस मसले को संसद हल करे और मन्दिर निर्माण की इजाज़त दे . कांची कामकोटि पीठम  के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई धर्म संसद की बैठक में दो  नारे लगाए गये - '' मन्दिर का निर्माण हो '' और '' देश का प्रधानमंत्री कैसा हो , नरेन्द्र मोदी जैसा हो '' .  रामानुजाचार्य प्रपन्नाचार्य  ने कहा कि मोदी के प्रधानमन्त्री बनते ही समस्याओं का अंत हो जायेगा और मन्दिर बन जायेगा . योगी आदित्यनाथ ने मन्दिर बनाने के लिए संसद को घेरने की बात कही और इस मुहिम को पहले की तरह गांवों तक ले जाने का संकल्प लिया . भाजपा के नये अध्यक्ष राजनाथ सिंह का भी कहना है कि '' केंद्र में राजग - शासन था , लेकिन भाजपा के पास अपने बल पर पूर्ण बहुमत नहीं था . इसलिए लोगों को लगता था कि अपने मूल मुद्दों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता कम हो गयी है , लेकिन ऐसा नहीं है . राम मन्दिर , समान  नागरिक संहिता , धरा ३७० जैसे मुद्दों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता यथावत है . लेकिन ये ऐसे मुद्दे हैं , जिनके बारे में भाजपा पूर्ण बहुमत की सरकार में ही कुछ कर सकती है . जैसे ही हमें केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का अवसर मिलेगा , हम अपनी प्रतिबद्धता वाले मुद्दों को वरीयता देंगे  '' [ ' पांचजन्य ' , २० फरवरी २०१३ ] . 
 अब हम उक्त बातों पर एक  वस्तुपरक दृष्टि डालने की कोशिश करेंगे . जहाँ तक नरेन्द्र मोदी को प्रधनमंत्री बनाने का ख़्वाब है , उस समय तक पूरा नहीं हो सकता , जब तक भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में न आए और भाजपा में मुड़फुटव्वल और गुटबंदी की कैफ़ियत किसी हद तक कम हो . इन  दोनों अनुकूल स्थितियों का आना बहुत ही मुश्किल है , क्योंकि दोनों को भारतीय जनता का बृहत्तर वर्ग नापसंद करता है . मोदी ने गुजरात में जो नरसंहार किया , वह अक्षम्य है . इस पर भाजपा की चुप्पी भी अक्षम्य है . ज़ाहिर है , अगर पार्टी चाहती तो ऐसा कदापि न होता . जहाँ तक मन्दिर निर्माण की बात है , तो इसका मामला अदालत में है . मुसलमानों का बार - बार यही कहना है कि वे अदालत के फ़ैसले को मानेंगे और उन्होंने अमलन इसे माना भी है , क्योंकि मुसलमान शांतिप्रिय हैं . दूसरी ओर मन्दिर समर्थक ज़ोर - ज़बरदस्ती की बात करते हैं , जिसका किसी भी स्थिति में समर्थन नहीं किया जा सकता . समान नागरिक संहिता बनाने  और धारा ३७० को निरस्त करने की बात भी अव्यावहारिक और अशांति पैदा करनेवाली है . मुसलमानों ने इस देश पर लगभग नौ सौ साल तक लगातार शासन किया , लेकिन उन्होंने हिन्दुओं पर अपना कोई क़ानून नहीं थोपा . जो कुछ लागू  किया , सहमति से ही लागू किया . कभी ' मुस्लिम राष्ट्र ' नहीं बनाया और न ही सद्भावना को बिगाड़ा . धर्म संसद में औपचारिक रूप से जिस कथित ' हिन्दू राष्ट्र ' के प्रारूप पर चर्चा की गयी , वह अत्यंत निंदनीय है . लोगों के सामने जो घोषणापत्र पेश किया गया ,  उस पर एक निगाह डाल लीजिए - 
 '' भारत प्रजातांत्रिक राज्य है. यहाँ बहुमत का राज्य चलता है ,हिंदू यहाँ बहुमत में है इसलिए भारत में हिंदू मत के अनुसार राज्य चलाया जाएगा.तदनुसार सत्ता में आने के बारह महीनों के भीतर वर्तमान संविधान में निम्नलिखित संशोधन किये जायेंगे-
१.अनुच्छेद १३(४) निरस्त किया जाएगा और मौलिक अधिकारों पर लगी सारी शर्ते विलोपित किये जायेंगे.
२.इसी क्रम में अनुच्छेद ३६८(३)भी निरस्त किया जाएगा.
३.अनुच्छेद ३० को निरस्त किया जाएगा.
४ अनुच्छेद २५ (२क) निरस्त किया जाएगा 
५.जातीय आधार पर आधार पर आरक्षण समाप्त करते हुए आर्थिक विपन्न के लिए करते हुए
शासकीय पदों में ६०% आरक्षण का प्रावधान १० वर्षों के लिए किया जायेगा.इसके बाद आरक्षण 
की अवधि दोनों सदनों में अलग - अलग तीन चौथाई बहुमत से ही वृद्धि की जा सकेगी.
६.अनुच्छेद ३७० पूर्णतः निरस्त किया जायेगा.
७.विभिन्न मजहबों के आबादी के अनुपात में विद्वानों की संख्या नियत करते हुए ‘नागरिक संहिता परिषद’ का गठन किया जाएगा और समान नागरिक संहिता तैयार की जायेगी.२६ जनवरी २०१६ से समान नागरिक संहिता लागू  की जायेगी.जो समुदाय अपनी अलग नागरिक संहिता चाहते है उन्हें उस मामले में वैधानिक न्यायालयों का संरक्षण प्राप्त नहीं होगा. ये मुद्दे चूँकि पंथनिरपेक्ष प्रजातंत्र के लिए मूलभूत हैं इसलिये इन्हें स्वीकार वाले दल को ही हिंदू मतदाता वोट देगा. '' इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए विहिप के कार्यकारी अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रवीण भाई तोगड़िया ने दमोह में  फ़रमाया था कि ' अगर मैं देश का प्रधानमंत्री बना , तो  मुसलमानों से मताधिकार छीन लूँगा ... प्रधानमंत्री बनने के दूसरे दिन देश के सभी संवैधानिक पदों से मुसलमानों को हटा दूंगा .कोई भी मुसलमान प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री , मुख्य सचिव , कलेक्टर , एस . पी . सहित पद  पर नहीं रहने पाएगा ' [ ' राजस्थान पत्रिका ' , इंदौर , २५ जनवरी २०१३ ] . ज़ाहिर है  ये सभी बयान और विवरण देश की एकता और शांति को पूरी तरह खत्म करने वाले हैं . इन हरकतों पर तत्काल रोक लगनी चाहिए .  
  = डॉ . मुहम्मद अहमद