Feb 28, 2014

तुम ज़िन्दों के ज़िन्दा हो ,


 तुम ज़िन्दों के ज़िन्दा हो ......

बहुत  कम समय में हिंदी साहित्य में विशिष्ट पहचान बनानेवाले , विशिष्ट हौसले के धनी मेरे आत्मीय दिवंगत मित्र , छोटी देवकाली  , फ़ैजाबाद [ उ . प्र . ] के निवासी श्री मुन्ना श्रीवास्तव जी की याद आज इस तरह आयी | कृपया अवलोकन कीजिए श्रद्धांजलि स्वरुप एक शेअर - 
मैं नहीं कहता तुम्हें मरहूम , तुम ज़िन्दों के ज़िन्दा हो ,
तुम्हारी नेकियाँ बाक़ी , तुम्हारी खूबियाँ बाक़ी |
 मुन्ना जी बड़े निराले , सौम्य व्यक्तित्व वाले थे | हर साहित्यिक कार्यक्रम में इतनी दिलचस्पी के साथ शिरकत करते मानो उनका व्यक्तिगत कार्यक्रम हो | थे तो आप कृशकाय , किन्तु चलते थे बुलेट से .... जब मैं उनके घर जाता , बहुत ख़ुश होते ..... पता नहीं कहाँ - कहाँ बुलेट पर बैठाकर घुमाते | उस दिन दफ़्तर नहीं जाते | आप इंजीनियर थे ... अब बस उनकी यादें ही शेष हैं | नीरव नवीन ने क्या ख़ूब कहा है -
गर चले जीने के हाथों हम ,
शायद इक तूफ़ान - सी है ज़िंदगी |
- अहमद ' मोहित '

Feb 27, 2014

किसको पता आलम की हकीक़त ?


किसको पता आलम की हकीक़त ?
ख़ुद से ख़ुद बुलंद ख़ुद हर शै है |

-  अहमद ' मोहित '
.

' पेड न्यूज़ ' के बाद ' पेड सर्वे ' !

' पेड न्यूज़ ' के बाद ' पेड सर्वे ' !

ओपीनियन पोल करने वाली कपंनियां पहली बार नहीं कठघरे में खड़ी हुई हैं। चुनाव सर्वे में धांधली के आरोप पुराने हैं | अब गत 25 फरवरी को समाचार चैनल ' न्यूज एक्सप्रेस ' ने चुनावी सर्वे करने एक बड़ी एजेंसी सी - वोटर सहित 11 एजेंसियों का स्टिंग ऑपरेशन " ऑपरेशन प्रधानमंत्री " दिखाकर यह चौंकाने वाला खुलासा किया है । इनमें देश की कुछ बड़ी और विदेशी एजेंसियां भी शामिल हैं। इस स्टिंग ऑपरेशन में दिखाया गया है कि सर्वे एजेंसियां राजनीतिक दलों और मीडिया हाउस से पैसे लेकर इच्छानुसार नतीजे दे देती हैं। इसके मुताबिक ये एजेंसियां ‘ मार्जिन ऑफ इरर ’ की आड़ में गलत सर्वे देती हैं। 
इस स्टिंग ऑपरेशन से ओपिनियन पोल के कारोबार में कालेधन के इस्तेमाल की बात भी सामने आई है। कई रिसर्च एजेंसियां सर्वे के लिए बड़ी सीमा तक नकद राशि भी लेने को तैयार हो गईं। यहां तक कि वे चुनाव प्रक्रिया प्रभावित करने के लिए पैसे लेकर डमी उम्मीदवार खड़ा करने के लिए भी राजी हो गईं। न्यूज एक्सप्रेस चैनल के सीईओ और प्रधान संपादक विनोद कापड़ी ने कहा कि 4 अक्तूबर 2013 को चुनाव आयोग ने एक खत लिखकर ओपिनियन पोल पर विभिन्न दलों की राय मांगी थी। इसके बाद हमने इन सर्वे की सच्चाई पता लगाने के बारे में सोचा। सर्वे के स्रोत में भी बड़ी गड़बड़ियां पाई गई हैं। इस खुलासे पर चुनाव आयोग गंभीर है | अटार्नी जनरल जी . ई . वाहनवती पहले ही चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों पर रोक लगाने की बात कह चुके हैं | चुनाव आयोग चाहता है कि इस बाबत क़ानून बने |
मीडिया में भ्रष्टाचार का रोग बढ़ता ही जा रहा है | पेड न्यूज़ के चलन ने विश्वसनीयता का संकट तो पैदा ही किया है , किरदार का भी संकट पैदा कर दिया है | मीडिया में अच्छे किरदार के भी लोग हैं , जैसे ताज़ा ख़ुलासा करनेवाले सज्जन भी मीडिया से ही जुड़े हुए हैं | लेकिन यह बात सच है कि मीडिया से जुड़े अधिकांश लोगों पर भ्रष्टता के आरोप हैं |  ताज़ा स्टिंग पर मीडिया कि ख़ामोशी भी चिंताजनक है | कभी - कभार ही इनके मामले उजागर होते हैं |  रिश्वतखोरी के गंभीर मामले में' ज़ी न्यूज़ ' के दो नामचीन संपादकों - सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया की गिरफ़्तारी [ दिसम्बर 2012 ] ने भारतीय प्रेस में आए किरदार के संकट को एक बार फिर बेनक़ाब कर दिया था | इसी के मद्देनज़र प्रेस काउन्सिल के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने अपनी त्वरित टिप्पणी में भारतीय पत्रकारिता ने गिरते स्तर पर चिंता प्रकट करते हुए कहा था कि हमारे यह इस क्षेत्र में बड़ी गंदगी है , जिसकी सफ़ाई होनी चाहिए | 
उनका ठीक ही कहना है कि वे प्रेस की आज़ादी के पक्ष में ज़रूर हैं , लेकिन प्रेस की अपनी कुछ जिम्मेदारियां भी होनी चाहिए | जस्टिस काटजू का यह भी खयाल है कि "उन्हें [ पत्रकारों को ] पूरी आज़ादी नहीं देनी चाहिए | हमने प्रेस की आज़ादी के लिए खुद आवाज़ उठायी है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं|" ज़ी न्यूज़ के सम्पादक सुधीर चौधरी और ज़ी बिजनेस के सम्पादक समीर आहलूवालिया पर आरोप लगे कि उन्होंने कांग्रेस सांसद और उद्योगपति नवीन जिंदल के ग्रुप से इस आधार पर 100 करोड़ रुपए मांगे थे कि वे नवीन ज़िंदल की कम्पनी और कोयला घोटाले को जोड़ कर कोई रिपोर्ट नहीं करेंगे |
जस्टिस काटजू की बात ऐसी थी और है , जिस पर भारतीय मीडिया को चितन - मनन ही नहीं , बल्कि अमली तौर पर इसे पाक - साफ़ रखने की ठोस पहल एवं कोशिश करनी चाहिए थी , जो अब तक नहीं हो सकी . काफ़ी लम्बे समय से भारतीय मीडिया की गैर ज़िम्मेदाराना हरकतें सामने आ रही हैं , जो लोकतंत्र और उसकी चतुर्थ सत्ता प्रेमियों को चिंता में डालती रही है | एडमंड बर्क ने इसे चतुर्थ सत्ता तो क़रार दिया ही था , साथ ही इसकी ज़िम्मेदारियाँ भी गिनाईं थीं , लेकिन अफ़सोस पत्रकारिता से जुड़े लोगों को ' चतुर्थ सत्ता ' ही याद रही | वे अपनी ज़िम्मेदारियाँ भूले ही नहीं , निरंकुश हो गये , जिसके लिए लोकतंत्र में कोई जगह नहीं होती |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Feb 23, 2014

सूखी नदी का चिंतन - 3

सूखी नदी का चिंतन -
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कितना सुखद 
आह्लादकारी काल !
सूखी नदी से ...
जलधारा का पुनर्प्रस्फुटन
वह भी 
वर्षों / दशकों नहीं 
शताब्दियों बाद 
पुनर्जन्म 
शस्य सलिला का 
शस्य श्यामला पर !
स्वागत है आपका 
अभिनंदन है आपका 
अहो भाग्य !!
आपका पुनरागमन !!!
क़ायल हो गए हम 
आपकी कल्याण - भावना के   
धन्य हैं आप 
कृतज्ञ हैं , हम सब आपके 
आप महाउपकारक हैं 
हमने तो अपराध ही किए 
प्रदूषण फैलाए 
आपमें गंदगियाँ डालीं 
किन्तु आपका यह उपकार 
महान उपकार !
'' कृते प्रत्युप्कारे यो वणिग् धर्मो न साधुता ''
से बहुत परे 
'' सर्वे भवन्तु सुखिनः ''
की प्रबल इच्छा 
'' सर्वे भद्राणि पश्यन्तु ''
की सतत साक्षी बनकर 
नव क्षितिजों की चाह में 
सबको संतृप्त करने की 
तीव्र उत्कंठा लेकर 
बारम्बार स्वागत है आपका 
शुभागमन , सुस्वागतम !!
लोकवासियों की ओर से 
तेरे देशवासियों की ओर से 
जो हैं तेरे परमप्रिय देश के 
एक सुप्रिय भू - भाग के 
एक शासन - प्रशासन के 
एक ' दरीचे ' के 
एक धरती के 
एक शैवालिनी के 
जो हम सबमें बहती हैं 
शताब्दियों से 
लुप्त होकर भी 
जो प्रवहमान थी 
तभी हम ज़िन्दा थे 
आगे भी ज़िन्दा रहेंगे 
अहो महाभाग्य हमारा !!!

- अहमद ' मोहित

कई दिनों तक चूल्हा रोया


कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास 
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास 
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त 
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद 
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद 
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद 
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद |
--- बाबा नागार्जुन 

मैं अकेला हूँ


मुसाफ़िर ही रहने दो , मैं अकेला हूँ ,
राह ही पर चलने दो , मैं अकेला हूँ .
बारिश आए , तूफाँ आए तो क्या ,
अकेले ही सह लेने दो , मैं अकेला हूँ |
-  अहमद ' मोहित '

दुनिया में मर - मरके जीना सीख लिया


दुनिया में मर - मरके जीना सीख लिया 
अब कहाँ आ गए कि हाजत नहीं रही 
ऐ खुदा , मुझको भेज दे अपने वतन 
यहाँ बुलाने की अब ज़रूरत नहीं रही |
-  अहमद ' मोहित ' 

Feb 22, 2014

करते थे दावे बस यूँ ही अज़मत के


करते थे दावे बस यूँ ही अज़मत के ,

कोशिश ये थी कि सहर भी न हो पाए |

- अहमद ' मोहित '

मनुष्य की मातृ भाषा


मनुष्य की मातृ भाषा उतनी ही महत्व रखती है , जितनी कि उसकी माता और मातृ भूमि रखती है | एक माता जन्म देती है , दूसरी खेलने - कूदने , विचरण करने और सांसारिक जीवन - निर्वाह के लिए स्थान देती है , और तीसरी मनोविचारों और मनोगत भावों को दूसरों पर प्रकट करने की शक्ति देकर मनुष्य जीवन को सुखमय बनाती है |

- आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी  [ मार्च 1923 में कानपुर में आयोजित तेरहवें साहित्य सम्मेलन की स्वागतकारिणी समिति में सभापति की हैसियत से व्यक्त लिखित वक्तव्य का एक अंश | ] 

Feb 21, 2014

भारतीय राष्ट्रीयता का भवन


एक विदेशी भाषा की बुनियाद पर भारतीय राष्ट्रीयता का भवन नहीं खड़ा किया जा सकता |
- मार्क टुली [ , बीबीसी के दिल्ली स्थित पूर्व विशेष प्रतिनिधि , जो अब भारत में ही बस गए ]

Feb 20, 2014

यथार्थ जीवन




आख़िर कब तक छिपा पाता  मैं तुम्हारा वह यथार्थ जीवन ?
जब मेरा स्वेदन निकला तुम्हारे शरीर से सेंट मनभावन |
-  अहमद ' मोहित ' 

बेगुनाह शकील और बशीर को फ़ौरन रिहा किया जाए

बेगुनाह शकील और बशीर को फ़ौरन रिहा किया जाए 

केंद्र सरकार ख़ासकर केन्द्रीय गृहमंत्री मंत्री सुशील कुमार शिंदे के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद किसी भी राज्य सरकार द्वारा गिरफ्तार  बेक़सूर मुस्लिम नवजवानों की रिहाई के लिए कोई क़दम न उठाया जाना वाक़ई अफ़सोसनाक और आश्चर्यजनक है | उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों की जेलों में बड़ी संख्या में बेक़सूर मुस्लिम नवजवान क़ैद हैं , जिनमें कई वर्षों से ' बेगुनाही ' की सज़ा भुगतनेवाले भी शामिल हैं | रिहाई मंच इन्हें भी रिहा कराने के लिए प्रयासरत है | आतंकवाद के नाम पर उत्तर प्रदेश ए टी एस द्वारापकड़े गये बेगुनाह शकील और बशीर हसन की रिहाई के लिए  विगत 13 फरवरी  को सीतापुर के बिसवां स्थित शकील के पुश्तैनी गांव कुतुबपुर में आयोजित जन सम्मेलन को सम्बोधित करते हुये रिहाई मंच की ओर से कहा गया  कि बशीर, शकील और उनका पूरा परिवार यूपी एटीएस और दिल्ली स्पेशल सेल की आपराधिक साजिश का शिकार है |  इन दोनों पुलिस गिरोहों ने शकील और बशीर के हँसते-खेलते परिवार को तबाह कर दिया है। उनके परिवार द्वारा कई बार सपा सरकार के नेताओं राजेंद्र चौधरी और अबू आसिम आजमी से फरियाद करने के बावजूद उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला | उनकी गिरफ्तारी पर उठने वाले सवालों की जाँच के लिये सरकार ने न तो कोई आयोग गठित करना जरूरी समझा और न ही उन ज्ञापनों का ही कोई जवाब आज तक इस परिवार को सरकार की तरफ से मिला | दोनों पीड़ित परिवार सरकार और मुख्यमंत्री को ज्ञापन व अनुरोध पत्र भेज चुके हैं |  इससे साबित होता है कि आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह मुसलमानों की रिहाई का समाजवादी पार्टी का चुनावी वादा सिर्फ एक धोखा था। शकील और बशीर पर आरोप है कि यासीन भटकल उनके घर  आया था | इस बात पुलिस के पास  न तो कोई पुष्ट प्रमाण है और न ही कोई गवाह। आज तक पुलिस यह भी नहीं बता पायी है कि उनके ऊपर आरोप क्या है और क्या किसी भी अनजान व्यक्ति के किसी के घर का पता पूछने भर से कोई कैसे आतंकवादी साबित हो जाता है। फिर भी ये दोनों पिछले लगभग दो सालों से जेल में बन्द हैं। इसके विपरीत स्वामी असीमानंद द्वारा संघ परिवार के बड़े नेताओं की आतंकी घटनाओं में कई बार संलिप्तता उजागर करने के बावजूद पुलिस और जाँच एजेंसियों ने उन्हें आज तक पूछताछ के लिए भी नहीं बुलाया। इससे साबित होता है कि आतंकवाद के नाम पर सिर्फ बेगुनाह मुसलामानों को फँसाने और असली आतंकियों को खुली छूट देने के नीतिगत सिद्धान्त पर खुले तौर पर अमल किया जा रहा है | रिहाई मंच के इस सराहनीय कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि इस दुश्चक्र में राज्य सरकार भी शामिल है | ऐसा न होता , तो उत्तर प्रदेश पुलिस अपने अधिकारों को ताक पर नहीं रखती | हुआ यह था कि उत्तर प्रदेश की स्पेशल पुलिस सेल ने ग़ैर क़ानूनी तौर पर  उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारों का अतिक्रमण करते हुए शकील और बशीर को पकड़कर दिल्ली स्पेशल सेल को दे दिया था | इस मामले सपा की सहमति साफ दिखती है | वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण का कहना है  कि शकील और बशीर जैसे निर्दोष मुस्लिम नवजवानों को आतंकवाद के झूठे आरोपों में फँसा कर सरकारें हिन्दुओं और मुसलमानों में दूरी पैदा करके अपनी जनविरोधी नीतियों के खिलाफ जनता के संयुक्त आंदोलनों को कमजोर करना चाहती हैं , लेकिन रिहाई मंच दूसरे संगठनों के साथ मिल कर सरकारों के इस नापाक साजिश को नाकाम करने का काम करेगा। उन्होंने कहा कि अवध की इस धरती के इतिहास से हमें सबक सीखना होगा | 
इस भूमि पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ यहाँ के हिन्दुओं और मुसलमानों ने बेगम हजरत महल और मौलवी अहमदुल्लाह  शाह के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई लड़ी थी। आज फिर से हमें ऐसी ही तहरीक चला कर साम्प्रदायिक और कार्पोरेट परस्त खुफिया एजेंसियों एवं सरकारों से मोर्चा लेते हुए अपने देश की गंगा-जमुनी विरासत की रक्षा करनी होगी । मुस्लिम मजलिस के नेता जैद अहमद फारूकी ने कहा कि सपा अपने को मुसलमानों की हिमायती बताती है, लेकिन मुसलमानों के वोट से सपा के कई बार सत्ता में पहुँचने के बावजूद मुसलमानों की स्थिति दयनीय बनी बुनी है। इस बात का अंदाज़ा सिर्फ इसी से लग जाता है कि प्रदेश में कुल दरोगाओं की संख्या 10197 है , जिनमें मुसलमानों की कुल संख्या 236 यानी 2:31 प्रतिशत है | कुल 8224 हेड कॉन्सटेबल में सिर्फ 269 मुसलमान हैं, 124245  सिपाहियों में सिर्फ 4430 यानी 4:37 मुसलमान हैं। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को आतंकवाद के नाम पर फँसाने की राजनीति मुसलमानों की नई पीढ़ी के मनोबल को तोड़कर उन्हें दोयम दजे का नागरिक बनाने की है जिसके खिलाफ आवाम को संघर्ष करना होगा। वरिष्ठ रंगकर्मी आदियोग ने कहा कि साम्प्रदायिक साजिशों के खिलाफ हमें सांस्कृतिक संघर्ष  भी करना होगा। आज मीडिया से लेकर सिनेमा तक के माध्यम से मुसलमानों की छवि बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है , जिसके खिलाफ हमें अपनी मिली जुली सांस्कृतिक परम्पराओं को आगे बढ़ाना होगा। वक्ताओं ने कहा कि सपा सरकार ने खालिद मुजाहिद की हत्या करवा कर साबित कर दिया है कि आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को छोड़ने के बजाय वह उनकी हत्या करवाने पर तुली है, जिसे मुसलमान समझ गया है और आने वाले लोकसभा चुनाव में वह इसका बदला भी लेगा। आजादी के बाद से मुसलमानों की संख्या को उच्च सरकारी नौकरियों में लगातार एक साजिश के तहत कम किया गया है और शकील, बशीर या अलीगढ़ से पीएचडी कर रहे गुलजार वानी जैसे पढ़े लिखे नवजवानों को जेलों में डाल कर उस संख्या को और सीमित किया जा रहा है। इसलिए इन साजिशों के खिलाफ नीतिगत स्तर पर संघर्ष करना होगा। जाँच ब्यूरो [ आई . बी . ] साम्प्रदायिक निगाहें सबसे ज्यादा पढ़े लिखे मुस्लिम युवकों पर है , क्योंकि मुसलमानों की यह पीढ़ी अपने अधिकारों के प्रति पहले से ज्यादा जागरूक है। ऐसे में जरूरत है कि देश में ऐसा वातावरण बने कि किसी भी नागरिक के मूलभूत मानवीय अधिकारों का हनन न हो सके | इसके लिए पहले क़दम के तौर पर गिरफ्तार बेगुनाह मुस्लिम नवजवानों को फ़ौरन रिहा किया जाए | 

Feb 19, 2014

शर्म तुमको मगर नहीं आती

शर्म तुमको मगर नहीं आती

कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

मौत का एक दिन मु'अय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती

जानता हूँ सवाब-ए-ता'अतो - ज़ुहद
पर तबीयत इधर नहीं आती

है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती

क्यों न चीख़ूँ कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं आती

दाग़-ए-दिल नज़र नहीं आता
बू-ए-चारागर नहीं आती

हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुमको मगर नहीं आती |



- मिर्ज़ा ग़ालिब 

ना मैं जानूं सेवा बंदगी

ना मैं जानूं सेवा बंदगी, ना मैं घंट बजाई। 
ना मैं शीश धरूं सिंहासन, ना मैं पुष्प चढ़ाई।
 सगरी दुनिया रहे सयानी, मैं ही इक बौराना।
-  कबीर

Feb 17, 2014

सदियों का संताप

सदियों का संताप 
दोस्‍तो !
बिता दिए हमने हज़ारों वर्ष
इस इंतज़ार में
कि भयानक त्रासदी का युग
अधबनी इमारत के मलबे में
दबा दिया जाएगा किसी दिन
ज़हरीले पंजों समेत.
फिर हम सब
एक जगह खडे होकर
हथेलियों पर उतार सकेंगे
एक-एक सूर्य
जो हमारी रक्‍त-शिराओं में
हज़ारों परमाणु-क्षमताओं की ऊर्जा
समाहित करके
धरती को अभिशाप से मुक्‍त कराएगा !
इसीलिए, हमने अपनी समूची घृणा को
पारदर्शी पत्‍तों में लपेटकर
ठूँठे वृक्ष की नंगी टहनियों पर
टाँग दिया है
ताकि आने वाले समय में
ताज़े लहू से महकती सड़कों पर
नंगे पाँव दौड़ते
सख़्त चेहरों वाले साँवले बच्‍चे
देख सकें
कर सकें प्‍यार
दुश्‍मनों के बच्‍चों में
अतीत की गहनतम पीड़ा को भूलकर
हमने अपनी उँगलियों के किनारों पर
दुःस्‍वप्‍न की आँच को
असंख्‍य बार सहा है
ताजा चुभी फाँस की तरह
और अपने ही घरों में
संकीर्ण पतली गलियों में
कुनमुनाती गंदगी से
टखनों तक सने पाँव में
सुना है
दहाड़ती आवाज़ों को
किसी चीख़ की मानिंद
जो हमारे हृदय से
मस्तिष्‍क तक का सफ़र तय करने में
थक कर सो गई है ।.
दोस्‍तो !
इस चीख़ को जगाकर पूछो
कि अभी और कितने दिन
इसी तरह गुमसुम रहकर
सदियों का संताप सहना है !
- ओमप्रकाश वाल्मीकि 
(जनवरी, 1989)

च दिलावारस्त दुजदे कि वकफ चरागदारद |


च दिलावारस्त दुजदे कि वकफ चरागदारद |
अर्थात , अपराध करना तो स्वीकार है , परन्तु अपराधी कहलाना पसंद नहीं | 

Feb 12, 2014

विदेश मालामाल नीति !

विदेश मालामाल नीति !


हमारे देश में डॉ . मनमोहन सिंह की अर्थनीति ही '' सर्वप्रिय '' बनकर उभरी है ! ? कांग्रेस इसे अपना ही रही है , भाजपा भी पीछे नहीं है | देखा जा रहा है कि पिछले कुछ वर्षों से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भारत को हब बना लिया है | यह विदेशी पूंजी ऐसी है , जिसे देश के प्राकृतिक संसाधनों और श्रम - शक्ति का दोहन करके विदेशों को मालामाल बनाने की कला बख़ूबी आती है | 


Feb 11, 2014

हिन्दी - गौरवमयी अमरता , अमृतमयी मधुरता

हिन्दी - गौरवमयी अमरता , अमृतमयी मधुरता  

आज हिन्दी दिवस है | यह कहने में संकोच नहीं कि अन्य दिवसों की भांति यह दिवस भी बस रस्मी और पारम्परिक तौर पर मना लिया जाता है हिन्दीवालों द्वारा , लेकिन कुछ पल भी नहीं बीतते अधिकांश पर अंग्रेज़ियत छा जाती है , यहाँ तक कि उनके सोचने - समझने की मेधा भी उसके प्रभावाधीन काम करने लगती है और उनमें बेजा दंभ , घमंड और दर्प आ जाता है ! फिर हम कलम के सिपाही न रहकर ' चिलम के सिपाही ' बन जाते हैं , अर्थात संस्कारहीनता ओढ़ लेते हैं ! ज़रा - सी विरोधी बात आई ही नहीं , यह कथित संस्कार भी विकृत होकर लतिहाव में बदल जाता है ..... हिंदी चिंदी - चिंदी होकर रह जाती है ...... | 
  अच्छी हिन्दी , प्यारी हिन्दी , न्यारी हिन्दी , बलिहारी हिन्दी की बात करनेवाले ' कुछ हितैषी ' जल्द ही कलम बेचने लगते हैं .... हिन्दी की खाकर अंग्रेज़ियत बघारने लगते हैं ! ऐसे में कैसे हो हिन्दी का समुचित अपेक्षित विकास ? कैसे हो स्तरीकरण ? कबीर , सूर , तुलसी , मीरा , रहीम , भूषण , रसखान , भारतेन्दु , महावीर आदि शिखर - पुरुषों की दुलारी हिन्दी का सही अर्थों में विकास तभी संभव है , जब निःस्वार्थ  भाव से संकीर्णता त्यागकर इसकी सेवा की जाए ... हम सदैव अमृत बाँटें , हलाहल स्वयं पिएं | हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं .... 

निस्पृहता

निस्पृहता मनुष्य का एक बड़ा गुण है , जो उच्च आचरण का मार्ग प्रशस्त करता है | रहीम जी का इसी भाव का एक दोहा है -- ''चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह । जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह | '' कहने का तात्पर्य यह कि जिन्हें कुछ नहीं चाहिए वे राजाओं के राजा हैं, क्योंकि उन्हें न तो किसी चीज की चाह है, न ही चिंता और मन तो बिल्कुल बेपरवाह है।
- Dr . Muhammad Ahmad

Feb 9, 2014

तेरे अर्दब में आना था क्यों नहीं बताया था


तेरे अर्दब में आना था क्यों नहीं बताया था ,
अहमन्यता तेरी देख पहचानने आया था |
- मोहित 

अब किसी से गिला - शिकवा नहीं मुझे

अब किसी से गिला - शिकवा नहीं मुझे    
अपने तो थे नहीं ,  पराये हो गये 
सूरतें जो दिल को कुछ बहला सकतीं  
सीरतें तो थीं नहीं , बिस्मिल हो गये  
सब्र की बात पढ़ता - सुनता रोज़ हूँ 
वसीले तो थे नहीं , बेसब्रे हो गये 
अब आंधियां भी आह में आती हैं 
ठौर तो थी  नहीं , खंडहर हो गये   
किस कदर दाद दूँ उन जफ़ाओं का  
आग तो थी नहीं , दीवाने हो गये 
मर - मरके जीने की आदत कहाँ  
ज़िन्दगी तो थीं नहीं , ज़िन्दा हो गये 
दुनिया को फानी यूँ  समझ रखा था  
असलियत तो थी नहीं ,' मोहित ' हो गये |  
- अहमद ' मोहित '


Feb 7, 2014

सेठ है , शोषक है , नामी गलाकाटू है


सेठ है , शोषक है , नामी गलाकाटू है ,
गालियाँ भी सुनता है , भारी थूकचाटू है |
चोर है , डाकू है , झूठा - मक्कार है ,
क़ातिल है , छलिया है , लुच्चा और लभार है |
जैसे भी टिकट मिला , जहाँ भी टिकट मिला ,
शासन के घोड़े पर वही सवार है |
उसी की जनवरी , उसी का अगस्त है ,
बाक़ी सब दुखी है , बाक़ी सब मस्त है |
गुंडों की है चौकड़ी , गुंडा ही मस्त है ,
उन्हीं की है जनवरी , उन्हीं का अगस्त है |
महल आबाद है , झोपड़ी उजाड़ है ,
गरीब की बस्ती में उखाड़ है , पछाड़ है |
मंत्री ही सुखी और मंत्री ही मस्त है ,
उसी की जनवरी , उसी का अगस्त है |
- महान कवि बाबा नागार्जुन  
[ वैद्यनाथ मिश्र ] 

क्या असीमानन्द सच्चे हैं ?

क्या असीमानन्द सच्चे हैं ?

क्या यह सच है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कई बड़े नेता भी आतंकी घटनाओं में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल हैं ? अब संघ प्रमुख भी इसमें लिप्त नज़र आते हैं | ' कैरावैन ' नामक पत्रिका को दिए एक विस्तृत इन्टरव्यू में मालेगांव [ 2008 ] और समझौता ब्लास्ट [ 2007 ] के आरोपी असीमानंद ने दावा किया है कि संघ प्रमुख [ सरसंघ चालक ] मोहन भागवत को इन धमाकों की जानकारी ही न थी , उन्होंने इसकी मंज़ूरी दी थी और उसे आशीर्वाद भी दिया था।इस सिलसिले में वे संघ के एक बड़े नेता इन्द्रेश कुमार का नाम पहले ही ले चुके हैं | ' कैरावैन  ' ने असीमानंद से बातचीत के आडियो टेप्स भी जारी किए हैं।  जबकि मामले को बढ़ता  असीमानंद के वकील ने कहा है कि ऐसा कोई इंटरव्यू नहीं लिया गया है। संघ ने भी असीमानंद से बातचीत के टेप्स को फर्जी करार दिया है , लेकिन किसी ने अपने बयान की पुष्टि नहीं की है | 
इसी बीच कांग्रेस के महासचिव मधुसूदन मिस्त्री ने नरेंद्र मोदी पर संदेह जताते हुए कहा है कि उन्हें 2002 के गांधीनगर [ गुजरात ] स्थित अक्षरधाम मन्दिर पर आतंकी हमले और जुलाई 2008 में अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट के बारे में पहले से जानकारी थी , हालाँकि इन्होंने कोई प्रमाण नहीं दिया | जबकि मैगजीन 'कैरावैन' ने अपनी कवर स्टोरी में दावा किया है कि उसने दो साल के दौरान असीमानंद से चार बार बातचीत की। इस बातचीत के आधार पर मैगजीन ने दावा किया है कि जुलाई 2005 में असीमानंद और सुनील जोशी सूरत में संघ नेताओं मोहन भागवत और इंद्रेश कुमार से मिले थे। उस समय मोहन भागवत संघ प्रमुख नहीं थे। सुनील जोशी की 20 दिसंबर 2007 को देवास [ मध्य प्रदेश ] में हत्या कर दी गई थी , जिसके सिलसिले में मालेगांव कांड की मुख्य आरोपी प्रज्ञा ठाकुर को गिरफ्तार किया गया था |
 इंटरव्यू में असीमानंद ने बताया कि सुनील जोशी ने मोहन भागवत को देशभर में मुस्लिमों को निशाना बनाकर ब्लास्ट का प्लान बताया था। संघ के इन दोनों नेताओं ने इसकी मंजूरी दी। भागवत ने कहा था, 'तुम यह कर सकते हो। हम इसमें शामिल नहीं होंगे। लेकिन अगर तुम यह कर रहे हो तो हमें अपने साथ ही समझो।' मालेगांव ब्लास्ट में तीस लोग मारे गए थे | समझौता ब्लास्ट में  पाकिस्तान के रहने वाले दर्जनों की मौत हो गई थी। बम धमाके में कुल 68 लोगों की मौत हुई थी। नेशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी ने समझौता ब्लास्ट के मामले में असीमानंद, लोकेश शर्मा, राजेंद्र पहलवान, कमल चौहान को आरोपी बनाया था। असीमानंद पर ब्लास्ट करवाने में मदद देने का आरोप है जबकि राजेंद्र पहलवान, लोकेश शर्मा और कमल चौहान पर रेल में बम लगाने का आरोप था। इससे पहले एनआईए ने 20 जून 2011 को स्वामी असीमानंद समेत अन्य के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। 
असीमानंद ने अदालत में पहले ही बहुत - सी बातें मान ली हैं | वह  अदालत में अपराध प्रक्रिया संहिता के अनुच्छेद 164 के तहत संबध्दता का इकबाल कर चुका है जो साक्ष्य को कानूनी तौर पर बाध्यकारी बनाता है। उस पर अपना बयान वापस लेने के लिए कोई भी दबाव कारगर सिध्द नहीं हुआ। उसने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेता इन्द्रेश का नाम उस हिन्दू आतंक मोडयूल के पीछे मस्तिष्क के तौर पर लिया, जिसे मोडयूल पर अजमेर, हैदराबाद, समझौता एक्सप्रेस और दो बार मालगांव में आतंकी विस्फोट कराए थे। धन की व्यवस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक अन्य कार्यकर्ता सुनील जोशी ने कराई थी, जिसका स्वामी से लगभग छह वर्ष पूर्व परिचय कराया। दो अन्य राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने संबध्द जन संदीप और रामजी कलसांगरा 'हिन्दू मंदिरों पर बम हमलों' की बदला लेने के लिए उनके साथ मिल गए। वे दोनों फरार हैं।
 सरकार ने उनके बारे में सूचना देने पर दस-दस लाख का पुरस्कार घोषित किया है। मई, 2008 में, आतंकवादियों के एक ग्रुप ने कई बैठकों के बाद हैदराबाद, मालेगांव, अजमेर शरीफ और अलीगढ़ विश्वविद्यालय पर आतंकी हमले की रूपरेखा रोड मैप तैयार की। स्वामी ने 26 पृष्ठों के इकबालिया बयान में कह चुका है, 'मैंने सुझाव दिया कि पहला बम मालेगांव में रखा जाए क्योंकि हमारे स्थान के समीप है और वहां 80 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। मैंने यह भी कहा कि चूंकि स्वतंत्रता के समय हैदराबाद के निजाम ने पाकिस्तान के साथ जाना चाहा था, अत: हैदराबाद को सबक सिखाया जाए और वहां बम रखा जाना चाहिए।' असीमानंद ने बताया कि जोशी ने उसे बताया था कि 'उसके लोगों ने षड़यंत्र क्रियान्वित कर दिया है।' स्वामी ने यह भी माना कि उसने अजमेर शरीफ का चयन किया था 'जहां बड़ी संख्या में हिन्दू जाते हैं ताकि हिन्दू वहां जाने से भय खाएं।' 
उसने यह भी कहा कि अ.मु.वि. में भी बम रखे जाएं, क्योंकि वहां अनेक मुस्लिम युवक अध्ययन करते हैं। स्वामी ने यह भी बताया कि मेरे सुझाव को प्रत्येक ने स्वीकार किया। असीमानंद के इंटरव्यू से कुछ और तथ्यों की पुष्टि हो गई है | पुख्ता सबूत मिलने के बाद ही मालेगांव कांड में फर्ज़ी तौर पर फांसे गए मुस्लिम नवजवानों की रिहाई हो पाई , लेकिन इससे मुस्लिम समुदाय की जो छवि बिगाड़ी गई , उसकी भरपाई शायद नहीं हो पाई | और तो और राजनीतिक स्तर पर भी मुसलमानों की छवि के साथ खिलवाड़ की एक मुहिम - सी चला दी गई है , जो बहुत ही अफ़सोसनाक और निंदनीय होने के साथ त्याज्य है |सांप्रदायिकों की बात छोड़ दीजिए , राहुल गाँधी तक इसमें लिप्त नज़र आते हैं ! 
मिसाल के तौर पर , उन्होंने पिछले दिनों पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई एस आई  के मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ितों के संपर्क में होने की झूठी बात  उछाल दी थी | अब केंद्रीय गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह ने विगत पांच फरवरी को राहुल गांधी के इस बयान को एक तरह से खारिज करते हुए साफ किया कि ऐसी कोई खुफिया जानकारी नहीं है, जिसमें यह पता चले कि आईएसआई ने मुजफ्फरनगर दंगों के पीड़ितों से संपर्क किया था । उन्होंने राज्यसभा में बीजेपी नेता प्रकाश जावड़ेकर के सवाल के लिखित जवाब में यह जानकारी दी। सिंह ने बताया कि खुफिया एजेंसी आईबी की ओर से गृह मंत्रालय के पास ऐसा कोई अलर्ट नहीं आया था। इससे राहुल गांधी एक बार फिर इस बयान को लेकर विपक्ष के निशाने पर आ सकते हैं। दिल्ली पुलिस ने जनवरी में दावा किया था कि लश्कर के दो संदिग्ध सदस्यों ने मुजफ्फरनगर में दो लोगों से मुलाकात की थी। हालांकि पुलिस ने इस बात से इनकार किया था कि दोनों दंगा पीड़ित थे या उनकी वहां की हिंसा से कोई संबंध था। 
उल्लेखनीय है  कि राहुल गांधी ने पिछले साल अक्टूबर में मध्य प्रदेश के इंदौर में विधानसभा चुनाव की रैली के दौरान यह विवादित बयान दिया था। उन्होंने कहा था,'परसों मेरे ऑफिस में इंटेलीजेंस का एक अफसर आया। मैंने उससे पूछा कि भैया मुजफ्फरनगर में क्या हो रहा है? उसने बताया कि राहुल जी मैं आपको क्या बताऊं। मुजफ्फरनगर में जो आग लगी है... ऐसे 10-15 मुसलमान लड़के हैं, जिनके भाई-बहनों को मारा गया है। पाकिस्तान की इंटेलिजेंस एजेंसी के लोग उन लड़कों से बात कर कर रहे हैं।' उनके  इस बयान को जहां बीजेपी ने मुद्दा बनाया था, वहीं उन्हें पार्टी के भीतर से ही विरोध का सामना करना पड़ा था। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस बयान के लिए राहुल गांधी को माफी मारने की सलाह तक दे डाली थी । अब सच्चाई सामने आ गई है और मुसलमानों की छवि ख़राब करने के दुश्चक्र का एक बार फिर पर्दाफ़ाश हो चुका है | आज इस बात की बहुत सख्त ज़रूरत है कि आतंक के सही उपकरणों ,सौदागरों और पैरोकारों की पहचान की जाए और उनको सख्त से सख्त सज़ा दी जाए एवं किसी भी कौम के खिलाफ़ ग़लतफ़हमियाँ और दुष्प्रचार न किया जाए |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Feb 5, 2014

दर्शन - दिग्दर्शन

दर्शन - दिग्दर्शन 
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भई , सुना बहुत है 
वह दर्शन - दिग्दर्शन 
दर्पण का .....
जितना देखो 
उतना ही दीखता 
न अथ  है 
न अंत है 
दर्पण के जीवन का 
टूटकर भी 
दिखाता रहता 
जलवा !
कण भर ही 
क्यों न सही 
सूर्य से जुगनू बनकर 
ही सही .....
भई , सही सुना है 
कण का महत्व 
हर कण 
जानता है 
समझता है 
हर कण देवता है 
जिसका आदि है 
न अंत 
शाश्वत सत्य है 
किसी का 
अथ  - अंत नहीं |
- अहमद ' मोहित '


काल - चक्र

काल - चक्र 
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श्रमिक बनकर 
ईंट - पत्थरों से 
जो दीवार उठाई मैंने 
छत बनाकर 
पलस्तर , रंग - रोगन से 
जिसे मनोहारी 
बनाया मैंने ....
अफ़सोस ....
आज भर ही दिहाड़ी ?
आज मेरे काम का अंतिम दिन है 
जाता हूँ साब !
फिर नया घर बनाने 
यही काल - चक्र है 
मेरे जीवन का |
- अहमद ' मोहित '

ये नसीब के खेल हैं , सुनते थे


ये नसीब के खेल हैं , सुनते थे 
नित आशाओं के जाल बुनते थे 
जब मेरे घर उगे पर्वत के पौधे 
अपनी मेहनत के फल हैं,चुनते थे |
- अहमद ' मोहित '

Feb 4, 2014

वसंतोत्सव

वसंतोत्सव पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं ...


अभिलाषा है यही हम सबकी 
सद्भावों से हो मन का श्रृंगार 
वसंत उपवन के इन सुमनों की 
सुगंध विकीर्ण हो बन सद्विचार |

भैया फेंकू !!!

भैया फेंकू !!!
एक ज़माना था आज़ादी के पहले का , जब राजनीति की आग में तपकर लोग कुंदन बनते थे . राजनीति से जुड़ने का मतलब तब तपस्या होती थी . समाज सर - आंखों पर बिठाता था . राजनीतिक आन्दोलन से जुड़े व्यक्तित्वों का पता नहीं क्या हुआ है कि आज़ादी के बाद राजनीति की आग में जलनेवाले अक्सर कोयला साबित हो रहे हैं  . क्या भैया फेंकू जी इसके अपवाद हैं ?  

Feb 1, 2014

बेहद दुखद - निंदनीय

बेहद दुखद , निंदनीय

किसी की हत्या हो जाए , फिर भी राजनीति जारी रहे ..... भारतीय राजनीति की इसे दुर्गति कहें या कुछ और .... दिल्ली के कांग्रेस विधायक हारून यूसुफ ने फरमा दिया है कि नस्लभेदी टिप्पणी की शुरुआत ' आप ' के मंत्री सोमनाथ भारती ने की थी .... इस प्रकार वे 18 वर्षीय नीडो तानियम के हत्यारों - फरहान और अकरम को बचाने में जुट गए हैं ....  बेहद दुखद निंदनीय - भर्त्सनीय ....