Mar 19, 2014

इनका क्या क़सूर ?

इनका क्या क़सूर ?

लोकसभा चुनाव का ऐलान हो चुका है , फिर भी पुलिस की पूर्वाग्रही कार्रवाईयों का न रुकना वाक़ई हैरतअंगेज और अफ़सोसनाक है | मुंबई पुलिस पर विगत 13 मार्च को पता नहीं कौन - सी आफत आयी कि उसने देर रात अस्सी मुसलमानों को सोते से जगाकर मुंब्रा इलाक़े के रशीद कंपाउंड को भर दिया | अब जब इस कारस्तानी की शिकायत अल्पसंख्यक आयोग से की गयी है , पुलिस को जवाब देते नहीं बन रहा है
पुलिस की कार्रवाई के बाद स्थानीय लोगों में रोष स्वाभाविक है , जबकि पुलिस के मुताबिक़ किसी को हिरासत में नहीं किया गया था, केवल पूछताछ के लिए लाया गया था | पुलिस पर यह आरोप भी है कि उसने मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन किया और इन लोगों को बिना कोई कारण बताए कई घंटे तक थाने में बिठाकर रखा
मानवाधिकार आयोग और अल्पसंख्यक आयोग से शिकायत करनेवाले 26 वर्षीय मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं एडवोकेट जनाब शहजाद पूनावाला कहते हैं कि ठाणे ज़िले के एसीपी अमित काले की सरपरस्ती में लगभग दो सौ पुलिसकर्मियों को साथ लेकर यह दबिश की कार्रवाई की गयी और बेक़सूर लोगों को सताकर मुसलमानों की छवि ख़राब करने की पूर्वनियोजित कोशिश की गयी |
पुलिस ने जिन मुसलमानों को उठाया , उनमें स्कूल में पढ़ रहे लड़कों से लेकर अस्सी साल के बुज़ुर्ग तक शामिल हैं जिन लोगों को थाने ले जाया गया था उनमें 19 साल के मोहसिन और 20 साल के रमीज़ भी शामिल थे | मोहसिन कहते हैं,"मैंने अभी 12वीं कक्षा की परीक्षा दी है. जब मैंने पुलिस को यह बताया तो उन्होंने कहा कि तुम जेबकतरे लगते हो |" एनसीपी के स्थानीय विधायक जीतेंद्र आव्हाड़ के हस्तक्षेप के बाद मोहसिन को पुलिस ने छोड़ा |
एक शायर उबैद आज़म आज़मी को पुलिस ने उस वक्त पकड़ लिया , जब वे मुशायरे से लौट रहे थे | उनका कहना है कि पुलिस ने अपना परिचय देते पर भी हिरासत में ले लिया | रमीज़ के मुताबिक़ ,"रात में क़रीब दो बजे के आसपास पुलिसवाले दरवाज़ा खटखटाने लगे. मेरे घर में अम्मी और बहन सो रहीं थीं | मैं अंदर बेडरूम में सो रहा था | अचानक पुलिस के आने से सब लोग घबरा गए | मेरी मां दिल की मरीज़ हैं | उनकी तबीयत बिगड़ने लगी | पुलिसवालों ने मुझे पकड़ा और कहा- चल गाड़ी में बैठ | " एसीपी अमित काले ने बताया, " किसी को भी हिरासत में नहीं लिया गया था | उन्हें केवल पूछताछ के लिए लाया गया था |जब बाहर लोगों ने हंगामा करना शुरू किया, तो उनसे पूछताछ भी पूरी नहीं हो पाई | ''

पुलिस का कहना है कि चुनाव के अवसर पर असामाजिक तत्वों के ख़िलाफ़ यह दबिश थी , मगर जिस तरह से इसे अंजाम दिया गया , उस पर सवालिया निशान लगना लाज़िमी है | जनाब पूनावाला का यह कहना उचित है कि पुलिस की यह कार्रवाई भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के ख़िलाफ़ है , जिनमें जीवन - सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की ज़मानत दी गयी है | अक्सर देखा जाता है कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ दुराग्रहपूर्ण कार्रवाईयां करती रहती है और उसके इस करतूत को हतोत्साहित भी नहीं किया जाता ! ज़ाहिर है , यह स्थिति देश के नागरिकों के लिए ही नहीं देश के लोकतंत्र और भविष्य के लिए खतरनाक है | इस पर रोक लगाने के लिए गंभीर प्रयास की ज़रूरत है |
- डॉ . मुहम्मद अहमद

Mar 17, 2014

देख बहारें होली की

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़म शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की।
हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे।
कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे।
दिल भूले देख बहारों को, और कानों में आहंग भरे।
कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे।
कुछ घुंघरू ताल झनकते हों, तब देख बहारें होली की॥
गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हों और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की॥
और एक तरफ़ दिल लेने को, महबूब भवौयों के लड़के।
हर आन घड़ी गत भिरते हों, कुछ घट घट के, कुछ बढ़ बढ़ के।
कुछ नाज़ जतावें लड़ लड़ के, कुछ होली गावें अड़ अड़ के।
कुछ लचकें शोख़ कमर पतली, कुछ हाथ चले, कुछ तन फड़के।
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की॥
यह धूम मची हो होली की, और ऐश मज़े का झक्कड़ हो।
उस खींचा खींचा घसीटी पर, भड़ुए रंडी का फक़्कड़ हो।
माजून, शराबें, नाच, मज़ा और टिकियां, सुल्फ़ा कक्कड़ हो।
लड़-भिड़ के 'नज़ीर' भी निकला हो, कीचड़ में लत्थड़ पत्थड़ हो।
जब ऐसे ऐश महकते हों, तब देख बहारें होली की॥
- नज़ीर अकबराबादी 

Mar 16, 2014

इंसानियत की बक़ा ?


इंसानियत की बक़ा वो चाहते बहुत हैं 

सालेह समाज को वो भाते बहुत हैं 

जब आया मौक़ा तपकर कुंदन बनने का 

' हुलूल ' कर वो मन को भरमाते बहुत हैं |

 - मोहित 

Mar 15, 2014

होली की मुबारकबाद


होली के मुबारक पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं  .....  मुबारकबाद 
इस अवसर पर जबलपुर [ म . प्र . ] के यशी कवि भाई सनातन कुमार वाजपेयी ' सनातन ' जी की ये गीत - पंक्तियाँ संकल्प स्वरूप आप सबकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ ---  आइए इन्हें जीवन में उतारें और जिन महानुभावों के जीवन में पहले से मौजूद हैं , वे इन्हें फिर से दुहराने का कष्ट करें ----
आओ होली पर्व मनाएं 
काम , क्रोध , पाखंड , दंभ , मद 
आओ आज जलाएं  |  ....  आओ ....
जन - जन के दुःख - दर्द दूर कर 
सुघढ़ समाज बनाएं |
भय , आतंक मिटाएं जग से 
सबको सुख पहुंचाएं  |  .... आओ  ....
आपस के सब भेद भूल हम
सबको गले लगाएं  |
मिलन  पर्व मधु - ऋतु की वेला 
दूरी सभी मिटाएं  |  ...  आओ  ....
आम , पलाश सदृश हो सज्जित 
जी भर प्रेम लुटाएं | 
कोकिल - सी मधुरिम वाणी से 
सबके प्रिय बन जाएं |  .....  आओ   .....
झूम - झूम नाचें ख़ुशियों में 
भाल अबीर लगाएं |
भर पिचकारी रंग उलीचें 
सरस नेह सरसाएं |  ...  आओ   ... 
कलुष मिटाएं जग के सारे 
भू को स्वर्ग बनाएं 
वसुधा ही परिवार हमारा 
पावन मंत्र गुंजाएं |   ....  आओ    ....

 

Mar 13, 2014

कब्रिस्तानों और अन्य वक्फ़ संपत्तियों से अतिक्रमण हटाएं

कब्रिस्तानों और अन्य वक्फ़ संपत्तियों से अतिक्रमण हटाएं  
पूरे देश में क़ब्रिस्तानों और वक्फ़ की अन्य ज़मीनों पर अवैध क़ब्ज़े के कई मामले अदालतों में लंबित हैं , तो कई ऐसे हैं , जो जान - बूझकर  विवादित बना दिए गए हैं | दिल्ली के ज़ोरबाग स्थित करबला का मसला पिछले दिनों चर्चा में रहा | दिल्ली के ही बटला हाउस क़ब्रिस्तान पर से अतिक्रमण हटाने की मांग ज़ोर पकड़ती जा रही है | वक्फ़ संपत्तियों पर अतिक्रमण के सिलसिले में विरोध - प्रकटन भी होता रहता है , मगर यह भी सच है कि अब कुछ मुसलमान बढ़े असंतोष - आक्रोश के कारण ऐसे प्रदर्शन भी आयोजित कर लेते हैं , जिनसे आम जनता की परेशानियाँ बढ़ जाती हैं | 
इस स्थिति से हरहाल में बचना होगा | राजधानी दिल्ली परिक्षेत्र की एक और घटना इसकी गवाह बन चुकी है | पिछले शबे बरआत पर कुछ मुस्लिम नवजवानों ख़ासकर बाइकर्स ने दिल्ली की सड़कों पर ऊधम मचाया था | ताज़ा घटना भी पसंदीदा नहीं है , बल्कि निंदनीय और त्याज्य है | घटनाक्रम यह है कि  दिल्ली के ज़ोरबाग स्थित  करबला में पिछले दिनों आयोजित मजलिस में पड़ोसी राज्यों से शिरकत करने जा रहे शिया समुदाय के लोगों ने  दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर स्थित यूपी गेट पर दिल्ली पुलिस द्वारा वापस भेजे जाने से नाराज होकर अपने सैकड़ों वाहनों को आड़ा तिरछा लगाकर राष्ट्रीय राजमार्ग 24 पर जाम लगा दिया और यूपी रोडवेज की एक बस सहित चार वाहनों को आग के हवाले कर दिया। हरकत में आई गाजियाबाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को काबू में किया। 
प्रदर्शनकारी सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे। दोपहर तकरीबन एक बजे लगा भीषण जाम लगभग दस घंटे बाद ही खुल सका था | लखनऊ जानेवाले इस राजमार्ग पर यातायात बिलकुल ठप रहा | लोगों को काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा | यूपी गेट से लेकर निज़ामुद्दीन तक वाहनों की लंबी लाइन लग गई | मजलिस-ए-हिंद के महासचिव मौलाना सैयद कल्बे जवाद के नेतृत्व में दिल्ली में भी जोरदार विरोध-प्रदर्शन किया गया।
नाराज शिया समुदाय के लोगों ने यूपी गेट पर तीन सौ बस, कार और जीपों के काफिले को लेकर जाम लगाना शुरू कर दिया। इस दौरान उनकी पुलिस के साथ कई बार झड़पें हुई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, शाम करीब चार बजे एक रोडवेज बस के पीछे किसी ने पेट्रोल डालकर आग लगा दी। इससे बस में सवार यात्रियों में अफरा-तफरी मच गई और लोग खिड़की-दरवाजे से कूदकर भागने लगे। इस दौरान लिंक रोड पर स्विफ्ट कार व यूपी गेट पुलिस चौकी के सामने एक इनोवा गाड़ी को आग लगा दी गई।
 दिल्ली की सीमा में गाजीपुर की ओर बढ़ रहे एक मिनी ट्रक को भी आग के हवाले कर दिया गया।लोगों का आरोप था कि करबला की भूमि पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल के एक सहयोगी ने कब्जा कर रखा है। जोरबाग स्थित दरगाह शाह-ए- मर्दा प्रबंधक कमेटी व जोरबाग बड़ा करबला (वक्फ) की जमीन को लेकर सालों से शिया समुदाय व राजधानी नर्सरी के संचालक के बीच विवाद चल रहा है | बताया जाता है कि संचालक महोदय कांग्रेस नेता अहमद पटेल के क़रीबी हैं | इसी वजह से पटेल की गिरफ़्तारी की मांग की जा रही है | यह मामला हाई कोर्ट में विचाराधीन है।
 इसी मामले को लेकर करबला में  विगत 10 मार्च को मौलाना कल्बे जव्वाद ने मजलिस बुलाई थी। बताया जा रहा है कि इस मुद्दे को लेकर कल्बे जवाद के नेतृत्व में चार मौलाना 24 अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय भी पहुंचे, लेकिन उनकी मांग नहीं मानी गई। करबला में चेहल्लुम मनानेवालों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने वहां महिलाओं और बच्चों की भी पिटाई की | कुछ लोगों का कहना था कि जिस दरवाज़े को लेकर विवाद हुआ था उस दरवाज़े को हटाकर वहां नगर निगम की दीवार बनाई जानी थी , मगर अभी तक उसने यह क़दम नहीं उठाया , जिसके चलते विवाद शांत नहीं हो सका |  
 जोरबाग स्थित दरगाह शाह-ए-मर्दा प्रबंधक कमेटी व जोरबाग बड़ा करबला (वक्फ) की जमीन को लेकर कई वर्षों से शिया समुदाय व राजधानी नर्सरी के संचालक के बीच विवाद चल रहा है | बताया जाता है कि संचालक महोदय कांग्रेस नेता अहमद पटेल के क़रीबी हैं | इसी वजह से पटेल की गिरफ़्तारी की मांग की जा रही है , जो राजनीति से प्रेरित मालूम होती है | जब मामला अदालत में लंबित हो , तो फ़ैसले का इन्तिज़ार करना ही बेहतर है | वक्फ बचाओ का आह्वान करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आवास का घेराव करने का एलान किया गया था। इस पूरे मामले में पहले की तरह पुलिस की भूमिका नकरात्मक रही | जानकारों का मानना है कि पुलिस अगर लापरवाही न बरतती तो यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो जाता |
-  डॉ . मुहम्मद अहमद 

Mar 11, 2014

राजनीति में विद्रूपता


राजनीति में जो विद्रूपता आई है , उससे लोग खिन्न हैं  ... यहाँ राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता का सवाल कुछ अधिक ही महत्वपूर्ण हो जाता है . इसका सार्थक जवाब न मिलने से उदासीनता का भाव उत्पन्न होता है . फिर मेरे जैसे लोग भी बेज़ार होने लगते हैं .... कुछ विकल्प की तलाश करते हैं , जिसकी अनुपस्थिति उन्हें गहरी निराशा की ओर खींच ले जाती है .... गंभीर स्थिति है .

इस्लाम में समानता का व्यावहारिक दृष्टान्त

इस्लाम में समानता का व्यावहारिक दृष्टान्त


'' जब इस्लाम आया, उसे देश में फैलने से देर नहीं लगी। तलवार के भय अथवा पद के लोभ से तो बहुत थोड़े ही लोग मुसलमान हुए, ज़्यादा तो ऐसे ही थे जिन्होंने इस्लाम का वरण स्वेच्छा से किया। बंगाल, कश्मीर और पंजाब में गाँव-के-गाँव एक साथ मुसलमान बनाने के लिए किसी ख़ास आयोजन की आवश्यकता नहीं हुई। ...मुहम्मद साहब ने जिस धर्म का उपदेश दिया वह अत्यंत सरल और सबके लिए सुलभ धर्म था। अतएव जनता उसकी ओर उत्साह से बढ़ी। ख़ास करके, आरंभ से ही उन्होंने इस बात पर काफ़ी ज़ोर दिया कि इस्लाम में दीक्षित हो जाने के बाद, आदमी आदमी के बीच कोई भेद नहीं रह जाता है। इस बराबरी वाले सिद्धांत के कारण इस्लाम की लोकप्रियता बहुत बढ़ गई और जिस समाज में निम्न स्तर के लोग उच्च स्तर वालों के धार्मिक या सामाजिक अत्याचार से पीड़ित थे उस समाज के निम्न स्तर के लोगों के बीच यह धर्म आसानी से फैल गया...। ''
‘‘...सबसे पहले इस्लाम का प्रचार नगरों में आरंभ हुआ क्योंकि विजेयता, मुख्यतः नगरों में ही रहते थे...अन्त्यज और निचली जाति के लोगों पर नगरों में सबसे अधिक अत्याचार था। ये लोग प्रायः नगर के भीतर बसने नहीं दिए जाते थे...इस्लाम ने जब उदार आलिंगन के लिए अपनी बाँहें इन अन्त्यजों और ब्राह्मण-पीड़ित जातियों की ओर पढ़ाईं, ये जातियाँ प्रसन्नता से मुसलमान हो गईं।
कश्मीर और बंगाल में तो लोग झुंड-के-झुंड मुसलमान हुए। इन्हें किसी ने लाठी से हाँक कर इस्लाम के घेरे में नहीं पहुँचाया, प्रत्युत, ये पहले से ही ब्राह्मण धर्म से चिढ़े हुए थे...जब इस्लाम आया...इन्हें लगा जैसे यह इस्लाम ही उनका अपना धर्म हो। अरब और ईरान के मुसलमान तो यहाँ बहुत कम आए थे। सैकड़े-पच्चानवे तो वे ही लोग हैं जिनके बाप-दादा हिन्दू थे...।
‘‘जिस इस्लाम का प्रवर्त्तन हज़रत मुहम्मद ने किया था...वह धर्म, सचमुच, स्वच्छ धर्म था और उसके अनुयायी सच्चरित्र, दयालु, उदार, ईमानदार थे। उन्होंने मानवता को एक नया संदेश दिया, गिरते हुए लोगों को ऊँचा उठाया और पहले-पहल दुनिया में यह दृष्टांत उपस्थित किया कि धर्म के अन्दर रहने वाले सभी आपस में समान हैं। उन दिनों इस्लाम ने जो लड़ाइयाँ लड़ीं उनकी विवरण भी मनुष्य के चरित्र को ऊँचा उठाने वाला है।’’

रामधारी सिंह दिनकर
 (प्रसिद्ध साहित्यकार और इतिहासकार)
‘संस्कृति के चार अध्याय’
लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1994
पृष्ठ-262, 278, 284, 326, 317

Mar 10, 2014

' फलकी ' हूँ , मीर हूँ


' फलकी ' हूँ , मीर हूँ 
' ज़मीर ' हूँ , हीर हूँ 
जलता हूँ , जलाता हूँ 
ज़हर बुझी तीर हूँ 
जनाब मेरी आपसे क्या तुलना ?
मैं अदना , हकीर हूँ 
वास नहीं , ' साँस ' नहीं 
मैं वह फ़कीर हूँ 
फ़क़त बहता नीर हूँ |
- मोहित 

देश की सुरक्षा का सवाल

देश की सुरक्षा का सवाल 

आदरणीय मित्रो , मेरे विचार  को आपने जिस कदर सराहा है और शब्दाभिव्यक्ति द्वारा मेरा उत्साहवर्धन किया है , उसके लिए मैं हरेक का तहेदिल से आभारी हूँ एवं शुक्रिया अदा करता हूँ .  दिली ख्वाहिश तो यह थी कि सभी मित्रो का व्यक्तिगत रूप से अलग - अलग शुक्रिया अदा करूं , लेकिन संख्या बहुत अधिक होने के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा है . क्षमा कीजिएगा . मेरा यह मानना है कि इस गंभीर समस्या पर पूरे देश में बस एक ही राय बने ... एक ही संकल्प उभरे .... एक ही आवाज़ गूंजे .
मेरे आत्मीय मित्रो , मेरे इस निवेदन पर ध्यान दीजिए .... आज जो स्थितियां हैं , सुरक्षा , मान - सम्मान और शांति की जो समस्याएं हैं , उन पर अपनी नीति - व्यवहार को  सम्यक रूप से देखते हुए क्या हम कह सकते हैं कि हमारा देश ज़िन्दा है . एक नहीं अनेक घटनाएं हैं ,जो देश के भविष्य को गर्त में खुलेआम ले जा रही हैं . तीन जुलाई 2013 को मेंधर सेक्टर में हमारे दो जवानों के सर काटे गये . अब पांच को शहीद किया गया . देश के किसी एक जवान की हत्या पूरे देश की हत्या के सदृश है , मगर हमारे राजनेताओं को क्या हो गया है , जो सत्ता के लिए पशुतुल्य हो गये हैं ? चीनियों का उत्पात सामने है . क्या कोई अदना राष्ट्र इन सबको यूँ ही सहन कर लेगा , कदापि नहीं . फिर हम तो स्वतंत्र , सम्प्रभु गौरवमयी राष्ट्र हैं . हम खामोश तमाशाई बनकर यह सब नज़ारा कब तक देखते रहेंगे ?     
आदरणीय मित्रो , आज सत्ताधारी अपना दायित्व भूल चुके हैं . जनता भी इसके लिए ज़िम्मेदार है .  कुछ लोग तो '' यथा राजा , तथा प्रजा '' जैसे हो गये हैं और बार - बार पौरुषहीनता / कायरता का विभिन्न रूपों में प्रदर्शन कर रहे हैं . ये किसी के भी सच्चे मित्र नहीं हो सकते .क्या ये नहीं जानते कि देश की सुरक्षा का प्रश्न सबसे बड़ा प्रश्न है ? 
-  Dr . Muhammad Ahmad

Mar 9, 2014

सोच - समझकर मतदान कीजिए

सोच - समझकर मतदान कीजिए 
देश की 16 वीं लोकसभा के चुनाव सात अप्रैल से 12 मई के बीच नौ चरणों में संपन्न होंगे | 543 संसदीय सीटों के परिणाम 16 मई को घोषित किए जायेंगे | इस बार पिछली लोकसभा की तुलना में लगभग दस करोड़ मतदाता अधिक हैं | चुनाव आयोग के अनुसार , इस बार लगभग 81 करोड़ 45 लाख मतदाता हैं , जो प्रत्याशियों का भविष्य तय करेंगे | पिछले चुनावों की भांति इस बार भी प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का जमकर दुरुपयोग हो रहा है | पेड एवं प्रायोजित चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों की खबरों के बीच ' पेड न्यूज़ ' के प्रकाशन - प्रसारण का धंधा खूब पनप रहा है | स्पष्ट है , यह कुप्रवृत्ति न तो लोकतंत्र के अनुकूल है और न ही निष्पक्षता के , अपितु यह गोरखधंधा है , जिस पर अविलंब रोक लगाने की आवश्यकता है | राजनीतिक दल मीडिया के दोहन के साथ ही चुनाव जीतने के अन्य अनैतिक , असंवैधानिक और अमर्यादित तिकड़म और उपक्रम अपना रहे हैं | लगता है , इन्हें लोकतंत्र की भावना की ज़रा भी चिंता नहीं ! धनबल , बहुबल और मीडियाबल जहाँ सक्रिय हों , वहां किसी भी तरह से निष्पक्षता की आशा बेमानी है | सबसे पहले धनबल के प्रकोप को लेते हैं | नई व्यवस्था के अनुसार , लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी अब सत्तर लाख रुपये खर्च कर सकते हैं | पहले यह धनराशि चालीस लाख थी | इसका अर्थ यह हुआ कि 543 सीटों पर 380 करोड़ दस लाख रुपये ही खर्च करने का वैधानिक प्रावधान है , लेकिन चुनाव विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बार चुनाव में अवैधानिक रूप से 18 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक खर्च होंगे |   वास्तव में यह धनराशि लोकतंत्र को और आहत करने के लिए लुटाई जा रही है | कहीं पैसे बांटे जाएँगे , तो कहीं मादक पदार्थ , तो कहीं अन्य सामग्रियां बांटी जाएँगी | कहने का तात्पर्य यह कि मत खरीदकर लोकतंत्र की दुहाई दी जाएगी | यहाँ एक सवाल यह भी उठता है कि कौन नहीं जनता इस वास्तविकता को ? फिर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की जाती ? इस मामले में चुनाव आयोग बिजूका बना नज़र आता है |
देश का एक अन्य महत्वपूर्ण विभाग - आयकर विभाग भी जानता है कि काला धन ही चुनाव के समय निकलकर सामने आता है , लेकिन उसने कभी कर्रवाई नहीं की ! इस धन को पकड़ने के लिए कभी कोई गंभीर प्रयास नहीं किया ! यह मौन समर्थन बताता है कि सभी लोकतंत्र को खोदने में लगे हैं | दूसरे शब्दों में देश के राजनीतिक दल काला धन रखना अपना अधिकार समझते हैं | इसी एक प्रमुख कारण से ये सूचनाधिकार क़ानून के तहत अपने को लाए जाने के ख़िलाफ़ रहे और सारे दल एकजुट होकर अंततः  इससे अपने को मुक्त कर लिया |    उल्लेखनीय है कि 11 जून, 2013 को केंद्रीय सूचना आयोग ने अपने एक फैसले में राजनीतिक दलों को सूचना आयोग कानून के तहत जवाबदेह माना था । आयोग की पूर्णपीठ ने राजनीतिक दलों का यह तर्क नहीं स्वीकार किया कि वे सरकारी सहायता से चलने, उनसे अनुदान प्राप्त करने वाले संगठन नहीं हैं , इसलिए वे इस कानून से मुक्त हैं। केंद्रीय सूचना आयोग का मानना है कि वे केंद्र सरकार की ओर से परोक्ष रूप से वित्तीय सहायता पाते हैं, मसलन रियायती दर पर जमीन या भवन आदि के आबंटन और आय कर में छूट और चुनाव के समय आकाशवाणी और दूरदर्शन पर मुफ्त प्रसारण की सुविधा आदि के रूप में। फिर, उनका कामकाज सार्वजनिक प्रकृति का है। आयोग के इस निर्णय से कांग्रेस, भाजपा, बसपा, राकांपा, माकपा, भाकपा यानी सभी प्रमुख राष्ट्रीय दल कुपित हो गई थीं और इस मामले मेंउनमें वामपंथ या दक्षिणपंथ का भेद नहीं रहा !
सवाल यह है कि राजनीतिक दल देश की जनता से इस सिलसिले में क्यों छिपना चाहते हैं? वे जनता को यह बताने के लिए क्यों तैयार नहीं होते कि उनका संचालन कैसे होता है और उनकी आय के स्रोत क्या हैं ? संभवत: उन्हें डर है कि एक बार उनकी आय के स्रोतों की जानकारी उजागर हो गई तो उस भ्रष्टाचार की पूरी कहानी सामने आ जाएगी जिसमें वे डूबे हुए हैं। लोकतंत्र के लिए इससे बड़ी विडंबना कोई और नहीं हो सकती कि राजनीतिक दल जनता के लिए जैसे नियम-कानून चाहते हैं वैसे अपने लिए नहीं चाहते ? राजनीतिक दलों के संचालन से जुड़ी जानकारियां कोई ऐसी नहीं जिनसे राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ती हो और इस कारण उन्हें सूचनाधिकार क़ानून से बाहर रखना आवश्यक हो। सूचना अधिकार कानून के निर्माण का उद्देश्य भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना है। जब यह स्पष्ट है कि सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ें राजनीतिक दलों तक जाती हैं तब इसका कोई औचित्य नहीं कि उन्हें सूचनाधिकार क़ानून से अलग रखा जाए | भारतीय चुनाव में बहुबल भी ख़ूब चलता है | दागियों को चुनाव से अलग रखने की क़वायद के बीच बाहुबलियों को टिकट देने में काफ़ी उदारता दिखाई गयी है | एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म [ ए डी आर ] और नेशनल वाच की रिपोर्टों के अनुसार , इस मामले में किसी भी दल ने संकोच से कम नहीं लिया है | स्पष्ट है , यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक स्थिति है | दूसरी ओर सुप्रीमकोर्ट का राजनीति से अपराधी तत्वों को बाहर रखने का निर्देश मौजूद है | इस पर रोक का अध्यादेश राहुल गाँधी के हस्तक्षेप के बाद वापस ले लिया गया था | सुप्रीमकोर्ट में दायर स्वयंसेवी संगठन ' लोक प्रहरी ' की  याचिका में कहा गया था कि जब संविधान में किसी भी अपराधी के मतदाता के रूप में पंजीकृत होने या उसके सांसद या विधायक बनने पर पाबंदी है, तो फिर किसी निर्वाचित प्रतिनिधि का दोषी ठहराए जाने के बावजूद पद पर बने रहना कैसे क़ानून के अनुरूप हो सकता है | याचिका के अनुसार , इस तरह की छूट देने संबंधी प्रावधान पक्षपातपूर्ण है और इससे राजनीति अपराधीकरण को बढ़ावा मिलता है | ताज़ा चुनाव के सिलसिले में यह बात बहुत साफ़ है कि राजनीतिक दल केवल सीट हथियाने में यकीन रखते हैं , उन्हें सुधार - कार्य की चिंता न के बराबर होती है | यह एप्रोच कितना आत्मघाती है , सहज ही समझा जा सकता है | अब चुनाव मीडियाबल को भी खुलकर इस्तेमाल किया जाता है और धनबल के सहारे जनता को भ्रामक सूचनाएं देकर मतदाताओं को आकर्षित किया जाता है | प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में विज्ञापनों और प्रायोजित समाचारों - कार्यक्रमों द्वारा जनमत तैयार करने की बात की जाती है , जो अक्सर झूठे तथ्यों पर आधारित होने के कारण लोकतंत्र विरोधी हो जाती है | इस बार के चुनाव में भी सांप्रदायिकता और फासीवाद का चलन बढ़ा है | आज के मतदाता काफ़ी जागरूक हैं | उन्हें पता है कि इन कुप्रवृत्तियों से देश का भला नहीं हो सकता | जो व्यक्ति अच्छे शील - स्वभाव वाला हो , उसे ही मत देना चाहिए | जो सांप्रदायिकता फैलाये , फासीवादी तरीक़ा अपनाये , न्याय और मानवाधिकार को पददलित करे , उसका किसी प्रकार समर्थन नहीं करना चाहिए | उसे किसी प्रकार के ' बल ' के प्रभाव में नहीं आना चाहिए |  
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Mar 8, 2014

भाषा की दो नदियाँ


हिंदी - उर्दू के स्रोत दो नदियों की भांति अलग - अलग हैं , लेकिन जब यही दो नदियाँ मिलकर बहने लगती हैं , तो कुछ दूरी के बाद यह बताना मुश्किल है कि इनमें बहने वाले पानी का कौन - सा भाग किस स्रोत का है |

किसी भी सूरत में क़ानून को हाथ में लेने की प्रवृत्ति को बढ़ावा न मिले

हमारे देश में एक तरफ़ जहाँ उन्नति - प्रगति हुई है , वहीं दूसरी ओर अस्वाभाविकता को बढ़ावा देने से तरह - तरह की समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं | विडंबना यह भी है कि अप्राकृतिक क़दमों को क़ानून के द्वारा पुष्ट कर दिया गया है ! हिन्दू मैरिज एक्ट को ही लीजिए | इसके द्वारा बहुविवाह पर रोक लगा दी गयी | चूँकि यह स्वाभाविक है , इसलिए राजनेता तक इसे भंग करते हैं और इस तरह क़ानून को तोड़ने का खमियाज़ा भुगतते हैं | अब उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी ने पिछले तीन मार्च को सार्वजनिक रूप से आखिरकार स्वीकार कर लिया कि रोहित शेखर उनके पुत्र हैं। इस पितृत्व मामले में तिवारी लंबे समय से रोहित के दावे को खारिज करते रहे । हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा पर अब ऐसा ही एक आरोप लगा है | कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी को उस समय बड़ा झटका लगा था , जब दिल्ली हाईकोर्ट में उनके रक्त के नमूने संबंधी डीएनए रिपोर्ट सार्वजनिक किया गया और उस रिपोर्ट के अनुसार पितृत्च वाद दायर करने वाले रोहित शेखर ही एनडी तिवारी के बेटे हैं | दिल्ली में रहने वाले 32 साल के रोहित शेखर का दावा किया था कि एनडी तिवारी ही उसके जैविक पिता हैं और इसी दावे को सच साबित करने के लिए रोहित और उसकी मां उज्ज्वला शर्मा ने पांच साल पहले यानी 2008 में अदालत में एन डी तिवारी के खिलाफ पितृत्व का केस दाखिल किया था |अदालत ने मामले की सुनवाई की और अदालत के ही आदेश पर 29 मई 2012 को डीएनए जांच के लिए एनडी तिवारी को अपना खून देना पड़ा था | देहरादून स्थित आवास में अदालत की निगरानी में एनडी तिवारी का ब्लड सैंपल लिया गया था | हैदराबाद के सेंटर फोर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायएग्नोस्टिक्स यानी सीडीएफडी ने ब्ल़ड सैंपल की जांच रिपोर्ट 27 जुलाई 2012 अदालत को सौंप दी थी | हालांकि एनडी तिवारी नहीं चाहते कि उनकी डीएनए टेस्ट रिपोर्ट सार्वजनिक हो इसलिए उन्होंने अदालत में इसे गोपनीय रखने के लिए याचिका भी दी थी लेकिन अदालत इसे खारिज कर दिया और इसे खोलने का आदेश जारी कर दिया और तिवारी के शेखर के जैविक पिता होने का दावा सही साबित हुआ | अब रोहित जायदाद में हिस्सा मांग रहा है | तिवारी इस पर खामोश हैं | तिवारी ने एक सार्वजनिक बयान में कहा, "मैं रोहित शेखर को अपने पुत्र के रूप में स्वीकार करता हूं। यह दो साल पहले ही साबित हो गया था जब दोनों के डीएनए मैच हुए थे। मुझे अपने पुत्र पर गर्व है। अब मैं इस मामले को यहीं खत्म करता हूं और सार्वजनिक रूप से रोहित को अपना पुत्र स्वीकार करता हूं।" मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार , रोहित दो मार्च की रात करीब 11.30 बजे तिवारी से मिले। उस दौरान तिवारी अपने पुत्र से भाव-विह्वल होकर मिले और उसे चूमा। ऐसे पिछले कई वर्षो में पहली बार हुआ। यह बैठक करीब ढाई घंटे चली। रोहित ने कहा, "मुझे खुशी है कि तिवारी ने मुझे अपना पुत्र स्वीकार किया। अब हम हर तरह से 21 अप्रैल को यह मामला जीतेंगे।" यह तो हुई एक बड़े राजनेता की बात
कांग्रेस के एक वर्तमान मुख्यमंत्री पर ऐसे ही आरोप लगे हैं | इंडियन नैशनल लोकदल के वरिष्ठ नेता और विधायक अभय सिंह चौटाला ने हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर एक पत्नी के रहते दूसरी शादी करने और दूसरी शादी से रजत नाम का एक 20 साल का बेटा होने का दावा किया है । चौटाला ने यह मामला गत तीन मार्च को हरियाणा विधानसभा की प्रेस गैलरी में उठाते हुए हुड्डा की दूसरी पत्नी होने का दावा करने वाली शशि के द्वारा देहरादून के फैमिली कोर्ट के सामने हिंदू मैरिज एक्ट के तहत दायर कराई गई शिकायत के दस्तावेज का ब्योरा भी दिया । इससे पहले हरियाणा विधानसभा में शून्यकाल शुरू होते ही आईएनएलडी के रामपाल माजरा ने यह मामला उठाया, लेकिन स्पीकर कुलदीप शर्मा ने इसे सदन की कार्यवाही से निकाल दिया। दूसरी तरफ, हुड्डा ने इस मामले पर कुछ भी नहीं कहा है, लेकिन उनके समर्थकों की ओर से इसे चरित्र हनन का मामला बताया गया है ।
अभय चौटाला ने दावा किया कि उनके पास इसका अदालती हलफनामा है, जिसमें देहरादून के प्रेम नगर की रहने वाली शशि ने 13 दिसंबर 2013 को देहरादून फैमिली कोर्ट में 11 नवंबर 1992 को हुए उनके विवाह को बहाल किए जाने की गुहार लगाई है । चौटाला ने बताया कि शपथ पत्र के मुताबिक, '1988-89 में शशि युवा कांग्रेस की सदस्य थीं और भूपेंद्र सिंह हुड्डा उस समय विपक्षी पार्टी में एक वरिष्ठ नेता थे। भूपेंद्र सिंह ने शशि को राजनीति में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और दोनों का मिलना-जुलना शुरू हो गया। भूपेंद्र सिंह ने विवाह करने का वायदा करके शशि को अपने प्रभाव में लिया और नई दिल्ली के जनपथ होटल में उससे संबंध बनाए। बाद में शशि को पता चला कि भूपेंद्र सिंह शादीशुदा हैं और उनकी पत्नी आशा जीवित है और एक बेटा भी है । शशि ने अदालत में दायर मामले में कहा कि जब उसने भूपेंद्र सिंह से इस धोखाधड़ी के संबंध में बात की तो राजनीतिक भविष्य का वास्ता देकर उन्होंने कहा कि आशा से उनका तलाक होने वाला है । उसके बाद भूपेंद्र सिंह ने घरवालों पर दबाव डालकर शशि का विवाह किसी अन्य व्यक्ति के साथ करा दिया, पर वह शादी नहीं चली । शशि ने अपनी शिकायत में कहा कि भूपेंद्र सिंह ने बताया कि उन्होंने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया है , लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं कर सकता । 11 नवंबर, 1992 को भूपेंद्र सिंह ने दिल्ली में शशि के साथ बिरादरी के रीति-रिवाज के अनुसार विवाह कर लिया । शशि ने अपनी शिकायत में बताया कि 1 फरवरी, 1994 को भूपेंद्र सिंह से शशि को एक बेटा हुआ, जिसका नाम रजत है । अभय सिंह चौटाला ने कहा कि वैसे वह किसी के पारिवारिक मामलों में दखल नहीं देते , लेकिन एक विधायक के नाते उनके पास ये दस्तावेज आए हैं, यह बेहद गंभीर मामला है । उन्होंने मांग की कि कांग्रेस तुरंत मुख्यमंत्री हुड्डा को पद से हटाए और सच्चाई सामने लाने के लिए डीएनए टेस्ट कराए । ज़ाहिर है , यह समस्या का समाधान नहीं है | इस क़ानून के चलते क़ानून तोड़ने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा | इसका हल यह है कि इस पर लगे प्रतिबंध को हटाया जाए | इस समस्या को स्थाई रूप से हल करने हेतु हमें इस्लामी क़ानूनों की ओर रुजू करना चाहिए | इस्लाम में सभी पत्नियों के साथ न्याय की शर्त के साथ एक समय में चार तक पत्नियाँ रखने की अनुमति है | कुछ सांप्रदायिक लोग मुस्लिम पर्सनल लॉ के खिलाफ़ साज़िश रचते और इसे खत्म करने की बात करते हैं , जो नितांत अनुचित और अकल्याणकारी है
- Dr . Muhammad Ahmad 

Mar 7, 2014

शालीन परिधान

बलात्कार से बचने के उपायों में शालीन कपड़े पहनने की बात एक ज़रूर है , लेकिन है यह एकपक्षीय और आत्मरक्षात्मक .  दिल्ली में और अन्य स्थानों पर पिछले दिनों बलात्कार की जितनी भी घटनाएं घटी हैं , उनमें कपड़े की कोई भूमिका नहीं है ..... छोटी - छोटी बच्चियों के साथ दुराचार !!! ??? ...... मानसिकता में ही सकारात्मक बदलाव इसका हल है ... क़ानून तो बहुत हैं , पर ? हमें स्त्री जाति को हरहाल में उसका नैसर्गिक गौरव एवं सम्मान देना होगा .

सबीह हत्याकांड : कब होगी कार्रवाई ?

सबीह हत्याकांड : कब होगी कार्रवाई ?

उत्तर प्रदेश पुलिस की एक के बाद काली करतूतें सामने आती जा रही हैं | कानपुर में डाक्टरों की निर्मम पिटाई में उपद्रवियों के साथ शामिल पुलिस सबीह हत्याकांड में भी अपना बर्बर चेहरा दिखा चुकी है | इस कांड में पुलिस ने जो पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की थी , उसके निवारण के लिए अब तक कोई क़दम न उठाया जाना अत्यंत निंदनीय और अफ़सोसनाक है | बीती 28 जनवरी को जिला इलाहाबाद के चंदापुर गांव के सबीह अख्तर पुत्र वसीमुद्दीन की इलाहाबाद के फाफामऊ इलाक़े के शांतिपुरम लेबर चौराहे पर सरेआम गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी। इंसाफ मांग रहे ग्रामीणों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और तकरीबन 50 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दबिश के नाम पर लूटपाट व महिलाओं से साथ अभद्रता की | इलाक़े में अब स्थिति सामान्य नहीं हो सकी है |
आरोप है कि रुदापुर गांव में पुलिस ने 31 जनवरी को रात में दबिश के नाम पर लूटपाट और महिलाओं से अभद्रता की। जिन लोगों ने इंसाफ की मांग की थी, उन पर फर्जी मुकदमे लाद दिए गये हैं। रुदापुर गांव  में दहशत का माहौल कायम है और परिवार के पुरुष सदस्य अभी भी गांव से बाहर हैं। जांच दल ने पाया कि पुलिस ने सांप्रदायिक मानसिकता से गांव के मदरसे में भी तोड़-फोड़ की । इलाक़े के लगभग तीस लोगों का आरोप है कि पुलिस सबीह के हत्यारों को बचा रही है | अब तक असली मुजरिम बचे हुए हैं | सफ़िया बेगम का कहना है कि 31 जनवरी की रात को एक सब इन्सपेक्टर ने कई पुलिसकर्मियों के साथ दीवार फांदकर घर में घुसने के बाद उत्पात किया | लूटपाट , तोड़फोड़ , मारपीट की और लोगों को धमकाया भी | दूसरी ओर विरोध प्रदर्शन में शामिल 40 लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया है , लेकिन दोषी पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गयी है |
रिहाई मंच राज्य कार्यकारिणी सदस्य अनिल यादव ने कहा कि पूरे प्रदेश में अराजकता का माहौल है, एक तरफ जहां कैबिनेट मंत्री आजम खान की भैंसों की चोरी होने पर चौकी के पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया गया, वहीँ दूसरी ओर हत्या जैसे गंभीर अपराध के अपराधियों को सजा दिलाने की मांग करने वालों को फर्जी मुकदमों में फंसाकर जेल भेजा जा रहा है। उन्होंने कहा की स्थानीय सपा विधायक  अंसार अहमद ने पीडि़त परिवार के घर जाने की भी जरुरत नहीं समझी उल्टे हत्यारोपियों से मुलाकात की इससे साबित हो जाता है की पूरे सूबे में समाजवादी पार्टी के लोगों और अपराधियों के गठजोड़ ने जंगल राज कायम कर दिया है ।
रिहाई मंच के जांच दल की सरकार से ये वाजिब मांगें की हैं कि सरकार पीडि़त परिवार को 10 लाख रुपए मुआवजा और नौकरी दे और उनकी सुरक्षा की गारंटी ले । गांव के लोगों पर से फर्जी मुकदमे वापस लिए जाएं । पुलिस द्वारा दबिश के नाम पर की गयी लूटपाट और क्षति की भरपाई करते हुए दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए ।

- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Mar 2, 2014

धन्यवाद


धन्यवाद , आपने मुझे पहचान लिया इस दुर्दिन में !
मगर बताते जाइए यह अहसान उतारूंगा  मैं कैसे ?
-  मोहित  

आज जोड़ दो तुम अपना तबस्सुम


आज जोड़ दो तुम अपना तबस्सुम 
नामुकम्मल होती हर दास्ताँ है |
-मोहित 

तेरे जज़्बात की क़द्र करके


तेरे जज़्बात की क़द्र करके आख़िर यह सिला मिला 
पानी पे लाठी मारके गहराई नापता रहा |

-मोहित
 

जब दुनिया ख़ुद ही अपनी पैवंदकारी करे


जब दुनिया ख़ुद ही अपनी पैवंदकारी करे 
इंसानियत के नाम पर ख़ुद से गद्दारी करे ,
क्यों न हों ज़ुल्मों के मछली बाज़ार गरम 
मक्रोफ़रेब के दाम से जीस्त वफ़ादारी करे

-मोहित 

जौमे तकब्बुर लड़ पड़े तो क्या हुआ ?


जौमे तकब्बुर लड़ पड़े तो क्या हुआ ?
एक बेघर हुआ , दूसरे के वास्ते !
.-मोहित 

ये दिलेआज़ारी का मौसम , ये तेज़ो तुंद हवाएं


ये दिलेआज़ारी का मौसम , ये तेज़ो तुंद हवाएं ,
किस - किसको सताएं पीरेमुगां , यही फ़िक्रे अज़ीम है |

-              -  मोहित 

ये खौफ़ के साये हैं या ज़ुल्मत की शुआएं


ये खौफ़ के साये हैं या ज़ुल्मत की शुआएं ,
कहाँ गया दिलकश नज़ारा जब हम - तुम मिले थे ?

-         - मोहित 

कब तलक मनाएगा तू मातम ज़िन्दगी का

कब तलक मनाएगा तू मातम ज़िन्दगी का 
सूए वक्त को जुंबिश की ज़रूरत नहीं रही .
किसके रोके रुका है जमाना - ए हयात ,
जब शै को आगही की ज़रूरत नहीं रही .
जितना मस्ख किया तूने अपने आपको ,
सैयाद को दाम की ज़रूरत नहीं  रही . 
किस कदर किससे कहें यह अलमिया जनाब ,
आलम के बरदारों की ज़रूरत नहीं रही . 
 ये तूफां साहिल से यूँ गुज़रते जायेंगे ,
भँवरे को अब ज़र की ज़रूरत नहीं रही |

- मोहित 

तेरी याद से गाफ़िल मैं कभी न था

तेरी याद से गाफ़िल मैं कभी न था ,
गहरी नींद से क्यों कर जगाया मुझे ?
मैं तो आज़ाद था इन परिंदों की तरह ,
सुब्हे सादिक़ से क्यों असीर बनाया मुझे ?
सुना था आवाज़ तू मेरी सुन लेगा ,
फिर भला क्यों सरेराह बुलाया मुझे ?
बेड़ियाँ , हथकड़ियाँ अब तेरे हवाले ,
जानता था मुझे क्यों अपनाया मुझे ?
ज़माना है हिसाब के लिए काफ़ी  ' मोहित '
दिखाकर सब्ज़बाग़ क्यों भरमाया मुझे ?
- मोहित 

विडंबना


इन्सान कितना कमज़ोर और बेबस है ...  ईश्वर की बेहतरीन कृति होने के बावजूद | अपने को चारित्रिक रूप से चाहे जितना ऊपर उठा ले , व्यावहारिक रूप में वह दूसरे कुछ समरूपों / इन्सानों  जैसा नहीं हो सकता .... श्रेणीक्रम की दृष्टि से भी और मान - सम्मान की दृष्टि से भी | बस औक़ात की लक्ष्मण - रेखा खिंची पड़ी है , जो हर जगह वर्ग - भेद को उजागर करती है !  

परिष्कार


ज्ञानवान अथवा विवेकशील बनने के लिए मनुष्य का अपने मन- मस्तिष्क को साफ- सुथरा बनाना होगा, उनका परिष्कार करना होगा । जिस खेत में कंकड़- पत्थर तथा खरपतवार भरा होगा उसमें अन्न के दाने कभी भी अंकुरित नहीं हो सकते । वे तभी अंकुरित होंगे । जब खेत से झाड़- झंखाड़ और कूड़ा- करकट साफ करके उन्नत दाने बोये जायेंगे |

सुसंस्कार

संस्कार जीवन के सभी क्षेत्रों और विभागों पर आच्छादित है | सुसंस्कार नहीं हैं ,तो कुभाव आएगे और मनुष्य को अपराध की ओर ले जाएंगे | अमर्यादित बनाएंगे | संस्कारों से बंधा व्यक्ति गंभीर अपराध कर ही नहीं सकता | डर मानव प्रकृति के विरुद्ध चीज़ है , इसीलिए महान संत अरबिंदो ने डर से सर्वथा दूर रहने की शिक्षा दी है , क्योंकि यह व्यक्तित्व का नाशक है | सामयिक रूप से इसे व्यवहृत किया जा सकता है | दीर्घकालिक केवल सुसंस्कारों को ही बनाना चाहिए |

Mar 1, 2014

जैसा बताया वैसा जीना सीख लिया

जैसा बताया वैसा जीना सीख लिया 
फिर क्या कमी थी , दरवाज़ा नहीं टला ?
रफ़्ता - रफ़्ता ज़माने ने वह पा लिया ज़रूर 
अमन सामने था , मगर खतरा नहीं टला |
स्वांग रचाकर कैसे बढ़ते चले गए ?
हर दांव खेले , मगर पैंतरा नहीं टला |
जिधर से देखो ,दिखता है वह शख्स अजीब 
गम हैं मुसलसल , गोरखधंधा नहीं टला !
सामने आ गए तो सुन लो मेरी बात 
' मोहित ' मन उदास है ,शिगूफा नहीं टला | 
- अहमद ' मोहित '

ऐसी पी ली आज जो मुद्दतों तक के लिए


ऐसी पी ली आज जो मुद्दतों तक के लिए 
बेदार नहीं फिर हुआ हर किसी के लिए  
ये कैसी अंधी सुरंग है मौत से बदतर ?
सही है , लतीफ़ा हुआ ज़माने भर के लिए |
- अहमद ' मोहित '