Apr 30, 2014

किरन के प्रति

किरन के प्रति 
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जानता हूँ 
मंज़िल अभी दूर 
रास्ते कठिन हैं 
मगर किरन !
सोने से पहले 
मुझे मीलों सफ़र तय करना है 
जबसे चला हूँ 
बस मंज़िल पर नज़र है 
मैंने कभी नहीं देखा 
नींव का पत्थर 
यूँ तो मैं बढ़ता ही जाता 
लेकिन क्या करूं 
बिन तुम्हारे 
अब मुझे चलना नहीं आता ...
एक - एक कर टूटते पत्ते 
और क़दमों की मद्धिम पड़ती आहटें 
सब तेरी ही ओर बढ़ती हैं 
चुपचाप सरकते पल 
एक नाज़ुक - सा सवाल लिए 
मगर तेरी कहानी नहीं है 
पल भर के लिए 
 किरन है 
 सदा - सर्वदा के लिए |

- मोहित 

Apr 29, 2014

देश के नये चीफ़ जस्टिस का मानवीय आधार पर पहला फ़ैसला

देश के नये चीफ़ जस्टिस का मानवीय आधार पर पहला फ़ैसला 

आरिफ़ की सज़ा - ए मौत के अमल पर रोक 

देश के नये प्रधान न्यायाधीश आर . एम . लोढ़ा ने पद संभालते ही एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया है | उन्होंने एक बड़ी ग़लती को सुधारने की सराहनीय कोशिश की है | बाबरी मस्जिद विध्वंस के सूत्रधार लालकृष्ण आडवाणी जब देश के गृहमंत्री थे , तब रमज़ान महीने में 22 दिसंबर 2000 की रात को दिल्ली के ऐतिहासिक लालकिले केअंदर राजपूताना राइफल्स की सातवीं बटालियन के बैरेक पर अज्ञात लोगों द्वारा की गयी फायरिंग में सेना के एक जवान और दो अर्ध सैनिक कर्मचारी मारे गये थे | इसके पहले प्रधानमंत्री आवास [ तत्कालीन प्रधानमंत्री थे अटल बिहारी बाजपेयी ] के निकट नौसेनाध्यक्ष आवास पर फायरिंग हुई थी , हालाँकि इस मामले को दबा दिया गया था | इस घटना के चंद महीने पहले ही सुप्रीमकोर्ट में बम फोड़ने की योजना बना रहा उड़ीसा का एक व्यक्ति गिरफ्तार किया गया था | लालकिले में फायरिंग की ज़िम्मेदारी देश की पक्षपाती न्यूज़ एजेंसियों के अनुसार , लश्करे तोयबा ने ली थी | बाद में इस संगठन के एक प्रवक्ता ने कहा भी था कि '' निर्दिष्ट काम करके हमारे दो लोग जो भारत अधिकृत कश्मीर के थे , दिल्ली से वापस लौट आये हैं | दिल्ली में मारे और पकड़े गये लोग बेगुनाह हैं | '' बाद का घटनाक्रम यह था कि दिल्ली पुलिस ने लालकिले की फायरिंग की घटना के चार दिन बाद दिल्ली के बटला हाउस में रह रहे एक मुस्लिम नवजवान की 26 दिसंबर की सुबह हत्या कर दी और एक अन्य [ मुहम्मद आरिफ़ उर्फ़ अशफ़ाक अहमद ] को गिरफ्तार कर लिया | उस समय मीडिया में गिरफ्तार व्यक्ति का नाम बार - बार अशफ़ाक अहमद ही आ रहा था | वह आरिफ नाम में कब परिवर्तित हुआ , यह जाँच का विषय है ! इसी तरह मारे गये नवजवान का नाम पुलिस ने कभी अबू शमायल , तो कभी अबू सलाम बताया और पाकिस्तान का रहनेवाला कहा , जबकि जनता में यह कहा जा रहा था कि मृतक का नाम अबू समद था और वह अमरोहा [ उ . प्र . ] का निवासी था | इस फर्जी मुठभेड़ के ख़िलाफ़ सैकड़ों लोगों ने जामिया नगर में प्रदर्शन किया था और दोषी पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की मांग की थी , मगर बटला हाउस कांड की भांति इस मांग पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया गया | दूसरी ओमुहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक को लश्कर का आतंकी मौत की सजा दिलवा दी गयी | अब सुप्रीमकोर्ट ने 28 अप्रैल 2014 को इस सज़ा के अमल पर रोक लगा दी | प्रधान न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने इसके साथ ही आरिफ की अर्जी पर केंद्र को नोटिस भी जारी किया। आरिफ ने अपनी अर्जी में इस आधार पर अपनी रिहाई की अपील की थी कि वह पहले ही 13 साल से ज्यादा समय जेल में गुजार चुका है और इतनी लंबी अवधि के बाद उसे फांसी नहीं दी जानी चाहिए। उसने कहा कि उसकी मौत की सजा पर अमल का मतलब उसे अपराध के लिए दो बार सजा देने के समान होगा क्योंकि वह 13 साल से ज्यादा वक्त जेल में काट चुका है जो करीब उम्रकैद की सजा के बराबर है। याचिका में यह भी कहा गया है कि आरिफ न्याय प्रक्रिया में हुए लंबे विलंब और सरकार की ओर से सजा पर अमल में हुई देरी की वजह से शारीरिक और मानसिक बीमारी से ग्रस्त है।शीर्ष अदालत ने 10 अगस्त, 2011 को आरिफ की मौत की सजा बरकरार रखते हुए उसकी अपील खारिज कर दी थी। 
आरिफ को सत्र न्यायालय ने मौत की सजा सुनाई थी , जिसकी पुष्टि दिल्ली हाई कोर्ट ने की थी। सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा बरकरार रखते हुए कहा था कि हमला भारत को ‘आतंकित करने के लिए’ पाकिस्तान द्वारा किया गया एक ‘दुस्साहसिक प्रयास’ और देश के खिलाफ युद्ध है। आरिफ ने 13 जुलाई, 2007 के हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उसकी मौत की सजा को बरकरार रखा गया था ,हालांकि अदालत ने अलग-अलग सजा पाने वाले छह अन्य को बरी कर दिया था।हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दायर आरिफ की अपील खारिज कर दी थी। निचली अदालत ने उसे देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने और लालकिले में सेना के दो जवानों सहित तीन लोगों की हत्या करने के जुर्म में फांसी की सजा सुनाई थी। हाई कोर्ट ने श्रीनगर निवासी पिता-पुत्र नजीर अहमद कासिद और फारूक अहमद कासिद व पाकिस्तानी नागरिक आरिफ की भारतीय पत्नी रहमाना यूसुफ फारूकी सहित छह दोषियों के मामले में निचली अदालत के फैसले को पलट दिया था। नजीर और फारूक को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, जबकि रहमाना को सात साल कैद की सजा सुनाई गई थी। इन तीनों को आरिफ को शरण देने का दोषी ठहराया गया था। मामले पर एक विहंगम दृष्टि डालने पर पता चलता है कि पुलिस ने संदेह के आधार पर उसकी गिरफ़्तारी की थी , क्योंकि उसे मामले की संगीनी को देखते हुए किसी न किसी की गिरफ़्तारी दिखानी ही थी | अतः पुलिस ने 25 दिसंबर 2000 की रात को दिल्ली स्थित गाजीपुर के डी  डी  ए फ्लैट्स से आरिफ [ 28 वर्ष ] को गिरफ्तार किया था और यह दावा किया था कि वह दिल्ली का लश्कर प्रमुख है | इसने ही लालकिला कांड को अंजाम दिया है | पुलिस ने उसकी पत्नी रहमाना को भी गिरफ्तार किया था | पुलिस के अनुसार , आरिफ पाकिस्तानी है | उसने दिल्ली पहुंचकर रहमाना से शादी कर ली और ओखला के गफूर मार्केट में ' नालेज प्लस ' नामक कंप्यूटर सिखाने की दुकान खोल ली थी  | आरिफ की गिरफ़्तारी की पुलिसिया कहानी में भी झोल नज़र आता है | पुलिस ने यह दावा किया था कि आरिफ़ के बताने पर उसने लालकिले के भीतर से ज़मीन के नीचे छिपे ए के 47 राइफल , दो हैंड ग्रेनेड और चार मैगज़ीन बरामद किया , मगर सवाल यह पैदा होता है कि आतंकियों ने हैंड ग्रेनेड का इस्तेमाल क्यों नहीं किया ? दूसरी बात जो अत्यंत महत्वपूर्ण है , वह यह कि 22 दिसंबर को फायरिंग वाली घटना के तत्काल बाद पुलिस और सेना के जवानों ने क़िला परिसर की मुकम्मल तलाशी ली थी , पर कुछ भी नहीं मिला था ! पुलिसवाले अपने कुत्ते भी साथ लाए थे , जो पुलिस की बैटन पर जाएं , तप नाकारा साबित हुए |वास्तव में जिस ए के 47 की बरामदगी की बात पुलिस ने आरिफ़ से जोड़ दिया , उसे दिल्ली के विजय घाट से एक बिजली के खंभे से बरामद किया गया था , जिसकी निशानदेही सफ़ाई कर्मचारियों ने की थी | ये घटनाक्रम बताते है कि पुलिस किस प्रकार फर्ज़ी मामले बनाती और बेकसूरों को उनमें फ़ांसती है ! ऐसे में सुप्रीमकोर्ट का आरिफ़ की सज़ा पर रोक का फ़ैसला मानवीय आधारों पर है , जिसका स्वागत किया जाना चाहिए | 
- Dr . M . Ahmad

बंगलादेशी जनता की बढ़ती मुश्किलें

बंगलादेशी जनता की बढ़ती मुश्किलें 

- डॉ . मुहम्मद अहमद 
बंगलादेश में अघोषित इमरजेंसी लगी हुई है | कहने को तो वहां की संसद के चुनाव 5 जनवरी 2014 को संपन्न हुए थे , लेकिन सही अर्थों में इस चुनाव का कोई अर्थ नहीं था|  खालिदा जिया की बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बी.एन.पी.) की अगुआई में 18 पार्टियों के विपक्ष के गठबंधन ने चुनावों का बहिष्कार किया था। धांधली व दिखावे के इस चुनाव में प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ताधारी आवामी लीग के गठबंधन की चुनावों में भारी जीत हुई थी उसके पहले से ही पूरा देश घोर राजनीतिक संकट और अव्यवस्था के दौर से गुजर रहा है। सच बात तो यह है कि यह छोटा - सा खूबसूरत देश भारत और अमेरिका की हित - साधना का बुरी तरह शिकार हो गया है | एक सोची - समझी कुनीति के तहत इस्लामपसंदों का दमन किया जा रहा है | जमाअत इस्लामी बंगलादेश के लोगों के साथ विशेष रूप से जुल्म - ज़्यादती की जा रही है | अमलन इस राजनीतिक - धार्मिक संगठन पर अघोषित प्रतिबन्ध लगा हुआ है
विगत माह बंगलादेश के दौरे से लौटे रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया [ ए ] के नेता एवं बहुजन मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष सुकीर्ति रंजन बिश्वास ने जमाअत इस्लामी हिन्द के नई दिल्ली स्थित मुख्यालय में जमाअत के शीर्ष नेतृत्व और समाचार पत्रों के संपादकों से भेंट में बताया कि बंगलादेश में लोकतंत्र की स्थिति बहुत नाज़ुक है | यह कहा जाए तो सही होगा कि वहां का सत्ता - स्वरूप तानाशाही में परिवर्तित हो चुका है | शेख हसीना की नादिरशाही जारी है
वहां अमलन इमरजेंसी लगी हुई है | जमाअत इस्लामी और बी . एन . पी . के बड़े नेता और हज़ारों कार्यकर्त्ता जेलों में बंद हैं | जमाअत के सीनियर लीडर अब्दुल कादिर मुल्ला को पिछले वर्ष दिसंबर में फांसी देकर शहीद किया जा चुका है | वहां की जमाअत के पूर्व अमीर [ अध्यक्ष ]ग़ुलाम आज़म को भी सज़ा - ए मौत का ऐलान किया जा चुका है | जमाअत और बी . एन . पी . के प्रमुख दैनिक पत्र ' अमर देश ' पर पाबंदी लगी हुई है | इसके संपादक को भी जेल में डाल दिया गया है | केवल वही मीडिया और समाचार संसाधन ' जीवित ' हैं , जो सरकार की जी - हुजूरी में लगे हुए हैं | इस मीडिया के द्वारा सत्ताधारी वर्ग मानवाधिकार हनन का कोई अवसर नहीं चूकता ! बंगलादेशी मीडिया भी पक्षपाती नीति अपनाता है | इसके प्रमाण के रूप में सुकीर्ति रंजन बिश्वास जी बताते हैं कि मालोपाड़ा में आगज़नी की घटना हुई , जिसमें मुसलमानों के भी घर जले थे , लेकिन सत्ता समर्थक मीडिया ने रिपोर्टिंग की कि केवल हिन्दुओं के घर जलाये गये हैं |  
उन्होंने बताया कि यह मीडिया ख़ासकर जमाअत और बी . एन . पी . की छवि बिगाड़कर पेश करती है | हिंसक घटनाओं में लिप्त बताती है , जबकि इनका इन घटनाओं से संबंध नहीं पाया जाता | बिश्वास जी कहते हैं कि जमाअत तो अल्पसंख्यक हितों की भी वकालत करनेवाली पार्टी है | इस पार्टी ने अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण , उनके लिएअवसरों की उपलब्धता और समस्याओं के अधययन हेतु आयोग के गठन आदि की मांग का समर्थन किया है , जिसके कारण वह अल्पसंख्यकों के दिलों को जीतने में कामयाब है
बिश्वास जी कहते हैं कि सत्ताधारी लोग विपक्ष की लोकप्रियता से बौखलाए हुए हैं | वह ऐसे सभी दुष्कृत्य कर रहे हैं , जिससे कि वे सत्ता में बने रह सकें | स्वयं बंगलादेशी मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष मीज़नुर्र्ह्मान को यह सत्य स्वीकार करने के लिए बाध्य होना पड़ा कि सत्ताधारी आवामी लीग के लोग हिंसा - उत्पात की घटनाओं में प्रत्यक्ष रूप से लिप्त हैं |प्रमुख विपक्षी नेता ख़ालिदा ज़िया का कहना है कि देश में लोकतंत्र का अंत हो चुका है | शेख़ हसीना सरकार अवैध है और देश एकदलीय शासन में तब्दील हो चुका है |उनके अनुसार , जो चुनाव हुए दिखावा मात्र थे | सभी विपक्षी पार्टियों ने इसका बहिष्कार किया था
बहिष्कार का फौरी कारण यह था कि सरकार ने चुनाव संचालन के लिए एक अंतरिम सरकार का गठन करने की विपक्ष की मांग को मानने से इन्कार कर दियाथा । शासक पार्टी ने संसद में अपने बहुमत का इस्तेमाल करके संविधान में संशोधन कर दिया, जबकि इससे पूर्व संविधान में यह कहा गया था कि चुनाव की घोषणा होने के बाद एक अंतरिम सरकार का गठन किया जाना चाहिए। विपक्षी पार्टियों ने इस संशोधन को मंजूर नहीं किया और अंतरिम सरकार के गठन की मांग की, जिसे शेख हसीना ने नकार दिया। 
उल्लेखनीय है कि शेख हसीना की आवामी लीग पार्टी ने इससे पहले जब वह विपक्ष में थी, खुद ही चुनाव कराने के लिए अंतरिम सरकार के गठन के लिए आंदोलन चलाया था, जिसके बाद संविधान में यह प्रावधान शामिल किया गया था ! सुप्रीम कोर्ट ने जमाअत इस्लामी पार्टी पर, उसके धार्मिक विचारों के आधार पर, प्रतिबंध लगा दिया था , हालांकि यह पार्टी कई दशकों से एक मान्यता प्राप्त पार्टी रही है और बी.एन.पी. के नेतृत्व में एक पूर्व गठबंधन सरकार में उसके सदस्य मंत्री पद पर चुने भी गये हैं। 2011 में सत्ताधारी आवामी लीग ने युद्ध अपराध अदालत बिठायी थी, जिसे 1971 में बंगलादेश मुक्ति संघर्ष के दौरान किये गये युद्ध अपराधोंके आरोपियों पर मुकदमा चलाने का काम सौंपा गया था। यह जमाअत इस्लामी को निशाना बनाने की सोची-समझी चाल थी, क्योंकि इस  इस्लामपसंद पार्टी पर यह आरोप लगाया गया कि 1971 के युद्ध में उसने पाकिस्तानी सेना का पक्ष लिया था। 
नवम्बर 2013 में बंगलादेश की स्थापना के 42 वर्ष बाद इस पार्टी के एक मुख्य नेता को युद्ध अपराधों के लिए फांसी की सज़ा दी गई थी , जिसका पार्टी के समर्थकों ने ज़बरदस्त विरोध किया। आज बंगलादेश के मजदूर और किसान भी कठोर शोषण और दमन के शिकार हैं। वे अपने अधिकारों के लिए अनेक संघर्ष करते आये हैं। परंतु उन्हें एक ऐसी सरकार और शासक वर्ग का मुकाबला करना पड़ रहा है, जो उनके मौलिक अधिकारों को खत्म करने पर तुले हुए हैं


Apr 26, 2014

महाराणा प्रताप का इस्लामी संकल्प !

महाराणा प्रताप का इस्लामी संकल्प !

बचपन में किसी कक्षा की पाठ्य पुस्तक में पढ़ा था कि महाराणा प्रताप बड़े ही प्रतापी सम्राट थे | उन्होंने घास की रोटी खाकर वीरता का ज़बरदस्त प्रदर्शन किया और हिन्दू धर्म की मुगलों से रक्षा की | अपने संकल्प को पूरा किया | उस पुस्तक में उनका चित्रण हिन्दू सम्राट के इस रूप में था मानो वे इस्लाम और मुसलमानों के विरोधी थे | आज जब मैं उनके बारे में गहराई के साथ जाना , तो यह पता चला कि उनके बारे में भी दुष्प्रचार किया गया है , जिसके कारण उनका सही व्यक्तित्व उभर नहीं पाया | यहाँ भी भारतीय इतिहास के साथ अन्याय किया गया है |  महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 ई . को कुम्भलगढ दुर्ग में हुआ था। उनका संबंध मेवाड़ के शिशोदिया राजवंश से था | उनकी माता का नाम जैवन्ताबाई था,जो पाली के सोनगरा अखैराज की बेटी थी। महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था। महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक गोगुन्दा में हुआ। महाराणा प्रताप ने भी अकबर की अधीनता को स्वीकार नहीं किया था। उन्होंने कई वर्षों तक अकबर से युद्ध किया | 1576 के प्रसिद्ध हल्दीघाटी युद्ध में प्रताप ने बीस हज़ार राजपूतों को साथ लेकर राजा मान सिंह [ मुग़ल सरदार ] की अस्सी हज़ार सैनिकों वाली सेना का सामना किया | यह युद्ध केवल एक दिन चला , जिस्मी सत्तरह हज़ार लोग मारे गये |   महाराणा प्रताप कि सेना ने छापामार युद्ध प्रणाली का उपयोग करते हुए शत्रु सेना के दांत खट्टे कर दिये। मुगलों की तरफ से मानसिंह नें सेना की कमान संभाल रखी थी । दोनों सेनाऔं में घमासान युद्ध हुआ। राणा प्रताप ने वीरता से मुगलों का सामना किया । इसी दौरान मानसिंह और महाराणा प्रताप का सामना हुआ । महाराणा प्रताप नें भाले से भरपुर वार किया, मानसिंह हाथी के हौदे में छुप गया | हाथी की सूंड में लगी तलवार से महाराणा प्रताप के स्वामिभक्त घोडे चेतक का एक पैर जख्मी हो गया । एक पांव से घायल होने के बावजजूद भी चेतक ने एक बडे से नाले को पार किया और राणा प्रताप को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया । अकबर ने महाराणा प्रताप को अपने अधीन करने के लिये क्रमश: चार शान्ति दूतों [ जलाल सिंह , मान सिंह , भगवान दास और टोडरमल ] को भेजा। राणा प्रताप ने कहा कि मैं शरीर रहते उसकी अधीनता स्वीकार करके उसे सम्राट नहीं कहूँगा | सूर्य जहाँ उगता है , वहां पूर्व में ही उगेगा | सूर्य के पश्चिम में उगने के समान प्रताप के मुख से अकबर को सम्राट निकलना असंभव है | उन्होंने राजपाट छोड़ा और अपने स्वाभिमान का सबूत दिया | पुनः सम्राट बने और उदयपुर को राजधानी बनाया |  
स्पष्ट है , यह उनके जीवन का एक पक्ष है | उनका यह संकल्प संभवतः लोगों के मन - मष्तिस्क से ओझल है | उस विभूति ने महल , अटारी , राजपाट , स्वर्णपात्र छोड़कर सपरिवार जंगलों में रहकर घास - फूस की रोटियां , फल - पत्र खाकर दिन बिताए थे और अपने संकल्प के पूरा होने तक इसी रूप में रहने की दृढ प्रतिज्ञा की थी | अपने संकल्प को उन्होंने स्वयं इन काव्यमय शब्दों में पिरोया था - 
जंगलों में घूमुंगा , पहाड़ों पै करूंगा वास ,
जीवन की घाटियों में ऊधम मचाऊँगा |
खाने को भोजन नसीब यदि होगा नहीं ,
पादपों के फूल पत्र बीन - बीन खाऊंगा |
हाथ में रहेगा हथियार यदि न कोई तो ,
ख़ाली नखों से शत्रु आसन डिगाऊँगा |
भूखे प्राण त्याग दूंगा , बस्ती छोड़ दूंगा ,
और हस्ती मेट दूँगा , पर शीश न झुकाऊँगा | |
चाहे भील वीर भारी बाँकुरे लड़ाकू ,
रणक्षेत्र में दिखाएं पीठ जीवन ये खार हो |
इष्ट मित्र , बंधु भाई सारा परिवार चाहे ,
कुन्नत बजाए अल्लाह अकबर प्यार हो |
रोटी , बेटी , चोटी चाहे खोटी पड़ जाए सबकी ,
दिन दूना इस्लाम धर्म का प्रचार हो |
विश्व की विभूति सारी शक्तियां हों एक ओर ,
एक ओर चेतक और मेरी तलवार हो |
- डॉ . मुहम्मद अहमद    

Apr 23, 2014

पक्षपातों का सामना


नागरिक को ख़ुद ही परिवार , जाति , रंग , दलवाद , नेतावाद एवं अन्य दबावों के पक्षपातों का सामना करना होगा , जिसके लिए बुद्धि की आध्यात्मिक शिक्षा तथा मन की साधना अपरिहार्य बन जाती है .....  कुछ असंभव नहीं ...
तुझमें चमक फ़लक के सितारों से कम नहीं , बस लगन को परवान चढ़ाने की बात है |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Apr 22, 2014

भूख से दम तोड़ते सपने और हर साल सड़ता हज़ारों टन अनाज

भूख से दम तोड़ते सपने और हर साल सड़ता हज़ारों टन अनाज

एक तरफ़ तो देश में खाद्य सुरक्षा क़ानून लागू है , जिसके तहत भुखमरी , कुपोषण और खाद्य असुरक्षा के लिए सरकार को ज़िम्मेदार माना गया है | फिर भी देश में हर साल लाखों टन अनाज सिर्फ भंडारण के उचित प्रबंध के अभाव में बर्बाद हो जाता है | खाद्य सुरक्षा क़ानून में सस्ते रेट पर चावल , गेहूं और मोटे अनाजों को उपलब्ध कराने की व्यवस्था है | इसके बावजूद भूखे लोगों की तादाद घट नहीं पा रही है ! कितनी बड़ी विडंबना है कि सरकार अनाज को तो सड़ने देती है , दूसरी ओर यह कहती है कि अनाज की कमी है , लिहाज़ा वह गरीब जनता को मुफ़्त में अनाज नहीं उपलब्ध करा सकती | भूखे लोगों तक मुफ़्त अनाज आपूर्ति के सुप्रीमकोर्ट की हिदायत पर बार - बार सरकार यही बात कहकर पल्ला झाड़ लेती है | हैरानी की बात यह भी है कि उचित भंडारण न हो पाने के कारण अनाज के सड़ने की खबरें पिछले कई साल से आती रही हैं, लेकिन इस दिशा में सरकार को कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। अब एसोचैम ने एक बार फिर सरकार के इस रवैये को कठघरे में खड़ा किया है। उसकी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल देश में साढ़े तीन करोड़ टन भंडारण क्षमता की जरूरत है, मगर इसकी कमी के चलते लगभग चालीस फीसद अनाज का रखरखाव सही तरीके से नहीं हो पाता। उसमें अवैज्ञानिक और गैर-व्यावसायिक तरीके से किए गए भंडारण और गोदामों की उपलब्धता में क्षेत्रीय विसंगति के चलते देश में कुल उपज का बीस से तीस फीसद अनाज बर्बाद हो जाता है। यह सच्चाई पहली बार सामने नहीं आई है। खाद्य सुरक्षा क़ानून के आने के बाद यह आशा की जा रही थी कि देश से भुखमरी का खात्मा हो जाएगा , किन्तु व्यवहार में ऐसा नही दीखता | आज भी करोड़ों लोगों को दिन की शरुआत के साथ ही यह सोचना पड़ता है कि आज पूरे दिन पेट भरने की व्यवस्था कैसे होगी ? सुप्रीम कोर्ट की फटकार का भी सरकार पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता | भंडारण में व्यापक खामियों के चलते लाखों टन अनाज सड़ जाने की खबरों के मद्देनजर कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी कि अगर भंडारण का प्रबंध नहीं किया जा पा रहा है तो क्यों नहीं अनाज को गरीबों में मुफ्त बांट दिया जाता। इसके अनुपालन में सरकार मूक - बधिर नज़र आती है | एक आंकड़े के अनुसार , सही रखरखाव के अभाव में पंजाब में पिछले तीन वर्षों के दौरान पंजाब में 16 हज़ार 500 टन अनाज सड गया |

सरकार एक तरफ़ यह दावा करते नहीं थकती कि देश में अनाज प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं , फिर भी देश में भूख से मौतों का सिलसिला बरक़रार है | कितनी अजीब बात है , जब सरकार विरोधाभासी बयान देकर यह कहती है कि अनाज की कमी है , जिसकी भरपाई के लिए जीएम तकनीक से अनाज उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाता है ,जबकि जीएम [ जेनेटिकली मोडीफाइड ] जी ई [ जेनेटिकली इंजीनियर्ड तकनीक से पैदा ऐसी फसलों के जोखिम से भरे होने को लेकर कई अध्ययन आ चुके हैं। जीई फसलें डीएनए को पुनर्संयोजित करनेवाली प्रौद्योगिकी ( Recombinant DNA technology) के माध्यम से प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से तैयार किए गए पादप जीव हैं। आनुवांशिकी इंजीनियरिंग (जीई) की अनिश्चितता और अपरिवर्तनीयता ने इस प्रौद्योगिकी पर बहुत सारे सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे भी आगे, विभिन्न अध्ययनों ने यह पाया है कि जीई फसलें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं और इससे मानव स्वास्थ्य को संकट की आशंका है। इन सबके परिणामस्वरूप, इस खतरनाक प्रौद्योगिकी को अमल में लाने की आवश्यकता पर दुनिया भर में विवाद खड़ा हो गया है। भारत एवं अन्य बहुत सारे देशों में, पर्यावरण में छोड़े जा रहे जीई या जीएम पौधों-जंतुओं (organism) के विरूद्ध प्रचार के साथ ग्रीनपीस का कृषि पटल पर पदार्पण हुआ। जीई फसलें जिन चीजों का प्रतिनिधित्व करती हैं वे सब हमारी खेती के लिए वाहियात हैं। वे हमारी जैवविविधता के विनाश और हमारे भोजन एवं खेती पर निगमों के बढ़ते नियंत्रण को कायम रखती हैं। करीब छह महीने पहले ब्रिटेन स्थित मेकेनिकल इंजीनियरिंग संस्थान की ओर से जारी एक रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया था कि भारत में मुख्य रूप से भंडारण और ढुलाई सहित आपूर्ति की खामियों के चलते हर साल लगभग दो करोड़ टन गेहूं बर्बाद हो जाता है। जबकि देश में ऐसे लाखों लोग हैं, जिन्हें भरपेट भोजन नहीं मिल पाता या फिर पर्याप्त पोषण के अभाव में वे गंभीर बीमारियों का शिकार होकर जान गंवा देते हैं। हैरानी की बात है कि एक ओर भंडारण के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किया गया, लेकिन स्थानीय जरूरतों के हिसाब से सरकारी पैमाने पर ऐसे प्रबंध करना या फिर इस व्यवस्था का विकेंद्रीकरण करके सामुदायिक सहयोग से इसे संचालित करना जरूरी नहीं समझा गया। इसके अलावा, जरूरत से अधिक भंडारण को लेकर खुद कृषि मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति की आलोचना के बावजूद यह सिलसिला रुका नहीं है। सरकार की लापरवाही से स्थिति दिन - प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है | ऐसे में खाद्य सुरक्षा क़ानून के क्रियान्वयन पर सवालिया निशान लग गया है | देश की नई सरकार को चाहिए कि इस गंभीर समस्या पर प्राथमिक रूप से ध्यान दे और विगत सरकारों द्वारा की जा रही अनदेखी पर रोक लगाए |
- DR . MUHAMMAD AHMAD

Apr 19, 2014

वह आह

वह आह जो निकली थी सदियों से मगर जारी है 
सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है |
मेरे अंदर की आग कब तक जलेगी मद्धिम - मद्धिम 
घर जलता है तो हरेक के छत पर धुओं होता है |
- मोहित 

Apr 18, 2014

जब से छाई ये अरुणाभाएं


जब से छाई ये अरुणाभाएं
मन दीपक को ये हरसाएं
चलो चलें क्षितिज के उस पार 
बैठे - बैठे क्यों अकुलाएं |
 - ' मोहित '  

Apr 10, 2014

माना बहुत हैं मुझसे अच्छा लिखनेवाले


माना बहुत हैं मुझसे अच्छा लिखनेवाले 
मुझसे बढ़कर हज़ारों हैं अच्छा करनेवाले 
मगर अब वे शख्स कम हैं हममें मौजूद 
आत्मसम्मान को अपनी ज़ीनत बनानेवाले |
 - अहमद ' मोहित '

Apr 9, 2014

इख्वान को सौंपें सत्ता

इख्वान को सौंपें सत्ता 
मिस्र में सारी दुनिया को धता बताते हुए वहां की एक अदालत द्वारा पिछले दिनों इख्वानुल मुस्लेमून के 529 सदस्यों को एक पुलिस अधिकारी की हत्या और पुलिस पर हमले के आरोप में मौत की सजा सुनाना दर्शाता है कि तमाम आंदोलनों के बाद भी देश फ़ौजी तानाशाही के चंगुल से निकल नहीं पाया है। आधुनिक दुनिया के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में लोगों को एक साथ सुनाई गयी मौत की सज़ा अत्यंत निंदनीय , भर्त्सनीय और सारी इंसानियत पर कलंक है | यह बड़ी अजीबोगरीब और चिंताजनक बात है कि लोकतंत्र की दुहाई देने वाले दुनिया के विशेषकर पश्चिमी देश मिस्र की गैरकानूनी , तानाशाही सरकार की इस घिनौनी हरकत पर चुप्पी साधे हुए हैं | यह वही चुप्पी है , जो 14 अगस्त 2013 को मंज़रेआम पर आई थी , जब मिस्र के इतिहास में सबसे ज्यादा खूनखराबा हुआ था और अपदस्थ राष्ट्रपति मुहम्मद मुर्सी , जो बहुत लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए थे , के समर्थकों पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई में सबसे ज्यादा छह सौ से ज्यादा लोग मारे गए | इस ख़ूनी कार्रवाई में इख्वानुल मुस्लेमून [ मुस्लिम ब्रदरहुड ] के अनुसार इस कार्रवाई में दो हज़ार से अधिक लोग मारे गये थे |पिछले साल मुहम्मद मुर्सी को राष्ट्रपति पद से अपदस्थ किए जाने के बाद से मिस्र प्रशासन  इस्लामपसंदों पर लगातार एकतरफ़ा कठोर कार्रवाई कर रहा है। अब बचाव पक्ष के वकीलों का आरोप है कि उन्हें अपना केस रखने का मौका नहीं दिया गया। इन्हीं तानाशाही रवैये के चलते पूर्व उप राष्ट्रपति मुहम्मद अलबरदेई को हटना पड़ा | उन्होंने साफ़ कह दिया कि टकराव की समाप्ति के लिए शांतिपूर्ण उपाय किए जा सकते थे , लेकिन सरकार के अन्य सदस्यों ने बल प्रयोग के फैसले का समर्थन किया। अलबरदेई ने कहा कि ' मैं  ऐसे फैसले की जिम्मेदारी और अधिक समय तक नहीं ले सकता  , जिससे मैं  खुद ही सहमत नहीं हूँ  और इसके दुष्परिणामों की आशंका मुझे पहले से  थी । मैं अल्लाह  के सामने बूंदमात्र रक्त की  भी जिम्मेदारी नहीं ले सकता । 'ब्रदरहुड के प्रवक्ता का कहना है कि ‘हम हमेशा ही अहिंसक और शांतिपूर्ण रहेंगे। हम मजबूत रहेंगे।’
इख्वानुल मुस्लेमून एक मुस्लिम राजनीतिक संस्था है जिसे वहां की सैनिक सरकार गलत रंग देकर आतंकी संगठन मानती है। अमेरिका और कुछ पश्चिमी देशों की साज़िश के चलते इस संगठन को रूस, सीरिया, सउदी अरब और यूएई में भी आतंकी संगठन के तौर पर ही देखा जाने लगा है , जबकि यह सच नहीं है | सच बात यह है कि 1952 से ही मिस्री जनता फ़ौज शाषित सरकारों के दमन से त्रस्त थी | कर्नल अनवर सादात और एयर मार्शल हुस्नी मुबारक तो सीधे तौर पर सेना से थे | तीन साल पहले तानाशाही से मुक्ति पाने के लिए मिस्र की जनता सड़कों पर आई थी। तहरीर चौक दुनिया में आंदोलन की नई परिभाषा गढ़ रहा था। हालांकि वह स्वत:स्फूर्त आंदोलन था, जिसने सोशल मीडिया से ताकत पायी थी। हुस्नी मुबारक को अंतत: सत्ता छोड़नी पड़ी थी और तीस वर्ष के तानाशाही शासन का अंत हो गया था | लोकतान्त्रिक चुनाव में इख्वान [ ब्रदरहुड ] को बहुमत प्राप्त हुआ | मुहम्मद मूर्सी राष्ट्रपति बने | पश्चिमी देशों ख़ासकर अमेरिका को इस्लाम पसंदों का यह उभार पसंद नहीं आया और शुरू कर दी गयीं मुर्सी को हटाने की साज़िशें | मिस्रवासियों को तब गहरा आघात पहुंचा जब निर्वाचित राष्ट्रपति मुहम्मद मूर्सी को सेना द्वारा अपदस्थ कर दिया गया | इसके बाद से ही मूर्सी समर्थकों इस्लाम पसंदों का दमन शुरू कर दिया गया था , जो अब तक जारी है | मध्य-पूर्व देश के जानकार प्रोफेसर क़मर आगा के अनुसार मिस्र की सेना ऐसा दमन की नीति के तहत कर रही है। सेना चाहती है कि इख्वानुल मुस्लेमून का नामोनिशान मिटा दिया जाए। इस तरह सेना न तो उदारवादियों को आगे आने देना चाहती है और न ही मुस्लिम ब्रदरहुड को।ऐसा कर वह स्वयं सत्ता कब्जाए रखना चाहती है। ऐसी कार्रवाइयों से मिस्र और उसकी जनता को कोई लाभ नहीं होंगे, उल्टे वहां अराजकता ही फैलेगी। एक अराजक मिस्र विदेश शांति के लिए खतरा बन सकता है। वहां की सेना को चाहिए कि सत्तालोलुपता से अलग हटकर लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की ओर बढ़े और लोकतान्त्रिक आधार पर सत्ता इख्वान को सौंपे , अन्यथा के विवेकहीन एवं अन्यायपूर्ण क़दम विश्वशांति के लिए खतरा बन सकते हैं | दुनिया के सभी प्रभावशाली देशों को मिस्र की ग़ैरकानूनी -  फ़ौजी सरकार पर सकारात्मक बदलाव के लिए दबाव डालना चाहिए और लोकतंत्र बहाली के लिए सभी संभावित क़दम उठाना चाहिए |

Apr 4, 2014

घोर अंधेर नगरी की दास्तान

मुज़फ्फरनगर दंगा

घोर अंधेर नगरी की दास्तान

मुजफ्फरनगर के साम्प्रदायिक दंगे को लेकर सियासत जारी है | दंगे पर क़ाबू पाने में नाकामी पर सुप्रीमकोर्ट की ताज़ा टिप्पणी से उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार की मुसीबतें बढ़ गयी हैं | कई राजनीतिक पार्टियों ने अखिलेश सरकार की आलोचना करते हुए इस्तीफ़े की मांग की है | सुप्रीमकोर्ट ने विगत 25 मार्च को अपनी एक टिप्पणी में सपा सरकार की दंगे में लचर भूमिका को रेखांकित किया | सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने समय से जरूरी कदम नहीं उठाए। यही नहीं, खुफिया तंत्र ने भी सूचना नहीं दी थी। कोर्ट ने कहा कि मुजफ्फरनगर में हालात बिगड़ने के लिए प्रशासन पूरी तरह जिम्मेदार है। गौरतलब है कि वर्ष 2013 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में हुए दंगे में 65 लोग मारे गए थे।  प्रदेश सरकार ने मृतक आश्रितों को दस लाख रुपये, केंद्र सरकार ने दो लाख रुपये का एलान किया था। बाद में प्रदेश सरकार ने मृतक आश्रितों को दी जाने वाली सहायता राशि में तीन लाख रुपये का इजाफा करने की घोषणा की थी। दंगों पर उत्तर प्रदेश सरकार के रवैये पर पीड़ितों की वकील कामिनी जायसवाल ने दलील दी थी कि यूपी पुलिस मामले की सही तरीके से जांच नहीं कर रही है, लिहाजा सीबीआई को पूरे मामले की जांच का आदेश दिया जाना चाहिए। उन्होंने आरोपियों के बच निकलने की संभावना जताई थी । हक़ीक़त यह है कि मुज़फ्फरनगर में उत्तर प्रदेश सरकार और उसकी समाजवादी पार्टी व केंद्र सरकार और उसकी कांग्रेस पार्टी ने मुसलमानों की हितैषी दिखाने की सारी हदें लांघीं , लेकिन साबित यही हुआ कि आम नागरिक कभी किसी सत्ता का प्रिय नहीं होता। नागरिकों के सरोकार कभी राजनीतिक दलों की प्राथमिकता पर नहीं रहते। दंगों पर सियासतज़रूर हो सकती है और हो भी रही है | सुप्रीमकोर्ट की टिप्पणी के बाद सपा पर  ' सियासी हमलों  ' का बढ़ जाना फ़ितरी है |भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने पिछले दिनों सपा सरकार को घेरते हुए कहा कि देश की सबसे बड़ी अदालत ने साबित कर दिया है कि कौन देश में सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ रहा है। सपा, बसपा और कांग्रेस योजनाबद्ध तरीके से नफरत पैदा कर सरकार बनाना चाहती हैं। यदि सपा सरकार में रंच मात्र भी नैतिकता है तो उसे इस्तीफा दे देना चाहिए । बसपा प्रमुख मायावती ने कहा है कि लोगों के जान माल की रक्षा करने में सपा सरकार की विफलता पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगा दी है। ऐसे में अखिलेश सरकार को तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए और अगर वह ऐसा नहीं करती तो केंद्र सरकार को तत्काल उसे बर्खास्त कर देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने बसपा के इस आरोप को भी पुष्ट कर दिया है कि प्रदेश में जंगलराज है और दंगा भाजपा और सपा की मिलीभगत से हुआ। पीड़ितों को न्याय दिलाने के बजाय सपा सरकार ने उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया । कांग्रेस ने भी बहती गंगा में हाथ धोना मुनासिब समझा | उसने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद सपा सरकार ने सत्ता में बने रहने का हक खो दिया है। प्रदेश कांग्रेस के कम्युनिकेशन विभाग के चेयरमैन सत्यदेव त्रिपाठी ने कहा कि अब यह स्पष्ट हो गया है कि सपा व भाजपा ने मिलकर दंगा कराया। रालोद के महासचिव अनिल दुबे ने कहा कि रालोद का शुरू से ही यह कहना था कि दंगा कराने के पीछे गहरी सियासी साजिश थी और इसका तानाबाना सपा और भाजपा ने मिलकर बुना।कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के राज्य सचिव रामजी राय ने भी अखिलेश सरकार से इस्तीफा मांगा है। उन्होंने कहा कि दंगा पीड़ितों को राहत की अब भी दरकार है और राज्य सरकार उनके राहत-पुनर्वास की समुचित व्यवस्था करे। सच्ची बात यह है कि दंगों के सिलसिले में की गई कार्रवाई, राहत और पुनर्वास कार्यों की संपन्नता में राज्य सरकार ने अक्षम्य ढिलाई का परिचय दिया | इन विषयों पर सूचना के अधिकार क़ानून के तहत जनाब सलीम बेग ने सवाल पूछे थे , जिनके बड़े अजीबोगरीब एवं टालमटोल वाले जवाब मिले । इनका आप भी मुलाहिज़ा कर सकते हैं - उत्तर प्रदेश के मुख्यमत्री कार्यालय के संयुक्त सचिव डॉ. नंदलाल ने कहा कि पूछे गए सवाल गृह विभाग से सम्बद्ध हैं। गृह विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देशित किया जाता है कि वे संदर्भित सूचनाएं प्रदान करें अन्यथा सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 5 (5) के तहत उत्तरदायी माने जाएंगे। हाथी के दांत की भांति कम करनेवाले अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ अनुभाग  ने बताया कि मुजफ्फरनगर में हुए साम्प्रदायिक दंगों से प्रभावित अल्पसंख्यकों के हितों के संरक्षण एवं जांच दलों द्वारा की गई कार्रवाई से सम्बन्धित कार्य अल्पसंख्यक कल्याण विभाग में व्यवहृत नहीं किया जाता है, बल्कि गृह विभाग में व्यवहृत होता है। अतः वह कोई सूचना नहीं देगा | उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग कहता है कि मुजफ्फरनगर दंगे से सम्बन्धित उसे कोई शिकायती पत्र प्राप्त नहीं हुआ है। यह भी बताया गया कि उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग का गठन अभी नहीं हुआ है। अत: कोई जांच दल नहीं भेजा गया है। अत: किसी कार्रवाई और कार्यवाही का प्रश्न ही नहींउठता है। विडम्बना यह है कि राज्य अल्पसंख्यक आयोग के सचिव मुहम्मद मारूफ जवाब में एक नम्बर बिंदु से लेकर छह नम्बर तक एक ही बात दोहराते हैं कि आयोग में कोई शिकायत नहीं आई है। वे फ़रमाते हैं कि आयोग का गठन अभी नहीं हुआ है , फिर किस हैसियत से पिछले दिनों उन्होंने सहारनपुर मंडल के आयुक्त को पत्र लिख कर दंगों की जो अद्यतन रिपोर्ट तलब की थी ? सहारनपुर के मंडलायुक्त ने सचिव को क्या जवाब भेजा और उस जवाब को सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया ?

दूसरी ओर उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग ने कहा कि अल्पसंख्यक कल्याण से संदर्भित पत्र में पूछे गए सवालों का गृह विभाग से कोई सम्बन्ध नहीं है। जनाब सलीम बेग ने जब उत्तर प्रदेश पुलिस महानिदेशक मुख्यालय से सूचना प्राप्त करने के लिए लेखाधिकारी पुलिस महानिदेशक के नाम से 10 रुपए का पोस्टल ऑर्डर भेजा, जबकि उसे जनसूचना अधिकारी, पुलिस मुख्यालय के नाम से भेजना चाहिए था। लिहाजा, सूचना नहीं दी गई | उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग से पता चला कि प्रश्नगत प्रकरण में कतिपय शिकायतें (आठ) प्राप्त हुई हैं। प्रश्नगत अवधि में आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों के पद रिक्त चल रहे थे। वर्तमान में अध्यक्ष और सदस्य पदभार ग्रहण कर चुके हैं। प्रकरण आयोग के अवलोकनार्थ अभी विचाराधीन है। आयोग के निर्णयोपरांत अग्रेतर कार्यवाही से यथासमय अवगत करा दिया जाएगा। आयोग के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी एमएल बाजपेयी एक तरफ कहते हैं कि मुजफ्फरनगर दंगे से सम्बन्धित कतिपय शिकायतें प्राप्त हुई हैं। फिर कहते हैं कि आयोग के अध्यक्ष और सदस्य का पद खाली है। फिर कहते हैं कि अध्यक्ष और सदस्य आ गए। इसके बावजूद दंगा प्रकरण आयोग के अवलोकनार्थ भी नहीं आया। अब ऐसे आयोग के लिए आह निकले या वाह ! ऐसे निरर्थक आयोगों के लिए आह और वाह दोनों शब्द माकूल हैं। उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक कार्यालय को दंगे जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील मसले पर सूचना देने से अधिक प्रिय 10 रुपए का पोस्टल ऑर्डर है। पोस्टल ऑर्डर भेजा भी गया लेकिन उस पर लेखाधिकारी पुलिस मुख्यालय लिख गया तो उसे लौटा दिया गया। सूचनाधिकार क़ानून में साफ़ प्रावधान है कि पोस्टल ऑर्डर के लिए सूचना रोकना गैर कानूनी है। मुज़फ्फरनगर दंगे पर अब राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, और राष्ट्रीय आयोगों का हाल सुनिए - राष्ट्रपति भवन के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी सौरभ विजय कहते हैं कि मुजफ्फरनगर दंगे से सम्बद्ध सूचनाएं राष्ट्रपति सचिवालय में उपलब्ध नहीं हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय के निदेशक एवं अपीलीय अधिकारी कृष्ण कुमार ने अपने जवाब में कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी को 15 दिनों के अंदर सूचना मुहैया कराने के लिए निर्देशित किया जाता है। कृष्ण कुमार ने तीन फरवरी को पत्र लिखा और 15 दिन का इंतिजार किए बगैर उसी दिन मामला निस्तारित भी कर दिया। सूचना अब तक नहीं आई। निर्देशों का उल्लंघन करने वाले अधिकारी पर कार्रवाई कौन करे ? केंद्र का अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय आधिकारिक तौर पर कहता है कि मंत्री के. रहमान खान व अफसरों का दल ने मुजफ्फरनगर दंगे के प्रभावित क्षेत्रों और राहत शिविरों का दौरा किया था। फिर यह भी कहता है कि मंत्रालय ने कोई टीम नहीं भेजी। अजीब बात है कि मुजफ्फरनगर दंगे से जुड़े सवालों को जवाब के लिए पहले मंत्रालय के 'मल्टी सेक्टोरल डेवलपमेंट प्रोग्राम' वाले महकमे में भेज दिया गया था। काफी धक्के खाने के बाद मंत्रालय पहुंचने पर यह जवाब आया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मुजफ्फनगर दंगे से सम्बद्ध कार्रवाइयों के बारे में पूछे गए सवाल का जवाब देने के बजाय 10 रुपए के पोस्टल ऑर्डर का मसला उठाया। आयोग ने कहा कि अस्पष्ट तारीख वाले पोस्टल ऑर्डर पर जवाब नहीं भेजा जाएगा। इस सांप्रदायिक दंगे पर राष्ट्रीय महिला आयोग का हाल भी जान लीजिए । महिला आयोग ने जांच दल बनाया और उसे दस दिन के भीतर जांच रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। यह 18 सितम्बर 2013 का ही आदेश है। कई महीने बीत गए , फिर भी जांच रिपोर्ट नदारद ! ? है ना घोर अंधेर नगरी की दास्तान |  

Apr 3, 2014

बिच्छू - कोबरा गैंग .....

बिच्छू - कोबरा गैंग .....

रेल यात्रियों सावधान ! यात्रा में आपको कभी भी बिच्छु - कोबरा गैंग मिल सकता है | इसका कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप किस ट्रेन में और किस दर्जे में यात्रा कर रहे हैं | अच्छी कहलानेवाली ट्रेनें भी इनकी हरकतों से वंचित नहीं हैं | सुरक्षाकर्मी भी इनसे मिले होते हैं , इसलिए जहाँ इनकी मौजूदगी दिखी , ये रफूचक्कर हो जाते हैं | टीटी और अन्य रेलकर्मियों का यही हाल है | कोई इनसे पंगा नहीं लेना चाहता ! रेल यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा की किसी को परवाह नहीं है | 
अभी पिछले दिनों 31 मार्च को मैं इस बिच्छू - कोबरा गैंग के आतंक का प्रत्यक्षदर्शी और भुक्तभोगी बना | मैं उस रात पूर्णतः एसी ट्रेन दुरंतो एक्सप्रेस  [ 12271 ] से नई दिल्ली आने के लिए लखनऊ में बी इ कोच 1 में सपत्नीक बैठा | यह कोच पूरे प्लेटफार्म पर चक्कर लगाने के बाद बड़ी मुश्किल से मिला , क्योंकि बी इ 1 इंजन के पीछे लगा था और बी इ 2 ट्रेन का सबसे पिछला कोच था |
 बर्थ का रिजर्वेशन [ पी एन आर नं . -  2619347693] पहले से करा रखा था |  बर्थ नंबर 63 और 64 पर बैठते ही पन्द्रह - बीस की तादाद में बिच्छू - कोबरा गैंग के सदस्य घुसे . जिनमें से कुछ का बर्थ रिजर्व था | लग रहा था कि कइयों के पास टिकट नहीं हैं | ये सभी कोच के एक गेट के पास की बर्थों पर , जहाँ हम सबकी बर्थ थी , हुडदंग मचाते हुए आकर बैठ गये | रात के लगभग सवा ग्यारह रहे थे | भारी शोरगुल और हंगामे के बीच सिगरेट की कसों ने पूरा वातावरण प्रदूषित कर दिया | तेज़ दुर्गन्ध से मेरी पत्नी का सर चकराने और दुखने लगा | ट्रेन चल पड़ी | इनके हंगामे को देखते हुए ऐसा लग रहा था कि ये सभी पूरी रात यात्रियों को परेशान करेंगे | 
मैंने विषम हालात को देखते हुए कुछ बोलना उचित न समझा | लगभग बारह बज चुके थे | अब गैंग वालों की शराब - कबाब की बारी आयी | सिगरेट का दौर तो सुबह दिल्ली पहुंचने तक चलता रहा | शराब की पांच - सात बोतलें खुलीं | खाने का ढेर सारी चीज़ें थीं उनके पास , जिन्हें खाकर वे शराब गटकते रहे | कोच के आधे हिस्से को मयखाना बना डाला | विकास नामक व्यक्ति ने देखते ही देखते एक बोतल से अधिक गटक ली थी | इतनी बदबू कि बैठना बहुत मुश्किल हो रहा था , लेकिन मुझ समेत किसी यात्री में यह हिम्मत नहीं थी कि कुछ विरोध - शब्द बोल सके | बोलने का मतलब एकदम साफ़ था - पिट जाना |
जब शराब - कबाब का दौर चल रहा था , तभी एक टीटी महोदय कोच के उसी ओर गेट खोलकर घुसे , जिधर हम लोग थे और हुडदंग चल रहा था | टीटी ने टिकट माँगा , तो एक सज्जन ने उसे शराब की बोतल थमा दी और दूसरे ने कहा - कहा नहीं जानता हमारे बिच्छू - कोबरा गैंग को ? इतना सुनना था कि बोतल रखकर टीटी महोदय भाग खड़े हुए | फिर कोई टीटी नहीं आया | सुरक्षाकर्मी पहले से ही नदारद थे | पता चला किसी एसी कोच में सुरक्षाकर्मी आराम फरमा रहे हैं |
पूरी रात इनका तांडव जारी रहा | देर रात एकभद्र महिला का सब्र जवाब दे गया | उन्होंने यह कहकर विरोध जताया कि हंगामा बंद करो | सुबह ड्यूटी पर जाना है , इसलिए सोना ज़रुरी है | मैंने भी महिला का समर्थन किया , लेकिन विरोध करने का अच्छा नतीजा नहीं निकला | पूरी रात कोच ' जीवंत नरक ' में ही तब्दील रही |
गैंग के गुंडे अपशब्दों की बौछार करने लगे | हालात भांपकर महिला ने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी | गुंडा तत्व किस तरह गुंडागर्दी करके लोकतंत्र को हड़प लेते हैं और विधि - विधान और क़ानून की मौजूदगी में जनता की परेशानियाँ किस हद तक बढ़ा देते हैं , इसकी एक नहीं अनेक घटनाएं घटती रहती हैं | उक्त घटना के सिलसिले में रेल - प्रशासन को चाहिए कि इसे गंभीरता से लेते हुए कड़ी कार्रवाई करे और असामाजिक तत्वों की हरकतों से यात्रियों को सुरक्षित रखे |  
- डॉ . मुहम्मद अहमद