May 27, 2014

लोकतंत्र की घुटती आवाज़ !

राजनीतिक असहिष्णुता के बढ़ते मामले

लोकतंत्र की घुटती आवाज़ !

क्या हमारे देश से लोकतान्त्रिक मूल्यों का जनाज़ा निकलना शुरू हो गया है ? हाल में घटित हुई कुछ घटनाएं कुछ निराशाजनक कहानी ही बयान करती हैं | नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री नामित होते ही देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर काले बादल छाना शुरू हो गए हैं। नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ टिप्पणी करनेवाले लेखकों , पत्रकारो और रचनाकारों - फेसबुकियों को लगातार धमकाया जा रहा है । आम चुनावों के परिणाम आते ही कन्नड़ के मशहूर साहित्यकार यू आर अनंतमूर्ति को डराने-धमकाने की जो हरकतें सामने आयी हैं, वे बेहद चिंताजनक और निंदनीय हैं | अनंतमूर्ति द्वारा पुलिस से की गयी शिकायत के अनुसार उन्हें धमकाने और बुरा-भला कहने वाले फोन आये | मंगलोर के नमो ब्रिगेड और शिमोगा की भाजपा इकाई ने अलग-अलग उन्हें पाकिस्तान जाने का एकतरफा हवाई टिकट कटा कर भेजा है | पुलिस ने इस मामले में कोई जांच शुरू नहीं की गयी | कहा गया कि शिकायत मौखिक है , अतः कार्रवाई नहीं हो सकती | पुलिस ने शिकायत को कलमबंद करने की कष्ट भी नहीं किया | अनंतमूर्ति कन्नड़ भाषा के ही नही भारतीय साहित्य के महान साहित्यकारों में एक है. अपने उपन्यास संस्कार में उन्होंने धर्म की रुढिवादिता और प्रगतिशील सोच के द्वन्द को काफी सशक्त रूप से व्यक्त किया है. यू. आर. अनंतमूर्ति को भारत का एक प्रतिनिधि लेखक कहा जा सकता है। उनकी रचनाओं के अनुवाद हिंदी, बंगला , मराठी, मलयालम, गुजराती सहित अनेक भारतीय भाषाओं सहित अंग्रेजी, रूसी, फ्रेंच, हंगेरियन आदि अनेक विदेशी भाषाओं में भी प्रचुर मात्रा में हुए हैं। उनकी अनेक रचनाओं पर बहुचर्चित फिल्में बनी हैं, नाट्य प्रस्तुतियाँ खेली गई हैं। वह दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर रहे हैं। साहित्य के अनेक अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में हिस्सेदारी की है। हिंदी पाठकों में भी समान रूप से लोकप्रिय अनंतमूर्ति 'नेशनल बुक ट्रस्ट' नई दिल्ली के चेयरमैन और साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष भी रहे हैं। एक अन्य घटना में एम एम एस भेजने के आरोप में 25 वर्षीय बेंगलुरु के एम बी ए छात्र वक्कास बरमावर को विगत 26 मई को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है | कोस्टल कर्नाटक के भटकल से आम आदमी पार्टी के इस कार्यकर्ता को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आपत्तिजनक एमएमएस सर्कुलेट करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। भटकल के मशहूर उर्दू कवि समीउल्लाह बरमावर के बेटे वक्कास बरमावर को चार दोस्तों के साथ बेंगलुरु में एक अपार्टमेंट से सिटी पुलिस के सेंट्रल क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार किया। वक्कास के चारों दोस्तों को पुलिस ने कुछ देर पूछताछ के बाद छोड़ दिया।

वक्कास फिलहाल पुलिस हिरासत में ही हैं। पुलिस सूत्रों के मुताबिक वक्कास को बेलगाम के खानपुर में पूछताछ के लिए ले जाया गया। वक्कास ने एमएमएस में एक अज्ञात शव में नरेंद्र मोदी का फेस जोड़कर भाजपा के इलेक्शन स्लोगन 'अबकी बार मोदी सरकार' की तर्ज़ पर लिखा था- 'अबकी बार अंतिम संस्कार'। आरोप है कि यह एमएमएस कुछ वॉट्सऐप ग्रुप पर भेजा जा रहा था जिसे आम आदमी पार्टी के ऐक्टिविस्ट हैंडल करते हैं। सूत्रों के मुताबिक गलती से यह एमएमएस बेलगाम में एक बीजेपी समर्थक के पास चला गया और उसने पुलिस में इसकी शिकायत दर्ज करा दी। पुलिस ने इस मामले में गिरफ्तारी की पुष्टि की है। गिरफ्तारी से उत्तर कन्नड़ जिले के भटकल में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता गुस्से में हैं। इनका कहना है कि इमेज राजनीति व्यंग्य के रूप में थी। आप के टिकट पर उत्तर कन्नड़ जिले से चुनाव लड़ने वाले राघवेंद्र थाणे ने कहा कि हमलोग राज्य स्तर पर इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन करेंगे। भाजपा की तरफ से चुनावी कैंपेन के दौरान भी हम लोग टारगेट किए गए। उन्होंने कहा कि भटकल में आप के मुस्लिम कार्यकर्ताओं को परेशान किया जा रहा है। फेसबुक पर टिप्पणी करने वाले गोवा के  एक अन्य युवक देवू चोडानकर के बारे में कहा जाता है कि उसे जल्द ही गिरफ्तार किया जा सकता है। उसने फेसबुक पर लिखा था कि अगर मोदी की सरकार बनी तो दक्षिण गोवा में ईसाई अपनी पहचान खो देंगे। इस टिप्पणी के बाद गोवा पुलिस ने देवू के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। गोवा क्राइम ब्रांच देवू की तलाश में अलग-अलग जगह छापेमारी कर रही है। स्थानीय अदालत ने उसकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। पुलिस का कहना है कि युवक को हिरासत में लेना जरूरी है ताकि उसके इरादों के बारे में जाना जा सके। शिकायतकर्ता के मुताबिक देवू ने 23 मार्च 2014 लिखा कि मोदी के आने पर विध्वसं भी हो सकता है। लेकिन इस पोस्ट को देवू ने हटा लिया। पुलिस ने देवू के खिलाफ आईपीसी की धारा 153 ए, 295 ए और 125 के तहत मामला दर्ज किया है। गोवा के पुलिस महानिदेशक टी मोहन ने कहा है कि इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई की जाएगी | गोवा हाईकोर्ट से देवू की अग्रिम ज़मानत लेने के प्रयास किए जा रहे हैं | कई सामाजिक संगठन पुलिस की इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ हैं | उन्होंने पुलिस मुख्यालय पर प्रदर्शन भी किया है | एक दूसरी घटना ट्विटर पर घटी | अभिनेत्री स्वरा भास्कर को नरेंद्र मोदी की जीत के खिलाफ ट्विटर पर किए कमेंट पर न केवल मोदी समर्थकों के गुस्से का शिकार होना पड़ा बल्कि अपने एकाउंट  पर एब्यूजिंग लैंग्वेज से भी गुजरना पड़ा। स्वरा ने मोदी की जीत पर निशाना साधते हुए गुजरात दंगों का जिक्र करते ट्वीट किया था , जिसके तुरंत बाद ही वे मोदी समर्थकों के निशाने पर आ गयीं और उनके ट्विटर पेज पर भद्दे और आपत्तिजनक ट्वीट की बाढ़ सी आ गई | इतना ही नहीं कुछ ने तो उन पर पर्सनली कमेंट भी कर डाले। फिल्मकार श्याम बेनेगल के टीवी सीरियल ' संविधान: मेकिंग ऑफ दि इंडियन कान्सटीट्यूशन ' में भी नजर आ चुकी स्वरा अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर बहुत चिंतित हैं , जो स्वाभाविक है |

May 18, 2014

मोदी सरकार के समक्ष चुनौतियाँ

मोदी सरकार के समक्ष चुनौतियाँ 
 
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी देश के नये प्रधानमंत्री होंगे | भाजपा के गठबंधन एनडीए को लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिल चुका है | देश के संसदीय इतिहास में तीस साल बाद किसी पार्टी के इतनी अधिक सीटें मिली हैं | भाजपा को पहली बार इतनी अधिक सीटें - उसकी आशा से बहुत अधिक सीटें प्राप्त हुई हैं |
भारत और दक्षिण अफ्रीका में एक ही समय केन्द्रीय सत्ता के लिए चुनाव हुए | दोनों देशों में लोकतंत्र हैं और दोनों देशों की समस्याएं लगभग एक जैसी हैं | वहां की सत्तारूढ़ एएनसी ने सत्ता विरोधी वेग के बावजूद लगातार पांचवी बार जीत दर्ज की है और राष्ट्रपति जैकब जुमा दोबारा सत्ता संभालने के लिए तैयार हैं। यह चुनाव अफ्रीका के अग्रनेता नेल्सन मंडेला के देहांत के बाद हुए होते तो स्वाभाविक था कि एएनसी को सहानुभूति लहर का लाभ मिलता। 
बावजूद इसके उसके वोट प्रतिशत में जो गिरावट आयी है, उस पर जैकब जुमा समेत तमाम लोगों को विचार करने की आवश्यकता है। राष्ट्रपति जुमा के पहले कार्यकाल में भ्रष्टाचार के कई आरोप सरकार पर लगे। बुनियादी सुविधाओं के अभाव, बेरोजगारी जैसे मसलों पर देश में सरकार विरोधी हिंसक प्रदर्शन हुए।
 इकानामिक फ्रीडम पार्टी के युवा नेता जूनियस मलेमा, जो पहले एएनसी के यूथ लीग के अध्यक्ष थे और पार्टी से निकाले जाने के बाद 2013 में , ने सत्ताधारी पार्टी को कड़ी चुनौती दी। इसी प्रकार विपक्षी दल डेमोक्रेटिक एलांयस, जो मुख्यत: गोरों की पार्टी कही जाती है, की नेता हेलेन जिले ने पिछले कुछ सालों में अश्वेत लोगों के बीच अपनी अच्छी पकड़ बना ली है। 
सुश्री जिले पहले पत्रकार थींऔर अश्वेत नेता स्टीव बीको की मृत्यु का सच उन्होंने उद्घाटित किया था। वे केपटाउन की मेयर रही हैं। नशीली दवाओं के व्यापार, अपराध व बेरोजगारी पर अंकुश लगाने की सफलता ने उन्हें 2008 में वल्र्ड मेयर आफ द इयर का खिताब दिलवाया था। वे रंगभेद विरोधी आंदोलन से जुड़ी रही हैं। 
भारत में सत्ता विरोधी लहर और सत्ताधारियों द्वारा जनता की समस्याओं की अनदेखी के सबब सत्तारूढ़ दल को सत्ता त्यागने के लिए मजबूर होना पड़ा है | अतः यह सही है कि सरकार के भ्रष्टाचार और खराब काम-काज ने नरेंद्र मोदी के लिए लाल कालीन बिछा दिया। लेकिन सरकार को पार्टी अध्यक्ष सोनिया और उपाध्यक्ष राहुल ने कैसे नचाया, यह भी जगजाहिर है। यूपीए-1 में मनमोहन सिंह के सलाहकार रहे संजय बारू की किताब प्रधानमंत्री के काम में सोनिया की दखलंदाजी के अनेक दृष्टांत देती है। 
राहुल गाँधी की जुबानी सरकार के फैसले को 'बकवास' और 'फाड़कर फेंक देने लायक' बताना भी दबाव बनाने का हिस्सा था | वैसे देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कड़े उपाय ज़रूरी थे , मगर यह काम सत्ता विरोधी लहर को कम से कम करके किया जा सकता था | क़दमों को जनविरोधी बनने से किसी हद तक रोका जा सकता था | इस सिलसिले में आधार की सब्सीडी रसोई गैस के लिए अनिवार्यता और सब्सीडी के सिलेंडरों को सीमित करने के क़दमों ने बड़ा गुल खिलाया | बढ़ती महंगाई ने कांग्रेस का बड़ा कबाड़ा किया | 
दूसरी ओर कांग्रेस अति दंभ का शिकार थी , क्योंकि यूपीए 2 उसकी गोदी में बैठे - बिठाये अनायास आ गया था , जिसकी कांग्रेसी अपेक्षा नहीं कर रहे थे | नई सरकार को इस तरह की गलतियों यानी जनविरोधी क़दमों से बचना होगा | 16 वीं लोकसभा के चुनाव सही मायने में पार्टी - आधार पर नहीं हुए | लोकतंत्र को धता बताकर व्यक्तिवाद चला | ख़ासकर मोदी , राहुल और केजरीवाल के नामों पर चुनाव लड़ा गया , जो लोकतान्त्रिक मूल्यों का साफ़ अवमूल्यन है | 
आरोप - प्रत्यारोप के दौर में विकास गुम हो गया | गुजरात माडल की जिसने भी चर्चा की , उसकी भद हुई , लिहाज़ा उसने चुप्पी साध रखने में ही अपनी समझी | ऐसे में पूरा चुनाव जनता की समस्याओं से कोसों दूर रहा | मतदान के अंतिम दिन महंगाई का तोहफ़ा अलग से दिया गया ! डीज़ल के दाम एक रुपये नौ पैसे बढ़ा दिए गये , मानो बस इसका इन्तिज़ार हो कि कब मतदान का अंतिम दिन आए और पूंजीपतियों को फ़ायदा पहुचाकर ख़ुद मालामाल हुआ जाए | 
वैसे महंगाई बढ़ाने की शुरुआत गुजरात के सरकार नियंत्रित अमूल दुग्ध उद्योग द्वारा मतदान के अंतिम चरण के दो दिन पहले ही दूध के दाम दो रुपये प्रति लीटर बढ़ाकर कर दी गयी थी | फिर मतदान के अंतिम दिन मदर डेयरी आदि ने अमूल की पैरवी की ! उल्लेखनीय है कि मोदी जी वाराणसी में भी अमूल उद्योग लगाने का ऐलान कर चुके हैं |
नरेंद्र मोदी तो अपने को उसी दिन से प्रधानमंत्री मान चुके थे , जिस दिन भाजपा ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का अपना उम्मीदवार बनाया था | उनका आत्मविश्वास तो देखते ही बनता है ! पिछले साल 15 अगस्त को उन्होंने बनावटी लालकिले से भाषण दिया | उनकी चुनावी रैलियां गोयबल्स से कम नहीं थीं | अपने भाषणों में वे अपने को चायवाला बताकर गरीब तबक़े का ध्यान खींचा ही , पूंजीपतियों के भी प्रिय बने रहे , जिसका सबूत शेयर मार्केट का सेंसेक्स देता रहा | एक्जिट पोल के लीक होते ही शेयर मार्केट में बहार आ गयी | ऐसा क्यों न हो !
मोदी जी ने बार - बार साबित किया है कि वे पूंजीपतियों के हितैषी हैं | मज़दूरों के शोषण पर जब रतन टाटा सिंगुर [ पश्चिम बंगाल ] से भगाए गये , तो उन्होंने टाटा को अहमदाबाद में नैनो के लिए 725 एकड़ जमीन दी | इस पर टाटा खुश हुए और उन्हें उनमें देश का भावी प्रधानमंत्री दिखा | इस आशय का टाटा ने बयान भी दिया | टाटा के इस ऐलान का अन्य कई पूंजीपतियों ने समर्थन किया | ऐसा क्यों न हो ? 
मोदी जी ने अपने शासनकाल में पूंजीपतियों को मात्र 900 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से दो लाख हेक्टेयर ज़मीनें जो दी हैं , उसके प्रति कृतज्ञता तो दिखानी ही थी | कहा जाता है कि इसके अतिरिक्त मोदी जी ने अदानी को बेहद सस्ते रेट पर बडौदा नगर के क्षेत्रफल से अधिक ज़मीनें उपलब्ध करायी हैं , लेकिन उनका यह क़दम उचित है , क्योंकि जो जमीनें उन्होंने दीं , वे अति बंजर हैं | मोदी जी पूंजीपतियों के उत्थान के लिए गुजरात में 13 विशेष निवेश क्षेत्रों के निर्माण  की दिशा में क़दम उठाया है | इसके लिए प्रत्येक विशेष निवेश क्षेत्र के लिए सौ किमी तक किसानों से ज़मीनें ली जाएँगी , जिसका किसान लगातार विरोध कर रहे हैं | 
विरोध करनेवालों को गुजरात पुलिस गिरफ्तार करके जेलों में डाल चुकी है | लालजी देसाई और सागर रबारी जैसे नेता गिरफ्तार किए जा चुके हैं , लेकिन मोदी अपने फ़ैसले पर अटल हैं | बहुत - से जानकर मानते हैं कि मोदी की कार्यप्रणाली में फासीवादी पुट अधिक है , जिसकी वजह से देश के धर्म निरपेक्ष , मानवाधिकारवादी और अल्पसंख्यक वर्ग के लोग आशंकित हैं | मोदी जी और भाजपा को यह आशंका दूर करनी होगी |  साथ ही देश का तेज़ी के साथ जनोन्मुखी सर्वसमावेशी विकास करना होगा | डालर को रोककर बढ़ती महंगाई पर काबू पाना होगा |
  इस बार के चुनाव परिणाम पर थोड़ा स्थिर होकर गंभीरता से सोचने की ज़रूरत होगी। यह सच है कि चुनाव के पहले देश भर में एक कांग्रेस-विरोधी हवा चल रही थी। उसका प्रचार के प्रारंभिक दौर में विपक्ष की प्रमुख पार्टी भाजपा को लाभ मिलना तय था। लेकिन भाजपा ने अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी को सामने लाकर इस पूरे दृष्यपट में एक गुणात्मक परिवर्तन का बीजारोपण किया। देखते-देखते एनडीए और भाजपा का कायांतर हो गया और वह सब एक व्यक्ति की, मोदी की पार्टी के रूप में बदल गया। साथ ही जिस राजग ने अपने प्रचार की शुरूआत भ्रष्टाचार-विरोधी, विकास-केंद्रित विपक्ष के गठबंधन के रूप में की थी, वह मतदान के वक़्त तक आते-आते सांप्रदायिक और जातिवादी विद्वेष की मोदी पार्टी में बदल गया।
 इस लम्बे प्रचार अभियान में मोदी और उनकी पार्टी का पूरा रवैया ऐसा रहा, जिससे वह विपक्ष की पार्टी प्रतीत ही नहीं होती थी। मोदी पार्टी ने धन की ताक़त का सबसे अधिक अश्लील प्रदर्शन किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस क़दर ख़ामोश हो गये जैसे देश का कोई प्रधानमंत्री ही न हो, और उनके इस रिक्त स्थान को नरेन्द्र मोदी और उनके जयगान में जुटे दरबारियों ने सिर्फ़ अपने शोर के बल पर चुनाव के पहले ही जैसे हथिया लिया। इस प्रकार, कांग्रेस-विरोधी माहौल से शुरू हुआ चुनाव कब और कैसे साम्प्रदायिकता बनाम धर्म-निरपेक्षता के चुनाव में, कब सामाजिक न्याय की एक और लड़ाई में बदल गया, किसी को पता भी नहीं चला। 
चुनाव नतीजों को देखकर कुछ टिप्पणीकार यह फरमा रहे हैं कि मुसलमानों ने मोदी का खुलकर विरोध किया और अपने वोटों को बर्बाद किया - प्रभावहीन बना लिया , ये दोनों बातें सच नहीं हैं | हाँ , यह सच है कि गुजरात - प्रकरण के चलते मोदी को सेकुलर लोग भी पसंद नहीं करते हैं , फिर यह मान लिया जाए कि देश से सेकुलर फैक्टर सिरे से गायब हो गया है , किसी भी रूप में सही नहीं होगा | यह सच है कि मोदी ने विकास की भी बातें बार - बार की हैं , हालाँकि वे इस पर अटल न रह सके | 
फिर भी वे मतदाताओं को जितना विश्वास दिला सके मुसलमानों और सेकुलर लोगों का उतना वोट वे पा भी सके | जहाँ विकास की बात होगी और उसमें गंभीरता दिखेगी , तो विकास के पक्ष में जनमत बनेगा ही | लेकिन नई सरकार को ख़ासकर अल्पसंख्यकों की आशंकाओं को ज़रूर दूर करना होगा | आशा की जानी चाहिए कि मोदी जी धर्म , मत और अन्य आग्रहों से ऊपर उठकर सिर्फ़ देश के विकास के लिए काम करेंगे , जैसा कि उन्होंने अपने चुनाव - प्रचार में बार - बार वादा किया है | वैसे मोटे तौर पर देश के समक्ष दस बड़ी चुनौतियां हैं - 
1 . देश की आर्थिक प्रगति को पक्षपातरहित होकर जनोन्मुखी और सर्वसमावेशी बनाना | इस सिलसिले में मनरेगा की समीक्षा और खाद्य सुरक्षा क़ानून को प्रभावी  ढंग से लागू करने जैसे क़दम उठाना , ताकि तेज़ रफ़्तार से आर्थिक प्रगति हो सके | डालर और चीनी हथकंडों से देश को हरहाल में बचाना होगा | 
2 . बिजली उत्पादन की ओर पर्याप्त ध्यान देना होगा , ताकि देश के बुनियादी ढांचे को मज़बूत बनाया जा सके | इस सिलसिले में निजीकरण और पूंजीवादी जाल से भी बचने की ज़रूरत है | नव एवं वैकल्पिक ऊर्जा क्षेत्रों को प्रोत्साहित किए जाने की भी आवश्यकता है |
3 .  नदियों को जोड़ने के व्यापक अभियान की ज़रूरत है , ताकि सिंचाई की ओर ध्यान देकर प्रगति को सुनिश्चित किया जा सके |
4 . पर्यावरण सुरक्षा के प्रति ठोस क़दम उठाना |
5 . अल्पसंख्यक समुदायों की उन्नति - प्रगति और उनकी धार्मिक - सांस्कृतिक पहचान की संरक्षा हेतु सकारात्मक क़दम उठाना | इस सिलसिले में हरहाल में सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखना और इसे बढ़ावा देना बहुत आवश्यक है |
6 . देश की सुरक्षा के लिए सामरिक आयुधों एवं संसाधनों की ओर समुचित ध्यान देना समय की आवश्यकता है |
7 . जनता की समस्याओं को कम करने के लिए बहुत - से क़दम उठाने की ज़रूरत है | बिजली , पानी , स्वास्थ्य , महंगाई से संबंधित समस्याएं हल करना सरकार की पहली प्राथमिकता बनती है |
8 . बेरोज़गारी को दूर करने के लिए ठोस और प्रभावी रणनीति बनाई जानी चाहिए |
9  .  भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोक लगाना | यह विभिन्न समस्याओं की जननी है |
10 . अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की साख - इज्जत को और बढ़ाने की ज़रूरत है | इस सिलसिले में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए | 
भोजपुरी अभिनेता मनोज तिवारी सही फरमाते हैं कि मोदी जी ने काँटों भरा ताज पहना है | तिवारी जी भाजपा के नये सांसद हैं | वे भाजपा की आंतरिक हालत से भी वाकिफ़ हैं | पार्टी में गुटबंदी से कौन इन्कार कर सकता है , लेकिन नेताओं पर आर एस एस का अनुशासन का चाबुक उन्हें ज़रूर रोकेगा , जो स्थायी सरकार का मार्ग प्रशस्त करेगा |  
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

नक्सलवाद - कठोर क़दम उठाएं

झीरम घाटी में फिर भयानक खूनखराबा

लचर राजनीति छोड़कर कठोर क़दम उठाएं

देश में बढ़ती नक्सल समस्या पर काबू पाने के लिए गत वर्ष 6 जून को नई दिल्ली में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री डॉ . मनमोहन सिंह ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हुए नक्सल हमले का जिक्र करते हुए कहा था कि इस तरह की हिंसा का हमारे लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है। केंद्र और राज्यों को साथ मिल कर काम करने की जरूरत है ताकि सुनिश्चित हो सके कि इस तरह की घटना फिर से न होने पाए। उन्होंने कहा था कि माओवादियों के खिलाफ सक्रियता से सतत अभियान चलाने और वामपंथी उग्रवाद प्रभावित इलाकों में विकास और शासन से जुडे मुद्दों के समाधान की दो-स्तरीय रणनीति को और मजबूत करने की जरूरत है। माओवादी हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा और खुफिया तंत्र मजबूत करने के प्रयासों के साथ ही हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसे इलाकों में रहने वाले लोग शांति और सुरक्षा के माहौल में रह सकें और विकास के प्रयासों से उन्हें पूरा फायदा हासिल हो सके। आप देख ही रहे हैं कि प्रधानमंत्री के वक्तव्य पर ध्यान नहीं दिया गया और  दंतेवाड़ा में 2010 में सीआरपीएफ के 76 जवानों के खूनी नरसंहार की यादें 11 मार्च 2014  को एक बार फिर ताजा हो गईं , जब लगभग 200 नक्सलियों के गिरोह ने एक बार फिर झीरम घाटी के उसी इलाके में सुरक्षाबलों पर हमला बोलकर 15 जवानों सहित 16 लोगों की ताबड़तोड़ गोलीबारी कर हत्या कर दी। नक्सलियों ने सुरक्षा बलों से 15 स्वचालित हथियार भी लूट लिए और तीन वाहनों में आग लगा दी। करीब तीन घंटे तक चली मुठभेड़ के बाद वे मृत पुलिसकर्मियों के हथियार और गोला बारूद भी लेकर फरार हो गए। बताया जाता है कि दिनदहाड़े हुए इस हमले को दंडकारण्य जोनल कमेटी की दड़बा घाटी इकाई के रामन्ना-सुरिंदर-देवा की तिकड़ी ने अंजाम दिया है। यह हमला जिस स्थान पर हुआ है , वह इससे पहले पिछले वर्ष 23 मई को कांग्रेसी नेताओं के काफिले पर हुए हमले से महज पांच किलोमीटर की दूरी पर है। उस हमले में नक्सलियों ने महेंद्र कर्मा सहित राज्य कांग्रेस के समूचे नेतृत्व का लगभग सफाया कर दिया था। इसी गिरोह ने पिछले हमले में छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस प्रमुख नंद कुमार पटेल और उनके बेटे और कर्मा सहित 25 लोगों की जान ली थी।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने घटना की निंदा की है। केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने घटना पर शोक जताते हुए कहा कि हम नक्सलियों से सीधी टक्कर लेंगे। नक्सली गतिविधियों से पूरी कठोरता से निपटा जाएगा और हम ऐसा करेंगे। इस प्रकार के बयान पहले भी दिए जाते रहे हैं , लेकिन सदा लापरवाही ही सरकार की अघोषित नीति रही है | नई दिल्ली में सीआरपीएफ के अधिकारियों ने हमले के लिए सुरक्षा चूक को भी जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने बताया कि सीआरपीएफ और स्थानीय पुलिस की 48 सदस्यीय संयुक्त टीम ने मानक परिचालन प्रक्रिया (एसओपी) का पूरी तरह उल्लंघन किया। यह टीम रोजाना निर्माण स्थल पर जा रही थी और एक ही रास्ते से जा रही थी। नक्सल रोधी अभियान में किसी एक ही रास्ते से बार बार न गुजरने के सिद्धांत का यहां उल्लंघन हुआ। वास्तव में यह सुरक्षा का इस्लामी सिद्धांत है , जिस पर पूरी दुनिया में अमल किया जाता है | ऐसा लगता है कि सुरक्षाकर्मियों की आवाजाही पर माओवादियों की निगाह थी। ऐसे में उन्हें सुनियोजित हमले के लिए पर्याप्त समय मिल गया। सच बात यह है कि यह हमला भी अपने साथ कुछ नये - पुराने सवाल लेकर आया है | इनमें पहला यह कि नक्सली हमले में क्रास फायरिंग होती है पर कोई नक्सली मारा नहीं जाता ? दूसरा सवाल यह कि जब पता है की नक्सली इलाका है तो वहां का सूचना - तंत्र इतना कमजोर क्यों कि  वे  सौ -दो सौ की संख्या में जमा होकर घात लगाते हैं, पर उनकी खबर वारदात तक नहीं मिल पाती ! ? तीसरा सवाल यह कि हमला तीन - तीन घंटे तक चलता है , पर वहां अतिरिक्त जवान क्यों नहीं पहुँचते , जबकि थाना वारदात स्थल से कोई पांच किमी पर है ? इसी क्रम में यह बात भी कि नक्सली वारदात बाद काफी देर गन,कारतूस,जूते और दीगर सामान लूटते रहे और जवान की पार्थिव देह के नीचे प्रेशर बम लगते रहे ,पर कोई अतिरिक्त फ़ोर्स नहीं पहुची ! और चौथा सवाल यह कि केद्र अलर्ट देने की बात कहता है | वैसे भी चुनाव के इस माहौल में नक्सली हमले की आशंका बढ़ जाती है , फिर भी पर्याप्त फ़ोर्स मौके पर क्यों नहीं पहुंची ? ऐसे में क्या यह सच नहीं कि अवसरवादी , ओछी और लचर राजनीति ने इस संकट को नासूर में तब्दील कर डाला है ? जब हम देश के आंतरिक दुश्मनों के ख़िलाफ़ प्रभावी , ठोस और कठोर क़दम नहीं उठा सकते , विदेशी दुश्मनों से कैसे निबट पायेंगे ?
 - डॉ . मुहम्मद अहमद 

May 11, 2014

निराश हो न हताश


निराश हो न हताश , कभी तुम न हो उदास 
शूरवीर बनो तुम , गिरते - उठते बढ़े चलो |
बनो जलधार जिधर चलो , राह ख़ुद बनती जाए 
शौर्य -  पौरुष की अकथ कहानी तुम कहते चलो |
बुद्धि - विवेक का साथ न जाए हाथ से कभी 
परोपकार -  पराक्रम का दर्पण बनते चलो |
 -  मोहित 

May 9, 2014

डॉ . मुहम्मद अहमद को '' विद्यावारिधि ''


May 6, 2014

मुस्लिम पर्सनल ला में अनुचित हस्तक्षेप

मुस्लिम पर्सनल ला में अनुचित हस्तक्षेप

23 अप्रैल 1985 को सुप्रीमकोर्ट ने महम्मद अहमद खां बनाम शाहबानो बेगम मुक़दमे में जो फ़ैसला सुनाया था और मुसलमानों के विरोध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने संसद द्वारा इसके विरोध में क़ानून बनवाकर इसके अमलदरामद पर रोक लगवा दी थी , ठीक वैसा ही फ़ैसला 29 साल के बाद सुप्रीमकोर्ट द्वारा दिया जाना अत्यंत अफ़सोसनाक और निंदनीय है | यह मुस्लिम पर्सनल ला में सीधा हस्तक्षेप है | इसे एक इत्तिफ़ाक़ ही कहेंगे कि ताज़ा फ़ैसला भी अप्रैल के महीने में आया है , जब लोकसभा के लिए मतदान हो रहे हैं | ऐसे में यह माना जा सकता है कि उस समय भी चुनावी माहौल रहा होगा | बहरहाल इसे जनमत ध्रवीकरण के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए | गत 26 अप्रैल को शमीम बानो बनाम अशरफ़ खां मुक़दमे की सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपक मिश्र और जस्टिस विक्रमजीत सेन की खंडपीठ ने अपने फ़ैसले में मुस्लिम महिला को इद्दत [ तलाक़ के बाद तीन महीने तक ] की अवधि पूरी होने के बाद भी पति से गुज़ारा भत्ता लेने का हक़दार ठहराया | पीठ ने कहा कि मुस्लिम महिला [ तलाक़ अधिकार संरक्षण ] क़ानून की धारा 3 के तहत गुज़ारा भत्ता देने की व्यवस्था सिर्फ़ इद्दत तक सीमित नहीं है देश के मुसलमान "मुस्लिम पर्सनल लॉ अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 द्वारा शासित हैं |"  यह मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ को निर्देशित करता है जिसमें शादी, महर, तलाक, रखरखाव, उपहार, वक्फ, चाह और विरासत शामिल है | सुप्रीमकोर्ट का ताज़ा फ़ैसला सहज रूप से विवादकारी है , क्योंकि यह इस्लाम की शिक्षाओं के अनुरूप नहीं है | इस प्रकार यह मुस्लिम पर्सनल ला में सीधा हस्तक्षेप है | कुछ लोग यह भी कहते हैं कि देश में एक ही नागरिक क़ानून होना चाहिए , जिसका भारतीय संविधान समर्थन करता है | इसके अनुच्छेद 44 [ नीति निर्देशक तत्व ] में समान सिविल कोड की परिकल्पना की गयी है | इसके हवाले से सुप्रीमकोर्ट केंद्र सरकार को पहले सुझाव दे चुकी है कि पूरे देश में समान सिविल कोड लागू करे | संघ परिवार इसके लिए बहुत लालायित दिखता रहा है , जबकि यह सच्चाई सबको पता है कि भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में इसे लागू कर पाना असंभव है लेकिन वोटों की राजनीति को चमकाने के लिए इसके लिए दुष्प्रयास किए जाते रहे हैं | मदनलाल खुराना जिन्हें भाजपा ने काम निकल जाने के बाद गंदे - बदबूदार कीचड़ में फेंक दिया था , जब दिल्ली के मुख्यमंत्री थे , तब उन्होंने इस बाबत एक प्रस्ताव विधानसभा में पारित तक करवा लिया था | मध्यप्रदेश प्रदेश विधानसभा में भी भाजपा के लोगों ने भी ऐसे दुष्प्रयास किए , जो अंततः नाकाम हो गये , क्योंकि ये नाकाम होने ही थे | यह संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त उनके मौलिक अधिकारों के सर्वथा विपरीत है | संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को अंतःकरण और धर्मानुसार अमल करने की आज़ादी देता है | ऐसी ही बात संविधान की प्रस्तावना में कही गई है |

   संविधान में धाराओं 25(1) और 26 के अंतर्गत जो बातें कही गई है उनका सार यह है कि हर धार्मिक समुदाय को इसका अधिकार प्राप्त होगा कि अपने धर्म पर चले, तथा अपने तौर पर अपने धार्मिक क्रिया-कलाप अंजाम दे। अतः यह सिर्फ़ मुसलमानों (या अन्य अल्पसंख्यक समुदायों) का मामला ही नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधान का भी तक़ाज़ा है कि उसके अंतर्गत देश में समान सिविल कोड लागू न हो। यही आदर्श बात भी है | मुसलमानों ने भी समान सिविल कोड को लागू नहीं किया | जब वे लगभग नौ सौ वर्ष देश के शासक रहे , कभी भी उन्होंने हिन्दू या अन्य धर्मानुयायी जनता पर अपना क़ानून नहीं थोपा | अंग्रेज़ों ने लार्ड मैकाले की अध्यक्षता में समिति बनकर भारतीय दंड संहिता , भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता , भारतीय व्यवहार प्रक्रिया संहिता , भारतीय साक्ष्य अधिनियम आदि बहुत - से क़ानून लागू कर दिए , लेकिन समान सिविल कोड की ओर नहीं बढ़े , क्योंकि वे ज़ालिम होने के बावजूद यह जानते थे कि यह किसी भी क़ीमत पर लागू नहीं हो सकता | उन्होंने मुसलमानों के लिए पारिवारिक क़ानून 1937 और अलग से मुस्लिम मैरिज डिज़ुलेशन एक्ट 1939 बनाया | देश के किसी भी ख्यातलब्ध विचारक एवं विद्वान ने समान सिविल कोड का समर्थन नहीं किया है | संविधान निर्माता डॉ . अंबेडकर ने संविधान निर्मात्री सभा में नीति निर्देशक तत्व की धारा 44 में इस बाबत रखे गये प्रावधान पर दक्षिण के कुछ मुस्लिम सदस्यों की आपत्ति का जवाब देते हुए कहा था कि जब तक सब देशवासी इसके लिए राज़ी नहीं होंगे , इसे कदापि लागू नहीं किया जाएगा | देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं . जवाहरलाल नेहरू ने कई बार इसी आशय का मत प्रकट किया था | तत्कालीन सरसंघ चालक गुरु गोलवलकर ने भी इसकी आवश्यकता को सिरे से ख़ारिज किया है | 20 अगस्त 1972 को दिल्ली स्थित दीनदयाल शोध संस्थान के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने साफ़ कहा था कि देश में समान सिविल कोड अवांछित है | उन्होंने कहा था कि जो लोग समान सिविल कोड की बात करते हैं , वे भारत की ज़रूरत समझते ही नहीं हैं | गुरु जी ने इसी आशय के उद्गार एक इंटरव्यू में व्यक्त किए थे , जो 26 अगस्त 1972 को ' मदरलैंड ' में छपा था | आश्चर्य की बात है कि संघ परिवारी अपने गुरु जी की बात का बार - बार अनादर करते हैं | भाजपा के हाल के चुनाव घोषणापत्र में इसकी बात है | भाजपा नेताओं द्वारा इसकी ज़रूरत बार - बार बताकर गुरु जी की आत्मा को ठेस पहुंचाई जाती है | सुप्रीमकोर्ट का ताज़ा फ़ैसला भी अवांछित है | एक ओर देश में मौजूद मुस्लिम पर्सनल ला में बहुत - सी ख़ामियां हैं , जिन्हें दूर करने की ज़रूरत है , दूसरी ओर इन खामियों को और नहीं बढ़ाया जाना चाहिए |