Jun 27, 2014

हाँ , मैं बिहारी हूँ

हाँ , मैं बिहारी हूँ 

अभी कुछ देर पहले की बात है | एक मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र से गुज़र रहा था | इसी बीच एक मरियल कार ड्राइव करते हुए एक नव धनाड्य सामने आते दिखे | मैं सड़क  की एक साइड  पर खड़ा हो गया , ताकि कार निकल जाए , तब मैं सुगमता से आगे बढूँ |  इसी प्रयास में कार से निकले कुछ शब्द मेरे कानों से टकराए , जिन्होंने मुझे बिम्बवादी दुनिया की ओर सरका दिया | शब्दों का विस्फोट तो नहीं हुआ , किन्तु ये शब्द मेरे कानों में अब भी गूंज रहे हैं | '' चल हट , बिहारी '' ....  मैंने कार पर निगाह डाली और उस स्थूलकाय शरीर पर भी , जिसके हाथों में कार की स्टीयरिंग थी तथा उसके पास लटकते हुए उस लोलक पर  , जिस पर कुछ धार्मिक शब्द लिखे थे | मैं समझ गया कि यह ' बाहरी ' हैं और भारत की गौरवमयी संस्कृति एवं मूल्यों से अनभिज्ञ है | मुझे खुद के बिहारी होने का एक बार फिर बोध हुआ .....  यह शब्द मेरे लिए अपशब्द नहीं है , बल्कि गौरवपूर्ण शब्द है ..... इसी प्रकार मैं बंगाली भी हूँ , पंजाबी भी , मद्रासी भी , राजस्थानी भी आदि - आदि |  
- Dr. M. Ahmad 

Jun 17, 2014

स्टंटबाज़ों पर कब लगेगी रोक ?

स्टंटबाज़ों पर कब लगेगी रोक ?

- डॉ . मुहम्मद अहमद
पिछले कुछ साल से शबे-बरआत को मुसलमान युवकों द्वारा सडकों पर हुडदंग मचाने और मोटरसाइकलों से स्टंट करने के बढते चलन से परेशान मुस्लिम समुदाय इस बार इसे रोकने में नाकाम रहा | इस बार समुदाय के संभ्रांत और अन्य जिम्मेदार लोगों ने अवाम से अपील की थी कि वे शबे-बरआत को अपने बच्चों को मोटर साइकिल और स्कूटर न दें। साथ ही यह संदेश भी पहुंचाया था कि यह रात इबादत की होती है न कि शोर-शराबा करके उसमें खलल डालने या लोगों को परेशान करने की | दिल्ली पुलिस भी इस बार हुडदंग को रोकने के लिए खासी मुस्तैद नजर आ रही थी | पुलिस ने मस्जिदों के इमामों और अन्यों के साथ बैठकें की थीं | पर्चे बांट कर भी लोगों से अपील की थी , मगर ये सब कोशिशें आख़िरकार धरी की धरी रह गयीं |
शबे - बरआत को लेकर दिल्ली ट्रैफिक पुलिस द्वारा किए गए कड़े इंतजामों के बावजूद राजधानी में कुछ ही घंटों में बाइकर्स ने ट्रैफिक नियम तोड़ने का रिकार्ड बना डाला। इस मौके पर बाइकर्स ने पूरी दिल्ली में जगह-जगह जमकर हुड़दंग मचाया और पुलिस तमाशा देखती रही। खास तौर पर उत्तर-पूर्वी जिले के सीलमपुर, न्यू उस्मानपुर, जाफराबाद और शास्त्री पार्क इलाकों में बाइकर्स ने कानून को ताक पर रखकर जमकर खतरनाक स्टंट किए और देर रातभर स्टंटबाजी का सिलसिला चलता रहा। हालांकि स्टंटबाजी के दौरान किसी को नुकसान पहुंचने की खबर नहीं है।
इस दौरान पुलिस ने 2884 वाहनों के चालान काटे। इस मौक़े पर  राजधानी में अलग-अलग साउथ, नॉर्थ, नॉर्थ-ईस्ट, सेन्ट्रल और नई दिल्ली जिलों में 182 जगहों पर पुलिस की विशेष तौर पर तैनाती की गई थी। 13 जून की  रात में सड़कों पर भारी भीड़ उतरी जिनमें बाइकर्स की संख्या भी बहुत ज्यादा थी। नई दिल्ली जिले को छोड़ दें तो अन्य जिलों में देर रात तक बाइकर्स का हंगामा चलता रहा। पुरानी दिल्ली से दक्षिणी दिल्ली जाने वाले मथुरा रोड पर बेरिकेड नहीं थे। इसी रोड पर देर रात तक हंगामा चलता रहा जबकि प्रगति मैदान के पास कुछ बाइकर्स ने उत्पात मचाया।
 इसी तरह सीलमपुर,जामा मस्जिद, वजीराबाद रोड, रोहिणी, जीटी रोड, शास्त्री पार्क, जाफराबाद, सीमापुरी समेत मुस्लिम बहुल इलाकों में भी हंगामा हुआ। सूत्रों की माने तो बगैर हेलमेट के एक बाइक पर बैठे तीन-तीन युवकों ने खूब स्टंट किए। किसी ने बाइक पर लेट कर सवारी की तो किसी ने आगे-पीछे के पहिये को उठाकर स्टंट किया। वहीं इस बार इंडिया गेट पर बाइकर्स पुलिस की सख्ती के चलते स्टंटबाजी नहीं कर पाए।
पिछले साल जब उत्तराखंड में बाढ़ , भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं से हज़ारों - हज़ार लोगों की ज़िंदगियाँ छिन गई थीं  | बहुत बड़ा क्षेत्र तबाह व बर्बाद हो गया | पीड़ितजनों के आंसू थम नहीं पा रहे थे , शबे बरआत पर कुछ मुसलमान नवजवान और लड़के  दिल्ली की सड़कों पर जश्न मनाते नज़र आ रहे थे ! यह वह अमल था , जिसकी इस्लाम में कोई सनद नहीं | हाँ , रमज़ान के आने से पूर्व ऐसा माहौल पैदा किया जाना चाहिए , जिसमें इस माह की बरकतों से फ़ायदा उठाना आसान हो जाए | लेकिन हुडदंग , शोरशराबा  और हंगामा पैदा करने को कोई कैसे समर्थन कर सकता है ?
पिछले शबे बरआत [ 24 जून ] को दिल्ली के इंडिया गेट पर हज़ारों बाइक सवारों ने करीब चार घंटे तक जमकर हुडदंग मचाया | ख़तरनाक स्टंटबाज़ियाँ कीं | पूरे इलाक़े को एक तरह से अपने क़ब्ज़े में ले लिया | उन्होंने वहां से गुज़रनेवालों की परवाह नहीं की | हज़ारों की तादाद में उत्पात मचानेवालों के सामने पुलिसकर्मी असहाय और बेबस हो गए | पुलिस को इन पर काबू पाने में लगभग दो घंटे लग गए | जब बाइक सवार बेरिकेड तोड़ने लगे और उस पर वाहन से टक्कर मारने लगे , तो हुडदंगियों को खदेड़ने के लिए ज़िले के डी सी पी को भारी संख्या में पुलिस बल के साथ सड़कों पर पर उतरकर मोर्चा संभालना पड़ा था |
इस बार भी दिल्ली और देश के अन्य स्थानों पर भी हुडदंग का आलम रहा | यह रात शालीनता से पेश आने की रात है न कि सडकों पर उतर कर शोरगुल करने की | जो लोग ऐसा करते हैं और लोगों को परेशान करते हैं तथा अपनी जिंदगी को खतरों में डालते हैं वे  इस्लाम और मुसलमानों की छवि बिगाड़ते हैं | चांदनी चौक स्थित फतेहपुरी शाही मस्जिद के इमाम मौलाना मुफ्ती मुकर्रम का कहना है कि ‘‘शबे-बरआत तो असल में इबादत की रात है | इसमें कहां से आ गया बाजार जाना, सैर सपाटा करना, बाइक चलाना | यह वक्त की बर्बादी है और गुनाह है |
हमें अल्लाह से दुआ करनी चाहिए. चाहे हम मस्जिद में बैठें या घर में। हमें अपने गुनाहों और बीती जिंदगी में किए गए कर्मो का जायजा लेना चाहिए और अल्लाह से तौबा करनी चाहिए | उन्होंने कहा कि ‘‘मोहल्ला कमेटियां और मज़हबी लीडर युवाओं को बताएं कि शबे बरआत क्या है और उन्हें नेक कामों में लगाएं  उन्हें समझाएं कि ऐसा कोई काम नहीं होना चाहिए जिससे दूसरों को पेरशानी हो या खुद के लिए समस्या पैदा हो। मैं खुद पिछले 15 दिनों से इस काम में लगा हुआ हूं. मुझे उम्मीद है कि इस बार कुछ अच्छा असर पडेगा और हम इसी तरह लगे रहे तो साल दो साल में यह समस्या खत्म हो जाएगी | ’’

मुस्लिम नवजवानों के इस अमल को भर्त्सना के साथ उन्हें ऐसे असभ्य व अशालीन हरकतों के प्रति हतोत्साहित किया जाना चाहिए | यह इस्तिकबाल - ए रमज़ान नहीं है , बल्कि ऐसा कोई भी काम जो अशालीन और खुदा की बन्दगी से ख़ाली हो , इस्लामी हुक्म और आचार से बाहर है | वास्तव में इस्तिक़बाल - ए रमज़ान की विभिन्न सरगर्मियों के द्वारा मुस्लिम समाज में ऐसी फ़ज़ा पैदा की जा सकती है , जो नेकियों के लिए साज़गार हो और जिसमें बुराईयाँ मिटने लगें | अफ़सोस और तशवीश की बात यह है कि  रमज़ान से पूर्व उसके लिए जो मंसूबा बनाना चाहिए , वह हमारे समाज में अब कम ही नज़र आता है | हमें इस ओर भी ध्यान देना चाहिए |   

Jun 10, 2014

ज्ञानवापी मस्जिद और अखिलेश सरकार

ज्ञानवापी मस्जिद और अखिलेश सरकार

-डॉ . मुहम्मद अहमद
आम चुनाव ने अखिलेश सरकार की नींद हराम कर दी है | जिस गुजरात माडल को आये दिन कोसा जा था , उसके लिए उसी माडल को अपनाना अब ज़रुरी ही नहीं अनिवार्य हो गया है | अतः यह माना जा रहा है कि लगभग दो वर्ष दो माह पुरानी सरकार के लिए आनेवाले दिन अच्छे नहीं लग रहे हैं | समाजवादी पार्टी नई चुनावी रणनीति बनाने में जुटी हुई है |
अब वह धार्मिक कार्ड खेलने से तौबा करेगी , बल्कि धार्मिक अभियंत्रण पर पूरा - पूरा ध्यान देगी | सपा का यह ' अभियान ' भाजपा और बसपा के इस तरह के अनुप्रयोगों पर भारी पड़ेगा | सपा जिस धार्मिक अभियंत्रण पर काम कर रही है है , वह यह है कि काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर दिया जाए |
इस बार लोकसभा चुनाव में इसका राजनीतिक फायदा भले ही नहीं उठाया जा सका, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में यह 'धार्मिक-अभियांत्रिकी' अपना असर जरूर दिखाएगी। भारतीय जनता पार्टी बाबरी मस्जिद के साथ काशी  - मथुरा का विवाद राजनीतिक पटल पर उछालती और उसका फायदा उठाती रही है।
 अब भाजपा चूँकि केन्द्रीय सत्ता में है , इसलिए समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में  भाजपा के विस्तार को रोकने के लिए इस योजना को अमली शक्ल देने में जुटी है | काशी के सिलसिले में अखिलेश सरकार ने जो फार्मूला बनाया है, उससे संकेत मिल रहा है कि हिंदू या मुस्लिम समुदाय के लोगों को कोई आपत्ति नहीं होगी।
काशी विवाद के स्थायी समाधान के लिए प्रदेश सरकार काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद के इर्द-गिर्द और उसकी व्यापक परिधि के सारे मकान और जमीनों का अधिग्रहण करने जा रही है। जिनके घर या जिनकी जमीनें ली जाएंगी उन्हें बाजार दर पर उसकी कीमत दी जाएगी। मंशा यह है कि मंदिर और मस्जिद के लिए आने-जाने वाले श्रद्धालुओं को जितनी मुश्किलों और आपसी तनाव का सामना करना पड़ता है, उसका हमेशा के लिए समाधान निकल आए। मंदिर और मस्जिद के पास के व्यापक इलाके को खाली कर मंदिर और मस्जिद के रास्ते अलग-अलग कर दिए जाएंगे।
मंदिर और मस्जिद के लिए अलग-अलग विशाल द्वार के निर्माण के साथ ही मंदिर-मस्जिद को भव्य बनाने का काम निर्बाध रूप से हो सकेगा। अत्यंत संकरे रास्ते और मंदिर मस्जिद के रख-रखाव को लेकर होने वाले कामों को लेकर जो दुश्वारियां पेश आती रही हैं। इस विवाद को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए प्रदेश सरकार के धर्मार्थ कार्य विभाग ने एक विस्तृत प्रस्ताव औपचारिक तौर पर मुख्यमंत्री को सुपुर्द किया था जिसे सरकार ने हरी झंडी दे दी और आगे की कार्रवाई भी तेज़ी के साथ शुरू हो गई है।
प्रदेश के धर्मार्थ कार्य विभाग एवं सूचना विभाग के सचिव नवनीत सहगल ने काशी विवाद हल करने की इस महत्वपूर्ण योजना की आधिकारिक पुष्टि की है । उन्होंने कहा कि योजना का विस्तृत प्रस्ताव सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया गया था, जिस पर मंजूरी के बाद इस पर काम तेजी से हो रहा है।
काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद के चारों तरफ फैले नागरिक-बसाव को खाली कराने के लिए लोगों को उनके घरों की कीमतें दी जा रही हैं। इस योजना पर लोगों का समर्थन तो मिल रहा है, लेकिन पैसे की लालच में मालिकाना हक के कुछ विवाद भी खड़े किए जा रहे हैं, लेकिन सरकार उसका भी हल निकाल रही है। श्री सहगल ने उम्मीद जताई कि मंदिर और मस्जिद के रास्तों को अलग-अलग करने और विस्तार देने का काम भी शीघ्र ही शुरू हो सकेगा।
उल्लेखनीय है कि यह विवाद अब भी बना हुआ है | 11 अगस्त, 1936 को दीन मुहम्मद, मुहम्मद हुसैन और मुहम्मद जकरिया ने स्टेट इन काउन्सिल में प्रतिवाद संख्या-62 दाखिल किया और दावा किया कि सम्पूर्ण परिसर वक्फ की सम्पत्ति है। 24 अगस्त 1937 को वाद खारिज कर दिया गया। इसके खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील संख्या 466 दायर की गई लेकिन 1942 में उच्च न्यायालय ने इस अपील को भी खारिज कर दिया। कानूनी गुत्थियां साफ होने के बावजूद मंदिर-मस्जिद का मसला आज तक बना हुआ है | सपा इसे हल करने में सफल हो जाती है , तो यह उसके लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी , जिसका उसे राजनीतिक लाभ भी मिलेगा |
दूसरी ओर मोदी ने काशी की ओर अर्थात उत्तर प्रदेश के विकास की ओर ध्यान देने की बात कही है , जिससे सपा में खलबली मची और इसे पार्टी अपने अस्तित्व से जोड़कर देख रही है | नये प्रधानमंत्री ने काशी में गुजरात के सरकारी नियंत्रण वाले अमूल दुग्ध उद्योग की शाखा खोलने का ऐलान किया है | कुछ अख़बारों में यह भी छपा कि काशी में अघोषित रूप से मिनी प्रधानमंत्री कार्यालय होगा |
इस स्थिति में अखिलेश सरकार विकास कार्यों की ओर खास ध्यान देगी | उत्तर प्रदेश विकास के मामले में ग्यारहवीं पंच वर्षीय योजना का लक्ष्य हासिल करने में पीछे रहा है | पिछले दस वर्षो में गुजरात के सकल घरेलू उत्पाद की औसत वृद्धि दर 10.1 प्रतिशत रही जो राष्ट्रीय औसत से भी ज्यादा है। उप्र सरकार ने बारहवीं योजना की अवधि (2012-17) में सालाना दस फीसद की रफ्तार से आर्थिक विकास दर हासिल करने का लक्ष्य तय किया है। नियोजन विभाग का आकलन है कि यह लक्ष्य हासिल करने के लिए कुल 16,70,000 करोड़ रुपये की ज़रूरत होगी।
इसमें से 71 फीसद यानी 11,84,000 करोड़ रुपये निजी क्षेत्र से हासिल करने की मंशा जतायी गई है, लेकिन जमीनी हकीकत देखते हुए यह निवेश हासिल कर पाना राज्य सरकार के लिए आसान नहीं है। ग्यारहवीं योजना के दौरान उप्र सरकार ने सार्वजनिक-निजी सहभागिता (पीपीपी) के आधार पर 2,64,204 रुपये का निवेश हासिल करने का लक्ष्य तय किया था। इसके सापेक्ष योजना की अवधि में असल निवेश महज 42,942 रुपये ही हो सका था।

अखिलेश सरकार के लिए यह चिंता की बात है कि सवा दो वर्ष के कार्यकाल की उसकी कोई ख़ास उपलब्धि नहीं रही , जिसकी वजह से वह अपने प्रदेश को भाजपा के प्रभाव से ममता बनर्जी , नवीन पटनायक और जयललिता की भांति नहीं बचा पाई | अब अपने अस्तित्व की खातिर उसे कुछ करना ही पड़ेगा |