Aug 23, 2014

राहुल गाँधी ने दुखती रग पर हाथ रखा

 महिला - सम्मान के लिए मानसिकता में बदलाव की ज़रूरत 

कांग्रेस अपनी हार से तिलमिलाई हुई है | उसके सभी नेता अपने पुराने जनाधार की खोज में ऊलजलूल बयानबाज़ी पर भी आमादा दिख जाते हैं | वे जनता के बीच अपनी पकड़ बहाल करने के लिए कुछ आयोजन भी कर डालते हैं | ऐसे ही एक आयोजन महिला कांग्रेस का हुआ | विगत 20 अगस्त को दिल्ली के ताल कटोरा स्टेडियम में राजीव गांधी की 70 वीं जयंती के अवसर पर आयोजित महिला कांग्रेस के कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने विवादस्पद किन्तु यथार्थवादी बयान दिया , लेकिन इसी मौक़े पर एक अनुभवी कांग्रेसी मणि शंकर अय्यर ने मोदी विरोध में यहाँ तक कह दिया कि ' यदि आप सार्वजनिक जीवन में सक्रिय ऐसी महिलाओं को कांग्रेस में लाते हैं , तो मोदीजी को कल तक गाँधी नगर जाना पड़ेगा और फिर हम उन्हें समंदर में पहुंचा देंगे | ' इससे पूर्व वे मोदी को कांग्रेस सम्मेलनों में चाय बेचने की मुफ्त राय भी दे चुके हैं| इस वर्ष के आम चुनाव प्रचार के दौरान भी अय्यर ने मोदी को ' नया लड़का ' की उपाधि दी थी और कहा था कि जोश में आकर इसकी जुबान फिसल जाती है ! राहुल गाँधी ने एक कडुई सच्चाई उजागर करते हुए कहा कि जो लोग आपको माता और बहन कहते हैं, जो मंदिरों में मत्था टेकते हैं, देवी की पूजा करते हैं, वही बसों में आपके साथ छेड़छाड़ करते हैं | उन्होंने कहा कि समाज में महिला विरोधी मानसिकता इस कदर व्याप्त है कि पूरे देश में हर महिला को दबाया जाता है | उन्होंने कहा कि समाज महज कानून से नहीं बदलता है | समाज में महिलाओं के प्रति सोच बदलने की जरूरत है| जब तक लोगों की सोच नहीं बदलेगी तब तक समाज को बदलना आसान नहीं है| कांग्रेस के युवा नेता की इस बात से इन्कार नहीं कि समाज में आमूलचूल परिवर्तन हेतु सोच में बदलाव लाना एक बड़ी चुनौती है , लेकिन राहुल गाँधी ने महिला अनुकूल मानसिकता के निर्माण की ज़िम्मेदारी स्वयं महिलाओं पर डालकर अपने संभाषण का गला घोंट डाला | उन्होंने बलात्कार और महिला अत्याचार की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि कमी सोच की है | पुलिस और क़ानून से यह सब ठीक नहीं होगा | इसे महिलाएं ही ठीक कर सकती हैं | पुरुषों की सोच वे ही बदल सकती हैं |बाबा राहुल के इस बयान के विपरीत उनकी माँ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने पिछले वर्ष मार्च में इस आशय का बयान दिया था कि देश में महिलाओं के साथ बलात्कार और हिंसा की लगातार हो रही घटनाओं से हमारे सिर शर्म से झुक गए हैं |  उन्होंने इनके उपाय के तौर पर घोषणा की थी कि कन्या भ्रूणहत्या और महिलाओं के प्रति बढ़ रही चिंताजनक घटनाओं पर क़ाबू पाने के लिए जल्द ही कड़ा क़ानून बनाया जाएगा |  वास्तव में महिलाओं के प्रति आपराधिक घटनाओं में तेज़ी आई हुई है या यूँ कहें कि 16 दिसम्बर 2012 को 23 वर्षीया ज्योति की गेंगरेप के बाद हुई हत्या की हृदय विदारक घटना के बाद वे घटनाएं भी सामने आ जाती हैं , जो पहले दब - दबा जाती थीं | देश में बलात्कार की रोज़ाना अनेक घटनाएं घटित हो रही हैं | कुल मिलाकर स्थिति बिगड़ती जा रही है और महिलाओं का मान - सम्मान धूल - धूसरित हो रहा है
यह हकीक़त भी लोगों को पता है कि इन घटनाओं के साथ ही  कन्या - भ्रूण हत्या और विभिन्न रूपों में महिला - शोषण जारी है ! आज इधर - उधर की बातें बहुत की जा रहीं हैं | महिला - दिवस भी मनाया जाता है ... हर साल बड़े धूम - धाम से आलमी सतह पर .... पर महिला आज भी बहुल भावना और विचार के यथार्थ धरातल पर दोयम दर्जे पर है | उसके प्रति सामाजिक सोच में दोहरापन मौजूद है , यानी महिला होने के कारण वह अपने नैसर्गिक एवं फ़ितरी अधिकारों से वंचित है | अभी पिछली सदी में महिलाओं के प्रति जागरुकता का परिचय देते हुये अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने आह्वान किया और 8 मार्च का दिन महिलाओं के सशक्तीकरण के रूप में मनाया जाने लगा | सबसे पहले 28 फरवरी 1909 ई. को अमेरिका में यह दिवस मनाया गया, लेकिन जिन उद्देश्यों को लेकर इसकी शुरुआत की गई थी, वह बहुत पहले ही खत्म हो गया था | बस औपचारिकता अब तक बाक़ी है | आज दुनिया के सभी तथाकथित विकसित और विकासशील देशों में भी महिलाओं को लेकर लगभग एक जैसी दुखद  स्थिति बनी हुई है | भौतिक रूप से समाज और देश ने भले ही खूब तरक्की कर ली हो, लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि महिलाओं के प्रति हमारा नजरिया सकारात्मक नहीं है | सृष्टि में उसकी रचना भी उन्हीं गुणों और तत्वों के आधार पर हुई है, जिससे पुरुष बना है, किन्तु सामाजिक और पारिवारिक दृष्टि से महिला अभी भी न्याय की राह तक रही है |  उसे न्याय नहीं मिल सका है |  सामाजिक, आर्थिक आदि स्तरों पर महिलाएं आज भी बहुत पिछड़ी हैं | कल्पना तो यह भी गई  थी कि हमारे सामाजिक नजरिये में व्यापक बदलाव आयेगा और समाज अपने अभिन्न अंग को स्वयं के बराबर का दर्जा दे सकेगा, लेकिन ऐसा केवल पुस्तकीय ज्ञान और मंचीय भाषण तक सीमित होकर रह गया | ऐसे में यह विचार करना होगा कि साल में एक दिन महिलाओं के विषय में चिन्ता करना क्या पर्याप्त है या हमें उनके प्रति बाकी दिनों में भी चिन्ता करनी  चाहिये | संबंधों की बुनियाद पर आज किसी भी महिला को दहेज की दहलीज पार करनी पड़ती है , अन्यथा उसके साथ जो हश्र होता है वह किसी से छिपा नहीं है | हकीक़त यह है कि आज शिक्षा का प्रतिशत बढऩे के साथ ही नैतिकता का स्तर काफी गिरा है | दहेज  के कारण हत्याएं, मुकदमेबाजी, तलाक, बलात्कार जैसी घटनाओं ने तो मानवता के मुख पर कालिख ही पोत दी है |  बिना किसी पूर्वाग्रह के बात करें तो शहरों की स्थिति बड़ी नाजुक है, जो जितना अधिक उच्च शिक्षित, बड़े सामाजिक दायित्व वाला है, वह उतना ही अनैतिक आचरण करते सुना - देखा जाता है | वास्तव में महिला - सम्मान की बात केवल भाषणों तक सीमित होकर रह जाती है | महिलाओं की मानसिक और वैचारिक स्थिति का यदि नैतिकता के आधार पर अध्ययन किया जाए तो ऐसे आंकड़े सामने आएंगे, जो हमारे सामाजिक खोखलेपन को रेखांकित करेंगे | राष्ट्रीय स्तर पर जारी एक रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि एशिया में प्रतिवर्ष 10 लाख से ज्यादा लड़कियों को वेश्यावृत्ति के धंधों में उतारा जाता है | यह आंकड़ा कोलकाता, दिल्ली आदि महानगरों में ज्यादा है | इसी प्रकार से विदेशों में भारत से भेजी जाने वाली घरेलू कामकाजी महिलाओं की स्थिति तो और भी लज्जास्पद है | अखबार और टेलीविजन के पर्दे पर जब कभी कोई महिला यदि रोते बिलखते अपनी पीड़ा लेकर आती है , तब हम सामाजिक न्याय के झंडे उठा लेते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे कितनी जिन्दगियां सिसकते आंसुओं के सैलाब में अपना गुजर कर रही हैं. उनका तो कोई पुरसानेहाल नहीं हैं | अतः जरूरी है कि सामाजिक संदर्भों में हम महिलाओं  के प्रति अपनी दृष्टि को और व्यापक , पारदर्शी और उदार बनाएं |



हिन्दू राष्ट्र के पैरोकार ?

लगता है कि अब संघ प्रमुख मोहन भागवत हमेशा चर्चा में रहना पसंद करने लगे हैं | उन्होंने गत 17 अगस्त को एक नए विवाद को जन्म दे दिया। उन्होंने कहा कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और हिंदुत्व उसकी पहचान है। विहिप के स्वर्णजयंती समारोह के उद्घाटन कार्यक्रम में मुंबई में उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र है..हिंदुत्व हमारे राष्ट्र की पहचान है और यह अन्य धर्मों को स्वयं में समाहित कर सकता है।इससे पहले पिछले सप्ताह उन्होंने कटक में कथित तौर पर कहा था कि सभी भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिंदुत्व है ।
उन्होंने कहा था, ‘सभी भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिंदुत्व है और देश के वर्तमान निवासी इसी महान संस्कृति की संतान हैं।उन्होंने सवाल किया था कि यदि इंगलैंड के लोग इंगलिश हैं, जर्मनी के लोग जर्मन हैं अमेरिका के लोग अमेरिकी हैं तो हिंदुस्तान के सभी लोग हिंदू के रूप में क्यों नहीं जाने जाते। विहिप की स्थापना श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर 29-30 अगस्त, 1964 को मुंबई में हुई थी। 
संघ प्रमुख ने विहिप के लक्ष्यों के बारे में कहा, ‘अगले पांच सालों में हमें देश में सभी हिंदुओं के बीच समानता लाने के लक्ष्य पर काम करना है। सभी हिंदुओं को एक ही स्थान पर पानी पीना चाहिए, एक ही स्थान पर प्रार्थना करना चाहिए, और देहावसान के पश्चात उनके पार्थिव शरीरों का एक ही स्थान पर दाह संस्कार किया जाना चाहिए।’ 
यह बात माननी होगी कि केंद्र में मोदी सरकार के गठन के बाद हिंदुत्व संबंधी बयानों की बाढ़ आ गयी है | कुछ लोग तो भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में अपनी बात बलात मनवाने पर आमादा दीखते हैं | राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोग इस दुष्कर्म में आगे हैं | जो लोग यथार्थ में जीना चाहते हैं और भ्रामक स्थितियों से बचना चाहते हैं , वे इस प्रकार के दुष्प्रयासों का सदा से विरोध करते आये हैं , यहाँ तक कि एक भाजपा विधायक ने इस बयानबाज़ी का विरोध किया है
गोवा में भारतीय जनता पार्टी के विधायक माइकल लोबो ने विगत 18 अगस्त को संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने भारत को हिंदू राष्ट्र कहा था। लोबो ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी भी ऐसे बयान का समर्थन नहीं किया है। मीडिया से बातचीत में लोबो ने कहा, ''मुझे नहीं लगता कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने इस पर सहमति जताई है।'' ज़ाहिर है , लोबो का बयान राजनैतिक अधिक है , लेकिन संघ प्रमुख के उक्त बयान के विरुद्ध है
यह हमारे देश की जीवंत आत्मा ही है कि इसने कभी संकीर्ण विचारधारा को गवारा नहीं किया | बेबाक राय रखनेवाले हमेशा मौजूद रहे हैं | ताज़ा बयान पर कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने मोहन भागवत को हिटलर अनायास ही नहीं कह दिया । भागवत के विवादित बयान पर निशाना साधते हुए दिग्विजय सिंह ने टि्वटर पर लिखा है कि हम लोग एक ही हिटलर को जानते थे, लेकिन यहां दो हैं। अब भारत को भगवान ही बचाए | दिग्विजय सिंह ने अपने अन्य ट्वीट में भागवत से पूछा है कि जब हिन्दुत्व एक धार्मिक पहचान है, तो सनातन धर्म क्या है। 
दिग्विजय ने संघ के विचारधारा की तुलना तालिबान से करते हुए कहा है कि ऎसी सोच रखने वाले लोग देश की शांति को बिगाड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत जैसे सेकुलर देश धर्म को राजनीति से दूर रखना चाहिए और धर्म के नाम पर मासूम लोगों को मूर्ख नहीं बनाना चाहिए। सहज रूप अन्य राजनेताओं ने भी भागवत के बयान की आलोचना की है
आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष ने कहा कि जो लोग संघ और मोदी को अलग.अलग समझते हैं वे नहीं जानते कि दोनों समान गुण वाले हैं और मोदी संघ के विचारधारा की कठपुतली हैं।  समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने कहा कि सामाजिक तनाव भड़काने के लिए वे इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने संघ पर नफरत और अलगाववाद की राजनीति करने का आरोप लगाया। 


' हिन्दू ' शब्द में धर्म विशेष के अनुयायी होने का बोध

भारत बहुलवादी देश है, इस प्रमुख विशेषता को 

खत्म करने की कोशिश निंदनीय एवं अनुचित   
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार फिर उलटबांसी छेड़ी है | उन्होंने विगत दस अगस्त को भुवनेश्वर [ ओडिशा ] में कहा कि अगर इंग्लैंड में रहने वाले अंग्रेज हैं, जर्मनी में रहने वाले जर्मन हैं और अमेरिका में रहने वाले अमेरिकी हैं तो फिर हिन्दुस्तान में रहने वाले सभी लोग हिन्दू क्यों नहीं हो सकते।उड़िया भाषा के एक साप्ताहिक पत्रिका के स्वर्ण जयंती समारोह में भागवत ने कहा, 'सभी भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिंदुत्व है और देश में रहने वाले इस महान सस्कृति के वंशज हैं।' उन्होंने कहा कि हिंदुत्व एक जीवन शैली है और किसी भी ईश्वर की उपासना करने वाला अथवा किसी की उपासना नहीं करने वाला भी हिंदू हो सकता है। स्वामी विवेकानंद का हवाला देते हुए भागवत ने कहा कि किसी ईश्वर की उपासना नहीं करने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि कोई व्यक्ति नास्तिक है, हालांकि जिसका खुद में विश्वास नहीं है, वह निश्चित तौर पर नास्तिक है। संघ प्रमुख ने यह भी कहा, ''केंद्र में भाजपा के नेतृत्त्व वाली राजग सरकार के गठन का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं बल्कि लोगों को जाता है क्योंकि परिवर्तन उनकी इच्छा के चलते संभव हो पाया | '' भागवत ने कहा, ''कुछ लोग जीत का श्रेय पार्टी को दे रहे हैं जबकि अन्य लोग इसका श्रेय व्यक्तियों को दे रहे हैं , लेकिन इससे पहले भी संगठन और पार्टी थी और इसलिए व्यक्ति भी थे | उस समय क्या हुआ था? यह जनता है जो चुनाव के दौरान बदलाव चाहती थी और जिसने पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया | '' उल्लेखनीय है कि इस बयान के एक दिन पहले ही दिल्ली में हुई भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की कार्यकारिणी बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी की जीत का श्रेय अमित शाह को दिया था | अब इस सिलसिले में आर एस एस ने अपने प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर सफाई दी है | आरएसएस के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने कहा है कि मोहन भागवत के बयान को नरेंद्र मोदी के बयान से जोड़कर न देखा जाए | मोहन भागवत के इस बयान को नरेंद्र मोदी द्वारा की गई अमित शाह की तारीफ से न जोड़ा जाए | वैद्य ने कहा कि मोहन भागवत ने जो जनता को शासन बदलने का क्रेडिट दिया है वह बात पहले भी आरएसएस के अलग-अलग फोरम में कर चुके हैं | उन्होंने कहा, ''एक पार्टी के अंदर अगर नरेंद्र मोदी किसी की तारीफ करते है , तो वह उनके पार्टी के अंदर का performance assessment है. साथ ही अमित शाह उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे , जहां मिली सीटों का बीजेपी की जीत में बड़ा सहयोग है | इसलिए अपनी पार्टी के अंदर नरेंद्र मोदी का ऐसा कहना और भागवत जी का पब्लिक मीटिंग में कुछ कहना इनको जोड़ा नहीं जा सकता |'' उन्होंने कहा कि बस दोनों ने अलग-अलग बात एक ही समय में कही ये सिर्फ अनुषांगिक है | सच है कि मोहन भागवत के ताज़ा बयान में सबसे विवादकारी तत्व उनका ' हिंदुत्व ' संबंधी है , जिसमें उन्होंने सावरकर के उस दर्शन को आगे बढ़ाया था कि भारत में रहनेवाले सभी लोग हिन्दू हैं | उनकी इस बात पर भारतीय समाज के कई प्रबुद्ध जनों ने भागवत के बयान कि तीखी आलोचना करते हुए कई सवाल खड़े किये हैं , जिनमें ख़ास है कि क्या उन्होंने संविधान पढ़ा है और क्या उनका वास्तव में उसमें विश्वास है। 

देश के मुसलमानों के प्रमुख संगठन जमाअत  इस्लामी हिन्द के महासचिव जनाब नुसरत अली ने कहा है कि इस आशय का बयान गलत और भ्रमकारी है कि देश के निवासी हिन्दू हैं | उन्होंने कहा कि भारत बहुधार्मिक , बहुसांस्कृतिक और बहुलतावादी देश है , अतः यहाँ के निवासियों को हिन्दू कहने का दुराग्रह गलत है ,  संविधान विरोधी है और अविवेकपूर्ण है | उन्होंने कहा कि देश के मुसलमानों को इंडियन , भारतीय और हिन्दुस्तानी तो कहा जा सकता है , लेकिन हिन्दू नहीं कहा जा सकता , क्यों इससे धर्म विशेष की पहचान , बोध और भान होता है | भाजपा नेता विनय कटियार ने कहा, ‘‘उनका (भागवत) हिंदु का तात्पर्य हिंदुस्तानी था। उन्होंने लोगों की धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप करने की बात नहीं की।’’ देश की प्रमुख प्रतिपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता मनीष तिवारी ने कहा कि भागवत को अच्छी सलाह दी जाती है कि वे देश का  संविधान पढ़ें , जिसमें विशेष तौर पर कहा गया है कि इंडिया भारत है, राज्यों का संघ और उसमें कहीं भी ‘‘हिंदुस्तान’’ का उल्लेख नहीं है। माकपा के सीताराम येचुरी ने कहा कि भागवत को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वे संविधान में विश्वास करते हैं। हमारे संविधान में देश भारत हैं, हिंदुस्तान नहीं।’’ जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत अपने विश्वास की बदौलत ही इतनी दूर आया हैं और उसका भविष्य इसी रास्ते में है। बसपा प्रमुख मायावती ने भागवत को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि उन्हें संविधान का ‘‘उचित ज्ञान’’ नहीं है।उन्होंने कहा कि ‘‘जब अंबेडकर जी (भीमराव अंबेडकर) ने संविधान लिखा तो उन्होंने यह बात ध्यान में रखी कि हमारा देश में विभिन्न धर्मों का पालन करने वालों लोग रहते हैं। इसलिए नाम भारत दिया गया | ' हिंदुस्तान ' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया। संघ प्रमुख को संविधान की उचित जानकारी नहीं है। उन्हें उसका अध्ययन करना चाहिए और उसके बाद कोई टिप्पणी करनी चाहिए | आर्कडायोसिस ऑफ दिल्ली के फादर सविरीमुत्तु ने भागवत की टिप्पणी पर चिंता जताई और कहा कि भारत एक बहुलवादी देश है लेकिन संघ प्रमुख ने सभी को एक छतरी में लाने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा, ‘‘हमारा देश महान है जो कि एकता और विविधता के लिए जाना जाता है, अब आप एक देश, एक धर्म, एक संस्कृति बनाने का प्रयास कर रहे हैं | सभी को एक छतरी में लाने का प्रयास कर रहे हैं जो कि सही नहीं है।’’ वास्तव में ' हिन्दू ' शब्द से एक धर्म विशेष का बोध होता है | अतः इस प्रकार कि कोशिश निंदनीय है |

भाईचारे का रास्ता अपनाएं

68वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने ‌परंपरा से अलग हटकर बिना लिखा भाषण दिया , जो कई महत्वपूर्ण घोषणाओं से भरा था। उन्होंने एक पर जहाँ जातिवादी मानसिकता पर प्रहार किया , वहीं सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ वातावरण बनाने पर बल दिया | उन्होंने जनता का आह्वान किया कि भाईचारे का रास्ता अपनाएं , इसी में सबकी भलाई निहित है | उन्होंने कहा कि बहुत मार - काट कर ली , मगर क्या मिला ? उन्होंने जो कुछ कहा उससे अनचाहे तौर पर ही सही उनकी पहचान एक बार फिर ' घोषणा पुरुष ' बनने जैसी हुई | गरीबों को बैंकों से जोड़ने, गांवों के विकास, पर्यावरण के विकास के लिए सफाई, आईटी सेक्टर और निर्माण के क्षेत्र के विकास का संकल्प लिया।
 प्रधानमंत्री के भाषण के अन्य मुख्य बिन्दुओं में कुछ घोषणाएं इस प्रकार हैं -  1 . दो अक्तूबर से देश भर में सफाई अभियान की शुरुआत। 2 . एक साल में हर स्कूल में टॉयलेट बनाने का लक्ष्य। 3 . प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत गरीबों के बैंक खाते खुलेंगे। डेबिट कार्ड दिया जाएगा। एक लाख रुपए का बीमा होगा। 4 .संसद आदर्श ग्राम योजना के तहत हर संसदीय क्षेत्र में 2016 तक एक गांव का समग्र विकास किया जाएगा। और , 5 . भारत को मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का हब बनाने का एलान। ज़ाहिर है , ये आम बजट जैसी घोषणाएं हैं , जो अभी पिछले महीने विकासवादी संकल्प के रूप में सामने आ चुकी हैं |
 अगर केवल बजटीय घोषणाओं को  ही एक वित्तीय वर्ष की बची हुई अवधियों में अमली जामा पहना दिया जाए , तो भारत का कायाकल्प हो जाए ! मगर केवल घोषणाओं से देश की जनता का भला नहीं होनेवाला ! वैसे हमारे प्रिय देश में अवाम को घोषणाओं का जाम पिलाने की परंपरा रही है और जनता को फुसलाने व बहलाने का बड़ा हथियार ! 
1971 के चुनाव में कांग्रेस की ओर से इंदिरा गाँधी ने ' गरीबी हटाओ ' का नारा दिया था और सबसे बड़ा कांग्रेसी संकल्प क़रार दिया था | कांग्रेस द्वारा बार - बार चुनाव जीतने और सरकार बनाने के बावजूद यह महज़ चुनावी नारा ही बना रहा , जिसका इंदिरा गाँधी के पुत्र राजीव गाँधी ने भी भरपूर इस्तेमाल किया | किन्तु इस दिशा में क्रियान्वयन इस रूप में हुआ कि गरीबी बढ़ती चली गयी ! जो योजनाएं बनीं भी , वे कई पंचवर्षीय योजनाओं तक जारी रहीं
दरअसल ये ख़ासकर मंत्रियों , अफ़सरों और अन्य राजनेताओं के भरण - पोषण का ज़रिया बनती रहीं और भ्रष्टाचार रूपी काल के गाल में समाती रहीं | फिर भी जिन - जिनकी घोषणाओं की बदौलत देश जिस मक़ाम पर पहुंचा है , उनका स्मरण करना प्रधानमंत्री जी नहीं भूलते , लेकिन इस बात को शायद भूल जाते रहे कि लालकिले की प्राचीर से और चुनावी जनसभा के संभाषण में अंतर होता है
उन्होंने कहा , 'भाइयों और बहनों, देश की आजादी के बाद भारत आज जहां भी पहुंचा हैं, उसमें सभी सरकारों, सभी राज्य सरकारों का योगदान है। मैं सभी पूर्व सरकारों को, सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों को इस पल आदर का भाव प्रकट करना चाहता हूं। जो देश पुरातन सांस्कृतिक धरोहर की उस नींव पर खड़ा है, जहां हम साथ चलें, मिलकर सोचे, मिलकर संंकल्प करें और देश को आगे बढ़ाएं। ' प्रधानमंत्री ने देश को धूल - धूसरित करनेवाले भ्रष्टाचार के ज्वलंत मुद्दे को छुआ ही नहीं , जबकि अभी कुछ दिन पहले ही करगिल में उन्होंने भ्रष्टाचार रोकने का अपना संकल्प इन शब्दों में व्यक्त किया था , ' न खाऊंगा न खाने दूंगा | ' 
स्वतंत्रता दिवस पर उन्होंने यह अवश्य कहा कि 'जन आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए जो शासन व्यवस्था नाम की मशीनरी है, उसे धारदार बनाना है। सरकार में बैठे लोगों के पास सामर्थ्य है। मैं उस शक्ति को जोड़ना चाहता हूं। हम उसे करके रहेंगे। हमारे महापुरुषों ने आजादी दिलाई। क्या उनके सपनों को पूरा करने के लिए हमारी जिम्मेदारी है कि नहीं? क्या हम जो दिन भर कर रहे हैं, क्या कभी शाम को अपने आप से पूछा कि क्या उससे गरीबों का भला हुआ, देश का भला हुआ? दुर्भाग्य से आज देश में माहौल बना हुआ है कि किसी के पास कोई काम लेकर जाओ तो वह पूछता है कि इसमें मेरा क्या? जब उसे पता चलता है कि उसमें उसका कुछ नहीं है तो वह कहता है मुझे क्या? हर चीज अपने लिए नहीं होती। कुछ चीजें देश के लिए भी होती हैं। हमें देश हित के लिए काम करना है। हमें यह भाव जगाना है।'
प्रधानमंत्री ने इस अवसर का लाभ एक बड़ी महत्वपूर्ण की ओर अवाम का ध्यान आकृष्ट कराकर उठाया , वह है बढ़ती कन्या भ्रूणहत्या | उन्होंने कहा कि-क्या हमने हमारा लिंगानुपात देखा है? समाज में यह असंतुलन कौन बना रहा है? भगवान नहीं बना रहे |” प्रधानमंत्री ने बड़े मार्मिक अंदाज़ में कहा-बेटियों को मत मारो, यह 21 वीं सदी के भारत पर एक धब्बा है | उन्होंने डॉक्टरों से अपील की कि अपनी तिजोरी भरने के लिए वे किसी मां की कोख में पल रही बेटी को न मारें | उन्होंने लड़कियों का परिवार में महत्व बताते हुए कहा कि मैं ऐसे परिवारों को भी जानता हूँ ,जिनमें पांच बेटे थे और जो बड़े मकानों में रहते थे, लेकिन अपने बूढ़े मां-बाप को वृद्धाश्रम भेज दिया | उन्होंने कहा, वहीं, मैंने ऐसे परिवार भी देखे हैं, जिनमें इकलौती बेटी ने अपने माता-पिता की देखभाल करने के लिए शादी भी नहीं की | प्रधानमंत्री  ने याद दिलाया कि इस बार के राष्ट्रमंडल खेलों में मेडल जीतने वालों में 29 बेटियां भी शामिल थीं |