Nov 12, 2014

आतंक का एक और सबूत !


आतंक का एक और सबूत !


25 सितंबर 2014 | बड़ोदरा का याकूतपुरा इलाक़ा | अचानक पुलिसवालों का काफ़िला आ गया ! देखते ही देखते मीनार मस्जिद फ़ालिया , पटेल फ़ालिया 1 और  2 में खड़े वाहनों की तोड़फोड़ शुरू कर दी | पुलिसवाले पूरी तैयारी के साथ आये थे | लगभग सत्तर वाहनों जिनमें कार , ऑटो रिक्शा , मोटर साइकिलें थीं , सबको बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर डाला | साथ ही कई घरों के दरवाज़े तोड़ डाले और कुछ खिड़कियों पर हाथ साफ़ किया | जब महिलाओं [ मुस्लिम ] ने इस उत्पात का कारण जानना चाहा , तो उन्हें गंदी , आपत्तिजनक गलियाँ दीं और उनके दुपट्टों को खींचा , जिसके चलते उनके गलों पर दबाव पड़ने से उनका दम घुटने लगा | पुलिसवालों ने इतने पर बस नहीं किया | कुछ महिलाओं पर लाठीचार्ज भी किया | बच्चों को भी नहीं बख्शा | दसवीं कक्षा के एक छात्र को जो ट्यूशन से लौट रहा था , बुरी तरह पीट डाला | पुलिस की ये आतंकी हरकतें आसानी से खत्म नहीं हुईं ! आंसूगैस के 20 से 25 गोले छोड़े गये और पांच - छह राउंड फ़ायरिंग भी की गयी |
जब महिलाएं इसकी रिपोर्ट लिखवाने थाने गयीं , तो उन्हें भगा दिया गया | उन्हें अपशब्द कहे गये | लोगों ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज [ PUCL ] की तथ्य अन्वेषक टीम को बताया कि पुलिस ने इलाक़े के 40 - 50 नवजवानों को उनके घरों का दरवाज़ा खटखटा कर गिरफ्तार किया और उन्हें थाने के लाकअप में बंद कर दिया | इलाक़े के लोगों ने बताया कि पुलिस ने यह सब इसलिए किया ताकि मुसलमान इंटरनेट और सोशल मीडिया पर धर्म विरुद्ध डाली गयी सामग्री - वीडियो / फ़ोटो आदि का विरोध न करें | गिरफ्तार नवजवानों को इसी शर्त पर छोड़ा गया कि वे प्रतिक्रिया में कोई कार्रवाई नहीं करेंगे | वीडियो / फोटो नेट पर नहीं डालेंगे | बड़ोदरा में पुलिस ने पहले भी ऐसी कार्रवाइयां की हैं | कभी वह दंगाइयों के सहायक के तौर पर आती रही है , तो कभी मूकदर्शक बनी रहती है | ऐसे ही 2002 की सांप्रदायिक हिंसा के दौरान हुआ | तोड़फोड़ . आगज़नी , नवजवानों को पीटने , महिलाओं को अपमानित करने एवं हिंसा - प्रताड़ना की अन्य घटनाएं सामने आयीं | स्थानीय लोगों के अनुसार , पुलिस हिंसा को उकसाने और फैलाने के लिए ऐसा करती रही है |
पुलिस इस इस हरकत से मुसलमान सहज रूप से आहत और क्रुद्ध थे | जब उन्होंने कुछ किया ही नहीं , तो उन्हें किस बात की सज़ा दी गयी ? यह सवाल सामने ज़रूर था | लिहाज़ा PUCL से संपर्क किया और मानवाधिकार उल्लंघन के इस इस गंभीर मामले में मुसलमानों के एक प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस कमिश्नर से मुलाक़ात की | प्रतिनिधिमंडल को साफ़ महसूस हुआ कि उन्हें इंसाफ़ नहीं मिलनेवाला | PUCL के प्रयासों से पुलिस कमिश्नर राधा कृष्णन दिखावे के तौर पर पुलिस के हरकतों की जाँच करवाने का आदेश दिया | फिर भी पुलिस की आतंकी कार्रवाइयां 27 सितंबर की रात तक जारी रहीं | पुलिसवालों ने ताईवाडा और सत दरगाह इलाकों में भी आतंक मचाया | PUCL की तथ्य अन्वेषक टीम ने इन इलाक़ों से भी पुलिस अत्याचार के कई सबूत जुटाए हैं | टीम में सर्व श्री अशोक गुप्ता , तपन दास गुप्ता , रेशमा वोहरा , कमल ठाकर , युसूफ शेख़ , तृप्ति शाह , हार्दिक रत्न , हमीदा चन्दोल , नागिन भाई पटेल , सबीहा हाकिम और शौक़त इन्दौरी शामिल थे | pucl की इस बड़ोदरा इकाई ने अपनी रिपोर्ट मानवाधिकार आयोग , गुजरात के गृह विभाग और डी आई जी , गुजरात को भेजी है और दोषी पुलिसवालों के ख़िलाफ़ फ़ौरन कड़ी कार्रवाई की मांग की है |          

Nov 8, 2014

आस्था का सवाल ?

आस्था का सवाल ?
विदेशों में जमा काले धन की वापसी का मसला अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आस्था का सवाल बन गया है | अपने ' मन की बात ' बताते हुए उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर सही दिशा में बेहतर काम कर रही हैं। कालाधन वापस लाना उनकी आस्था का सवाल है और इस बारे में कोई कोताही नहीं बरती जाएगी। पाई-पाई वापस लाया जाएगा , लेकिन यह कालाधन कितना है, इसका सही अनुमान सरकार के पास नहीं है। मोदी जी की इसी बात के अनुवर्तन में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण तथा पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि यह सुनिश्चित करने के प्रयास होने चाहिए कि कोई भी अवैध बैंक खाता अस्तित्व में ही ना आए और उम्मीद जतायी कि ऐसा वर्तमान सरकार के तहत होगा। 
सभी जानते हैं कि काले धन के ख़िलाफ़ पिछली यूपीए सरकार ने भी काफ़ी हो - हल्ला लिया था | उसने  21 मई 2012 को काले धन पर श्वेतपत्र जारी किया था , जिससे यह लगा था कि यूपीए सरकार काले धन की समस्या से निबटने के प्रति गंभीर है | वर्तमान राष्ट्रपति एवं  तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा पेश इस दस्तावेज़ में भ्रष्टाचार के मामलों की तेज़ी से जाँच और दोषियों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई के लिए जल्द से जल्द लोकपाल और लोकायुक्त जैसी संस्थाओं का गठन किए जाने की बात कही गयी थी | तत्कालीन वित्तमंत्री ने आयकर विभाग में अभियोजन पक्ष को मज़बूत बनाने और प्रत्यक्ष कर क़ानूनों व नियमों को युक्तिसंगत बनाने की ओर इशारा करते हुए त्वरित अदालतों के गठन एवं अपराधियों को कड़ी सज़ा के प्रावधानों का समर्थन किया था |
 कुल 97 पेज के इस श्वेत पत्र में किसी आर्थिक अपराधी का नाम नहीं लिया गया था और न ही इस बारे में कोई जानकारी दी गयी थी कि दरअसल कितना काला धन विदेशों में है | सरकार ने इस सिलसिले में अन्य एजेंसियों के आकलन शामिल किए थे | उल्लेखनीय है कि यूपीए सरकार ने अपने पूरे कार्यकाल में आर्थिक अपराधों पर लगाम लगाने के लिए कम से कम उन उपायों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया , जिनको अपनाने की बात श्वेतपत्र में कही गयी थी | 
कुछ आर्थिक जानकारों का मानना है कि यह हल्ला - गुल्ला भी पूंजीपतियों के फ़ायदे के लिए किया जाता है , ताकि वे अपने काले धन को समेट सकें | ऐसा हुआ भी है | पूंजीपति अपने काले धन को विदेशी बैकों से लगातार सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने में व्यस्त हैं | एक आर्थिक चिंतक का कहना है कि लोग बेमतलब सरकार पर शक कर रहे हैं कि सरकार को साँप सूँघ गया ! हो सकता है कि काले धन को ही साँप सूँघ गया हो, इसलिए अब वह किसी विदेशी बैंक में दिख नहीं रहा है !
काले धन की वापसी को लेकर मोदी सरकार से जनता की बड़ी उम्मीदें हैं | इस सिलसिले में सरकार के पास तो बस एक लिस्ट थी, जो उसे पिछली सरकार से मिली थी। 
सुप्रीम कोर्ट के कहने पर सरकार ने अपना काम सँभालते ही जून में एसआईटी बना दी और लिस्ट उसे सौंप दी ! इस क़दम का लोगों ने स्वागत किया | छह महीने बाद गत 29 अक्तूबर 2014 को  सुप्रीम कोर्ट के कहने पर सरकार ने बड़ी ना-नुकुर के बाद फिर वही पुरानी लिस्ट कोर्ट में जमा कर दी। वाया सुप्रीम कोर्ट वही लिस्ट फिर से एसआईटी के पास पहुँच गयी !
इस बार हुआ सिर्फ़ इतना है कि अब ब्लैक लिस्ट की पोल खुल चुकी है | यही कि लिस्ट में आधे तो एनआरआई ही हैं, जिन पर देश के टैक्स कानून तो लागू ही नहीं होते | बाकी बची लिस्ट में बहुत-से खातों में एक दमड़ी भी नहीं है। सारा पैसा बरसों पहले ही कहीं और ठिकाने लगाया जा चुका है। बाकी बचे कुछ खातों में कुछ तो कानूनी रूप से बिल्कुल सही बताये जा रहे हैं, कुछ पर कार्रवाई होकर पहले ही जुर्माना वगैरह वसूला जा चुका है और जो बचे-खुचे ‘काले’ खाते हैं भी, उनमें कुछ ज्यादा बड़ी रकम नहीं है ! तो फिर किस बात के लिए आस्था का सवाल खड़ा किया जा रहा है ?

लाजपत नगर पोस्ट आफिस में जबरन दिए जा रहे प्रतिबंधित नोट

रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने उन नोटों के लेन  - देन पर रोक लगा रखी है , जो 2005 से पूर्व जारी किये गये थे और जिन पर सन अंकित नहीं है | एक अप्रैल 2014 से इन्हें सिर्फ़ बैंकों में वापस किया जा सकता है | इसके लिए भी आवश्यक है कि बैक में एकाउंट हो | मगर नई दिल्ली के लाजपत नगर स्थित पोस्ट आफिस इन नोटों को लेने के लिए उपभोक्ताओं को बाध्य कर रहा है और न लेने पर डाक कर्मी अशिष्टता पर उतर आते हैं | मैंने विगत पांच नवंबर को उक्त पोस्ट आफिस से अपने एकाउंट से बारह हज़ार रुपये निकाले , जिसमें एक - एक हज़ार के चार नोट 2005 के पूर्वकाल के थे , जिन्हें बदलने के लिए विंडो पर मौजूद महिला डाककर्मी महोदया से जब मैंने निवेदन किया , तो वे भड़क उठीं और कहा कि सब नोट सही हैं | अभद्र शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि तुम्हें किसने बता दिया कि जिन नोटों पर सन मुद्रित नहीं है , वे नोट व्यावहारिक चलन से बाहर हैं | मैंने उन्हें रिज़र्व बैंक की हिदायत का हवाला दिया , फिर भी उन्होंने सिर्फ़ एक हज़ार के एक नोट के पांच - पांच सौ कर दिए , जिनमें भी एक पांच सौ का नोट 2005 से पूर्व का था | उन्होंने शेष तीन हज़ार के साथ ही उस पांच सौ के नोट को वापस लेने से इन्कार कर दिया | यह भी साफ़ कह दिया कि जो नोट उपलब्ध हैं , वही मिलेंगे | उन्होंने कहा ' घर से लाकर थोड़े ही दूंगी | ' डाक विभाग के उच्च अधिकारियों से अनुरोध है कि प्रतिबंधित नोट उपभोक्ताओं को न प्रदान करें और कर्मचारियों को निर्देश दें कि उपभोक्ताओं से सदा शिष्ट व्यवहार करें |
- मुहम्मद अहमद 
संपादक ' कान्ति ' साप्ताहिक / मासिक 
D- 314 ,दावत नगर , अबुल फज्ल इन्क्लेव 
जामिया नगर , नयी दिल्ली  - 110025