Jan 23, 2015

धार्मिक छवि के सिक्के और देश की धर्म निरपेक्षता

धार्मिक छवि के सिक्के और देश की धर्म निरपेक्षता 
भारतीय राजनीति दलितों-स्‍वर्णों , अल्‍पसंख्‍यकों और बहुसंख्‍यकों के बीच सिमटती जा रही है और इससे हिन्‍दुस्‍तान की धर्म निरपेक्षता वाली छवि दागदार होती जा रही है। इस प्रकार की  राजनीति के पीछे आर्थिक साम्राज्‍यवाद के हाथ होने से काई भी इन्‍कार नहीं कर सकता, और न ही इनके दुष्‍परिणामों से। हमारे देश में अब जिस तरह के मंजर दिखाई देने लगे है उनमें राजनैतिक दलों को भले ही वोटों की लहलहाती फसल दिखाई दे रही हो, मगर इन परिस्‍थितियों के चलते देश की धर्मनिरपेक्षता वाली छवि क्षतिग्रस्‍त होती जा रही है | सभी जानते हैं कि हमारा देश हिन्‍दू राष्‍ट्र नहीं है | यहां अनेक धर्मों के अनुयायी रहते हैं । धर्मनिरपेक्षता को संवैधानिकता प्राप्त है | हमारे संविधान की प्रस्‍तावना में कहा गया है कि भारत एक सम्‍पूर्ण प्रभुत्‍व सम्‍पन्‍न, समाजवादी,धर्म निरपेक्ष , लोकतन्‍त्रात्‍मक गणराज्‍य है। 
सत्य धर्म किसी के लिए ख़ास नहीं है | धर्म भेदभाव व बँटवारे के लिए नहीं होता। हो भी नहीं सकता। धर्म कोई भी हो , वह बाँटना नहीं सिखाता। मगर संवैधानिक रूप से सरकार किसी एक धर्म की पक्षधर नहीं हो सकती | इसी वजह से भारतीय रिज़र्व बैंक ने जब सिक्कों पर धार्मिक तस्वीरों का उत्कीर्णन करवाया तो इसका ज़बरदस्त विरोध हुआ | पांच रुपये के सिक्के पर माता वैष्णो देवी देवी की तस्वीर छापने के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने विगत 12 नवंबर को रिजर्व बैंक से पूछा कि किन नियमों के तहत बैंक ने सिक्कों पर हिंदू देवी की तस्वीर छापी। मामले की अगली सुनवाई 3 दिसंबर को होगी। कोर्ट ने कहा कि सरकार को किसी धर्म का प्रचार करते नहीं दिखना चाहिए और धर्मनिरपेक्षता शब्द का अर्थ सही संदर्भ में लिया जाना चाहिए। 
सिक्कों पर वैष्णो देवी की तस्वीर छापने के विरोध में नफीस काजी और अबू सईद एवं  एडवोकेट सचिन मिश्रा ने वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के खिलाफ अलग - अलग जनहित याचिकाएं दायर की थीं। याचिकाकर्ता नफ़ीस काजी का कहना है भारत राज्य 'सर्व धर्म समभाव' में यकीन रखता है। देश की मुद्रा पर किसी मंदिर या मस्जिद की तस्वीर लगाना उचित नहीं है। नवंबर 2013 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की तरफ से माता वैष्णो देवी की तस्वीर वाले सिक्के जारी किये गये थे। 
इसके बाद 16 जनवरी 2014 को पांच और दस  रूपये के सिक्कों पर फिर उक्त तस्वीर मुद्रित की गयी |
 इन सिक्कों को जारी करने के संदर्भ में तत्कालीन केंद्र सरकार ने मार्च में मामले की सुनवाई की दौरान तर्क दिया था कि माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की सिल्वर जुबली के मौके पर स्मृति के रूप में क्वॉइंज एक्ट के तहत सिक्के जारी किये गये थे। इससे पहले स्वामी विवेकानन्द की 150 वीं , मोतीलाल नेहरु की 150 वीं और मदनमोहन मालवीय की भी 150 वीं जयन्तियों पर तथा कूका आन्दोलन के 150 वर्ष पूरे होने पर ये सिक्के जारी किये गये थे | सरकार 2010 में बृहदेश्वर मंदिर, तंजावुर के 1000 साल पूरे होने के मौके पर इस मंदिर की छवि वाला 5 रुपये का सिक्का जारी कर चुकी है | 
 याचिकाओं में रिजर्व बैंक को 2010 और 2013 में धार्मिक चिन्ह के साथ जारी सिक्कों को वापस लेने का निर्देश देने की अपील की गई थी | जनहित याचिकाओं में कहा गया कि केंद्र को एक राष्ट्रीय नीति बनाने का निर्देश दिया जाना चाहिए जिसके तहत किसी भी धर्म के चिह्न को सरकार की मूर्त या अमूर्त संपत्ति बनाने से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए | याचिका में कहा गया कि ये चिह्न धर्मनिरपेक्ष छवि को आघात पहुंचाते हैं | इस मामले में उस समय भी कोर्ट का रूख कड़ा था। मार्च में भी सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था, 'यह काम कैसे (सिक्कों पर माता की तस्वीर लगाना) हो सकता है? राज्य कैसे किसी धार्मिक प्रतीक का इस्तेमाल कर सकता है? राज्य को धर्म से बिल्कुल अलग रहना चाहिए?’

ग़ैर ज़िम्मेदार मीडिया की वकालत क्यों ?

ग़ैर ज़िम्मेदार मीडिया की वकालत क्यों ?
मीडिया की आज़ादी के लिए दशकों पूर्व गठित प्रेस परिषद के नये अध्यक्ष जस्टिस चन्द्रमौलि कुमार प्रसाद का मानना है कि लोकतंत्र में नियंत्रित मीडिया की अपेक्षा गैर जिम्मेदार मीडिया होना ज्यादा बेहतर है। साथ ही यह भी कहा कि प्रेस की रक्षा करना उनकी प्राथमिकता में होगी। उनका मानना है कि '' अगर मीडिया गैर जिम्मेदाराना काम करता है तो उसकी जांच परख हो , लेकिन यदि इसे नियंत्रित किया जायेगा तो लोकतंत्र का अस्तित्व ही नहीं रह जायेगा। मीडिया के लिए आत्म -नियमन सर्वश्रेष्ठ बात है , लेकिन मीडिया का नियंत्रण नहीं।'' इससे पहले प्रेस परिषद के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने चेतावनी दी थी कि कुछ नियंत्रण भी लगाए जा सकते हैं, क्योंकि आत्मनियंत्रण सही मामले में नियंत्रण नहीं हैं। आपातकाल के दौरान लगाई गई सेंसरशिप को छोड़कर आजादी के बाद से इस मामले में सरकार ने कभी कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया , जिसके कारण मीडिया स्वच्छंद हो गयी और यह स्वच्छन्दता समाज में अफरा - तफरी का कारण भी बनी और बन रही है
 केंद्र की सरकारें पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का अनुसरण करती आई हैं। नेहरू ने 3 दिसंबर, 1950 को अखिल भारतीय समाचार पत्र संपादक सम्मेलन को आश्वस्त किया था कि मैं प्रेस को पूरी स्वतंत्रता दूंगा, लेकिन जस्टिस काटजू ने दूसरी बात कही थी , जिसका मीडिया के एक वर्ग ने विरोध भी किया था | लेकिन यह सच है कि जस्टिस काटजू स्तरीय मीडिया के पक्षधर थे | मीडिया से जुड़े लोगों के लिए एक शिक्षा - स्तर के हिमायती थे | उन्हें पता था कि अधकचरे लोग समाज को किस अंधी सुरंग में ले जाकर फंसा देते हैं ! स्वच्छन्दता - स्वेच्छाचारिता समाज में कितनी बड़ी अव्यवस्था पैदा कर रही है ! ग़ैर ज़िम्मेदाराना पत्रकारिता के परिणाम सदैव बुरे होते हैं | आज देश इन कुपरिणामों को भुगतने के लिए अभिशप्त है | माना कि  
 लोकतांत्रिक व्यवस्था अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है। लेकिन क्या सलमान रुश्दी , तसलीमा नसरीन , ' शार्ली हाब्दो ' जैसे लोग लोकतंत्र की दुर्गति नहीं कर रहे हैं ? एम.एफ. हुसैन को शह देने से जो समस्याएं पैदा हुईं थी , वे हमारे सामने हैं |  संजय काक की डाक्यूमेंट्री जश्ने-आजादीमें सेना की गलत छवि पेश किये जाने के कारण प्रतिबंधित किया गया था | लोक व्यवस्था बनाये रखने की चिन्ता तो होनी ही चाहिए ताकि अव्यवस्था को रोका जा सके और समाज निर्धारित ध्येय, लक्ष्य और उद्देश्य की ओर आगे बढ़ सके। इसी प्रकार राज्य की रक्षा के लिए भी प्रतिबन्ध लगाये जाते रहे हैं , जो कि उचित है
व्यवस्था बनाये रखना राज्य का भी दायित्व है और नागरिक का भी | सहमति - असहमति की अभिव्यक्ति लोकतंत्र का अभिन्न अंग है , लेकिन असहमति या विरोध मर्यादा के अंतर्गत ही सह्य है , अन्यथा अराजकता की स्थिति में सज़ा योग्य है , जिसका ज़िम्मेदार सरकारें सदा पालन करती रहती हैं | जहां तक गैर जिम्मेदार मीडिया को बेहतर बताने से संबंधित प्रेस परिषद के नये अध्यक्ष का बयान है, उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता , क्योंकि गैर जिम्मेदाराना रुख, व्यवहार और व्यवस्था समाज को तोडऩे और बिगाडऩे का ही काम करती है, बनाने का नहीं। 
प्रख्यात पत्रकार शीतला सिंह के अनुसार , '' यह कहा जा सकता है कि मीडिया आखिर गैर जिम्मेदार होकर भी क्या नुकसान कर सकता है। इस रूप में झूठी, काल्पनिक खबरें प्रकाशित करके वह लोकमानस को उकसा सकता है। इसलिए जिसे लोक  मानसिकता बनाने की छूट है उसे नियंत्रित भी करना पड़ेगा। आत्मनियंत्रण से यदि यह काम चले तो उसका स्वागत ही किया जायेगा। लेकिन प्रश्न यह है कि मीडिया कहीं दूसरे स्वार्थों से तो प्रेरित नहीं हो रहा है? क्या उसे अनुचित, अवैध और समाज विरोधी स्वार्थों की स्वतंत्रता देना उचित होगा। मीडिया का संचालन तो व्यक्ति के ही हाथों में होगा, इसलिए उसे सोच, विचार और चिंतन की स्वतंत्रता आवश्यक है। लेकिन यह स्वतंत्र चिंतन प्रक्रिया कैसे प्रभावित होती है, इसे बनाये रखना भी तो राज्य का दायित्व है। ''  हमारे देश में शायद ही कोई ऐसा दिन बीतता हो , जब यहाँ की प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में इस्लाम या मुसलमानों से संबंधित भ्रामक और गुमराहकुन ख़बरें , रिपोर्टें या अन्य सामग्रियां न प्रकाशित - प्रसारित होती हों
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कुछ ऐसा ही माहौल बना हुआ है | इनका बड़ा वर्ग एक तरह से न्याय और इंसाफ़ को भूल चुका है | वह मीडिया को अपने घिनौने हित साधन का उपकरण मात्र समझता है | देशी - विदेशी मीडिया की इस्लाम दुश्मनी किसी से छिपी भी नहीं है | कमोवेश दोनों ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल रखा है | इस प्रजाति की मीडिया की हरकतें इस्लाम से जुड़े लोगों और संगठनों की छवि बुरी तरह बिगाड़ने की रही है | मिस्र की इस्लामपसंद इख्वानुल मुस्लिमून पार्टी हो या अल्जीरिया की इस्लामिक साल्वेशन फ्रंट या तुर्की की रिफाह पार्टी आदि की यह मीडिया खास तरह की दुश्मन है | इस मीडिया में मुस्लिम देशों चल रहे इस्लामी आंदोलनों को आतंकवाद से जोड़ने का दुस्साहस किया ही जाता है , दुनिया के किसी हिस्से की इस्लामी बेदारी को भी किसी भी रूप में सहन नहीं किया जाता | अतएव देखा गया कि जहाँ - जहाँ भी इस्लाम के नाम पर लोगों ने संगठित होने या उभरने की कोशिश की , उनके विरुद्ध बड़े पैमाने पर नियोजित ढंग से दुष्प्रचार छेड़ा गया | उन्हें डराने - धमकाने की भरपूर कोशिशें की गयीं | वर्तमान में भी यही सब कुछ किया जा रहा है | मुस्लिम देशों में अपने हिमायतियों के द्वारा कठपुतली सरकारों का भी गठन करके इस्लामपसंदों  का दमन करने की अमेरिका और पश्चिमी देशों की नापाक कोशिशें जारी हैं
मिस्र में तो दमन की हद कर दी गयी है | बोस्निया , चेचन्या , इराक़ और अफ़गानिस्तान आदि के बाद अब मिस्र सीधे तौर पर इनके निशाने पर है | हमारे देश की वर्चस्ववादी मीडिया की इस्लाम और मुस्लिम दुश्मनी पुरानी हैं , हालाँकि भारतीय मुसलमान बहुत ही ज़िम्मेदार नागरिक की तरह शांतिपूर्ण ढंग से रहते हैं | फिर भी इनकी छवि बिगाड़ी जाती है , वह भी बक़ायदा अभियान चलाकर | इनके द्वारा कुछ तोतारटंत झूठी बातें इस तरह फैलाई जाती हैं - कभी कहा जाता है कि देश के  मुस्लिम क्षेत्रों में आतंक के अड्डे बने हुए हैं | इनमें मदरसों को भी शामिल करने की कुचेष्टा की जाती है | इसी सिलसिले में आई एस आई के देश में अड्डे चलने की बात है | तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने इस पर श्वेत - पत्र लाने की घोषणा की थी , मगर वह उनकी घोषणा मात्र रही
हमारे देश में कई ऐसे पत्रकार रहे है और हैं जो मुसलमानों के खिलाफ़ ही लिखते रहते हैं | अरुण शौरी , बलबीर पुंज , भानु प्रताप  शुक्ल , राजीव सचान , हृदय नारायण दीक्षित जैसे लोग तो लगता है कि मुसलमानों के सबसे बड़े छविभंजक बने हुए हैं | मीडिया को बहुत - से ऐसे मुद्दे भाते हैं , जिनसे मुसलमान आहत होते हैं | 1985 का शाहबानो केस भारतीय मीडिया का प्रिय विषय बना रहा ! आमिना केस भी ऐसा ही रहा | गुड़िया - प्रकरण के बहाने भी इस्लाम और मुसलमानों के बारे में ग़लतफहमियां फैलाई गयीं | कभी क़ुरआन की आयतों पर कोलकाता हाईकोर्ट के जस्टिस चाँदमल चोपड़ा की टिप्पणियों की आड़ में , तो कभी इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस हरिनाथ तिलहरी ने तीन तलाक़ के मसले के बहाने इस्लामी शरीअत पर गंभीर हमले किए , जिन्हें मीडिया ने अनावश्यक हवा दी और माहौल को बिगाड़ा
नरेंद्र मोदी के पक्ष में प्रचार की मीडिया ने हद कर ही दी है , 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के समय भी कुछ हिंदी अख़बारों ने इतना माहौल बिगाड़ दिया था कि कई स्थानों पर दंगे भड़क गये थे | आज , दैनिक जागरण , स्वतंत्र भारत और स्वतंत्र चेतना के उत्तर प्रदेश से प्रकाशित संस्करणों में बड़ी मनगढ़ंत ख़बरें छापी गयीं | इन अफ़वाह और भड़काऊ खबरों ने सांप्रदायिक सद्भाव को बुरी तरह बिगाड़ कर रख दिया | आज [ आगरा ] ने इतनी निराधार खबर छाप दी , जिसकी जितनी निंदा की जाए कम है | अख़बार ने 11 से लेकर 13 दिसंबर 1990 के बीच इस आशय की खबर छापी कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कालेज में भर्ती 32 हिन्दू मरीज़ों को ज़हरीला इंजेक्शन देकर मार डाला गया | ज़ाहिर है , यह खबर झूठी थी , मगर प्रेस कौंसिल ने उसकी निंदा करने के अलावा कुछ नहीं किया | कुछ ऐसी ही हरकतें आये दिन मीडियावाले करते हैं और बचे रहते हैं ! है ना यह आधुनिक युग का ' चमत्कार ' ! सारे अपराध करो और बचे रहो !! ये घटनाएं इस बात की सबूत हैं कि मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी को सही तौर पर नहीं निभा रहा है और इसका स्वेच्छाचार देश के लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है |           


काले धन को वापस लाने के लिए ठोस प्रयास करे केंद्र सरकार

काले धन को वापस लाने के लिए ठोस प्रयास करे केंद्र सरकार 
भारत कालाधन विदेश में जमा करने के मामले में चौथे स्थान पर है और 2004-2013 के बीच देश से 51 अरब डालर सालाना बाहरले जाया गया। यह बात 9 दिसंबर 15 को अमेरिका की एक विचार संस्था ने कही। वाशिंगटन की एक अनुसंधान एवं सलाहकार संस्थान ग्लोबल फिनांशल इंटेग्रिटी (जीएफआई) द्वारा जारी रपट के मुताबिक भारत का रक्षा बजट 50 अरब डालर से कम का है। चीन सालाना 139 अरब डालर की निकासी के साथ इस सूची में शीर्ष पर है जिसके बाद रूस (104 अरब डालर सालाना) और मेक्सिको (52.8 अरब डालर सालाना) का स्थान है। रपट में कहा गया कि 2013 के दौरान विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में गैरकानूनी धन, कर चोरी, अपराध, भ्रष्टाचार और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों से पैदा रिकार्ड 1,100 अरब डालर कालाधन विदेश में जमा किया गया। रपट में 2013 तक के आंकड़े उपलब्ध हैं। जीएफआई के अनुमान के मुताबिक कुल मिलाकर 2004-2013 तक के दशक के दौरान भारत से 510 अरब डालर की राशि भारत से बाहर गई जबकि चीन से 1,390 अरब डालर और रूस से 1,000 अरब डालर कालाधन विदेश गया।
मोदी सरकार ने विदेशों से काला धन वापस लाने के लिए एस आई टी की एक समिति बनायी थी | उस समय इस क़दम को ऐतिहासिक बताकर स्वागत किया गया था , लेकिन तीन महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद इस दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति न होना वाकई तशवीशनाक और चिंताजनक है | अब भाजपा वाले ख़ुद इस पर सवाल खड़े कर रहे हैं | भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कह दिया है कि सरकार विदेशों में जमा काला धन वापस नहीं ला पायेगी | दूसरी ओर केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली कहते हैं कि काले धन की वापसी में लंबी प्रतीक्षा की ज़रूरत नहीं है | इन बयानों के बीच यह सच भी सामने रहे कि केंद्र सरकार में एस आई टी गठित करने की घोषणा के बाद  इस विषय पर कोई गंभीर चर्चा नहीं हो पा रही है | एसोचैम के अनुसार , विदेशों में भारतीयों के दो हज़ार अरब डालर जमा हैं | आये दिन विदेशी बैंकों से रक़म निकाले जाने की सूचनाएं भी आती रहती हैं | कुछ समय पहले एसोचैम की कानूनी मामलों की समिति के अध्यक्ष आरके हांडू ने कालेधन पर एसोचैम की अध्ययन रिपोर्ट जारी करते हुए कहा था कि विदेशों में पड़े कालेधन को वापस लाने के लिए 'माफी योजना एक बेहतर और व्यावहारिक योजना है।'सरकार ने 1997 में इस प्रकार की 'आय की स्वैच्छिक घोषणा योजना (वीडीआईएस)' के जरिए 10,000 करोड़ रुपये जुटाए थे , हालांकि इस योजना को लेकर विरोध के स्वर उठे और कहा गया कि यह योजना ईमानदार करदाताओं को दंडित करने कर चोरी करने वालों को प्रोत्साहन देने के समान है। सरकार ने बाद में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया, जिसमें कहा गया कि वीडीआईएस इस तरह की आखिरी योजना है और वह भविष्य में ऐसी कोई योजना नहीं लाएगी। हांडू ने इसके जवाब में कहा कि सरकार इस मामले में फिर से सुप्रीम कोर्ट जा सकती है और मंजूरी ले सकती है। स्पष्ट है , सरकार इस दिशा में कुछ नहीं सोच रही है | उसे जी - 20 देशों [ स्विट्जरलैंड और मारीशस समेत 45 देश ] की इस सहमति पर शायद अधिक भरोसा हो गया है कि ये देश 2017 की शुरुआत से ये आपस में सभी बैंकों की सूचना टैक्स अधिकारियों के साथ ऑटोमैटिक सालाना साझा करेंगे। 
बताया जाता है कि ओईसीडी टैक्स फोरम जो कि विभिन्न देशों के बीच पारदर्शिता के लिए सूचनाओं के आदान-प्रदान पर एक मिशन के तहत काम कर रहा है, सितंबर 2017 से 2018 के अंत तक यह अपनी प्रतिबद्धता को पूरी कर सकेगा , लेकिन यह काले धन को वापस लाने में कितना कारगर होगा , यक़ीनी तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता | इस मामले में वर्तमान केंद्र सरकार पूर्व सरकारों से भिन्न नहीं दिखती | पूर्व सरकारों की तरह यह भी दिखावे पर यक़ीन रखती है | पूर्व की कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने 21 मई 2012 को काले धन पर श्वेतपत्र जारी किया था , जिससे यह लगा था  कि वह काले धन की समस्या से निबटने के प्रति गंभीर है , लेकिन आगे चलकर यह दिखावे का क़दम साबित हुआ | तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा पेश इस दस्तावेज़ में भ्रष्टाचार के मामलों की तेज़ी से जाँच और दोषियों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई के लिए जल्द से जल्द लोकपाल और लोकायुक्त जैसी संस्थाओं का गठन किए जाने की बात कही गयी थी | तत्कालीन वित्तमंत्री ने आयकर विभाग में अभियोजन पक्ष को मज़बूत बनाने और प्रत्यक्ष कर क़ानूनों व नियमों को युक्तिसंगत बनाने की ओर इशारा करते हुए त्वरित अदालतों के गठन एवं अपराधियों को कड़ी सज़ा के प्रावधानों का समर्थन किया था | कुल 97 पेज के इस श्वेत पत्र में किसी आर्थिक अपराधी का नाम नहीं लिया गया था और न ही इस बारे में कोई जानकारी दी गयी थी कि दरअसल कितना काला धन विदेशों में है | सरकार ने इस सिलसिले में अन्य एजेंसियों के आकलन शामिल किए थे |अफ़सोस की बात यह है कि कांग्रेस ने श्वेतपत्र तो पेश कर दिया , मगर कभी इस दिशा में कोई गंभीर क़दम नहीं उठाया | अब मोदी सरकार भी पूर्व सरकार की ही पैरवी करती नज़र आती है | सरकार को चाहिए कि वह काला धन स्वदेश लाने के लिए ठोस प्रयास करे , ताकि देश की चरमराती अर्थव्यवस्था पर रोक लग सके



Jan 21, 2015

कैसा लोकतंत्र ?

कैसा लोकतंत्र ?
लोकतंत्र की एक सुनिश्चित परिभाषा है - जनता का शासन | यह शासन - व्यवस्था विश्व के अधिकांश देशों में मौजूद है | हमारे देश में भी लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था है , जिसकी अपनी ख़ासियत है | इसमें जन प्रतिनिधियों की सामूहिक भागीदारी से सरकारी कामकाज चलता है | अध्यादेश विशेष परिस्थिति में ही लाया जाता है , लेकिन मोदी सरकार इसकी परवाह न करते हुए पिछले करीब आठ महीने में आठ अध्यादेश ले आई |
 इसके चलते देश के संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने सरकार को नसीहत की है | उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार को सामान्य विधेयक के लिए अध्यादेश के रास्ते से बचना चाहिए। असाधारण परिस्थितियों में ही अध्यादेश जारी करने का प्रावधान है। राष्ट्रपति महोदय ने यह नसीहत ऐसी चर्चाओं के बीच की है कि सरकार राज्यसभा में गतिरोध के मद्देनजर कुछ विधेयकों को पारित कराने के लिए संसद का संयुक्त सत्र बुला सकती है। राज्यसभा में सरकार को बहुमत प्राप्त नहीं है। राष्ट्रपति महोदय ने कहा कि इस तरीके से विधेयक पारित कराना व्यावहारिक नहीं है , क्योंकि मैंने देखा है कि 1952 से आज तक केवल चार बार संयुक्त सत्र के माध्यम से विधेयक पारित किए गए।
 वे केंद्रीय विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के प्राध्यापकों और छात्रों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए संबोधन के दौरान सवालों के जवाब दे रहे थे | उन्होंने संसद और राज्य विधान मंडलों में कार्यवाहियां बार - बार बाधित होने पर चिंता जताई | उन्होंने कहा कि सत्तारूढ़ दल और विपक्ष की जिम्मेदारी है कि साथ बैठकर अवरोधों से बचने का व्यावहारिक समाधान निकालें। संसद में हंगामा करना कामकाज में हस्तक्षेप का तरीका नहीं है। हंगामे में केवल शक्ति प्रदर्शन होता है लेकिन दूसरे लोगों की बात नहीं सुनी जा सकती। संसद चलाने में सत्तारूढ़ दल की बड़ी भूमिका होती है। उसे पहल करनी चाहिए और विपक्ष को सहयोग करना चाहिए।
 मालूम हो कि राष्ट्रपति महोदय ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर दस्तखत से पहले सरकार से स्पष्टीकरण चाहा था। अरुण जेटली , सदानंद गौड़ा और नितिन गडकरी जैसे तीन वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री उनकी सेवा में पहुंचे थे | उन्होंने इन मंत्रियों से भूमि अधिग्रहण से जुड़े अध्यादेश को लाने की तत्काल जरूरत पर सवाल किया था , हालांकि बाद में उन्होंने इसे मंजूरी दे दी थी। उल्लेखनीय है कि यूपीए के कार्यकाल में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, जयराम रमेश ने प्रतिष्ठा दांव पर लगा कर भूमि अधिग्रहण कानून बनाया था , जो मोदी सरकार को रास नहीं आया | 
अब सरपट विकास का दावा करनेवाली नितिन गडकरी के शब्दों में ' रामभक्तों की सरकार ' भारी दुविधा में है | संवैधानिक दृष्टि से अध्यादेशों को 42 दिन के भीतर संसद से पास करवाना ज़रूरी होता है | इसी पर विचार करने के लिए मोदी मंत्रिमंडल की बीस जनवरी को जो मीटिंग हुई , उसमें किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका |बीमा विधेयक, कोयला खदान, नागरिकता संशोधन ,भूमि अधिग्रहण आदि से संबंधित अध्यादेशों को अगर क़ानूनी रूप नहीं दिया गया , तो ये सभी निष्प्रभावी हो जाएंगे | सरकार का प्रयास यह है कि अध्यादेश लोकसभा में पास हों । फिर राज्यसभा में उन्हें रख कर पास कराने की कोशिश हो। 
राज्यसभा जब पास नहीं करेगी तो जून-जुलाई में दोनों सदनों का साझा सत्र बुलाकर इन अध्यादेशों को पास कराया जाए। संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू का कहना है कि अध्यादेश देश हित में जारी किए गए क्योंकि निवेश के लिए वातावरण बनाने की जरूरत थी..सरकार संसद में किसी भी विषय पर चर्चा  के लिए तैयार है लेकिन विपक्ष उच्च सदन को चलने नहीं दे रहा | अध्यादेश जारी करने संबंधी कांग्रेस की आलोचनाओं पर पलटवार करते हुए नायडू ने कहा कि पिछले 62 साल में, खासकर कांग्रेस शासन के दौरान 637 अध्यादेश जारी किए गए, यानी हर साल औसतन 11 अध्यादेश। 
उन्होंने कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में 70, इंदिरागांधी के कार्यकाल में 77, राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते 35 और पीवी नरसिंह राव के शासन में 77 अध्यादेश जारी हुए। वाम दलों को भी आड़े हाथ लेते हुए उन्होंने कहा कि माकपा समर्थित संयुक्त मोर्चा सरकार ने 1996 से 1998 के अपने कार्यकाल में केवल 61 विधेयक पारित किए जबकि अध्यादेश 77 जारी किए। ये वही दल हैं , जो हमारी सरकार द्वारा अध्यादेश जारी करने के खिलाफ संसद को ठप करने की धमकी दे रहे हैं। 
क्या संसदीय कार्यमंत्री को पता नहीं कि मोदी सरकार के पास कुशल प्रबंधकों का अभाव है | वास्तव में संसदीय प्रबन्धन एक कला है , जिसे मोदी सरकार ने नकार दिया है और वह इस प्रकार के ' अध्यादेशी संकट ' में फंस गई है | सरकार को चाहिए कि लोकतंत्र की भावनाओं और तक़ाज़ों की क़द्र करे और संकट से उबरे | 



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Jan 16, 2015

यह क्या हुआ !?

यह क्या हुआ !?

क्या मोदी लहर अब नहीं चल रही ? उत्तर प्रदेश छावनी परिषद के हाल में संपन्न हुए चुनाव यही बता रहे हैं !  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह के चुनाव क्षेत्र लखनऊ में हुए छावनी परिषद के चुनावों में भाजपा को करारा झटका लगा है। दोनों ही स्थानों पर उसके समर्थित सभी प्रत्याशी हार गए। इसके अलावा आगरा में भी भाजपा को करारा झटका लगा है , जहां पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ा गया था। यहां की सभी आठ सीटों में भाजपा को सिर्फ एक ही सीट मिल पाई | मथुरा में भी भाजपा को सिर्फ दो सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। 
वाराणसी में सभी सीटों पर निर्दल प्रत्याशियों ने बाज़ी मारी।इस चुनाव में कुल 36 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था और मतदान में करीब 15 हजार मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था। लखनऊ में भी भाजपा की दुर्गति हुई | भाजपा ने बोर्ड की सभी आठ सीटों के चुनाव में एक-एक प्रत्याशी को समर्थन दिया था, लेकिन उनमें से कोई भी जीत नहीं सका। उधर आगरा छावनी परिषद् के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) सोनम यांगडोल ने बताया कि आठ वाडरें में से भाजपा केवल एक सीट पर दर्ज कर सकी, जबकि निर्दलीय प्रत्याशियों ने सात सीटों पर जीत हासिल की। इनमें पांच प्रत्याशी पहली बार निर्वाचित हुए हैं। 
मथुरा छावनी परिषद के सात वार्डों के चुनाव में भाजपा को सिर्फ दो पर ही विजय मिली। इन चुनावों के परिणाम गत 11 जनवरी को घोषित किये गये |इन परिणामों के बाद यहां भाजपा खेमे में अजीब सन्नाटा है। फिर भी कुछ बातें कही ही जा रही हैं | भाजपा के प्रान्तीय अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने छावनी परिषद के चुनाव में पार्टी की हार पर कहा कि जहां भाजपा को अपना चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने की इजाजत दी गयी, वहां पार्टी ने बढ़त बनायी और वाराणसी, कानपुर, लखनऊ और फैजाबाद में उसे अपने चुनाव निशान का इस्तेमाल नहीं करने दिया गया। इसी वजह से पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। 
भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक भी छावनी परिषद चुनाव में पार्टी की हार को स्वीकार करते हुए कहते हैं और हार के कारणों की समीक्षा की जाएगी। उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ सपा की और से विकलांग कल्याण मंत्री अम्बिका चौधरी ने कहा कि लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जो सपने दिखाए थे , उनकी हकीक़त सामने आने लगी है। भाजपा उपचुनाव में 11 में से नौ सीटों पर हारी। चौधरी ने कहा, ‘‘अब भाजपा की हार का सिलसिला शुरू हो गया है। मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूं कि आने वाले समय में भाजपा हर चुनाव हारेगी।’’ निश्चित रूप से ये चुनाव दिल्ली विधानसभा चुनाव पर भी असर डालेंगे , जहाँ सात फ़रवरी को मतदान होना है | बहरहाल भाजपा की यह हार उसके लिए किसी सदमे से कम नहीं है | सच है केवल नारों से काम नहीं चलता , बदलाव के लिए निरंतर कार्य की जरूरत होती है |  

Jan 14, 2015

पेरिस हमला - बर्बर एवं निंदनीय

अभिव्यक्ति की असीमित आज़ादी से उत्पन्न होती नित नयी समस्याएं 

 वैसे हिंसा के किसी भी रूप का समर्थन नहीं किया जा सकता है , लेकिन यह भी सच है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में किसी की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता | सभी लोकतान्त्रिक देशों में इस तरह की हरकतों पर रोक के लिए क़ानूनी तौर पर पाबंदी है | फ़्रांस भी उन देशों में शामिल है , जहाँ अभिव्यक्ति की मर्यादा के उल्लंघन पर सज़ा का प्रावधान है | चूँकि पश्चिम में व्यावहारिक रूप में अभियक्ति की स्वतंत्रता सीमित नहीं है , इसलिए लोग ऊलजलूल बकते रहते हैं | मीडिया भी इसमें लिप्त है | पहली बार फ्रांस की राजधानी पेरिस में विगत सात जनवरी को हिंसक हमला करके जिन 12 लोगों को मौत के घाट उतार दिया , उनमें से 10 पत्रकार थे। इसमें ' चार्ली हेब्डो ' के संपादक स्टीफन चारबोनियर और  चार कार्टूनिस्ट शामिल हैं। वे कार्टूनिस्ट थे, जिन्होंने इस्लाम के अंतिम पैगंबर हजरत मुहम्मद [ सल्ल .] पर अत्यंत आपतिजनक कार्टून बनाए थे। इस हरकत का कड़ा विरोध किया गया था ,फिर भी सरकार ने अभिव्यक्ति की आज़ादी का दुरूपयोग करनवाली पत्रिका और कार्टूनिस्टों के खिलाफ़ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की | फलस्वरूप उनका दुस्साहस बढ़ता चला गया | तत्कालीन फ़्रांसिसी प्रधानमन्त्री फ्रांसिस फिलान ने भी अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर उक्त पत्रिका के निंदनीय कृत्य का समर्थन किया था | उन्होंने यह अजीबोगरीब बयान दिया था कि फ्रांस के लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बुनियादी हक है | यह पत्रिका इधर कुछ समय से भी अपने कंटेंट की वजह से विवादों में थी. | इसने हाल में एक कार्टून ट्वीट किया था , जिसमें अबू बकर अल-बगदादी का कार्टून शेयर किया गया था | इस पत्रिका ने कुछ समय पहले एक और बड़ी शरारत की | उसने अपने एक अंक में पैगम्बर हज़रत मुहम्मद [ सल्ल .] को अतिथि संपादक बना दिया। ज़ाहिर है , ऐसी हरकतों से मुसलमानों की भावनाएं आहत होंगी ही | वैसे कोई भी व्यक्ति अपने महापुरुषों का अपमान एवं अवमान नहीं सहन कर सकता |
 इस प्रकार की ओछी हरकतों पर सख्त कार्रवाई करके विरोध स्वरूप उपजे गुस्से को समाप्त किया जा सकता था , मगर ऐसा न हो सका | प्रतिहिंसा में कई लोग मारे गये | ताजा अपडेट के मुताबिक 18 साल के एक हमलावर ने जिसका नाम हामिद मुराद बताया जाता है , खुद को पुलिस के हवाले कर दिया | पुलिस और खुफिया एजेंसियां उससे गहन पूछताछ कर रही हैं | पुलिस दो भाइयों की तलाश कर रही है , जिन पर हमला करने का उसे शक है | पुलिस का कहना है कि उसने तीनों हमलावरों की पहचान कर ली है | इनमें हामिद मुराद के अलावा एक का नाम फ्रैंचमैन सईद कोआची (34) और दूसरे का नाम शरीफ कोआची (32) है | पुलिस ने दोनों की तस्वीरें भी जारी की है | पुलिस का बयान है कि इनमें से एक इससे पहले भी आतंकी वारदातों में नामजद हो चुका है | दोनों भाई बताए जा रहे हैं और पुलिस इनकी तलाश कर रही है | दोनों के खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी किया जा चुका है | दोनों फ्रांस के रहने वाले हैं, जबकि ममुराद रीम्स के उत्तर-पूर्वी इलाके का रहने वाला है | इस सिलसिले में पुलिस ने मीडिया को जो विवरण दिया , वह इस प्रकार है - शरीफ कोउआची को आतंकवाद के आरोपों में वर्ष 2008 में दोषी ठहराया गया था। उस पर इराक में चल रही बगावत के दौरान लड़ाकों को मदद पहुंचाने का आरोप था और उसे 18 महीने कैद की सजा सुनाई गई थी। वर्ष 2008 में हुई सुनवाई के दौरान उसने अदालत से कहा था, '' मैं इराक में अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन से युद्ध के विचार में वाकई यकीन रखता हूं।’’ उसने कहा था कि ऐसा करने के लिए उसके उस गुस्से ने प्रेरित किया, जो टीवी पर अबू गरैब स्थित अमेरिकी कारावास में इराकी कैदियों के साथ किए जा रहे बर्बर व्यवहार की तस्वीरों को देखकर उपजा था। फ़्रांस की इस निंदनीय घटना पर जो प्रतिक्रियाएं जताई जा रही हैं , उनमें इस्लाम को आतंकवाद से जुड़ने की बात अनजाने में ही सही , मगर कही जा रही है | ज़ाहिर है , यह बात किसी भी तरह से सही नहीं है | सच्ची बात यह है कि इस्लाम शांति का धर्म है |इस्लाम मूल शब्द सलामसे निकला है जिसका अर्थ है शान्ति। इसका दूसरा अर्थ है अपनी इच्छाओं को अपने पालनहार ख़ुदा के हवाले कर देना। अतः इस्लाम शान्ति का धर्म है  , जो सर्वोच्च स्रष्टा अल्लाह के सामने अपनी इच्छाओं को हवाले करने से प्राप्त होती है। सीमित बल - प्रयोग भी शांति - स्थापना के लिए है |  संसार का हर इंसान शान्ति - सद्भाव के पक्ष में नहीं है। बहुत से इंसान अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए शान्ति को भंग करने का प्रयास करते हैं। शान्ति बनाए रखने के लिए कभी-कभी बल-प्रयोग किया जाता है। इसी कारण हम पुलिस रखते हैं जो अपराधियों और असामाजिक तत्वों के विरुद्ध बल - प्रयोग करती है , ताकि समाज में शान्ति स्थापित हो सके। इस्लाम शान्ति को बढ़ावा देता है और साथ ही जहाँ कहीं भी अत्याचार और जु़ल्म होते हैं, वह अपने अनुयायियों को इसके विरुद्ध संघर्ष हेतु प्रोत्साहित करता है। वह अन्याय से बचने और हमेशा न्याय करने पर बल देता है | क़ुरआन में है -
'' ऐ लोगो जो ईमान लाये हो , अल्लाह के लिए औचित्य पर क़ायम रहनेवाले और इन्साफ़ की गवाही देनेवाले बनो | किसी गिरोह की दुश्मनी तुमको इतना उत्तेजित न कर दे कि इन्साफ़ से फिर जाओ | इन्साफ़ करो , यह ईशभक्ति और विनम्रता के अधिक अनुकूल है | '' (कुरआन, 5:8)

- DR.MUHAMMAD AHMAD