Feb 21, 2015

जनगणना रिपोर्ट की सही व्याख्या की जाए


' आउटलुक ' [ 1 - 15 फ़रवरी 2015 ] में ' जनगणना पर राजनीति ' शीर्षक से प्रकाशित आवरण लेख में देश में मुसलमानों की आबादी को लेकर किये जा रहे भ्रामक दुष्प्रचारों का सटीक विश्लेषण करके यथातथ्य पेश करने का प्रयास किया गया है |आवरण लेख में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने लिखा है कि '' 2001 से 2011 के जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़ , भारत की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी बढ़ने की रफ़्तार कम हुई है | हालाँकि अब भी हिन्दू समेत बाक़ी समुदायों की तुलना में उनकी आबादी की वृद्धि अधिक है | वर्ष 2001 से 2011 के बीच आबादी में उनका हिस्सा 13 . 4 फ़ीसदी से 14 . 2 फ़ीसदी हो गया है यानी 0 . 8 फ़ीसदी अंक की वृद्धि , जबकि 1991 से 2001 के दशक में उनकी आबादी में 1 . 7 फीसदी अंक का इज़ाफ़ा हुआ था | देखा जाए तो भारत में मुसलमानों की आबादी 24 . 4 फीसदी बढ़कर 13 . 8 करोड़ से 17 . 18 करोड़ हो गई | इस लिहाज़ से मुसलमानों की कुल आबादी बढ़ने की रफ़्तार में भी बहुत गिरावट हुई है |  '' मुसलमानों का लिंगानुपात यह बताता है कि 1000 मुस्लिम मर्दों की तुलना में औरतें 936 ही हैं |  मुसलमानों की आबादी के बढ़ने के दो प्रमुख कारण हैं -  पहला , उनकी जीवन प्रत्याशा हिन्दुओं से अधिक 68 वर्ष है , जबकि हिन्दुओं की 65 वर्ष है | दूसरा प्रमुख कारण मुसलमानों में बाल मृत्यु दर का कम होना है | हिन्दुओं में बाल मृत्यु दर 76 है , जबकि मुसलमानों में केवल 70 है [ राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण - 3 , 2005-06 , पृष्ठ 182 टेबल 7.2 ] | अतः व्यर्थ का हो - हल्ला करनेवालों को चाहिए कि सही तथ्य ही अवाम के सामने पेश करें , कुतर्क करके भ्रम की स्थिति न पैदा करें |
  आज हो यह रहा है कि मुस्लिम आबादी को लेकर जनता को गुमराह किया जा रहा है | कुछ लोग ज़्यादा बच्चे पैदा करने की बार - बार वकालत कर रहे हैं और धर्माधार पर इस मुद्दे को उठा रहे हैं | एक ओर संघ प्रमुख मोहन भागवत भारत को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करने की बात कर रहे हैं , भाजपा नेता श्यामलाल गोस्वामी [ पश्चिम बंगाल ] ने हिन्दू महिलाओं से कम से कम पांच - पांच बच्चे पैदा करने की अपील की है | कुछ साधु - संत ऐसी ही बातें कर रहे हैं और ज़्यादा बच्चे पैदा करनेवालों को सम्मानित - प्रोत्साहित कर रहे हैं | धर्माधार की बात छोड़कर आंध्रप्रदेश के मुख्य मंत्री चंद्रबाबू नायडू ज़्यादा बच्चे पैदा करने के पक्ष में नये तर्क दे रहे हैं | उनका कहना है कि अगर ज़्यादा बच्चे नहीं पैदा किये गये , तो भारत की स्थिति भी जापान जैसी हो जाएगी , जहाँ बूढ़ों की संख्या अधिक है | मगर इन सब बयानों का एक और पक्ष भी है , जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता | प्रसिद्ध समाजविज्ञानी सतीश देशपांडे का यह कहना सही है कि '' जनगणना के आंकड़ों की तर्कसंगत व्याख्या करने के बजाय खौफ़ पैदा करने की कोशिश की जा रही है | दुनिया भर में अल्पसंख्यकों की आबादी बहुसंख्यक लोगों की आबादी से तेज़ रफ़्तार से बढ़ती है | इसकी बहुत बड़ी वजह इस समुदाय का पिछड़ापन होता है | भारत में भी यही प्रवृत्ति है , जहाँ पर मुसलमानों की आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति ठीक हुई है , वहाँ उनकी आबादी में वृद्धि दर कम है | दक्षिण भारत के कई राज्यों में मुसलमानों की आबादी की वृद्धि दर उत्तर भारत के हिन्दुओं की आबादी की वृद्धि दर से कम है | आबादी में वृद्धि का मसला कौम , धर्म से नहीं बल्कि भौतिक स्थितियों से जुड़ा हुआ है और इसे इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए | ''  उक्त पत्रिका की आवरण कथा में शहरी एवं जनसंख्यात्मक मामलों के विशेषज्ञ अनंत कृषणन का बयान भी उद्धरित किया गया है , जिसमें उन्होंने कहा है कि '' सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए आबादी की वृद्धि दर पर राजनीति की जा रही है | '' विभिन्न संस्थाओं से जुड़े अर्थशास्त्री अमिताभ कुंडू का मुस्लिम आबादी पर मानना है कि '' यह स्वाभाविक - सा ट्रेंड है | इसमें कुछ भी हैरतअंगेज नहीं है और न ही इस पर कोई हंगामा खड़ा करने की ज़रूरत है | ''  

ऐसे बयान क्यों ?


लगता है , अब झूठे बयानों से सद्भावना आएगी ! मुफ्ती मुहम्मद इलियास ने पिछले दिनों विवादित बयान देते हुए कहा है कि भगवान शंकर मुस्लिमों के पहले पैगंबर हैं। उन्होंने कहा कि इस बात को मानने में मुसलमानों को कोई गुरेज नहीं है। उन्होंने यह भी गलत - भ्रामक बात कही कि मुसलमान भी सनातन धर्मी हैं और हिंदुओं के देवता शंकर और पार्वती हमारे भी मां-बाप हैं। उन्होंने यह झूठी बात भी जोड़ी कि शंकर जी लंका में आए थे। हमारे इस्लाम धर्म के पहले पैगम्बर हैं। हम यहीं पैदा हुए हैं। यहीं हमारा कर्म और धर्म क्षेत्र है। इसलिए हमें इससे प्यार है। सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा। उनकी अन्य बातें भी आपत्तिजनक हैं |
 मसलन उनका यह कहना कि देश के मुसलमान हिंदू राष्ट्र के विरोधी नहीं हैं। मीडिया में बताया गया कि मुफ़्ती साहब का संबंध जमीअत उलेमा से है , हालाँकि जमीअत ने इसका खंडन किया है | मीडिया में यह खबर भी आई कि जमीअत का एक प्रतिनिधिमंडल गत 19 फरवरी को अयोध्या आया था। जमीयत बलरामपुर में कौमी एकता का कार्यक्रम करने जा रहा है। इसी कार्यक्रम में अयोध्या के साधु-संतों को भी आमंत्रित करने के लिए प्रतिनिधिमंडल अयोध्या आया था। इस दौरान मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल ने राम जन्मभूमि के मुख्य पुजारी सतेंद्रदास और शनि धाम के महंत हरदयाल शास्त्री के साथ मिलकर आतंकवाद का पुतला फूंका।
ऐसा लगता है कि मुफ़्ती साहब को न तो इस्लाम की जानकारी है और न ही हिन्दू धर्म की | यह भी संभव है कि अपने घिनौने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उन्होंने ऐसा बयान दिया हो , जिसे किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता | अगर मुफ़्ती साहब ने जानबूझ कर बयान दिया है , तो भी उन्हें जनता के बीच गलतफहमियां फैलाने का अधिकार कहाँ से मिल गया | 
हिन्दू धर्म की मान्यता है कि सृष्टि का आरंभ मनु और सतरूपा से हुआ , जिन्हें शंकर जी ने आशीर्वाद दिया था | कथा है कि मनु और सतरूपा परमब्रह्म  की तपस्या कर रहे थे | कई वर्ष तपस्या करने के बाद शंकर जी  ने स्वयं पार्वती  जी से कहा कि मैं, ब्रह्मा और  विष्णु कई बार मनु सतरूपा के पास वर देने के लिये आये , पर उन्होंने वर नहीं माँगा | इसका उल्लेख तुलसी दास जी द्वारा रचित रामचरितमानस में भी मिलता है-  '' बिधि हरि तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु बारा। '' कहने का मतलब यह कि जिनसे सृष्टि का आरंभ हुआ , वे मनु - सतरूपा थे | 
ज़ाहिर है , तथ्यहीन बातों से सद्भावना नहीं पैदा हो सकती , अपितु गलत फहमियां फैलती हैं , जो सद्भावना की दिशा में बड़ी बाधा है | लखनऊ के ईदगाह इमाम मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा है कि इस तरह के बयान से मुसलमानों पर कोई असर नहीं होता। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना डॉ. कल्बे सादिक ने कहा कि मुफ्ती साहब धर्म के नाम पर विवाद न खड़ा करें। इस तरह के बयान से पहले वह हिंदू धर्म के बारे में जानें, क्योंकि शंकर जी हिंदू धर्म की आस्था का केंद्र हैं। फैजाबाद के शहर उलेमा ने कहा है कि भगवान शंकर को मुसलमानों का पहला पैगंबर बताना उनका अपना विचार है। उनके मुताबिक, 'हर धर्म अपनी धार्मिक आस्था के आधार से समाज से जुड़ा है। हिंदू धर्म के मानने वालों व इस्लाम धर्म के मानने वालों का अलग-अलग इतिहास है और इसे किसी से जोड़ा नहीं जा सकता।'
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

Feb 3, 2015

' बेटी बचाओ , बेटी पढाओ '

' बेटी बचाओ , बेटी पढाओ ' 
हमारे देश में कन्या भ्रूणहत्या ज़ोरों पर है | ऊपर से इन हत्याओं पर न तो कोई शर्म है और न ही कोई पछतावा ! बस , बेटे की चाहत बेटियों की हत्या करवा रही है | कानून चुप है और सभी ख़ामोश तमाशाई बने हुए हैं ! इस नीरवता भरे माहौल में बधाई के पात्र हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी , जिन्होंने तन्द्रा भंग की है और समाज में लड़कियों की गिरती संख्या, भ्रूण हत्या पर गंभीर चिंता जताई है | 
हरियाणा से विगत 23 जनवरी को ' बेटी बचाओ , बेटी पढाओ ' शीर्षक से राष्ट्रीय अभियान का शुभारंभ करते हुए उन्होंने कहा कि बेटा-बेटी एक समान हमारा मंत्र होना चाहिए। भ्रूण हत्या समाज के प्रति द्रोह है। यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं है। हर किसी की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक एक समाज के रूप में हम इस समस्या के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, जागरूक नहीं होंगे। हम अपना ही नहीं, आने वाली सदियों तक पीढ़ी दर पीढ़ी एक भयंकर संकट को निमंत्रण दे रहे हैं। 
उन्होंने कहा कि सांसारिक चक्र के लिए जरूरी है कि एक हजार लड़के पैदा हों तो एक हजार लड़कियां भी पैदा हों। हरियाणा में ही महेंद्रगढ़ समेत कई जिलों में लड़कियों की संख्या बहुत कम हैं। उन्होंने कहा, माताओं से पूछना चाहता हूं कि बेटी नहीं पैदा होगी तो बहू कहां से लाओगी। हम जो चाहते हैं समाज भी तो वही चाहता है। हम चाहते हैं कि बहू पढ़ी-लिखी मिले, लेकिन बेटियों को पढ़ाने के लिए तैयार नहीं हैं। आखिर यह दोहरापन कब तक चलेगा। अगर हम बेटी को पढ़ा नहीं सकते तो शिक्षित बहू की उम्मीद बेमानी है। 
प्रधानमंत्री ने कहा कि जिस धरती पर मानवता का संदेश दिया गया हो वहां बेटियों की हत्या दुख देती है। यह अल्ताफ हुसैन हाली की धरती है। हाली ने कहा था, मांओ, बहनों, बेटियां दुनिया की ज़ीनत तुमसे है | शास्त्रों में भी बेटियों की प्रशंसा की गई है। उन्हें आशीर्वाद दिया गया है। उसी धरती पर बेटियों को बेमौत मार दिया जाए। इसके मूल में हमारे मन की बीमारी है। जिसमें हम बेटियों को परायी मानते हैं। मां भी बेटों को दो चम्मच घी देती है तो बेटी को एक चम्मच। यह समस्या पूरे देश की है। आखिर कब तक हम बेटियों को परायी मानते रहेंगे। 
उन्होंने कहा कि गर्भ में पाल रही बहन कभी नहीं चाहती की उसकी बेटी को मार दिया जाए, लेकिन परिवार का दबाव उसे इसके लिए मजबूर कर देता है। हम किसी भी तरह से खुद को इक्कीसवीं सदी का नागरिक कहने योग्य नहीं हैं। प्रधानमंत्री ने उस वक्त इस अभियान की शरूआत की है , जब संयुक्त राष्ट्र का यह ताज़ा अध्ययन - निष्कर्ष सामने आया है कि भारत में लिंगानुपात प्रति हज़ार पुरुषों पर केवल 918 महिलाओं का रह गया है | यह 2008 में 915 महिलाओं का था |  
'ट्वेंटी इलेविन ' संस्था द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार , हमारे देश में पिछले तीस वर्षों में एक करोड़ बीस लाख कन्याओं की हत्या की आशंका है | महिलाओं के अनुपात में यह असंतुलन वास्तव में बहुत चिंताजनक है | प्रधानमंत्री ने इस गंभीर समस्या की ओर ध्यान देकर जो जागरूकता पैदा करने की कोशिश है , वह सराहनीय है | इस सिलसिले में पहले सुप्रीमकोर्ट ने भी कड़ी टिप्पणी की थी और इस कुप्रथा पर रोक लगाने का आदेश दिया था , मगर इस ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया | यूँ तो लड़के-लड़की में फर्क करने यानी बेटे को तरजीह देने की मानसिकता समाज में सदियों से रही है, पर अत्याधुनिक तकनीकी साधनों के इस जमाने में इसने एक क्रूर शक्ल अख्तियार कर ली है। 
बहुत-सी कन्याएं गर्भ में ही मार दी जाती हैं, कुछ जन्म लेने के बाद भी जीवित नहीं रहने पातीं | लिंग चयन निषेध अधिनियम 1994 के लागू होने के बावजूद इस पर रोक नहीं लग पा रही है |  जिन लोगों की पहुंच अल्ट्रासाउंड जैसीतकनीकों तक है, वे पहले ही चोरी-छिपे गर्भ में पल रहे भ्रूण के लिंग का पता लगा लेते हैं और बेटी होने पर उसे नष्ट करा देते हैं। इन अवसरों पर डाक्टर क़ातिल की भूमिका में नज़र आते हैं , मगर क़ानून उनका बाल - बांका तक नहीं कर पाता ! कन्या भ्रूणहत्या के मामले में एक पहलू यह है कि गर्भवती महिला पर आमतौर पर उसके पति या परिवार वालों का दबाव होता है, जिसके सामने वह खुद को लाचार पाती है। 
सुप्रीमकोर्ट के तत्कालीन जज श्री के . एस  राधाकृष्णन और श्री दीपक मिश्रा ने कहा था कि इस सम्बंध में बने क़ानून के क्रियान्वयन न होने की वजह से महिला - पुरुष का अनुपात बिगड़ गया है | कोर्ट ने कहा कि धार्मिक ग्रंथों , वेदों , स्मृतियों , उपनिषदों और लोकोक्तियों में महिलाओं का सम्मान करने का निर्देश दिया गया है एवं धार्मिक अनुष्ठानों में उनका स्थान नियत किया गया है | कोर्ट ने कुछ उद्धरण भी कोट किए | कन्या भ्रूणहत्या के विरुद्ध जनचेतना जगाने के अन्य प्रयास भी किए गए , जो  संयुक्त राष्ट्र की उक्त रिपोर्ट के मद्देनज़र विफल हो गए लगते हैं | 
इस सिलसिले में भी इस्लाम की शिक्षाएं बड़ी कारगर हो सकती हैं | हज़रत मुहम्मद [ सल्ल .] से पूर्व अरब में महिलाओं की हालत बहुत ख़राब थी | उन्हें कोई अधिकार प्राप्त न था | विरासत में किसी तरह का हिस्सा न था | पैदा होते ही लड़कियों की हत्या , बलात्कार और दुराचार सामान्य बात बन चुकी थी | कुमार्गगमन और बेहयाई आम थी | महिला - शोषण की इंतिहा थी . पुरुष जितनी चाहता शादियाँ कर लेता , यहाँ तक कि सौतेली माँ को भी अपनी पत्नी बना लेता | हज़रत मुहम्मद [  स . ]  ने इस महिला - विरोधी गंदी मानसिकता को पूरी तरह स्वस्थ - सकारात्मक मानसिकता में बदल दिया | महिलाओं को उनके स्वाभाविक अधिकार दिए एवं आदर - सम्मान प्रदान किया | आपने लड़कियों के अच्छी तरह लालन - पालन की शिक्षा और प्रेरणा दी | उनकी हत्या पर रोक लगा दी | समाज को भ्रूणहत्या जैसी लानत से मुक्त किया | 
इस्लाम लड़कों को लड़कियों पर प्राथमिकता नहीं देता | हज़रत मुहम्मद [ स . ] ने कहा ,  '' जिस व्यक्ति के लड़की हो वह न तो ज़िन्दा गाड़े , न उसके साथ उपेक्षा का व्यवहार करे , न उस पर अपने लड़के ही को प्राथमिकता दे , तो अल्लाह उसे जन्नत में दाख़िल करेगा '' [ अबू दाऊद ] | एक और हदीस में है -  '' जिसने तीन लड़कियों की परवरिश की , उनकी शिक्षा - दीक्षा का प्रबंध किया , उनका विवाह किया और उनके साथ बाद में भी सद्व्यवहार किया , तो उसके लिए जन्नत है '' [ अबू दाऊद ]  | इस सिलसिले में इस्लाम की और भी शिक्षाएं हैं , जो महिला - सम्मान के लिए उभारती हैं |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

जारी है मानवाधिकार हनन का खुला खेल

 नरकंकालों का प्रदेश 
क्या उ.प्र. में भारतीय संविधान से अलग हटकर ऐसी हैवानी व्यवस्था चल रही है , जहाँ किसी नियम - क़ानून , नैतिकता , मानवता और सभ्यता को कोई स्थान नहीं है | दिल दुखाने ही नहीं दहलाने वाले जो मंज़र सामने आ रहे हैं,उन्हें देखकर तो ऐसा ही लगता है| उन्नाव जिले के बिठूर में पेरियर घाट पर अभी कुछ ही दिनों पहले सौ से अधिक लाशों के मिलने की घटना सामने आई थी , अब प्रदेश के कई स्थानों से पुलिस संरक्षण में बड़ी संख्या में नरमुंडों और नरकंकालों के मिलने की जो ख़बरें आई हैं , उन्होंने आम जनमानस में तरह - तरह के शक व शुब्हात को जन्म दिया है | लोग स्वाभाविक रूप से बड़ी परेशानी और चिंता में गिरफ़्तार हो गये हैं उन्नाव के पुलिस लाइन कैंपस में बिसरा कक्ष में 100 से अधिक नरकंकाल मिले हैं , जिनकी संतोषजनक जांच अभी तक नहीं हो पाई है ये नरकंकाल समूचे न होकर शरीर के अलग-अलग हिस्सों के हैं। ये 20 से 25 प्लास्टिक बोरियों में पाए गए मौके पर चीफ फार्मेसिस्ट वी .के . वर्मा को भी बुलाया गया , लेकिन वे भी कोई ठोस बात नहीं बता सके | पुलिस का कहना है कि ये नरकंकाल उन लाशों के होते हैं जिनकी जांच नहीं हो पाती है कि लाश किसकी है। इसलिए इन नरकंकालों को सुरक्षित रख लिया जाता है , लेकिन यह किसी कुतर्क से कम नहीं | कानूनन किसी की लाश को रखा नहीं जा सकता | उसकी अन्तेष्टि आवश्यक है कानूनी तौर पर 90 दिनों में जांच पूरी कर ली जाती है। 180 दिनों के बाद विसरा किसी काम का नहीं रहता इसलिए नष्ट कर दिया जाता है। अलबत्ता कोर्ट के आदेश पर जांच हेतु किसी अंग के अल्प भाग को रखा जाता है वह भी अस्पताल में जहाँ पर रखरखाव की उचित व्यवस्था हो | जहाँ तक लावारिश लाशों की अंतेष्टि का सवाल है , तो सरकार इसमें भी पीछे है | अतः पोस्टमॉर्टम हाउस में लावारिस लाशों के निस्तारण को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं। सरकार की ओर से लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार के लिए निर्धारित पैसे का क्या किया जाता है, इस सवाल का जवाब कोई अधिकारी देने को तैयार नहीं है। ऐसे में नरकंकालों का मिलना भ्रष्टाचार के साथ ही किसी बड़ी साज़िश की ओर भी इशारा है | यही कारण है कि उन्नाव में घटना की सूचना मिलते ही राजनेता भी वहां पहुंच गए। उन्नाव के सदर विधायक पंकज गुप्ता और पूर्व विधायक कृपा शंकर सिंह ने इस मामले की जांच की बात की। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में नरकंकाल मिलना सामान्य बात नहीं है। बहरहाल इसकी जाँच की जा रही है | इसमें लीपापोती न हो , इसकी कोशिश होनी चाहिए | प्रदेश के अन्य स्थानों से भी नरकंकालों के मिलने की ख़बरें आ रही हैं बहराइच पुलिस लाइन के एक कमरे में भी मानव खोपड़ी और कंकाल का जखीरा मिला है , हालांकि अधिकारियों का कहना है कि बड़ी संख्या में मिले ये मानव कंकाल विसरा है, लेकिन इनकी सुरक्षा में इतनी लापरवाही कई सवाल खड़े कर रही है। पुलिस लाइन के कमरे में वर्षों पुराने नर कंकाल सड़ रहे हैं। मानव अस्थियां बोरे और कपड़े में बंधी हुई हैं। विसरा के सैकड़ों डिब्बे भी रखे हुए हैं। कमरे में बंद नर कंकाल और विसरा के हालात जानने के लिए जब पड़ताल की गई तो पता चला कि यहां पर वर्ष 1950 से अब तक 5793 पोस्टमार्टम हुए ऐसे हुए हैं और इनका विसरा यहां सुरक्षित रखकर अधिकारी भूल गए हैं। सूत्रों की माने तो इन नरकंकालों की संख्या कई सौ में हो सकती है | 12×12 के कमरे में नीचे से काफी ऊपर तक ये कंकाल पटे पड़े हैं जिनमें इंसान की खोपड़ी सहित शरीर के सभी अंग मौजूद हैं | यही नहीं उसी कमरे के कुछ दूरी पर इंसानी विसरा भी हज़ारों की संख्या में रखा गया है काफी मशक्कत के बाद जब पत्रकारों ने इस मामले में सवाल-जवाब शुरु किया , तो पुलिस अधिकारियों के हाथ पाँव फूल गए और उन्होंने फ़ौरन कंकाल घर को सील करा दिया। गोरखपुर में भी कमोबेश यही स्थिति है रेलवे स्टेशन के पास स्थित पुराने पोस्टमॉर्टम हाउस को करीब सात साल पहले बी.आर.डी. मेडिकल कॉलेज में ट्रांसफर कर दिया गया था, लेकिन आज जब वहां मानव अस्थियां और विसरा देखने में आया तो आनन-फानन में हटा दिया गया। इस मामले में स्थानीय नागरिकों काली देवी, पुरेंदर थापा और समाजसेवी मोहनलाल गुप्ता का कहना है कि पुराना पोस्टमॉर्टम हटा दिए जाने के बावजूद यहां की गंदगी और बदबू से यहां रहना मुश्किल हो गया है। 
इस संबंध में जब अधिकारियों से बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने इस बारे में बोलने से मना कर दिया इलाहाबाद पोस्टमॉर्टम हाउस में लावारिस लाशों के निस्तारण को लेकर सवाल उठने लगे हैं। रिकॉर्ड के मुताबिक यहां सालभर में 350 से ज्यादा लाशें आती हैं, जिनके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी पुलिस प्रशासन की होती है , लेकिन लापरवाह पुलिस प्रशासन इन लाशों की अंतेष्टि नहीं करवाता है। समाजसेवी आर.पी. सिंह के मुताबिक पिछले आठ साल से अपनी जेब से लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार कराने का काम कर रहे हैं। वे अब तक दो हजार से अधिक लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करवा चुके हैं। इसी तरह इलाहाबाद के रामबाबू पिछले 26 सालों से लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करवा चुके हैं। रामबाबू को प्रशासन की तरफ से प्रत्येक लाश के अंतिम संस्कार के लिए 800 रुपये मंजूर किए गए थे, लेकिन अब तक उन्हें यह राशि नहीं मिली। पुलिस के रवैये से निराश रामबाबू ने अब हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा चुके हैं, जहां 12 फरवरी को उनकी सुनवाई होनी है। वहीं इस मामले में इलाहाबाद के विसरा टेस्ट सेंटर इंचार्ज डॉ. बी.एल. गुप्ता का कहना है कि पुलिस या सरकारी अस्पताल पूरे जरूरी कागजात ही नहीं देते ,जिसके चलते लाशें लावारिस पड़ी रह जाती हैं। मुरादाबाद में भी केंद्रीय पुलिस अस्पताल परिसर में बने पुराने पोस्टमार्टम हाउस में सैकड़ों नमूने और हड्डियां पड़ी हैं। ए.डी.एम. सिटी प्रवीण मिश्र और एस.पी. सिटी प्रदीप गुप्ता ने पिछले दिनों पुराने पोस्टमार्टम हाउस का निरीक्षण किया। लगभग 15 साल से यहां पर पोस्टमार्टम बंद हो गए हैं। यहां बड़ी संख्या में मानव कंकाल, हड्डियां और विसरे के जार रखे थे। चार साल पहले भी इन अस्थियों को लेकर मामला उछला था। भदोही जिला अस्पताल में भी मानव अंगों से खिलवाड़ का बड़ा मामला उजागर हुआ है। लंबे समय से पोस्‍टमार्टम के बाद सुरक्षित किये गए विसरो का निस्तारण किया ही नहीं  गया है | इनको खण्‍डहर जैसे कमरे में कूड़े के ढेर में फेक दिया गया है !1994 में भदोही नया जिला बना | उसके बाद तमाम मौतों के बाद विसरा स्वास्थ्य विभाग के पास सुरक्षित रखा जाना था। पिछले चार वर्षो से विभाग विसरा पुलिस को सौप रहा है, लेकिन उसके पहले के दस वर्षो से अधिक के सैकड़ो विसरे आज कूड़े के ढेर में फेंक दिए गए हैं। अधिकरियों का कहना है कि, उनके पास इनका कोई लेखाजोखा नहीं है। कई बार निस्तारण के लिए रिपोर्ट भेजी भी गयी , पर अभी तक कमेटी की बैठक नहीं हो पाई है। मामले में जिले के उच्चाधिकारी कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं वहीं विभाग के डाक्टर 250 विसरा होने की बात कबूल कर रहे हैं। मगर मौके पर इनकी संख्या हजारों में दिख रही है | अब यह जाँच के बाद ही पता लगेगा कि इनकी कुल कितनी संख्या हैं। निश्चित रूप से मानव गरिमा के हनन की ये घटनाएं  न तो सभ्य समाज की द्योतक हैं और न ही स्वस्थ शासन - प्रशासन की | इसे सिर्फ़ इत्तिफ़ाक़ नहीं कह सकते कि ये सभी घटनाएं पुलिस महकमे से जुड़ी हुई हैं , बल्कि पुलिस विभाग जैसे भी अनेक विभाग हैं , जिनकी कार्य - प्रणाली सन्तोषजनक नहीं है | सरकार को चाहिए कि ऐसे सभी विभागों को प्राथमिक तौर पर बेहतर बनाएं , जो जनता से सीधे तौर पर जुड़े हों | पुलिस विभाग इनमें से सर्वप्रथम है


गुमराहकुन है मीडिया रिपोर्ट

मुसलमानों की आबादी की वृद्धि दर में गिरावट 

ऐसी ख़बरें आ रही थीं कि मोदी सरकार 2011 के धार्मिक जनगणना के आंकड़ों को जारी करने की दिशा में गंभीरता से सोच रही है , अंग्रेज़ी अख़बार ' द टाइम्स आफ़ इंडिया ' ने गत 22 जनवरी को  इसकी  स्कूप खबर प्रकाशित कर दी , जिसके अनुसार , देश में मुसलमानों की आबादी राष्ट्रीय औसत 18 प्रतिशत के विपरीत 2001-11 के दौरान 24 प्रतिशत बढ़ी है और इसके साथ कुल आबादी में समुदाय का प्रतिनिधित्व 13.4 प्रतिशत से बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गया है। धार्मिक समूहों की आबादी पर जनगणना के आंकड़ों में कहा गया है कि देश के सभी राज्यों में जम्मू-कश्मीर में सर्वाधिक मुस्लिम आबदी 68.3 प्रतिशत है। इसके बाद असम में 34.2 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने विगत 21 जनवरी को कहा था कि आंकड़े जल्द जारी किए जा सकते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 1991 से 2001 के बीच मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर करीब 29 प्रतिशत थी | पांच प्रतिशत की आई गिरावट के बावजूद मुस्लिम आबादी में 24 प्रतिशत वृद्धि दर दशक 2001-11 में 18 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से अधिक है। कुल आबादी में मुसलमानों की आबादी सर्वाधिक तेज गति से असम में बढ़ी है। राज्य में 2001 में मुसलमानों की आबादी कुल आबादी का 30.9 प्रतिशत थी और बाद के दशक में यह बढ़कर 34.2 प्रतिशत हो गई है । मणिपुर एकमात्र ऐसा राज्य है जहां मुसलमानों की आबादी कम होकर 8.8 प्रतिशत से 8.4 प्रतिशत हो गई है। असम और पश्चिम बंगाल एक और ऐसा राज्य है जहां बांग्लादेश से अवैध आव्रजन एक मुद्दा रहा है। इस राज्य में मुसलमानों की आबादी 2001 के आंकड़े 25.2 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 27 प्रतिशत हो गई। यह 1.8 प्रतिशत की वृद्धि है , जो अधिक नहीं कही जा सकती | उत्तराखंड में भी मुस्लिम आबादी में वृद्धि हुई है और यह आंकड़ा 2001-2011 के बीच 11.9 प्रतिशत से बढ़कर 13.9 प्रतिशत हो गया है। 
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार अन्य राज्यों में जहां कुल आबादी में मुसलमानों की आबादी में वृद्धि हुई है, उनमें केरल (24.7 प्रतिशत से बढ़कर 26.6 प्रतिशत), गोवा (6.8 प्रतिशत से बढ़कर 8.4 प्रतिशत), जम्मू-कश्मीर (67 प्रतिशत से बढ़कर 68.3 प्रतिशत), हरियाणा (5.8 प्रतिशत से बढ़कर 7 प्रतिशत), दिल्ली (11.7 प्रतिशत से बढ़कर 12.9 प्रतिशत) शामिल हैं। केंद्र शासित क्षेत्रों में लक्षद्वीप में सर्वाधिक मुस्लिम आबादी 96.2 प्रतिशत है। गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया कि डाटा अभी जनगणना महापंजीयक द्वारा संकलित किया जा रहा है और यह जल्द ही आधिकारिक तौर पर जारी किया जाएगा। गृह मंत्रालय के तहत महापंजीयक और जनगणना आयुक्त ने मार्च 2014 तक आंकड़े संकलित कर दिए थे, लेकिन पिछली संप्रग सरकार ने इन्हें जारी नहीं किया था। विशेषज्ञों ने कहा कि डाटा संग्रह के तीन साल के भीतर इस तरह के आंकडे जारी कर दिए जाते हैं और 2015 को देखते हुए समयसीमा पहले ही निकल चुकी है। पिछली बार धर्म आधारित आंकड़े 2004 में जारी किए गए थे , जो 2001 तक का रिकॉर्ड था। इन आंकड़ों के आने के बाद प्रत्याशित रूप से बयानबाज़ियाँ शुरू हो गयी हैं | वैसे हर जनगणना के बाद मुसलमानों पर सवाल उठाये जाते रहे हैं और मुस्लिम आबादी का हव्वा खड़ा किया जाता रहा है | कुछ साधू - संत पिछले दिनों हिन्दू जनसंख्या बढ़ाने से संबंधित बयान दे चुके हैं और हिन्दुओं को अल्पसंख्यक होने का भय दिला चुके हैं | लेकिन यह ऐसी स्थिति नहीं है , जिसके प्रति भय दिलाया जाए | असम और पश्चिम बंगाल के आंकड़ों के अतिरिक्त मुसलमानों की आबादी स्वाभाविक रूप से बढ़ी है | सच्चाई यह है कि मुसलमानों की आबादी पहले से घटी है |1991 से 2001 के बीच मुसलमानों की आबादी 29 प्रतिशत बढ़ी थी , जो 2001 से 2011 में घटकर 24 प्रतिशत रह गयी है , हालांकि कुल आबादी की औसत वृद्धि दर 18 प्रतिशत ही रही | इसके मुकाबले मुसलमानों की वृद्धिदर मात्र 6 प्रतिशत अधिक है , जो उसके पूर्वकाल से काफ़ी कम है | मुसलमानों का लिंगानुपात यह बताता है कि 1000 मुस्लिम मर्दों की तुलना में औरतें 936 ही हैं |  मुसलमानों की आबादी के बढ़ने के दो प्रमुख कारण हैं -  पहला , उनकी जीवन प्रत्याशा हिन्दुओं से अधिक 68 वर्ष है , जबकि हिन्दुओं की 65 वर्ष है | दूसरा प्रमुख कारण मुसलमानों में बाल मृत्यु दर का कम होना है | हिन्दुओं में बाल मृत्यु दर 76 है , जबकि मुसलमानों में केवल 70 है [ राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण - 3 , 2005-06 , पृष्ठ 182 टेबल 7.2 ] | अतः व्यर्थ का हो - हल्ला करनेवालों को चाहिए कि सही तथ्य ही अवाम के सामने पेश करें , कुतर्क करके भ्रम की स्थिति न पैदा करें | 
- Dr. Muhammad Ahmad