Mar 29, 2015

महंगाई घटने के दावे की सच्चाई

महंगाई घटने के दावे की सच्चाई

मोदी सरकार ने महंगाई घटाने का जो वादा किया था , उसके बारे में ख़ासकर भाजपा के लोग कुछ आंकड़ों के सहारे यह दावा करते हैं कि महँगाई दर घट कर पाँच वर्षों के सबसे निचले स्तर पर आ गयी है। जबकि वे और सभी जानते हैं कि हकीक़त में ऐसा है नहीं | महंगाई की रफ्तार पर कहीं ब्रेक नहीं है बढ़ती महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है रोजमर्रा इस्तेमाल की चीजों के दाम पहले की तरह ही बढ़ रहे हैं | मगर आंकड़ों का मकडजाल कुछ नया ज़रूर है | जी हाँ , यह सच है कि जो महँगाई दर पाँच वर्षों के निचले स्तर पर आयी है, वह थोक महँगाई दर (डब्लूपीआई) है। यह थोक महँगाई दर अगस्त 2014 में घट कर 3.74 फीसदी पर आ गयी है, जो वाकई करीब पाँच वर्षों का सबसे निचला स्तर है। जुलाई में यह दर 5.19 फीसदी थी। लेकिन आप जिस महँगाई को खुद भुगतते हैं, वह खुदरा महँगाई दर में दिखती है। अभी हाल में उसके भी ताजा आँकड़े आये हैं। वह जुलाई के 7.96 फीसदी से घट कर अगस्त में 7.8 फीसदी पर आयी है। यानी उसमें कमी आयी तो है, पर उतनी नहीं, जितनी थोक महँगाई दर में। यहाँ दो बातें समझने वाली हैं। सबसे पहले तो यह कि महँगाई दर घटने का मतलब चीजों के दाम घटना नहीं होता। इसका मतलब यह होता है कि चीजों के दाम बढ़ने की रफ्तार पहले से कम हो गयी है। इसलिए जब आप सुनते हैं कि महँगाई दर नीचे आ गयी है, तो उसका मतलब सीधे शब्दों में यह होता है कि 100 रुपये की जिस चीज का दाम बढ़ कर 110 रुपये हो सकता था, वह बढ़ कर केवल 105 रुपये हुआ है। अब यह उम्मीद तो कोई भूले-भटके भी नहीं करता कि 100 रुपये की चीज के दाम घट कर कभी 95 या 90 रुपये हो जायेंगे! यह केवल कुछ असामान्य स्थितियों में ही होता है, जब टमाटर के भाव 80 रुपये तक जाने के बाद फिर से 40 रुपये पर लौट आते हैं। दूसरी बात जो थोक और खुदरा महँगाई दर में अंतर से दिखती है, वह यह है कि महँगाई को घटाने के सरकारी उपाय खुदरा स्तर पर अक्सर नाकाम साबित होते रहे हैं। सरकार एक थोक व्यापारी के गोदाम पर तो छापे मार सकती है। लेकिन ठेले पर सब्जियाँ बेचने वाला मंडी से किस भाव पर खरीद कर किस खुदरा भाव पर बेचेगा, इस पर नियंत्रण करने का कोई कारगर उपाय सरकार के पास नहीं है। खुदरा व्यापारी इस मानसिकता का फायदा उठाते हैं कि एक बार जो दाम ऊपर चले गये, उनका पुनः लौट नीचे आना एक तरह से नामुमकिन है | इस बात को आँकड़ों के जरिये भी समझा जा सकता है | थोक में पिछले साल अगस्त में प्याज के दाम 273 फीसदी बढ़े थे। इस साल अगस्त में प्याज के थोक भाव 45 फीसदी घटे हैं। लेकिन क्या प्याज की कीमतों में ऐसी कोई भारी कमी आपको अपने खुदरा बाजार में दिखी है? नहीं |
पिछले साल अगस्त में खाद्य वस्तुओं की थोक महँगाई दर 19.17 फीसदी थी, जो इस साल अगस्त में घट कर केवल 5.15 फीसदी पर आ गयी। लेकिन खुदरा बाजार में खाद्य महँगाई दर 9.42 फीसदी पर रही, पिछले महीने यानी जुलाई के 9.36 फीसदी से बढ़ गयी। थोक में महँगाई शांत पड़ रही है, लेकिन खुदरा में अभी भी फुफकार रही है। इसलिए थोक महँगाई दर पाँच साल के निचले स्तर पर आ जाने से आपको कोई राहत नहीं मिलने वाली, न ही इससे रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन की चिंताएँ कम होने वाली हैं। पहले रिज़र्व की नजर मुख्य रूप से थोक महँगाई दर पर होती थी और उसी के हिसाब से इसकी नीतियाँ तय होती थीं। लेकिन पिछले कुछ समय से इसने खुदरा महँगाई दर को भी तवज्जो देना शुरू कर दिया है, जो उचित ही है। इसलिए जब तक खुदरा महँगाई दर में पर्याप्त कमी न आये और यह भरोसा न हो कि यह निचले स्तरों पर रुकी रहेगी, तब तक रिजर्व बैंक अपनी ब्याज दरों में कमी नहीं करेगा। रिजर्व बैंक जब अपनी ब्याज दरों को घटाता है, तभी बैंक अपने ग्राहकों और छोटी-बड़ी कंपनियों के लिए ब्याज दरें घटाते हैं। ब्याज की मार अर्थव्यवस्था पर बहुत घातक रूप में पड़ती है | इसकी दरें घटने से निवेश और खपत दोनों में इजाफा होता है और अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। इसीलिए आर्थिक जानकारों के एक बड़े तबके और उद्योग जगत की अरसे से माँग रही है कि रिज़र्व बैंक ब्याज दरें घटाने का चक्र शुरू करे। मगर ऊँची महँगाई दर का हवाला देकर उसने इस माँग को लगातार नकारा है। रघुराम राजन कह चुके हैं कि उन्हें खुदरा महँगाई दर जनवरी 2015 तक 8% और उसके अगले 12 महीनों में घट कर 6% पर आने का इंतजार है। अभी खुदरा महँगाई दर उनके जनवरी 2015 के लक्ष्य के आसपास दिख रही है और थोक महँगाई दर काफी नीचे आ चुकी है, मगर रिज़र्व बैंक को आशंका है कि इस समय ब्याज दरों में कटौती करने पर कहीं महँगाई दर फिर से न उछल जाये। लेकिन नयी सरकार के आने के बाद से जिस तरह लोगों की उम्मीदें परवान चढ़ी हैं और लोग जल्दी से देश की आर्थिक विकास दर में तेजी आने की बाट जोहने लगे हैं, उसके मद्देनजर यह स्वाभाविक है कि अब आरबीआई पर ब्याज दरें घटाने का दबाव बनेगा। ऐसे में सरकार और रिज़र्व बैंक के बीच फिर से खींचतान की स्थिति पैदा हो सकती है , लेकिन सच्चाई यही है कि इन्हीं दोनों को मिल कर इस पहेली का हल भी निकालना होगा। सरकार को यह देखना होगा कि थोक महँगाई में आयी कमी कैसे खुदरा बाजार पर भी असर दिखाये। वहीं रिज़र्व बैंक को भी एक हद तक यह समझना होगा कि भारत में महँगाई दर की उठापटक पर उसकी ब्याज दरें ऊँची रखने से कोई नियंत्रण नहीं हो पाता है। उसने सालों से अपनी ब्याज दरें ऊँची रख कर देख लिया, क्या फर्क पड़ा महँगाई पर? अब अगर थोक महँगाई दर घटी है तो इसका कारण आरबीआई की ऊँची ब्याज दरें नहीं हैं। इसके घटने के पीछे दो मुख्य कारण हैं खाद्य महँगाई में कमी और ईंधन की कीमत में कमी। इन दोनों पर रिज़र्व बैंक की ब्याज दरों का कोई असर नहीं होता। खाद्य महँगाई के पीछे मुख्य समस्या आपूर्ति पक्ष से जुड़ी रही है। यह समझा जा सकता है कि जमाखोरी और कालाबाजारी रोकने के लिए थोक व्यापारियों पर सरकार ने हाल में जो सख्ती की, उसका कुछ असर दिखा है। वहीं ईंधन, खास कर पेट्रोल की कीमत में कमी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम घटने की वजह से आयी है। इसलिए अब रिज़र्व बैंक को महँगाई दर के मामले में थोड़ा लचीला रवैया दिखाना होगा। बेहतर होगा कि वह खुदरा महँगाई दर में वांछित कमी का इंतजार करते रहने के बदले थोक महँगाई में कमी को ही आधार बनाते हुए ब्याज दरों में कटौती का सिलसिला शुरू करे , लेकिन पिछले दिनों गवर्नर रघुराम राजन ऐसी माँग को साफ नकार चुके हैं। उनका कहना है कि ब्याज दरों में कटौती करने का कोई तुक नहीं है, क्योंकि इससे फिर महँगाई बढ़ने लगेगी | वे उल्टे उद्योग जगत से कह रहे हैं कि आप दाम घटा दीजिए तो हम ब्याज दरें घटा देंगे। ऐसा मुमकिन नहीं कि उद्योगपति महंगाई घटाने में सक्षम हों , इसके लिए सरकार को ही ठोस पहल करनी होगी इस बात में कोई दो राय नहीं है कि वर्तमान महंगाई को रोक पाना सरकार के लिए निकट भविष्य में संभव नहीं है। लेकिन सरकार को सोचना होगा कि यदि आम जन के लिए दीर्घकाल में वस्तुओं की कीमतों को नीचे रखना है तो उसके लिए उसे कृषि की अनदेखी समाप्त कर कृषि विकास के लिए ठोस उपाय करने होंगे। साथ ही साथ वायदा बाजार पर रोक लगानी होगी। और सबसे जरूरी बात यह है कि सरकार को अपनी फिजूलखर्ची को कम करते हुए बजट घाटे को कम करना होगा ताकि सरकार को अपना खर्च पूरा करने के लिए अतिरिक्त करेंसी नोट न छापने पड़े।


भारतीय समाज की मुश्किलें

भारतीय समाज की मुश्किलें 

आज हमारा प्यारा देश चौतरफ़ा समस्याओं से घिरा हुआ है | गरीबी , बेरोज़गारी , महंगाई, भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं ने आम आदमी की मुश्किलें बहुत बढ़ा दी हैं | आख़िर इन समस्याओं का मूल कारण क्या है ? इन्सान की विकृत मानसिकता , नैतिक पतन के साथ ही पूंजीवाद और पूंजीवादी स्वार्थपरक मानसिकता ही इसका मूल कारण है | आज देश का लगभग हर नेता हर हाल में अपने खाने - कमाने में मशगूल है | ज़ाहिर है , बिना पूंजीवाद का दमन थामे यह संभव नहीं है ! अतएव आज सामान्य रूप से देखा जा रहा है कि देश को पूंजीवादी साम्राज्यवाद की आग में झोंकने का काम सत्ताधारी वर्ग और प्रतिपक्षी दोनों कर रहे हैं
देश के राजनीतिक दल इस घिनौने काम में बुरी तरह पारंगत हो चुके हैं | सभी जानते हैं कि ये ही देश की व्यवस्थापिका का निर्माण करते हैं | फिर कार्यपालिका में अपने जैसी मानसिकता रखनेवालों का प्रोत्साहन एवं संवर्धन करते हैं , जिसके नतीजे में  अधिकारियों और कर्मचारियों का पूरा गिरोह रिश्वतखोरी , कामचोरी और भ्रष्टता में बेख़ौफ़ तरीक़े से लिप्त हो जाता है ! फिर हालत यह हो जाती रही है कि हर छोटे - बड़े सभी कामों और सौदों में छोटी रक़म से लेकर अरबों - खरबों की धनराशि कमीशन या रिश्वत के तौर पर ली जाती है ! हमारे प्रिय देश को बड़े - बड़े घोटाले करने का श्रेय और गर्व प्राप्त है ! इनके अनगिनत नाम हैं | टू जी स्पेक्ट्रम , कोलगेट , राष्ट्रमंडल खेल घोटाला , बोफ़ोर्स ,  चारा घोटाला , ताबूत और हेलीकाप्टर - खरीद घोटाला आदि ऐसे अनगिनत काण्ड एवं ' आमालनामे ' हैं , जो देश के कर्णधारों  के चाल - चलन को पूरी तरह उजागर कर देते हैं | केंद्र और राज्य सरकारों का यही हाल है | एक छोटे - से क्लर्क के पास से करोड़ों की काली कमाई निकलती है ! म . प्र . में छापेमारियों ने इसे स्वयं सिद्ध कर दिया है  | सरकारी कार्यालय भ्रष्टाचार के ' जीवंत ' केंद्र बने हुए हैं | हालत इतनी बदतर है कि किसी को भी अपना काम कराने के लिए रिश्वत देने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं है |गरीबों को उनका जायज़ हक़ रिश्वत , पक्षपात   और प्रदूषित मानसिकता के कारण नहीं मिलता
 देश की आज़ादी के लिए जो लड़ाई हिन्दू - मुसलमान और अन्य लोगों ने मिलकर लड़ी थी , उनमें आज दूरी पायी जाती है | सांप्रदायिक दंगों में जो लगातार वृद्धि हो रही है , वह भी दूरी और बदगुमानी का कूपरिणाम है | इस सूरतेहाल में सांप्रदायिक और फ़ासीवादी तत्वों को अपना काम करने का ' सुअवसर ' प्राप्त होता है | ये तत्व देश की सत्ता - राजनीति पर क़ाबिज़ होना चाहते हैं और इसके लिए अंग्रेज़ों की ' फूट डालो . राज करो ' की नीति को पूरी तरह अपना रखा है | इनकी पहुँच पुलिस , प्रशासन , मीडिया और न्यायपालिका तक है , जिसे कारण देश के अल्पसंख्यक और कमज़ोर वर्गों को अपने भौतिक एवं आस्थागत अस्तित्व को बचाना बहुत कठिन हो गया है | वास्तव में नागरिक और मानवीय अधिकारों की पामाली हमारे देश में एक बड़ी समस्या बनी हुई है आतंकवाद के नाम पर पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियां मुस्लिम नवजवानों को बेबुनियाद और मनगढ़ंत आरोपों के तहत झूठे मुक़दमों में फंसाकर जेलों में झोंक रही हैं | स्थिति यह है कि जब तक इनकी बेगुनाही अदालत में साबित होती है , तब तक ये अपनी उम्र का बड़ा हिस्सा जेलों में गुज़ार चुकते हैं | यह अन्यायपूर्ण स्थिति भी ज़रूर बदलनी चाहिए | ज़रूरत इस बात की है कि शांति प्रिय , न्याय प्रिय और देश व समाज हितैषी हर व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारी महसूस करे , मौलिक धार्मिक और नैतिक मूल्यों को अपनाए एवं देश को इन समस्याओं के हल तथा चरित्रहीन व मलिन राजनीति से देश को पाक करने के लिए आगे आए | क्या भाजपा इन विसंगतियों और समस्याओं में स्वस्थ - सकारात्मक बदलाव लाने में सफल हो पाएगी ?

आज हमारा प्यारा देश चौतरफ़ा समस्याओं से घिरा हुआ है | गरीबी , बेरोज़गारी , महंगाई, भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं ने आम आदमी की मुश्किलें बहुत बढ़ा दी हैं | आख़िर इन समस्याओं का मूल कारण क्या है ? इन्सान की विकृत मानसिकता , नैतिक पतन के साथ ही पूंजीवाद और पूंजीवादी स्वार्थपरक मानसिकता ही इसका मूल कारण है | आज देश का लगभग हर नेता हर हाल में अपने खाने - कमाने में मशगूल है | ज़ाहिर है , बिना पूंजीवाद का दमन थामे यह संभव नहीं है ! अतएव आज सामान्य रूप से देखा जा रहा है कि देश को पूंजीवादी साम्राज्यवाद की आग में झोंकने का काम सत्ताधारी वर्ग और प्रतिपक्षी दोनों कर रहे हैं
देश के राजनीतिक दल इस घिनौने काम में बुरी तरह पारंगत हो चुके हैं | सभी जानते हैं कि ये ही देश की व्यवस्थापिका का निर्माण करते हैं | फिर कार्यपालिका में अपने जैसी मानसिकता रखनेवालों का प्रोत्साहन एवं संवर्धन करते हैं , जिसके नतीजे में  अधिकारियों और कर्मचारियों का पूरा गिरोह रिश्वतखोरी , कामचोरी और भ्रष्टता में बेख़ौफ़ तरीक़े से लिप्त हो जाता है ! फिर हालत यह हो जाती रही है कि हर छोटे - बड़े सभी कामों और सौदों में छोटी रक़म से लेकर अरबों - खरबों की धनराशि कमीशन या रिश्वत के तौर पर ली जाती है ! हमारे प्रिय देश को बड़े - बड़े घोटाले करने का श्रेय और गर्व प्राप्त है ! इनके अनगिनत नाम हैं | टू जी स्पेक्ट्रम , कोलगेट , राष्ट्रमंडल खेल घोटाला , बोफ़ोर्स ,  चारा घोटाला , ताबूत और हेलीकाप्टर - खरीद घोटाला आदि ऐसे अनगिनत काण्ड एवं ' आमालनामे ' हैं , जो देश के कर्णधारों  के चाल - चलन को पूरी तरह उजागर कर देते हैं
केंद्र और राज्य सरकारों का यही हाल है | एक छोटे - से क्लर्क के पास से करोड़ों की काली कमाई निकलती है ! म . प्र . में छापेमारियों ने इसे स्वयं सिद्ध कर दिया है  | सरकारी कार्यालय भ्रष्टाचार के ' जीवंत ' केंद्र बने हुए हैं | हालत इतनी बदतर है कि किसी को भी अपना काम कराने के लिए रिश्वत देने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं है |गरीबों को उनका जायज़ हक़ रिश्वत , पक्षपात   और प्रदूषित मानसिकता के कारण नहीं मिलता
 देश की आज़ादी के लिए जो लड़ाई हिन्दू - मुसलमान और अन्य लोगों ने मिलकर लड़ी थी , उनमें आज दूरी पायी जाती है | सांप्रदायिक दंगों में जो लगातार वृद्धि हो रही है , वह भी दूरी और बदगुमानी का कूपरिणाम है | इस सूरतेहाल में सांप्रदायिक और फ़ासीवादी तत्वों को अपना काम करने का ' सुअवसर ' प्राप्त होता है | ये तत्व देश की सत्ता - राजनीति पर क़ाबिज़ होना चाहते हैं और इसके लिए अंग्रेज़ों की ' फूट डालो . राज करो ' की नीति को पूरी तरह अपना रखा है | इनकी पहुँच पुलिस , प्रशासन , मीडिया और न्यायपालिका तक है , जिसे कारण देश के अल्पसंख्यक और कमज़ोर वर्गों को अपने भौतिक एवं आस्थागत अस्तित्व को बचाना बहुत कठिन हो गया है | वास्तव में नागरिक और मानवीय अधिकारों की पामाली हमारे देश में एक बड़ी समस्या बनी हुई है आतंकवाद के नाम पर पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियां मुस्लिम नवजवानों को बेबुनियाद और मनगढ़ंत आरोपों के तहत झूठे मुक़दमों में फंसाकर जेलों में झोंक रही हैं | स्थिति यह है कि जब तक इनकी बेगुनाही अदालत में साबित होती है , तब तक ये अपनी उम्र का बड़ा हिस्सा जेलों में गुज़ार चुकते हैं | यह अन्यायपूर्ण स्थिति भी ज़रूर बदलनी चाहिए | ज़रूरत इस बात की है कि शांति प्रिय , न्याय प्रिय और देश व समाज हितैषी हर व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारी महसूस करे , मौलिक धार्मिक और नैतिक मूल्यों को अपनाए एवं देश को इन समस्याओं के हल तथा चरित्रहीन व मलिन राजनीति से देश को पाक करने के लिए आगे आए | क्या भाजपा इन विसंगतियों और समस्याओं में स्वस्थ - सकारात्मक बदलाव लाने में सफल हो पाएगी ?
- डॉ . मुहम्मद अहमद 


खालिद मुजाहिद हत्याकांड की दोबारा जाँच के आदेश से इन्साफ के तक़ाज़े पूरे होंगे ?

खालिद मुजाहिद हत्याकांड की दोबारा जाँच के आदेश से इन्साफ के तक़ाज़े पूरे होंगे ?

खालिद मुजाहिदकी हत्या के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार एक बार फिर फंसती नज़र आ रही है | अखिलेश यादव सरकार ने इस हत्याकांड में शामिल जिन अधिकारियों को बचाने की कोशिश की थी , वे सभी एक बार फिर क़ानून की जद में आ गये हैं | इस मामले में विवेचना अधिकारी मोहन वर्मा द्वारा लगाई गई फाइनल रिपोर्ट को बाराबंकी मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी बृजेन्द्र त्रिपाठी द्वारा पिछले सात नवंबर14 को  खारिज किए जाने और दोबारा जाँच कराने के आदेश से सूबे की समाजवादी पार्टी सरकार को तगड़ा झटका लगा है। अदालत में सरकार की शिकस्त सपा के लिए राजनीतिक मुसीबत बन सकती है। जमाअत इस्लामी हिन्द ,रिहाई मंच सहित कई मुस्लिम एवं अन्य संगठनों ने अदालत के फैसले का स्वागत किया है। इस मामले खालिद मुजाहिद के चचा ज़हीर आलम फलाही ने 19 मई 2013 को 42 पुलिसवालों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज कराई थी , जिनमें पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह, पूर्व एडीजी कानून व्यवस्था बृजलाल, मनोज झा समेत कई आला पुलिस अधिकारियों समेत आईबी के अधिकारी भी शामिल थे। उन्होंने सीबीआई जांच की मांग की थी | खालिद मुजाहिद हत्या कांड की जांच में वादी जहीर आलम फलाही के अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब और रणधीर सिंह सुमन ने बताया कि खालिद की हत्या जो 18 मई 2013 को हुई थी, लेकिन विवेचना अधिकारी ने पूरे मामले बिना आरोपियों से पूछताछ किए ही 12 जून 2014 को फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी, जिसे खारिज करने की मांग को लेकर जहीर आलम फलाही ने 20 अक्टूबर 2014 को मुक़दमा दायर किया था और42 पुलिसवालों को नामज़द किया था । याचिका में उन्होंने कहा था कि विवेचना अधिकारी द्वारा वादी का 161 सीआरपीसी के तहत बयान दर्ज नहीं किया गया, अभियुक्तगणों का नाम मामले में होने के बावजूद विवेचना अधिकारी द्वारा उन्हें अज्ञात लिखा गया। इसके साथ ही विवेचनाधिकारी मोहन वर्मा [ कोतवाल, बाराबंकी ] ने खालिद के कथित तौर पर गिरफ्तारी के समय उनके अपहरण, अवैध हिरासत के आरोप की जांच नहीं की जिससे बाद में उनकी हत्या का उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है। वहीं विसरा की जांच भी उचित तरीके से नहीं की गई क्योंकि प्रभावशाली आरोपियों विक्रम सिंह और बृजलाल के प्रभावक्षेत्र में ही विधि विज्ञान प्रयोगशाला भी आती है। याचिका में जहीर आलम फलाही ने सवाल उठाया था कि चूंकि ऐसा प्रतीत होता है कि विवेचनाधिकारी ने अपने उच्च अधिकारियों को बचाने के लिए साक्ष्य एकत्र करने के बजाय उन्हें नष्ट करने का कार्य किया और हत्या के उद्देश्य के संबन्ध में कोई जांच करने की कोशिश ही नहीं की, इसलिए पूरे मामले की फिर से जांच कराई जाए। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी बृजेन्द्र त्रिपाठी ने वादी से सहमत होते हुए कहा कि सभी साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि सही ढंग से मामले की विवेचना नहीं की गई है। सही बयान भी अंकित नहीं किए गए हैं। जिसके समर्थन में वादी ने शपथ पत्र भी लगाया है। दण्डाधिकारी ने आगे कहा है कि पत्रावली के परिसीलन से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि प्रकरण में विवेचक का आचरण जल्दबाजी का प्रतीत हो रहा है। इसलिए उक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मामले की अग्रिम विवेचना कराया जाना न्यायोचित है। इस मामले में दण्डाधिकारी ने थाना प्रभारी , कोतवाली बाराबंकी को निर्देशित किया है कि इस पूरे मामले की विवेचना के प्रति सभी तथ्य संज्ञान में लेकर पुलिस अधीक्षक बाराबंकी के निर्देशानुसार इसकी जांच सुनिश्चित करें तथा दो महीने के अंदर परिणाम से अवगत कराएं। काबिलेगौर है कि सपा के चुनाव घोषणापत्र में बेक़सूर मुस्लिम नवजवानों की रिहाई के लाख दावे किये गये हों , पर अमलन कुछ नहीं हो सका | पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ज़बानी तौर पर  चार सौ बेक़सूर मुस्लिम नवजवानों  को रिहा करने की घोषणा कर चुके हैं , किन्तु अमलन एक की भी रिहाई नहीं हो पाई है! . दरअसल बात यहाँ इच्छाशक्ति की है | अखिलेश सरकार चाहती तो निमेष आयोग की रिपोर्ट का हवाला देकर तारिक और खालिद को रिपोर्ट के आने फ़ौरन बाद रिहा कर सकती थी , लेकिन उसने ऐसा न करके रिपोर्ट को ही दबा दिया ! मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पन्द्रह मार्च 2012 को  पदभार ग्रहण करने के बाद ही तारिक और खालिद के मामले की फ़ाइलें मंगाई थीं और रिहाई के सिलसिले में गौर किया था | मगर भाजपा जैसी कुछ पार्टियों द्वारा विरोध जताने के बाद रिहाई की दिशा में कोई प्रगति नहीं हो पाई , यहाँ तक कि निमेष आयोग की रिपोर्ट को भी दबा दिया गया !

निमेष जाँच आयोग पुलिस और सरकार दोनों की पक्षपाती भूमिका को उजागर करने में सक्षम है | यह दोनों को कटघरे में खड़ा करती है | आरोपियों के  मोबाइल नंबरों की जांच में लापरवाहियों और दोनों आरोपियों के अपहरण की सूचना परिजनों और स्थानीय नेताओं द्वारा दर्ज कराये जाने के बावजूद जांच का न होना भी आंतकवाद आरोपियों को फंसाये जाने की ओर इशारा करता है | जांच आयोग ने गिरफ्तारी के अनियमितता और झोल को कुल 14 बिंदुओं में समेटा | रिपोर्ट के 14वें हिस्से में कहा गया कि कथित आरोपी तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की 22 दिसंबर 2007 को सुबह 6.20 बजे आपत्तिजनक वस्तुओं के साथ गिरफ्तारी संदेहजनक प्रतीत होती है और अभियोजन के गवाहों पर पूर्णरूप से विश्वास नहीं किया जा सकता | ’ जांच आयोग ने अपने 12 सूत्रीय सुझावों में कई महत्वपूर्ण सुझाव आतंकवाद मामलों में होने वाली गिरफ्तारियों को लेकर दिये हैं, जिनमें सुझाव संख्या 8 और 11 बेहद महत्वपूर्ण हैं. सुझाव आठ में कहा गया है कि ऐसे मुकदमों के निर्धारण की सीमा अधिकतम 2 साल् होनी चाहिए. केस समय पर निस्तारण न होने पर समीक्षा होनी चाहिए और संबंधित व्यक्ति के विरूद्ध कार्रवाई होनी चाहिए.वहीं सुझाव संख्या 11 में झूठे मामलों में फंसाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और सुझाव 9 में गिरफ्तार बेक़सूर लोगों को मुआवज़ा देने की बात कही गयी |.रिहाई मंच आजमगढ़ के प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी ने कहा कि खालिद मुजाहिद की हत्या के मामले में विवेचनाधिकारी पर अदालत ने भी संदेह व्यक्त कर दिया है |इससे साफ है कि डीजीपी, एडीजी स्तर के अधिकारी इस पूरे मामले को दबाने में लगे हैं | अखिलेश सरकार भी उनके साथ है। खालिद मुजहिद हत्या प्रकरण सिर्फ हत्या तक सीमित नहीं है बल्कि यह तारिक-खालिद की गिरफ्तारी से भी जुड़ा है, जिस पर आरडी निमेष जांच आयोग ने संदेह व्यक्त करते हुए दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। उन्होंने कहा कि दरअसल तारिक-खालिद की गिरफ्तारी के समय उनके पास से बरामद दिखाए गए हथियार व विस्फोटक उनकी गिरफ्तारी के झूठे साबित हो जाने के बाद पुलिस व खुफिया विभाग संदेह के घेरे में आ जाता है कि इतने बड़े पैमाने पर उनके पास विस्फोटक व हथियार कहां से आए। यह पूरा मामला पुलिस-खुफिया विभाग और आतंकवाद के बीच के गठजोड़ का है | प्रदेश की सपा सरकार दोषियों को  बचाना चाहती है , आतंकवाद की पूरी राजनीति जिसके निशाने पर मुसलमान हैं का पर्दाफाश न हो सके | रिहाई मंच ने मांग की कि सपा सरकार प्रदेश को खुफिया विभाग-पुलिस और आतंकवाद के गठजोड़ से पैदा होने वाली खतरनाक राजनीतिक खेल में न फंसाकर खालिद मुजाहिद हत्या कांड की सीबीआई जांच कराए और तत्काल प्रभाव में निमेष जाचं आयोग रिपोर्ट पर अमल करते हुए दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करे। स्पष्ट विवेचना न्याय का आधार होती है जिसकी जिम्मेदारी विवेचनाधिकारी पर होती है , पर विवेचनाधिकारी ने जिस तरीके से इस मामले में पुलिस के आला अधिकारियों को बचाने की कोशिश की उनके खिलाफ न सिर्फ कार्रवाई की जाए बल्कि आतंकवाद के नाम पर झूठी बरामदगी, गिरफ्तारी व हत्या कराने वाले पुलिस के अधिकारियों के इस पूरे गठजोड़ की जांच कराई जाए |

फिर गाय की सियासत

फिर गाय की सियासत 


देश में गाय को लेकर फिर राजनीति की जा रही है | एक ओर महाराष्ट्र की भाजपा सरकार पाबंदी का दायरा बढ़ाकर बैलों आदि तक कर देती है , वहीं दूसरी ओर वह गोवा में सहर्ष बीफ परोस रही है | पार्टी के इस क़दम से सभी हैरत में हैं और बीफ पर रोक से प्रभावितों में सहज ही गुस्सा व आक्रोश है | मालूम हो कि महाराष्ट्र में पाबंदी के चलते गोवा में हाहाकार मचा हुआ था , तो राज्य सरकार ने पिछले 14 मार्च से लोगों को आसानी से बीफ़ मिलने लगा।
 इसके लिए राज्य के लोग गोवा की भारतीय जनता पार्टी सरकार को शुक्रिया कह रहे हैं। उल्लेखनीय है कि भाजपा गोवंशकुशी रोकने के लिए भावनात्मक आधार पर अभियान चलाकर अपना राजनीतिक स्वार्थ पूरा करने की कोशिश करती रही है | हाल के दिनों में उसने महाराष्ट्र के बाद हरियाणा में ऐसा ही क़दम उठाते हुए गोवंश कुशी पर पाबंदी लगा दी | हरियाणा विधानसभा में विगत 16 मार्च को हरियाणा गोवंश संरक्षण व गोसंवर्धन विधेयक-2015 को ध्वनिमत से मंजूरी दे दी गई। अब प्रदेश में गोकुशी ग़ैर ज़मानती आपराधिक कृत्य बन चुकी है
ऐसे अपराध के दोषियों को तीन से 10 साल तक की कैद व एक लाख रुपये तक जुर्माने की सजा हो सकती है। महाराष्ट्र में भी कड़ी सज़ा का प्रावधान है | इसके विपरीत गोवा में भाजपा सरकार इस बात की पूरी कोशिश क्र रही है कि राज्य में बीफ की किल्लत न होने पाए | वह गोवा में बीफ की कमी पड़ोसी राज्य कर्नाटक और महाराष्ट्र के जरिए पूरी कर रही है ! साथ ही भाजपा सरकार प्राइवेट सेक्टर के कोल्ड स्टोरेज से भी मदद ले रही है।
 जीएमसी के चेयरमैन लिंदोन मोंटेरिओ ने कहा, 'हमने प्रदेश में बीफ ट्रेडर्स से दो टूक कहा कि वे अपने स्टोर को खोलें नहीं तो कार्रवाई की जाएगी। हमने इन्हें एक हफ्ते का वक्त दिया था , लेकिन ये हरकत में नहीं आए। इसके बाद हमने पड़ोसी राज्यों से बीफ खरीद राज्य में अपने स्टोरेज के जरिए बेचना शुरू किया। इस वक्त गोवा सरकार अपने खुद के चेन के जरिए राज्य में बीफ बेच रही है। ' गोवा की कुल आबादी में ईसाई 26 पर्सेंट हैं। इनके किचन के लिए बीफ अहम है।
उधर केरल में इस मुद्दे पर घमासान मचा हुआ है | पूरे देश में गोहत्या और गोमांस पर प्रतिबंध लगाने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव के खिलाफ दोनों मोर्चे एकजुट हो गए हैं। दोनों ने इसे लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में दखलंदाजी करार दिया है। माकपा की राज्य कमेटी के सदस्य राजेश के नेतृत्व वाले डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (डीवाईएफआई) ने पिछले दिनों केंद्र की पहल के खिलाफ राज्य भर में मुफ्त में गोमांस निर्मित खाद्य पदार्थ बांटकर बीफ-फेस्टिवल मनाया। केरल देश के उन राज्यों में है जहां सर्वाधिक गोमांस की खपत होती है। 
सबसे महत्त्वपूर्ण और ध्यान देने वाली बात यह है कि बीफ मुख्यत: गरीबों का भोजन है, चाहे उसका कोई भी धार्मिक संबंध हो। इसके अलावा इसके जरिए गरीबों को सबसे सस्ते में प्रोटीन मिल जाता है। सरकारी आंकड़े खुद यह बताते हैं कि गैर शाकाहारी भोजन में बीफ सामान्यत: अधिक खाया जाता है। यूनाइटेड नेशंस फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में जो सबसे अधिक मांस खाया जाता है वह बीफ है। 
पश्चिम बंगाल और केरल में गोमांस गैरकानूनी नहीं है। हिंदुओं की ऐसी बहुत बड़ी संख्या है जो गोवंश का गोश्त खाती है। दक्षिण केरल में सभी समुदायों, जिसमें हिंदू भी शामिल हैं, द्वारा जितना गोश्त खाया जाता है उसमें आधा हिस्सा बीफ का होता है। साफ है कि बीफ गरीबों का भोजन है जिसे केवल मुसलमान ही नहीं खाते हैं। वर्तमान में केरल में 72 समुदाय ऐसे हैं, जिनमें सभी अछूत नहीं हैं, जो महंगे बकरे के गोश्त के बजाय गोवंश के जानवरों के गोश्त को ज्यादा तरजीह देते हैं। 
यही वजह है कि वहां भाजपा की कोशिश का सर्वाधिक खुलकर विरोध हो रहा है | इसी कड़ी में गत दिनों वहां एक अनोखे उत्सव का नजारा देखने को मिला , जहां खुली रसोई में बीफ (गाय का मांस) पकाया गया। इतना ही नहीं, हिंदुओं और मुसलमानों ने साथ बैठकर बीफ खाया भी। इस फेस्ट में आए लोग महाराष्ट्र में बीफ पर लगाए गए बैन का विरोध कर रहे थे। केरल में बीफ का मतलब गाय और भैंस दोनों का गोश्त है और यहां बीफ खाना कोई धर्म से जुड़ा मसला भी नहीं है। 
केरल में बहुत से हिंदू ऐसे हैं जो न सिर्फ बीफ खाते है बल्कि यह लोगों का पसंदीदा भी माना जाता है। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में बीफ खाना एक सामान्य बात है। भारत के विभिन्न हिस्सों में आदिवासी, दलित और मुसलमान बीफ खाते हैं। यही नहीं, उत्तर-पूर्वी भारत के पहाड़ी समुदायों के लोग भी बीफ खाते हैं। उत्तराखंड में आज भी बड़े पैमाने पर भैंसे की बलि चढ़ाने की परंपरा है , जिसका गोश्त खाया जाता है | हिन्दू धर्म ग्रंथ इसका समर्थन करते हैं | सुप्रसिद्ध लेखक डी एन झा ने अपनी पुस्तक ' द मिथ ऑफ होली काउ ' में कई ऐसे हवाले दिए हैं |