May 30, 2015

बढती सांप्रदायिकता पर फ़ौरन लगायें रोक

बढती सांप्रदायिकता पर फ़ौरन लगायें रोक 
हमारे देश में वोट की राजनीति के चलते अक्सर दंगे भड़काए जाते  रहे हैं | इसी राजनीति के तहत दंगों के वक्त प्रशासन को भी ढीला छोड़ दिया जाता है। इसकी पुनरावृत्ति पिछले दिनों 25 मई को हुई , जब सांप्रदायिक तत्वों ने गाँव की मस्जिद और मुसलमानों पर हमला किया और सुरक्षा कर्मी एक तरह से खामोश रहे | 
बताया जाता है कि अगर वे चाहते तो मुसलमानों को सुरक्षा की जा सकती थी | फरीदाबाद के अटाली गांव में धार्मिक स्थल के निर्माण विवाद में मुसलमानों के 15 से अधिक घर और एक दर्जन वाहन आग की भेंट चढ़ गए। इस दौरान पथराव में घायल सात लोगों को बल्लभगढ़ के सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया है। तनाव को देखते हुए गांव में धारा 144 लागू कर दी गई है। बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है। उल्लेखनीय है कि आसपास केलगभग बीस गांव के लोगों ने इकट्ठा होकर अदालत के आदेश और सरकारी मंज़ूरी लेकर बनाई जा रही एक मस्जिद का काम रुकवा दिया , तोड़फोड़ और मारपीट की | हालात इतने बिगड़े कि गाँव के मुसलमानों को मजबूरन गाँव छोडकर अन्यत्र जाना पड़ा | 
 इलाक़े के एक सामाजिक कार्यकर्ता जनाब मुमताज़ अली ने बताया कि लगभग तीन हज़ार की आबादी वाले इस गाँव में लगभग चार सौ मुसलमान हैं , जो यहाँ लगभग चार सौ साल से रहते हैं | 1985 में यहाँ मुस्लिम क़ब्रिस्तान की ज़मीन पर एक कच्ची मस्जिद सबकी रज़ामंदी से बनाई गई थी | इसके बाद इस पर छप्पर की जगह टीन शेड डाले गए | लगभग 6 साल पहले भी जब इस मस्जिद की छत पक्की करने के लिए पिलर उठाए जा रहे थे , तो जात बिरादरी के लोगों ने आपत्ति जताई और अदालत से स्टे ले लिया | गत 31 मार्च को अदालत ने मस्जिद के हक़ में फ़ैसला दे दिया और मस्जिद निर्माण की मंजूरी भी दे दी | इसके बाद स्थानीय अधिकारियों से मस्जिद - निर्माण की मंज़ूरी ली गई | हरियाणा वक्फ़ बोर्ड ने निर्माण के लिए दो लाख रुपए का अनुदान दिया | विगत 25 मई को जब मस्जिद निर्माण का कार्य चल रहा था , तभी शाम लगभग पांच बजे हज़ारों लोग आये और तोड़फोड़ - मारपीट की | हादसे में घायल ने बताया कि निर्माण के दौरान हमलावरों ने पथराव कर घरों में आग लगा दी। पुलिस को तनाव के बारे में पहले से ही पता था , किन्तु वह  घटनास्थल पर करीब डेढ़ घंटे बाद पहुंची।
डीसीपी बल्लभगढ़ भूपेंद्र ¨सह ने बताया कि पथराव में घायल कुछ महिलाएं व बच्चे बस्ती में ही रह गए , जिन्हें बाद में पुलिस ने बाहर निकाल कर एंबुलेंस से बल्लभगढ़ के सरकारी अस्पताल में पहुंचाया। उन्होंने बताया कि कहीं कोई अंदर न रह गया हो इसके लिए पुलिस संप्रदाय विशेष के घरों को सर्च कर रही है। फायर ब्रिगेड ने मौके पर पहुंच आग पर काबू पा लिया है। इस घटना की सीधी ज़िम्मेदारी हरियाणा सरकार पर आती है , जहाँ भाजपा सरकार | संयोग से केंद्र में भी भाजपा है , अतः गड़बड़ी फ़ैलाने वालों से सख्ती के साथ निबटा जा सकता है | हरियाणा सरकार के साथ ही देश के गृह मंत्री को चाहिए कि वे राज्य सरकारों को सांप्रदायिकता फैलाने वाले तत्वों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दें एवं सांप्रदायिकता पर काबू पाएं |

एक कटोरी दाल का सवाल

एक कटोरी दाल का सवाल 
कहते हैं , देश तरक्की कर रहा है .... जन - धन योजना के खाते देश को ख़ुशहाल बना रहे हैं ? और प्रधानमंत्री की बीमा योजनाएं लोगों का जीवन - स्तर सुधार रही हैं ? लेकिन सच्चाई यह नहीं है ! जिस देश में एक कटोरी दाल के लाले पड़े हों , भुखमरी और आत्महत्या जैसी स्थितियां बार - बार समाज की नियति बन जाती हों , उस देश में ' देश तरक्की कर रहा है ' और ' बुरे दिन बीते रे भैया ' जैसे जुमले आम जन पर फब्ती कसने से कम नहीं हैं | ' गरीबी हटाओ ' का नारा दशकों से सुनते आ रहे हैं , जिसके शब्द तो बदलते रहे , पर केन्द्रीय भाव एक ही रहता है | मगर आश्चर्य है , कभी गरीबी नहीं हटी , न ही कम हुई बल्कि गरीबी बढती ही जा रही है | इससे उलट अमीरी बढ़ी , नये - नये करोड़पति , अरबपति बने | हमारे देश की गरीबी बड़ी मर्मान्तक है | हाल की एक घटना देखिए , जो यह बताती है कि किसी की अंतिम इच्छा एक कटोरी दाल हो सकती है। कैसे कोई पूरी उम्र एक कटोरी दाल के लिए तरसता रह सकता है। ये कैसे हो सकता है कि एक आदमी जब मौत के निकट हो तो उसका परिवार दाल के लिए पड़ोसियों के घर दौड़ रहा हो। पूरी उम्र वह औरत एक कटोरी दाल के लिए तरसती रही। अरहर, मसूर, चना, मूंग या उड़द का विकल्प नहीं था उसके पास। जब उसने गरीबी से हारकर जहर खा लिया तो अपने अपाहिज पति से कहा अब तो जा रही हूं। आखिरी इच्छा है मेरी, जाते हुए दाल तो चखा दो। एक मरती हुई औरत अपनी उखड़ती हुई सांसों के साथ आखिरी ख़्वाहिश के तौर पर एक कटोरी दाल मांग रही थी। यूपी के जिला गोंडा, तहसील तरबगंज के गांव अकौनी में रितु बस इस दुनिया को छोड़ने से पहले दाल का स्वाद चख लेना चाहती थी। अपनी पत्नी की इस इच्छा के सामने बहुत बेचारा था उसका पति। क्‍योंकि घर में दाल नहीं थी इसलिए पड़ोसी के आगे कटोरी फैलानी पड़ी। तब जाकर वह अपनी पत्नी के लिए एक कटोरी दाल का इन्तिज़ाम कर पाया | यह भी एक बिडंबना ही है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में दाल की कीमतें ही अधिक बढ़ी हैं |
खाद्य मंत्रालय की प्राइस मॉनिटरिंग सेल के पास मौजूद आंकड़ों के मुताबिक, 26 मई 2014 से 22 मई 2015 के बीच दिल्ली में उड़द दाल 71 रुपये प्रति किलो से बढ़ कर 109 प्रति किलो यानी 54% महंगी हो गई। यही हाल अरहर की कीमतों में भी दिखा। अरहर दाल पिछले साल 26 मई 2014 को 75 प्रति किलो थी, जो 22 मई 2015 को बढ़ कर 108 रूपये प्रति किलो हो गई, यानी 44% की बढ़ोत्तरी। चना दाल पिछले एक साल में 50 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 68 प्रति किलो यानी 36% महंगी हुई और मसूर दाल इस दौरान 70 प्रति किलो से 94 प्रति किलो यानी 35% महंगी हुई। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने गत 25 मई को पत्रकारों से बात करते हुए माना कि दाल की कीमतें सरकार के लिए एक चुनौती है। जेटली ने कहा, 'एक समस्या दालों को लेकर है , क्योंकि फसल खराब होने का असर पड़ा है... ( दालों पर) अंतरराष्ट्रीय कीमतों का भी असर पड़ता है। इसलिए प्रमुख सचिव ने बैठक की है जिससे सप्लाई बढ़े और उसके दामों में नियंत्रण आए।' दाल व्यापारियों का कहना है कि पैदावार कम हुई तो बाजार में माल भी कम पहुंचा। हाल में ओला वृष्टि और भारी बारिश ने भी काफी फसल बर्बाद कर दी। नतीजा यह हुआ कि बाज़ार में माल कम पहुंचा और कीमतें बढ़ती चली गईं। रही सही कसर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में दाल की बढ़ी हुई कीमतों ने पूरी कर दीं, क्योंकि बाहर से दाल आयात करना भी बहुत महंगा सौदा साबित हुआ। इस दौरान रुपया भी डॉलर के मुकाबले कमज़ोर हुआ। अब दाल व्यापारियों की आशंका है कि आने वाले दिनों में दाल की क़ीमतें और बढ़ेंगी | अगर ऐसा हुआ और सरकार कारगर क़दम उठाने में नाकाम रही , तो आम जन का जीवन और दूभर हो जाएगा और एक कटोरी दाल के लिए उसे दूसरों के आगे बार - बार हाथ पसारने के लिए बाध्य होना पड़ेगा एवं ख़ाली पड़े जनधन खाते उसकी भूख नहीं मिटा पायेंगे |इन खातों में जो रक़म है , वह भी तो मध्य वर्ग की है ... गरीबों का कोई पुरसानेहाल नहीं है !

May 21, 2015

अतिक्रमण की ज़द में ताजमहल

अतिक्रमण की ज़द में ताजमहल 
- डॉ . मुहम्मद अहमद 
दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक आगरा का ताजमहल के चारों ओर अवैध कब्ज़ों एवं अतिक्रमणों में लगातार वृद्धि होती जा रही है ! भारतीय पुरातत्व विभाग जो इस विश्व धरोहर की निगरानी और सुरक्षा करती है , जमाअत इस्लामी हिन्द द्वारा लगातार ध्यान दिलाये जाने के बावजूद अवैध कब्ज़ों को हटाने में नाकाम है , बल्कि यूँ कहें तो उचित होगा कि इसे प्रशासन और पुरातत्व विभाग की शह मिली हुई है ! 
उल्लेखनीय है कि 1983 ताजमहल यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था | इससे पहले 1920 में ताजमहल को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया था | 
जमाअत इस्लामी हिन्द द्वारा बार - बार अतिक्रमण हटाने के सिलसिले में ध्यान दिलाने एवं अनुरोध करने के बाद भी ताजमहल के चतुर्दिक अतिक्रमण नहीं रुक रहे | इन्हें हटाने की बात तो बहुत दूर , अतिक्रमणों [ अवैध निर्माणों ] की संख्या 44 से बढ़कर 69 और अब 104 हो गई है |जमाअत के सहायक सचिव जनाब इन्तिज़ार नईम ने विगत 14 मई को पुरातत्व विभाग के महा निदेशक को भेजे गये पत्र में इस बात पर चिंता प्रकट की है और अतिक्रमणों को तत्काल हटाने की मांग की है |
 गौरतलब है कि पुरातत्व विभाग , आगरा क्षेत्र की ओर से जमाअत इस्लामी हिन्द को उपलब्ध करायी गई जानकारी के अनुसार , पूरे क्षेत्र में पुरातत्व विभाग की निगरानीवाली इमारतों आदि में 1513 अवैध निर्माण व अतिक्रमण हैं और पुरातत्व विभाग द्वारा 1475 एफ़ आई आर दर्ज करवाने एवं कुछ अन्य क़ानूनी कार्रवाइयों के बावजूद अतिक्रमण समाप्त करने के सिलसिले में कोई कामयाबी नहीं हुई है |पुरातत्व विभाग ख़ुद को कागज़ी कार्रवाइयों तक सीमित कर ख़ामोश बैठा हुआ है |
 वास्तव में आर टी आई के जवाब में जो विवरण दिए गये हैं , वे बेहद चौंकाने वाले हैं | हद तो यह कि ताजमहल परिसर से महज़ सौ मीटर के दायरे में बहुत से अवैध निर्माण किये गये हैं ! ऐतिहासिक धरोहरों एवं संरक्षण से जुड़े क़ानून के मुताबिक़ , ऐसे किसी भी स्मारक के दो सौ मीटर के दायरे में कोई निर्माण नहीं हो सकता , जबकि तीन सौ मीटर का दायरा रेगूलेटेड होता है , जिसमें कई स्तरों पर मंज़ूरी और कई शर्तों का पालन करने पर ही कोई निर्माण कार्य किया जा सकता है | सुप्रीमकोर्ट के एक आदेश के अनुसार , ताजमहल के सिलसिले में यह रोक पांच सौ मीटर के दायरे में लागू है |  
बीते कई वर्षों से आगरा में ताज और अन्य ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण के लिए काम कर रही संस्था ‘पर्यटक घाट समिति’ के प्रमुख श्री राजकुमार सिंह कहते हैं, ‘‘ताजमहल के आसपास अवैध निर्माणों के बारे में कई बार आंदोलन किया गया, लेकिन इसे रोकने के लिए पुरातत्व विभाग और प्रशासन ने कोई सख्त कदम नहीं उठाया | अतः ताज के आस पास तेजी से अवैध निर्माण कार्य चल रहा है |’’

May 19, 2015

धार्मिक भेदभाव क्यों ?

धार्मिक भेदभाव क्यों ?
क्या इस वक्त पूरी दुनिया तंगनज़री की चपेट में है ? कुछ घटनाओं से ऐसा ही लगता है कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में इन्सानों में वांछित उदारता और सहिष्णुता के गुणों का घोर अभाव हो चला है ! अभी कुछ ही दिन पहले मानवाधिकार और मानव स्वतंत्रता के अलमबरदार समझे जानेवाले देश अमेरिका में सिख शिक्षकों पर पगड़ी सहित धार्मिक परिधान पहनने पर पाबंदी लगा दी गई | अमेरिकी सरकार के इस क़दम से अमेरिका में जारी नस्ली विवाद को नया रंग मिला है , जो हर लिहाज़ से निंदनीय है | सारी दुनिया के सिखों ने अमेरिकी सरकार के उस कानून की निंदा की है जो सिख समुदाय केशिक्षकों पर पब्लिक स्कूलों में पगड़ी सहित ‘धार्मिक परिधान’ पहनने पर बंदिशें लगाता है। ओरेगन की विधायिका में पारित यह विधेयक गवर्नर के पास मंजूरी के लिए भेजा गया है। ओरेगनऑनलाइव ऑनलाइन ने कहा है कि विधेयक के अनुसार शिक्षा अधिकारी और स्कूल कानून का उल्लंघन नहीं करेंगे, अगर वे ‘किसी शिक्षक को बतौर अध्यापक धार्मिक परिधान पहनने से रोकेंगे।’ असल में ओरेगॉन में पारित यह विधेयक कार्यस्थल पर धार्मिक आजादी को व्यापकता देने के लिए लाया गया लेकिन इसने सिख समुदाय में विरोध को जन्म दे दिया है क्योंकि विधेयक में समान तरह के अधिकारों से स्कूलों को अलग रखा गया है। ‘ओरगॉन वर्कप्लेस रिलीजन फ्रीडम एक्ट’ शीर्षक वाला विधेयक कामकाजियों को तब तक धार्मिक आजादी की अनुमति देता है जब तक उनकी गतिविधि,परिवेश या अन्य धार्मिक रीतियाँ नियोक्ता के लिए दिक्कतें खड़ी न करें। इस पर विवाद बढ़ता ही जा रहा है | इसी बीच अब भारत में भी धार्मिक भेदभाव का ताज़ा मामला प्रकाश में आया है | लखनऊ के एक आईसीएसई स्कूल के खिलाफ भेदभाव बरतने की जांच का आदेश दिया गया है। नौवीं क्लास की एक छात्रा को क्लास में इसलिए नहीं आने दिया गया , क्योंकि वह हिजाब पहनकर पहुंची थी। सेंट जोसेफ इंटर कॉलेज के प्रबंध निदेशक अनिल अग्रवाल ने कहा कि स्कूल का अपना ड्रेस कोड है। 
उन्होंने कहा कि यदि कोई मजहबी ड्रेस पहनना चाहता या चाहती है तो उसे मदरसे या उसी तरह के किसी स्कूल में दाख़िला लेना चाहिए। जिलाधिकारी राज शेखर ने इस मामले में जांच का आदेश दिया है। इन्होंने इस मामले में अतिरिक्त जिलाधिकारी और ज़िला विद्यालय निरीक्षक को 19 मई तक रिपोर्ट सौंपने को कहा है। जब लड़की को हिजाब के कारण क्लास में जाने नहीं दिया गया , तो उसकी मां ने इस मामले में जिलाधिकारी को चिट्ठी लिखी थी। इसके बाद जिलाधिकारी ने इस मामले में जांच का आदेश दिया। गत 15 मई को स्कूल ने कहा कि यदि फरहीन को हिजाब में स्कूल आने की अनुमति दी जाती तो यह वाजिब नहीं होता क्योंकि इसके बाद भविष्य में इसे लेकर और गतिरोध पैदा होने की आशंका रहती। फरहीन के परिवार वालों ने स्कूल के इस कदम के बाद वहां नहीं पढ़ाने का फैसला किया है। ये फरहीन के लिए शहर में कोई दूसरा स्कूल देख रहे हैं। जिलाधिकारी को भेजे अपने पत्र में फरहीन की मां फातिमा वकार ने कहा कि मेरी बेटी का सेंट जोसेफ इंटर कॉलेज में दाख़िला सभी मानदंडों को पूरा करने का बाद हुआ था। फातिमा लखनऊ में ठाकुरगंज इलाके में रहती हैं। विगत सात मई को फरहीन को क्लास में बैठने से इसलिए रोक दिया गया क्योंकि वह हिजाब पहन कर आई थी। स्कूल ने दो टूक कहा कि आप स्कूल हिजाब पहन कर नहीं आ सकतीं। लेकिन मां फातिमा वक़ार का कहना है कि जब मेरी बेटी दाख़िला  लेने गई थी तब भी हिजाब पहनकर ही गई थी। उन्होंने कहा कि दाख़िले के फार्म पर फहरीन की तस्वीर भी स्कार्फ के साथ थी। फरहीन के जीजा शादाब वहीद ने कहा कि उनके ससुर की मौत दो साल पहले हो गई थी। तब फरहीन का दाख़िला भी नहीं हुआ था। दाख़िले के दौरान इंटरव्यू प्रिंसिपल ने ही लिया था और तब हिजाब को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। वहीद ने कहा, '6 मई को फीस जमा करने का बाद दाख़िला लिया गया था। जब वह सात मई को स्कूल गई तो उसे स्कार्फ हटाने का कहा गया। इसके जवाब में उसने कहा कि वह नहीं हटा सकती क्योंकि वह धार्मिक परिवार से है। इसके बाद उसे क्लास खत्म होने तक लाइब्रेरी में भेज दिया गया। 8 मई को भी ऐसा ही हुआ।' इस प्रकार की घटनाएं बहुत ही निंदनीय हैं | इन पर रोक लगाना ही समाज और देश के हित में ही नहीं बल्कि विश्व शांति के लिए बहुत आवश्यक है |

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक, सराहनीय फ़ैसला

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक, सराहनीय फ़ैसला 
- डॉ . मुहम्मद अहमद 
यह सच है कि स्त्री - पुरुष के मेलजोल के मौकों से विभिन्न प्रकार की समस्याएं पैदा होती हैं | आधुनिक समाज इस तथ्य की जितनी अनदेखी करता है , विकारों में फंसता चला जाता है | बहुत समय से समाज के कुछ चिंतकों और हितैषियों द्वारा यह मांग की जा रही है कि ऐसे अवसरों पर रोक लगाई जाए | यह बड़ी ख़ुशी और संतोष की बात है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस ओर ध्यान देकर यह फ़ैसला सुनाया है कि लड़कियों के स्कूलों में पुरुषों की शिक्षक, हेडमास्टर या प्रिंसिपल के तौर पर नियुक्ति नहीं होनी चाहिए। हाईकोर्ट ने विगत 13 मई को एक याचिका पर फैसला सुनाते हुए ये बात कही। हाईकोर्ट ने कहा कि यूपी माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड को यह हक़ है कि वह नियम बनाकर इस तरह की नियुक्तियों पर रोक लगाए। स्पष्ट रूप से यह फ़ैसला मानव हितकारी और लड़कियों के संस्‍थानों के हित में है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह फैसला डीपी गर्ल्‍स इंटर कॉलेज के प्रवक्ता मनमोहन मिश्रा की अपील को खारिज करते हुए दिया है। मिश्रा ने प्रिंसिपल पोस्ट के लिए बोर्ड द्वारा निकाले गए विज्ञापन के आधार पर अपने ही कॉलेज में इस पद पर नियुक्ति के लिए आवेदन दिया था। इसको बोर्ड ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि पुरुष शिक्षक को लड़कियों के स्कूल में प्रिंसिपल नहीं बनाया जा सकता |
 इस्लाम ऐसा मानव कल्याणकारी धर्म है , जो स्त्री - पुरुष के मेलजोल पर प्रभावी रोक लगाता है || पवित्र क़ुरआन में नामहरम [ अर्थात , जिन स्त्रियों - पुरुषों में परस्पर शादी हो सकती है ] स्त्रियों और मुस्लिम महिलाओं को नामहरम पुरुषों पर नज़र डालने से मना किया गया है और स्त्री - पुरुष दोनों को समान रूप से आदेश दिया गया है कि वे अपनी निगाहें नीची रखा करें | स्त्रियों को चाहिए कि परदा करें,दुपट्टा ओढें और उसके पल्लू अपने सीने पर डाल लें | अपनी शोभा और साज -सज्जा को अपने पतियों और महरम पुरुषों के सिवा किसी और पर ज़ाहिर न होने दें [ क़ुरआन , 24 : 30 , 31 ] | अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद [ सल्ल . ] ने मुसलमान स्त्रियों को हिदायत की है कि वे अपने पतियों या महरम पुरुषों के सिवा किसी और पुरुष से एकांत में न  मिलें , न अपने परिवार से अलग तन्हा रहें , न क़रीबी रिश्तेदारों के बिना लंबी यात्रा पर जाएं | इस सिलसिले में भी इस्लाम दुनिया के धर्मों में अनुपम - अपूर्व है | इसकी शिक्षाएं न केवल बुराइयों की जड़ें काटती हैं , अपितु उन सामाजिक गतिविधियों में फंसने से रोकती हैं , जो इन्सान को दुराचरण की राह पर ले जाती हैं | 

May 10, 2015

शराब करे ख़राब

शराब करे ख़राब 
आजकल बलात्कार की जितनी घटनाएं घट रही है हैं , उनके मूल कारणों में एक बड़ा कारण शराब का सेवन है . वास्तव में शराब बीमारियों की जननी है । मेडिकल साइंस ने इधर जाकर इसकी पुष्टि की है कि इसके शरीर पर बहुत घातक प्रभाव पड़ते हैं । सम्राट जार्ज के पारिवारिक डॉक्टर सर फ्रेडरिक स्टीक्स वार्ट का कहना है, ‘‘शराब शरीर की पची हुई शक्तियों को भी उत्तेजित करके  काम में लगा देती है, फिर  उसके ख़र्च हो जाने पर शरीर काम के  लायक़ नहीं रहता ।’’ इसी प्रकार सर एंड्रू क्लार्क वार्ट [ एम॰डी॰] का कथन है, ‘‘शरीर को अल्कोहल से कभी लाभ नहीं हो सकता ।’’
इस्लाम की सद्क्रान्तियों में से एक है शराब और मादक पदार्थों के  सेवन से मानवता को निजात दिलाना । अल्लाह के  रसूल हज़रत मुहम्मद [ सल्ल॰] के समय  में अरब समाज इतना पतित था कि जीवन में भोग-विलास  की जो भी सामग्री प्राप्त हो सकती थी उससे आनन्द लेना और आज़ादी के साथ शराब पीना लोगों की दिनचर्या में शामिल हो गयी थी । लेकिन उन पर इस्लामी शिक्षाओं का इतना ज़बरदस्त प्रभाव पड़ा कि शराब पीना बिलकुल बंद कर दिया और जब क़ुरआन की ये आयतें अवतरित हुईं, तो जिन लोगों के पास जो कुछ  शराब थी, उसे मदीना की गलियों में बहा दी -
‘‘ऐ ईमान लाने वालो ! यह शराब, जुआ और ये थान एवं पांसे शैतान के  गंदे कामों में से है । अतः इनसे बचो ताकि तुम सफल हो सको । शैतान तो यही चाहता है कि शराब और जुए के द्वारा तुम्हारे बीच वैमनस्य व द्वेष पैदा कर दे और तुम्हें अल्लाह की याद और नमाज़ से रोक दे । फिर क्या तुम बाज़ आ जाओगे ? अल्लाह का आदेश मानो और रसूल का आदेश मानो और [ इन चीज़ों से ] बचते रहो । यदि तुमने [ हुक्म मानने से ] मुंह मोड़ा, तो जान लो कि हमारे रसूल पर केवल स्पष्ट रूप से [ संदेश ] पहुंचा देने की ही ज़िम्मेदारी है ।’’   [ क़ुरआन , 5: 90-92 ]

May 9, 2015

क्या इन्साफ़ मिल पाएगा ?

क्या इन्साफ़ मिल पाएगा ?
कचहरी बम धमाके के फर्ज़ी तौर पर आरोपी बनाये गये डॉ . तारिक़ क़ासिमी को बांराबंकी की स्थानीय अदालत ने गत 28 अप्रैल 15 को उम्र कैद की सजा सुनाकर देश की न्याय व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा दिया है , क्योंकि 2007 में गठित आर डी निमेष आयोग ने गहन जाँच - पड़ताल के बाद 31 अगस्त 2012 को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में इस मामले को फर्जी बताया था | आयोग ने मौलाना डॉ. तारिक़  क़ासिमी और खालिद मुजाहिद को निर्दोष बताया था | 
उल्लेखनीय है कि खालिद मुजाहिद की फैजाबाद से पेशी पर आते वक्त पुलिस के जवानों ने  हत्या कर दी थी। अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के आदेश पर सीबीआई इस हत्याकांड की जाँच करेगी | यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह पैदा होता कि है न्याययिक जाँच आयोग - निमेष आयोग द्वारा  इन दोनों को निर्दोष बताने के बावजूद उसके नतीजे पर अमल क्यों नहीं किया गया और खालिद की तो हत्या ही करवा दी गई तथा तारिक को उम्रक़ैद की सज़ा दे दी गई ? बड़ी हैरानी - परेशानी की बात यह भी है कि आयोग के पुख्ता प्रमाणों के मौजूद रहते अदालत में यह मामला क्यों नहीं टिक पाया ? 
उत्तर प्रदेश की सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की ओर से यह वादा किया गया था कि सत्ता में आते ही बेकसूरों को जेलों से रिहा कर दिया जाएगा , सूबे की अखिलेश सरकार ने इस दिशा में किया कुछ नहीं ! इसके विपरीत वह निमेष आयोग की सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डालकर बैठी रही ? उसकी सिफारिशों को लागू नहीं किया गया ! इतना ही नहीं उसने अदालत को यह भी नहीं बताया कि जस्टिस आर डी निमेष ने अपनी जाँच व सिफारिशों में क्या कहा था ? 
इस मामले की अदालत के अभिज्ञान में यह बात भी आई थी कि डॉ . तारिक कासिमी के साथ बार - बार अमानवीय व्यवहार किया गया | तारिक ने जेल से लिखी चिट्ठी में कहा था कि उनके साथ सांप्रदायिक आधार पर उत्पीड़न किया गया, जिसमें एसटीएफ के लोगों द्वारा मुंह में पेशाब करना, दाढ़ी नोचना, सूअर का गोश्त खिलाना शामिल है ! यह शायद देश के अदालती इतिहास का पहला मामला होगा , जिसमें जज महोदय ने अपने पर पड़ रहे दबाव पर मौखिक टिप्पणी की हो |
डॉ . तारिक़  कासिमी के वकील रणधीर सिंह सुमन के मुताबिक़ ,  जज साहब ने कहा था कि ‘मजबूरी है नौकरी करनी है इसलिये दे रहा हूं फैसला’। इस बीच रिहाई मंच ने खालिद मुजाहिद की हिरासत में हुई हत्या के बाबत इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के सीबीआई जाँच के आदेश का स्वागत करते हुए इसे सपा सरकार के मुंह पर करारा तमाचा बताया है | रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने बताया कि खालिद मुजाहिद की हत्या की सीबीआई जांच का वादा करने के बाद भी अखिलेश यादव सरकार ने जांच नहीं करवाई | इस मामले में खालिद मुजाहिद के हत्यारोपी पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह, पूर्व एडीजी बृजलाल, मनोज कुमार झा समेत 42 पुलिस व आईबी अधिकारियों को बचाने की कोशिश भी सपा सरकार ने की थी | जनाब शुऐब ने बताया कि सपा सरकार में अंधेरगर्दी का आलम यह है कि बाराबंकी में खालिद मुजाहिद की हत्या के मुकदमे में विवेचनाधिकारी ने ज्ञात अभियुक्तों को अज्ञात करके फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी | ऐसे में हाईकोर्ट के आदेश से प्रदेश सरकार की इंसाफ विरोधी कोशिशों पर अंकुश लगेगा | खालिद मुजाहिद के चाचा जहीर आलम फलाही ने कहा कि हाईकोर्ट लखनऊ बेंच के जस्टिस अजय लांबा और जस्टिस अख्तर हुसैन ने यह कहते हुए सीबीआई जांच का आदेश दिया कि ‘6 जुलाई 2015 को अंतरिम रिपोर्ट पेश की जाए |' उन्होंने कहा कि इस फैसले से यह उम्मीद बंधी है कि खालिद मुजाहिद के साथ इंसाफ होगा |
पिछले दिनों यह आशंका प्रकट की गई थी कि खालिद मुजाहिद के बाद तारिक कासिमी को भी मारने की साजिश रची जा रही है ? रिहाई मंच ने यह आशंका प्रकट की थी कि लखनऊ जेल में तारिक को मौत के घाट उतारने की सजिश के पीछे खुफिया विभाग, पुलिस और सरकार का गठजोड़ सक्रिय है | मंच ने जेल अधीक्षक को तत्काल बर्खास्त करने की मांग की थी |
   यह सच है कि अखिलेश सरकार चाहती तो निमेष आयोग की रिपोर्ट का हवाला देकर तारिक और खालिद को रिपोर्ट के आने फ़ौरन बाद रिहा कर सकती थी ,लेकिन उसने ऐसा न करके रिपोर्ट को ही दबा दिया | ' निमेष जाँच आयोग  ने  साफ़ किया था कि इन दोनों आरोपियों की गिरफ़्तारी फर्ज़ी है | इनके सिलसिले के घटनाक्रमों में बहुत सारे विरोधाभास सामने आ चुके हैं , जो पुलिस बल की ग़ैरज़िम्मेदाराना कार्यशैली की कहानी बयान करते हैं | पुलिस प्रताड़ना से खालिद की 18 मई 2013 को मृत्यु हो चुकी है | यह भी कहना उचित होगा कि उत्तर प्रदेश की सपा सरकार की कार्यशैली भी विगत अन्य सरकारों से भिन्न नहीं है | 
अखिलेश यादव सरकार से यह भी आशा की गयी थी कि सांप्रदायिक ताक़तों को काबू में रखेगी , जिसके नतीजे में प्रदेश में शांति और अम्नोअमान की फ़ज़ा बनेगी , लेकिन हुआ इसके बिलकुल उल्टा |इस सरकार के तीन साल से अधिक के अब तक के कार्यकाल में छोटे - बड़े सैकड़ों दंगे हुए | इन दंगों के सर्वाधिक शिकार मुसलमान ही हुए |  मतलब यह कि सपा सरकार मुसलमानों के हितार्थ कोई भी पोज़िटिव क़दम उठाने में नाकाम रही है |.निमेष जाँच आयोग पुलिस और सरकारों की पक्षपाती भूमिका को उजागर करने में सक्षम है | यह दोनों को कटघरे में खड़ा करती है |आरोपियों के  मोबाइल नंबरों की जांच में लापरवाहियों और दोनों आरोपियों के अपहरण की सूचना परिजनों और स्थानीय नेताओं द्वारा दर्ज कराये जाने के बावजूद जांच का न होना भी आंतकवाद आरोपियों को फंसाये जाने की ओर इशारा करता है | अब भी समय है , प्रदेश सरकार निमेष आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करके तारिक कासिमी की रिहाई करवा सकती है | उसे ऐसा करना भी चाहिए , ताकि एक बेक़सूर को इन्साफ़ मिल सके और सपा सरकार की साख भी कुछ बहाल हो सके |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

May 8, 2015

अंधाधुंध करारोपण बंद करे मोदी सरकार

अंधाधुंध करारोपण बंद करे मोदी सरकार 
मोदी सरकार द्वारा अंधाधुंध करारोपण का सिलसिला जारी है | अब कुछ क्षेत्रों में अब सब्सीडी को कर योग्य बना दिया गया है और आय कर का दायरा बढ़ा दिया गया है | पिछले हफ्ते लोकसभा में पारित वित्त विधेयक, 2015 में आयकर कानून के तहत आय का दायरा बढ़ाने का प्रस्ताव है विधेयक में संशोधन कर इसके लिए एक अलग उपबंध शामिल किया गया है, जिसके अनुसार केंद्र, राज्य सरकार या किसी अथॉरिटी की ओर से दी जाने वाली सब्सीडी , अनुदान, नकद प्रोत्साहन और री-इम्बर्समेंट आदि को आय में जोड़ा जाएगा। गौरतलब है कि ग्राहकों को साल में 12 रसोई गैस सिलिंडर खरीदने के लिए लगभग 200 रुपये प्रति सिलिंडर की सब्सिडी मिलती है। यह सब्सीडी बाजार मूल्य और 414 रुपये के सब्सीडीयुक्त एलपीजी सिलिंडर के दाम में अंतर के बराबर होती है। गनीमत है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस बार इस सब्सीडी को करमुक्त कर दिया है , जबकि चुनिंदा क्षेत्रों में इस पर कर देना होगा | मोदी सरकार का यह भी प्लान है कि कृषि सब्सीडी को लाभार्थी को सीधे नक़द दे दिया जाये। एल पी जी गैस पर इसे लागू भी किया जा चुका है | इस बाबत सरकार ने अजीबोगरीब हरकत की है | वह उपभोक्ता से सिलेंडर के दाम पहले वसूल कर लेती है , फिर कुछ रूपये उसके बैंक खाते में वापस कर देती है | ज़ाहिर है , यह ग़ैर ज़रूरी क़वायद है , जिसका औचित्य शायद ही किसी की समझ में आए | यह सब्सीडी भी वैसी ही होनी चाहिए , जैसी सरकार द्वारा पेट्रोल , डीजल, यूरिया, खाद्यान्न आदि पर दी जा रही है। आम आदमी समझता है कि उसे राहत मिल रही है , परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं होता है। यह एक तिकड़म है , जिसके सहारे पूंजीपतियों को और मालामाल किया जाता है | होता यह है कि सब्सीडी में दी गई रकम को वसूल करने के लिये सरकार जनता पर टैक्स लगाती है। इसका भार आख़िरकार आमजन पर ही पड़ता है। अंतर मात्र इतना होता है कि यह भार टैक्स अदा करने वाले पर पड़ता है , जबकि सब्सीडी हासिल करने वाले को राहत मिलती है। यह मामला जनता के एक वर्ग से रकम को वसूलकर दूसरे वर्ग को देने का है। बहुतेरे अध्ययन यही बताते हैं कि इस सब्सीडी का बड़ा हिस्सा देश के संभ्रांत वर्ग को पहुंचता है। मिसाल के तौर पर यूरिया की वास्तविक उत्पादन लागत 9 रुपये प्रति किलो है और कम्पनी 2 रुपये की सब्सीडी पाने की हकदार है। परन्तु कम्पनी खातों में हेरा-फेरी करके उत्पादन लागत 10 रुपये की बताती है और सरकार से 3 रुपये की सब्सीडी हथिया लेती है। 
दूसरी समस्या यह है कि सब्सीडी की अधिकाधिक रकम कृषि कम्पनियों एवं बड़े किसानों द्वारा हड़प लेने की है। इंडियन इंस्टीट्यूट, अहमदाबाद द्वारा किये गये एक अध्ययन में पाया गया कि बड़े किसानों के पास 18 प्रतिशत कृषि भूमि है , परन्तु वे 48 प्रतिशत खाद की खपत करते हैं। यानि जो सब्सीडी छोटे किसान के लिये दी जा रही है, उसका मुख्य लाभ बड़े किसान उठा रहे हैं। खाद्य सब्सीडी का वितरण बीपीएल कार्ड के आधार पर किया जाता है। परन्तु इंडियन स्टेटिस्टिकल इंस्टीट्यूट द्वारा किये गये एक अध्ययन में पाया गया कि लगभग 52 प्रतिशत खेत मजदूर एवं 60 प्रतिशत अनुसूचित जातियों को बीपीएल कार्ड नहीं मिले थे। इसी प्रकार की समस्यायें रसोई गैस, कैरोसीन और डीजल पर दी जा रही सब्सीडी में पाई गयी है। सब्सीडी के नक़द वितरण के विरोध में कई तर्क दिये जा रहे हैं। पहला तर्क है कि नक़द सब्सीडी को लाभार्थी तक पहुंचाना उतना ही कठिन होगा जितना कि फर्टिलाइजर या खाद्यान्न सब्सीडी को पहुंचाना। रोजगार गारंटी कार्यक्रम के अन्तर्गत लाभार्थी को पेमेन्ट कई राज्यों में उनके बैंक के खातों के माध्यम ये किया जा रहा है। फिर भी झूठे नाम से खोले गये खातों से रकम का रिसाव हो रहा है। यहाँ फ़र्जी भुगतान आम बात है | मनरेगा - भ्रष्टाचार की जाँच में सैकड़ों ऐसे खातों में भुगतान कराए जाने का पर्दाफ़ाश हुआ है , जिनके धारकों ने कभी काम ही नहीं किये | फिर भ्रष्टाचारियों ने रक़म आपस में बाँट ली | सब्सीडी पर टैक्स से भ्रष्टाचार को और बढ़ावा मिलेगा | हर व्यक्ति फ़ालतू चीज़ों में नहीं पड़ना चाहता | वह सुगम - सरल जीवन चाहता है , जिसे वर्तमान सरकार भूल चुकी है | लगता है , सरकार अब बनियागीरी का काम शुरू कर चुकी है और जनता को करदोहन का यंत्र बना दिया गया है | बस हर जगह कर ही कर ! अब तो  प्रॉविडेंट फंड [ भविष्य निधि ] को भी नहीं बख्शा जा रहा है ! नये फ़रमान के मुताबिक़ ,  अब प्रॉविडेंट फंड में निवेश करने वाले वैसे लोग, जिनके पास पैन कार्ड नहीं हैं, उन्हें कर की भारी मार झेलनी पड़ेगी। 5 साल से पहले पीएफ का पैसा निकालने वालों को 10.3 फीसदी से लेकर 30.9 फीसदी तक का कर देना पड़ेगा। इस बारे में ज्यादा जानकारी देते हुए धीरज अग्रवाल ने बताया कि अब पीएफ से पैसे निकालना महंगा हो जाएगा। अब 30,000 से ज्यादा की रकम निकासी पर कर लगेगा। इसके साथ ही 5 साल से पहले पीएफ से पैसे निकालने पर टैक्स लगेगा और एंप्लॉयर 10.3 फीसदी टीडीएस काटकर पीएफ का पैसा देंगे। पैन नहीं होने पर निकाली गई रकम पर 30.9 फीसद टैक्स चुकाना होगा। अब तक टैक्स स्लैब के मुताबिक टीडीएस काटकर पैसा मिलता था। धीरज अग्रवाल ने बताया कि इस नए नियम से ईपीएफओ के 90 फीसद सदस्यों को नुकसान हो सकता है, क्योंकि ईपीएफओ के 90 फीसद सदस्यों के पास पैन नहीं है। जानकारों के मुताबिक 30,000 रुपये की सीमा बेहद कम है। बड़ी तादाद में ईपीएफओ सदस्य इनकम टैक्स की सीमा से बाहर हैं। उनको टैक्स रिफंड के लिए आयकर विभाग का दरवाज़ा खटखटाना पड़ेगा | इन प्रावधानों से जनता की मुश्किलें बढ़ेंगी |

May 7, 2015

किसान हितों पर गौर

किसान हितों पर गौर 
यह वही दशक था , जब देश में आर्थिक उदारीकरण की हवा डॉ . मनमोहन सिंह द्वारा बहाई गई थी | कुछ जानकार इसके नतीजों के प्रति आशंकित थे और वे इसका अपने - अपने स्तर से विरोध कर रहे थे | मगर कहते हैं कि सत्तामद के शिकार लोग हक़ीक़त भूल जाते हैं और जो उनके दिल में आता है , बिना विचारे सब कर गुजरते हैं ! यह वही दशक था , जब देश में ज्ञातव्य तौर पर किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला शुरू हुआ | 1990 के बाद प्रति वर्ष लगभग दस हज़ार किसानों की आत्महत्याओं का आंकड़ा सामने आया , जो आज बढ़ते - बढ़ते हर दिन औसतन 46 किसानों की आत्महत्याओं में तब्दील हो चुका है ! 
हर दिन क़रीब 46 परिवारों पर मुसीबत का पहाड़, पिछला क़र्ज़ कैसे चुकेगा, पेट कैसे पलेगा, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई कैसे होगी, खेती कौन सम्भालेगा, लड़कियों की शादी कैसे होगी? यह भयावह मानवीय त्रासदी हमारे देश और समाज की सच्चाई है | एक आंकड़े के अनुसार , 1997 से 2006 तक 166304 किसानों ने आत्महत्याएं कीं | आज हालात इतने संजीदा हैं कि देशभर में असमय बारिश और ओलों से खेतों में लगे खराब फसल के अंबार से हताश किसानों की आत्महत्या का सिलसिला थमता नजर नही आ रहा है। 
महाराष्ट्र सरकार की ओर से हाल ही जारी आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से मार्च 2015  तक प्रदेश में 601 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यानी महाराष्ट्र में हर रोज करीब 8 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, साल 2014 में महाराष्ट्र में करीब 1900 किसानों ने आत्महत्या की थी । इस हिसाब से पिछले साल की तुलना में इस बार आत्महत्या का आंकड़ा करीब 30 फीसदी तक बढ़ गया है। ये हालात ऐसे दौर के हैं, जब महाराष्ट्र की भाजपा सरकार लगातार किसानों के मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान देने की बात कर रही है।
 महाराष्ट्र के विदर्भ में आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस भी विदर्भ इलाके से है। जनवरी से लेकर मार्च तक विदर्भ में 310 किसानों ने आत्महत्या की थी। विदर्भ जनांदोलन कमेटी के किशोर तिवारी ने बताया कि 1900 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से दिए जाते हैं, साथ ही बैंक सरकार के निर्देशों को नजरअंदाज करते हुए लगातार किसानों से पैसे मांगते रहते हैं। उत्तर प्रदेश के आंकड़े भी बड़े भयावह हैं | उत्तर प्रदेश में महज़ 40 दिनों में 42 किसानों ने आत्महत्या कर ली | वहां के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव फ़रमाते हैं कि किसी किसान ने फ़सल ख़राब होने की वजह से अपनी जान नहीं दी है |
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह भी किसानों की आत्महत्या की वारदात को ख़राब फ़सल से हुए नुक़सान से जोड़ने से साफ़ इन्कार करते हैं | उन्होंने कहा कि किसान कभी भी फ़सल ख़राब होने से आत्महत्या नहीं करते | वे इतने कमज़ोर नहीं होते कि आर्थिक नुक़सान न झेल पाएं और अपनी जान दे दें | श्री सिंह किसानों की ख़ुदकुशी को मीडिया का प्रचार क़रार देते हैं | उन्होंने कहा, “किसी किसान की मौत प्राकृतिक कारणों से भी हुई तो मीडिया ने उसे आत्महत्या बता दिया | यह पूरी तरह ग़लत है |”   
यह एक खुली हकीक़त है कि देश की जनसंख्या के साठ फ़ीसद से अधिक जनसंख्या वाले किसानों की समस्याओं पर कभी कोई गम्भीर सोच-विचार नहीं हुआ | भूमि अध्यादेश पर तर्क - कुतर्क सिर्फ राजनीतिक नफ़ा - नुक़सान तक सीमित है ! कोई न तो भूमि अध्यादेश की खामियां खुलकर बता पा रहा है और न ही किसानों के दुःख - दर्द का सही चित्रण कर पा रहा है | उलटे बेशर्मी की हद यह है कि उत्तर प्रदेश , छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने इन आँकड़ों को छिपाना शुरू कर दिया और ‘शून्य आत्महत्याएँ’ घोषित करना शुरू कर दिया. कहा जाने लगा कि आत्महत्याएँ खेती की वजह से नहीं, बल्कि नशे की लत, पारिवारिक झगड़े, बीमारी की परेशानी, लड़की की शादी या ऐसे ही किसी कारण से लिये गये क़र्ज़ को न चुका पाने के कारण हो रही हैं ! इस मामले में उत्तर प्रदेश में तो खुले झूठ का बाज़ार गर्म है , जहाँ आधिकारिक रूप से फ़सल बर्बादी की वजह से पिछले दिनों 99 किसानों द्वारा आत्महत्या की बात आई , वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ मंत्री शिवपाल यादव कहते हैं कि प्रदेश ने फसल बर्बादी से एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की | 
ज़ाहिर है , वस्तुस्थिति यह नहीं है | आर्थिक उदारीकरण ने किसानों को निगला है | इसी वजह से खेती लगातार किसान के लिए घाटे का सौदा साबित होती जा रही है और उसकी लागत लगातार बढ़ती जा रही है, जिसे बर्दाश्त करना नामुमकिन है | 
पूंजीवाद इस कदर हावी है कि किसानों को उत्पादित फ़सल का मुनासिब दाम नहीं मिलता |  सरकारी आँकड़े बताते हैं कि गेहूँ की फ़सल पर औसतन एक हेक्टेयर में क़रीब 14 हज़ार, सरसों की फ़सल पर क़रीब 15 हज़ार, चने की फ़सल पर महज़ साढ़े सात हज़ार रुपये और धान पर सिर्फ़ साढ़े चार हज़ार रुपये प्रति हेक्टेयर ही किसान को बच पाते हैं | लेकिन अगर फसल खराब हो गई तो वह भी नहीं | 
अगर खेती खुद नहीं की , साझेदारी या बटाई के माध्यम से करवाई तो कुछ ही मिल पाता है | हमारी कृषि नीति इतनी ख़ामियों वाली है कि किसानों को कोई उल्लेखनीय सरकारी लाभ नहीं मिल पाता | ऐसे में बहुत आवश्यक है कि अब किसान हितों पर भी ध्यान दिया जाए , रस्मन नहीं अमलन उन कारकों को तलाश करके उनका हल भी तलाश करना होगा , जो किसानों को आत्महत्या की ओर ले जाते हैं |