Jun 30, 2015

ग्रीस से सबक़

ग्रीस से सबक़ 
- डॉ . मुहम्मद अहमद 
ग्रीस संकट काफ़ी इतना गंभीर बन चुका है कि अब तात्कालिक मदद से उसका काम नहीं चलनेवाला | हालत यह है कि विश्व की असंतोषजनक अर्थव्यवस्था के मद्देनजर अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक संस्थाएं थकी - हारी लगती हैं | एक तरह से सबने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं , जिनमें यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ईसीबी) भी शामिल है | इस बैंक से मदद की बड़ी अपेक्षाएं थीं , मगर अब यह भी फूंक - फूंककर क़दम रख रहा है | ग्रीस की अंदरूनी माली हालत इतनी खराब है कि वहां के प्रधानमंत्री एलिक्सिस त्सिप्रास ने पिछले 29 जून को सभी बैंकों को बंद रखने के साथ हफ्ते भर तक बैंकों का कामकाज ठप रखा | 
इसके साथ ही एटीमएम मशीनों से पैसा निकालने निकालने पर भी पाबंदियां लगा दी गईं हैं | खाता धारकों को दिन में 60 यूरो से ज़्यादा निकालने की अनुमति नहीं होगी | लोग बिना पूर्व अनुमति के अपने पैसे को देश के बाहर भी नहीं भेज सकेंगे | ईसीबी ने ग्रीस की बैंकिंग प्रणाली के लिए और आपात सहायता नहीं देने का फ़ैसला करके उसकी आख़िरी उम्मीद पर भी पानी फेर दिया है | अब वह देनदारी को चुकता नहीं कर पाएगा और इस तरह वह दिवालिया हो जाएगा |
ग्रीस और यूरोज़ोन के बीच बातचीत पहले ही विगत 26 जून को विफल हो चुकी है | ग्रीस के प्रधानमन्त्री एलिक्सिस त्सिप्रास के पास कम ही रास्ते बचे थे | ईसीबी की घोषणा के बाद सहज रूप से ग्रीस के बैंक प्रभावित हुए हैं | ये पहले से ही केंद्रीय बैंक के ऊपर निर्भर थे | पिछले कुछ दशकों में अर्जेन्टीना , ब्राजील और अमेरिका के बाद ग्रीस के संकट ने सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपनी जद में ले रखा है | अतः ग्रीस के लोगों की यह आशंका बढ़ गई है कि उन्हें उनके ही पैसे निकालने से रोक दिया जाएगा या फिर उनके उनकी यूरो मुद्रा को ग्रीक की करंसी ड्राक्मा में तब्दील दिया जाएगा , जिसकी कोई कीमत नहीं होगी | एक संकट यह भी है कि ग्रीस में जनमत संग्रह के परिणाम आने तक यूरोप के देश राज़ी नहीं हैं | 
उधर भारतीय रिज़र्व बैक [ आरबीआई ] के गवर्नर रघुराम राजन ने यह कहकर सारी दुनिया को चौंका दिया है कि महामंदी आनेवाली है और हम वैश्विक मंदी की तरफ बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमे केंद्रीय बैंकों द्वारा वैश्विक नियम बनाने के लिए जोर देना चाहिए। उनके अनुसार , जिस तरह की आर्थिक महामंदी का सामना 1930 में करना पड़ा था, फिर दुनिया को उसी तरह के संकट का सामना करना पड़ सकता है , हालाँकि बाद में रिज़र्व बैंक ने कुछ सफ़ाई दी और कहा है कि गवर्नर महोदय के कहने का वह मन्तव्य नहीं था , जो समझा गया | फिर भी रिज़र्व बैंक की सफ़ाई को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष  [ आई एम एफ ] की आपत्ति का नतीजा माना जा रहा है और राजन की बात अपनी जगह मौजूद है | 
पिछले दिनों उन्होंने लंदन में आयोजित बिजनस स्कूल कॉन्फ्रेंस में कहा था कि 'हमें बेहतर हल के लिए नियम को बदलने होंगे। मेरा मानना है कि सेंट्रल बैंक की कार्रवाई में किन बातों की अनुमति दी जानी चाहिए, इसके लिए वैश्विक नियम बनाने पर चर्चा शुरू किए जाने का समय आ गया है।' राजन से जब ब्याज कटौती को लोकर जब सवाल किया तो उन्होंने कहा, 'जहां तक संभव था मैंने रेट कटौती में कड़ा रुख अपनाया । भारत में अभी भी निवेश को बढ़ाने की जरुरत है। मैं इसके लिए प्रयत्नशील हूं। ' बाद में रिजर्व बैंक ने स्पष्टीकरण में कहा है कि एक हलके ने गवर्नर रघुराम राजन की टिप्पणियों को गलत रूप दे दिया और इसे इस तरह प्रस्तुत किया कि राजन ने कहा कि दुनिया के सामने महामंदी का जोखिम है।
 राजन के बयान पर दुनिया भर में खलबली मचने पर अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के अनुसंधान पत्र में राजन के इस दृष्टिकोण को चुनौती दी गयी है कि अकेले सस्ते कर्ज वाली मौद्रिक नीति ही दुनिया के लिए वित्तीय संकट का कारण बन सकती है। केवल मौद्रिक नीति आसान बनाने को ही वित्तीय अस्थिरता के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। 
बीते समय में विश्व के समक्ष मंत्री की बड़ी समस्याएं ‘वित्तीय प्रणाली की स्थिरता की हिफाजत के लिए प्रभावी नियामकीय व्यवस्था की कमी’ के कारण पैदा हुईं। 2007-09 का संकट भी इसी कारण हुआ। ग्रीस संकट यह साफ़ तौर पर बताता है कि दुनिया में सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा | ब्याज के बढ़ते बोझ ने अर्थव्यवस्थाओं को रसातल में जाने के लिए मजबूर कर रखा है | इस विकट परिस्थिति में राजन की आशंका की पुष्टि प्रथम दृष्टया ग्रीस के संकट से होती है | अतः समय रहते महामंदी की चपेट से बचने के लिए ठोस प्रयास किए जाने चाहिए |



Jun 25, 2015

शराब के जबड़े

शराब के जबड़े 

- डॉ . मुहम्मद अहमद 
नशा एक धीमा जहर है जिसमें दर्दनाक मौत के सिवा कुछ हासिल नहीं होता है,,, कितने ही परिवारो की जिंदगी इस जहर की शिकार होकर घर से बेघर हो गई है तथा न जाने कितनी जिंदगियां मौत के मुहं में समा चुकी हैं और ऩ जाने कितनी जिंदगियां अतिंम सांसे गिन रही हैं | शराब का नशा सबसे अधिक घातक है | इसीलिए हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने शराबबंदी की ओर भी ध्यान दिया और मद्य निषेध विभाग भी बनाया गया | आबकारी विभाग भी अस्तित्व में आया और आरंभिक कुछ समय के बाद यह धड़ल्ले से शराबबंदी का मखौल उड़ाने लगा | सरकारें शराब माफ़िया के आगे झुकती गईं और आबकारी विभाग निरंकुश ढंग से शराब की नई दूकानें खोलने का लाइसेंस बाँटने लगा |
 अब हालत यह है कि इस सूरतेहाल पर सरकार से कुछ ख़ास स्वेच्छिक क़दम की अपेक्षा नहीं की जा सकती , क्योंकि सरकार को नशे के कारोबार से करोडो- अरबों का मुनाफा होता है और शराब माफ़िया से राजनेताओं की निरंतर बंदरबांट चलती रहती है | जनस्वास्थ्य की किसी को चिंता नहीं है | योग से शराबबंदी होने से रहीं |
अतः इस जहर को रोकने के लिए जनता को ही पहल करनी होगी , कयोंकि यह एक बड़ी समस्या बनी हुई है | अगर जनता नशा मुक्ति के पक्ष में एक जुट हो जाए तो ये मौत की फैक्टरियां अपने आप बंद हो जायेंगी, और सरकार को मजबूर होकर उन पर बैन लगाना पड़ेगा | वास्तव में शराबनोशी ने भारतीयों की बड़ी संख्या का जीवन दुष्कर बना डाला है | 
कुछ समय पहले एक अंग्रेज़ी दैनिक में शराब के इस्तेमाल पर एक सर्वेक्षणात्मक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसमें बताया गया कि भारतीय समाज के विशेषकर अभिजात्य वर्ग के युवक और युवतियां शराब के प्रति तेज़ी से आकर्षित हो रहे हैं । यह वर्ग फैशन के तौर पर भी शराब का इस्तेमाल करता है । कहने का मतलब यह कि इस ज़हरीले पदार्थ का इस्तेमाल पढ़े-लिखे मूर्ख तो पहले से करते रहे हैं, यह दुर्व्यसन अपनी पीढ़ी की ओर भी स्थानांतरित कर रहे हैं । इसकी बुरी आदत और लत ने ख़ासकर कमज़ोर वर्ग के लोगों की आर्थिक स्थिति और स्वास्थ्य पर कल्पनातीत कुप्रभाव डाला है | 
यह भी सच है कि पुरातनकाल से ही कुछ लोगों की सामाजिक व्यवस्था और जीवनशैली में शराब का प्रवेश था , जिसे पूंजीपतियों ने अपनी धन बढ़ाऊ घिनौनी मानसिकता के फेर में हवा दी है | ये लोग अपने देवताओं और पितरों को संतुष्ट करने के लिए भी हर त्योहार पर , जन्म और विवाह के अवसरों पर शराब का इस्तेमाल अनिवार्य रूप से करते हैं | दैनिक दिनचर्या में भी इस्तेमाल करते हैं | फिर न तो शराब के उपयोग की मात्रा की कोई सीमा है और न ही उनके समाज के किसी सदस्य पर इसके सेवन पर रोक है ! हालत यह है कि शराब पीनेवालों का शरीर और मन - मस्तिष्क सभी अपाहिज हो चुके हैं ! नतीजा यह है कि अच्छे और बुरे की पहचान करने के योग्य नहीं रहे और न ही वे किसी मामले में सही निर्णय कर सकते हैं |  
क़ुरआन में शराब के लिए ‘‘ख़म्र’’ शब्द प्रयुक्त हुआ है, जिसकी व्याख्या हज़रत उमर [ रज़ि॰] ने इन शब्दों में की है, ‘‘ख़म्र उस चीज़ को कहते हैं जो बुद्धि पर परदा डाल दे ।’’ शराब मन-मस्तिष्क को सर्वाधिक प्रभावित करती है और बुद्धि को नष्ट कर डालती है । डॉ॰ ई॰ मैक्डोवेल कासग्रेव [ एम॰ डी .] केअनुसार,‘‘अल्कोहल मस्तिष्क को नष्ट कर देती है ।’’.
इस्लाम ने हर प्रकार की शराब ही को हराम नहीं किया है, बल्कि इसके  अन्तर्गत हर वह चीज़ आ जाती है जो नशावर हो और मनुष्य की सोचने-समझने की शक्ति को नष्ट करे या उसे क्षति पहुंचाए ।
इस अवसर पर इस बात को भी ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि मनुष्य का जिस चीज़ के कारण समस्त प्राणियों में विशिष्ट और प्रतिष्ठित एवं केन्द्रीय स्थान दिया गया है, वह वास्तव में उसकी सोचने-समझने और सत्य-असत्य और भले-बुरे में अन्तर करने की क्षमता है । अब यह स्वाभाविक बात है कि जिस चीज़ या काम से मनुष्य की इस क्षमता और योग्यता को आघात पहुंचा हो या उसके पूर्ण रूप से क्रियाशील होने में बाधा उत्पन्न होती हो, उसको मनुष्य का निकृष्टतम शत्रु समझा जाए । शराब चूंकि मस्तिष्क को स्वाभाविक रूप से कार्य करने में रुकावट डालती है और उसकी तर्कशक्ति को शिथिल करके मनुष्य को मानवता से ही वंचित कर देती है, इसलिए उसे मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु घोषित करना बिलकुल उचित ही है ।
क़ुरआन मजीद में शराब के विषय में जो कुछ कहा गया है उसका स्पष्टीकरण अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद [ सल्ल॰ ] के बहुत से कथनों से भी होता है । आपने कहा है , ‘प्रत्येक मादक चीज़ ‘ख़म्र’ है और प्रत्येक मादक चीज़ हराम है ।’ ‘वह हर पेय जो नशा पैदा करे, हराम है और मैं हर मादक चीज़ से वर्जित करता हूं ।’

Jun 24, 2015

विकास - संपन्नता के दावों की सच्चाई

विकास - संपन्नता के दावों की सच्चाई 
कहते हैं , हमारा देश तरक्की कर रहा है और संपन्नता की नित नई सीढियाँ चढ़ रहा है | लोगों का जीवन - स्तर ऊपर उठाने के लिए अनेक प्रकार की सरकारी योजनाएं चल रही हैं | प्रधानमंत्री की कई बीमा योजनाएं और जनधन योजना मौजूद है , लेकिन इनका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है | जिस देश में एक कटोरी दाल के लाले पड़े हों , भुखमरी और आत्महत्या जैसी स्थितियां बार - बार समाज की नियति बन जाती हों , उस देश में ' देश तरक्की कर रहा है ' और ' बुरे दिन बीते रे भैया ' जैसे जुमले आम जन पर फब्ती कसने से कम नहीं हैं | ' गरीबी हटाओ ' का नारा दशकों से सुनते आ रहे हैं , जिसके शब्द तो बदलते रहे , पर केन्द्रीय भाव एक ही रहता है | मगर आश्चर्य है , कभी गरीबी नहीं हटी , न ही कम हुई बल्कि गरीबी बढती ही जा रही है | इससे उलट अमीरी बढ़ी , नये - नये करोड़पति , अरबपति बने | हमारे देश की गरीबी बड़ी मर्मान्तक है | हाल की एक घटना देखिए , जो यह बताती है कि किसी की अंतिम इच्छा एक कटोरी दाल हो सकती है। कैसे कोई पूरी उम्र एक कटोरी दाल के लिए तरसता रह सकता है। ये कैसे हो सकता है कि एक आदमी जब मौत के निकट हो तो उसका परिवार दाल के लिए पड़ोसियों के घर दौड़ रहा हो। पूरी उम्र वह औरत एक कटोरी दाल के लिए तरसती रही। अरहर, मसूर, चना, मूंग या उड़द का विकल्प नहीं था उसके पास। जब उसने गरीबी से हारकर जहर खा लिया तो अपने अपाहिज पति से कहा अब तो जा रही हूं। आखिरी इच्छा है मेरी, जाते हुए दाल तो चखा दो। एक मरती हुई औरत अपनी उखड़ती हुई सांसों के साथ आखिरी ख़्वाहिश के तौर पर एक कटोरी दाल मांग रही थी। उत्तर प्रदेश के जिला गोंडा, तहसील तरबगंज के गांव अकौनी में ऋतु बस इस दुनिया को छोड़ने से पहले दाल का स्वाद चख लेना चाहती थी। अपनी पत्नी की इस इच्छा के सामने बहुत बेचारा था उसका पति। क्‍योंकि घर में दाल नहीं थी इसलिए पड़ोसी के आगे कटोरी फैलानी पड़ी। तब जाकर वह अपनी पत्नी के लिए एक कटोरी दाल का इन्तिज़ाम कर पाया | यह भी एक बिडंबना ही है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में दाल की कीमतें ही अधिक बढ़ी हैं |
खाद्य मंत्रालय की प्राइस मॉनिटरिंग सेल के पास मौजूद आंकड़ों के मुताबिक, 26 मई 2014 से 22 मई 2015 के बीच दिल्ली में उड़द दाल 71 रुपये प्रति किलो से बढ़ कर 109 प्रति किलो यानी 54% महंगी हो गई। यही हाल अरहर की कीमतों में भी दिखा। अरहर दाल पिछले साल 26 मई 2014 को 75 प्रति किलो थी, जो 22 मई 2015 को बढ़ कर 108 रूपये प्रति किलो हो गई, यानी 44% की बढ़ोत्तरी। चना दाल पिछले एक साल में 50 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 68 प्रति किलो यानी 36% महंगी हुई और मसूर दाल इस दौरान 70 प्रति किलो से 94 प्रति किलो यानी 35% महंगी हुई | अब दाल व्यापारियों की आशंका है कि आने वाले दिनों में दाल की क़ीमतें और बढ़ेंगी | अगर ऐसा हुआ और सरकार कारगर क़दम उठाने में नाकाम रही , तो आम जन का जीवन और दूभर हो जाएगा और एक कटोरी दाल के लिए उसे दूसरों के आगे बार - बार हाथ पसारने के लिए बाध्य होना पड़ेगा एवं ख़ाली पड़े जनधन खाते उसकी भूख नहीं मिटा पायेंगे | इन खातों में जो रक़म है , वह भी तो मध्य वर्ग की है ... गरीबों का कोई पुरसानेहाल नहीं है ! 
ताज़ा सरकारी  आंकड़ों के मुताबिक भारत में पांच साल तक की उम्र के 45 फीसदी बच्चे कुपोषित पाए गए हैं। इस उम्र के 48 फीसद बच्चों का विकास उनकी उम्र के हिसाब से बेहद कम पाया गया और 25 फीसद से भी अधिक बच्चों की स्थिति बेहद बुरी पाई गई। एक चिंतनीय बात जो इन आंकड़ों में सामने आई वह यह है कि इन कुपोषित और बेहद कमजोर हालत वाले बच्चों में ज्यादातर संख्या लड़कियों की है। परिवार में लड़कों को अच्छा पौष्टिक खाना देने वाले ज्यादातर परिवार लड़कियों को वही पौष्टिक खाना नहीं देते। मेडिसिन सेंस फ्रंटियर्स इंडिया नाम की संस्था के मेडिकल एक्टिविटी मैनेजर जिया उल हक़ ने बताया कि पांच महीने के एक स्वस्थ बच्चे का आदर्श वजन कम-से-कम 5 किलो होना चाहिए, लेकिन उनके पास ज्यादातर ऐसे बच्चे आते हैं जिनका वजन 2.5 साल की उम्र में भी महज 5 किलो होता है। उन्होंने बताया कि उनके पास आने वाले कुपोषित बच्चों में लड़कियों की तादाद सबसे ज्यादा होती है। संयुक्त राष्ट्र के एक आंकड़े के अनुसार , कुपोषण से मरने वाले बच्चों की सालाना तादाद 30 लाख है | कुपोषण के कारण इन बच्चों के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहद कम होती है। आंकड़े बताते हैं कि कुपोषण का स्तर लड़कों से कई गुना ज्यादा लड़कियों में पाया जाता है। एमएसएफ इंडिया द्वारा फरवरी 2009 से सितंबर 2011 के बीच कराए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि संस्था के दरभंगा केंद्र पर इलाज के लिए आए 8000 बच्चों में तकरीबन 62 फीसदी संख्या लड़कियों की थी। यह बात इस लिहाज से भी चौंकाने वाली है कि दरभंगा जिले की कुल आबादी में पांच साल के कम उम्र के बच्चों की कुल तादाद में लड़कियों की संख्या केवल 47 फीसदी ही है। ज़ाहिर है ,इस विषम और विकट स्थिति से उबरने की दिशा में हमें अभी बहुत कुछ करना है , जिसकी ओर सरकार को पर्याप्त ध्यान देना चाहिए | राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सतही प्रयास सदैव निरर्थक और असफल ही होंगे |

Jun 19, 2015

इसे मुहिम के तौर पर लें

इसे मुहिम के तौर पर लें 

मैगी को एक तरह से देश निकाला दे दिया गया है | नेस्ले का यह ज़हरीला उत्पाद हम भारतीयों ने पता नहीं कितने सालों से बड़े चाव से खाया | फ़िल्मी सितारों ने इसकी रगबत दिलाई और दो मिनट में शरीर को पौष्टिकता से भर देने का वादा किया | कहते हैं और गोयबल्स जैसे शातिरों का यह मानना भी है कि झूठ को बार - बार कहने पर सच बन जाता है | मगर यह अकाट्य सत्य है कि सत्य अधिक समय तक छिपा नहीं रह सकता | आखिरकार मैगी का सच सामने आया |  सालों तक यह उत्पाद हमारे सेहत के साथ खिलवाड़ करता रहा ! 
 अब इसी के अन्य उत्पाद सेरेलैक में भी गड़बड़ी की खबर है | कोयंबटूर में इसमें कीड़े पाए गए हैं , जबकि पैकिंग की तारीख पुरानी नहीं है | इतना ही नहीं मदर डेयरी के दूध में डिटर्जेंट मिलने का पता चला है ! वैसे दूध में मिलावट की बात पुरानी पड़ गई है , मगर सरकार कोई कार्रवाई न कर केवल खानापूरी करती रहती है | पकड़े जाने पर अब मदर डेयरी सफ़ाई पर उतर आई है | 
मदर डेयरी के एक अधिकारी ने कहा है कि उत्तर प्रदेश फूड ऐंड ड्रग ऐडमिनिस्ट्रेशन द्वारा मदर डेयरी के मिल्क सैंपल में डिटर्जेंट पाए जाने की बात सच नहीं है | अधिकारी ने कहा कि कंपनी दूध की सख्त जांच करती है और खराब दूध मदर डेयरी का है ही नहीं। आगरा के फूड सेफ्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FSDA) प्रमुख राम नरेश यादव ने कहा कि आगरा से 70 किलोमीटर दूर बाह तहसील में मदर डेयरी के कलेक्शन सेंटर से नवंबर 2014 में दूध के दो नमूने लिए गए थे। यादव ने कहा कि नमूने लखनऊ लैब में भेजे गए, जिसने कहा कि दोनों ही नमूने मानकों पर खरे नहीं हैं। कंपनी ने इस परिणाम को चुनौती देते हुए नमूनों को कोलकाता की लैब में भेजने की मांग की। इसके बाद वहां भी इनमें खराबी पाई गई। कोलकाता की लैब ने कहा कि एक नमूने में डिटर्जेंट मिला हुआ है। फिर भी मदर डेयरी के अधिकारी ने हालांकि कहा है कि पाउच में बेचा जा रहा दूध खराब नहीं है। 
जहाँ तक कोल्ड ड्रिंक्स की बात है , तो इनके दुष्प्रभावों पर पहले भी चर्चा होती रही है , मगर कभी इसे संजीदगी से नहीं लिया गया | अब एक बार फिर मैगी - चर्चा के बहाने यह बात सामने आ रही हैं कि कोका-कोला और पेप्सी में इस्तेमाल होने वाले तत्व की वजह से कैंसर तक हो सकता है। अतः इन पर पाबंदी लगाई जाए | 
कुछ हलक़ों से इसकी मांग भी उठी है | ब्रिटिश अख़बार ' डेली मेल ' के मुताबिक, शोधकर्ताओं  का मानना है कि कोल्ड ड्रिंक्स में भूरा रंग लाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कलर एजेंट की वजह से हजारों लोगों को कैंसर हो सकता है। वॉशिंगटन डीसी के सेंटर फॉर साइंस इन द पब्लिक इंटरेस्ट (सीएसपीआई) ने कहा, 'कोका-कोला, पेप्सी और बाकी चीजों में इस्तेमाल किए जाने वाले दो रसायन कैंसर पैदा कर सकते हैं और इन्हें प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।' 'कोल्ड ड्रिंक्स और बाकी चीजों में भूरा रंग लाने के लिए चीनी को अमोनिया और सल्फाइट के साथ उच्च दबाव और तापमान पर मिलाया जाता है। इस केमिकल रिऐक्शन में दो तत्व 2-एमआई और 4-एमआई बनते हैं। सरकारी स्टडी यह बात पता चली है कि ये तत्व चूहों के फेफड़े, लीवर और थायरॉइड कैंसर का कारण बने हैं।
सीएसपीआई के मुताबिक जांच किए गए कोल्ड ड्रिंक्स में जितना 4 एमआई पाया गया है, वह अमेरिका में हजारों लोगों में कैंसर फैला सकता है। सीएसपीआई की बात पर कोका-कोला और पेप्सी ने कुछ भी नहीं कहा है। स्वीडेन की लुंड यूनीवर्सिटी के शोधकर्ताओं का दावा है कि कोल्ड ड्रिंक्स पीने से प्रोस्टेट कैंसर का खतरा काफ़ी बढ़ जाता है |
मियामी मिलर स्कूल आफ मेडिसिन यूनीवर्सिटी और कोलंबिया यूनीवर्सिटी मेडिकल सेंटर के नेतत्व में एक अंतरराष्ट्रीय दल ने कहा कि उनके शोध के निष्कर्षों ने इस भावना को खारिज किया है कि ये डायट ड्रिंक्स स्वास्थ्यकर होती हैं और इनके सेवन से पतले होने में मदद मिलती है। इस अध्ययन में डायट और सामान्य दोनों तरह के शीतल पेय के सेवन और दिल के दौरे तथा नाड़ी संबंधी रोगों के खतरे को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने एक खास समूह पर अध्यययन किया। निष्कर्षों में पाया गया कि जो लोग प्रतिदिन डायट ड्रिंक्स पीते हैं उनमें दिल के दौरे या नाड़ी संबंधी रोग होने की आशंका 43 प्रतिशत ज्यादा होती है। एक महीने में एक बार से सप्ताह में छह बार हल्की डायट ड्रिंक्स पीने वालों और सामान्य शीतल पेय लेने वालों में इस तरह के रोगों के खतरे की संभावना बहुत कम होती है। इस दल का नेतृत्व करने वाले हाना गार्डनर ने कहा कि हमारे नतीजों में संकेत मिले हैं कि प्रतिदिन डायट शीतल पेय के सेवन और नाड़ी संबंधी रोगों के बीच गहरा संबंध है।
अमेरिका के नैशनल टॉक्सिकोलॉजी प्रोग्राम ने कहा है कि इस बात के साफ सबूत हैं कि 2-एमआई और 4-एमआई, दोनों जानवरों में कैंसर पैदा करने वाले तत्व हैं इसलिए आदमियों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। सीएसपीआई के एग्जेक्युटिव डायरेक्टर माइकल जैकबसन ने अमेरिका के फूड रेग्लेयूटर के पास इस बारे में कार्रवाई करने के लिए एक याचिका दाखिल की है। उनका कहना है, ' कैंसर पैदा करने वाले तत्वों को खाने में कोई जगह नहीं मिलनी चाहिए, खासतौर पर तब जब उनका इस्तेमाल केवल रंग के लिए किया जाता हो। सीएसपीआई की बात का पांच बड़े कैंसर एक्सपर्ट समर्थन करते हैं। कोल्ड ड्रिंक्स में इस्तेमाल किया जाने वाला तत्व कैरेमल 4 या अमोनिया सल्फाइट से प्रोसेस कैरेमल के नाम से जाना जाता है। सल्फाइट के बिना केवल अमोनिया के साथ बनाया जाने वाला कैरेमल 3 बियर, सोया सॉस और खाने की कई चीजों में इस्तेमाल किया जाता है। शीतल पेय न सिर्फ आपके भोजन में मौजूद कैल्शियम को बर्बाद करते हैं, बल्कि आपके शरीर में पहले से मौजूद कैल्शियम को भी सोख लेते हैं। कैल्शियम के सप्लीमेंट लेने से ही इस नुकसान की भरपाई हो सकती है।
हमारे देश में एक लंबे अरसे से खाने - पीने की चीज़ों में मिलावट का धंधा खूब फल - फूल रहा है | यहाँ मिलावट विरोधी कानून भी मौजूद हैं , लेकिन भ्रष्ट अधिकारी घूस लेकर मिलावटियों को बेखौफ़ छोड़ते रहे है और वे और मिलावट करते रहे | आज भी यही गंभीर स्थिति है | खाद्यान्न से लेकर सब्ज़ियों तक में ज़हरीले कलर आदि की मिलावट है | रासायनिक खाद सेहत को पहले से ही चौपट कर रहे हैं | अतः आवश्यकता इस बात है कि मिलावट को दूर करने के लिए दीर्घकालिक अभियान चलाया जाए | वक्ती हल्ले - गुल्ले से बात नहीं बनने वाली !

Jun 17, 2015

भुखमरी और कुपोषण से कब मिलेगी नजात ?

भुखमरी और कुपोषण से कब मिलेगी नजात ?

एक तरफ़ तो देश में खाद्य सुरक्षा क़ानून लागू है , जिसके तहत भुखमरी , कुपोषण और खाद्य असुरक्षा के लिए सरकार को ज़िम्मेदार माना गया है | मगर लगता हमारे यहाँ यह क़ानून भी सुविधावादी है , लेकिन इसमें बड़ा अंतर यह है कि इसे इच्छानुसार अपनाया जाता है , वह भी कागज़ों पर ! दुनिया में इस समय भूखे लोगों की संख्या लगभग 7,950 लाख है, जिनमें से एक चौथाई भारत में रहते हैं। यह संख्या चीन में कुपोषितों की संख्या से भी ज्यादा है। ये आंकड़े हैं फूड एंड ऐग्रिकल्चरल ऑर्गनाइजेशन (FAO) की रिपोर्ट के, जो पिछले दिनों प्रकाशित हुई है। यह स्थिति तब है , जब वैश्विक भुखमरी सूचकांक (जीएचआई) में 2014 में भारत की स्थिति सुधरी है और यह 55वें स्थान पर आ गया है। रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में 1,946 लाख लोग कुपोषण के शिकार हैं, जो भारत की कुल जनसंख्या के 15.2 फीसदी है। 1990-1992 में भारत में कुपोषितों की तादाद लगभग 2,101 लाख थी। चीन में कुपोषितों की संख्या 1,338 लाख है, जो 2014-16 की चीन की कुल जनसंख्या के 9.3 फीसदी हैं। 1990-92 में चीन में कुपोषितों की संख्या 2,890 लाख थी। भारत 1990-92 से 2014-16 के बीच अपने यहां कुपोषितों की संख्या में 36 फीसदी की कमी लाने में कामयाब रहा। वहीं, चीन ने इतने ही समय में कुपोषितों की तादाद 60.9 फीसदी तक कम कर ली है। रिपोर्ट के मुताबिक, 'भारत में जारी हुए खाद्य वितरण कार्यक्रम के सकारात्मक परिणाम मिले, हालांकि, भारत उच्च आर्थिक विकास दर को उच्च खाद्य खपत में बदलने में नाकाम रहा। अतः समग्र विकास से भूखों को कोई फायदा नहीं हुआ।' हमारे देश का यह खुला सच है कि हमारे यहाँ हर साल लाखों टन अनाज सिर्फ भंडारण के उचित प्रबंध के अभाव में बर्बाद हो जाता है | खाद्य सुरक्षा क़ानून में सस्ते रेट पर चावल , गेहूं और मोटे अनाजों को उपलब्ध कराने की व्यवस्था है | इसके बावजूद भूखे लोगों की तादाद घट नहीं पा रही है ! कितनी बड़ी विडंबना है कि सरकार अनाज को तो सड़ने देती है , दूसरी ओर यह कहती है कि अनाज की कमी है , लिहाज़ा वह गरीब जनता को मुफ़्त में अनाज नहीं उपलब्ध करा सकती | भूखे लोगों तक मुफ़्त अनाज आपूर्ति के सुप्रीमकोर्ट की हिदायत पर बार - बार सरकार यही बात कहकर पल्ला झाड़ लेती है | सरकार जो अनाज आयात करती है , उसे भ्रष्ट जन अमूमन सड़ा ही डालते हैं | चिंता और हैरानी की बात यह भी है कि उचित भंडारण न हो पाने के कारण अनाज के सड़ने की खबरें पिछले कई वर्षों से आती रही हैं, लेकिन इस दिशा में सरकार को कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। एक रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल देश में साढ़े तीन करोड़ टन भंडारण क्षमता की जरूरत है, मगर इसकी कमी के चलते लगभग चालीस फीसद अनाज का रखरखाव सही तरीके से नहीं हो पाता। उसमें अवैज्ञानिक और गैर-व्यावसायिक तरीके से किए गए भंडारण और गोदामों की उपलब्धता में क्षेत्रीय विसंगति के चलते देश में कुल उपज का बीस से तीस फीसद अनाज बर्बाद हो जाता है। यह सच्चाई पहली बार सामने नहीं आई है। खाद्य सुरक्षा क़ानून के आने के बाद यह आशा की जा रही थी कि देश से भुखमरी का खात्मा हो जाएगा , किन्तु व्यवहार में ऐसा नही दीखता | आज भी करोड़ों लोगों को दिन की शरुआत के साथ ही यह सोचना पड़ता है कि आज पूरे दिन पेट भरने की व्यवस्था कैसे होगी ? सुप्रीम कोर्ट की फटकार का भी सरकार पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता | भंडारण में व्यापक खामियों के चलते लाखों टन अनाज सड़ जाने की खबरों के मद्देनजर कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी कि अगर भंडारण का प्रबंध नहीं किया जा पा रहा है तो क्यों नहीं अनाज को गरीबों में मुफ्त बांट दिया जाता। इसके अनुपालन में सरकार मूक - बधिर नज़र आती है | एक आंकड़े के अनुसार , सही रखरखाव के अभाव में पंजाब में पिछले तीन वर्षों के दौरान पंजाब में 16 हज़ार 500 टन अनाज सड गया |

सरकार एक तरफ़ यह दावा करते नहीं थकती कि देश में अनाज प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं , फिर भी देश में भूख से मौतों का सिलसिला बरक़रार है | कितनी अजीब बात है , जब सरकार विरोधाभासी बयान देकर यह कहती है कि अनाज की कमी है , जिसकी भरपाई के लिए जीएम तकनीक से अनाज उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाता है ,जबकि जीएम [ जेनेटिकली मोडीफाइड ] जी ई [ जेनेटिकली इंजीनियर्ड ]  तकनीक से पैदा ऐसी फसलों के जोखिम से भरे होने को लेकर कई अध्ययन आ चुके हैं। जीई फसलें डीएनए को पुनर्संयोजित करनेवाली प्रौद्योगिकी ( Recombinant DNA technology) के माध्यम से प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से तैयार किए गए पादप जीव हैं। आनुवांशिकी इंजीनियरिंग (जीई) की अनिश्चितता और अपरिवर्तनीयता ने इस प्रौद्योगिकी पर बहुत सारे सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे भी आगे, विभिन्न अध्ययनों ने यह पाया है कि जीई फसलें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं और इससे मानव स्वास्थ्य को संकट की आशंका है। इन सबके परिणामस्वरूप, इस खतरनाक प्रौद्योगिकी को अमल में लाने की आवश्यकता पर दुनिया भर में विवाद खड़ा हो गया है। भारत एवं अन्य बहुत सारे देशों में, पर्यावरण में छोड़े जा रहे जीई या जीएम पौधों-जंतुओं (organism) के विरूद्ध प्रचार के साथ ग्रीनपीस का कृषि पटल पर पदार्पण हुआ। जीई फसलें जिन चीजों का प्रतिनिधित्व करती हैं वे सब हमारी खेती के लिए अनुचित हैं। वे हमारी जैवविविधता के विनाश और हमारे भोजन एवं खेती पर निगमों के बढ़ते नियंत्रण को कायम रखती हैं। करीब छह महीने पहले ब्रिटेन स्थित मेकेनिकल इंजीनियरिंग संस्थान की ओर से जारी एक रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया था कि भारत में मुख्य रूप से भंडारण और ढुलाई सहित आपूर्ति की खामियों के चलते हर साल लगभग दो करोड़ टन गेहूं बर्बाद हो जाता है। जबकि देश में ऐसे करोड़ों लोग हैं, जिन्हें भरपेट भोजन नहीं मिल पाता या फिर पर्याप्त पोषण के अभाव में वे गंभीर बीमारियों का शिकार होकर जान गंवा देते हैं। हैरानी की बात है कि एक ओर भंडारण के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किया गया, लेकिन स्थानीय जरूरतों के हिसाब से सरकारी पैमाने पर ऐसे प्रबंध करना या फिर इस व्यवस्था का विकेंद्रीकरण करके सामुदायिक सहयोग से इसे संचालित करना जरूरी नहीं समझा गया। इसके अलावा, जरूरत से अधिक भंडारण को लेकर खुद कृषि मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति की आलोचना के बावजूद यह सिलसिला रुका नहीं है। सरकार की लापरवाही से स्थिति दिन - प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है | ऐसे में खाद्य सुरक्षा क़ानून के क्रियान्वयन पर सवालिया निशान लग गया है | सरकार को चाहिए कि इस गंभीर समस्या पर प्राथमिक रूप से ध्यान दे और विगत सरकारों द्वारा की जा रही अनदेखी पर रोक लगाए | 

Jun 16, 2015

सच्ची धार्मिकता से ही मिलेगी ' नई ज़िन्दगी '

समाचारपत्र - पत्रिकाओं एवं मीडिया के अन्य साधनों - उपक्रमों में आए दिन आत्महत्या की ख़बरें प्रकाशित - प्रसारित होती रहती हैं . कभी छात्र - छात्राओं की आत्महत्या की ख़बरें होती हैं ,तो कभी किसान और परेशानहाल सर्वहारा वर्ग के लोगों की .यदा - कदा अन्यों के भी इस प्रकार परलोक सिधारने की घटनाएं सामने आती हैं . कहने का तात्पर्य यह कि सभी जीवन से हारे और उकताए हुए हैं . और इस संतोष की मात्रा इतनी घनीभूत है कि आत्महत्या जैसा कायराना क़दम उठकर अपना अमूल्य जीवन तक खो दे रहे है . फिर भी आश्चर्य और चिंता की बात यह है कि यह हमारे समाज मय राजनीतिक क्षितिज पर चर्चा का विषय कभी नहीं बनता . फिर इसके कारणों की पड़ताल की बात बहुत दूर हो जाती है . कोई चिंतन नहीं हो पाता . फिर आख़िर कैसे होगा इस समस्या का समाधान ? हमारा मानना है कि धार्मिक मूल्यों - शिक्षाओं से दूरी आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण है . दुर्भाग्य से आज समाज में ऐसे तथाकथित जीवन मूल्यों को प्रतिष्ठा प्राप्त है जिन्हें प्राप्त करने मे असफलता का डर ही विद्यार्थियों को जीवन ससे निराश और कुंठित कर देता है . उनके माता पिता भले ही उनसे बहुत अपेक्षा न रखते हों , लेकिन समाज की नजरों में ऊँचा बनने,खासतौर से पूजीवादी मूल्यों के अन्तर्गत उच्च जीवन स्तर प्राप्त करने की ललक या एक ऐसी सफलता प्राप्त करने की ललक जिसके लिये कठोर और अनवरत परिश्रम की आवश्यकता होती है न कर पाने की विफलता युवाओं को आत्महत्या की ओर ले जाती है. ईश्वर के प्रति समर्पण एवं आलम्ब न होने से उनकी वास्तविक जीवन - शक्ति और आत्मबल क्षीण हो जाता है और वे जीवन - अंत का फ़ैसला कर लेते हैं . इसमें माँ - बाप को निर्दोष नहीं माना जा सकता . वे उनका उचित ध्यान नहीं रखते , उचित प्रशिक्षण नहीं करते या कर नहीं पाते . यह भी देखा गया है कि आज के युवा अपने माँ - बाप से डरते हों या न डरते हों , किन्तु हकीकत यह है कि उनके माँ - बाप उनसे बहुत डरते हैं . वे डरते हैं - उनके गुस्से से, वे डरते है उनकी चुप्पी से वे डरते हैं उनकी हॅंसी से . हाँ , वे अब उनकी हॅंसी से भी डरते हैं . पता नहीं उनके चेहरे की हॅंसी कितनी सच्ची है कितनी अच्छी है . क्या पता उनके हॅंसते खिलखिलाते चेहरे के पीछे कोई भयानक चेहरा छुपा हो।क्या पता उनके दिल की गहराइओं में कौन सा राज नाग बनकर जिन्दगी को डसने के लिए तैयार बैठा हो। कितने युवा होते बच्चे हॅंसते,खेलते मौत को गले जगा रहे हैं। क्या वे किसी से कुछ कहकर आत्महत्या कर रहे हैं। उनके माता पिता तो क्या उनके निकट - मित्र भी नहीं जान पाते कि वे कब अपनी जीवन लीला समाप्त करेंगें।
यही हाल किसानों और परेशानहाल सर्वहारा लोगों का है . कहा जाता है , अपितु यह सत्य है कि अक्सर वे बैंकों से ऋण लेते हैं और उसकी अदायगी नहीं कर पाते . उनके लिए सरकार की भी ' कल्याणकारी राज्य ' की परिकल्पना क्रियान्वित नहीं हो पाती . सरकार का अनुदारवादी चेहरा ही उन्हें देखना पड़ता है . वे इस विषम परिस्थिति का मुक़ाबला नहींकर पाते और कायरतापूर्ण क़दम उठा लेते हैं . निःसंदेह आज विकट स्थिति है . इतनी विकट कि कहा जाता है कि आज के दौर में शायद दुनिया में कोई ऐसा आदमी न होगा जिसने अपने जीवन में कभी आत्महत्या करने के बारे मे न सोचा हो। ऐसा भी होता है कि अनायास या सप्रयास वह बुरा वक्त गुजर जाता है और जिन्दगी फिर अपनी रप्तार से चल पड़ती है । सच यही है कि यदि वह समय गुजर जाये जिस समय व्यक्ति आत्मघात की ओर प्रवृत्त होता है तो फिर वह आत्महत्या नहीं करेगा. कुछ कहते हैं कि आत्महती लम्बे समय से तनाव में था। लम्बे समय से तनाव मे था? महीने? दो महीने? छः महीने? मगर यह मुद्दत तो गुज़ारी जा सकती है . क्या बरसात के बाद सर्दी और सर्दी के बाद गर्मी की ऋुत नहीं आती ? क्या पतझड़ के बाद वसंत नहीं आता ? फिर जिन्दगी में हॅंसी खुशी के दिन क्यो नहीं आ सकते हैं ? जिन्दगी हजार नेमत है. वास्तव में जिन्दगी को जीना चाहिए , उसे जीतना इन शब्दों में चाहिए कि उसे स्वाभाविक ज़िन्दगी मिले . ज़िन्दगी को निराशा से परे रखना चाहिए . ठहरा हुआ तो पानी भी सड़ जाता है . अतः ज़िन्दगी में ठहराव अर्थात स्वांत नहीं आना चाहिए . ज़िन्दगी तो है ही चलने का नाम. ये जो गमो की स्याह रात है कितनी भी लम्बी हो कट ही जायेगी . फिर सुबह होगी, सूरज निकलेगा,फूल खिलेंगें, भौंरे गुनगुनायेंगें, पंछी चहचहायेंगें. फिर ज़िन्दगी में ही कैसे अन्धकार कैसे कायम रह सकता है ? हमेशा सुबह की आशा रखनी चाहिए . लेकिन फिर सवाल यह आएगा कि यह संभव कैसे होगा , तो हम जैसा कि ऊपर उल्लेख कर चुके हैं कि इसके लिए धार्मिकता को अपनाना ज़रूरी है , वह भी सच्ची धार्मिकता . जब कार्य ईश्वर के इच्छानुसार किये जाएंगे और उसे ही कार्यसाधक भी माना जाएगा , तो ज़िन्दगी में निराशा , चिंता . कुंठा और हतोत्साह का आना असंभव है . दिल में सरलता और निर्मलता आ जाएगी . चिन्तन सकारत्मक होगा . वह हमेशा यह सोचेगा कि जो ईश्वर - इच्छा है , उसे होने दो . [ Let the will of God be done . ] ईश्वर जो करता है , अच्छा ही करता है .उसे संतोष ,संबल मिल जाएगा , जो उसे ' नवजीवन ' प्रदान करेगा .

Jun 10, 2015

योग के बहाने

योग के बहाने 
संयुक्त राष्ट्र ने आगामी 21 जून को योग दिवस मनाने का ऐलान क्या किया , श्रेय लेने वालों की होड़ लग गई | इसी बीच किसी ने इसे अपने धर्म - प्रचार का साधन समझ लिया और इसके प्राचीन रूपों के साथ मनाने का फ़ैसला , जिसका भारत जैसे लोकतान्त्रिक और धर्म निरपेक्ष देश में विरोध होना ही था और हुआ भी | जबकि संयुक्त राष्ट्र ने आधुनिक योग पर आधारित योग दिवस मनाने की बात कही थी |
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के विरोध पर ॐ और सूर्य नमस्कार जैसी क्रियाओं को हटाने का फ़ैसला विवेकसम्मत  ही कहा जाएगा | दरअसल इस मामले में संयुक्त राष्ट्र से बड़ी चूक हुई है | उसे विचारक वेंडी डॉनियर जैसे बुद्धिजीवियों की किताबों के हवाले से बताया गया कि '' योग यूरोपीय जनों की भारत को देन है , जो 18 वीं और 19 वीं सदी में यूरोपियों के साथ भारत आया था | उस समय लोग व्यायाम के फ़ायदे तलाश कर रहे थे और फ्रांसीसी दार्शनिक रूसो की ' एमिली ' जैसी किताबों से उन्हें प्रेरणा मिल रही थी | ''
 वह लिखता है कि ''कई लोग इस तथ्य पर एतिराज़ जताते हैं और सोचते हैं कि आधुनिक योग प्राचीन भारतीय चीज़ है |'' इन बातों से प्रभावित होकर योग के स्वास्थ्य - लाभ के परिप्रेक्ष्य में संयुक्त राष्ट्र ने इसे दिवस के रूप में मनाने का फ़ैसला किया |
वास्तव में योग की जड भारत के प्राचीन ग्रन्थ '' घेरंड संहिता ' में निहित है , जिसके रचनाकार घेरंड मुनि हैं | वर्णित है कि मुनि जी अपने प्रिय शिष्य चंड कपालि को योग विषयक प्रश्न पूछने पर जो नसीहत की थी , वह इसमें संकलित है | पतंजलि के ' योग सूत्र ' में आसन , प्राणायाम , मुद्रा , नेति आदि योगिक क्रियाओं का उल्लेख नहीं है | जबकि ' घेरंड संहिता ' में योग आसन , प्राणायाम , बंध , मुद्रा और योग की विभिन्न क्रियाओं का जैसा विशद वर्णन मिलता है , वह अन्यत्र उपलब्ध नहीं है |  इस किताब में 350 श्लोक हैं | यही आधारभूत किताब योग को सही तौर पर हिन्दू धर्म से जोड़ती है | यह अद्वैतवादी है , जो आदि शंकराचार्य का भी उपदेश है |
हमारे देश धार्मिक क्रियाओं और प्रतीकों को दूसरे धर्म के लोगों पर थोपने का जो चलन बढ़ा है , उसकी व्यापक निंदा हो रही है | योग ही नहीं सूर्य नमस्कार , सरस्वती वन्दना , गीता - पठन आदि को जबरन थोपने की कोशिश की जा रही है और विरोध पर अशालीन जवाब दिया जाता है | यह सब कृत्य हमारे देश के संविधान के विपरीत हैं ! जमाअत इस्लामी हिन्द के महासचिव इंजीनियर मुहम्मद सलीम ने ऐसी चीज़ों को केंद्र - राज्य सरकारों द्वारा पूरे समाज और इसके सभी वर्गों के लिए अनिवार्य करने और जबरन थोपने का विरोध किया है और इसे संविधान की आत्मा के प्रतिकूल बताया है |
 उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को अपनी धारणा के अनुसार कृत्य की स्वतंत्रता प्राप्त है | सत्ताधारी वर्ग देश के जन - साधारण की निर्धनता , आर्थिक बदहाली , शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने और सामाजिक न्याय जैसी महत्वपूर्ण समस्याओं को हल करने एवं विभिन्न वर्गों और समूहों के बीच एकजुटता और सद्भाव पैदा करने की सच्चे दिल से कोशिश करने के स्थान पर समाज में अशांति और बेचैनी पैदा करने की अनुचित व अनपेक्षित कोशिश कर रहा है , जो अत्यंत हानिकारक है | इंजीनियर मुहम्मद सलीम ने यह आशा प्रकट की कि सरकार संविधान का पालन करते हुए एक विशेष कल्चर के वर्चस्व की कोशिश से बचेगी और व्यापक देशहित में न्याय , प्रेम , सद्भावना और एकजुटता को बढ़ावा देने की गंभीर कोशिश करेगी |     


मुस्लिम पर्सनल लॉ की हर सूरत में हिफ़ाज़त की जाए

मुस्लिम पर्सनल लॉ की हर सूरत में हिफ़ाज़त की जाए

मुंबई की एक परिवार अदालत ने अमेरिका से वापस भारत आए एक मुस्लिम डाक्टर को दूसरी शादी करने से रोक दिया है | जज स्वाति चौहान ने पिछले दिनों आदेश दिया है कि वह पहली पत्नी के अधिकार और मुआवजा राशि उसे दे, तभी दूसरी शादी करे। उनका कहना है कि पहली पत्नी को उसके अधिकार दिए बिना एक मुस्लिम शख्स को धर्म और कानून दोनों में से कोई भी दूसरी शादी की इजाजत नहीं देता है। कोर्ट ने वर्ली निवासी डॉ. अकबर खान (बदला हुआ नाम) की दूसरी शादी पर उसकी पहली पत्नी सकीना (बदला हुआ नाम) को वैकल्पिक आवास मुहैया कराने तक रोक लगा दी है। 34 साल की सकीना ने अपने 45 साल के पति अकबर के वैवाहिक वेबसाइट पर शादी का विज्ञापन देने के बाद शादी रोकने के लिए अदालत की मदद ली थी। सकीना और अकबर ने 27 मई 2001 को शादी की थी। इसके अलगे महीने ही वे अमेरिका चले गए थे। वहां उनके चार बेटे हुए। उनकी उम्र 4 से लेकर 12 साल की बीच है। सितंबर 2011 में मुंबई आकर किराए के फ्लैट में रहने से पहले ही उनके बीच झगड़ा होने लगा था। सकीना ने इससे पहले परिवार अदालत में अपने तीन बच्चों की कस्टडी के लिए आवेदन किया था और आरोप लगाया था कि अकबर ने उन्हें उससे छीन लिया था। सकीना ने यह भी कहा कि मकान मालिक ने उससे जुलाई 2014 में फ्लैट खाली करने को कहा था। अदालत में अकबर के वकील ने कहा कि उसके मुवक्किल ने सकीना को तलाक दे दिया है और सकीना ने इसे चुनौती भी नहीं दी थी। वकील ने कहा कि वे मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आते हैं, इसलिए उनके मुवक्किल को चार शादी करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। दूसरी ओर सकीना के वकील ने तर्क दिया कि अगर कोई पति अपनी पहली पत्नी के अधिकारों का हनन कर रहा है तो उसे धर्म और कानून के तहत दूसरी शादी करने से रोका जा सकता है। उन्होंने कहा कि चार शादी का विचार 'पवित्र क़ुरआन की गलत व्याख्या है। पहली नज़र में अदालत का उक्त फ़ैसला मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप है | दूसरे सकीना के वकील का यह कहना कि चार शादियों की अवधारणा पवित्र क़ुरआन की गलत व्याख्या है , बेहद निंदनीय और आपत्तिजनक है | वास्तव में शाहबानो मामले और उसके बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप का जो सिलसिला शुरू हुआ , वह मुसलमानों की तमाम आपत्तियों और विरोधों के बावजूद थमने का नाम ही नहीं ले रहा है ! बार - बार पर्सनल लॉ विरोधी फ़ैसले सामने आ रहे हैं , जो न्यायपालिका की मंशा पर सवाल खड़े करते हैं | ज्ञातव्य है कि 23 अप्रैल 1985 को सुप्रीमकोर्ट ने महम्मद अहमद खां बनाम शाहबानो बेगम मुक़दमे में जो फ़ैसला सुनाया था और मुसलमानों के विरोध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने संसद द्वारा इसके विरोध में क़ानून बनवाकर इसके क्रियान्वयन पर रोक लगवा दी थी |,अफसोसनाक बात यह है कि ठीक वैसा ही फ़ैसला कई बार सामने आ चुका है | मिसाल के तौर पर गत वर्ष 26 अप्रैल 2014 को शमीम बानो बनाम अशरफ़ खां मुक़दमे की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक मिश्र और जस्टिस विक्रमजीत सेन की खंडपीठ ने अपने फ़ैसले में मुस्लिम महिला को इद्दत [ तलाक़ के बाद तीन महीने तक ] की अवधि पूरी होने के बाद भी पति से गुज़ारा भत्ता लेने का हक़दार ठहराया | 
पीठ ने कहा कि मुस्लिम महिला [ तलाक़ अधिकार संरक्षण ] क़ानून की धारा 3 के तहत गुज़ारा भत्ता देने की व्यवस्था सिर्फ़ इद्दत तक सीमित नहीं है |  देश के मुसलमान "मुस्लिम पर्सनल लॉ अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 द्वारा शासित हैं |"  यह मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ को निर्देशित करता है जिसमें शादी, महर, तलाक, रखरखाव, उपहार, वक्फ और विरासत शामिल है | देखा गया है कि इस तरह केअक्सर फ़ैसले इस्लाम की शिक्षाओं के अनुरूप नहीं होते | इस प्रकार यह मुस्लिम पर्सनल ला में सीधा हस्तक्षेप का विषय बन जाता है | कुछ लोग यह भी कहते हैं कि देश में एक ही नागरिक क़ानून होना चाहिए , जिसका भारतीय संविधान समर्थन करता है | इसके अनुच्छेद 44 [ नीति निर्देशक तत्व ] में समान सिविल कोड की परिकल्पना की गयी है | इसके हवाले से सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार को पहले सुझाव दे चुकी है कि पूरे देश में समान सिविल कोड लागू करे | संघ परिवार इसके लिए बहुत लालायित दिखता रहा है , जबकि यह सच्चाई सबको पता है कि भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में इसे लागू कर पाना असंभव है ,  लेकिन वोटों की राजनीति को चमकाने के लिए इसके लिए दुष्प्रयास किए जाते रहे हैं | मदनलाल खुराना जिन्हें भाजपा ने काम निकल जाने के बाद उपेक्षित कर दिया था , जब दिल्ली के मुख्यमंत्री थे , तब उन्होंने इस बाबत एक प्रस्ताव विधानसभा में पारित तक करवा लिया था | मध्यप्रदेश विधानसभा में भी भाजपा के लोगों ने भी ऐसे दुष्प्रयास किए , जो अंततः नाकाम हो गये , क्योंकि ये नाकाम होने ही थे | यह संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त उनके मौलिक अधिकारों के सर्वथा विपरीत है | संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को अंतःकरण और धर्मानुसार अमल करने की आज़ादी देता है | ऐसी ही बात संविधान की प्रस्तावना में कही गई है | संविधान में धाराओं 25 (1) और 26 के अंतर्गत जो बातें कही गई है उनका सार यह है कि हर धार्मिक समुदाय को इसका अधिकार प्राप्त होगा कि अपने धर्म पर चले, तथा अपने तौर पर अपने धार्मिक क्रिया-कलाप अंजाम दे। अतः यह सिर्फ़ मुसलमानों (या अन्य अल्पसंख्यक समुदायों) का मामला ही नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधान का भी तक़ाज़ा है कि उसके अंतर्गत देश में समान सिविल कोड लागू न हो। मुसलमानों ने भी समान सिविल कोड को लागू नहीं किया | जब वे लगभग नौ सौ वर्ष देश के शासक रहे , कभी भी उन्होंने हिन्दू या अन्य धर्मानुयायी जनता पर अपना क़ानून नहीं थोपा | अंग्रेज़ों ने लार्ड मैकाले की अध्यक्षता में समिति बनकर भारतीय दंड संहिता , भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता , भारतीय व्यवहार प्रक्रिया संहिता , भारतीय साक्ष्य अधिनियम आदि बहुत - से क़ानून लागू कर दिए , लेकिन समान सिविल कोड की ओर नहीं बढ़े , क्योंकि वे ज़ालिम होने के बावजूद यह जानते थे कि यह किसी भी क़ीमत पर लागू नहीं हो सकता | उन्होंने मुसलमानों के लिए पारिवारिक क़ानून 1937 और अलग से मुस्लिम मैरिज डिज़ुलेशन एक्ट 1939 बनाया | देश के किसी भी ख्यातलब्ध विचारक एवं विद्वान ने समान सिविल कोड का समर्थन नहीं किया है | संविधान निर्माता डॉ . अंबेडकर ने संविधान निर्मात्री सभा में नीति निर्देशक तत्व की धारा 44 में इस बाबत रखे गये प्रावधान पर दक्षिण के कुछ मुस्लिम सदस्यों की आपत्ति का जवाब देते हुए कहा था कि जब तक सब देशवासी इसके लिए राज़ी नहीं होंगे , इसे कदापि लागू नहीं किया जाएगा | देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं . जवाहरलाल नेहरू ने कई बार इसी आशय का मत प्रकट किया था | राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लंबे समय तक कमान संभालने वाले गुरु गोलवलकर जी भी इसके समर्थक है कि देश समान सिविल कोड लागू न हो | 20 अगस्त 1972 को दिल्ली स्थित दीनदयाल शोध संस्थान के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने साफ़ कहा था कि देश में समान सिविल कोड अवांछित है | उन्होंने कहा था कि जो लोग समान सिविल कोड की बात करते हैं , वे भारत की ज़रूरत समझते ही नहीं हैं | गुरु जी ने इसी आशय के उद्गार एक इंटरव्यू में व्यक्त किए थे , जो 26 अगस्त 1972 को ' मदरलैंड ' में छपा था | आश्चर्य की बात है कि संघ परिवारी अपने गुरु जी की बात का बार - बार अनादर करते हैं | भाजपा नेताओं द्वारा इसकी ज़रूरत बार - बार बताकर गुरु जी की आत्मा को ठेस पहुंचाई जाती है , यहाँ तक कि भाजपा इसे अपने घोषणापत्र तक में शामिल कर लेती है || देश की अदालतें भी मुस्लिम पर्सनल लॉ को समुचित महत्व नहीं देतीं , जिसके कारण बार - बार समस्या पैदा होती है | एक ओर देश में मौजूद मुस्लिम पर्सनल ला में बहुत - सी ख़ामियां हैं , जिन्हें दूर करने की ज़रूरत है , दूसरी ओर इन खामियों को और नहीं बढ़ाया जाना चाहिए और इस मामले को स्थाई रूप से हल किया जाना चाहिए , ताकि भविष्य में मुस्लिम पर्सनल लॉ का अतिक्रमण न किया जा सके |

Jun 5, 2015

ज़हरीले खाद्य पदार्थों पर फ़ौरन लगे रोक

ज़हरीले खाद्य पदार्थों पर फ़ौरन लगे रोक 
- डॉ . मुहम्मद अहमद 
कहते हैं , हमारे देश में विकसित देशों का हर उत्सर्जित माल बिक जाता है , चाहे वह स्वास्थ्य के लिए कितना ही खतरनाक और जानलेवा हो ! फिर लगता है कि किसी सरकार में इतनी हिम्मत नहीं कि पूंजीपतियों का लोहा ले सके और अपनी जनता को हानिकारक  पदार्थों के सेवन से बचा सके | लेकिन इस दिशा में नाकाम कोशिशें होती रही हैं | जनता पार्टी के केन्द्रीय सत्ताकाल में जब जार्ज फर्नान्डीज उद्योग मंत्री थे , तब उन्होंने दो अमेरिकी कंपनियों - कोकाकोला और आई . बी . एम . पर गिरफ्त की थी , मगर इनका बाल बांका भी नहीं हुआ |
 कोकाकोला ने अपने पेयों का फार्मूला नहीं बताया और कैंसरजनित पेय हम भारतीयों को पिलाती रही , जबकि अमेरिका में इसे अपनी गुणवत्ता सुधारनी पड़ी | वास्तव में अमेरिका में खाद्य मानक संस्थाएँ और उनके नियम इतने कठोर हैं कि कोई कोई कम्पनी इस प्रकार की हरकत के बारे में सोच भी नहीं सकती | 
हमारे देश में स्थिति दूसरी है | यहाँ विदेश से आने वाली कम्पनियाँ हों या भारतीय कम्पनियाँ, मानक-नियम-क़ानून-सुरक्षा आदि के बारे में रत्ती भर भी परवाह नहीं करतीं.| युनियन कार्बाइड गैस रिसाव मामले में हम देख चुके हैं कि हजारों मौतों और लाखों को विकलांग बना देने के बावजूद कम्पनी के कर्ताधर्ता अब तक सुरक्षित हैं , क्योंकि हमारे यहाँ भ्रष्टाचार सिरमौर बना रहता है | भारत में जमकर रिश्वतखोरी होती है, और जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ जारी रहता है | ताज़ा मामला नेस्ले इंडिया के उत्पाद ख़ासकर ' मैगी ' का है | यह स्विट्ज़रलैंड की नेस्ले कंपनी की अनुषंगी है , जिसे 2014 में ब्रांड इक्विटी रिपोर्ट में भारत का पांचवां विश्वसनीय ब्रांड का दर्जा दिया गया था | 
मगर यह कहना अनुचित होगा कि हाई प्रोफ़ाइल लोग इन उत्पादों को ठीक से नहीं जानते , इसलिए इनकी हिमायत करते हैं ! वास्तव में यह सब जानते - बूझते होता है | दिल्ली समेत कुछ राज्यों में ; मैगी ' को प्रतिबंधित किये जाने एवं मैगी टेस्ट रिपोर्ट में जहर पाए जाने के बावजूद कुछ "पत्रकार" मैगी की तरफदारी कर रहे हैं ! मैगी का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है | झटपट से मैगी तैयार कर के हम खा लेते है और स्वाद भी मिल जाता है और भूख भी मिट जाती है ,लेकिन इसमें उत्तरप्रदेश के कुछ इलाकों में मैगी के सैंपल में कुछ घातक पदार्थ पाया गया है | अतः इस बात का दबाव सरकार पर बढ़ रहा है कि  सबको लुभाने वाले मैगी पर देश भर में प्रतिबन्ध लगाया जाए | 
यह बात भी सच है कि हमारे देश में ' अंतिम विजय ' पूंजीपतियों की ही होती है , फिर देश में  मोदी सरकार भी मौजूद है , जो पूंजीपतियों की हर विघ्न - बाधा की निवारक है | यह बड़ी चिंताजनक बात है कि उत्तर प्रदेश से लिए गए नमूनों में मैगी में तय मात्रा से 17 गुना ज्यादा लेड यानी सीसा पाया गया। पैकेट में जिक्र न होने के बावजूद भी मैगी के मसाले में मोनो सोडियम ग्लूटामेट पाए जाने का आरोप है। आइए जानते हैं कि आखिर तय सीमा से ज्यादा खाने पर सीसा और एमएसजी हमारे लिए कितने ख़तरनाक हैं। खून में सीसे की अधिक मात्रा में जमा होने से कैंसर, दिमागी बीमारी, मिर्गी या फिर किडनी ख़राब हो सकती है। 
कुछ मामलों में इससे मौत भी हो सकती है। लेड बच्चों के दिमागी विकास पर स्थायी असर डाल सकता है। इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी मुंबई में फूड केमिस्ट्री विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ उदय अन्नापुरे के मुताबिक "शरीर में कई मेटल होते हैं, जो खून के प्रवाह के ज़रिये शरीर के किसी भी हिस्से में जा सकते हैं। सीसे के ज्यादा मात्रा में इकठ्ठा होने से सिरदर्द, तनाव या फिर यादाश्त कमज़ोर हो सकती है।" उनका कहना है कि कई पौधों में प्राकृतिक रूप से पाया जाना वाला ग्लूटामेट अमीनो एसिड है। मैगी पर लगे आरोप के मुताबिक , इसे मसाला मेकर में मिलाया गया, लेकिन जानकारी नहीं दी गई। मोनोसोडियम मिलने से ग्लूटामेट में नमक तेज हो जाता है, जिससे नर्वस सिस्टम पर असर हो सकता है, ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है, शरीर के कई हिस्सों में सिहरन या जलन का अनुभव हो सकता है।
. सूत्रों के अनुसार जांच नतीजों के बाद उक्त विभाग ने दिल्ली स्थित भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) को लिखित में मैगी का लाइसेंस रद्द करने के लिए कहा है |
देश के विभिन्न राज्यों से मैगी के सैंपल लिए गये हैं और उनकी जाँच करवाई जा रही है | दूसरी ओर मैगी बनाने वाली कंपनी नेस्ले ने इस आरोप पर हैरानी जताई और कहा कि वह मैगी में मोनोसोडियम ग्लूटामेट केमिकल नहीं मिलाते हैं | मैगी में सीसा की मात्रा नगण्य है और निर्धारित 1 फीसदी से भी कम है | आज की यह बड़ी आवश्यकता है कि देश बिक रहे खाद्य सामग्रियों की ठीक से जाँच करवाई जाए और अपमिश्रण की स्थिति में बिना किसी बाह्य दबाव के उन पर रोक लगाई जाए |  
कोका-कोला और पेप्सी में इस्तेमाल होने वाला तत्व की वजह से कैंसर तक हो सकता है। इन पर रोक लगाने की बार - बार मांग की गई है , किन्तु भारत सरकार कोई क़दम नहीं उठाती | अमेरिका में इन कंपनियों ने अपने पेयों को स्वास्थ्य - अनुकूल बना लिया है , पर हमारे देश में पुराना ढर्रा ही चल रहा है | ब्रिटिश टैब्लॉइड ' डेली मेल ' के मुताबिक, अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि कोल्ड ड्रिंक्स में भूरा रंग लाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कलर एजेंट की वजह से हजारों लोगों को कैंसर हो सकता है। 
वॉशिंगटन डीसी के सेंटर फॉर साइंस इन द पब्लिक इंटरेस्ट (सीएसपीआई) ने कहा, 'कोका-कोला, पेप्सी और बाकी चीजों में इस्तेमाल किए जाने वाले दो केमिकल कैंसर पैदा कर सकते हैं और इन्हें बैन किया जाना चाहिए।' 'कोल्ड ड्रिंक्स और बाकी चीजों में भूरा रंग लाने के लिए चीनी को अमोनिया और सल्फाइट के साथ उच्च दबाव और तापमान पर मिलाया जाता है। इस केमिकल रिऐक्शन में दो तत्व 2-एमआई और 4-एमआई बनते हैं। सरकारी स्टडी यह बात पता चली है कि ये तत्व चूहों के फेफड़े, लीवर और थायरॉइड कैंसर का कारण बने हैं।'  अतः इन पेयों पर दुनियाभर में पाबंदी लगनी चाहिए |

Jun 4, 2015

मोदी सरकार वित्तीय सेवाएं आसान बनाए

मोदी सरकार वित्तीय सेवाएं आसान बनाए 


कहा जाता है कि किसी नई सरकार की उपलब्धियां आंकने के लिए एक साल कम होता है , लेकिन यह सच है कि एक साल में उसकी प्रगति की दिशा ज़रूर मालूम हो जाती है | आगामी 26 मई को मोदी सरकार के एक वर्ष पूरे हो जाएंगे जहाँ तक मोदी सरकार के कार्यकाल की उपलब्धियों का सवाल है , तो इस सिलसिले में कहा जा रहा है कि मोदी सरकार और डॉ . मन मोहन सिंह के एक वर्षीय कार्यकाल में दोनों में बहुत समानताएं हैं | मगर यह पूरा सच नहीं है | मोदी का एकाधिकारवादी होना एक अलग समस्या है , जो मनमोहन सिंह में नहीं थी | इसी प्रकार मोदी सरकार आरोपों के घेरे में अधिक है | एक अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि  मोदी सरकार के कार्यकाल में धार्मिक एवं लैंगिक भेदभाव बढ़ा है | अटल बिहारी बाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके अरुण शौरी का कहना है कि वर्तमान में प्रधानमंत्री आफ़िस का कंट्रोल बहुत अधिक बढ़ गया है | इसका यह भी मतलब है कि पीएम की हर चीज पर नजर है और जो कुछ हो रहा है, उसकी जवाबदेही से प्रधानमंत्री बच नहीं सकते। नई सरकार के बारे में विदेशी निवेशकों का जोश ठंडा पड़ चुका है, हालांकि उन्होंने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है। इस स्थिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पहले साल की उपलब्धियां कुछ समान अवश्य लगती हैं | ,मिसाल के तौर पर दोनों ही प्रधानमंत्रियों के पहले वर्ष के कार्यकाल में विकास दर में तेजी आई, आयात और निर्यात घटा, विदेशी पूंजी भंडार बढ़ा, कोयला उत्पादन बढ़ा, बिजली उत्पादन बढ़ा, पेट्रोलियम उत्पादों की खपत बढ़ी और बैंकों की गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) का स्तर बढ़ा। 'इंडिया स्पेंड' ने 12 संकेतकों का मूल्यांकन किया, जिसमें कई समानताएं देखी गईं। मोदी के प्रथम वर्ष में आठ प्रमुख उद्योगों (कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, रिफायनरी उत्पाद, ऊर्वरक, इस्पात, सीमेंट और बिजली) की विकास दर 2014-15 में पांच फीसदी रही, जो एक साल पहले 4.2 फीसदी थी। सिंह के प्रथम वर्ष में छह प्रमुख उद्योगों (कच्चा तेल, रिफायनरी उत्पाद, कोयला, बिजली, सीमेंट और तैयार कार्बन स्टील) की विकास दर 2009-10 में 10.4 फीसदी थी, जो 2008-09 में 2.8 फीसदी थी।डॉलर राशि में निर्यात और आयात 2014-15 में साल-दर-साल आधार पर क्रमश: दो फीसदी और 0.5 फीसदी घटा। डॉ .सिंह के दूसरे कार्यकाल के प्रथम वर्ष 2009-10 में यह क्रमश: चार फीसदी और पांच फीसदी रहा।विदेशी पूंजी भंडार 12 फीसदी वृद्धि दर्ज करते हुए 2013-14 के 304 अरब डॉलर से बढ़कर 2014-15 के आखिर में 341 अरब डॉलर हो गया। 2009-10 में यह 5.4 फीसदी वृद्धि के साथ 254.9 अरब डॉलर दर्ज किया गया था, जो एक साल पहले 241.7 अरब डॉलर था। आर्थिक मोर्चे पर देखें तो 2012-13 में 5.1% के बाद 2013-14 में 6.9% की विकास दर हासिल करने का माहौल अब भी बना हुआ है। इस सरकार को कई अहम मोर्चों पर निरंतरता बनाए रखने का श्रेय दिया जाना चाहिए। रघुराम राजन रिजर्व बैंक के गवर्नर बने हुए हैं और वह रुपये में स्थिरता बनाए रखने और महंगाई पर काबू पाने की जंग छेड़े हुए हैं।

यहाँ उन बातों की भी चर्चा होनी चाहिए जो पहले नहीं थीं या अल्प मात्रा में पाई जाती थीं और अब उनका विस्तार हो गया है ! देश के धार्मिक अल्पसंख्यकों पर होनेवाले हमलों पर प्रधानमंत्री मोदी की ख़ामोशी को अच्छा नहीं माना जा रहा है और इसे लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत बताया जा रहा है | बढ़ते धार्मिक और लैंगिक भेदभाव की  अस्ल वजह राजनीतिक शह है , जिसके चलते लोगों को नौकरियां और क़र्ज़ हासिल करने में दिक्कत हो रही है। मशहूर संस्था ' मास्टर कार्ड ' ने हाल में एक सर्वे के नतीजे जारी किए हैं, जिनसे ये बातें स्पष्ट हुई हैं सर्वे के लिए इंडिया में जितने लोगों ने हिस्सा  किया, उनमें से 58 फ़ीसद ने बताया कि भेदभाव के चलते उनके लिए क़र्ज़ लेना, बचत करना और नौकरी पाना मुश्किल होता है। सर्वे में शामिल दूसरे देशों के 33 फ़ीसद लोगों की यह शिकायत थी। सर्वे में यह भी बताया गया है कि 58 फ़ीसद लोगों को अपने अल्पसंख्यक समुदाय या धर्म का होने के चलते नौकरी पाने या क़र्ज़ लेने में दिक्कत होती है। बाहर के देशों में ऐसी शिकायत 28 फ़ीसद लोगों ने की थी। प्रधानमंत्री मोदी अपने वित्तीय समायोजन की पहल को आगे बढ़ाते हुए पिछले वर्ष 15 अगस्त को  देश के हर परिवार को बैंकिंग सेवाओं के दायरे में लाने के लिए महत्वाकांक्षी जन धन योजना शुरू की थी। इस योजना के तहत करोड़ों बैंक खाते खुले और रूपे डेबिट कार्ड जारी किये गये | प्रधानमंत्री के अनुसार , जन धन योजना के तहत 15 करोड़ से ज्यादा खाते खोले जा चुके हैं। इनमें 15,800 करोड़ रुपये जमा हो गए हैं। इस योजना के तहत करोड़ों बैंक खाते खुले और रूपे डेबिट कार्ड जारी किये गये | अब मोदी सरकार ने तीन सामाजिक योजनाओं की घोषणा की है | इनमें 1 रुपये से कम के दैनिक खर्च में जीवनबीमा कवर और हर महीने एक रुपये के प्रीमियम पर सेहत और दुर्घटना कवर वाली योजना शामिल हैं। मगर मास्टर कार्ड के सर्वे में कहा गया है कि वित्तीय सेवाएं प्राप्त करना आसान हो तो लोगों का भरोसा बढ़ेगा और विकास की गति बढ़ेगी

Jun 2, 2015

भुखमरी और कुपोषण से कब मिलेगी नजात ?

भुखमरी और कुपोषण से कब मिलेगी नजात ?

एक तरफ़ तो देश में खाद्य सुरक्षा क़ानून लागू है , जिसके तहत भुखमरी , कुपोषण और खाद्य असुरक्षा के लिए सरकार को ज़िम्मेदार माना गया है | मगर लगता हमारे यहाँ यह क़ानून भी सुविधावादी है , लेकिन इसमें बड़ा अंतर यह है कि इसे इच्छानुसार अपनाया जाता है , वह भी कागज़ों पर ! दुनिया में इस समय भूखे लोगों की संख्या लगभग 7,950 लाख है, जिनमें से एक चौथाई भारत में रहते हैं। यह संख्या चीन में कुपोषितों की संख्या से भी ज्यादा है। ये आंकड़े हैं फूड एंड ऐग्रिकल्चरल ऑर्गनाइजेशन (FAO) की रिपोर्ट के, जो पिछले दिनों प्रकाशित हुई है। यह स्थिति तब है , जब वैश्विक भुखमरी सूचकांक (जीएचआई) में 2014 में भारत की स्थिति सुधरी है और यह 55वें स्थान पर आ गया है। रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में 1,946 लाख लोग कुपोषण के शिकार हैं, जो भारत की कुल जनसंख्या के 15.2 फीसदी है। 1990-1992 में भारत में कुपोषितों की तादाद लगभग 2,101 लाख थी। चीन में कुपोषितों की संख्या 1,338 लाख है, जो 2014-16 की चीन की कुल जनसंख्या के 9.3 फीसदी हैं। 1990-92 में चीन में कुपोषितों की संख्या 2,890 लाख थी। भारत 1990-92 से 2014-16 के बीच अपने यहां कुपोषितों की संख्या में 36 फीसदी की कमी लाने में कामयाब रहा। वहीं, चीन ने इतने ही समय में कुपोषितों की तादाद 60.9 फीसदी तक कम कर ली है। रिपोर्ट के मुताबिक, 'भारत में जारी हुए खाद्य वितरण कार्यक्रम के सकारात्मक परिणाम मिले, हालांकि, भारत उच्च आर्थिक विकास दर को उच्च खाद्य खपत में बदलने में नाकाम रहा। अतः समग्र विकास से भूखों को कोई फायदा नहीं हुआ।' हमारे देश का यह खुला सच है कि हमारे यहाँ हर साल लाखों टन अनाज सिर्फ भंडारण के उचित प्रबंध के अभाव में बर्बाद हो जाता है | खाद्य सुरक्षा क़ानून में सस्ते रेट पर चावल , गेहूं और मोटे अनाजों को उपलब्ध कराने की व्यवस्था है | इसके बावजूद भूखे लोगों की तादाद घट नहीं पा रही है ! कितनी बड़ी विडंबना है कि सरकार अनाज को तो सड़ने देती है , दूसरी ओर यह कहती है कि अनाज की कमी है , लिहाज़ा वह गरीब जनता को मुफ़्त में अनाज नहीं उपलब्ध करा सकती | भूखे लोगों तक मुफ़्त अनाज आपूर्ति के सुप्रीमकोर्ट की हिदायत पर बार - बार सरकार यही बात कहकर पल्ला झाड़ लेती है | सरकार जो अनाज आयात करती है , उसे भ्रष्ट जन अमूमन सड़ा ही डालते हैं | चिंता और हैरानी की बात यह भी है कि उचित भंडारण न हो पाने के कारण अनाज के सड़ने की खबरें पिछले कई वर्षों से आती रही हैं, लेकिन इस दिशा में सरकार को कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। एक रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल देश में साढ़े तीन करोड़ टन भंडारण क्षमता की जरूरत है, मगर इसकी कमी के चलते लगभग चालीस फीसद अनाज का रखरखाव सही तरीके से नहीं हो पाता। उसमें अवैज्ञानिक और गैर-व्यावसायिक तरीके से किए गए भंडारण और गोदामों की उपलब्धता में क्षेत्रीय विसंगति के चलते देश में कुल उपज का बीस से तीस फीसद अनाज बर्बाद हो जाता है। यह सच्चाई पहली बार सामने नहीं आई है। खाद्य सुरक्षा क़ानून के आने के बाद यह आशा की जा रही थी कि देश से भुखमरी का खात्मा हो जाएगा , किन्तु व्यवहार में ऐसा नही दीखता | आज भी करोड़ों लोगों को दिन की शरुआत के साथ ही यह सोचना पड़ता है कि आज पूरे दिन पेट भरने की व्यवस्था कैसे होगी ? सुप्रीम कोर्ट की फटकार का भी सरकार पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता | भंडारण में व्यापक खामियों के चलते लाखों टन अनाज सड़ जाने की खबरों के मद्देनजर कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी कि अगर भंडारण का प्रबंध नहीं किया जा पा रहा है तो क्यों नहीं अनाज को गरीबों में मुफ्त बांट दिया जाता। इसके अनुपालन में सरकार मूक - बधिर नज़र आती है | एक आंकड़े के अनुसार , सही रखरखाव के अभाव में पंजाब में पिछले तीन वर्षों के दौरान पंजाब में 16 हज़ार 500 टन अनाज सड गया | सरकार एक तरफ़ यह दावा करते नहीं थकती कि देश में अनाज प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं , फिर भी देश में भूख से मौतों का सिलसिला बरक़रार है | कितनी अजीब बात है , जब सरकार विरोधाभासी बयान देकर यह कहती है कि अनाज की कमी है , जिसकी भरपाई के लिए जीएम तकनीक से अनाज उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाता है ,जबकि जीएम [ जेनेटिकली मोडीफाइड ] जी ई [ जेनेटिकली इंजीनियर्ड ]  तकनीक से पैदा ऐसी फसलों के जोखिम से भरे होने को लेकर कई अध्ययन आ चुके हैं। जीई फसलें डीएनए को पुनर्संयोजित करनेवाली प्रौद्योगिकी ( Recombinant DNA technology) के माध्यम से प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से तैयार किए गए पादप जीव हैं। आनुवांशिकी इंजीनियरिंग (जीई) की अनिश्चितता और अपरिवर्तनीयता ने इस प्रौद्योगिकी पर बहुत सारे सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे भी आगे, विभिन्न अध्ययनों ने यह पाया है कि जीई फसलें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं और इससे मानव स्वास्थ्य को संकट की आशंका है। इन सबके परिणामस्वरूप, इस खतरनाक प्रौद्योगिकी को अमल में लाने की आवश्यकता पर दुनिया भर में विवाद खड़ा हो गया है। भारत एवं अन्य बहुत सारे देशों में, पर्यावरण में छोड़े जा रहे जीई या जीएम पौधों-जंतुओं (organism) के विरूद्ध प्रचार के साथ ग्रीनपीस का कृषि पटल पर पदार्पण हुआ। जीई फसलें जिन चीजों का प्रतिनिधित्व करती हैं वे सब हमारी खेती के लिए अनुचित हैं। वे हमारी जैवविविधता के विनाश और हमारे भोजन एवं खेती पर निगमों के बढ़ते नियंत्रण को कायम रखती हैं। करीब छह महीने पहले ब्रिटेन स्थित मेकेनिकल इंजीनियरिंग संस्थान की ओर से जारी एक रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया था कि भारत में मुख्य रूप से भंडारण और ढुलाई सहित आपूर्ति की खामियों के चलते हर साल लगभग दो करोड़ टन गेहूं बर्बाद हो जाता है। जबकि देश में ऐसे करोड़ों लोग हैं, जिन्हें भरपेट भोजन नहीं मिल पाता या फिर पर्याप्त पोषण के अभाव में वे गंभीर बीमारियों का शिकार होकर जान गंवा देते हैं। हैरानी की बात है कि एक ओर भंडारण के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किया गया, लेकिन स्थानीय जरूरतों के हिसाब से सरकारी पैमाने पर ऐसे प्रबंध करना या फिर इस व्यवस्था का विकेंद्रीकरण करके सामुदायिक सहयोग से इसे संचालित करना जरूरी नहीं समझा गया। इसके अलावा, जरूरत से अधिक भंडारण को लेकर खुद कृषि मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति की आलोचना के बावजूद यह सिलसिला रुका नहीं है। सरकार की लापरवाही से स्थिति दिन - प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है | ऐसे में खाद्य सुरक्षा क़ानून के क्रियान्वयन पर सवालिया निशान लग गया है | सरकार को चाहिए कि इस गंभीर समस्या पर प्राथमिक रूप से ध्यान दे और विगत सरकारों द्वारा की जा रही अनदेखी पर रोक लगाए |