Jul 30, 2015

53 वें जन्मदिन पर याक़ूब मेमन को फांसी

53 वें जन्मदिन पर याक़ूब मेमन को फांसी 

मुंबई में 12 मार्च 1993 के श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों के सिलसिले में मौत की सजा पाने वाले एकमात्र दोषी याकूब मेमन को तमाम क़ानूनी कोशिशों के बावजूद गत 30 जुलाई की सुबह उसके 53 वें जन्मदिन पर फांसी दे दी गई । सुप्रीमकोर्ट में बार - बार की गुहार पर 29 / 30 जुलाई की रात में सुबह चार बजकर 55 मिनट तक सुनवाई हुई और याक़ूब के वकीलों की याचिका ख़ारिज कर डी गई | इसके साथ ही राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी एवं  महाराष्‍ट्र के राज्‍यपाल विद्यासागर राव ने भी याकूब की दया याचिका कर खारिज कर दिया। इस प्रकार राहत प्राप्त करने के उसके प्रयास विफल रहे | याक़ब को नागपुर केंद्रीय कारागार में सुबह सात बजे से कुछ देर पहले फांसी दे दी गई। यह सज़ा कई सवाल छोड़ गई , ख़ासकर यह कि जो शख्स 23 वर्ष क़ैद में रह चुका हो , उसे फांसी देने का क्या औचित्य है ? देश के कई नामी - गिरामी वकीलों और समाजसेवियों ने याक़ूब को फांसी से बचाने के सभी संभव प्रयास किए , जो आख़िरकार नाकाम रहे | जुलाई 1994 में याक़ूब मेमन को तब पकड़ा गया, जब वह काठमांडू [ नेपाल ] में एक वकील से भारत वापसी के बारे में सलाह लेने गया था | वकील उनका रिश्तेदार था | खबरों और रॉ के टेररिज़्म डिवीज़न के मुखिया बी रमन के लिखे एक लेख के मुताबिक़, उस समय उसे भारत लाया गया था और मामले में शामिल किया गया था | 2007 में याक़ूब को मौत की सज़ा दिए जाने और अभियोजन पक्ष द्वारा इस मामले में परिस्थितिजन्य तथ्यों को न रखे जाने से रॉ अधिकारी रमन नाराज़ हो गए थे | यह मामला सुप्रीमकोर्ट में भी चला और 29 जुलाई 15 को कोर्ट ने याक़ूब मेमन की फांसी की सजा बरकरार रखा। कोर्ट ने उसकी क्‍यूरेटिव पेटिशन पर दोबारा सुनवाई करते हुए उसे खारिज कर दिया। 
सुप्रीम कोर्ट में 29 जुलाई को जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई में तीन जजों की पीठ ने याकूब मेमन की उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें मेमन ने 30 जुलाई को निर्धारित अपनी फांसी पर रोक लगाने का आग्रह (क्‍यूरेटिव पेटीशन) किया। कोर्ट में मेमन की अर्जी पर दोनों पक्षों की बहस पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क्‍यूरेटिव पेटिशन पर तीनों जजों का फैसला सही था।
इसके एक दिन पहले 28 जुलाई को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की पीठ ने इस याचिका पर खंडित निर्णय दिया, जिससे मेमन की फांसी पर दो रायें उभरकर सामने आ गई थीं। 
जस्टिस ए.आर. दवे ने मौत के वारंट पर रोक लगाये बगैर उसकी याचिका खारिज कर दी, वहीं जस्टिस कुरियन की राय अलग रही और उन्होंने रोक का समर्थन किया। दोनों जजों के बीच किसी विषय पर अलग अलग राय होने पर पैदा कानूनी स्थिति के बारे में पूछे जाने पर पीठ को बताया गया कि यदि एक न्यायाधीश इस पर रोक लगाता है और दूसरा नहीं, तो फिर कानून में कोई व्यवस्था नहीं रहेगी। अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी और मेमन की ओर से पेश हुए राजू रामचंद्रन सहित वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि इस विषय को गौर करने के लिए प्रधान न्यायाधीश के हस्तक्षेप के साथ बड़ी पीठ को भेजा जाना चाहिए। न्यायमूर्ति दवे का नजरिया था कि 21 जुलाई को मेमन की उपचारात्मक याचिका को खारिज करने में कुछ खामी नहीं थी और महाराष्ट्र के राज्यपाल उसकी दया याचिका पर फैसला कर सकते हैं क्योंकि दोषी कैदी अपनी सभी कानूनी उपचारों का प्रयोग कर चुका है। शीर्ष अदालत की ओर से मेमन की उपचारात्मक याचिका पर फैसले में सही प्रक्रिया का पालन नहीं करने की बात कहने वाले न्यायमूर्ति कुरियन ने कहा कि इस खामी को दूर किया जाना चाहिए और उपचारात्मक याचिका पर नए सिरे से सुनवाई होनी चाहिए। जस्टिस ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में मौत के वारंट पर रोक लगाई जानी चाहिए। जस्टिस दवे ने इस मसले पर मनु स्मृति का एक श्लोक उद्धृत करते हुये कहा कि खेद है, मैं मौत के फरमान पर रोक लगाने का हिस्सा नहीं बनूंगा। प्रधान न्यायाधीश को निर्णय लेने दीजिए। इस स्थिति में इसे तीन जजों की पीठ के हवाले किया गया |
 जब इस मामले में जस्टिस ए.आर. दवे और जस्टिस कुरियन जोसेफ के बीच असहमति पैदा हुई , तो इस गंभीर मामले को प्रधान न्यायाधीश एच. एल. दत्तू को भेजा गया , जिन्होंने मेमन की किस्मत का फैसला करने के लिए जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस प्रफुल्ल सी पंत और जस्टिस अमिताव राय की बड़ी पीठ का गठन किया। इस पीठ पर बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी गई कि वह यह फ़ैसला करे कि 30 अप्रैल को मुंबई की टाडा अदालत की ओर से जारी मौत वारंट पर रोक लगाई जाए या नहीं और मेमन की याचिका के गुणदोष पर गौर किया जाए या नहीं। मेमन ने दावा किया था कि अदालत के सामने सभी कानूनी उपचार खत्म होने से पहले ही वारंट जारी कर दिया गया। 
 अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी का विचार था कि सुधारात्मक याचिका 21 जुलाई को खारिज होने के साथ ही एक तरह से दोषी को उपलब्ध सारे कानूनी विकल्प अब खत्म हो चुके थे , जबकि मेमन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन का दावा था कि मेमन की सुधारात्मक याचिका पर गौर करते समय शीर्ष अदालत ने सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया। राजू रामचंद्रन ने कहा कि सुधारात्मक याचिका लंबित होने के दौरान म्रत्यु की सज़ा का आदेश ही जारी नहीं किया गया, बल्कि टाडा अदालत ने मेमन को यह बताने का अवसर भी नहीं दिया कि क्या उसने उपलब्ध सारे कानूनी विकल्प अपना लिए हैं। उन्होंने मेमन को उसे फांसी दिए जाने की की तारीख की जानकारी देने में हुई देरी की भी आलोचना की। इस तारीख के बारे में उसे 13 जुलाई को बताया गया था। उन्होंने कहा कि टाडा न्यायाधीश ने मौत की सजा पर अमल के लिए 90 दिन का नोटिस दिया था लेकिन राज्य सरकार ने सिर्फ 17 दिन का नोटिस दिया। राज्य सरकार का आदेश समय पूर्व है। उन्होंने कहा कि 30 अप्रैल को मौत का फरमान जारी करने के मसले को चुनौती दी गई , जो इस अदालत की ओर से प्रतिपादित नियमों के आलोक में पूरी तरह मनमाना है। ऐसा लगता था कि जस्टिस कुरियन जोसेफ मेमन के वकील से सहमत थे , जब उन्होंने कहा कि शायद सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि सुधारात्मक याचिका शीर्ष अदालत के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के समक्ष जाने के बाद उस पीठ के पास भी जानी चाहिए थी जिसने उसकी मौत की सजा की पुष्टि के मामले में नौ अप्रैल, 2015 को पुनर्विचार याचिका पर अंतिम सुनवाई की थी।
जस्टिस कुरियन जोसेफ ने ऐसे मामलों में दोषी की ओर से राज्यपाल और राष्ट्रपति के दया याचिका दायर करने सहित विभिन्न प्रक्रियाओं के बारे में सवाल उठाए।  उन्होंने कहा कि खुले हाथों से रहम की मांग की जा रही है और यह सांविधानिक प्रक्रिया है।अटार्नी जनरल रोहतगी जब इस मामले के पूरे घटनाक्रम पर विस्तार से अपनी बात रख रहे थे तो इस दौरान जस्टिस कुरियन ने सुधारात्मक याचिका के बारे में कई सवाल किए | वे जानना चाहते थे कि सुधारात्मक याचिका की प्रक्रिया क्या होती है। रोहतगी ने जोर देकर कहा कि इस मामले से संबंधित किसी भी पहलू को 21 मार्च, 2013 के मूल फैसले के आलोक में देखना चाहिए। इसी फैसले के अंतर्गत न्यायालय ने मेमन को दोषी ठहराने और मौत की सजा देने के टाडा अदालत के 2007 के फैसले को सही ठहराया था ,क्योंकि तथ्य तो बदल नहीं सकते। उन्होंने कहा कि दया का सवाल भी न्यायिक प्रक्रिया पर नहीं ,बल्कि अपराध के तथ्यों पर निर्भर करता है। न्यायमूर्ति दवे ने एक मौके पर कहा कि अदालत गुण दोष के सवाल पर अब गौर नहीं कर सकता। इसमें फैसला करने के लिए अब और कुछ नहीं बचा है।
अटार्नी जनरल ने इस मामले में शीर्ष अदालत की कार्यवाही का जिक्र करते हुए कहा कि शीर्ष अदालत में 21 मार्च, 2013 को मौत की सजा की पुष्टि और 30 जुलाई को प्रथम पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद मेमन के भाई ने राष्ट्रपति के पास उसी साल अगस्त के पहले हफ्ते में दया याचिका दायर की, क्योंकि उस समय 14 अगस्त को उसे फांसी दी जानी थी। दया याचिका लंबित होने के दौरान उसकी सजा के अमल पर रोक लगा दी गई थी और उसकी याचिका राज्यपाल के पास भेज दी गई, जिन्होंने 14 नवंबर, 2013 को इसे अस्वीकार कर दिया था। बाद में राष्ट्रपति ने भी 11 अप्रैल, 2014 को अस्वीकार कर दिया था। पिछले दिनों याक़ूब मेमन को फांसी की सज़ा से बचाने के लिए कई सेवानिवृत्त जजों सहित विभिन्न क्षेत्रों के संभ्रांत जनों ने राष्ट्रपति से गुहार लगाई | चालीस लोगों के दस्तखतों के साथ राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की सेवा में पत्र लिखा गया |
इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले लोगों में वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी, कांग्रेस नेता मणि शंकर अय्यर. भाकपा महासचिव सीताराम येचुरी, वरिष्ठ वकील और पूर्व मंत्री प्रशांत भूषण, वरिष्ठ पत्रकार एन. राम, आनंद पटवर्धन , जस्टिस पणचंद जैन , जस्टिस एच . एस. बेदी , जस्टिस पी . बी . सावंत , जस्टिस के . पी . सिवा सुब्रह्मण्यम , जस्टिस एस . एन . भार्गव , जस्टिस के . चंद्रू , जस्टिस नाग मोहन दास , अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा , भाकपा सांसद डी . राजा , माकपा नेता प्रकाश करात , बृंदा करात , वरिष्ठ एडवोकेट के . टी . एस . तुलसी , तुषार गाँधी , नसीरुद्दीन शाह और महेश भट्ट के नाम शामिल हैं। इस पत्र रूपी याचिका में कहा गया, 'हम इस पत्र के जरिए महामहिम से अनुरोध करते हैं कि फांसी पर रोक लगाई जाए।'लिखा गया कि इस पत्र को दया याचिका मानकर याकूब की सजा पर फिर से विचार किया जाए। याकूब पिछले 20 वर्षों से पैरानाइड स्क्रित्जोफ्रेनिया से पीड़ित है और इस आधार पर वह फांसी के लिए शारीरिक रूप से अनफिट है। जेल के डॉक्टरों ने भी उसकी मानसिक स्थिति की पुष्टि की है।" ज़ाहिर है , इन सब प्रक्रियाओं के बीच याक़ूब को फांसी की सज़ा दे दी गई |

Jul 28, 2015

निजता का अधिकार ?


- डॉ . मुहम्मद अहमद 
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह सवाल उठा कर सबको चौंका दिया कि ‘क्या निजता का अधिकार मूल अधिकार माना जा सकता है ?’ यह सवाल इसलिए भी व्यर्थ है , क्योंकि सुप्रीमकोर्ट ने अपनी कई व्याख्याओं में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकारों के तहत माना है | केंद्र सरकार निराधार ' आधार ' के चक्कर में तरह - तरह की दलीलें दिए जा रही है | केंद्र सरकार की ओर से ' आधार ' को आधार प्रदान करने के लिए बहस करते हुए अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने अदालत में कहा कि संविधान निजता के अधिकार को मान्यता नहीं देता।
 उन्होंने इस सिलसिले में दो दशकों में सुप्रीम कोर्ट की ओर दिए उन फैसलों पर पुनर्विचार करने को कहा जिनमें निजता के अधिकार को मूल अधिकार के तौर पर परिभाषित किया गया है। उल्लेखनीय है कि बिना संसद की मंज़ूरी और शीर्ष अदालत की मुहर के ' आधार ' की घोड़ा बुरी तरह कांग्रेस नीत केंद्र सरकार ने दौड़ाया था , उसी सरपट चाल को मोदी सरकार भी पकड़े हुए है ! जबकि इसी वर्ष 16 मार्च को सुप्रीमकोर्ट इसकी अनिवार्य्रता पर रोक लगा चुकी है | फिर भी मोदी सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा | वह बस इसी की लगातार रट लगाये हुए है | 
उसे इसके दुरूपयोग की भी परवाह नहीं ! कुछ ईष्ट देवों के अतिरिक्त कुत्ते - बिल्ली के भी आधार बन चुके हैं और कुछ सीनियर सिटीजन के हाथ के निशान घिस जाने या कैमरे पर न आने के कारण उनके ' आधार ' बनाने से इन्कार कर दिया गया है ! फिर भी सरकार पुख्ता व्यवस्था बनाने का दम भर रही है ! आधार योजना पर उठी आपत्तियों को लेकर कुछ आपत्तियों पर केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा कि आधार योजना को लागू करने के लिए ‘पुख्ता व्यवस्था’ होगी और कल्याणकारी कार्यक्रम को निरस्त करने के लिए निजता के अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकार नहीं है। 
न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष अटार्नी जनरल ने कहा, ‘निजता का अधिकार हमारे संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकार नहीं है। यह अधिकार एक अन्य अधिकार से मिलता है। संविधान निर्माताओं की मंशा निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की नहीं थी।’
उन्होंने कहा, निजता के लिए कोई मौलिक अधिकार नहीं है, इसलिए अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिकाएं खारिज की जानी चाहिए। इस पर पीठ ने कहा कि वह इस मामले को संविधान पीठ के पास भेजना चाहता है। आधार कार्ड को वेतन, भविष्य निधि वितरण और विवाह व संपति के पंजीकरण जैसी तमाम गतिविधियों के लिए अनिवार्य बनाने के कुछ राज्यों के फैसलों के खिलाफ दायर याचिकाओं पर अदालत सुनवाई कर रही है।
अटार्नी जनरल ने कहा कि इसमें किसी अधिकार के हनन का सवाल ही नहीं उठता। वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अटार्नी जनरल की इन दलीलों का विरोध किया। सुप्रीमकोर्ट ने पूर्व के अपने फ़ैसलों में निजता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत आजादी के अधिकार के तहत एक मौलिक अधिकार माना है, लेकिन यह अधिकार ऐसा नहीं है, जिसमें कोई कटौती नहीं की जा सकती है। 
अमेरिकी नागरिकों को यह अधिकार प्राप्त है , हालाँकि यह अधिकार उन्हें बहुत विलंब से मिला | अमेरिका में अदालतों ने इस अधिकार की रक्षा 19वीं सदी के अंत तक नहीं की क्योंकि कॉमन लॉ ने इसे मान्यता नहीं दी थी। इसे मान्यता तब मिली जब चार्ल्स वारेन तथा लूई ब्रैंडाइस ने हार्वाड लॉ रिव्यू (1890) में एक ऐतिहासिक लेख लिखा- ‘द राइट टू प्राइवेसी’। निजता के अधिकार से संबंधित सैकड़ों मामले अमेरिकी अदालतों के समक्ष आये | पहली बार इस मामले में न्यूयॉर्क ऐपेलेट कोर्ट ने रॉबर्सन बनाम रोचेस्टर फोल्डिंग बॉक्स कम्पनी (1902) में इस पर विचार किया और प्रतिवादी को इस अधिकार के उल्लंघन के लिए दोषी करार दिया। 
फिर ग्रिसवर्ल्ड मामले (1965) में जस्टिस डगलस ने कहा कि भले ही बिल ऑफ राइट्स में इस अधिकार का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, यह अन्य अधिकारों में निहित है। अमेरिका में ' आधार ' नहीं पाया जाता | भारतीय सुप्रीमकोर्ट ने आर. बनाम गोविंद (1975) विवाद में अमेरिकी अदालत के स्टैंड का हवाला दिया था । यह सच है कि सार्वजनिक हित महत्वपूर्ण होते हैं , परन्तु  ' आधार ' के मामले में पुख्ता तौर पर ' सार्वजनिक हित ' सामने नहीं आ सका है | आकड़ों आदि के दुरूपयोग का संशय अलग से बना हुआ है |
 

Jul 2, 2015

पुलिस की कारकर्दगी में बड़े बदलाव की ज़रूरत

पुलिस की कारकर्दगी में बड़े बदलाव की ज़रूरत 
हमारे देश में पुलिस की कार्यशैली अक्सर विभिन्न सवालों के घेरे में रहती है | यह अपनी नियंत्रक सरकार की ग़ुलाम बनी रहती है | यह महत्वपूर विभाग आज़ादाना काम करे , इसके नसीब में नहीं है ! अतएव निष्पक्ष कार्रवाई इसके बस की बात नहीं !! फिर सत्तारूढ़ राजनेताओं का बल बनी पुलिस से न्याय और इन्साफ की कैसे आशा की जा सकती है ? यह तथ्य भी बार - बार उजागर हो चुका है कि राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण भी वे अपराध बढ़े हैं , जिन्हें पुलिस ख़ुद अंजाम देती और दिलवाती है | उत्तर प्रदेश की पुलिस कार्य - प्रणाली को देखें , तो यह तथ्य और भी साफ़ हो जाता है , जहाँ अपराधिक भ्रष्टाचार के साथ जातिवाद का बोलबाला है | नतीजा यह है कि एक ही जाति - यादव की पुलिस के उच्च पदों पर भरमार हो गई है | बिहार पुलिस आज के युग में भी जातीय आधार चूल्हा - चौके का इन्तिज़ाम करवाती है | इस अफ़सोसनाक सूरतेहाल में पुलिस की कार्यप्रणाली और विवेचना कैसी होगी , सभी को सहज ही समझ में आ सकती है | उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार के चहेते मंत्री राम स्वरुप वर्मा ने अभी जो आपराधिक गुल खिलाया , उससे सारी दुनिया अवगत हो चुकी है | पुलिस कोतवाल श्रीप्रकाश राय ने अपने साथ चार पुलिसकर्मियों को शाहजहांपुर के पत्रकार जागेन्द्र सिंह को मंत्री वर्मा के कहने पर विगत एक जून 15 को जिन्दा जला दिया , फिर भी इन सबको निलंबन की दिखावटी कार्रवाई के बाद साफ़ बचा लिया गया | पुलिस ने पूरे मामले को गलत ढंग से विवेचित कर दिया ! पुलिस की खराब कार्यप्रणाली और गलतकारी से पुलिस सुधार आयोग सदैव चिन्तित रहता है | उसका मानना रहा है कि पुलिस का तौर - तरीक़ा सन्तोषजनक नहीं रहता , जिसके कारण जनता को न्याय नहीं मिल पाता और उसे तरह - तरह की परेशानियाँ उठानी पडती हैं | अतः आयोग पुलिस तंत्र में सतत सुधार की सिफ़ारिशें करता रहता है , फिर भी इन पर ध्यान न देना और इन्हें अमल में न लाना सचमुच हैरानकुन और चिंताजनक है | पुलिस सुधार आयोग की सिफ़ारिशों में एक महत्वपूर्ण सिफ़ारिश थानों में पुलिस प्रशासन से अलग एक विवेचना इकाई की स्थापना है , ताकि मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई संभव हो सके | ऐसी सिफ़ारिश विवेचना अधिकारियों द्वारा दबाव में काम करने एवं इस प्रकार न्याय की जगह अन्याय का पैरोकार बनने की शिकायतों के कारण की गयी है | पुलिस निरंकुशता के बेशुमार मामले हैं | ऐसा ही एक और मामला मेरठ का सामने आया था |  पिछले वर्ष 2014 के आरंभिक काल में एसआई अरुणा राय द्वारा आईपीएस अधिकारी डीपी श्रीवास्तव पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने के बाद जिस तरह से यह मामला सामने आया कि सीओ रैंक की विवेचनाधिकारी सरवन जीत कौर ने मुकदमें से गैरजमानती धाराओं को हटाकर श्रीवास्तव की जमानत का रास्ता साफ किया गया , उसने एक बार फिर पुलिस की विवेचना पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए | 
आरोपी आईपीएस को जमानत दिलाने वालों को अरुणा ने सहअभियुक्त कह कर उनके साथ हुए अन्याय में विवेचनाधिकारी को भी बराबर का दोषी माना है | उन्होंने बड़ी मुश्किल से उक्त आई पी एस अफ़सर के ख़िलाफ़ एफ़ आई आर दर्ज करायी थी और अब विवेचना अधिकारी ने मामले को काफ़ी हल्का बनाने में कोई कोई कसर नहीं छोड़ी है | ऐसे भी आरोप लगते रहे हैं कि मामला जब राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी का या अल्पसंख्यक या दलित समाज का होता है , तो यह स्वेच्छाचार - भ्रष्टाचार कुछ अधिक ही बढ़ जाता है | इन सारी बुराइयों की जड़ सत्ता व पुलिस का नापाक एवं कलुषित गठजोड़ है , जो एक दूसरे के मनोबल के प्रति इतना फिक्रमंद होता है कि आम नागरिक का मनोबल बरक़रार न रह सके | देखा जाता है कि इस पूरे मनोबल को बचाने में विवेचनाधिकारी लगा रहता है, जो सबूतों का अभाव खड़ा कर उन्हें बरी करवाने की कोशिश करता है | चिंता की बड़ी बात यह भी है कि आजकल सीबीआई भी दबावों और प्रभावों से मुक्त नहीं है |से मुक्त नहीं है | अल्पसंख्यकों के मामले में पुलिस की भूमिका क्या होती है ? इसे हम बार - बार देखते और भुगतते हैं | एक मिसाल देखिए -  सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर-शामली व आस-पास के जिलों में सांप्रदायिक हिंसा के दौरान मुस्लिम महिलाओं के साथ हुए बलात्कार के मामलों में तीन हफ्ते से अधिक समय बाद एफ़ आई आर  दर्ज हो पाती है |  बलात्कार जैसे जघन्यतम अपराध जिसमें पीडि़ता की तहरीर के बाद प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करते हुए 24 घंटे के भीतर पीडि़ता का चिकित्सकीय परीक्षण कराने का निर्देश है, वहां हफ्तों की जाने वाली पुलिस की यह देरी बलात्कारी को बचाने की हर संभव कोशिश होती है | सवाल यह भी उठता है कि मुजफ्फरनगर ही नहीं देश में ऐसे तमाम दलित व अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा में पुलिस की इस आपराधिक कार्यशैली को क्या विवेचनाधिकारी अपनी विवेचना में शामिल करता है, तो इसका जवाब न में होगा | सर्वोच्च न्यायालय  विवेचनाधिकारी को एक स्वंतंत्र जांच अधिकारी के बतौर कार्य करने की बात कहता है | देश में पुलिस द्वारा की गई फर्जी मुठभेड़ों की जांच चाहे वह  यूपी के सोनभद्र में रनटोला कांड, जहां इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दो छात्रों को डकैत बताकर की गई हत्या का मामला हो या फिर उत्तराखंड के रणवीर हत्याकांड इन सभी में विवेचनाधिकारी ने पुलिस अधीक्षक का नाम न लेकर उसे बचाने का कार्य किया है , जबकि सजा पाने वाले पुलिस कर्मियों ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि ऐसा उन्होंने एसपी के कहने पर किया था | निष्पक्ष विवेचना न्याय का आधार होती है| इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ कांड को कौन भूल सकता हैं, जिसमें राज्य के पुलिस अधिकारियों पर राज्य सरकार के संरक्षण में हत्या का आरोप है, वहां पर भी इसे साफ देखा जा सकता है | वहीं उत्तर प्रदेश में आतंकवाद के नाम पर फर्जी तरीके से गिरफ्तार किए गए तारिक-खालिद की गिरफ्तारी पर गठित निमेष कमीशन, गिरफ्तारी को संदिग्ध मानते हुए पुलिस के अधिकारियों को दोषी माना , वहीं इस मामले के विवेचनाधिकारी ने पुलिस की गिरफ्तारी को सही माना | 18 मई 2013 को खालिद मुजाहिद की हत्या कर डी गई थी , जिसमे कई पुलिसवाले आरोपित हैं | इस मामले की सीबीआई जाँच भी मनरेगा की तरह बहुत ही धीमी गति से चल रही है | इसी तरह छत्तीसगढ़ में सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर डालने वाले पुलिस अधिकारियों में से एक एसपी अंकित गर्ग को राष्ट्रपति द्वारा स्वर्ण पदक से सम्मानित किया जा चुका है ! यह एक बड़ी विडंबना है | अतः पुलिस की कार्यशैली में आमूल सुधार की ज़रूरत है |