Aug 31, 2015

मज़दूरी देने से बलरामपुर वन प्रभाग अब कैसे करेगा इन्कार ?

धरना - प्रदर्शन और मामले को हाईकोर्ट ले जाने की तैयारी 
वाचर ने दिया पुख्ता सबूत मज़दूरी देने से बलरामपुर 
वन प्रभाग अब कैसे करेगा इन्कार 

उल्लेखनीय है कि इन श्रमिकों में से चार श्रमिकों - रामफल कृपाराम बड़कऊ और राम बहादुर को मज़दूरी अदा करने की बात प्रभागीय वनाधिकारी करते हैं जबकि ये श्रमिक भी मजदूरी मिलने से इन्कार करते हैं बनकटवा वन क्षेत्र के पूर्व फारेस्ट गार्ड नूरुल हुदा तो किसी भी श्रमिक को पहचानने तक से इन्कार करते हैं जबकि उनके और वाचर सिया राम द्वारा विभिन्न अवधियों में काम लिया गया था |
वाचर सिया राम ने लिखित रूप में माना है कि श्रमिकों से काम लिया पांच जनवरी 2015 को कलमबंद की गई उनकी तहरीर इस प्रकार है -
'' मैंने 13 जनवरी 2014 से 26 मार्च 2014 के बीच विभिन्न अवधियों में ग्राम मैनडीह और टेंगनवार निवासी गण सर्वश्री केशव राम राम वृक्ष मझिले यादव राम बहादुर बड़कऊ यादव कृपा राम खेदू यादव राम प्यारे शिव वचन शंभू यादव संतोष कुमार यादव रामफल आदि से वृक्षारोपण और झाड़ी की सफ़ाई आदि का कार्य लिया फारेस्ट गार्ड नूरुल हुदा की निगरानी में मैंने यह कार्य कराया बिना किसी भय दबाव के शांत चित्त के साथ उक्त लिखित तथ्यों को पढ़वा कर - समझ बूझ कर ही मैंने इस तहरीर पर अंगूठा लगाया है |'' 
इस तहरीर पर गवाह के तौर पर मैनडीह ग्राम के निवासी राजकुमार मिश्रा और रामकुमार के हस्ताक्षर हैं मजदूरों ने बताया कि वे अपनी मज़दूरी लेने के लिए धरना - प्रदर्शन और लेबर कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं रिहाई मंच लखनऊ के वरिष्ठ नेता श्री राजीव यादव ने बताया कि यदि बलरामपुर वन विभाग इस मामले में त्वरित कार्रवाई करके सभी श्रमिकों को उनकी मज़दूरी अदा नहीं करता तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय में पी .आई . एल दाख़िल किया जाएगा |    
ज्ञातव्य है कि उक्त श्रमिक अपनी मज़दूरी को पाने के लिए विभिन्न उच्चाधिकारियों से लिखित रूप में निवेदन के चुके हैं लेकिन कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं की गई कह दिया गया कि किसी ने काम ही नहीं लिया गया फिर कहा कि हाँ चार ने कार्य किया लेकिन श्रमिकों के अनुसार ,उन्हें भी मज़दूरी भुगतान नहीं गई ! बनकटवा के रेंजर पी. डी . राय लिखते हैं कि ‘’ स्पष्ट है कि जब दि . 28 – 1 – 14 को काम प्रारंभ हुआ तो दिनांक 26 – 3 – 14 जैसा कि शिकायतकर्ता ने अपने [ अपनी ] शिकायत में लिखा है | शिकायतकर्ता द्वारा कैसे 70 दिन काम किया गया | ‘’ इस तथ्य के विपरीत अब प्रभागीय वनाधिकारी एस . एस . श्रीवास्तव लिखते हैं कि ‘’ शिकायतकर्ता श्रमिकों द्वारा कार्य करने की समयावधि दिनांक 13 – 01 – 2014 से 26 – ०३ – 2014 तक बताई गई है’’ , जो 70 दिन से अधिक है |     
लेकिन एक आर . टी . आई . के उत्तर में बलरामपुर के प्रभागीय वनाधिकारी श्री श्रीवास्तव ने बहुत - से तथ्यों को छिपा लिया है आरोप है कि वे भ्रष्टाचारियों को प्रश्रय दे रहे हैं | ' कान्ति '[ साप्ताहिक ] के उपसंपादक मुहम्मद यूसुफ मुन्ना ने सूचना आयुक्त लखनऊ के पास इस मामले को पेश किया है उन्होंने अपनी शिकायत का आधार संबंधित अधिकारी के भ्रामक अपूर्ण टालू तथ्यों को छिपानेवाला अकर्मण्यतापूर्ण जवाब और सूचनाधिकार अधिनियम के प्रावधानों के विरुद्ध बताया हैं 
सूचना आयुक्त को लिखित रूप में बताया गया है कि सूचनाधिकार अधिनियम 2005 के अध्याय 1 - प्रारंभिक अध्याय 2 - '' सूचना का अधिकार और लोक प्राधिकारियों की बाध्यताएं '' शीर्षक के अंतर्गत अनुच्छेद  4  में लिखा है कि '' डिस्केट फ्लापी टेप वीडियो कैसेट के रूप में या किसी अन्य इलेक्ट्रानिक रीति में या प्रिंटआउट के माध्यम से सूचना को जहाँ ऐसी सूचना किसी  कम्प्यूटर या किसी अन्य युक्ति में अंतरित है अभिप्राप्त करना | ''
अपने उत्तर में प्रभागीय वनाधिकारी सोहेलवा वन्य जीव प्रभाग बलरामपुर [ उत्तर प्रदेश ] ने किसी दस्तावेज को संलग्न नहीं किया है और बार - बार वेब पोर्टल देखने को निर्दिष्ट किया है जो कानून के विरुद्ध है उत्तर की अन्य बातें भ्रामक अपूर्ण और नियम के प्रतिकूल हैं -
1 . प्रश्न संख्या के उत्तर में कहा गया है कि 20.12.2014 को शिकायत का पत्र प्राप्त हुआ जिसका उत्तर 16.01.2015 को दिया गया ज्ञातव्य है कि मनरेगा पोर्टल पर यह शिकायत ऑनलाइन 03.08.2014 को की गई थी यह उत्तर भ्रामक है यह पोर्टल 01 . 06 . 15 से भुगतान न होने के कारण बंद कर दिया है जो आज की तिथि तक बंद है 
2.  प्रश्न संख्या कर उत्तर में अपूर्ण जानकारी दी गई है यह नहीं बताया गया कि मजदूरी का भुगतान किस विधि से और किन बैंक खातों में किया गया जबकि इस बाबत पूर्ण विवरण उपलब्ध कराने की सूचना मांगी गई थी मजदूरों के अनुसार उन्हें न तो बैंक खातों या अन्य किसी माध्यम से मजदूरी का भुगतान किया गया है उत्तर में यह सूचना स्पष्ट रूप से छिपा ली गई है इस प्रश्न के उत्तर में मनरेगा पोर्टल देखने की बात लिखी गई है |
3. प्रश्न के उत्तर में भी भ्रामक जानकारी दी गई है कहा गया है कि मनरेगा मजदूरों की समस्याओं के निदान हेतु कोई सरकारी दिशा - निर्देश / अधिसूचना कार्यालय में मौजूद नहीं है उल्लेखनीय है कि इस बाबत सरकारी अधिसूचना संख्या 1308/38 - 7 - 09 - 45 एन . आर . ई . जी . ए . - 08 के अंतर्गत शिकायत निवारण तंत्र नियमावली 2009 मौजूद है जो 24 सितंबर 2009 से लागू है |    
4 . प्रश्न के उत्तर में कोई दस्तावेज न देकर मनरेगा वेब पोर्टल को देखने को निर्दिष्ट किया गया है जो सूचनाधिकार कानून के विरुद्ध है 
5 . प्रश्न का उत्तर भी अपूर्ण है यह कहकर दस्तावेज नहीं प्रदान किया गया कि वॉउचर्स पर कार्य नहीं लिया जाता बल्कि मस्टर रोल जारी किया जाता है और इसे ब्लाक को वापस कर दिया जाता है अर्थात विभाग के पास कोई रिकार्ड नहीं  रहता यह उत्तर भी भ्रामक और अपूर्ण है |     
 बलरामपुर वन विभाग की कार्य प्रणाली से राज्य सरकार भी असंतुष्ट है अभी पिछले दिनों वन एवं युवा कल्याण राज्यमंत्री फरीद महफूज किदवाई ने बलरामपुर के वनाधिकारियों को अवैध रूप लगातार काटे जा रहे पेड़ों और वन माफ़िया को पनपाने पर कड़ी फटकर लगाई | उन्होंने कहा कि बलरामपुर जिले में वन सुरक्षित नहीं है। जंगल काटने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। जंगल से पेड़ों के अवैध कटान को रोकने के लिए जिले में परमिट जारी करने पर रोक लगाने पर भी विचार किया जाएगा। क्योंकि यहां बड़ों (सफेदपोश) के संरक्षण में वनों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। इसके लिए मुख्यमंत्री से सीधी बात करूंगा।
लखनऊ से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक के विगत छह अगस्त के अंक में प्रकाशित खबर पर संज्ञान लेकर उत्तर प्रदेश के वन एवं युवा कल्याण राज्यमंत्री फरीद महफूज किदवई ने सोहेलवा जंगल के बरहवा रेंज का औचक निरीक्षण किया। मंत्री महोदय खबर में इंगित गनेशपुर व गदाखैव्वा बीट तक गए। गनेशपुर बीट का उन्होंने चीफ कंजरवेटर उरबिला थामस  और प्रभागीय वनाधिकारी एस .एस . श्रीवास्तव के साथ निरीक्षण किया। 
राज्यमंत्री के मुताबिक़ गनेशपुर बीट में करीब सौ बूट (जड़) मिले हैं। इनमें कई पुराने है जिनमें नंबर पड़ा है लेकिन पांच बूट नए कटान के भी मिले हैं। सोहेलवा जंगल में पेड़ों की कटान अंधाधुंध हो रही हैं। इस कार्य में बड़े लोगों का लकड़ी काटने वालों को संरक्षण मिला है। जिम्मेदार अधिकारी भी जानकर अनजान बने बैठे हैं। यह स्थिति ठीक नहीं है। वन की सुरक्षा मुख्यमंत्री की प्राथमिकता में है। गनेशपुर व गदाखौव्वा बीट सहित जंगल में काटे गए पेड़ों की सजा जिम्मेदारों को मिलेगी। राज्य मंत्री ने कहा कि वे मुख्यमंत्री से मुलाकात कर स्थिति से अवगत कराएंगे। किसी को बख्शा नहीं जाएगा। इसमें कार्रवाई तय है। राज्यमंत्री से आसपास के गांव के लोगों ने पेड़ काटने वालों का नाम भी बताया।

Aug 22, 2015

मरहबा आबिद !

मरहबा आबिद !
- डॉ . मुहम्मद अहमद  
इस्लाम की एक बड़ी शिक्षा ईमानदारी और नैतिकता है | वास्तव में नेकी और ईमानदारी इन्सान के जीवन में चार चाँद लगा देते हैं | ऐसा ही कुछ 26 वर्षीय आबिद कुरैशी के जीवन में हुआ | जयपुर के रहनेवाले रिक्शा चालक आबिद गरीब होने के बावजूद ईमानदारी के बेमिसाल उदाहरण बन गए हैं। पिछले दिनों इस रिक्शे वाले को सड़क पर 1 लाख 17 हजार रुपए पड़े मिले , लेकिन ये रुपए आबिद की ईमानदारी को डिगा नहीं पाए और उसने ये रुपए पुलिस को लौटा दिए। इस तरह उसने आज के दौर में ईमानदारी का नया अध्याय जोड़ा |
आबिद के जीवन के बारे में पता चला चला कि वह बेहद तंगी में बसर करता है , मगर किसी के आगे हाथ नहीं फैलता | उसका गैरत और स्वाभिमान उसके चेहरे पर झलकता है | वह बेहद दीनदार है | पांचों वक्त की नमाज़ों का पाबन्द है | वह रिक्शा चला कर रोजाना 200 से 300 रुपए कमा लेता है उसे जब जयपुर में गत 12 अगस्त 15 को गवर्नमेंट होस्टेल के पास की सड़क पर रुपयों से भरा बैग मिला , तो बिना किसी लोभ - लालच उसे संबंधित व्यक्ति तक पहुँचाने का अनुरोध करते हुए उसने पुलिस स्टेशन जाकर पुलिस अधिकारी को सौंप दिया
पुलिस कमिश्नर श्रीनिवास राव ने आबिद की ईमानदारी की तारीफ करते हुए कहा, 'उसने बहुत ही महान काम किया है वह कभी स्कूल नहीं गया, गरीब है लेकिन ईमानदारी के मामले में बहुत ही अमीर है। आबिद ने हम सबके सामने एक उदाहरण पेश किया है।'
सहायक पुलिस अधीक्षक भंवर सिंह ने कहा, 'आबिद अपनी बेटी की शिक्षा और शादी में आने वाले खर्च के लिए एक-एक रुपए जोड़ता है ऐसे में उसकी ईमानदारी काबिले तारीफ है। उन्होंने कहा कि निश्चित रुप से उसने महान काम किया है | '
आबिद से जब पत्रकारों ने पूछा कि क्या उसके दिमाग में एक बार भी रुपए अपने पास रखने का खयाल आया तो आबिद ने कहा, 'ईमानदारी सबसे बड़ी नियामत है। कुरआन पाक में लिखा है जिसके पास ईमान होता है वह जन्नत का हकदार होता है।आबिद ने बताया, 'मैं अपनी आजीविका रिक्शा खींचकर चलाता हूं। बुधवार को 4 बजे एक स्टोर पर कुछ सामान छोड़कर आ रहा था तभी लौटते हुए मुझे सड़क पर रुपए से भरा एक बैग मिला। मैं उस वक्त थोड़ा घबराया हुआ था लेकिन फिर मैं गवर्नमेंट सर्कल के पास रात के 10 बजे तक खड़ा रहा लेकिन कोई उसे लेने नहीं आया। इसके बाद मैं घर पहुंचा और अपनी पत्नी को पूरा वाकया सुनाया।आबिद की पत्नी अमीना बानो ने कहा, 'मैंने उन्हें कहा कि ये रुपए जिसकी अमानत है उसे लौटा दीजिए। मोहल्ले की एक टीचर ने हमारी इसमें मदद की।
इतना ही नहीं हुआ | मीडिया में आबिद की ईमानदारी की खबर आने के बाद 66 साल के लालचंद नागपाल ने फ्लाइट पकड़ी और बेंगलुरु से जयपुर आ गए। कारण था आबिद से मिलना | उसे पुरस्कृत करना , जबकि आबिद कहते हैं कि उन्होंने किसी बदले या पुरस्कार के लिए नेकी नहीं की | उसे पूरा यक़ीन है कि उसके सुकर्म का बदला अल्लाह तआला देगा लालचंद आबिद और उसके परिवार से मिलने गए। इनाम के तौर पर लालचंद ने पुलिस कमिश्नर श्रीनिवास राव की मौजूदगी में आबिद को ई-रिक्शा दिया। लालचंद ने बताया , 'मैंने बेंगलुरु में आबिद के बारे में खबर पढ़ी और बहुत प्रभावित हुआ। आज के जमाने में अगर आपके 100 रुपए भी गिर जाएं तो आप उन्हें वापस मिलने की उम्मीद नहीं कर सकते और इस शख्स ने गरीब होते हुए भी एक लाख से ज्यादा की रकम वापस कर दी। उसकी कमाई बढ़ाने के लिए मैंने उसे ई-रिक्शा दिया।'
इस मौक़े पर कमिश्नर राव ने कहा, 'अच्छा काम करने का यह सबसे अच्छा उदाहरण है। एक इंसान ने ईमानदारी दिखाई और दूसरे ने उसका इनाम दिया। ये हमारे समाज के असली हीरो हैं।'

अपनी पत्नी अमीना और बेटी अनम के साथ मौजूद आबिद ने कहा, 'मुझे इस तरह के इनाम की उम्मीद नहीं थी। पैसा लौटाने के बाद मुझे टीवी चैनल और एफएम चैनल पर इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था। अगले दिन जब मैं एक डॉक्टर के पास गया तो उन्होंने मुझसे पैसे नहीं लिए। डॉक्टर ने कहा कि वह भी मेरी ईमानदारी से खुश थे।' ज़ाहिर हैं , आज के दौर जब नैतिक मूल्य छिन्न - भिन्न हो रहे हों , लोगों से उसूल पसंदी उठ रही हो , ऐसे में आबिद का यह कारनामा यक़ीनन बहुत सराहनीय और अनुकरणीय है |

मुस्लिम सेनानियों की उपेक्षा क्यों ?

मुस्लिम सेनानियों की उपेक्षा क्यों ?


- डॉ . मुहम्मद अहमद
यह बड़े अफ़सोस और चिंता की बात है कि देश के स्वतंत्रता संग्राम के मुस्लिम सेनानियों का किसी भी रूप में उल्लेख तक नहीं किया जाता | जबकि ऐसी अनगिनत मुस्लिम हस्तियां और विभूतियाँ इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं , जिन्होंने स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय व बहुमूल्य योगदान किया ! ब्रिटिश राज की नींव हिला दी और उन्हें भारत छोड़ने के लिए विवश किया | अनेक  मुस्लिम क्रांतिकारियों, कवियों और लेखकों ने अपने प्राणों की बाज़ी लगा दी , हज़ारों की संख्या में इन्हें शहीद किया गया | मगर हमने इन्हें भुला दिया या यूँ कहें , जानबूझकर इनके योगदानों को भुला दिया गया ! प्रख्यात समाजसेवी एवं चिंतक राम पुनियानी जी लिखते हैं , '' मुस्लिम नेताओं को स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में वह स्थान नहीं मिला , किसके वे लायक़ थे | हमारे कई शिक्षाविदों , इतिहासकारों , पाठ्य पुस्तक लेखकों और सबसे बढकर राजनीतिज्ञों की सांप्रदायिक सोच के कारण इन मुस्लिम नेताओं की स्वाधीनता आन्दोलन में महती भूमिका को भुला दिया गया या फिर उसे बहुत ही कम स्थान दिया गया |  '' [ ' चौथी दुनिया ', हिंदी में प्रकाशित एक लेख का अंश ] इसी सांप्रदायिक सोच का उल्लेख एक अन्य विचारक जगदीश्वर चतुर्वेदी इन शब्दों में करते हैं , '' इसके विपरीत भारत के मुसलमानों ने अनेक विपरीत परिस्थितियों में रहकर भी भारत के स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अनेक मुस्लिम नेताओं ने ....  क्रांतिकारी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। ब्रिटिश शासन के खिलाफ मुसलमानों की देशभक्तिपूर्ण भूमिका को हमें हमेशा याद रखना चाहिए।मिसाल के तौर पर रौलेट एक्ट विरोधी आंदोलन और जलियांवाला बाग कांड में 70 से अधिक मुसलमान शहीद हुए। इनकी शहादत को हम कैसे भूल सकते हैं ? आरएसएस के दुष्प्रचार अभियान में मुसलमानों को जब भी निशाना बनाया जाता है तो उनके देशप्रेम और कुर्बानी की बातें नहीं बतायी जाती हैं। हमारे अनेक सुधीजन फेसबुक पर उनके प्रचार के रोज शिकार हो रहे हैं। ऐसे लोगों को हम यही कहना चाहेंगे कि मुसलमानों के खिलाफ फेसबुक पर लिखने से पहले थोड़ा लाइब्रेरी जाकर इतिहास का ज्ञान भी प्राप्त कर लें तो शायद मुसलमानों के प्रति फैलायी जा रही नफरत से इस देश को बचा सकेंगे। '' [ ' प्रवक्ता डॉट काम ' ]
भारतीय इतिहास पर निगाह रखनेवाले सुगमता के साथ जानते हैं कि स्वाधीनता आन्दोलन में सात प्रमुख मुस्लिम संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई , जिनके नाम हैं - 1 , मजलिसे अहरार 2 , खुदाई खिदमतगार 3 , खिलाफत कमेटी 4 . कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस 5 , जमीअतुल उलमा 6 , अंजुमने वतन बलूचिस्तान , और 7 . प्रजा कृषक पार्टी | एक दस्तावेज़ी रिपोर्ट के अनुसार , स्वतंत्रता आन्दोलन में गिरफ्तार किए गए मुसलमानों की कुल संख्या दो लाख 77 हज़ार है | साथ ही शहीद किए गए मुसलमानों की संख्या हज़ारों में है | उदाहरण के तौर पर कुछ आंकड़े इस प्रकार हैं -  1930 में सूबा सरहद [ सीमान्त प्रदेश ] में तीन हज़ार मुसलमानों को गोलियों से उडा दिया गया , जबकि चार हज़ार नामर्द बनाये गए और चालीस हज़ार गिरफ्तार किए गए | इसी वर्ष पंजाब में चार हज़ार , उत्तर प्रदेश में दस हज़ार , बिहार में तीन हज़ार , असम में तीन हज़ार , बंगाल में चार हज़ार , बम्बई में तीन हज़ार और सिंध में तीन हज़ार मुसलमान गिरफ्तार किए गए | एक रिकार्ड के अनुसार , भारतीय स्वाधीनता संग्राम में गिरफ्तार मुसलमानों की कुल संख्या लगभग दो लाख 77 हज़ार है |   
देश के स्वतंत्रता आन्दोलन में लाखों मुसलमान भी शामिल हुए , जिनमें से बहुतों का नाम तक अज्ञात है | इन मुस्लिम सेनानियों के नामों की सूची में कुछ के नाम निश्चय ही सर्वोपरि हैं | प्रस्तुत विशेषांक में ऐसी ही कुछ शख्सियतों के कुछ कारनामों का उल्लेख भर किया गया है | प्रसिद्ध विद्वान मौलाना शाह वलीउल्लाह [ रह .]  ने  मुसलमानों में लक्ष्य - प्राप्ति की खातिर राजनीतिक चेतना जगाने का महत्वपूर्ण काम अंजाम दिया | इसी क्रम में मौलाना शाह अब्दुल अजीज़ और हाजी इम्दादुल्लाह के योगदानों को कोई कैसे नकार सकता है | महान क्रन्तिकारी मौलाना महमुदुल हसन और उबैदुल्लाह सिन्धी के कारनामे तो स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हैं , लेकिन राजनीति और कूटनीति के धनी मौलाना मुहम्मद मियां अंसारी के योगदान से दुनिया अनभिज्ञ  नहीं है | यह बात दूसरी है कि मुसलमानों के इस अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति के प्रयासों पर जानबूझकर प्रकाश नहीं डाला जाता | मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, हकीम अजमल खान , मौलाना मुहम्मद अली , मौलाना शौकत अली ,अल्ताफ़ हुसैन हाली , बी अम्मा , सैयद अहमद सरहिंदी , मौलाना शिबली नोमानी ,डॉ . सैफुद्दीन किचलू और रफी अहमद किदवाई आदि ऐसे मुसलमान हैं जो इस उद्देश्य में शामिल थे | शाहजहांपुर के अशफाकउल्लाह खां ने काकोरी (लखनऊ) पर ब्रिटिश राजकोष को लूटने का षड़यंत्र रचा था | खान अब्दुल गफ्फार खां (सीमांत गांधी के रूप में प्रसिद्ध) एक महान  थे ,जिन्होंने अपने 95 वर्ष के जीवन में से 45 वर्ष केवल जेल में बिताया| भोपाल के मुहम्मद बरकतुल्लाह ग़दर पार्टी के संस्थापकों में से एक थे , जिन्होंने  ब्रिटिश विरोधी संगठनों से नेटवर्क बनाया था| ग़दर पार्टी के सैयद शाह रहमत ने फ्रांस में एक भूमिगत क्रांतिकारी रूप में काम किया और 1915 में असफल गदर में उनकी भूमिका के लिए उन्हें फांसी की सजा दी गई | फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) के अली अहमद सिद्दीकी ने जौनपुर के सैयद मुज्तबा हुसैन के साथ मलाया और बर्मा में भारतीय विद्रोह की योजना बनाई और 1917 में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया था | केरल के अब्दुल वक्कोम कादिर ने 1942 के 'भारत छोड़ो' में भाग लिया और 1942 में उन्हें फांसी की सजा दी गई थी|  उमर सुबहानी जो की बंबई की एकउद्योगपति करोड़पति थे, उन्होंने गांधी और कांग्रेस व्यय प्रदान किया था और अंततः स्वतंत्रता आंदोलन में अपने को कुर्बान कर दिया | क्रन्तिकारी मुस्लिम महिलाओं में बी अम्मा के साथ ही बेगम  हजरत महल, असगरी बेगम, हबीबा , जमीला , बेगम ज़ीनत महल आदि ने ब्रिटिश के खिलाफ स्वतंत्रता के संघर्ष में महतवपूर्ण योगदान दिया है | बहुत सी मुस्लिम महिलाओं ने क्रांतिकारियों को विभिन्न प्रकार से सहायता प्रदान की |   जब 1857 में क्रांति प्रारंभ हुई, तो कानपुर में नाना साहब तथा तात्या टोपे ने क्रांति का नेतृत्व किया। उस समय हिंदू और मुस्लिम महिलाओं ने विविध रूप से क्रांतिकारियों को सहायता दी। उन्होंने गोला-बारूद इधर-उधर ले जाने, तोपचियों की मदद करने, किले के नीचे लड़ रहे क्रांतिकारियों को भोजन पहुँचाने, घायलों की सेवा-सुश्रूषा का कार्य कर युद्ध के समय क्रांतिकारियों को मदद पहुँचाई। आवश्यकता पड़ने पर वे शस्त्र धारण करके युद्ध के मैदान में भी जाती थीं। अवध में क्रांति का नेतृत्व बेग़म हज़रत महल ने किया था। उनके नेतृत्व में वहाँ की अनेक मुस्लिम महिलाओं ने अंग्रेज़ों के विरद्ध  क्रांति में खुलकर भाग लिया था। उनमें कुछ तो युद्ध में शहीद हो गईं और कुछ के साथ अँग्रेज़ सैनिकों ने बुरा बर्ताव किया था। ऐसा पता चलता है कि लखनऊ को बचाने के लिए अनेक महिलाओं ने अपनी जान तक कुर्बान कर दी। एक महिला नेे पेड़ पर बैठे हुए अँग्रेज़ सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया। इसी प्रयास में वह भी ब्रितानियों के हाथों शहीद हो गई। इसी प्रकार दिल्ली में जीनत महल के नेतृत्व में कुछ मुस्लिम महिलाओं ने अँग्रेज़ सैनिकों को विशेष क्षति पहुँचाई थी। ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली की एक मुस्लिम महिला ने ब्रितानियों को आतंकित कर दिया था। इसके अतिरिक्त दिल्ली की चौदह मुस्लिम महिलाओं ने इज्ज़त बचाने के लिए आत्महत्या कर ली थी। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के भवन थाना की असगरी बेग़म को क्रांति में अहम भूमिका निभाने कारण ज़िंदा आग में जला कर मार डाला गया। इसके अतिरिक्त बाखरा गाँव की बख्तावरी को फाँसी की सजा दी गई थी।अफ़सोस आज हमें उन लोगों की कुर्बानी बिलकुल भी याद नहीं रही, जिनकी बदौलत हमें आज़ादी नसीब हुई |

Aug 19, 2015

सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने वालों से सख्ती से निबटें


देश के विभिन्न हिस्सों में जानबूझकर सांप्रदायिक तनाव के हालात पैदा करने की जो कोशिश की जा रही है , उसकी जितनी निंदा और भर्त्सना की जाए कम है | खबर है कि उत्तर प्रदेश के अति संवेदनशील शहर फैज़ाबाद में सांप्रदायिक तत्वों ने एक बार फिर सुनियोजित साजिश के तहत पिछले दिनों माहौल को खराब करने की कोशिश की और शहर के सदर कोतवाली क्षेत्र में कोतवाली के कुछ ही क़दम पर स्थित मदनी मस्जिद के एक कमरे में खिड़की से पेट्रोल झोंककर आग लगा दी | इस घटना की खबर जंगल में आग की तरह फ़ैल गई , लोग घबरा उठे और स्थिति को संभालने की कोशिश की | पूरे इलाक़े में तनाव बना हुआ है |स्थानीय लोगों ने किसी तरह आग पर काबू पा लिया | खबरों के मुताबिक़ , सदर कोतवाली परिक्षेत्र के मुगलपुरा में स्थित उक्त मस्जिद के कमरे में विगत 17 अगस्त की रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे असामाजिक तत्वों ने आग लगा दी | कमरे में पवित्र पुस्तकें , कुछ कागजात और चटाइयां थीं | मस्जिद के इमाम हसीबुल्लाह खान उर्फ़ बादशाह खान के अनुसार , '' मस्जिद के उक्त कमरे की खिड़की खुली थी | इसी ओर से पेट्रोल डालकर आग लगाई गई | कुछ राहगीरों ने आग देखकर शोर मचाया , तो मेरी भी उस पर निगाह पड़ी और उसे मैं बुझाने में जुट गया | साथ ही पुलिस को सूचित किया गया | स्थानीय लोगों की सामूहिक कोशिशों से आग पर जल्द ही काबू पा लिया गया | '' इस घटना की सूचना मिलते ही जिला मजिस्ट्रेट अनिल धींगरा और वरीय पुलिस अधीक्षक समेत अन्य सुरक्षाकर्मी मौक़े पर पहुंच गए और आश्वासन दिया कि दोषियों को जल्द ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा और किसी भी क़ीमत पर आशांति पैदा करने की साज़िश को विफल कर दिया जाएगा |
 इमाम साहब ने अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ एफ. आई, आर दर्ज करायी है | पुलिस के अनुसार , घटनास्थल से जली हुई जो चीज़ें बरामद की गई हैं , उन्हें फारेंसिक जाँच के लिए भेजा जाएगा | इसी तरह पूर्वी दिल्ली के नेहरू कैंप इलाके के मंडावली में एक पुलिस दल पर कुछ लोगों द्वारा हमला किए जाने के बाद पूरे इलाके में तनाव का माहौल बना है। लोगों का आरोप है कि पुलिस दल लोक निर्माण विभाग की जमीन पर बनी एक मस्जिद को गिराने की कोशिश कर रही थी। लोगों ने पुलिस की गाड़ी पर पत्थर फेंके, जिसमें 2 कॉन्स्टेबल घायल हो गए। हमले की इस घटना के बाद पुलिस ने इलाके में जगह-जगह छापेमारी की। एक महिला सहित 12 लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया है। पुलिस ने सभी पकड़े गए लोगों पर दंगा-फसाद करने, डाका डालने और ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी पर हमला करने का मामला दर्ज किया है। यह घटना गत 16 अगस्त की शाम की है। शनिवार दोपहर को पुलिस के पीसीआर दल को उक्त इलाके में लड़ाई की एक शिकायत मिली थी। जब पुलिस दल बताई गई जगह पर पहुंचा तब स्थानीय लोगों ने उनपर मस्जिद को गिराने की कोशिश करने का आरोप लगाया। उधर, पुलिस दल का दावा है कि नेहरू कैंप के जिस 8x10 स्क्वेयर फुट के विवादित क्षेत्र का इस्तेमाल धार्मिक जगह के तौर पर किया जा रहा था वह पहले से ही क्षतिग्रस्त था। पुलिस का दावा है कि उन्होंने विवादित स्थल को हाथ भी नहीं लगाया है। आरोप है कि जब कमरे के मालिक ने किरायेदारों को कमरा खाली करने के लिए कहा तो उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इसी बात पर मकान मालिक और किरायेदार के बीच में बहस और लड़ाई शुरू हो गई, जिसकी सूचना पुलिस को दी गई थी। पुलिस ने घटनास्थल पर पहुंचकर पूरा मामला जानने के बाद मकान मालिक के पक्ष में फैसला दिया। इस घटना के बाद रविवार को शाम के समय जब हेड कॉन्स्टेबल सोमपाल और कॉन्स्टेबल अजित मंडावली पुलिस स्टेशन की ओर जा रहे थे तब उन्होंने गौर किया कि कुछ लोग हाथ में डंडे और पत्थर लेकर उन दोनों का पीछा कर रहे हैं। हेड कॉन्स्टेबल सोमपाल, जो कि पकड़े गए 12 लोगों के खिलाफ लिखवाई गई शिकायत में शिकायतकर्ता हैं, का कहना है कि पीछा कर रहे लोगों ने उनपर और अजित पर पत्थर फेंककर हमला किया और उन्हें मारा भी। दोनों पुलिसकर्मियों को चोटें आई हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुलिस ने उक्त कमरे में घुसकर इबादत से जुड़ी चीजें बाहर फेंक दी। उनका दावा है कि पुलिस ने कमरे को क्षति भी पहुंचाई। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने इन सभी आरोपों से इनकार किया है। उन्होंने कहा, 'उक्त कमरा अवैध है और उसे लोक निर्माण विभाग की जमीन पर बनाया गया है। सरकारी जमीन हथियाने की कोशिश की जा रही है। वह कोई मस्जिद या धार्मिक जगह नहीं थी। वह बस एक कमरा था, जिसका इस्तेमाल पिछले कुछ दिनों से धार्मिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा था।' ज़रूरत इस बात की है कि देश की शांति व्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर माहौल को खराब करनेवालों के खिलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाए | ऐसी सभी गतिविधियों पर रोक लगनी ही चाहिए |

Aug 13, 2015

पोर्नोग्राफी और पोर्न साइटों पर लगे पूर्ण प्रतिबन्ध

पोर्नोग्राफी और पोर्न साइटों पर लगे पूर्ण प्रतिबन्ध 

भारत में बढ़ती पोर्नोग्राफी और पोर्न के इंटरनेट उपयोग के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों  सुनवाई की। मध्यप्रदेश की इंदौर हाईकोर्ट के वकील कमलेश वासवानी द्वारा दायर की गई जनहित याचिका पर कार्रवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि पूरी तरह से पोर्न साईट्स को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है हालांकि बच्चों के पोर्न को ब्लाॅक करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं। कोर्ट ने सरकार को आदेश देकर बच्चों की 850 पोर्न बेव साइटें बंद कराने को कहा | दूसरी ओर शील - शुचिता की बार - बार बात और दुहाई देनेवाली , जिनमें पोर्न बेवसाइटों और ब्लू फिल्मों पर रोक की बात शामिल है , केंद्र सरकार ने गत चार अगस्त 15 को कहा कि वह आठ सौ से अधिक बेव साइटों पर लगी आंशिक प्रतिबन्ध हटाने जा रही है ! जिसका मतलब यह हुआ कि सरकार पोर्न साइटों पर रोक के सिलसिले में गंभीर नहीं है | सुप्रीमकोर्ट ने  कहा कि यह किसी की निजता और व्यक्तिगत आजादी का उल्लंघन है। मामले में कोर्ट ने पोर्न साइटों के उपयोग को रोकने की बात को नकारते हुए कहा है कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित मौलिक अधिकार का हनन है। मिली जानकारी के अनुसार कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है कि इस मसले पर वयस्क और अवयस्क का सवाल उठ सकता है। यही नहीं जिस देश में ' कामसूत्र ' की रचना की गई हो वहां, व्यक्तिगत आजादी सर्वोपरि होना जरूरी है। तीन न्यायाधीशों की बेंच की अध्यक्षता करते हुए मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू द्वारा कहा गया है कि इंटरनेट पर ब्लू फिल्म उपलब्ध हैं और कामुकता व्यक्ति की इच्छा है, हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाओं और बच्चों के विरूद्ध अधिकांश अपराध इसी तरह की पोर्न साईट्स से होते हैं। कोर्ट ने कहा कि आखिर यदि कोई व्यक्ति घर की चारदीवारी में पोर्न साईट देखता है तो उसे कैसे रोका जा सकता है। हालांकि सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिए गए उत्तरों से न्यायालय संतुष्ट नहीं है ,लेकिन माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू द्वारा पोर्न साईट रोकने को लेकर असंतोष जताया। सुप्रीम कोर्ट के पोर्न साईट पर बैन के निर्देश पर केंद्र सरकार ने दलील दी कि पोर्न की सभी वेबसाइट को प्रतिबंधित करना संभव नहीं है। वहीँ केंद्र ने यह भी कहा कि पोर्न पाबंदी से नुकसान भी हो सकता है , क्योंकि फिर ऐसे शब्दोंवाली साहित्यिक सामग्री लोगों को इन्टरनेट पर उपलब्ध नहीं हो सकेगी। जस्टिस बी एस चौहान की अध्यक्षता वाली बेंच को सरकार की तरफ से जनरल विश्वानाथन ने कहा है कि इस तरह की वेबसाइट बंद करने से अच्छे साहित्य का  मिलना भी मुश्किल हो जायेगा। उन्होंने कहा कि ऐसी वेबसाइट बंद करने के लिए कंप्यूटर में सॉफ्टवेयर लगाने होंगे जिसके लिए सॉफ्टवेयर कंपनी के निर्माताओं को सॉफ्टवेयर लगाने के निर्देश देने होंगे।
 इंदौर निवासी वकील कमलेश वासवानी की जनहित याचिका के अनुसार इस समय बाजार में बीस करोड़ से भी अधिक क्लिपिंग आसानी से उपलब्ध हैं। श्री वासवानी कहते हैं, "पोर्न देखने के बाद लोग बच्चों और महिलाओं का बलात्कार करते हैं | कई बार बलात्कार कांड के अभियुक्तों ने कहा है कि उन्होंने पोर्न देखने के बाद ही वारदात को अंजाम दिया था |" उनके मुताबिक़, "कुछ ने यह भी माना है कि पोर्न देखने से उन्हें बलात्कार करने की प्रेरणा मिली | इसलिए पोर्न साइट पर रोक लगा दी जानी चाहिए | "वासवानी ने यह भी कहा कि सरकार ने पहले तो साफ़ कह दिया था कि पोर्न साइट को ब्लॉक करना तकनीकी रूप से मुमकिन ही नहीं है | उन्होंने अदालत में कहा कि सभी न सही, कुछ बड़े और आसानी से लोगों की पंहुच में आने वाले साइट तो ब्लॉक किए ही जा सकते हैं |उन्होंने 850 साइट की एक सूची अदालत को सौंपी और सरकार उन्हें ब्लॉक करने पर राज़ी हो गई| वे इस तर्क को ख़ारिज करते हैं कि अपने घर में बैठ कर पोर्न देखने में कोई बुराई नहीं है | उनका तर्क है कि जब घर में बैठ कर ड्रग्स लेना या घर में ड्रग्स रखना ग़ैरक़ानूनी है तो ये कैसे नहीं ? वे कहते हैं कि बच्चे तो ख़ुद अदालत जा नहीं सकते और महिलाएं इस तरह की बातों से बचना चाहती हैं. इसलिए उन्होंने अदालत जाने का फ़ैसला किया | वस्तुस्थिति यह है कि हमारे देश के ख़ासकर युवाओं में इसकी लत बहुत बढ़ी हुई है | हालत यह है कि 800 से ज्यादा पॉर्नोग्राफिक वेबसाइट्स को ब्लॉक करने से पॉर्न डीवीडी की चोरी-छिपे होने वाली बिक्री काफी बढ़ गई। नई दिल्ली के पालिका बाजार, लाजपत नगर और पहाड़गंज जैसे मार्केट्स में पॉर्न डीवीडी खरीदने के लिए लोगों और रिटेलर्स की भीड़ देखी गई। इस दौरान पॉर्न डीवीडी की बिक्री पहले से कई गुना बढ़ गई। पहले जो डीवीडी 100 रुपये में बिकती थी, वह 300 रुपये तक में बिकी। करीब 300 रुपये की कीमत की 8 जीबी की एक नॉर्मल डीवीडी में हर तरह की 10-12 एचडी क्लिपें होती हैं। कोलकाता में दुकानदारों ने सीडी के दाम 20 फीसदी से 30 फीसदी तक बढ़ा दिए हैं। पार्क सर्कस के एक दुकानदार ने बताया कि 20 रुपये में बिकने वाली सीडी 25-30 रुपये में बिक रही है। सबसे ज्यादा मांग वाली एमएमएस क्लिपें करीब दोगुने कीमत 30-40 रुपये में बिक रही हैं। एक दूसरे दुकानदार ने बताया कि मुख्य स्थानों जैसे गरियाहाट और रासबिहारी एवेन्यू में सीडी और डीवीडी के दाम 20 फीसदी बढ़ गए हैं। इंग्लिश पॉर्न डीवीडी करीब 50-60 रुपये में बिक रही है | लखनऊ की बात करें तो पॉर्न के कन्जयूमर्स ने बताया कि पाइरेटेड सीडी/डीवीडी 50फीसदी ज्यादा दाम में बिक रही हैं। हजरतगंज का नाका और नाज मार्केट में प्रीत और अंबर मार्केट्स ऐसे स्थान हैं जहां कंप्यूटर सामग्री और सीडी खुलेआम बिकती हैं। बेंगलुरु में डीवीडी से ज्यादा वीपीएन की मांग बढ़ी। वीपीएन की मदद से कोई भी व्यक्ति सर्विस प्रवाइडर द्वारा किए गए ब्लॉक को तोड़ सकता है। ये हालात कुछ इस क़िस्म के हैं कि सरकार , दूकानदार और उपभोक्ता सभी पोर्नोग्राफी और पोर्न साइट्स को सिरे से बंद करने के खिलाफ़ हैं | जबकि समय , नैतिकता और अच्छे शील - स्वभाव की यह मांग है कि देश में पोर्न साइटों पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया जाए


डायन बताकर हत्या कब तक जारी रहेगी

महिलाओं के असली दुश्मन कौन ?

खबर है कि झारखंड की राजधानी रांची से 45 किलोमीटर दूर एक गांव में पिछले दिनों पांच  महिलाओं की कथित तौर पर डायन बताकर हत्या कर दी गई। यह गांव रांची के मंडार ब्लॉक के अंतर्गत आता है। ब्लॉक प्रशासन ने घटना की पुष्टि की है। उसका कहना है कि मामले की जांच शुरू कर दी गई है , लेकिन पुलिस ने अभी तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया है। अक्सर पुलिस ऐसे ही करती है और इस तरह के मामलों को गंभीरता से नहीं लेती | वह रटा - रटाया कुछ बयान जारी कर देती है | इस बड़े मामले में पुलिस ने प्रथम दृष्टया सबूतों के आधार पर बताती है कि ऐसा लगता है कि उक्त मामले में ग्रामीण ही शामिल थे। बाहर के किसी तत्व के दखल देने या प्रभाव स्थापित करवाने की संभावना नहीं दिख रही है। इस बयान के बावजूद पुलिस हत्यारों को गिरफ्तार करने में अक्षम है | मारी गई एक महिला की बेटी का कहना है कि इलाके के ही एक परिवार में एक बच्चा बीमार था। बच्चे के परिवार ने उसका इलाज कराने की जगह उस पर डायन का असर बताया। सभी 5 महिलाओं को ग्रामीणों ने गत सात अगस्त 15 की रात में डायन होने का आरोप लगाकर एक-एक कर मार डाला। ग्रामीणों ने उनके कपड़े फाड़े और फिर उन्हें तलवार और लाठी से पीट-पीटकर मार डाला। डायन बताकर हत्या करने की घटना झारखंड के लिए नई नहीं है राज्य में इस तरह की घटनाएं सामने आती रही हैं। नेशनल क्राइम ब्यूरो रिकॉर्ड्स के अनुसार, वर्ष 2000 से 2012 के बीच देशभर में डायन बताकर की गई हत्याओं की ज्ञात संख्या 2097 हैं। इनमें से सिर्फ झारखंड में हुए मामले 363 हैं। हालांकि झारखंड सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2011 से 2013 के बीच 400 से भी ज्यादा की डायन होने का आरोप लगाकर हत्या की गई है। इसके अलावा 2854 मामले पुलिस में दर्ज हैं। झारखंड में डायन प्रथा विरोधी कानून साल 2001 से ही लागू है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कानून बनने के बाद भी ना तो उसे प्रभावी तरीके से लागू करने की कोशिश की गई है और न ही समाज में कोई खास बदलाव आया है। देश भर में यही गंभीर स्थिति बनी हुई है | विधि - विधान और नैतिकता को धता बताकर देश के गांव-देहातों और छोटे कस्बों में अब भी कोई ओझा, भोपा , गुनिया और तांत्रिक किसी सामान्य औरत को कभी भी डायन घोषित कर देता है | आम तौर पर औरत के घर , परिवार और रिश्तेदार अपने घिनौने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए करवाते हैं | 
देखा जाता है कि इस कुप्रथा के ख़िलाफ़ जनचेतना का घोर अभाव है | खाप पंचायतें भी अपना मुंह नहीं खोलतीं | महाराष्ट्र में सामाजिक कार्यकर्ता विनायक तावडे़ और उनका संगठन कई सालों से डायन प्रथा के विरुद्ध अभियान चला रहे है | तावडे़ के मुताबिक आदिवासी इलाकों में ये प्रथा एक बड़ी समस्या बनी हुई है | वे बताते हैं कि कैसे एक ओझा गाव में एक महिला को डायन करार देने का उपक्रम करता है -  “जैसे गांव में कोई बीमार हो गया,तो कुछ लोग जवार के दाने बीमार के ऊपर सात बार घुमाकर ओझा के पास ले जाते हैं |ओझा एक दाना इस तरफ, एक उस तरफ रख कर मन्त्र बोलना शुरू करता है | फिर कहता है - हाँ, .उसे डायन ने खाया है | उस डायन का घर नाले के पास है | उसमे पेड़ है, इतने जानवर है ,आम के पेड़ है | महू का पेड़ है ,इतने बच्चे है! ” मि . तावडे आगे बताते हैं, “इनमे जो बातें अनुमान से किसी पर लागू  हो जाए , उस औरत को डायन करार दिया जाएगा | हमने ऐसे ही एक ओझा को गिरफतार करवाया है | ” राष्ट्रीय महिला आयोग की निर्मला सावंत प्रभावलकर मानती हैं कि देश के पचास - साठ ऐसे जिले है जहाँ इस कुप्रथा के उदाहरण आये दिन मिल जाते हैं | महिला को डायन, कही डाकन, तेनी या टोनी, पनव्ती ,मनहूस और ऐसे ही नामों से लांछित कर उसे घर से निकाल दिया जाता है | यह  समस्या शिक्षित वर्ग में भी है | कभी ऐसा भी होता है कि जब कोई महिला राजनीति में आती है ,तो लोग कहने लगते हैं कि वह जहां भी हाथ लगाएगी, नुकसान हो जायेगा | आप चुनाव हार जायेगे ,ऐसा कह कर लांछित किया जाता है | पीड़ित महिलाओं में ज्यादातर दलित, आदिवासी या पिछड़े  वर्ग से है | सामाजिक कार्यकर्ता तारा अहलूवालिया ने राजस्थान में आदिवासी बहुल इलाकों में ऐसी पीड़ित महिलाओं की मदद की है | उनके अनुसार ,  “ लगभग 36 ऐसे मामले मेरे पास है जिनमें औरत को डायन घोषित कर दिया गया |  मगर पुलिस ने कोई मदद नहीं की | इस गंभीर स्थिति में इस कुप्रथा पर कैसे लगाम लग पाएगी ? अहलूवालिया ने कहा, “ यह समय है जब डायन विरोधी कानून बनना चाहिए | अकेले भीलवाड़ा जिले में ही कोई ग्यारह स्थान ऐसे है जो औरत के शरीर से डायन निकालने के लिए जाने जाते है | वहां हर सप्ताह भीड़ लगती है. इन औरतों के साथ हर तरह की हिंसा होती है | ”रांची इंस्टीटयूट ऑफ़ न्यूरो साइकिएट्री एंड एलायड साइसेंज के निदेशक सह मनोवैज्ञानिक डॉ. अमूलरंजन सिंह कहते हैं , “किसी की बीमारी या मौत में भूत-प्रेत, ओझा-गुनी की कोई भूमिका नहीं होती , लेकिन गांवों में अब भी तरह-तरह की भ्रांतिया हैं | इसे जागरूकता के ज़रिए ही दूर किया जा सकता  है | महिला कार्यकर्ता लखी दास डायन कुप्रथा के ख़िलाफ़ कोल्हान इलाक़े में काम करती हैं | उनका कहना है , “ इन मामलों में विधवाएं अधिक प्रताड़ित होती हैं | जनजाति बहुल गांवों में अब भी गहरा अंधविश्वास है |.” उन्होंने बताया कि अध्ययन में पाया गया है कि महिलाओं को सार्वजनिक तौर पर मैला पिलाया जाता है | उनके बाल काट दिए जाते हैं और उन्हें निर्वस्त्र कर घुमाया जाता है, लेकिन सुदूर इलाक़ों में होनेवाली प्रताड़ना की अधिकतर घटनाएं प्रकाश में नहीं आ पातीं | झारखंड सरकार ने डायन प्रथा उन्मूलन की जो योजना बनाई है , उस   पर हर साल बीस लाख रुपए ख़र्च किए जाते हैं | मगर यह योजना कारगर नहीं साबित हुई है |  इस कुप्रथा पर रोक के लिए बड़े पैमाने पर काम करने की ज़रूरत है | 

आधार पर उचित फ़ैसला

 आधार पर उचित फ़ैसला  

- डॉ . मुहम्मद अहमद 
आधार की अनिवार्यता को लेकर केंद्र सरकार पिछली कांग्रेस सरकार की ही तरह बिना संसद की मंज़ूरी के सक्रिय थी , जिसके कारण आमजन को काफ़ी परेशानी हो रही थी | अब सुप्रीमकोर्ट कोर्ट ने अपने एक अंतरिम आदेश में जनता की यह परेशानी दूर हो गई है , लेकिन देखना यह है कि उसके इस आदेश का कितना अनुपालन किया जाता है | क्या उसके पिछले वर्ष 24 मार्च के आदेश जैसा इस बार नहीं होगा कि उसके इसी प्रकार के आदेश की केंद्र सरकार अवहेलना करती रही और आधार को अनिवार्य ठहराने पर ज़ोर देती रही ? शायद इसी कारण से विगत 11 अगस्त 15 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को उसकी महत्वकांक्षी योजना आधार को लेकर उसे करारा झटका दिया है। शीर्ष अदालत ने देश में आधार कार्ड को सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए बतौर एकमात्र पहचान मानने से इन्कार कर दिया है। अतः नागरिकों को अब आधार कार्ड बनवाना अनिवार्य नहीं है। यह बात खुद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कही है। सरकार ने यह भी कहा है कि आधार कार्ड बनाने का फैसला लोगों की इच्छा पर है।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र औऱ राज्यों सरकारों को आदेश दिए हैं कि इस बात का ध्यान रखा जाए कि किसी भी अवैध नागरिक का आधार कार्ड न बने। कोर्ट ने कहा है कि आवश्यक सुविधाओं जैसे एलपीजी, टेलीफोन कनेक्शन वगैरह के लिए आधार कार्ड अनिवार्य नहीं है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा, आधार कार्ड को एक विशुद्ध स्वैच्छिक योजना रहना चाहिए। सरकार अपनी कई योजनाओं को पहले ही आधार कार्ड से जोड़ चुकी है। ऐसे में सरकार का सुप्रीम कोर्ट में यह कहना कि इसे बनवाना लोगों की इच्छा पर है उस पर कई सवाल उठते हैं। इनमें एक बड़ा सवाल यह है कि सुप्रीमकोर्ट की आधार - अनिवार्यता के विरुद्ध पिछले वर्ष के आदेश के बावजूद बड़े पैमाने पर आधार से योजनाओं को अनिवार्यता की तरह क्यों जोड़ा गया ? क्या इससे शीर्ष अदालत कर निर्णय की अवमानना नहीं हुई ? फिर अवमानना पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कोई दंडात्मक कार्यवाही की ?
सुप्रीमकोर्ट ने ताज़ा आदेश एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए, जिसमें आधार कार्ड योजना को बंद किए जाने की मांग की गई है। इसके पीछे तर्क दिया है कि आधार कार्ड में कई तरह की कमियां हैं। इससे व्यक्ति की निजता का उल्लघन होता है , डाटा का दुरूपयोग हो सकता है और ऐसे भी मामले प्रकाश में आये हैं , जिनमें फिंगर प्रिंट न उभरने की वजह से लोगों का आधार बनाने से इन्कार कर दिया गया | यह आरोप  भी लगाया जाता है कि आधार कार्ड बनवाने का ठेका निजी कंपनियों को दिया जाता है , जो पूरी तरह विश्वसनीय नहीं हैं , जिसके फलस्वरूप कुत्ते - बिल्ली आदि के भी आधार बन चुके हैं | 
दरअसल पहले ये खबरें फैलाई गई थीं और गैस डीलरों की ओर से बार - बार यही कहा जा रहा था  कि रसोई गैस पर दी जाने वाली सब्सिडी आधार कार्ड से जुड़े आपके बैंक अकाउंट में ही आएगी। सब्सिडी की राशि तभी अकाउंट में आएगी, जब आपने आधार कार्ड बनवाकर अपने बैंक अकाउंट से उसे लिंक कराया होगा। यह भी बात सामने आ रही थी कि आधार कार्ड न होने पर मार्केट रेट पर सिलेंडर खरीदना पड़ेगा। सबसे ज्यादा भ्रम की स्थिति एलपीजी के मसले पर ही थी जो कोर्ट के फैसले के बाद अब दूर हो गई है |
सुप्रीमकोर्ट ने अब यह व्यवस्था दी है कि सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य नहीं होगा। इसके साथ ही अदालत ने इस योजना के तहत पंजीकरण के लिए एकत्र व्यक्तिगत बायोमेट्रिक आंकड़े साझा करने से प्राधिकारियों को रोक दिया। एकत्र की गयी जानकारी का इस्तेमाल अदालत की अनुमति से ही आपराधिक मामलों की जांच के अलावा किसी अन्य कार्य के लिए नहीं किया जायेगा। शीर्ष अदालत की संविधान पीठ अब इस सवाल पर फैसला करेगी कि क्या आधार कार्ड तैयार करने के लिये बायोमेट्रिक आंकड़े एकत्र करने से व्यक्ति के निजता के अधिकार का हनन होता है और क्या निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है ?
 जस्टिस जे चेलामेश्वर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि आधार कार्ड की कोई भी व्यक्तिगत जानकारी किसी प्राधिकार के साथ साझा नहीं की जायेगी। अदालत ने इस संबंध में अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी का कथन भी रिकार्ड में दर्ज किया। शीर्ष अदालत ने कहा, आधार का इस्तेमाल सार्वजनिक वितरण पण्राली, मिट्टी के तेल और रसोई गैस , वितरण पण्राली के अलावा किसी अन्य मकसद के लिए नहीं किया जायेगा। परंतु साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि इन सुविधाओं का लाभ उठाने के लिये भी आधार कार्ड अनिवार्य नहीं होगा।
 शीर्ष अदालत ने आधार योजना को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं का इस योजना के तहत पंजीकरण की प्रक्रिया रोकने का अंतरिम अनुरोध अस्वीकार कर दिया। इससे पहले इसी पीठ ने केन्द्र सरकार की आधार कार्ड योजना को चुनौती देने वाली याचिकाओं को संविधान पीठ को यह फैसला करने के लिये सौंप दिया कि क्या निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है | याचिका कर्ताओं का दावा है कि इस योजना के तहत एकत्र बायोमेट्रिक सूचना को साझा करना निजता के मौलिक अधिकार का हनन है। इससे पहले सुनवाई के दौरान अटार्नी जनरल ने आधार कार्ड योजना का समर्थन करते हुये दलील दी थी कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा था, कोई भी फैसला स्पष्ट रूप से नहीं कहता है कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है। यह अनुच्छेद 21 के तहत भी नहीं है। 
यदि यह न्यायालय महसूस करता है कि इस मामले में स्पष्ट होना चाहिए तो इस पर सिर्फ संविधान पीठ ही निर्णय कर सकती है। अटार्नी जनरल रोहतगी ने छह और आठ न्यायाधीशों की पीठ के दो फैसलों को उद्धृत किया था जिसमें कहा गया था कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। उन्होंने ए .के . गोपालन, मेनका गांधी और बैंकों के राष्ट्रीयकरण मामलों में दी गयी व्यवस्थाओं का हवाला देते हुये कहा कि चुनिन्दा मौलिक अधिकारों की व्याख्या को लेकर व्याप्त असंगति को सिर्फ बड़ी पीठ ही दूर कर सकती है। 
केन्द्र सरकार ने नागरिकों को विभिन्न योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिये कथित रूप से आधार कार्ड के लिये दबाव डाले जाने के मामले में केन्द्र, भारतीय रिजर्व बैंक और अन्य के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के अनुरोध का विरोध करते हुये कहा था कि यह अनिवार्य नहीं है। अतिरिक्त सालिसीटर जनरल पिंकी आनंद ने अदालत से कहा था कि इससे पहले के आदेशों के अनुरूप सरकार ने राज्यों और संबंधित प्राधिकारियों को सूचित किया था कि विभिन्न योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिये आधार कार्ड का होना अनिवार्य नहीं किया जाये।
केद्र सरकार की यह बात सही नहीं लगती , क्योंकि आधार की अनिवार्यता की बात न कही गई होती , तो हर जगह आधार की मांग क्यों की जाती और जनता को अनावश्यक परेशानी में न डाला जाता |

Aug 6, 2015

किधर रहा है हमारा देश ?

किधर रहा है हमारा देश ?
डॉ . मुहम्मद अहमद
हिन्दूवादी संगठनों के दबाव में शिवपुरी म . प्र . के खनियांधाना क्षेत्र के बुकर्रा गाँव निवासी तुलाराम जाटव परिवार के 7 सदस्यों ने विगत तीन सितंबर 14 को फिर से हिन्दू धर्म अपना लिया।14 महीने तक मुस्लिम रहने के बाद मनीराम [अब्दुल्लाऔर उसकी पत्नी मखू बाई  ने कहा कि उन्हें स्वतः प्रेरणा हुईजिसके बाद वे फिर से हिन्दू धर्म स्वीकार करने जा रहे हैं। मनीराम के बेटे कासिम केशव ]और इब्राहिम रिंकू ने 10 दिन का समय मांगा है। परिवार के सदस्यों ने कहा कि उन्हें भी समझा लिया जाएगा। कहा जाता है कि हिंदूवादी संगठनों ने जबरन धर्म परिवर्तन कराया और ' घर वापसी ' नाम दिया इस मामले में स्थानीय प्रशासन और पुलिस की पक्षपातपूर्ण भूमिका रही |
पुलिस ने तीन सितंबर को ही मनीराम और उनके परिवार के तीन सदस्यों को इस आरोप में गिरफ्तार कर लिया था कि उन्होंने स्थानीय प्रशासन को सूचित किये बिना इस्लाम धर्म क़बूल किया था इस सिलसिले में इन पर हाल में ही मामला दर्ज किया गया था म . प्र . धर्म स्वतंत्रता अधिनयम 1968 में धर्म परिवर्तन की स्थिति में स्थानीय प्रशासन को सूचित करने एवं अन्य प्रक्रियाएं पूरी करने का प्रावधान है कहते हैं कि मनीराम और तुलाराम आदि ने इस प्रक्रिया को पूरा नहीं किया था इनके ख़िलाफ़ पुलिस थाने में एफ़ आई आर दर्ज थी |
जब ये अन्य लोगों के साथ तीन सितंबर को धर्म परिवर्तन का शपथपत्र देने के लिए कलेक्ट्रेट पहुंचे , तो एस डी ओ पी शिवपुरी एस के एस तोमर और कोतवाली टी आई आर के एस राठौड़ ने इन दोनों को गिरफ्तार कर लिया इसी दिन जब इन लोगों ने पुनः हिन्दू बनने पर हामी भर दी तो इन्हें रिहा करके टेकरी मन्दिर पहुंचा हिन्दू बनाया गया |
जाटव परिवार की जो महिलाएं थीं , उन्हें भाजपा नेता ओम प्रकाश खटिक ने आदिम जाति कल्याण विभाग के कार्यालय में बंधक बना लिया बाद में इन्हें भी शुद्धिकरण के वास्ते मन्दिर पहुंचाया गया इस पूरे प्रकरण में भाजपा नेता आशुतोष शर्मा और अन्य की भी निंदनीय और अवैधानिक भूमिका रही |    
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इन्होंने जो शपथपत्र और एक संयुक्त अनुरोधपत्र कलेक्टर को सौंपा था , उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया और भारतीय संविधान की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गयीं ! इनमें इन्होंने साफ़ तौर पर लिखा है कि '' हमारा दिल इस्लाम स्वीकार करना चाहता है चूँकि हमें ऐसा पता लगा है कि अपना धर्म परिवर्तन करने में कलेक्टर की अनुमति आवश्यक है , इसलिए हम यह आवेदन पेश कर रहे हैं |हम सभी इस्लाम धर्म अपनाने के लिए किसी भी व्यक्ति या संस्था ने कोई दबाव , लोभ और लालच नहीं दिया है | .....
फिर कहा गया कि मैं शपथकर्ता बिना नशे के और किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा न तो उकसाया गया है और न ही किसी प्रकार कोई लोभ , लालच आदि दिया गया मैं इस्लाम धर्म की अच्छाइयों को देखते हुए इसे ग्रहण कर रहा / रही हूँ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत यह मेरा मुलभूत अधिकार भी है |''
इस शपथपत्र की नोटरी को कोई वकील तैयार नहीं हुआ जब ये लोग निराश हो गये , तो एक एडवोकेट ने नोटरी कर दी इस मामले में कलेक्टर राजीव चन्द्र दुबे कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं |लेकिन तुलाराम के ताऊ बहुरन और भाई अतर सिंह को मुसलमान बनाने के लिए एक लाख रूपये की पेशकश करने के आरोप ज़रूर लगाये जा रहे हैं , जो पूरी तरह बनावटी और मनगढ़ंत है बताया जाता है कि अब हिन्दूवादियों ने उन्हें आश्वासन दिया है कि उनके साथ अन्याय नहीं होगा , लेकिन इस आश्वासन पर कितने खरे उतरते हैं , आनेवाला समय ही बतायेगा |