Sep 17, 2015

समावेशी विकास के लिए सरकार ठोस क़दम उठाए

निजी क्षेत्र में भी मुसलमानों को समुचित भागीदारी नहीं


देश के निजी क्षेत्र में भी मुसलमानों की सहभागिता की स्थिति अच्छी नहीं है | उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने पिछले दिनों देश के मुसलमानों की बुरी स्थिति की ओर ध्यान दिलाते हुए सरकार और समाज के विभिन्न क्षेत्रों से उनकी हालत सुधारने के लिए दखल देने की अपील की थी। उन्होंने मोदी सरकार से मुस्लिम समाज से भेदभाव की गलती सुधारने की मांग की थी और कहा था कि देश के मुसलमानों को अपनी पहचान, सुरक्षा, शिक्षा एवं सशक्तीकरण बरकरार रखने में समस्या आ रही है। मुसलमानों को आ रही समस्याओं पर सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए और इसे दूर करने के लिए सकारात्मक कदम उठाने चाहिए। उपराष्ट्रपति ने मोदी सरकार के सबका साथ सबका विकास की तर्ज पर मुस्लिमों की पहचान एवं सुरक्षा को मजबूत करने की मांग की थी | उपराष्ट्रपति के इस बयान की सांप्रदायिक सोच वालों ने अपने अंदाज़ में आलोचना की , लेकिन सच्चाई पर पर्दा नहीं डाल सके | मोदी सरकार ने 'सबका साथ - सबका विकास 'का नारा दिया था , लेकिन वह इस पर अपने अब तक के डेढ़ वर्ष के शासनकाल में अमल नहीं कर सकी | विश्‍व आर्थिक मंच (WEF) ने भारत के 'विकास रथ' की चाल को सुस्‍त माना है। उसने समावेशी विकास अर्थात सभी नागरिकों के विकास के मामले में भारत को फिसड्डी घोषित किया है | मंच ने भारत को समावेशी वृद्धि और विकास के लिहाज से ग्‍लोबल रैंकिंग में निचले पायदान पर रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के समावेशी विकास में वृद्धि की सुस्‍त चाल को देखते हुए इस निचले पायदान पर रखा गया है। जबकि कारोबारी और राजनीतिक आचार-नीति के लिहाज से इंटरनेशनल लेवल पर काफी बेहतर स्‍थिति में है। यहां प्रतिव्‍यक्‍ित आय के लिहाज से विभिन्‍न देशों के समूहों में अपनी तरह की पहली वैश्‍विक रैंकिंग में विश्‍व आर्थिक मंच ने पाया कि ज्‍यादातर देशों में आय की असमानता घटाने के बड़े मौके खो रहे हैं और इसमें भारत भी शामिल है। पिछले दो वर्षों में किए गए अध्‍ययन में ऐसे विभिन्‍न तरीकों की पहचान करने की कोशिश की गई है, जिससे नीति-निर्माता आर्थिक वृद्धि तथा समानता दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ा सकते हैं। यही नहीं भारत को कम और मध्‍यम आय वाले 38 देशों में निचले स्‍थान पर रखा है। खास तौर पर वित्त स्थानांतरण के मामले में भारत का प्रदर्शन काफी निराशाजनक है। इस सूची में शामिल 38 देशों में भारत का 37वां स्थान है |

यह एक खुली हुई सच्चाई है कि देश का समावेशी विकास ख़ासकर पक्षपाती मानसिकता के चलते संभव नही हो पा रहा है | सरकारी क्षेत्र में दशकों से असन्तोषजनक स्थिति है | निजी क्षेत्र जिसके बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि वहां मुसलमानों को समाविष्ट किया जाता है , में भी मुसलमानों की अच्छी भागीदारी नहीं है | हाल में आई एक रिपोर्ट के अनुसार , निजी क्षेत्र की अच्छी कंपनियों में मुस्लिम कर्मचारियों का डाटा उपलब्ध नहीं है। वहीं इन कंपनियों में डायरेक्टर और सीनियर एग्जिक्यूटिव्स स्तर पर मुसलमानों की संख्या सिर्फ 2.67 पर्सेंट है। यह डाटा बीएसई 500 में शामिल कंपनियों का है। इनमें डायरेक्टर और सीनियर एग्जिक्यूटिव्स स्तर के कुल 2,324 लोग हैं, जिनमें से सिर्फ 62 मुसलमान हैं। 2,324 टॉप एग्जिक्यूटिव्स को जो सैलरी मिलती है, उसका 3.14 फ़ीसद हिस्सा मुसलमान एग्जिक्यूटिव्स के हाथ लगता है। वहीं, देश की कुल आबादी में मुसलमानों की संख्या 14.2 फ़ीसद है। शेयर बाजार के कुल बाज़ार पूंजी में 93 फ़ीसद बीएसई 500 इंडेक्स में शामिल कंपनियों का है। वहीं, बीएसई 100 इंडेक्स में शामिल कंपनियों के सीनियर मैनेजमेंट में 4.60 फ़ीसद मुसलमान हैं। इनमें डायरेक्टर्स और सीनियर एग्जिक्यूटिव्स लेवल पर कुल 587 लोग हैं, जिनमें से 27 मुसलमान हैं। हालांकि, कुल सैलरी पैकेज में से 2.56 फीसद ही इन लोगों को मिलता है। इसका मतलब यह है कि कॉर्पोरेट इंडिया के राडार पर मुसलमान नहीं हैं। हालांकि, पिछले एक दशक में प्राइवेट सेक्टर ने दलितों को ज्यादा नौकरी देने की कोशिश की है। मुसलमानों के लिए इस तरह की कोई पहल नहीं हुई है, जबकि भा रोजगार की दृष्टि से उनकी हालत बहुत खराब है। सरकारी नौकरियों में भी उनकी संख्या अधिक नहीं है। सरकारी नौकरियों में उनका प्रतिनिधित्व 7 फ़ीसद से भी कम है | सच्चर समिति की सिफ़ारिशों के क्रियान्वयन की हकीक़त को जानने के लिए बनी कमेटी के अध्यक्ष एवं नई दिल्ली स्थित इन्सिटीटयूट ऑफ ह्यूमन डिवेलपमेंट (आई.एच.डी.) के विजिटिंग प्रोफेसर अमिताभ कुंडू के अनुसार , ‘जॉब मार्केट में सबसे बुरी हालत मुसलमानों की है। शहरी क्षेत्रों में उनकी हालत अनुसूचित जनजाति से भी बुरी है।इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट 2014 में सौंपी थी। इसमें कहा गया था कि एससी और एसटी रिजर्वेशन के चलते शहरी क्षेत्रों में पढ़ाई और रोजगार के लिए आते हैं। मुसलमानों के लिए यह सुविधा नहीं है। इस वजह से उन्हें शहरीकरण का भी फायदा नहीं मिल रहा है। कुंडू ने कहा, "हमने सिफ़ारिश की थी कि डाइवर्सिटी इंडेक्स के आधार पर अगर हम कुछ इंसेटिव दे सकें और इस इंसेंटिव सिस्टम में निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों को शामिल कर सकें तो उसका असर ज़्यादा कारगर साबित हो सकेगा | उन्होंने कहा कि , "हमने सिफ़ारिश की थी कि एक डाइवर्सिटी कमीशन बनाना चाहिए | जिन संस्थाओं ने डाइवर्सिटी को बनाकर रखा है, जिन्होंने अपनी नियुक्तियों में, फ़ायदे देने में अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति-जनजाति का ख़्याल रखा है, लैंगिक समानता का ध्यान रखा है- उसकी एक रेटिंग होगी | उस रेटिंग में जो ऊपर आएंगे उन्हें सरकार की ओर से कुछ छूट दी जा सकती है, कुछ उन्हें फंड दिए जा सकते हैं | " ज़ाहिर है , उनकी सिफ़ारिशों पर सरकार ने अब तक कोई ध्यान नहीं दिया है | पुणे बेस्ड फोर्ब्स मार्शल ग्रुप और सी.आई.आई. नेशनल कमेटी ऑन अफर्मेटिव एक्शन के चेयरमैन फरहाद फोर्ब्स का कहा है कि प्राइवेट सेक्टर का फोकस अब तक एससी, एसटी पर रहा है। दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कहा कि मुसलमानों को हाशिए पर रखना पूरे सिस्टम की सेहत के लिए अच्छा नहीं है। सरकार को इस गंभीर स्थिति की ओर फ़ौरन ध्यान देना चाहिए |

राजनीति का जातीय आधार कितना नुकसानदेह ?

राजनीति का जातीय आधार कितना नुकसानदेह ?

देश की आज़ादी के बाद से ही राजनीति को जिस जातीय आधार पर चलाना शुरू किया गया था , आज उसका उत्कर्ष काल चल रहा है और राजनीतिक मान्यताओं का पतन हो रहा है | यह सच है कि जातीय आरक्षण ने इसे ठोस आधार प्रदान किया है | दूसरी ओर कुछ संसदीय सीटों के जातीय आधार पर संवैधानिक आरक्षण ने जातीय राजनीति को बढ़ावा दिया है | नतीजतन आज ऐसी ख़तरनाक स्थिति बन गई है कि संसद , विधानसभाओं से लेकर पंचायतों के सदस्यों तक के चुनाव में जातीयता ही काम करती है , योग्यता का महत्व नहीं रह जाता ! साथ ही आपराधिक प्रवृत्ति मानो योग्यता को बढ़ा देती है ! यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र के लिए कितनी खतरनाक और नुकसानदेह है , बहुत ही आसानी से समझा जा सकता है | हाल में बिहार विधानसभा के लिए सीटों पर उम्मीदवारों की तैनाती में जातीय आधारों ने ही सक्रिय भूमिका निभाई | यह बात और है कि बिहार के राजनेताओं की पुरज़ोर मांग के बावजूद केंद्र सरकार ने जातिगत जनगणना के आंकड़ों को जारी नहीं किया | ऐसा इसलिए हुआ कि ये आंकड़े बिहार चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बन सकते थे और गुजरात के पटेल आन्दोलन की भांति भाजपा के लिए आफ़त की पुड़िया बन सकते थे | फिर भी जातिगत आधार पर चलाई जा राजनीति के ज़िम्मेदार राजनेता ही हैं , जो जातीय मुद्दों को हवा देते और आरक्षण की बात करते नहीं थकते , जबकि यह एक खुली हुई सच्चाई है कि सभी जातियों में गरीब लोग मौजूद हैं | वे भी आरक्षण के उतने ही हक़दार होने चाहिए , जितने अन्य हैं | मगर कुछ पार्टियों के ही नेता इसे तथ्य को स्वीकार करते हैं , वह भी दबी ज़ुबान से ! उन्हें डर है कि इस मामले में जहाँ उनकी ज़ुबान कुछ साफ़ हुई , उनकी राजनीति बंद हो सकती है और वे हाशिए पर जा सकते हैं | इसके बावजूद आरक्षण की बात चलाये रखना कई बड़े राजनेताओं का शगल बन गया है | मिसाल के तौर पर हाल में राजद प्रमुख लालूप्रसाद यादव ने पटना में कायस्थों को आरक्षण दिलाने की बात कही | इसे अच्छा संकेत कहेंगे कि उनकी इस बात का कायस्थ समाज ने स्वागत नहीं किया | इसी प्रकार मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की जगह सभी वर्ग और जाति के आर्थिक रूप से विपन्न लोगों को आरक्षण देने की मांग अब उठ रही है और कुछ लोग इसे आन्दोलन की शक्ल देने की कोशिश कर रहे हैं |

कुछ लोगों द्वारा मौजूदा आरक्षण को ख़ारिज करने के तर्क बार - बार सामने आ रहे हैं | कहा जा रहा है कि 65 साल से आरक्षण पा रही जातियाँ पहले के मुक़ाबले काफ़ी सक्षम और सशक्त हो चुकी हैं | ओबीसी भी पच्चीस साल तक आरक्षण पा चुके? यह मांग ध्यान देने योग्य है कि आरक्षण अगर अब हो तो केवल आर्थिक आधार पर ही हो | जातीय आरक्षण तो बिलकुल होना ही नहीं चाहिए | जातिगत आरक्षण का तो वोट बैंकके लिए बहुत दुरुपयोग हुआ | इससे जातियों में विद्वेष और दूरियाँ ही बढ़ी हैं | समाज में खाइयाँ और चौड़ी हो गयी हैं , अतः इसे बन्द तत्काल बंद करना चाहिए | राजनीति के जातीय चेहरे ने भारतीय जनमानस को बहुत उद्वेलित और परेशान किया है | योग्यता और प्रतिभा पर काफ़ी आघात पहुंचाया है | उत्तर प्रदेश से अक्सर जातीय पक्षपात की खबरे आती रहती हैं | वहां पी सी एस परीक्षा में जातीयता का खुलासा हो चूका है | पीसीएस 2011 परीक्षा का इंटरव्यू अखिलेश यादव सरकार के समय पिछले साल हुआ था |चौंकाने वाली बात यह है कि पिछड़े वर्ग में 86 उम्मीदवारों को चुना गया, जिसमें से 50 यादव थे | एकाध उम्मीदवारों को छोड़कर यादव जाति में सभी उम्मीदवारों को 135 से 140 के बीच इंटरव्यू में नंबर मिले | खास बात यह रही कि यादव जाति के जिन उम्मीदवारों के नंबर मेंस में दूसरे उम्मीदवारों से कम रहे, वे भी इंटरव्यू में सबसे ज्यादा नंबर पा गए | इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के विभागाध्यक्ष मुश्ताक अली साहब लोक सेवा आयोग के इम्तिहानों में उम्मीदवारों का इंटरव्यू लेते रहे हैं | मुश्ताक साहब ने खुलासा किया कि भले ही सरकार इंटरव्यू बोर्ड को जितना भी गोपनीय रखे, फिर भी कहीं ना कहीं सिफारिश अपना काम कर जाती है | इसी प्रदेश में अब अधिकांश पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति जातीय आधार पर करने के आरोप राज्य सरकार पर लगे हैं | ज़ाहिर है , जब स्थिति इतनी गंभीर हो जनता का समावेशी विकास कैसे हो सकता है | इससे तो पारस्परिक वैमनस्यता ही बढ़ेगी , जो विकास में बड़ी बाधक होगी |

अलीगढ़ की घटना से सबक़


13 सितंबर 2015 ... सुबह का वक्त .... अलीगढ़ के थाना जवां क्षेत्र के गांव कस्तली के पास गोकुशी की घटना की ख़बर पाकर आसपास के कई गांवों के लोग भड़क गए। 21 गायों को काटने की बात कही गई | नतीजतन गोकुशी के आरोपियों के मैक्स लोडर व बाइक को आग लगा दी।निजी बस समेत कई वाहनों में तोड़-फोड़ की। पुलिस के खदेड़ने पर हमलावर हुई भीड़ ने पथराव कर दिया जिसमें एसपी देहात समेत कई पुलिसकर्मी चोटिल हो गए।भीड़ ने थाने का घेराव कर खरी-खोटी भी सुनाई।पुलिस ने गोकशी के आरोप में दोमहिलाओं समेत 11 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है |
11 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा-सुमेरा गांव के धनंजय शर्मा पुत्र रामवीर शर्मा की तहरीर पर पुलिस ने डल सिंह पुत्र छौजी सिंह, विजय सिंह पुत्र सोजी सिंह निवासी देवली टोंक, विजय सिंह पुत्र नन्नू सिंह निवासी प्रतापनगर कालोनी थाना देवली टोंक, राम सिंह पुत्र नन्नू सिंह, मोहर सिंह पुत्र विजय सिंह देवली टोंक, दुर्गा पुत्र रत्‍‌ना निवासी ढावा देव थाना मोदक कोटा, शरमा पुत्र विजय सिंह निवासी देवली टोंक, शोभा पुत्र नक्कू निवासी देवली टोंक, मोहनलाल उर्फ शरमा पुत्र अमर सिंह व काली देवी पत्नी डल सिंह देवली, प्रेमाबाई पत्‍‌नी विजय सिंह देवली टोंक के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।सभी आरोपी राजस्थान के हैं उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है।
लापरवाही और ढिलाई बरतने के आरोप में इंस्पेक्टर रामदरश यादव, दारोगा दिनेश कुमार, सिपाही सुरेंद्र सिंह, विमल कुमार, शोभाराम, सुरेश सिंह व अवधेश कुमार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। प्राप्त विवरण के अनुसार , घटना कर दिन सुबह छह बजे जवां पुलिस को सूचना मिली कि गांव कस्तली में कासिमपुर पावर हाउस के एश डंप यार्ड के पास कुछ गायों को ज़िबह कर दिया गया है।यह खबर मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंच गई।आसपास के गांव फरीदपुर, पला, सुमेरा व छेरत, अमरौली, मंजूरगढ़ी से भीड़ भी जा पहुंची।लोगों ने देखा कि कुछ लोग मैक्स लोडर में मीट लादकर भाग रहे हैं तो उन्हें रोक लिया।लोडर व उनकी एक बाइक में आग लगा दी।पुलिस ने भीड़ को खदेड़ दिया।जवाब में भीड़ ने पुलिस पर पथराव कर दिया।तब तक एसपी देहात संसार सिंह ने कई थानों की पुलिस के साथ जा पहुंचे।पथराव में एसपी देहात संसार सिंह, इंस्पेक्टर सिविल लाइंस सूर्यकांत द्विवेदी, अमरौली चौकी इंचार्ज अवनीश चंद्र दुबे सहित कई पुलिसकर्मी घायल हो गए।
गोकशी की घटना के विरोध में जवां का बाजार बंद रहा।लोगों ने तीन जगह जाम लगाकर प्रदर्शन किया।प्राइवेट बस समेत कई वाहनों के शीशे तोड़ दिए। जाम-प्रदर्शन में भाजपाइयों समेत बड़ी संख्या में हिंदूवादी संगठनों के लोग भी मौजूद रहे। यह हमारे देश की पहली घटना नहीं है , बल्कि ऐसी घटनाएं आए दिन घटती हैं और बदअमनी पैदा करती हैं | इससे देश का सामाजिक ताना - बाना बिगड़ता है | कानूनन उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में गोकुशी पर पाबंदी है , फिर भी ऐसी घटनाओं का घटित होना यकीनन चिंता और तशवीश की बात है |
यह भी सच है कि पाबंदी के मामले में धार्मिकता की जगह राजनितिक पुट अधिक देखा जाता है | वैसे देखा जाए तो बीफ मुख्यत: गरीबों का भोजन है, चाहे उसका कोई भी धार्मिक संबंध हो। इसके अलावा इसके जरिए गरीबों को सबसे सस्ते में प्रोटीन मिल जाता है। सरकारी आंकड़े खुद यह बताते हैं कि गैर शाकाहारी भोजन में बीफ सामान्यत: अधिक खाया जाता है। यूनाइटेड नेशंस फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में जो सबसे अधिक मांस खाया जाता है वह बीफ है।
पश्चिम बंगाल और केरल में गोमांस गैरकानूनी नहीं है। हिंदुओं की ऐसी बहुत बड़ी संख्या है जो गोवंश का गोश्त खाती है। दक्षिण केरल में सभी समुदायों, जिसमें हिंदू भी शामिल हैं, द्वारा जितना गोश्त खाया जाता है उसमें आधा हिस्सा बीफ का होता है। साफ है कि बीफ गरीबों का भोजन है जिसे केवल मुसलमान ही नहीं खाते हैं। वर्तमान में केरल में 72 समुदाय ऐसे हैं, जिनमें सभी अछूत नहीं हैं, जो महंगे बकरे के गोश्त के बजाय गोवंश के जानवरों के गोश्त को ज्यादा तरजीह देते हैं। अतः इसे लेकर हिंसा , तनाव उत्पन्न करना हर दृष्टि से निंदनीय - भर्त्सनीय है |

Sep 10, 2015

समावेशी विकास के लिए सरकार ठोस क़दम उठाए

निजी क्षेत्र में भी मुसलमानों को समुचित भागीदारी नहीं

देश के निजी क्षेत्र में भी मुसलमानों की सहभागिता की स्थिति अच्छी नहीं है | उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने पिछले दिनों देश के मुसलमानों की बुरी स्थिति की ओर ध्यान दिलाते हुए सरकार और समाज के विभिन्न क्षेत्रों से उनकी हालत सुधारने के लिए दखल देने की अपील की थी। उन्होंने मोदी सरकार से मुस्लिम समाज से भेदभाव की गलती सुधारने की मांग की थी और कहा था कि देश के मुसलमानों को अपनी पहचान, सुरक्षा, शिक्षा एवं सशक्तीकरण बरकरार रखने में समस्या आ रही है। मुसलमानों को आ रही समस्याओं पर सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए और इसे दूर करने के लिए सकारात्मक कदम उठाने चाहिए। उपराष्ट्रपति ने मोदी सरकार के सबका साथ सबका विकास की तर्ज पर मुस्लिमों की पहचान एवं सुरक्षा को मजबूत करने की मांग की थी | उपराष्ट्रपति के इस बयान की सांप्रदायिक सोच वालों ने अपने अंदाज़ में आलोचना की , लेकिन सच्चाई पर पर्दा नहीं डाल सके | मोदी सरकार ने 'सबका साथ - सबका विकास 'का नारा दिया था , लेकिन वह इस पर अपने अब तक के डेढ़ वर्ष के शासनकाल में अमल नहीं कर सकी | विश्‍व आर्थिक मंच (WEF) ने भारत के 'विकास रथ' की चाल को सुस्‍त माना है। उसने समावेशी विकास अर्थात सभी नागरिकों के विकास के मामले में भारत को फिसड्डी घोषित किया है | मंच ने भारत को समावेशी वृद्धि और विकास के लिहाज से ग्‍लोबल रैंकिंग में निचले पायदान पर रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के समावेशी विकास में वृद्धि की सुस्‍त चाल को देखते हुए इस निचले पायदान पर रखा गया है। जबकि कारोबारी और राजनीतिक आचार-नीति के लिहाज से इंटरनेशनल लेवल पर काफी बेहतर स्‍थिति में है। यहां प्रतिव्‍यक्‍ित आय के लिहाज से विभिन्‍न देशों के समूहों में अपनी तरह की पहली वैश्‍विक रैंकिंग में विश्‍व आर्थिक मंच ने पाया कि ज्‍यादातर देशों में आय की असमानता घटाने के बड़े मौके खो रहे हैं और इसमें भारत भी शामिल है। पिछले दो वर्षों में किए गए अध्‍ययन में ऐसे विभिन्‍न तरीकों की पहचान करने की कोशिश की गई है, जिससे नीति-निर्माता आर्थिक वृद्धि तथा समानता दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ा सकते हैं। यही नहीं भारत को कम और मध्‍यम आय वाले 38 देशों में निचले स्‍थान पर रखा है। खास तौर पर वित्त स्थानांतरण के मामले में भारत का प्रदर्शन काफी निराशाजनक है। इस सूची में शामिल 38 देशों में भारत का 37वां स्थान है |
यह एक खुली हुई सच्चाई है कि देश का समावेशी विकास ख़ासकर पक्षपाती मानसिकता के चलते संभव नही हो पा रहा है | सरकारी क्षेत्र में दशकों से असन्तोषजनक स्थिति है | निजी क्षेत्र जिसके बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि वहां मुसलमानों को समाविष्ट किया जाता है , में भी मुसलमानों की अच्छी भागीदारी नहीं है | हाल में आई एक रिपोर्ट के अनुसार , निजी क्षेत्र की अच्छी कंपनियों में मुस्लिम कर्मचारियों का डाटा उपलब्ध नहीं है। वहीं इन कंपनियों में डायरेक्टर और सीनियर एग्जिक्यूटिव्स स्तर पर मुसलमानों की संख्या सिर्फ 2.67 पर्सेंट है। यह डाटा बीएसई 500 में शामिल कंपनियों का है। इनमें डायरेक्टर और सीनियर एग्जिक्यूटिव्स स्तर के कुल 2,324 लोग हैं, जिनमें से सिर्फ 62 मुसलमान हैं। 2,324 टॉप एग्जिक्यूटिव्स को जो सैलरी मिलती है, उसका 3.14 फ़ीसद हिस्सा मुसलमान एग्जिक्यूटिव्स के हाथ लगता है। वहीं, देश की कुल आबादी में मुसलमानों की संख्या 14.2 फ़ीसद है। शेयर बाजार के कुल बाज़ार पूंजी में 93 फ़ीसद बीएसई 500 इंडेक्स में शामिल कंपनियों का है। वहीं, बीएसई 100 इंडेक्स में शामिल कंपनियों के सीनियर मैनेजमेंट में 4.60 फ़ीसद मुसलमान हैं। इनमें डायरेक्टर्स और सीनियर एग्जिक्यूटिव्स लेवल पर कुल 587 लोग हैं, जिनमें से 27 मुसलमान हैं। हालांकि, कुल सैलरी पैकेज में से 2.56 फीसद ही इन लोगों को मिलता है। इसका मतलब यह है कि कॉर्पोरेट इंडिया के राडार पर मुसलमान नहीं हैं। हालांकि, पिछले एक दशक में प्राइवेट सेक्टर ने दलितों को ज्यादा नौकरी देने की कोशिश की है। मुसलमानों के लिए इस तरह की कोई पहल नहीं हुई है, जबकि भा रोजगार की दृष्टि से उनकी हालत बहुत खराब है। सरकारी नौकरियों में भी उनकी संख्या अधिक नहीं है। सरकारी नौकरियों में उनका प्रतिनिधित्व 7 फ़ीसद से भी कम है | सच्चर समिति की सिफ़ारिशों के क्रियान्वयन की हकीक़त को जानने के लिए बनी कमेटी के अध्यक्ष एवं नई दिल्ली स्थित इन्सिटीटयूट ऑफ ह्यूमन डिवेलपमेंट (आई.एच.डी.) के विजिटिंग प्रोफेसर अमिताभ कुंडू के अनुसार , ‘जॉब मार्केट में सबसे बुरी हालत मुसलमानों की है। शहरी क्षेत्रों में उनकी हालत अनुसूचित जनजाति से भी बुरी है।’ इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट 2014 में सौंपी थी। इसमें कहा गया था कि एससी और एसटी रिजर्वेशन के चलते शहरी क्षेत्रों में पढ़ाई और रोजगार के लिए आते हैं। मुसलमानों के लिए यह सुविधा नहीं है। इस वजह से उन्हें शहरीकरण का भी फायदा नहीं मिल रहा है। कुंडू ने कहा, "हमने सिफ़ारिश की थी कि डाइवर्सिटी इंडेक्स के आधार पर अगर हम कुछ इंसेटिव दे सकें और इस इंसेंटिव सिस्टम में निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों को शामिल कर सकें तो उसका असर ज़्यादा कारगर साबित हो सकेगा | उन्होंने कहा कि , "हमने सिफ़ारिश की थी कि एक डाइवर्सिटी कमीशन बनाना चाहिए | जिन संस्थाओं ने डाइवर्सिटी को बनाकर रखा है, जिन्होंने अपनी नियुक्तियों में, फ़ायदे देने में अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति-जनजाति का ख़्याल रखा है, लैंगिक समानता का ध्यान रखा है- उसकी एक रेटिंग होगी | उस रेटिंग में जो ऊपर आएंगे उन्हें सरकार की ओर से कुछ छूट दी जा सकती है, कुछ उन्हें फंड दिए जा सकते हैं | " ज़ाहिर है , उनकी सिफ़ारिशों पर सरकार ने अब तक कोई ध्यान नहीं दिया है | पुणे बेस्ड फोर्ब्स मार्शल ग्रुप और सी.आई.आई. नेशनल कमेटी ऑन अफर्मेटिव एक्शन के चेयरमैन फरहाद फोर्ब्स का कहा है कि प्राइवेट सेक्टर का फोकस अब तक एससी, एसटी पर रहा है। दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कहा कि मुसलमानों को हाशिए पर रखना पूरे सिस्टम की सेहत के लिए अच्छा नहीं है। सरकार को इस गंभीर स्थिति की ओर फ़ौरन ध्यान देना चाहिए |

देश की गरीबी काबू में क्यों नहीं ?

देश की गरीबी काबू में क्यों नहीं ?

हमारे देश में गरीबी के आंकडे बड़े भयावह हैं | इन आंकड़ों की असलियत और सच्चाई पर बार - बार उठनेवाले सवालों के बावजूद देश की गरीबी और बदहाली को छिपाया नहीं जा सका है | हाल के सर्वेक्षणों में यह बात नुमायाँ तौर पर सामने आ रही है कि 1991 में तत्कालीन कांग्रेस नीत  केंद्र सरकार ने जो आर्थिक उदारीकरण प्रक्रिया शुरू की थी , उसका गरीबी बढ़ानेवाला घातक परिणाम आज  ही सामने आ रहा है , क्योंकि किसी भी सरकार ने इस पर रोक नहीं लगाई है | भाजपा जब केन्द्रीय सत्ता से बाहर थी , तो उदारीकरण के विरुद्ध बोलती थी , लेकिन सत्ता पाते ही उसकी बोलती बंद ही नहीं हो गई , उसके ख़ुद के क़दम प्राथमिकता के साथ उदारीकरण की ओर ही बढ़े ! हमारा देश ग्राम प्रधान देश है , इसलिए कहा जाता है कि देश की आत्मा गांवों में बसती है | अतः देश की गरीबी में कमीबेशी का सीधा प्रभाव ग्रामीणों पर पडता है | देश की 125 करोड़ आबादी में से गांवों में रहनेवाले 70 फीसद लोगों के लिए गरीबी जीवन का कडुवा सच है | यह बात भी सौ फीसद सच है कि ग्रामीण भारत उससे अधिक गरीब है , जितना अब तक आकलन किया गया था | झूठे सर्वेक्षणों से बार - बार ग्रामीण भारत की भी गलत तस्वीर सामने आती रही है | एक सर्वेक्षण के अनुसार ,  ग्रामीण क्षेत्रों में कमानेवाले लोगों में से 75 फीसद की महीने भर की अधिकतम आय पांच हज़ार रूपये से अधिक नहीं है | 51 फीसद परिवार मानव श्रम पर निर्भर हैं | यही उनकी आय का प्राथमिक स्रोत है | हमारे देश के ग्रामीण विकास के जो भी बढ़ - चढ़ कर दावे किए जा रहे हैं , उनमें अधिक सच्चाई नहीं है | सर्वेक्षण में पाया गया कि विगत वर्षों में विकास की चाहे जितनी बातें हुई हों , गांवों में गरीबी की जडें गहरी बनी हुई हैं | उल्लेखनीय है कि मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों और नीति - निर्धारकों ने ग्रामीण गरीबी को ढांकने - छिपाने की नाकाम कोशिश की है ! सुप्रीमकोर्ट ने 2011 में इन्हीं आंकड़ों पर सवालिया निशान लगाया था और पूछा था कि गरीबों की संख्या निर्धारित करने के क्या आधार हैं ? इससे पहले किसी ने कृत्रिम रूप से नीचे रखी गई गरीबी रेखा कभी उँगली नहीं उठाई थी | उस समय तत्कालीन योजना आयोग उन लोगों को गरीब बता रहा था , जो शहरी इलाक़ों में रोज़ाना 17 रूपये और ग्रामीण इलाक़ों में रोज़ाना 12 रूपये खर्च कर रहे थे | शीर्ष अदालत ने कहा कि ' यहाँ दो भारत नहीं हो सकते | '  अदालत ने ये तीखी टिप्पणियां पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की जनहित याचिका की सुनवाई करते समय कीं थीं। उसने हरेक राज्य में बीपीएल परिवारों की संख्या 36 फीसदी तय करने के पीछे योजना आयोग के तर्को को जानना चाहा था । शीर्ष कोर्ट ने जानना चाहा कि 1991 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर 2011 के लिए यह प्रतिशत कैसे तय कर लिया गया ? वास्तव में यह सवाल बार - बार खड़ा होता है कि एक ओर देश तरक्की कर रहा है , दूसरी ओर गरीबों की संख्या काबू में क्यों नहीं आ पा रही है ?

Sep 7, 2015

वाचर ने दिया पुख्ता सबूत , मज़दूरी देने से बलरामपुर वन प्रभाग अब कैसे करेगा इन्कार ?

धरना - प्रदर्शन और मामले को हाईकोर्ट ले जाने की तैयारी 

सोहेलवा वन्य जीव प्रभाग , बलरामपुर  लंबे समय से तरह - तरह की अनियमितताओं और भ्रष्टाचार का शिकार है | इस वन प्रभाग के बनकटवा परिक्षेत्र में दर्जन भर से अधिक मनरेगा श्रमिकों से काम लेने के लगभग डेढ़ वर्ष बाद भी मज़दूरी नहीं मिल पाई है | अधिकारी काम लेने से इन्कार कर रहे हैं और हज़ारों रुपयों की मज़दूरी डकार चुके हैं | दूसरी ओर काम लेनेवाले वाचर ने लिखित रूप में कहा है कि उसने श्रमिकों से काम लिया है | इससे एक बार फिर वन विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों पर गाज गिरी है और उन पर वर्षों से लंबित मजदूरी भुगतान करने का दबाव बढ़ गया है |
उल्लेखनीय है कि इन श्रमिकों में से चार श्रमिकों - रामफल , कृपाराम , बड़कऊ और राम बहादुर को मज़दूरी अदा करने की बात प्रभागीय वनाधिकारी करते हैं , जबकि ये श्रमिक भी मजदूरी मिलने से इन्कार करते हैं | बनकटवा वन क्षेत्र के पूर्व फारेस्ट गार्ड नूरुल हुदा तो किसी भी श्रमिक को पहचानने तक से इन्कार करते हैं , जबकि उनके और वाचर सिया राम द्वारा विभिन्न अवधियों में काम लिया गया था |
वाचर सिया राम ने लिखित रूप में माना है कि श्रमिकों से काम लिया | पांच जनवरी 2015 को कलमबंद की गई उनकी तहरीर इस प्रकार है -
'' मैंने 13 जनवरी 2014 से 26 मार्च 2014 के बीच विभिन्न अवधियों में ग्राम मैनडीह और टेंगनवार निवासी गण सर्वश्री केशव राम , राम वृक्ष , मझिले यादव , राम बहादुर , बड़कऊ यादव , कृपा राम , खेदू यादव , राम प्यारे , शिव वचन , शंभू यादव , संतोष कुमार यादव , रामफल आदि से वृक्षारोपण और झाड़ी की सफ़ाई आदि का कार्य लिया | फारेस्ट गार्ड नूरुल हुदा की निगरानी में मैंने यह कार्य कराया | बिना किसी भय , दबाव के शांत चित्त के साथ उक्त लिखित तथ्यों को पढ़वा कर - समझ बूझ कर ही मैंने इस तहरीर पर अंगूठा लगाया है |'' 
इस तहरीर पर गवाह के तौर पर मैनडीह ग्राम के निवासी राजकुमार मिश्रा और रामकुमार के हस्ताक्षर हैं | मजदूरों ने बताया कि वे अपनी मज़दूरी लेने के लिए धरना - प्रदर्शन और लेबर कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं | रिहाई मंच , लखनऊ के वरिष्ठ नेता श्री राजीव यादव ने बताया कि यदि बलरामपुर वन विभाग इस मामले में त्वरित कार्रवाई करके सभी श्रमिकों को उनकी मज़दूरी अदा नहीं करता तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय में पी .आई . एल दाख़िल किया जाएगा |    
ज्ञातव्य है कि उक्त श्रमिक अपनी मज़दूरी को पाने के लिए विभिन्न उच्चाधिकारियों से लिखित रूप में निवेदन के चुके हैं , लेकिन कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं की गई | कह दिया गया कि किसी ने काम ही नहीं लिया गया | फिर कहा कि हाँ , चार ने कार्य किया , लेकिन श्रमिकों के अनुसार ,उन्हें भी मज़दूरी भुगतान नहीं गई ! बनकटवा के रेंजर पी. डी . राय लिखते हैं कि ‘’ स्पष्ट है कि जब दि . 28 – 1 – 14 को काम प्रारंभ हुआ तो दिनांक 26 – 3 – 14 जैसा कि शिकायतकर्ता ने अपने [ अपनी ] शिकायत में लिखा है | शिकायतकर्ता द्वारा कैसे 70 दिन काम किया गया | ‘’ इस तथ्य के विपरीत अब प्रभागीय वनाधिकारी एस . एस . श्रीवास्तव लिखते हैं कि ‘’ शिकायतकर्ता श्रमिकों द्वारा कार्य करने की समयावधि दिनांक 13 – 01 – 2014 से 26 – 03- 2014 तक बताई गई है’’ , जो 70 दिन से अधिक है | इस मामले में फर्जी ढंग से अपनों को भुगतान करवाकर मज़दूरी हड़पने में बनकटवा वन क्षेत्र के वाचर राम किशुन पर अधिकारियों की पर्याप्त मदद करने का आरोप है |     
 एक आर . टी . आई . के उत्तर में बलरामपुर के प्रभागीय वनाधिकारी श्री श्रीवास्तव ने बहुत - से तथ्यों को छिपा लिया है | आरोप है कि वे भ्रष्टाचारियों को प्रश्रय दे रहे हैं | ' कान्ति '[ साप्ताहिक ] के उपसंपादक मुहम्मद यूसुफ ' मुन्ना ' ने सूचना आयुक्त , लखनऊ के पास इस मामले को पेश किया है | उन्होंने अपनी शिकायत का आधार संबंधित अधिकारी के भ्रामक , अपूर्ण , टालू , तथ्यों को छिपानेवाला , अकर्मण्यतापूर्ण जवाब और सूचनाधिकार अधिनियम के प्रावधानों के विरुद्ध बताया हैं
सूचना आयुक्त को लिखित रूप में बताया गया है कि सूचनाधिकार अधिनियम 2005 के अध्याय 1 - प्रारंभिक | अध्याय 2 - '' सूचना का अधिकार और लोक प्राधिकारियों की बाध्यताएं '' शीर्षक के अंतर्गत , अनुच्छेद  4  में लिखा है कि '' डिस्केट , फ्लापी , टेप , वीडियो कैसेट के रूप में या किसी अन्य इलेक्ट्रानिक रीति में या प्रिंटआउट के माध्यम से सूचना को , जहाँ ऐसी सूचना किसी  कम्प्यूटर या किसी अन्य युक्ति में अंतरित है , अभिप्राप्त करना | ''
अपने उत्तर में प्रभागीय वनाधिकारी , सोहेलवा वन्य जीव प्रभाग , बलरामपुर [ उत्तर प्रदेश ] ने किसी दस्तावेज को संलग्न नहीं किया है और बार - बार वेब पोर्टल देखने को निर्दिष्ट किया है , जो कानून के विरुद्ध है | उत्तर की अन्य बातें भ्रामक , अपूर्ण और नियम के प्रतिकूल हैं -
1 . प्रश्न संख्या 1 के उत्तर में कहा गया है कि 20.12.2014 को शिकायत का पत्र प्राप्त हुआ , जिसका उत्तर 16.01.2015 को दिया गया | ज्ञातव्य है कि मनरेगा पोर्टल पर यह शिकायत ऑनलाइन 03.08.2014 को की गई थी | यह उत्तर भ्रामक है | यह पोर्टल 01 . 06 . 15 से भुगतान न होने के कारण बंद कर दिया है , जो आज की तिथि तक बंद है
2.  प्रश्न संख्या 2 कर उत्तर में अपूर्ण जानकारी दी गई है | यह नहीं बताया गया कि मजदूरी का भुगतान किस विधि से और किन बैंक खातों में किया गया ? जबकि इस बाबत पूर्ण विवरण उपलब्ध कराने की सूचना मांगी गई थी | मजदूरों के अनुसार , उन्हें न तो बैंक खातों या अन्य किसी माध्यम से मजदूरी का भुगतान किया गया है | उत्तर में यह सूचना स्पष्ट रूप से छिपा ली गई है | इस प्रश्न के उत्तर में मनरेगा पोर्टल देखने की बात लिखी गई है |
3. प्रश्न 4 के उत्तर में भी भ्रामक जानकारी दी गई है | कहा गया है कि मनरेगा मजदूरों की समस्याओं के निदान हेतु कोई सरकारी दिशा - निर्देश / अधिसूचना कार्यालय में मौजूद नहीं है | उल्लेखनीय है कि इस बाबत सरकारी अधिसूचना संख्या 1308/38 - 7 - 09 - 45 एन . आर . ई . जी . ए . - 08 के अंतर्गत शिकायत निवारण तंत्र नियमावली 2009 मौजूद है , जो 24 सितंबर 2009 से लागू है |    
4 . प्रश्न 8 के उत्तर में कोई दस्तावेज न देकर मनरेगा वेब पोर्टल को देखने को निर्दिष्ट किया गया है , जो सूचनाधिकार कानून के विरुद्ध है
5 . प्रश्न 9 का उत्तर भी अपूर्ण है | यह कहकर दस्तावेज नहीं प्रदान किया गया कि वॉउचर्स पर कार्य नहीं लिया जाता , बल्कि मस्टर रोल जारी किया जाता है और इसे ब्लाक को वापस कर दिया जाता है , अर्थात विभाग के पास कोई रिकार्ड नहीं  रहता | यह उत्तर भी भ्रामक और अपूर्ण है |     
 बलरामपुर वन विभाग की कार्य प्रणाली से राज्य सरकार भी असंतुष्ट है | अभी पिछले दिनों वन एवं युवा कल्याण राज्यमंत्री फरीद महफूज किदवाई ने बलरामपुर के वनाधिकारियों को अवैध रूप लगातार काटे जा रहे पेड़ों और वन माफ़िया को पनपाने पर कड़ी फटकर लगाई | उन्होंने कहा कि बलरामपुर जिले में वन सुरक्षित नहीं है। जंगल काटने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। जंगल से पेड़ों के अवैध कटान को रोकने के लिए जिले में परमिट जारी करने पर रोक लगाने पर भी विचार किया जाएगा। क्योंकि यहां बड़ों (सफेदपोश) के संरक्षण में वनों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। इसके लिए मुख्यमंत्री से सीधी बात करूंगा।
लखनऊ से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक के विगत छह अगस्त के अंक में प्रकाशित खबर पर संज्ञान लेकर उत्तर प्रदेश के वन एवं युवा कल्याण राज्यमंत्री फरीद महफूज किदवई ने सोहेलवा जंगल के बरहवा रेंज का औचक निरीक्षण किया। मंत्री महोदय खबर में इंगित गनेशपुर व गदाखैव्वा बीट तक गए। गनेशपुर बीट का उन्होंने चीफ कंजरवेटर उरबिला थामस  और प्रभागीय वनाधिकारी एस .एस . श्रीवास्तव के साथ निरीक्षण किया। 

राज्यमंत्री के मुताबिक़ , गनेशपुर बीट में करीब सौ बूट (जड़) मिले हैं। इनमें कई पुराने है जिनमें नंबर पड़ा है , लेकिन पांच बूट नए कटान के भी मिले हैं। सोहेलवा जंगल में पेड़ों की कटान अंधाधुंध हो रही हैं। इस कार्य में बड़े लोगों का लकड़ी काटने वालों को संरक्षण मिला है। जिम्मेदार अधिकारी भी जानकर अनजान बने बैठे हैं। यह स्थिति ठीक नहीं है। वन की सुरक्षा मुख्यमंत्री की प्राथमिकता में है। गनेशपुर व गदाखौव्वा बीट सहित जंगल में काटे गए पेड़ों की सजा जिम्मेदारों को मिलेगी। राज्य मंत्री ने कहा कि वे मुख्यमंत्री से मुलाकात कर स्थिति से अवगत कराएंगे। किसी को बख्शा नहीं जाएगा। इसमें कार्रवाई तय है। आसपास के गांव के लोगों ने पेड़ काटने वालों के नाम राज्यमंत्री महोदय को बताये |