Oct 24, 2015

अलीगढ़ की घटना से सबक़

अलीगढ़ की घटना से सबक़

13 सितंबर 2015 ... सुबह का वक्त .... अलीगढ़ के थाना जवां क्षेत्र के गांव कस्तली के पास गोकुशी की घटना की ख़बर पाकर आसपास के कई गांवों के लोग भड़क गए। 21 गायों को काटने की बात कही गई | नतीजतन गोकुशी के आरोपियों के मैक्स लोडर व बाइक को आग लगा दी।निजी बस समेत कई वाहनों में तोड़-फोड़ की। पुलिस के खदेड़ने पर हमलावर हुई भीड़ ने पथराव कर दिया जिसमें एसपी देहात समेत कई पुलिसकर्मी चोटिल हो गए।भीड़ ने थाने का घेराव कर खरी-खोटी भी सुनाई।पुलिस ने गोकशी के आरोप में दो महिलाओं समेत 11 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है |
11 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा-सुमेरा गांव के धनंजय शर्मा पुत्र रामवीर शर्मा की तहरीर पर पुलिस ने डल सिंह पुत्र छौजी सिंह, विजय सिंह पुत्र सोजी सिंह निवासी देवली टोंक, विजय सिंह पुत्र नन्नू सिंह निवासी प्रतापनगर कालोनी थाना देवली टोंक, राम सिंह पुत्र नन्नू सिंह, मोहर सिंह पुत्र विजय सिंह देवली टोंक, दुर्गा पुत्र रत्‍‌ना निवासी ढावा देव थाना मोदक कोटा, शरमा पुत्र विजय सिंह निवासी देवली टोंक, शोभा पुत्र नक्कू निवासी देवली टोंक, मोहनलाल उर्फ शरमा पुत्र अमर सिंह व काली देवी पत्नी डल सिंह देवली, प्रेमाबाई पत्‍‌नी विजय सिंह देवली टोंक के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।सभी आरोपी राजस्थान के हैं उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है।
लापरवाही और ढिलाई बरतने के आरोप में इंस्पेक्टर रामदरश यादव, दारोगा दिनेश कुमार, सिपाही सुरेंद्र सिंह, विमल कुमार, शोभाराम, सुरेश सिंह व अवधेश कुमार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। प्राप्त विवरण के अनुसार , घटना कर दिन सुबह छह बजे जवां पुलिस को सूचना मिली कि गांव कस्तली में कासिमपुर पावर हाउस के एश डंप यार्ड के पास कुछ गायों को ज़िबह कर दिया गया है।यह खबर मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंच गई।आसपास के गांव फरीदपुर, पला, सुमेरा व छेरत, अमरौली, मंजूरगढ़ी से भीड़ भी जा पहुंची।लोगों ने देखा कि कुछ लोग मैक्स लोडर में मीट लादकर भाग रहे हैं तो उन्हें रोक लिया।लोडर व उनकी एक बाइक में आग लगा दी।पुलिस ने भीड़ को खदेड़ दिया।जवाब में भीड़ ने पुलिस पर पथराव कर दिया।तब तक एसपी देहात संसार सिंह ने कई थानों की पुलिस के साथ जा पहुंचे।पथराव में एसपी देहात संसार सिंह, इंस्पेक्टर सिविल लाइंस सूर्यकांत द्विवेदी, अमरौली चौकी इंचार्ज अवनीश चंद्र दुबे सहित कई पुलिसकर्मी घायल हो गए।
गोकशी की घटना के विरोध में जवां का बाजार बंद रहा।लोगों ने तीन जगह जाम लगाकर प्रदर्शन किया।प्राइवेट बस समेत कई वाहनों के शीशे तोड़ दिए। जाम-प्रदर्शन में भाजपाइयों समेत बड़ी संख्या में हिंदूवादी संगठनों के लोग भी मौजूद रहे। यह हमारे देश की पहली घटना नहीं है , बल्कि ऐसी घटनाएं आए दिन घटती हैं और बदअमनी पैदा करती हैं | इससे देश का सामाजिक ताना - बाना बिगड़ता है | कानूनन उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में गोकुशी पर पाबंदी है , फिर भी ऐसी घटनाओं का घटित होना यकीनन चिंता और तशवीश की बात है |
यह भी सच है कि पाबंदी के मामले में धार्मिकता की जगह राजनितिक पुट अधिक देखा जाता है | वैसे देखा जाए तो बीफ मुख्यत: गरीबों का भोजन है, चाहे उसका कोई भी धार्मिक संबंध हो। इसके अलावा इसके जरिए गरीबों को सबसे सस्ते में प्रोटीन मिल जाता है। सरकारी आंकड़े खुद यह बताते हैं कि गैर शाकाहारी भोजन में बीफ सामान्यत: अधिक खाया जाता है। यूनाइटेड नेशंस फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में जो सबसे अधिक मांस खाया जाता है वह बीफ है।
पश्चिम बंगाल और केरल में गोमांस गैरकानूनी नहीं है। हिंदुओं की ऐसी बहुत बड़ी संख्या है जो गोवंश का गोश्त खाती है। दक्षिण केरल में सभी समुदायों, जिसमें हिंदू भी शामिल हैं, द्वारा जितना गोश्त खाया जाता है उसमें आधा हिस्सा बीफ का होता है। साफ है कि बीफ गरीबों का भोजन है जिसे केवल मुसलमान ही नहीं खाते हैं। वर्तमान में केरल में 72 समुदाय ऐसे हैं, जिनमें सभी अछूत नहीं हैं, जो महंगे बकरे के गोश्त के बजाय गोवंश के जानवरों के गोश्त को ज्यादा तरजीह देते हैं। अतः इसे लेकर हिंसा , तनाव उत्पन्न करना हर दृष्टि से निंदनीय - भर्त्सनीय है |

सांप्रदायिकता एवं फासीवाद - भारतीय समाज के दो बड़े शत्रु

सांप्रदायिकता एवं फासीवाद - भारतीय समाज के दो बड़े शत्रु


देश में सांप्रदायिकता और फासीवाद का बढ़ता रुझान बहुत चिंताजनक और आत्मघाती है | उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर स्थित दादरी के बिसहड़ा गांव में पिछले दिनों जो कुछ घटित हुआ , वह इस कुप्रवृत्ति का जीवंत उदाहरण है | वैसे पिछले कुछ समय से ऐसी घटनाएं घटित होती रही हैं , जिनसे साफ़ पता चलता है कि देश में ऐसे लोग मौजूद हैं , जो हिंसा , अराजकता और स्वेच्छाचारिता पर यक़ीन रखते हैं और जिन्हें शासन के विधि - विधान के प्रति कोई दायित्व - बोध नहीं है | बिसहडा में जो निंदनीय घटना घटी , वह इसी मानसिकता का एक नतीजा है | गोहत्या की झूठी खबर फैलाकर मुहम्मद अखलाक़ की जान ले गई | वरिष्ठ पत्रकार स्वामीनाथन एस . अंकलेश्वर अय्यर लिखते हैं , '' एक बीफ खाने वाले हिंदू के तौर पर मैं दादरी में मुहम्मद अखलाक के घर में बीफ रखा होने की अफवाह के बाद उनकी हत्या किए जाने से बेहद परेशान हूं। इससे भी दुखद बीजेपी के नेताओं की ओर से हत्या को साफ रंग देने का प्रयास है। ....यह दावा कि सभी हिंदू गोहत्या का विरोध करते हैं, गलत है। हां, आज ताकतवर उच्च जातियां बीफ के खिलाफ है, लेकिन दलित और जनजातियां हमेशा से बीफ खाती रही हैं। दलित आदिवासी बहुजन एंड माइनॉरिटी स्टूडेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मोहन धारावाथ कहते हैं, 'दलित समुदाय के लिए बीफ प्रोटीन का सबसे सस्ता स्रोत रहा है।' ....लेकिन मैं भवभूति के नाटक के आधार पर ही यह भी दावा करता हूं कि बीफ खाने का अधिकार प्राचीन हिंदू परंपरा का हिस्सा रहा है। एक ब्राह्मण के तौर पर मैं वशिष्ठ मुनि के पदचिह्नों पर खुशी से चल रहा हूं। ' [ नभाटा , नई दिल्ली , 5 अक्तूबर 2015 ] | घर में गोमांस रखने की अफ़वाह फैलाकर अखलाक़ की हत्या का कोई कैसे औचित्य ठहरा सकता है ? पुलिस द्वारा मांस को जाँच के लिए भेजना एक अवैधानिक कार्रवाई है , क्योंकि क़ानून में मांसाहार पर कोई रोक नहीं है | इस घटना के विरोध में केरल के तिरुवनंतपुरम में बीफ़ पार्टी का आयोजन उल्लेखनीय है , जो बयान आ रहे हैं , वे भी सांप्रदायिकता व फासीवादी मानसिकता पर चोट करते हैं , जो समय की बड़ी मांग है | सुप्रीमकोर्ट के सेवानिवृत जज मार्कण्डेय काटजू का कहना है कि '' वे गोमांस खा चुके हैं और मौका मिलेगा तो फिर खाएंगे। उन्होंने कहा कि गोहत्या पर पाबंदी की मांग सिर्फ राजनीतिक है और ऐसा किए जाने से विदेशों में भारत की छवि खराब होगी। उन्हें हमारे ऊपर हंसने का मौका मिलेगा। हाल में महाराष्ट्र और हरियाणा में गोमांस पर प्रतिबंध लगाया गया था। उन्होंने गोमांस के पक्ष में तर्क देते हुए कहा कि यह सस्ते प्रोटीन का एक अच्छा स्रोत है। नगालैंड, मिजोरम, त्रिपुरा और केरल में गोमांस की बिक्री पर रोक नहीं है। काटजू का कहना है, "गोहत्या के खिलाफ शोर मचाने वाले लोगों को उन गायों की भी फिक्र करनी चाहिए, जिन्हें ठीक से खाना नहीं मिलता है। मैंने गायों को कचरा खाते हुए देखा है।" उन्होंने कहा, "दुनिया में ज्यादातर लोग गोमांस खाते हैं। क्या वे सभी लोग पापी हैं? मुझे गोमांस खाने में कुछ गलत नहीं दिखता।" दादरी की घटना पर अंग्रेजी की मशहूर पत्रकार एवं लेखिका शोभा डे ने काफ़ी तंज़ भरे अंदाज़ में ट्वीट किया की '' मैंने अभी - अभी गोमांस खाया है , आओ मुझे मार डालो | '' 
उधर उत्तर प्रदेश के शहरी विकास मंत्री आजम खान ने गोमांस के निर्यात पर पाबंदी को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा | उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान कहा, ''अगर सरकार को गोमांस खाने पर पाबंदी लगानी है तो सबसे पहले गोमांस के निर्यात पर रोक लगाने की जरूरत है।'' इस घटना की आड़ में जो सांप्रदायिकता फ़ैलाने की कोशिश करे , उसके विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई अवश्य की जानी चाहिए | इस सिलसिले में विभिन्न वक्तव्यों में घटना के कथित पक्षकारों के कई निंदनीय उद्गार भी सामने आए हैं | आइए कुछ सांप्रदायिक और फासीवादी वक्तव्यों पर भी एक नज़र डालते हैं -
वीएचपी के प्रवक्ता विनोद बंसल का कहना है कि ऐसे लोग हिन्दू के नाम पर अभिशाप है और हिंदू जीवन पद्धति को अपमानित कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस तरह के बयान देकर धार्मिक भावनाओं को भड़काने की कोशिश की जा रही है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ये लोग कानून का उल्लंघन कर रहे हैं और उनके खिलाफ कारर्वाई करने की जरूरत है। केन्द्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा का दावा है कि यह महज एक 'घटना' थी। पूर्व विधायक नवाब सिंह नागर कहते हैं कि जिन लोगों ने ताकतवर ठाकुरों की भावनाओं को आहत करने की हिम्मत की है, उन्हें इसके अंजाम का अहसास भी होना चाहिए। वे दावा करते हैं कि हत्या करने वाली भीड़ में 'मासूम बच्चे' भी हैं, जिनकी उम्र 15 साल से कम है। कई भाजपा नेता मुसलमानों पर गोमांस खाने का आरोप लगाते हैं। विचित्र तोमर चाहते हैं कि गाय के हत्यारों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए, न कि मुसलमानों का कत्ल करने वालों को। श्रीचंद शर्मा कहते हैं कि ''यदि मुस्लिम समुदाय के लोग हिंदुओं की भावनाओं को आहत करते हैं तो हिंसा अवश्यंभावी है।'' ज़ाहिर है , ये वक्तव्य घोर आपत्तिजनक और सांप्रदायिक सद्भाव के नितांत विरोधी हैं | इस बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पीड़ित परिवार का सहयोग करके अच्छा कार्य किया है | उन्होंने पीड़ित परिवार को कुल 45 लाख का मुआवजा दिया। मुख्यमंत्री ने इसके पहले परिजनों को 20 लाख रुपए की मदद देने की घोषणा की थी। विगत 4 अक्तूबर 15 को उन्होंने अखलाक के तीन भाइयों को भी पांच-पांच लाख रुपए की आर्थिक मदद देने की घोषणा की। मुख्यमंत्री ने कहा कि तीनों भाइयों की माली हालत बेहद खस्ताहाल होने की वजह से उन्हें मदद देने का फैसला किया गया है। घटना में गंभीर रूप से घायल अखलाक के पुत्र का इलाज सरकारी खर्च पर कराने की घोषणा करते हुए अखिलेश यादव ने भरोसा दिलाया कि किसी भी हाल में दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। मुख्यमंत्री की इस घोषणा का यदि व्यावहारिक क्रियान्वयन किया गया , तो निश्चय ही देश में जान - बूझकर पनपायी जा रही सांप्रदायिकता पर अवश्य रोक लगेगी | ज़रूरत इस बात की है कि सांप्रदायिकता और फासीवाद के विरुद्ध एक मज़बूत लड़ाई लड़ी जाए |

आधार अधर में !

आधार अधर में !

आधार कार्ड को जनता पर जबरन थोपने की कोशिश में मोदी सरकार को एक बार फिर तगड़ा झटका लगा है | सुप्रीमकोर्ट कोर्ट ने एक बार फिर इसे अनिवार्य बनाने से इन्कार कर दिया है | पिछले 6 अक्तूबर को आर , बी . आई . , सेबी , इरडा आदि के साथ झारखंड और गुजरात सरकारों की ओर से दाख़िल याचिका को तीन जजों की बेंच ने मामला संविधान पीठ को भेज दिया | अब सरकार ने इस मामले की जल्द सुनवाई की अपील की है | कोर्ट ने सारी सरकारी योजनाओं में आधार के इस्तेमाल पर सरकार को कोई राहत न देकर भविष्य की दृष्टि से एक अच्छा क़दम उठाया है | कोर्ट ने पिछली सुनवाई के दौरान कहा कि हम ये देखेंगे कि आधार कार्ड से निजता का अधिकार किस हद तक प्रभावित होता है। इस बार फिर सुनवाई के दौरान कोर्ट के एक जज महोदय ने इसके दुरूपयोग की आशंका जताई और जासूसी आदि में इसके इस्तेमाल की आशंका से निजता के अधिकार के प्रभावित होने की बात की | कोर्ट में यह अपील की गई थी कि आधार को लेकर अंतरिम आदेश में संशोधन किया जाए। आधार समर्थकों द्वारा जिनमें मीडिया भी शामिल है , की ओर से यह कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में पीडीएस व्यवस्था में आधार कार्ड को अनिवार्य बनाए जाने पर फैसला दिया था। कोर्ट ने केरोसीन और एलपीजी में आधार लागू करने की इजाजत दे दी थी। ए बातें पूरी तरह गलत और भ्रामक हैं | कोर्ट ने आधार से जोड़ने की बात की थी , लेकिन अनिवार्य नहीं किया | साथ ही यह भी आदेश दिया था कि किसी नागरिक को आधार के अभाव में सरकारी राहत व सुविधाओं से वंचित नहीं किया जा सकता |
यह सवाल यह उठता है कि जिस योजना को न तो संसद से मंज़ूरी मिली हो और न ही न्यायपालिका का अनुमोदन , उसे कैसे लागू किया जा सकता है ? यहाँ तक कि इसे ' फुल सुविंग ' ढंग से लागू किया जा रहा है , फिर भी तुर्रा यह की यह अनिवार्य नहीं स्वेच्छा पर आधारित है | अब तो बैकों से यह शिकायत भी मिल रही है कि जिसके पास आधार कार्ड नहीं होता एकाउंट खोलने से इन्कार कर दिया जाता है | अगर यह अघोषित रूप से अनिवार्य और बाध्यकारी न होता करोड़ों आधार कैसे बन जाते ? किसी भी नागरिक के पास समय नहीं होता कि जो अनिवार्य नहीं है , उसे इतने बड़े पैमाने पर करे | केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कोर्ट में कहा था कि देश में 92 करोड़ आधार कार्ड बनाए गए। आधार कार्ड देश के करोड़ों गरीबों तक पहुंचने का एकमात्र जरिया है। वहीं, कोर्ट ने कहा था कि कि आधार के जरिए किसी के बेडरूम में जासूसी नहीं की जा सकती।
वहीं, सरकार ने कहा कि आधार के जरिए सरकार देश के छह लाख गांवों में घर-घर पहुंची है। सरकार ने कहा कि लोगों को मनरेगा के लिए घर तक बैंक पैसा पहुंचा रहे हैं। प्रधानमंत्री की जनधन योजना की सफलता में आधार की भूमिका रही है। आधार की वजह से सरकार के एलपीजी सब्सिडी में एक साल में 15 से 20 हजार करोड़ बचाए गए। बूढ़े और लाचारों तक घर पर ही पेंशन पहुंच रही है। आधार नहीं होगा तो गरीबों को खानी होंगी दर दर की ठोंकरे। वहीं, इस मामले में सेबी ने कहा, हवाला और काले धन को काबू करने के लिए आधार जरूरी है। मार्केट पर नजर रखने के लिए ये प्रभावशाली है।ट्राई ने अपनी ओर से कहा, मोबाइल सिम जारी करने के लिए आधार की अनिवार्यता की जाए। इससे आतंकवादी और आपराधिक गतिविधियों की रोकथाम में मदद मिलेगी। आरबीआई ने कहा है कि एलपीजी, केरोसिन और पीडीएस में आधार को लिंक करने के कोर्ट ने आदेश दिए थे। ऐसे में क्या कोई अपनी मर्जी से आधार कार्ड के जरिये एकाउंट खोलना चाहता है, तो क्या करें। खास कर तब जब उसके पास आधार के अलावा कोई और दूसरा पहचान पत्र न हो। वहीं इरडा ने कहा कि, पेंशन विभाग समेत कई राज्यों ने भी आधार का समर्थन किया है। इन सब बातों के बीच सबसे जरूरी बात यह है कि इस क़दम से नागरिकों की निजता का 
अधिकार कितना प्रभावित होता है | इस मुद्दे पर जब तक पर्याप्त सफाई नहीं होती , आधार अधर में लटक सकता है | 

रईस मेकरानी का बड़ा कारनामा

रईस मेकरानी का बड़ा कारनामा

‘' पढो अपने पालनहार का नाम लेकर, जिसने पैदा किया। पैदा किया इंसान को एक लोथड़े से। पढ़ और तेरा पालनहार बड़ा ही उदार है, जिसने ज्ञान सिखाया, कलम के द्वारा, ज्ञान दिया इंसान को उस चीज का जिसको वह नहीं जानता था ’’ (कुरआन 96 :1-5) | हजरत मुहम्मद (सल्ल0) की पवित्र शिक्षाएं भी इस्लाम मे शिक्षा और ज्ञानार्जन के महत्व को उभारती हैं | कैस बिन कसीर कहते हैं कि एक बार मै हजरत अबू दरदा [ रज़ि .] के साथ दमिश्क की मस्जिद मे बैठा था कि इतने में एक आदमी आया और कहने लगा, ऐ अबू दरदा! मैं मदीनें से आपके पास इसलिए आया हूॅ कि मुझे खबर मिली है कि आप मुहम्मद (सल्ल0) की हदीस बयान करते हैं। हज़रत अबू दरदा ने फरमाया, मैने अल्लाह के रसूल (सल्ल0) से सुना हैं, आप [ सल्ल . ] ने फ़रमाया , ‘‘जो व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करने के लिए रास्ता तय करके आगे बढ़ता हैं। उसके रास्ते मे फरिश्ते पर बिछाते हैं और र्इश्वर उसके रास्ते को आसान कर देता हैं ’’ ( अबू दाऊद , तिरमिज़ी ) 
एक अन्य हदीस में है - हजरत अनस (रजि0) से रिवायत हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्ल0) फरमाया , ‘‘ जो व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करने के लिए निकलता हैं वह अल्लाह के रास्ते में हैं, यहॉ तक कि वापस आ जाए ’’ [ तिरमिज़ी ] | इन्हीं शिक्षाओं के अनुपालन से ही मुसलमानों ने सदैव ज्ञान - विज्ञानं के क्षेत्र में महत्तम योगदान किया है और आज भी कर रहे हैं |
मध्यप्रदेश के सागर निवासी कार मेकेनिक मुहम्मद रईस मेकरानी एक बड़े आविष्कार के लिए चर्चाओं का केन्द्र बने हुए हैं। उन्होंने अविष्कार किया है एक ऐसी कार का जो पेट्रोल या डीजल के बजाय पानी से दौड़ती है। हम जानते हैं कि आपको यह बात बिल्कुल अटपटी लग रही होगी , लेकिन यह पूरी तरह सच है | 44 साल के रईस मेकरानी ने ऐसी कार बनाई है , जो विशुद्ध रूप से पानी से दौड़ती है। पानी के अलावा इसमें कार्बाइड का इस्तेमाल किया जाता है।
रईस ने यह कार छह महीने की कड़ी मेहनत से तैयार की है। अपनी खुद की वर्कशाप में उन्होंने खुद इसे तैयार किया है। इस कार की खासियत ययह भी है कि ये पूरी तरह इको फ्रैंडली है। उन्होंने बताया कि पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों के कारण उनके दिमाग में ऐसी कार बनाने की बात आई जिसके लिए जेब ज्यादा ढीली न करनी पड़े। पानी से चलनेवाली यह कार मात्र दस से बीस पैसे प्रति किलोमीटर की दर से दौड़ती है।असल में रईस ने अपनी एक पुरानी कार के इंजन में बदलाव करके इसे पानी से चलने के लिए तैयार किया है। 
इसके फ्यूल टैंक में पेट्रोल-डीजल की जगह पानी ही डाला जाता है। पानी डालने के बाद इसमें कैल्सियम कार्बाइड का मिश्रण डाला जाता है। पानी और कैल्सियम कार्बाइड के मिश्रण से एसिटीलीन गैस तैयार होती है जो कार में ईंधन का काम करती है। पानी के साथ कैल्सियम कार्बाइड का संपर्क होते ही यह धधकने लगता है, जिसके बाद इसके ढक्कन को बंद कर दिया जाता है।
इसके बाद तेजी से गैस फ्यूल टैंक से होते हुए इंजन तक पहुंचती है।विशेष रूप से तैयार किया गया इंजन एसिटिलीन गैस के संपर्क आते ही काम करना शुरू कर देता है। यह कार दूसरे ईंधन से चलने वाली अन्य कारों की तरह पूरा काम करती है। इसकी रफ्तार देख अच्छे अच्छे चौंक जाते हैं।
आविष्कारक रईस ने बताया कि उनके इस अविष्कार के बाद लोगों को पेट्रोल की बढ़ती कीमतों से आजादी मिलेगी। वे अपने इस अविष्कार का पेटेंट भी करवाना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने एक चीनी फर्म से संपर्क भी किया है। उसने इस अविष्कार के प्रति रुचि भी दिखाई है। इसका कारखाना स्‍थापित करने की बात चल रही है |


समान सिविल कोड देश की ज़रूरत नहीं

समान सिविल कोड देश की ज़रूरत नहीं
सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी से एक बार फिर समान सिविल कोड पर अवांछित बहस छिड़ गयी है | उसने इस पर केंद्र सरकार से रुख साफ करने को कहा है। कोर्ट ने गत 13 अक्तूबर 2015 को सरकार से पूछा, “समान सिविल कोड पर आपको (सरकार) हो क्या गया? अगर इसे लागू करना चाहते हैं तो लाइए। आप इसे फौरन लागू क्यों नहीं करते? देश में कई पर्सनल लॉ हैं। इससे भ्रम की स्थिति बनी हुई है।” कोर्ट ने यह बात क्रिश्चियन डायवोर्स एक्ट की धारा 10ए(1) को चुनौती देने वाली अर्जी की सुनवाई के दौरान कही। दिल्ली के अलबर्ट एंथोनी ने ये अर्जी लगाई है। उनकी दलील है कि “ईसाई दंपत्ति को तलाक के लिए कम से कम दो साल अलग रहना जरूरी है। जबकि हिंदू मैरिज एक्ट में एक साल अलग रहने पर तलाक दे दिया जाता है। एक ही मामले में दो व्यवस्थाएं गलत हैं।” पिछली सुनवाई में सरकार धारा 10ए(1) को बदलने पर राजी थी। कहा था कि काम शुरू भी हो चुका है। 12 अक्तूबर 15 की सुनवाई में जस्टिस विक्रमजीत सेन और जस्टिस शिवकीर्ति सिंह की पीठ ने नाराजगी जताई कि 3 महीने बाद भी इसे बदला नहीं गया है। जब सरकारी वकील ने और समय मांगा तो बेंच ने कहा, “क्या हुआ? किस वजह से ऐसा नहीं हो सका? अगर आप ऐसा करना चाहते हैं तो आपको बताना चाहिए।”वकील के जवाब से नाखुश होने पर कोर्ट ने किसी और काम के लिए वहां मौजूद सॉलीसिटर जनरल रंजीत कुमार से मदद करने को कहा। उनसे सभी धर्मों के लिए तलाक के एक जैसे नियम पर सरकार की स्थिति के बारे में पूछा। साथ ही जवाब देने के लिए तीन हफ्ते का वक्त दे दिया। इससे पहले फरवरी 2015 में इसी मामले में जस्टिस विक्रमजीत सेन की बेंच ने कहा था, “भारत अब तक सेक्युलर देश है , लेकिन हम नहीं जानते कि कब तक यह सेक्युलर रहेगा। हम नागरिक कानूनों से धर्म को बाहर करना चाहते हैं। यह बहुत जरूरी है।'' आज देश के संविधान के तहत भारतीय समाज में कई पर्सनल लॉ प्रचलित हैं, जो अलग-अलग धर्मों के रीति-रिवाज और परंपरा के आधार पर बने हैं। यह खास तौर पर शादी, तलाक, विरासत और गुजारा भत्ता जैसे मामले में लागू होते हैं। सुप्रीम कोर्ट धारा 10ए(1) को गलत ठहरा चुका है। कोर्ट ने कहा था कि कानून से धर्म को अलग करना जरूरी है। कई हाईकोर्ट भी कह चुके हैं कि एक ही मामले में अलग-अलग कानूनी व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 और 21, यानी समानता और जीवन के अधिकार के खिलाफ है। संविधान के नीति निर्देशक तत्व के अनुच्छेद 44 में इस बात की परिकल्पना की गई है कि सरकार समान सिविल कोड लागू करने की कोशिश करेगी | मगर इसे लागू करना सरकार के अनिवार्य और अपरिहार्य नहीं है | यह शराबबंदी की तरह की कल्पना है , जिसका संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में समावेश है | दूसरी ओर कानून मंत्री डी.वी. सदानंद गौड़ा ने सुप्रीमकोर्ट की टिप्पणी के बाद राष्ट्र की अखंडता के लिए समान सिविल कोड की जरूरत पर बल दिया , लेकिन साथ ही कहा कि इस मुद्दे पर सभी पक्षों से राय हासिल करने एवं व्यापक चर्चा के बाद ही कोई फैसला किया जा सकता है।गौड़ा ने कहा कि इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में सरकार द्वारा हलफनामा दाखिल करने से पहले वह प्रधानमंत्री, कैबिनेट के सहयोगियों, अटार्नी जनरल और सालीसीटर जनरल के साथ विचार करेंगे। उन्होंने कहा कि समान सिविल कोड पर सहमति बनाने के लिए विभिन्न पर्सनल लॉ बोर्डों और संबंधित पक्षों के साथ व्यापक चर्चा की जाएगी। कानून मंत्री के अनुसार , देश के संविधान की प्रस्तावना और अनुच्छेद 44 में भी समान सिविल कोड की बात कही गई है। लेकिन यह संवेदनशील मुद्दा है, इसलिए बड़े पैमाने पर चर्चा जरूरी है। कानून मंत्री ने कहा कि संविधान की प्रस्तावना एवं अनुच्छेद 44 की अवधारणा और राष्ट्र के हित में इस दिशा में कदम आगे बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अप्रैल में लोकसभा में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान उन्होंने यही बात कही थी। उन्होंने कहा कि कुछ विवाह कानूनों पर अपने फैसले में केरल और कर्नाटक के हाई कोर्ट ने कहा है कि समान सिविल कोड देश की जरूरत है। ज्ञातव्य है कि 22 अप्रैल 1985 को मुहम्मद अहमद खां बनाम शाहबानो केस में सुप्रीमकोर्ट ने इस्लामी शरीअत के विरुद्ध फ़ैसला सुनाया था , जिसको तत्कालीन राजीव गाँधी सरकार द्वारा संसद में क़ानून बना कर रद्द कर दिया था | इसके बावजूद इस्लामी शरीअत के विरुद्ध फ़ैसले आते रहे हैं , जो मुसलमानों के लिए गंभीर चिंता का विषय रहे हैं | सुप्रीमकोर्ट की ताज़ा टिप्पणी पर भी मुसलमानों ने चिंता प्रकट की है और इसे देश के संविधान की आत्मा के विपरीत बताया है | 
जमाअत इस्लामी हिन्द ने ऐसी कोशिशों पर अफ़सोस और चिंता प्रकट की है और इसे संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त मौलिक अधिकारों के विरुद्ध क़रार दिया है | जमीअत उलमा हिन्द के मौलवी अब्दुल हमीद नोमानी ने कहा कि भारत में समान नागरिक संहिता अव्यावहारिक है। उन्होंने कहा कि पूरा मुस्लिम समुदाय इसके खिलाफ है। भारत में धर्म और जाति में विविधता है। ऐसे में सभी को कानून द्वारा बांधना व्यावहारिक नहीं है। जो लोग ऐसा चाहते हैं वे देश की विविधता की अवहेलना कर रहे हैं। देश के मुसलमान "मुस्लिम पर्सनल लॉ अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 द्वारा शासित हैं |" यह मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ को निर्देशित करता है , जिसमें शादी, महर, तलाक, रखरखाव, उपहार, वक्फ और विरासत शामिल है | देखा गया है कि अदालतों के कुछ फ़ैसले इस्लाम की शिक्षाओं के अनुरूप नहीं होते | इस प्रकार यह मुस्लिम पर्सनल ला में सीधा हस्तक्षेप का विषय बन जाता है | कुछ लोग समान सिविल कोड की ज़रूरत जताते हैं | संघ परिवार इसके लिए बहुत लालायित दिखता रहा है , जबकि यह सच्चाई सबको पता है कि भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में इसे लागू कर पाना असंभव है , लेकिन वोटों की राजनीति को चमकाने के लिए इसके लिए दुष्प्रयास किए जाते रहे हैं | मदनलाल खुराना जिन्हें भाजपा ने काम निकल जाने के बाद उपेक्षित कर दिया था , जब दिल्ली के मुख्यमंत्री थे , तब उन्होंने इस बाबत एक प्रस्ताव विधानसभा में पारित तक करवा लिया था | मध्यप्रदेश विधानसभा में भी भाजपा के लोगों ने भी ऐसे दुष्प्रयास किए , जो अंततः नाकाम हो गये , क्योंकि ये नाकाम होने ही थे | यह संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त उनके मौलिक अधिकारों के सर्वथा विपरीत है | संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को अंतःकरण और धर्मानुसार अमल करने की आज़ादी देता है | ऐसी ही बात संविधान की प्रस्तावना में कही गई है | संविधान में धाराओं 25 (1) और 26 के अंतर्गत जो बातें कही गई है उनका सार यह है कि हर धार्मिक समुदाय को इसका अधिकार प्राप्त होगा कि अपने धर्म पर चले, तथा अपने तौर पर अपने धार्मिक क्रिया-कलाप अंजाम दे। अतः यह सिर्फ़ मुसलमानों (या अन्य अल्पसंख्यक समुदायों) का मामला ही नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधान का भी तक़ाज़ा है कि उसके अंतर्गत देश में समान सिविल कोड लागू न हो। मुसलमानों ने भी समान सिविल कोड को लागू नहीं किया | जब वे लगभग नौ सौ वर्ष देश के शासक रहे , कभी भी उन्होंने हिन्दू या अन्य धर्मानुयायी जनता पर अपना क़ानून नहीं थोपा | अंग्रेज़ों ने लार्ड मैकाले की अध्यक्षता में समिति बनकर भारतीय दंड संहिता , भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता , भारतीय व्यवहार प्रक्रिया संहिता , भारतीय साक्ष्य अधिनियम आदि बहुत - से क़ानून लागू कर दिए , लेकिन समान सिविल कोड की ओर नहीं बढ़े , क्योंकि वे ज़ालिम होने के बावजूद यह जानते थे कि यह किसी भी क़ीमत पर लागू नहीं हो सकता | उन्होंने मुसलमानों के लिए पारिवारिक क़ानून 1937 और अलग से मुस्लिम मैरिज डिज़ुलेशन एक्ट 1939 बनाया | देश के किसी भी ख्यातलब्ध विचारक एवं विद्वान ने समान सिविल कोड का समर्थन नहीं किया है | संविधान निर्माता डॉ . अंबेडकर ने संविधान निर्मात्री सभा में नीति निर्देशक तत्व की धारा 44 में इस बाबत रखे गये प्रावधान पर दक्षिण के कुछ मुस्लिम सदस्यों की आपत्ति का जवाब देते हुए कहा था कि जब तक सब देशवासी इसके लिए राज़ी नहीं होंगे , इसे कदापि लागू नहीं किया जाएगा | देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं . जवाहरलाल नेहरू ने कई बार इसी आशय का मत प्रकट किया था | राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लंबे समय तक कमान संभालने वाले गुरु गोलवलकर जी भी इसके समर्थक है कि देश समान सिविल कोड लागू न हो | 20 अगस्त 1972 को दिल्ली स्थित दीनदयाल शोध संस्थान के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने साफ़ कहा था कि देश में समान सिविल कोड अवांछित है | उन्होंने कहा था कि जो लोग समान सिविल कोड की बात करते हैं , वे भारत की ज़रूरत समझते ही नहीं हैं | गुरु जी ने इसी आशय के उद्गार एक इंटरव्यू में व्यक्त किए थे , जो 26 अगस्त 1972 को ' मदरलैंड ' में छपा था | आश्चर्य की बात है कि संघ परिवारी अपने गुरु जी की बात का बार - बार अनादर करते हैं | भाजपा नेताओं द्वारा इसकी ज़रूरत बार - बार बताकर गुरु जी की आत्मा को ठेस पहुंचाई जाती है , यहाँ तक कि भाजपा इसे अपने घोषणापत्र तक में शामिल कर लेती है | देश की अदालतें भी मुस्लिम पर्सनल लॉ को समुचित महत्व नहीं देतीं , जिसके कारण बार - बार समस्या पैदा होती है | एक ओर देश में मौजूद मुस्लिम पर्सनल ला में बहुत - सी ख़ामियां हैं , जिन्हें दूर करने की ज़रूरत है , दूसरी ओर इन खामियों को और नहीं बढ़ाया जाना चाहिए और इस मामले को स्थाई रूप से हल किया जाना चाहिए , ताकि भविष्य में मुस्लिम पर्सनल लॉ का अतिक्रमण न किया जा सके | अतः इस प्रकार की कोशिशों पर हमेशा के लिए विराम लगा देना चाहिए |

पीड़ितों को जल्द से जल्द इन्साफ मिले

नफ़रत की चौतरफ़ा आग में क्यों झुलस रहा है हमारा प्यारा देश ?

हरियाणा के फरीदाबाद जिले के सुनपेड़ गांव में अगड़ी राजपूत जाति के दबंगों द्वारा एक दलित परिवार को पेट्रोल डालकर जिंदा जलाने की दिल दहलाने वाली गत 20 अक्तूबर की स्तब्धकारी घटना को लेकर विपक्ष तथा सहयोगी लोजपा के निशाने पर आने के बाद राज्य सरकार ने इसकी सी.बी.आई. जांच कराने की सिफारिश कर दी। इस घटना में दो मासूम बच्चों की बुरी तरह जल जाने से मौत हो गई। 28 वर्षीया माँ रेखा 70 प्रतिशत जली अवस्था में अस्पताल में भर्ती है | पिता जितेन्द्र भी घायल है , जिसका भी उपचार किया जा रहा है | सुनपेड में गांव के लोगों ने ढाई साल के वैभव और 11 महीने की दिव्या के शवों को लेकर प्रदर्शन किया। बाद में प्रशासन ने उन्हें सड़क से जाम खत्म करने और शवों का अंतिम संस्कार करने के लिए मनाया। केन्द्रीय मंत्री एवं स्थानीय सांसद कृष्णपाल गुर्जर ने फरीदाबाद में घोषणा की कि प्रदेश सरकार ने पीड़ित पक्ष की मामले की सीबीआई से जांच कराने की मांग को मंजूर कर लिया है। उनकी इस घोषणा के बाद पीडित पक्ष बच्चों के अंतिम संस्कार के लिए राजी हो गया | भाजपा ने इसे पैसे के लेन - देन की बात कहकर मामले को हल्का करने की कोशिश की है | साथ ही राज्य सरकार ने दस लाख रूपये का मुआवजा देने का ऐलान किया है
पुलिस ने इस घटना के संबंध में 11 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर इनमें से सात लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस के अनुसार घटना फरीदाबाद के सुनपेड़ गांव में 20 अक्तूबर को तड़के दो बजे हुई। हमलावरों द्वारा घर पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगाए जाने के बाद ढाई साल के वैभव और उसकी 11 महीने की बहन दिव्या की घटनास्थल पर ही मौत हो गयी। उनकी मां रेखा 70 फीसदी जल गयी जिसे इलाज के लिए दिल्ली ले जाया गया है |जबकि उनके पिता जितेन्द्र भी परिवार को बचाने के कोशिश में झुलस गए। जितेन्द्र सिंह ने आरोप लगाया कि हमलावर राजपूत जाति के थे और अक्तूबर में उनके साथ उसका झगड़ा हुआ था जिसके बाद एक मामला दर्ज कराया गया था। रोते हुए जितेन्द्र ने बताया, ‘‘जिस समय उन्होंने खिड़की में से पेट्रोल डाला हम सो रहे थे। मुझे पेट्रोल की बदबू आयी और मैंने अपनी पत्नी को जगाने का प्रयास किया , लेकिन तब तक आग भड़क गयी। मेरे बच्चे आग में जल गए।’’ अभी कुछ ही दिन पहले दादरी में मुहम्मद अख्लाक गोमांस रखने की अफ़वाह फैलाकर पीट - पीटकर हत्या किए जाने की घटना के बाद हरियाणा में दलित परिवार पर हमले की घटना के बाद राजनीतिक दलों के बीच पहले से चल रही बयानबाजी तेज़ हो गई है , जबकि इन सब घटनाओं के मूल में राजनीतिक फ़ायदा और उकसावा ही अधिक होता है । इसलिए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि धर्म या संप्रदाय के नाम पर राजनीति अस्वीकार्य है और किसी के साथ आस्था, जाति या पंथ के नाम पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हाल में दादरी, फरीदाबाद और पंजाब की घटनाओं से पैदा हुए तनाव के बीच वह दशहरा के अवसर पर यह अपील कर रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने आरोप लगाया कि ‘‘प्रधानमंत्री, राज्य के मुख्यमंत्री और पूरी भाजपा और संघ का एक ही रुख है। उनका रुख है कि यदि कोई कमजोर है तो उसे दबाया जा सकता है। आपने जो देखा है वह इसी रुख का परिणाम है।’’ उन्होंने सुनपेड़ गाँव में ग्रामीणों और पीड़ितों के परिवार से मुलाकात की। राहुल गाँधी ने कहा, ‘‘हरियाणा में गरीबों के लिए कोई सरकार नहीं है और गरीब लोगों को यहां निशाना बनाया जा रहा है जो पूरी तरह से गलत है। मैंने पीड़ितों के परिवार को भरोसा दिलाया है कि सरकार पर दबाव बनाने के लिये वे जो कुछ भी मुझसे चाहते हैं, मैं उनके लिए वह करूंगा।’’ एक संवाददाता के इस सवाल पर कि क्या वह इस मामले पर राजनीति कर रहे हैं, राहुल ने आक्रोशित स्वर में कहा, ‘‘किसी के यहां आने पर जब कोई ऐसा कहता है, तो यह अपमानजनक है। यह मेरे लिए अपमानजनक नहीं है। यह इन लोगों के लिए अपमानजनक है। फोटो खिंचवाने का मौका क्या होता है? आपका क्या मतलब है?.. लोग मर रहे हैं। मैं ऐसे स्थानों पर आता रहूंगा। 
इस हत्याकांड पर केंद्रीय मंत्री वी के सिंह का बेतुका बयान सामने आया है। वी के सिंह ने खट्टर सरकार के समर्थन में बयान देते हुए कहा है कि क्या कोई कुत्ते को भी पत्थर मार दे तो सरकार जिम्मेदार होगी। यहां यह उल्लेखनीय है कि भाजपा के सहयोगी और केन्द्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने दलित परिवार के दो बच्चों की मौत के लिए हरियाणा सरकार को जिम्मेदार ठहराए जाने की मांग की। बिहार के महागठबंधन के नेताओं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद ने इस हमले को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधा और उनसे पूछा कि वे लोग कहां हैं जो यह दावा किया करते थे कि उनकी पार्टी को सत्ता मिल गई तो सब कुछ ठीक हो जाएगा | नीतीश और लालू की आलोचना का जवाब देते हुए भाजपा नेता और बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने दोनो नेताओं पर घटना को लेकर नकली आंसू बहाने का आरोप लगाया, जिसके पीछे उनकी नजर बिहार विधानसभा चुनाव में दलितों के बड़े वोट बैंक पर है। 
ध्यान रहे कि बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान का कुछ दौर और बाक़ी है। लालू प्रसाद यादव ने एक ट्वीट में कहा, ‘‘मैंने मांग की थी कि मोदी और गुरू गोलवरकर की दलित विरोधी किताबों को जला दिया जाए, लेकिन उनके शासन में तो दलितों को ही जलाया जा रहा है।’’ उन्होंने एक अन्य ट्वीट में कहा, ‘‘भाजपा और आरएसएस शासन में आरक्षण खत्म करने के साथ ही आरक्षण का लाभ लेने वालों को आग के हवाले किया जा रहा है।’’ नीतीश ने भी इस घटना पर राजग सरकार को आड़े हाथों लिया। नीतीश ने ट्वीट किया, ‘‘इस वीभत्स घटना से स्तब्ध हूं। अब कहां है वो लोग जिन्होंने दावा किया था हमारी सरकार बना दो सब ठीक हो जाएगा |'' वास्तव में यह दिल हिला देने वाली यह एक ऐसी घटना है, जो हमारे सामाजिक ढांचे , प्रशासनिक व्यवस्था और क़ानून को लागू करनेवाली एजेंसियों से भी ताल्लुक़ रखती है । पुलिस ने इस मामले को किस अन्दाज़ और मानसिकता के साथ लिया , उस पर भी एक निगाह डाल लेने की ज़रूरत है | एक पुलिस अफ़सर ने अपने प्राथमिक बयान में कहा कि पीड़ितों के घर पर हमले का कोई निशान नहीं मिला, आग केवल उस बिस्तर पर लगी थी जिस पर पीड़ित सोए हुए थे। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि बिस्तर में आग कैसे लगी। हमले का कोई निशान न देखने की बात कहने के पीछे क्या इरादा हो सकता है इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। बच्चों के पिता जितेन्द्र का कहना है कि पेट्रोल डाल कर आग लगाई गई। कुछ दिन पहले आपसी झगड़े के बाद आरोपियों से उन्हें लगातार धमकियां मिल रही थीं , जिसकी सूचना जितेन्द्र ने पुलिस को दे रखी थी | इसके बावजूद पुलिस का यह बयान क्या पुलिस की अन्यायी मानसिकता को नहीं दर्शाता ? यह सच है कि दबंग लोग ही राजनीतिक वर्चस्व रखते हैं | पुलिसवाले अमलन इन्हीं के दबाव में काम करते हैं , जिसका परिणाम यह होता है कि दलितों के खिलाफ संगीन अपराध और जुल्म के बहुत-से मामलों में पूरी जांच नहीं होती। खानापूर्ति अधिक होती है | पुलिस द्वारा सबूत मिटाने की हर कोशिश होती है |आरोपी अक्सर रसूख वाले या दबंग होते हैं। इसी कारण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उन्हें बचाने का दबाव पुलिस पर रहता है। अतः इस सिलसिले के आंकड़े बहुत निराशाजनक हैं | दलितों और आदिवासियों के खिलाफ गंभीर से गंभीर अपराध के मामलों में सजा मिलने की दर बहुत कम रही है। अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून, 1989 में दंड प्रक्रिया संहिता के मुकाबले ज्यादा सजा के प्रावधान किए गए थे । ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित की गर्इं। लेकिन हुआ कुछ संतोषजनक नहीं ! देश के अल्पसंख्यक समाज भी जुल्म - ज़्यादती के शिकार होते रहते हैं और अक्सर न्याय से वंचित रहते हैं | दलितों का भी यही हाल है | अतः सुनपेड़ कांड का भी पुराने हत्याकांडों की तरह हश्र न होने पाए और इस बात की पूरी कोशिश होनी चाहिए कि पीड़ितों को जल्द से जल्द एक समय - सीमा के भीतर न्याय मिले |


Oct 20, 2015

पवार ने सच कहा

पवार ने सच कहा

गोमांस रखने की अफ़वाह पर 50 वर्षीय मुहम्मद अख्लाक की दादरी में पीट-पीट कर हत्या करने की घटना की पृष्ठभूमि में राकांपा प्रमुख शरद पवार ने गत 18 अक्तूबर को कहा कि हिंदुत्व के प्रखर नेता एवं विचारक विनायक दामोदर सावरकर गाय को पवित्र पशु नहीं मानते थे। उन्होंने कहा, ‘‘ हिंदुत्व पर सावरकर के विचारों को कुछ ऐसे लोगों ने अपनी सुविधा के अनुसार अपना लिया है जिन्होंने अपने सोचने के दायरे को संकुचित कर लिया है। सावरकर ने कहा था कि गाय उपयोगी पशु है, उसका उपयोग ना रहने पर उसे मारा और उसका मांस खाया जा सकता है। उनके इस विचार का स्वागत नहीं किया गया।’’ डॉक्टर दीपक कोर्डे की पुस्तक ‘‘जातिवादी राजकर्नाचा अनिवार्यता’’ के विमोचन के अवसर पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री शरद पवार ने यह बात कही। पवार ने दादरी घटना, जहां गोमांस खाने की अफवाह के कारण एक व्यक्ति की भीड़ ने हत्या कर दी थी, और इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र ' पांचजन्य ' में प्रकाशित लेख की आलोचना की। 
शरद पवार ने कहा, ‘‘यह बहुत चिंताजनक है कि एक ऐसा तबका उभर आया है जो लोगों के खाने की पसंद तय करता है। यह तबका उनके आदेश को न मानने वालों को सजा देने का अधिकार भी अपने पास रखता है।’’ उन्होंने कहा कि चरमपंथी संगठनों द्वारा युवाओं को दिग्भ्रमित किया जाना बंद होना चाहिए। सावरकर ने गाय को अति सम्मान और श्रद्धा का पात्र बनाने का विरोध किया था। उनका कहना था कि गाय एक पशु है, हमें उसके प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और हिन्दुओं को उसकी रक्षा करनी चाहिए। सावरकर के लिए गाय किसी भी अन्य पशु के समान थी.| उनकी दृष्टि में अन्य पशुओं के मुक़ाबले में न गाय का महत्व कम था , न ज्यादा।
वे लिखते हैं 'गाय और भैंस जैसे पशु और पीपल व बरगद जैसे वृक्ष, मानव के लिए उपयोगी हैं इसलिए हम उन्हें पसंद करते हैं और यहां तक कि हम उन्हें पूजा करने के काबिल मानते हैं और उनकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है , परंतु केवल इसी अर्थ में। क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि अगर किन्हीं परिस्थितियों में वह जानवर या वृक्ष मानवता के लिए समस्या का स्रोत बन जाए तब वह संरक्षण के काबिल नहीं रहेगा और उसे नष्ट करना,मानव व राष्ट्र हित में होगा और तब वह मानवीय व राष्ट्र धर्म बन जाएगा ' [ ' समाज चित्र, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 2, पृष्ठ 678 ] । सावरकर आगे लिखते हैं 'कोई भी खाद्य पदार्थ इसलिए खाने योग्य होता है क्योंकि वह हमारे लिए लाभदायक होता है , परंतु किसी खाद्य पदार्थ को धर्म से जोड़ना, उसे ईश्वरीय दर्जा देना है। इस तरह की अंधविश्वासी मानसिकता से देश की बौद्धिकता नष्ट होती है' [ 1935, सावरकरांच्या गोष्ठी, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 2, पृष्ठ 559 ] 'जब गाय से मानवीय हितों की पूर्ति न होती हो या उससे मानवता शर्मसार होती हो,तब अतिवादी गो संरक्षण को खारिज कर दिया जाना चाहिए' [ समग्र सावरकर वांग्मय,खण्ड 3, पृष्ठ 341 ] खिलाफत आंदोलन के दौरान जब मुसलमानों ने गोमांस भक्षण बंद कर दिया और गोवध का विरोध करने लगे तब सावरकर और हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए गाय वह मुद्दा न रही जिसका इस्तेमाल हिन्दुओं को एक करने और मुसलमानों को 'दूसरा' या 'अलग' बताने के लिए किया जा सके। परंतु सावरकर हिन्दुओं द्वारा गाय की पूजा करने का विरोध एक अन्य कारण से भी कर रहे थे। सावरकर लिखते हैं 'जिस वस्तु की हम पूजा करें, वह हमसे बेहतर व महान होनी चाहिए। उसी तरह राष्ट्र का प्रतीक, राष्ट्र की वीरता, मेधा और महत्वाकांक्षा को जागृत करने वाला होना चाहिए और उसमें देश के निवासियों को महामानव बनाने की क्षमता होनी चाहिए। परंतु गाय, जिसका मनमाना शोषण होता है और जिसे लोग जब चाहे मारकर खा लेते हैं, वह तो हमारी वर्तमान कमजोर स्थिति का एकदम उपयुक्त प्रतीक है। पर कम से कम कल के हिन्दू राष्ट्र के निवासियों का तो ऐसा शर्मनाक प्रतीक नहीं होना चाहिए' [ समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 3 पृष्ठ 237 ]  
सावरकर जी लिखते हैं , 'हिन्दुत्व का प्रतीक गाय नहीं बल्कि नृसिंह है। ईश्वर के गुण उसके आराधक में आ जाते हैं। गाय को ईश्वरीय मानकर उसकी पूजा करने से संपूर्ण हिन्दू राष्ट्र गाय जैसा दब्बू बन जाएगाए वह घास खाने लगेगा। अगर हमें अपने राष्ट्र से किसी पशु को जोड़ना ही है तो वह पशु सिंह होना चाहिए। एक लंबी छलांग लगाकर सिंह अपने पैने पंजों से जंगली हाथियों के सिर को चीर डालता है। हमें ऐसे नृसिंह की पूजा करनी चाहिए। नृसिंह के पैने पंजे न कि गाय के खुर, हिन्दुत्व की निशानी हैं ' [ सावरकर वांग्मय खण्ड 3,पृष्ठ 167 ]
भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माताओं में से एक डॉ . अंबेडकर अच्छे अध्येता और शोधकर्ता भी थे | उन्होंने गोमांस खाने के संबंध में एक निबंध लिखा था, 'क्या हिंदुओं ने कभी गोमांस नहीं खाया?' यह निबंध उनकी किताब, 'अछूतः कौन थे और वे अछूत क्यों बने?' में है | अंबेडकर ने प्राचीन काल में हिंदुओं के गोमांस खाने की बात को साबित करने के लिए हिन्दू और बौद्ध धर्मग्रंथों का सहारा लिया | वे लिखते हैं , "गाय को पवित्र माने जाने से पहले गाय को मारा जाता था | उन्होंने हिन्दू धर्मशास्त्रों के विख्यात विद्वान पी.वी. काणे का हवाला दिया | काणे ने लिखा है, ' ऐसा नहीं है कि वैदिक काल में गाय पवित्र नहीं थी, लेकिन उसकी पवित्रता के कारण ही वाजसनेई संहिता में कहा गया कि गोमांस को खाया जाना चाहिए " (मराठी में धर्म शास्त्र विचार, पृ .180) |
डॉ .अंबेडकर ने लिखा है, " ऋग्वेद काल के आर्य खाने के लिए गाय को मारा करते थे, जो खुद ऋगवेद से ही स्पष्ट है |" ऋग्वेद में (10. 86.14) में इंद्र कहते हैं, "उन्होंने एक बार 5 से ज़्यादा बैल पकाए ' | ऋग्वेद (10. 91.14) कहता है कि अग्नि के लिए घोड़े, बैल, सांड, बांझ गायों और भेड़ों की बलि दी गई | ऋग्वेद (10. 72.6) से ऐसा लगता है कि गाय को तलवार या कुल्हाड़ी से मारा जाता था | " डॉ .अंबेडकर ने बौद्ध ग्रंथ संयुक्त निकाय(111. .1-9) के उस अंश का हवाला भी दिया है जिसमें कौशल के राजा पसेंडी के यज्ञ का विवरण मिलता है संयुक्त निकाय में लिखा है, "पांच सौ सांड, पांच सौ बछड़े और कई बछियों, बकरियों और भेड़ों को बलि के लिए खंभे की ओर ले जाया गया |" लेख के अंत में  डॉ . अंबेडकर लिखते हैं, "इस सुबूत के साथ कोई संदेह नहीं कर सकता कि एक समय ऐसा था जब हिंदू, जिनमें ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण दोनों थे, न सिर्फ़ मांस बल्कि गोमांस भी खाते थे |"