Nov 28, 2015

इन्हें किसने दिए पैसे ?

इन्हें किसने दिए पैसे ? 


देश में जानबूझकर सुनियोजित तरीक़े से फैलाई जा रही वैमनस्यता और असहिष्णुता के विरोध में लेखकों, साहित्यकारों, इतिहासकारों, कलाकारों व वैज्ञानिकों के बाद अब आईआईटी कानपुर के 100 से अधिक पूर्व व वर्तमान विद्यार्थियों, कर्मचारी और शिक्षक समुदाय ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को गत 16 नवंबर को पत्र लिखकर नफ़रत और असहिष्णुता फैलाने वाली शक्तियों पर लगाम लगाने की माँग की है। आईआईटी ,कानपुर एल्युमनी के सदस्य डॉ.विजयानंनद शर्मा ने राष्ट्रपति को 105 हस्ताक्षरों वाला ज्ञापन भेजा है , जिस पर सभी के मोबाइल नंबर दर्ज हैं | इस ज्ञापन में आईआईटी कानपुर से सम्बंधित पूर्व और वर्तमान विद्यार्थी, कर्मचारी और शिक्षक समुदाय की ओर से भारत में व्याप्त असहिष्णुता के विरोध में राष्ट्रपति से अपील की गयी है कि वे प्रधानमंत्री और भारत सरकार को समुचित कदम उठवा कर असहिष्णुता फैलानेवाली शक्तियों को नियंत्रित करें , जो कि उनकी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेवारी भी है | ज्ञापन में देश में बढ़ती असहिष्णुता की मिसालों में नरेंद्र दाभोलकर , गोविन्द पनसरे , मल्लेशप्पा कलबुर्गी और दादरी के मुहम्मद अखलाक़ की नृशंस हत्याओं का उल्लेख किया गया है | ये वारदातें नागरिकों के मौलिक अधिकारों को चैलेंज करती हैं |
यह कितनी हास्यस्पद बात है कि इस गंभीर परिस्थिति में कुछ को मज़ाक़ सूझ रहा है |
मोदी सरकार में विदेश राज्यमंत्री जनरल वी. के. सिंह ने इन्टॉलरेंस (असहिष्णुता) के मुद्दे पर जो बयान दिया है , वह कुछ ऐसा ही है । उन्होंने कहा है कि ''इन्टॉलरेंस पर बहस गैरजरूरी है। खूब सारे पैसे देकर सरकार के खिलाफ माहौल बनाया गया। यह सिर्फ कुछ राजनीतिक पार्टियों के जरिए बिहार इलेक्शन में वोट पाने के लिए उठाया एक मुद्दा था।'' इस दौरान उन्होंने एक बार फिर भारतीय मीडिया के काम करने के तरीके पर भी सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर इस विकट स्थिति से राष्ट्रपति तक हैरान - परेशान हैं | देश में असहिष्णुता की बढ़ती घटनाओं पर सरकार को तीन बार नसीहत दे चुके राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अब पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों और बुद्धिजीवियों को नसीहत दी है।
पुरस्कार वापसी को गलत बताते हुए राष्ट्रपति ने कहा है कि बुद्धिजीवियों को भावनाओं में बहने के बदले अपने मतभेद बहस और चर्चा के जरिये जाहिर करना चाहिए। राष्ट्रपति ने बुद्धिजीवियों को सम्मान का कद्र करने की नसीहत देते हुए यह भी कहा कि हमें भारत की विचारधारा और संविधान में निहित मूल्यों और सिद्धांतों पर भरोसा रखना चाहिए। राष्ट्रपति महोदय की यह नसीहत एक दृष्टि से उचित है , लेकिन जब सिर से पानी गुज़र जाए और अस्तित्व का संकट पैदा हो जाए तो विरोध का यह तरीक़ा सवालिया निशान के दायरे में नहीं रह जाता | अतः इस परिप्रेक्ष्य में सरकार को ही नसीहत करना चाहिए कि वह अपनी पदेन ज़िम्मेदारी का अनुपालन करते हुए देश के विषाक्त माहौल को ठीक करे |


मज़दूरी हड़पने की नई कूट रचना , रेंजर के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग

मज़दूरी हड़पने की नई कूट रचना , रेंजर के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग

सोहेलवा वन्य जीव प्रभाग , बलरामपुर [ उत्तर प्रदेश ] का बनकटवा रेंज भ्रष्टाचार और अनियमितता का केंद्र बन गया है | यहाँ के रेंजर बी डी राय ने हाल में ही एक दर्जन से अधिक मनरेगा मजदूरों की वर्षों से लंबित हज़ारों रूपये की मज़दूरी को हड़पने के लिए एक ही दिन में फर्जी तौर पर कागज़ी प्रक्रिया पूरी करने का नया कारनामा अंजाम दिया है ! उल्लेखनीय है कि मजदूरों से 13 जनवरी से 26 मार्च 2014 के बीच विभिन्न अवधियों में वृक्षारोपण और झाड़ी की सफ़ाई के काम कराये थे | कुछ मज़दूरों से दो - ढाई महीने तक काम कराये गये , लेकिन अब तक मज़दूरी का भुगतान नहीं किया गया है और फर्जी तौर पर दूसरों के नाम मजदूरी की रक़म डलवाकर ऐंठ ली गई |
' कान्ति ' [ साप्ताहिक ] के 13 सितंबर 15 के अंक में प्रकाशित ' वाचर ने दिया पुख्ता सबूत , मज़दूरी देने से बलरामपुर वन प्रभाग अब कैसे करेगा इन्कार ? ' शीर्षक रिपोर्ट के बाद भ्रष्ट वन अधिकारियों और कर्मचारियों को दिन में तारे नज़र आने लगे | उन्होंने मज़दूरी हड़पने का नया दुष्चक्र रचा र झूठे तौर पर यह बताने की कोशिश की , मज़दूर अपनी मज़दूरी को लेकर रेंजर के सामने गिडगिडाने और याचना करने नहीं आए | उल्लेखनीय है कि ये मज़दूर पिछले लगभग डेढ़ वर्ष वन विभाग के अधिकारियों से लेकर अन्य संबंधित उच्च अधिकारियों से लिखित रूप में फ़रियाद कर चुके हैं , मगर उनकी फ़रियाद नहीं सुनी जा रही है | आरोप है कि वन अधिकारी मिल - बाँटकर पहले ही मज़दूरी हड़प चुके हैं और अब अपनी नौकरी बचाने के लिए नियम - क़ानून को ताक पर रखकर तरह - तरह की कूट - रचना और बहानेबाजियों का सहारा ले रहे हैं , जिसके चलते वे अपने ही द्वारा बुने गए जाल में बुरी तरह फंसते नज़र आ रहे हैं |
बनकटवा के रेंजर बी डी राय जो मज़दूरी देने के इस मामले में पहले ही निष्पक्षता का परिचय न देकर मजदूरों पर सवालिया निशान लगा चुके हैं , इस बार मुख्य शिकायतकर्ता मज़दूर केशव राम को डरा - धमकाकर 15 अक्तूबर 2015 को अपने फारेस्ट गार्ड मालिक राम से द्वारा एक कागज़ भेजकर उस पर दस्तखत करवा लिया , जिस पर रेंजर की ओर से लिखा गया था कि 14 अक्तूबर 15 को मज़दूरी के बारे में जो कहना है वह अपने साथियों के साथ आकर कहो , मानो मजदूरों ने अपनी गाढ़ी मेहनत से कमाई मज़दूरी के बारे में पहले कुछ कहा ही न हो | इस कागज़ में यह भी लिखा था कि यदि इस दिन नहीं आते तो मान लिया जाएगा कि मजदूरों को अपनी मज़दूरी के सिलसिले में कुछ नहीं कहना है | यह भी झूठी बात लिखी गई कि सप्ताह भर के भीतर दो बार फारेस्ट गार्ड मालिक राम द्वारा मजदूरों को मौखिक रूप से बुलाया गया था | उल्लेखनीय है कि मालिक राम अब भी मजदूरों से कहता है कि रेंजर राय जल्द ही बुलाएँगे , तब उनसे मिलने आप लोग चलना | इसी तरह की बात उसने केशव राम से दस्तखत कराने के समय कही थी | पता चला है कि पूर्व फारेस्ट गार्ड नुरुल हुदा भ्रष्टाचार के खेल के अपने एक गुर्गे राम किशुन के साथ रेंजर की जी - हुजूरी में लगा है |
ज़ाहिर है ,मजदूरों की अज्ञानता और भोलेपन के कारण ही मजदूरों से उक्त गैर कानूनी बर्ताव किया गया और और उनकी मज़दूरी हड़पने की एक बार फिर कोशिश की गई ! रेंजर द्वारा हाज़िरी तिथि के एक दिन बाद यानी 15 अक्तूबर की शाम को केशव राम से दस्तखत लेना अपने आम में जुर्म की श्रेणी में आता है और यह समग्र छल - छद्म , फ्राड और भयाक्रांत की कार्रवाई से परिपूर्ण है | यह उत्तर प्रदेश श्रमिक शिकायत निवारण तंत्र नियमावली के बिलकुल विपरीत कार्रवाई है , जो 24 सितंबर 2009 से प्रदेश में लागू है | रिहाई मंच , लखनऊ के सीनियर लीडर राजीव यादव ने रेंजर बी डी राय के ख़िलाफ़ जाँच और कार्रवाई की मांग की है | उन्होंने कहा कि डरा - धमकाकर इन छिछोरी फर्ज़ी कागज़ी कारस्तानियों के सहारे मज़दूरी नहीं हड़पी जा सकती | वर्षों तक यह मामला जीवंत रहेगा , जब तक मजदूरों को मज़दूरी नहीं मिल जाती | नियम - क़ानून को धता बताकर भ्रष्टाचार की गंगा बहानेवाले ढीठ , दुस्साहसी अधिकारी - कर्मचारी कभी बख्शे नहीं जाएंगे |

Nov 25, 2015

बलात्कार के मामलों में बेतहाशा वृद्धि , प्रभावी रोक की ज़रूरत

बलात्कार के मामलों में बेतहाशा वृद्धि , प्रभावी रोक की ज़रूरत

यह बड़ी चिंता और अफ़सोस की बात है कि आज देश में बलात्कार के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। नये आंकड़े बताते हैं कि भारत में बलात्कार संबंधी मामलों में कई गुना वृद्धि हो गई है। पिछले 13 जून को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2001 से 2014 के बीच बलात्कार के मामलों में दोगुनी वृद्धि हुई है। यह रिपोर्ट कोवलम [ केरल ] में लैंगिक समानता पर हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में जारी किए गए बहुप्रतिक्षित रिपोर्ट का हिस्सा है। भारत में महिलाओं की स्थितिविषय पर आई इस रिपोर्ट के अनुसार, देश में बलात्कार के मामले 16075 से बढकर 36735 तक पहुंच गए हैं। विवाहित महिलाओं के साथ क्रूरता के मामले 49170 से बढकर 122877 तक पहुंच गए। वास्तव में देश में बलात्कार के आंकड़े बड़े भयावह हैं | देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आए दिन बलात्कार के एक से ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं और कई मामलों में तो हैवायित भी सामने आ रही हैं। छोटी - छोटी बच्चियां भी इस दरिंदगी की चपेट में आ रही हैं | 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में दामिनी बलात्कार कांड के बाद जो जन - जागरूकता पैदा हुई थी , उसे देखकर ऐसा लगता था कि बलात्कार की घटनाओं पर रोक लगेगी चाहे वह सीमित रोक क्यों न हो | मगर हुआ कुछ नहीं ! हाँ , इस जागरूकता का राजनीतिक लाभ ज़रूर उठाया गया | वही यह भी लगता है कि बलात्कार की यह घटना इतनी प्रचारित की गई और बलात्कारियों का दमन भी नहीं हुआ और दिल्ली में शराब और नेट - कल्चर को काफ़ी विस्तार दे दिया गया, इसलिए भी बलात्कार की घटनाएं किसी हद तक थम नहीं सकीं | इतना ही नहीं , अब बलात्कार विरोधी प्रदर्शनों का कोई असर होता नहीं दीखता ! दिल्ली में पिछले दिनों बलात्कार को लेकर लोगों ने सड़कों पर उतरकर आंदोलन भी किए , किन्तु कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। इसके विपरीत ये मामले कम होने के बजाय बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में यह सोचना होगा कि बलात्कार के बढ़ते मामलों के पीछे कौन दोषी है और इसे रोकने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए। आजकल बलात्कार की जितनी घटनाएं घट रही है हैं , उनके मूल कारणों में एक बड़ा कारण शराब का सेवन है . वास्तव में शराब बीमारियों की जननी है । मेडिकल साइंस ने इधर जाकर इसकी पुष्टि की है कि इसके शरीर पर बहुत घातक प्रभाव पड़ते हैं । सम्राट जार्ज के पारिवारिक डॉक्टर सर फ्रेडरिक स्टीक्स वार्ट का कहना है, ‘‘शराब शरीर की पची हुई शक्तियों को भी उत्तेजित करके काम में लगा देती है, फिर उसके ख़र्च हो जाने पर शरीर काम के लायक़ नहीं रहता ।’’ इसी प्रकार सर एंड्रू क्लार्क वार्ट [ एम॰डी॰] का कथन है, ‘‘शरीर को अल्कोहल से कभी लाभ नहीं हो सकता ।’’

गांधी जी ने कहा था कि स्वतंत्र भारत में एक बूंद शराब नहीं होगी , किन्तु आज गांधी के आदर्शों पर चलने वाले नेता ही शराब को बढ़ावा दे रहे हैं ! सरकार को भी यह मालूम है कि शराब की वजह से औरतों की जिंदगी सबसे अधिक प्रभावित होती है। अतः यह अनिवार्य है कि बलात्कार की रोकथाम के लिए शराब समेत सभी प्रकार के नशों को बंद कर दिया जाए । आज जगह-जगह बने नशामुक्ति केन्द्रों के होने का तो यही मतलब है कि सरकार चाहती है कि देश में ज्यादा से ज्यादा शराब की बिक्री हो और लोग वहां इलाज कराने आएं | वह राजस्व का बहाना बनाकर शराबबंदी नहीं चाहती | पुलिस भी इसमें सहायक है | वह शराब के दुष्प्रभावों के मामलों को भी नजरअंदाज कर देती है | उस पर यह आरोप भी लगता रहा है कि वह अपराध कम दिखाने के चक्कर में एफआईआर दर्ज नहीं करती या झूठे केस दर्ज करती है | पूर्व कमिश्नर टी आर कक्कड़ ने भी बोला था कि अपराध को बढ़ावा गृहमंत्री से मिलता है जो सच लगता है ,क्योंकि गृहमंत्री चाहता है कि उसके कार्यकाल में कम से कम अपराध दर रहे। इसका फायदा पुलिस और गृह मंत्रालय दोनों को पहुंचता है। पुलिस अपराधियों से रिश्वत लेती हैं और यह गृह मंत्रालय तक पहुंचती है। दूसरा फायदा यह है कि मामले कम दर्ज होते हैं और गृह मंत्री बदनामी से बचता है। बलात्कार जैसी घटनाएं रोकने के लिए महिला को प्रताड़ित करनेवालों को अमलन कड़ी सज़ा देने के साथ कामुक - अश्लील साहित्य के साथ ब्लू व अश्लील फिल्मों एवं टीवी चैनलों द्वारा फैलाई जा रही अश्लीलता पर भी प्रभावी रोक आवश्यक है | अब तक किसी भी सरकार ने इस ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया है , मानो अश्लीलता को खुली छूट मिली हुई हो | आजकल टीआरपी बढ़ाने के लिए सब कुछ दिखाया जाता है , जिसका समाज पर बुरा प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है | सामाजिक संगठनों को चाहिए कि लोगों में महिला - सम्मान की मानसिकता विकसित करने हेतु ज़ोरदार अभियान चलायें , जिसमें धार्मिक साहित्य का भी इस्तेमाल करें | इस सिलसिले में इस्लाम की शिक्षाएं बड़ी कारगर भूमिका निभा सकती हैं

Nov 24, 2015

भ्रष्टाचार के चलते गरीबी पर अंकुश नहीं !

भ्रष्टाचार के चलते गरीबी पर अंकुश नहीं !

हमारे देश में कितनी गरीबी है इसे लेकर हमेशा विवाद रहा है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि गरीबी के आकलन का पैमाना कैसा है ? इसके आकलन में कितनी ईमानदारी और निष्पक्षता बरती गई है | आम तौर पर देखा गया है कि सत्ता पक्ष देश की गरीबी को घटता हुआ दिखाता है और अपनी नीतियों की सफलता की बात फैलाकर वाहवाही लूटता है | यही कारण है कि आंकड़ों में गरीबी वास्तविकता से कम दिखती या दिखाई जाती रही है। जबकि सच्चाई यह है कि देश में एक तिहाई परिवार गरीब हैं और ऐसा हर पांचवां परिवार अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग से ताल्लुक रखता है। आज ग्रामीण भारत के सवा तेरह फीसद परिवार ऐसे हैं जो सिर्फ एक कमरे के कच्चे मकान में रहते हैं। अगर राज्यवार देखें तो ग्रामीण आबादी में गरीबों का अनुपात सबसे ज्यादा मध्यप्रदेश में है। दूसरे नंबर पर छत्तीसगढ़ है। फिर बिहार और उत्तर प्रदेश का स्थान आता है। आकलन में रोजगार, शिक्षा, आमदनी और आमदनी का स्रोत, अनुसूचित जाति-जनजाति के वर्ग से संबंध, मकान, संपत्ति आदि कई पैमाने शामिल किए गए थे। इस आकलन में आए निष्कर्षों को सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं खासकर बीपीएल परिवारों के लिए चलाई जाने वाली योजनाओं का आधार बनाने की बात कही गई है , मगर यह कोई अजूबी बात नहीं है। पहले भी जनगणना से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग होता रहा है और ' उपयोग में ' भ्रष्टाचार ' का व्यापक घालमेल कर उन्हें गरीब बनाये रखा जाता है | इसके चलते गरीबी पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है | सवाल यह भी पैदा होता रहा है कि गरीब कौन है ? रंगराजन समिति ने तय किया था कि अगर कोई ग्रामीण व्यक्ति 32 रुपए रोजाना से अधिक खर्च करता है, तो वह गरीब नहीं है। इस पहले बनी तेंदुलकर समिति ने गरीबी की रेखा प्रति ग्रामीण व्यक्ति के लिए 27 रुपए रोजाना तय की थी। ज़ाहिर है , ये दोनों पैमाने पूरी तरह असन्तोषजनक हैं | असंगठित क्षेत्र की रोजगार-असुरक्षा और कृषि क्षेत्र के व्यापक संकट ने गरीबी को मापने के अब तक अपनाए जाते रहे पैमानों पर सवालिया निशान लगा दिया है।
वास्तव में देश की बहुत बड़ी आबादी भूखे पेट जीवन गुज़ारने के लिए अभिशप्त है |वैश्विक स्तर पर हल में आई एक रिपोर्ट का कहना है कि भारत भूखे लोगों का घर है | विश्व की सबसे अधिक भूख से पीड़ित आबादी यहां निवास करती है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स को पूरा करने में नाकाम रहा। रिपोर्ट के अनुसार 27 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा से नीचे निवास करते हैं | इनकी कमाई 1.25 डॉलर प्रतिदिन से कम है। यहां की एक चौथाई जनसंख्या कुपोषण का शिकार है और लगभग एक तिहाई जनसंख्या भूख से पीड़ित है। विश्व में सामाजिक सुरक्षा के तहत रोजगार प्रदान करने में विश्व बैंक ने मनरेगा को पहले स्थान पर माना है। कहा गया है कि मनरेगा भारत के पंद्रह करोड़ लोगों को रोजगार देता है, हालाँकि यहाँ भी भ्रष्टाचार की प्रचुरता है। मिड डे मील के लिए भी विश्व बैंक ने भारत की तारीफ़ की और कहा की यह विश्व में चलाई जाने वाली इस तरह की सबसे बड़ा विद्यालयी योजना है, इससे भारत में 10.5 करोड़ बच्चे लाभान्वित होते हैं। सच्चाई यह है कि मनरेगा और मिड डे मील भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है। देश में एक तरफ स्मार्ट सिटी और डिजिटल इंडिया की बात हो रही है तो दूसरी ओर करीब 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जी रहे हैं। गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण किसी भी देश के विकास के मार्ग की बाधाएं हैं। एनएसएसओ की ओर से जुलाई 2009 से जून 2010 के बीच कराए गए सर्वे के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में एक व्यक्ति का औसत मासिक खर्च 1,054 रुपए था। वहीं शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 1,984 रुपए मासिक था। इस हिसाब से शहरवासी औसतन 66 रुपए रोजाना खर्च करने में सक्षम था। वैसे दस फीसद शहरी आबादी भी मात्र बीस रुपए में गुजारा कर रही थी। यह राशि ग्रामीण इलाकों से थोड़ी ही ज्यादा थी। इसी सर्वे की मानें तो महीने के इस खर्च के मामले में बिहार और छत्तीसगढ़ के ग्रामीणों की की हालत सबसे ज्यादा खराब थी, जहां लोग करीब 780 रुपए महीने पर अपना भरण पोषण कर पाते थे। यह रकम महज छब्बीस रुपए रोजाना बैठती थी। इसके बाद ओडिशा और झारखंड का स्थान था, जहां प्रति व्यक्ति 820 रुपए महीने का खर्च था। खर्च के मामले में केरल अव्वल था। यहाँ के ग्रामीण 1,835 रुपए मासिक खर्च करते थे। शहरी आबादी के मासिक खर्च में महाराष्ट्र सबसे ऊपर था। यहां प्रति व्यक्ति खर्च 2,437 रुपए था। बिहार इस मामले में भी सबसे पिछड़ा हुआ था। यहां की शहरी आबादी मात्र 1,238 रुपए महीने पर पेट पालती थी। यूपीए-दो सरकार के समय 2013 में एनएसएसओ के अनुमान पर ही योजना आयोग ने शहरी इलाकों में 28.65 रुपए और ग्रामीण इलाकों में 22.42 रुपए रोजाना कमाने वालों को गरीबी रेखा से नीचे रखा था। खर्च के इस स्तर को लेकर खूब हंगामा मचाया गया था। लेकिन 2014 में भाजपा नीत राजग के सत्ता में आने के कुछ महीने बाद योजना आयोग ने 32 रुपया ग्रामीण और 47 रुपया शहरी इलाकों में दैनिक खर्च तय किया। यह भी किसी मजाक से कम नहीं था। वर्तमान में दाल, सब्जी, खाद्य तेल और अब चावल आदि के दाम आसमान छू रहे हैं। देश का समावेशी विकास कब होगा और कौन करेगा ? यह तो आनेवाला समय ही बताएगा | अब भी गल्ला व्यापारियों की आशंका है कि आने वाले दिनों में दाल , चावल आदि की क़ीमतें और बढ़ेंगी | अगर ऐसा हुआ और सरकार कारगर क़दम उठाने में नाकाम रही , तो आम जन का जीवन और दूभर हो जाएगा और एक कटोरी दाल के लिए ही नहीं एक मुट्ठी चावल के लिए भी उसे दूसरों के आगे बार - बार हाथ पसारने के लिए बाध्य होना पड़ेगा एवं ख़ाली पड़े जनधन खाते उसकी भूख नहीं मिटा पायेंगे | इन खातों में जो रक़म है , वह भी तो मध्य वर्ग की है , गरीबों का कोई पुरसानेहाल नहीं है !

Nov 19, 2015

बेवजह की चिन्ता


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देश में मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या पर चिंता जताते हुए सरकार से जनसंख्या नीति की समीक्षा करने की मांग की है | इससे पहले भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ ने हाल में ही केंद्र सरकार से मुसलमानों की बढ़ती आबादी पर रोक लगाने की मांग की थी ।
सांसद योगी अदित्यनाथ का यह बयान भी बड़ा भ्रमकारी था कि भारत में मुसलमानों की तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या एक ख़तरनाक रुझान है, जिसके लिए केंद्र सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए और मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या के नियंत्रण के लिए सख़्त क़दम उठाए। अब यही मांग संघ ने बाकायदगी के साथ की है , जबकि देश के जनसंख्या मामलों के कई विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में आदित्यनाथ जैसे लोग केवल आम लोगों को भ्रमित कर रहे हैं, क्योंकि भारत में जनसंख्या वृद्धि दर में अंतर के बावजूद 10 वर्षों में हिंदुओं की आबादी लगभग उतनी ही बढ़ जाती है जितनी देश में मुसलमानों की कुल आबादी है। 
यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों से दुर्भावना या घिनौने स्वार्थवश यह भ्रम - प्रचार किया जा रहा है कि देश में मुसलमानों की आबादी तेज़ी के साथ बढ़ रही है और एक दिन ऐसा आएगा जब पूरे देश में मुसलमान हिंदुओं से ज़्यादा हो जाएंगे। जनसंख्या मामलों के विशेषज्ञ इस तरह के सवालों को भ्रम फैलाने वाला और नफ़रत के माहौल को बढ़ानेवाला क़रार दिया है | विशेषज्ञों का मानना है कि जब हर दस साल में देश में लगभग इतने हिंदू बढ़ जाते हैं जितनी मुसलमानों की कुल आबादी है, तो फिर कैसे वह दिन आ सकता है जब भारत में मुसलमान हिंदुओं के बराबर हो जाएंगे
जनसंख्या विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक असंभव सी बात है, जबकि देश में मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ने की रफ़्तार भी लगातार धीमी हो रही है, और जैसे जैसे देश में शिक्षा और संपन्नता बढ़ेगी, हर समुदाय की जनसंख्या वृद्धि दर बढ़ने की रफ़्तार लगभग बराबर होने लगेगी, जैसा की विकसित देशों में होता है। इस धीमी रफ़्तार पर भी यह भ्रम प्रचार उचित नहीं है कि इसे ' धार्मिक असंतुलन ' कहा जा सके , जैसा कि संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की पिछले दिनों रांची में हुई बैठक में पारित एक प्रस्ताव में यह कहा गया है कि 2011 की जनगणना के धार्मिक आंकड़ों ने जनसंख्या नीति की समीक्षा को जरूरी है |
प्रस्ताव में कहा गया है, "1951 से 2011 के बीच मूल भारतीय धर्मों से संबंध रखने वाले लोगों की जनसंख्या 88 प्रतिशत से घटकर 83.5 प्रतिशत रह गई है जबकि मुस्लिम आबादी 9.8 फ़ीसदी से बढ़कर 14.23 प्रतिशत हो गई है |"
प्रस्ताव में साथ ही कहा गया है कि 'सीमावर्ती राज्यों असम, पश्चिम बंगाल और बिहार में मुसलमानों की आबादी बढ़ने की दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है जो इस बात का संकेत है कि बंगलादेश की तरफ घुसपैठ जारी है | ' पूर्वोत्तर राज्यों में जनसंख्या के ‘‘धार्मिक असंतुलन’’ को गंभीर करार देते हुए प्रस्ताव में कहा गया है कि 1951 में अरुणाचल प्रदेश में भारतीय मूल के लोग 99.21 फ़ीसदी थे लेकिन 2011 में उनकी आबादी घटकर 67 फ़ीसदी रह गई | सच्चाई यह है कि
भारत में पिछले दस सालों में हिंदुओं और मुसलमानों की आबादी बढ़ने की रफ़्तार में गिरावट आई है | हिंदू, मुस्लिम ही नहीं, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन, इन सभी समुदायों की जनसंख्या वृद्धि की दर में गिरावट आई है | भारत में जनगणना हर दस साल में होती है. साल 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक़ हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर 16.76 फ़ीसद रही जबकि 10 साल पहले हुई जनगणना में यह दर 19.92 फ़ीसद पाई गई थी कहने का मतलब यह कि देश की कुल आबादी में जुड़ने वाले हिंदुओं की तादाद में 3.16 प्रतिशत की कमी हुई | मुसलमानों की जनसंख्या में बढ़ोतरी की बात की जाए तो उसमें ज़्यादा बड़ी गिरावट देखी गई है.पिछली जनगणना के मुताबिक़ भारत में मुसलमानों की आबादी 29.5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी जो अब गिरकर 24.6 फ़ीसद हो गई है
अतः देश में मुसलमानों की आबादी की वृद्धि - दर अब भी हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर से अधिक है, लेकिन यह भी सच है कि मुसलमानों की आबादी बढ़ने की दर में हिंदुओं की तुलना में अधिक कमी आई है | देश में हिंदुओं की आबादी 96.63 करोड़ है, जो कि कुल जनसंख्या का 79.8 फ़ीसद है, वहीं मुसलमानों की आबादी 17.22 करोड़ है, जो कि जनसंख्या का 14.23 फ़ीसद होता है |
ईसाइयों की आबादी 2.78 करोड़ है, जो कि कुल जनसंख्या का 2.3 फ़ीसद और सिखों की आबादी 2.08 करोड़ (2.16 फ़ीसद) और बौद्धों की आबादी 0.84 करोड़ (0.7 फ़ीसद) है|

वहीं 29 लाख लोगों ने जनगणना में अपने धर्म का उल्लेख नहीं किया | इन आंकड़ों से यह बात साफ़ है कि मुसलमान भारत में अल्पसंख्यक हैं | उनकी आबादी को लेकर भ्रमकारी गलत सोच पैदा करके देशवासियों में असहिष्णुता का वातावरण बनाना नितांत अनुचित और देश , समाज के ताने - बाने पर कुठाराघात करनेवाला है |

Nov 3, 2015

खालिद मुजाहिद हत्याकांड की सी आई डी जाँच से क्या इन्साफ मिल पाएगा ?

खालिद मुजाहिद हत्याकांड की सी आई डी जाँच से क्या इन्साफ मिल पाएगा ?

खालिद मुजाहिद की पुलिस हिरासत में हत्या के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने नये सिरे से जाँच का हुक्म दिया है और बाराबंकी के मुख्य दंडाधिकारी को इस मामले के सारे द्स्यावेज़ सीआईडी की अपराध शाखा के सुपुर्द करने को कहा है | राज्य सरकार के अतिरिक्त एडवोकेट जनरल जनाब जफरयाब जीलानी ने कहा था कि राज्य सरकार इसकी एस आई टी या सीबी सी आई डी से करने को तैयार है | अतः अब खालिद मुजाहिद हत्याकांड की मुकम्मल जाँच होगी , जिसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े होंगे , ऐसा पहले से ही माना जा चूका है | सीबीआई पहले ही जाँच के उत्तर प्रदेश सरकार के अनुरोध को ठुकरा चुकी है | सीबीआई के इन्कार की वजह अखिलेश सरकार के संभावित हस्तक्षेप को बताया जाता है | उल्लेखनीय है कि खालिद मुजाहिद हत्याकांड में पूर्व डीजीपी और अन्य अधिकारियों समेत 42 लोगों पर मुकदमा है , जिनमें से कइयों को अखिलेश सरकार बचाना चाहती है | अखिलेश सरकार ने इस हत्याकांड में शामिल जिन अधिकारियों को बचाने की कोशिश की थी , वे सभी हाईकोर्ट के ताज़ा आदेश के बाद एक बार फिर क़ानून की जद में आ गये हैं | ज्ञातव्य है कि विवेचना अधिकारी मोहन वर्मा द्वारा लगाई गई फाइनल रिपोर्ट को बाराबंकी मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी बृजेन्द्र त्रिपाठी द्वारा पिछले वर्ष सात नवंबर14 को खारिज कर दी गई थी और दोबारा जाँच का आदेश दिया था , जिसे राज्य सरकार जानबुझकर लटकाती रही थी | अब हाईकोर्ट के आदेश से निश्चय ही कराने के आदेश से समाजवादी पार्टी सरकार को तगड़ा झटका लगा है। जमाअत इस्लामी हिन्द ,रिहाई मंच सहित कई मुस्लिम एवं अन्य संगठनों ने अदालत के फैसले का स्वागत किया है। इस मामले खालिद मुजाहिद के चचा ज़हीर आलम फलाही ने 19 मई 2013 को 42 पुलिसवालों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज कराई थी , जिनमें पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह, पूर्व एडीजी कानून व्यवस्था बृजलाल, मनोज झा समेत कई आला पुलिस अधिकारियों समेत आईबी के अधिकारी भी शामिल थे। उन्होंने सीबीआई जांच की मांग की थी , जिसे राज्य सरकार ने मान भी ली थी | खालिद मुजाहिद हत्या कांड की जांच में वादी जहीर आलम फलाही के अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब और रणधीर सिंह सुमन के अनुसार , खालिद की हत्या जो 18 मई 2013 को हुई थी, लेकिन विवेचना अधिकारी ने पूरे मामले बिना आरोपियों से पूछताछ किए ही 12 जून 2014 को फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी, जिसे खारिज करने की मांग को लेकर जहीर आलम फलाही ने 20 अक्टूबर 2014 को बाराबंकी कोर्ट में मुक़दमा दायर किया था और 42 पुलिसवालों को नामज़द किया था । याचिका में उन्होंने कहा था कि विवेचना अधिकारी द्वारा वादी का 161 सीआरपीसी के तहत बयान दर्ज नहीं किया गया, अभियुक्तगणों का नाम मामले में होने के बावजूद विवेचना अधिकारी द्वारा उन्हें अज्ञात लिखा गया। इसके साथ ही विवेचनाधिकारी मोहन वर्मा [ कोतवाल, बाराबंकी ] ने खालिद के कथित तौर पर गिरफ्तारी के समय उनके अपहरण, अवैध हिरासत के आरोप की जांच नहीं की जिससे बाद में उनकी हत्या का उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है। वहीं विसरा की जांच भी उचित तरीके से नहीं की गई क्योंकि प्रभावशाली आरोपियों विक्रम सिंह और बृजलाल के प्रभावक्षेत्र में ही विधि विज्ञान प्रयोगशाला भी आती है। याचिका में जहीर आलम फलाही ने सवाल उठाया था कि चूंकि ऐसा प्रतीत होता है कि विवेचनाधिकारी ने अपने उच्च अधिकारियों को बचाने के लिए साक्ष्य एकत्र करने के बजाय उन्हें नष्ट करने का कार्य किया और हत्या के उद्देश्य के संबन्ध में कोई जांच करने की कोशिश ही नहीं की, इसलिए पूरे मामले की फिर से जांच कराई जाए। तत्कालीन मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी बृजेन्द्र त्रिपाठी ने वादी से सहमत होते हुए कहा कि सभी साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि सही ढंग से मामले की विवेचना नहीं की गई है। सही बयान भी अंकित नहीं किए गए हैं। जिसके समर्थन में वादी ने शपथ पत्र भी लगाया है। दण्डाधिकारी ने आगे कहा था कि पत्रावली के परिसीलन से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि प्रकरण में विवेचक का आचरण जल्दबाजी का प्रतीत हो रहा है। इसलिए उक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मामले की अग्रिम विवेचना कराया जाना न्यायोचित है। 
इस मामले में दण्डाधिकारी ने थाना प्रभारी , कोतवाली बाराबंकी को निर्देशित किया था कि इस पूरे मामले की विवेचना के प्रति सभी तथ्य संज्ञान में लेकर पुलिस अधीक्षक बाराबंकी के निर्देशानुसार इसकी जांच सुनिश्चित करें तथा दो महीने के अंदर परिणाम से अवगत कराएं। इस मामले में भी लीपापोती को देखते हुए हाईकोर्ट का द्र्र्वाज़ा खटखटाया गया था | साथ ही बीस लाख रूपये मुआवज़ा देने की मांग की गई थी | कोर्ट ने गत 2 नवम्बर 15 को इस हत्याकांड की नये सिरे से सीबी - सीआईडी जाँच का आदेश दिया | जस्टिस अजय लांबा और जस्टिस बृजेश कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने यह फ़ैसला सुनाया |उल्लेखनीय है कि सपा के चुनाव घोषणापत्र और सपा नेताओं के बयानों में बेक़सूर मुस्लिम नवजवानों की रिहाई के लाख दावे किये गये हों , पर अमलन कुछ नहीं हो सका | पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने ज़बानी तौर पर चार सौ बेक़सूर मुस्लिम नवजवानों को रिहाई की घोषणा की थी , किन्तु अमलन एक की भी रिहाई नहीं हो पाई है ! . दरअसल बात इच्छाशक्ति की है | अखिलेश सरकार चाहती तो निमेष आयोग की रिपोर्ट का हवाला देकर तारिक और खालिद को रिपोर्ट के आने फ़ौरन बाद रिहा कर सकती थी , लेकिन उसने ऐसा न करके रिपोर्ट को ही दबा दिया ! मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पन्द्रह मार्च 2012 को पदभार ग्रहण करने के बाद ही तारिक और खालिद के मामले की फ़ाइलें मंगाई थीं और रिहाई के सिलसिले में गौर किया था | मगर भाजपा जैसी कुछ पार्टियों द्वारा विरोध जताने के बाद रिहाई की दिशा में कोई प्रगति नहीं हो पाई , यहाँ तक कि निमेष आयोग की रिपोर्ट को ही दबा दिया गया ! निमेष जाँच आयोग पुलिस और सरकार दोनों की पक्षपाती भूमिका को उजागर करने में सक्षम है | यह दोनों को कटघरे में खड़ा करती है | आरोपियों के मोबाइल नंबरों की जांच में लापरवाहियों और दोनों आरोपियों के अपहरण की सूचना परिजनों और स्थानीय नेताओं द्वारा दर्ज कराये जाने के बावजूद जांच का न होना भी आंतकवाद के कथित आरोपियों को फंसाये जाने की ओर इशारा करता है | जांच आयोग ने गिरफ्तारी के अनियमितता और झोल को कुल 14 बिंदुओं में समेटा | रिपोर्ट के 14वें हिस्से में कहा गया कि ‘कथित आरोपी तारिक कासिमी और खालिद मुजाहिद की 22 दिसंबर 2007 को सुबह 6.20 बजे आपत्तिजनक वस्तुओं के साथ गिरफ्तारी संदेहजनक प्रतीत होती है और अभियोजन के गवाहों पर पूर्णरूप से विश्वास नहीं किया जा सकता | ’ जांच आयोग ने अपने 12 सूत्रीय सुझावों में कई महत्वपूर्ण सुझाव आतंकवाद मामलों में होने वाली गिरफ्तारियों को लेकर दिये थे , जिनमें सुझाव संख्या 8 और 11 बेहद महत्वपूर्ण हैं | सुझाव आठ में कहा गया है कि ‘ऐसे मुकदमों के निर्धारण की सीमा अधिकतम 2 साल होनी चाहिए | केस समय पर निस्तारण न होने पर समीक्षा होनी चाहिए और संबंधित व्यक्ति के विरूद्ध कार्रवाई होनी चाहिए | ’ वहीं सुझाव संख्या 11 में ‘झूठे मामलों में फंसाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई ’ और सुझाव 9 में गिरफ्तार बेक़सूर लोगों को मुआवज़ा देने की बात कही गयी |.हाईकोर्ट के ताज़ा जाँच - आदेश के बाद यह आशा की जानी चाहिए कि अस्ली मुजरिम पकड़े जाएंगे और उन्हें सज़ा मिलेगी एवं सरकार प्रायोजित आतंकवाद पर रोक लगेगी |

तेलंगाना की अनुकरणीय पहल

तेलंगाना की अनुकरणीय पहल

बिगड़ी हुई सामाजिक सोच ने महिलाओं के लिए भी हमेशा परेशानियाँ पैदा की हैं | इसका एक विकृत रूप दहेज की शक्ल में लंबे अरसे से हमारे सामने है | एक सर्वेक्षण के अनुसार , देश में औसतन हर घंटे एक महिला दहेज या दहेज संबंधी वजहों से मार दी जाती है। इन्हीं अशुभ और क्षोभकारी समाचारों के बीच देश के एक नवोदित राज्य तेलंगाना से जो स्वस्थ जागरूकता का प्रमाण मिला है , वह बड़ा सुखद और स्वागतयोग्य है | वहां के नवाबपेट गांव के लोग इन दिनों दहेज में बरसों पहले मिली रकम वापस लौटा रहे हैं। निश्चय ही ग्रामीणों के इस क़दम का ठीक ढंग से प्रचार - प्रसार हो तो यह देशव्यापी अभियान का शक्ल ले सकता है | ऐसा इसलिए कहा जा सकता है , क्योंकि देश के अधिकांश युवा इस कुप्रथा के ख़िलाफ़ हैं | फरवरी 2015 में कराए गए एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि देश के 72 फीसदी युवक शादी में दहेज लेने के खिलाफ हैं , जबकि 75 फीसदी युवा मानते हैं कि दहेज प्रथा का अंत करना संभव है | सर्वेक्षण के अनुसार , 59.8 फीसदी युवकों का कहना है कि दहेज मांगने वाले लोगों को तुरंत जेल भेज दिया जाना चाहिए। वहीं दूसरी ओर 40.2 प्रतिशत युवक दहेज लोभी ससुरालवालों का सामाजिक बहिष्कार करने को सही ठहराते हैं। इस सर्वेक्षण की उल्लेखनीय बात यह भी रही कि 51.4 फीसदी लड़कियों ने कहा कि दहेज की मांग होने पर वे अपनी शादी तोड़ देंगी। 48.6 फीसदी लड़कियों ने कहा कि अगर उनके ससुरालवाले दहेज मांगेंगे तो वे सार्वजनिक तौर पर उनकी बदनामी कर देंगी। वास्तव में हमारे देश मे महिलाओं की दशा इतनी दयनीय और शोचनीय होने के पीछे एक बड़ा कारण है दहेज नामक कुप्रथा | इस कुप्रथा के चलते भी देश में कन्या भ्रूणहत्या की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं | दहेज की कुप्रथा के कारण भी लड़कियों को हर क्षेत्र मे दबाया जाता है | विडंबना देखिए कि वधू पक्ष ही वर को भरपूर दहेज भी दे, अपनी बेटी को अघोषित रूप से 24 घण्टे की सेविका बनाकर वर पक्ष को दे दे , फिर भी रौब और अकड़ वर पक्ष दिखाए, और कन्या पक्ष उसके आगे झुका रहे | शादी से पहले मां बाप के कंधो का बोझ होने की हीनता लड़कियों के मन बैठा दी जाती है | सच है कि आज यह कुप्रथा एक बड़ी राष्ट्रीय और सामाजिक समस्या के साथ बेटियों के माता-पिता के लिए आर्थिक समस्या भी है | दहेज विरोधी क़ानून की मौजूदगी के बावजूद समाज में दहेज के लेन-देन चलन और दायरा बढ़ता ही जा रहा है ! गौरतलब है कि 2012 में भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में बेटी की शादी पर हर परिवार औसतन 1 लाख 26 हजार 724 रुपये खर्च करता है। साथ ही अध्ययन में यह बात भी सामने आई थी कि देश में हर परिवार बेटी की शादी पर औसतन 30 हजार रुपये का दहेज देता है। आज की परिस्थिति में यह कहने में संकोच नहीं कि दहेज विरोधी क़ानून पूरी तर्ज निष्प्रभावी हो चुका है | आज भी कहीं - कहीं विज्ञापन के ये शब्द नारे के रूप में लिखे दिख जाते हैं कि '' दहेज लेना या देना अपराध है '' और '' दुल्हन ही दहेज है | '' लेकिन यह बात एकदम सच है कि 1961 से लागू दहेज निरोधक कानून सिर्फ़ दिखावा बना हुआ है | इस कानून तोड़ने पर पांच साल की सज़ा और 15 हजार रुपये के जुर्माने का प्रावधान है। 1985 में दहेज रोकने के कुछ कड़े नियम बनाये गए , लेकिन इन पर अमल नहीं हो पाया | नये नियमों के मुताबिक , शादी के समय दिए गए उपहारों की एक लिस्ट बनाकर रखी जानी चाहिए। लिस्ट में हर उपहार, उस उपहार की अनुमानित कीमत, उपहार देने वाले का नाम-पता और दुल्हन से उसके रिश्ते का विवरण मौज़ूद होना चाहिए। मगर कभी नियमानुसार नहीं किया जाता ! इस्लाम में दहेज को मान्यता नही दी गई है | इसकी शिक्षाएं दहेज के खिलाफ हैं | इस्लाम ने लड़कियो से दहेज मिलने के लालच या फिर उनकी सुन्दरता के लोभ मे विवाह करने की अनुमति मुस्लिम को बिल्कुल नहीं है | इसी तरह एक हदीस में है कि जो कोई व्यक्ति किसी औरत से केवल उसकी ताकत और उच्चस्तर पाने के लिए विवाह करता है तो अल्लाह उस व्यक्ति के केवल अपमान मे ही बढ़ोत्तरी करता है । जो व्यक्ति केवल किसी स्त्री की जायदाद मिलने के लालच मे उससे विवाह करता है, तो अल्लाह उसे केवल निर्धनता मे परिणित करता है, और जो व्यक्ति किसी केवल स्त्री की सुन्दरता के कारण विवाह करता है तो अल्लाह केवल उसमें कुरूपता की ही बढ़ोत्तरी करता है लेकिन जो व्यक्ति अपनी आंखों को सुरक्षित रखने के लिए ( अपनी यौन शुचिता को बनाए रखने के लिए ) विवाह करता है, और अपनी पत्नी के साथ दयालुता और भलाई का व्यवहार करता है तो अल्लाह उस वधू को वर के लिए शुभकारी बना देता है, और उस वर को वधू के लिए शुभकारी बना देता है | स्पष्ट है कि दहेज या अन्य किसी लोभ मे किसी स्त्री से विवाह करने को इस्लाम मे एक अप्रिय और निषेध कर्म ठहराया गया है और केवल भलाई और सदाचार पर कायम रहने के लिए विवाह किए जाने को प्रोत्साहित किया गया है, जिससे दहेज अपराध जैसी, भ्रूण हत्या जैसी कोई चीज समाज मे पनप ही न पाए | बस ज़रूरत है , इन शिक्षाओं पर अमल करने की |

अल्लाह की ओर से चेतावनियाँ हैं भूकंप और अन्य आपदाएं

भूकंप प्रभावित इलाक़ों में पर्याप्त मानवीय सहायता की ज़रूरत 

''थल और जल में बिगाड़ फैल गया है लोगों के अपने हाथों की कमाई से ताकि मज़ा चखाए उनको उनके कुछ कर्मों का , शायद कि वे बाज़ आएं '' [ क़ुरआन 30 - 41 ] | वास्तव में भूकंप और अन्य आपदाएं अल्लाह की निशानियाँ और चेतावनियाँ हैं , ताकि इन्सान इनसे शिक्षा लेकर अपने जीवन को सुधारे और जीवनोद्देश्य को पूरा करने में ठीक से लग जाए | मगर ऐसा महसूस होता है कि ऐसी घटनाएं घटती और गुज़र जाती हैं , मगर इन्सान के व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन में अभीष्ट परिवर्तन नज़र नहीं आता | अभी पिछले दिनों जबरदस्त भूकम्प आया | 26 अक्तूबर  को आये इस भूकंप से उत्तर भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान दहल और लरज़ उठा। रिक्टर स्केल पर भूकम्प की तीव्रता 7.5 मापी गई। भूकम्प का केंद्र अफगानिस्तान में हिंदूकुश पर्वत श्रेणी था। यह दोपहर करीब दो बजकर 40 मिनट पर आया। भूकम्प से पाकिस्तान में 250 लोगों, अफगानिस्तान में 73 लोगों और भारत में अभी तक लगभग एक दर्जन के मारे जाने की खबर है। भूकम्प से भारत में जम्मू कश्मीर, दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर), पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, और राजस्थान दहल गया। पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में हल्के झटके महसूस किए गए। दिल्ली-एनसीआर में ये झटके लगभग दो मिनट तक महसूस किए गए। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट में दो मामलों की सुनवाई हो रही थी। भूकंप आते ही जज समेत सभी के बाहर निकल गए। भूकंप के कारण जम्‍मू-कश्‍मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्‍दुल्‍लाह  को भी भागना पड़ा। उमर ने ट्वीट कर कहा, ‘2005 के बाद यह पहला मौका है जब भूकंप के कारण मझे बाहर की तरफ भागना पड़ा।’ अब्‍दुल्लाह ने बताया कि श्रीनगर में इलेक्ट्रिसिटी सप्लाइ बंद कर दी गई थी |
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति से फोन पर बात कर सहायता की पेशकश की। जम्मू कश्मीर में महसूस किए गए 7.5 तीव्रता वाले भूकम्प के झटकों से दो बुजुर्ग महिलाओं की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। राष्ट्रीय राजधानी में धरती हिलते ही लोग अपने-अपने घरों से बाहर दौड़े। दिल्ली मेट्रो की ट्रेनों का परिचालन रोक दिया गया। इसकी सेवाएं 15 मिनट के बाद बहाल हुईं। उत्तराखंड में भूकम्प के झटके मसूरी, देहरादून, हरिद्वार, रूड़की और ऋषीकेश में महसूस किए गए। इसके बाद लोग अपने घरों और कार्यालयों से बाहर निकल आए और अफरा - तफरी मच गई |
 भूकम्प की वजह से संचार सेवाएं कुछ देर के लिए बाधित हुईं। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की शाखा राष्ट्रीय भूगर्भ विज्ञान केंद्र के मुताबिक भूकम्प का केंद्र हिंदूकुश पर्वत श्रेणी में 190 किलोमीटर की गहराई में था। यह भूकम्प का अधिक संवेदेशनशील क्षेत्र माना जाता है। वहीं यूएस जियोलॉजिकल सर्वे के मुताबिक भूकम्प का केंद्र उत्तर-पूर्वी अफगानिस्तान में जुर्म के पास था और 213.5 किलोमीटर की गहराई पर आया। यह जगह राजधानी काबुल से 250 किलोमीटर दूर है। संकट की इस घड़ी में भारत - पाकिस्तान के बिगड़ते संबंधों को नया आयाम मिला |प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जबरदस्त भूकम्प के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को फोन किया और लोगों की जान जाने पर संवेदना जताई और सहायता की पेशकश की। मोदी ने ट्वीट किया, ‘प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बात की और के भूकम्प चलते लोगों की जान जाने पर संवेदना जाहिर की। भारत से हर संभव सहायता की पेशकश की।’ प्रधानमंत्री मोदी ट्वीट किया, ‘बिहार से लौटा हूं। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद से बात की और दुर्भाग्यपूर्ण भूकम्प की वजह से बने हालात का जायजा लिया।’ उन्होंने लिखा, ‘मैंने अभी राष्ट्रपति अशरफ गनी से बात की और भूकम्प से हुए नुकसान पर मेरी ओर से सहानुभूति और संवेदना प्रकट की।’ उन्होंने एक ट्वीट में कहा, ‘राष्ट्रपति अशरफ गनी ने मुझसे नुकसान के अपने आंतरिक आकलन को साझा किया। मैंने हरसंभव मदद का आश्वासन दिया।’ मोदी के मुताबिक गनी ने उन्हें बताया कि भूकम्प की वजह से एक स्कूली इमारत गिर गयी और कुछ बच्चे मारे गए। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘मुझे यह सुनकर बहुत दुख हुआ। जब राष्ट्रपति गनी मुझे स्कूल के बारे में बता रहे थे तो मेरा दिमाग 2001 में कच्छ के अंजार में आई इसी तरह की आपदा की ओर चला गया। बहुत बुरा लगा।’ भूकम्प से पाकिस्तान का उत्तरी हिस्सा दहल उठा। प्रभावित इलाकों में राहत अभियान के लिए सेना को तैनात किया गया है। कराची, लाहौर, इस्लामाबाद, रावलपिंडी, पेशावर, क्वेटा, कोहाट, और मालाकंड समेत पाकिस्तान के प्रमुख शहरों में भूकम्प का झटका महसूस किया गया। सेना के मुताबिक सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ खैबर पख्तूनख्वा की राजधानी पेशावर में राहत व बचाव अभियान की निगरानी कर रहे हैं । पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने सभी संघीय, नागरिक, सैन्य और प्रांतीय एजंसियों को तत्काल अलर्ट का निर्देश दिया है | अफगानिस्तान के मुख्य कार्यकारी अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह ने कहा, ‘शुरुआती रिपोर्ट से बदख्शांं, तखर, नांगरहार, कुनार और राजधानी काबुल सहित दूसरे क्षेत्रों में जान माल की भारी क्षति होने का पता चला है।’ अफगानिस्तान में 7.5 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आने से कम से कम 73 लोग मारे गए जिनमें एक स्कूल की 12 छात्राएं शामिल हैं जो भूकंप से स्कूल की ढहती इमारत से भागते समय मची भगदड़ की भेंट चढ़ गयीं। इस बार आए भूकम्प का केंद्र अक्तूबर 2005 में आए 7.6 तीव्रता के भूकम्प से कुछ सौ किलोमीटर दूर है। 2005 में आए भूकम्प में 75 हजार लोग मारे गए थे और 35 लाख लोग विस्थापित हुए थे। ज़रूरत इस बात की है कि बचाव व राहत के कम युद्ध स्तर पर किये जायें , साथ ही विश्व स्तर पर भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में पर्याप्त मानवीय सहायता पहुंचाई जाए |