Dec 30, 2015

कम हुआ नहीं लगता देश का भ्रष्टाचार

कम हुआ नहीं लगता देश का भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार के नित नये मामलों का आना इस बात का सबूत है कि भ्रष्टाचारी किसी सरकार ने नहीं डरते ! न ही केजरीवाल से और न ही मोदी से | दिल्ली सरकार की नाक के नीचे ऑटो परमिट का घोटाला आप वाले झेल ही रहे हैं , वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार के जेटली समेत कुछ मंत्री आरोपों के घेरे में हैं | भाजपा शासित राज्य भी इससे अछूते नहीं हैं | पिछले दिनों मध्‍य प्रदेश में लोकायुक्‍त पुलिस की छापेमारी में एक हेड कॉन्‍स्‍टेबल के पास 5 घर, 6 प्‍लॉट, 3 कार, एक एसयूवी गाड़ी समेत करोड़ों की चल-अचल संपत्ति का खुलासा हुआ है। लोकायुक्त पुलिस ने आरटीओ विभाग में तैनात हेड कॉन्स्टेबल अरुण सिंह के इंदौर, रीवा, सतना और जबलपुर स्थित ठिकानों पर छापेमारी की थी। यह कार्रवाई आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में की गई थी। अरुण सिंह जिस घर में रहता है अकेले उसी की कीमत एक करोड़ रुपए बताई जा रही है | अरुण सिंह के इंदौर स्थित घर से अन्नपूर्णा नगर स्थित तीन मंजिला मकान, तलावली चांदा कॉलोनी में दो प्‍लॉट के कागजात बरामद हुए हैं। इसके अलावा एक स्‍कॉर्पियो और बैंक में लॉकर के दस्‍तावेज भी लोकायुक्‍त पुलिस के हाथ लगे हैं। अरुण सिंह के पास से कुल संपत्ति के जो दस्‍तावेज मिले हैं, उनमें इंदौर के अन्नपूर्णा इलाके में तीन मंजिल मकान, 6-6 हजार स्‍क्‍वायर फीट के दो प्लॉट पत्नी के नाम, इंदौर में बेटे के नाम पर दो फ्लैट, रीवा में 30 एकड़ जमीन, रीवा में 8-8 हजार स्‍क्‍वायर फीट के दो प्लॉट, रीवा में दो मकान, स्कॉर्पियो सहित तीन कार, और 8 बैंक अकाउंट समेत कुछ लॉकर शामिल हैं | यह मध्य प्रदेश की पहली घटना नहीं है | चिंताजनक बात यह है कि भ्रष्टाचारियों के पकड़े जाने के बाद भी कोई शिक्षा नहीं ग्रहण करता ! दूसरी ओर भ्रष्टता सूची में देश के पायदान का घटना कोई विशेष उपलब्धि नहीं मानी जा सकती , क्योंकि जो टेम्पो केजरीवाल और मोदी के आह्वान से बना था , उसे बिना कार्यरूप दिए अधिक समय तक बरक़रार नहीं रखा जा सकता |
भ्रष्टाचार विरोधी संगठन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की भ्रष्ट देशों की ताजा सूची में कुल 175 देशों के नाम हैं | सूची में भारत को 85वां स्थान मिला है जो सांत्वना का विषय ज़रूर हो सकता है | इस संगठन की 2011 की भ्रष्टता सूची में भारत 95 वें पायदान पर था , जबकि इससे पहले 79 वें पायदान पर था , लेकिन इस घट - बढ़ में भ्रष्टाचार का चलन कम नहीं हुआ है , बल्कि इसका तरीक़ा बदल गया | भ्रष्टाचार विरोधी तेवरों के बावजूद इस पर रोकथाम के प्रयास नगण्य हैं , बल्कि ऐसे लोगों को बचाया भी जाता है | केन्द्रीय सत्ता में आने से पहले से ही काले धन को जिस तरह मोदी ने अपना बड़ा मुद्दा बनाया , उससे भी इस सोच को बल मिला कि नई सरकार भ्रष्टाचार और भ्रष्ट लोगों के खिलाफ सख्त कदम उठाएगी | सरकार बनते ही उन्होंने न्यायालयों से भ्रष्ट नेताओं पर चल रहे मामलों की फास्ट ट्रैक सुनवाई करने की अपील की , मगर दूसरी ओर, इस पर भी गौर किया जाना चाहिए कि वर्तमान कैबिनेट में तमाम आपराधिक मामलों में आरोपित लोगों की तादाद पुरानी कांग्रेस सरकार के दागी मंत्रियों से करीब दोगुनी है | 66 सदस्यीय वर्तमान कैबिनेट के करीब एक तिहाई मंत्री आपराधिक धमकी, धोखाधड़ी , तो कुछ दंगा भड़काने और बलात्कार जैसे गंभीर आरोपों में घिरे हैं | लोकपाल भी अभी तक हवा में हैं | आप के लोकपाल को भी मोदी सरकार ने रोककर क़ानूनी दांव - पेंच के हवाले कर दिया है और केजरीवाल सरकार को निबटाने पर पूरा ज़ोर लगा रखा है | भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून में उचित संशोधन करने के साथ ही लोकपाल जैसी व्यवस्था को लागू करने से भ्रष्टाचार पर रोकथाम में काफी मदद मिल सकती है | आर्थिक विकास से ही भ्रष्टाचार उन्मूलन - संभव नहीं | 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भ्रष्टाचार को वैश्विक चलन कहा था | इस वक्तव्य के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री के ऐसी बात करने पर खेद जताया था | 
1989 के लोकसभा चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा छाया रहा | तबसे लेकर आज तक चुनावी अभियानों में भ्रष्टाचार मिटाने के दावे बढ़चढ़ कर उछाले जाना आम बात हो गई है | ऐसे में इन दावों की कलई तब खुलती है , जब भारत सूची में बुर्किना फासो, जमैका, पेरु और जाम्बिया जैसे गरीब देशों के पायदान जैसा पाया जाता है | वस्तुस्थिति यह है कि आज हमारा देश भ्रष्टाचार और नैतिक पतन से गंभीर रूप से जूझ रहा है | भ्रष्टाचार पूरी व्यवस्था को चाट रहा है | जब तक इन्सान के नैतिक अस्तित्व को सबल नहीं बनाया जाएगा और उसके अंदर ईशपरायणता एवं ईशभय नहीं पैदा होगा , तब तक भ्रष्टाचार - उन्मूलन असंभव है | पूरी सृष्टि में केवल इन्सान ही ऐसा प्राणी है , जिसे कर्म और इरादे का अधिकार प्राप्त है | वह ईश्वर द्वारा स्रष्ट सभी जीवों और चीजों में सर्वश्रेष्ठ है , अतः सृष्टि की बहुत - सी चीज़ें उसके वशीभूत की गई हैं , जिनका वह अधिकारपूर्वक उपभोग करता है और कर सकता है | उहाँ यह तथ्य भी स्पष्ट रहे कि इन्सान के न तो अधिकार असीमित हैं और न ही उपभोग | उसके लिए भी एक सीमा - रेखा है , जिसे मर्यादा कहते हैं | यह चीज़ ही इन्सान को नैतिक अस्तित्व प्रदान करती है | मर्यादा और नैतिक अस्तित्व को बनाये रखने के लिए ही सदाचरण के द्वारा इन्हें परिमार्जित करने एवं जीवन को उच्चता की ओर ले जाने के लिए इन्सान को आध्यात्मिकता की ज़रूरत होती है , जो उसके जीवन की नैसर्गिक , बुनियादी और अपरिहार्य आवश्यकता है | अतः भ्रष्टाचार - निवारण के लिए अनिवार्य है कि इन्सान अपने स्रष्टा - पालनहार की ओर पलटे और उसका आज्ञाकारी और ईशपरायण बने |

Dec 27, 2015

दहेज की लानत से कैसे पाएं छुटकारा ?

दहेज प्रथा पूरे समाज के लिए एक अभिशाप है | इसके कारण न जाने कितनी मासूम बहन - बेटियाँ को अपनी जान गंवानी पड़ रही है , लेकिन यह सच है कि इस समस्या पर कोई सार्थक चर्चा तक नहीं हो पाती ! जबकि सभी जानते हैं कि यह कुप्रथा महिलाओं के लिए बहुत घातक है | प्रारम्भ में इस प्रथा का विकास उपहार के रूप में हुआ। समाज का हर वर्ग अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुकूल खुशी से अपनी कन्या को कुछ देता था। बाद में धीरे-धीरे सम्पन्न घरों में दी गई वस्तुओं की तरह अन्य लोगों ने भी लड़की पक्ष से मांग करना शुरू कर दिया। कन्या पक्ष गरीब भी हो तो उसको एक बनी हुई कुप्रथा के अनुसार वरपक्ष को इतना दहेज देना पड़ता हैं , जिससे वह जीवन भर कर्ज में फंस जाता है और उसकी आर्थिक स्थिति बहुत कमज़ोर हो जाती है | दुखद और त्रासद स्थिति यह भी होती है कि कभी दहेज का प्रबंध न होने के कारण लड़कियों की शादी नहीं हो पाती | अक्सर देखा गया है कि वरपक्ष की ओर से अपनी लोभ - लिप्सा व कुत्सित स्वार्थ के चलते अधिक से अधिक कीमती वस्तुओं, नकद व जेवर आदि की मांग की जाती है | बहुत से लोग जो समर्थ है अधिक से अधिक दहेज देकर उनकी मांग पूरी कर देते है, परंतु जो लोग वरपक्ष की मांगें पूरी नहीं कर पाते , वे या तो कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं या फिर उनकी लड़कियों का विवाह ही नहीं हो पाता। यह भी देखा गया है कि कम दहेज लाने वाली लड़कियो को कई प्रकार के शारीरिक व मानसिक कष्ट उठाने पड़ते हैं यहाँ तक कि बहुओं को जला दिया जाता हैं या अन्य प्रकार से उनकी हत्या कर दी जाती है। विडंबना यह कि वधू पक्ष वर पक्ष को भरपूर दहेज भी दे, अपनी बेटी को अघोषित रूप से स्थाई सेविका बनाकर दे, फिर भी रौब और अकड़ वर पक्ष दिखाए और कन्या पक्ष उसके आगे झुका रहे ! शादी से पहले मां बाप के कंधो का बोझ होने की बात लड़कियों के मन बैठा दी जाती है और शादी के बाद कम दहेज लाने को लेकर ससुराल मे मिलने वाली मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना को परिवार की मान मर्यादा बनाए रखने के लिए लड़की पर ही हर ओर से दबाव डाला जाता है | यह स्थिति केवल गांव कस्बों की कम पढ़ी लिखी लड़कियों की ही नहीं बल्कि बड़े शहरो की उच्च शिक्षित और माडर्न लड़कियों की भी है | आम तौर पर दोनों जगहों पर बात सिर्फ़ थोड़ी शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना तक सीमित नहीं रहती , अक्सर देश के ग्रामीण क्षेत्रों से दहेज हत्या - बहू को जलाकर मार डालने के मामले सामने आते रहते है , जबकि शहरी क्षेत्रों में दहेज प्रताड़ना के बेशुमार मामले अदालतों मे लम्बित रहते हैं | राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की विगत वर्ष आई रिपोर्ट के अनुसार , भारत में पिछले वर्ष दहेज हत्या के 8,083 मामले प्रकाश में आए. इनमें क़रीब एक चौथाई मामले (2,335) सिर्फ उत्तर प्रदेश से हैं | बिहार और मध्य प्रदेश 1,182 और 7,76 दहेज हत्या के मामलों के साथ क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं | दहेज हत्या की दर के मामले में राष्ट्रीय औसत 1.36 है जबकि उत्तर प्रदेश में यह दर 2.36 है | उत्तर प्रदेश की महिला आबादी क़रीब नौ करोड़ 88 लाख है और बिहार में महिला आबादी चार करोड़ 85 लाख है | आँकड़ों के अनुसार, बिहार में दहेज हत्या की दर सबसे अधिक 2.43 है | 
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में दहेज हत्या के 144 मामले दर्ज हुए | सिक्किम, मिज़ोरम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, गोवा, लक्षदीप और दमन दीव में दहेज हत्या का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ | वर्ष 2013 में पूरे देश में जितने मामले दर्ज हुए उनमें 28.89 प्रतिशत अकेले उत्तर प्रदेश से थे | ये आंकड़े वे हैं जो पुलिस थानों में दर्ज हुए जबकि देश में बहुत से मामले थानों तक पहुंच ही नहीं पाते | वर्ष 2012 में देश भर में दहेज हत्या के 8,233 मामले दर्ज हुए थे | इस हिसाब से 2013 में बहुत मामूली सुधार हुआ था | वर्ष 2012 में दहेज हत्या के सबसे अधिक 2,511 मामले आंध्र प्रदेश से दर्ज किए गए थे | उस वर्ष ओडिशा से 1,487 मामले दर्ज हुए थे और अपराध दर के लिहाज से राष्ट्रीय औसत 1.5 के मुकाबले ओडिशा की दर 7.3 थी | सरकार ने दहेज प्रथा पर रोक लगाने के लिए दहेज प्रतिबन्ध अधिनियम 1961 लागू किया , परन्तु वह समाज में वयवहारिक रूप से लागू नहीं हो पा रहा हैं , क्योंकि समाज अभी इस कुप्रथा को अपनाने में मशगूल है। जब तक समाज स्वयं इसको समाप्त नहीं करेगा तब तक कानून भी कुछ नहीं कर सकता। इसके दुरूपयोग की समस्या भी विचारणीय और शोचनीय है | हर साल दहेज उत्पीड़न के औसतन 10,000 झूठे मामले दर्ज होते हैं। यही वजह है कि सरकार ने आपराधिक कानून में संशोधन किया है | विधि आयोग और न्यामूर्ति मलिमथ समिति की सिफारिशों के तहत अदालतों की अनुमति से भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए को ऐसे अपराध की श्रेणी में रखा गया है , जिसमें सुलह-समाधान की गुंजाइश हो।यह भी एक तथ्य है कि इस कुप्रथा के भय से भी हमारे देश मे लाखों लड़कियों को गर्भ मे ही मार डाला जाता है ! जो बच जाती हैं , वे नारकीय जीवन जीने के लिए अभिशप्त होती हैं ! दहेज - दानव से निबटने में इस्लामी शिक्षाएं बहुत कारगर हैं | पवित्र क़ुरआन की सूरह निसा की आयत संख्या 129 धन और सौन्दर्य लोभवश शादी पर रोक लगाती है | इस आयत में है '' पत्नियों के बीच पूरा -पूरा न्याय करना तुम्हारे बस में नहीं है | तुम चाहो भी तो तुम्हें इसकी सामर्थ्य नहीं हो सकती | अतः [ ईश्वरीय विधान की मंशा पूरी करने के लिए यह काफ़ी है कि ] एक पत्नी की ओर इस तरह न झुक जाओ कि दूसरी को अधर में लटकता छोड़ दो | ''
इस आयत की व्याख्या में एक रिवायत [ बुख़ारी ] में हज़रत आइशा [ रजि , ] फरमाती हैं कि यह आयत अनाथ लड़कियों का संरक्षण करने वाले उन पुरूषों के लिए नाजिल हुई , जो अनाथ लड़कियों से प्रेम के कारण नहीं , बल्कि उनकी सुन्दरता का रस लेने और उनकी धन सम्पत्ति हड़पने के फिराक मे उनसे विवाह करना चाहते थे | इस स्थिति में ऐसी आशंका थी कि वे उन लड़कियों की जायदाद हड़पने और लड़कियों की सुन्दरता से मन भर जाने के बाद उन लड़कियों को उनका अधिकार भी न देते और उन लड़कियों से बुरा व्यवहार भी करने लग जाते | अतः अल्लाह ने इस कपटपूर्ण भावना से किसी भी स्त्री से विवाह करने से पुरुष को रोका है, और उस स्त्री के बजाय किसी अन्य स्त्री से विवाह की आज्ञा दी है । उल्लेखनीय है कि इस आयत से कुछ लोग यह गलत नतीजा निकाल बैठे हैं कि क़ुरआन एक ओर न्याय की शर्त के साथ बहुविवाह की अनुमति देता है [ क़ुरआन 4 - 3 ] और दूसरी ओर न्याय करने को असंभव ठहराकर इस अनुमति को व्यवहारतः निरस्त कर देता है , लेकिन वास्तव में ऐसा नतीजा निकालने के लिए इस आयत में कोई गुंजाइश नहीं है | अगर सिर्फ़ इतना ही कहकर छोड़ दिया गया होता कि '' तुम औरतों के बीच न्याय नहीं कर सकते '' तो यह नतीजा निकाला जा सकता था , मगर इसके बाद यह जो कहा गया कि '' अतः एक पत्नी की ओर बिलकुल न झुक पड़ो '' इस वाक्य ने लोगों को उक्त नतीजा निकालने के लिए कोई अवसर ही नहीं छोड़ा | इस्लाम में भौतिक चीज़ें विवाह का आधार नहीं हैं , बल्कि ईमान और प्रेम इसका आधार हैं | दहेज या अन्य किसी भौतिक लोभ मे किसी स्त्री से विवाह करने को इस्लाम मे एक अप्रिय और निषेध कर्म ठहराया गया है | ईमान , भलाई और सदाचार पर कायम रहने के लिए विवाह किए जाने को प्रोत्साहित किया गया है, ताकि दहेज , भ्रूण हत्या जैसे अपराध समाज में पनप ही न पाएं | कुल मिलाकर बात यह है कि दहेज रूपी दानव के अत्याचार थमने के नाम नहीं ले रहे ! इस पर रोक के लिए इस्लामी शिक्षाओं से लाभ उठाने के साथ ही समाज में पर्याप्त जनचेतना की ज़रूरत है ही ,इसके लिए ख़ास तौर से शिक्षित युवाओं को आगे आना चाहिए । युवकों को भी दहेज की राशि नहीं स्वीकार करनी चाहिए।

Dec 12, 2015

समान सिविल कोड और सुप्रीम कोर्ट

समान सिविल कोड
और सुप्रीम कोर्ट

समान सिविल कोड के मुद्दे पर दायर की गई जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने विगत सात दिसंबर 15 को सुनवाई करने से इन्कार करके बड़ा ही बुद्धिमत्तापूर्ण क़दम उठाया है | इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई थी कि वह सरकार को समान सिविल कोड तैयार करने का निर्देश दे। याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्वनी उपाध्याय की ओर से दाखिल की गई थी , जिसमें कहा गया था कि समान सिविल कोड प्रगतिशील आधुनिक राष्ट्र का प्रतीक है। इसके लागू होने से पता चलेगा कि देश में धर्म, जाति, वर्ण के आधार पर भेदभाव समाप्त हुआ है और राष्ट्र आगे बढ़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में संसद ही कोई फैसला कर सकती है। बता दें कि एक जनहित याचिका दाखिल कर देश भर के नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की मांग की गई है ताकि विभिन्न धर्मो में व्याप्त भेदभाव समाप्त हो। इस याचिका की अस्ल मंशा जो भी रही हो , लेकिन इसमें यह बात भी कही गई है कि '' हिन्दू विधि को चार कानूनों में संहिताबद्ध किया गया है लेकिन परंपरा और रीतिरिवाज को स्वीकार करके भ्रम की स्थिति पैदा कर दी गई , अतः समान सिविल कोड आवश्यक है | ''
ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी के बाद समान सिविल कोड पर अवांछित बहस छिड़ गयी है | उसने इस पर केंद्र सरकार से रुख साफ करने को कहा था । कोर्ट ने गत 13 अक्तूबर 2015 को सरकार से पूछा, “समान सिविल कोड पर आपको (सरकार) हो क्या गया? अगर इसे लागू करना चाहते हैं तो लाइए। आप इसे फौरन लागू क्यों नहीं करते? देश में कई पर्सनल लॉ हैं। इससे भ्रम की स्थिति बनी हुई है।” 
कोर्ट ने यह बात क्रिश्चियन डायवोर्स एक्ट की धारा 10ए(1) को चुनौती देने वाली अर्जी की सुनवाई के दौरान कही। दिल्ली के अलबर्ट एंथोनी द्वारा दायर याचिका में दलील दी गई थी कि “ईसाई दंपत्ति को तलाक के लिए कम से कम दो साल अलग रहना जरूरी है। जबकि हिंदू मैरिज एक्ट में एक साल अलग रहने पर तलाक दे दिया जाता है। एक ही मामले में दो व्यवस्थाएं गलत हैं।” 
पिछली सुनवाई में सरकार धारा 10ए(1) को बदलने पर राजी थी। कहा था कि काम शुरू भी हो चुका है। 12 अक्तूबर 15 की सुनवाई में जस्टिस विक्रमजीत सेन और जस्टिस शिवकीर्ति सिंह की पीठ ने नाराजगी जताई कि 3 महीने बाद भी इसे बदला नहीं गया है। जब सरकारी वकील ने और समय मांगा तो बेंच ने कहा, “क्या हुआ? किस वजह से ऐसा नहीं हो सका? अगर आप ऐसा करना चाहते हैं तो आपको बताना चाहिए।”
वकील के जवाब से नाखुश होने पर कोर्ट ने किसी और काम के लिए वहां मौजूद सॉलीसिटर जनरल रंजीत कुमार से मदद करने को कहा। उनसे सभी धर्मों के लिए तलाक के एक जैसे नियम पर सरकार की स्थिति के बारे में पूछा। साथ ही जवाब देने के लिए तीन हफ्ते का वक्त दे दिया , लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं दिया गया है |
केन्द्रीय कानून मंत्री डी.वी. सदानंद गौड़ा ने सुप्रीमकोर्ट की टिप्पणी के बाद राष्ट्र की अखंडता के लिए समान सिविल कोड की जरूरत पर बल देते हुए कहा था कि इस मुद्दे पर सभी पक्षों से राय हासिल करने एवं व्यापक चर्चा के बाद ही कोई फैसला किया जा सकता है।गौड़ा ने कहा था कि इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में सरकार द्वारा हलफनामा दाखिल करने से पहले वह प्रधानमंत्री, कैबिनेट के सहयोगियों, अटार्नी जनरल और सालीसीटर जनरल के साथ विचार करेंगे। उन्होंने कहा कि समान सिविल कोड पर सहमति बनाने के लिए विभिन्न पर्सनल लॉ बोर्डों और संबंधित पक्षों के साथ व्यापक चर्चा की जाएगी। कानून मंत्री के अनुसार , देश के संविधान की प्रस्तावना और अनुच्छेद 44 में भी समान सिविल कोड की बात कही गई है। लेकिन यह संवेदनशील मुद्दा है, इसलिए बड़े पैमाने पर चर्चा जरूरी है।
अब सुप्रीमकोर्ट ने जनहित याचिका ख़ारिज करके अनावश्यक बहसा - बहसी पर रोक लगा दी है और गेंद केंद्र के पाले में डाल दी है | वास्तव में समान सिविल कोड संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त उनके मौलिक अधिकारों के सर्वथा विपरीत है | संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को अंतःकरण और धर्मानुसार अमल करने की आज़ादी देता है | ऐसी ही बात संविधान की प्रस्तावना में कही गई है | संविधान में धाराओं 25 (1) और 26 के अंतर्गत जो बातें कही गई है उनका सार यह है कि हर धार्मिक समुदाय को इसका अधिकार प्राप्त होगा कि अपने धर्म पर चले, तथा अपने तौर पर अपने धार्मिक क्रिया-कलाप अंजाम दे। 
अतः यह सिर्फ़ मुसलमानों (या अन्य अल्पसंख्यक समुदायों) का मामला ही नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधान का भी तक़ाज़ा है कि उसके अंतर्गत देश में समान सिविल कोड लागू न हो। मुसलमानों ने भी समान सिविल कोड को लागू नहीं किया | जब वे लगभग नौ सौ वर्ष देश के शासक रहे , कभी भी उन्होंने हिन्दू या अन्य धर्मानुयायी जनता पर अपना क़ानून नहीं थोपा | अंग्रेज़ों ने लार्ड मैकाले की अध्यक्षता में समिति बनकर भारतीय दंड संहिता , भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता , भारतीय व्यवहार प्रक्रिया संहिता , भारतीय साक्ष्य अधिनियम आदि बहुत - से क़ानून लागू कर दिए , लेकिन समान सिविल कोड की ओर नहीं बढ़े , क्योंकि वे यह जानते थे कि यह किसी भी क़ीमत पर लागू नहीं हो सकता | उन्होंने मुसलमानों के लिए पारिवारिक क़ानून 1937 और अलग से मुस्लिम मैरिज डिज़ुलेशन एक्ट 1939 बनाया | देश के किसी भी हितैषी व स्कालर ने समान सिविल कोड का समर्थन नहीं किया है |
डॉ. अंबेडकर जो संविधान निर्मात्री सभा के प्रमुख नेता थे सभा में नीति निर्देशक तत्व की धारा 44 में इस बाबत रखे गये प्रावधान पर दक्षिण के कुछ मुस्लिम सदस्यों की आपत्ति का जवाब देते हुए कहा था कि जब तक सब देशवासी इसके लिए राज़ी नहीं होंगे , इसे कदापि लागू नहीं किया जाएगा | देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं . जवाहरलाल नेहरू ने भी कई बार इसी आशय का मत प्रकट किया था | राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को लंबे समय तक नेतृत्व देनेवाले गुरु गोलवलकर जी भी इसके समर्थक है कि देश समान सिविल कोड लागू न हो | 20 अगस्त 1972 को दिल्ली स्थित दीनदयाल शोध संस्थान के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने साफ़ कहा था कि देश में समान सिविल कोड अवांछित है | उन्होंने कहा था कि जो लोग समान सिविल कोड की बात करते हैं , वे भारत की ज़रूरत समझते ही नहीं हैं | गुरु जी ने इसी आशय के उद्गार एक इंटरव्यू में व्यक्त किए थे , जो 26 अगस्त 1972 को ' मदरलैंड ' में छपा था | 
आश्चर्य की बात है कि आज संघ परिवार के लोग अपने गुरु जी की बात का बार - बार अनादर करते हैं | भाजपा नेताओं द्वारा इसकी ज़रूरत बार - बार बताकर गुरु जी की आत्मा को ठेस पहुंचाई जाती है , यहाँ तक कि भाजपा इसे अपने घोषणापत्र तक में शामिल कर चुकी है | देश की अदालतें भी मुस्लिम पर्सनल लॉ को समुचित महत्व नहीं देतीं , जिसके कारण बार - बार समस्या पैदा होती है | एक ओर देश में मौजूद मुस्लिम पर्सनल ला में बहुत - सी ख़ामियां हैं , जिन्हें दूर करने की ज़रूरत है और इस मामले को स्थाई रूप से हल किया जाना चाहिए , ताकि भविष्य में मुस्लिम पर्सनल लॉ का अतिक्रमण न किया जा सके |

मसलमानों की तरक्की के लिए समान अवसर आयोग को बहाल किया जाए

मसलमानों की तरक्की के लिए समान
अवसर आयोग को बहाल किया जाए

अब किसी को शायद समान अवसर आयोग याद ही नहीं रहा , जबकि संप्रग सरकार की मनरेगा जैसी अनेक योजनाएं आज भी संचालित की जा रही हैं ! यह एक ऐसा आयोग था , जिससे किसी हद तक न्याय और तटस्थता की उम्मीद थी , मगर वर्तमान सरकार ने अपने कार्यकाल के डेढ़ वर्ष से अधिक बीत जाने के बाद भी इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया है ! सरकार की इस उदासीनता को लेकर तरह - तरह के सवालों का उठाना स्वाभाविक है | यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि सरकार अल्पसंख्यक कल्याण की ओर पूरी तरह गाफ़िल है और वह कोई ऐसा काम नहीं करना चाहती , जिससे मुसलमानों को सीधे तौर कोई फ़ायदा पहुंचे | मुसलमानों के सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन का अध्ययन करने वाली सच्चर समिति ने जिसने 2006 में अपनी रिपोर्ट पेश की थी , समान अवसर आयोग गठित करने की सिफारिश की थी , जिसे तत्कालीन संप्रग सरकार ने मान ली थी और वर्षों बाद संप्रग [ भाग 2 ] के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 20 फरवरी 2014 इस प्रस्ताव को मंजूरी भी दे दी थी | पिछले लोकसभा चुनाव से ऐन पहले केंद्र सरकार ने देश के अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए समान अवसर आयोग बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी । इससे संबंधित प्रस्ताव में कहा गया था कि यह एक वैधानिक निकाय होगा, जो नौकरियों, शिक्षा और आवासीय सोसायटियों में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव की शिकायत सुनेगा और उसे दूर करने के उपाय करेगा। सच्चर समिति की सिफ़ारिशों के बाद क्रियान्वयन हेतु ए के एंटनी की अध्यक्षता में बने मंत्री समूह ने भी इसकी सिफारिश की थी । पहले इस आयोग के विरोधी यह आरोप और आशंकाएं प्रकट कर रहे थे कि इस तरह का आयोग बनाने से ऐसी ही दूसरी संस्थाओं के अधिकारों का अतिक्रमण होगा , लेकिन इन आपत्तियों को दरकिनार करके मंत्री समूह ने सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए समान अवसर आयोग बनाने की सिफारिश की, जिसे तत्कालीन केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूर कर लिया था । ऐसी बात भी नहीं है कि इस आयोग के गठन के सिलसिले में पूर्व कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के इरादे पाक - साफ़ थे | उसने जन - बूझकर इसके गठन का प्रस्ताव अपने कार्यकाल के अंतिम काल में किया , ताकि इसका राजनीतिक लाभ उठाया जा सके | जबकि जून 2009 में ही संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित करते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने कहा, "सरकार अल्पसंख्यकों के कल्याण को उच्चतम प्राथमिकता देना जारी रखेगी। अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए प्रधानमंत्री ने 15 सूत्री कार्यक्रम और सच्चर कमेटी की सिफारिशों पर की गई कार्रवाई कुछ सीमा तक सरकार संसाधनों, नौकरियों और योजनाओं में अल्पसंख्यकों के लिए न्यायोचित हिस्सा सुनिश्चित करने में सफल रही है।" उन्होंने कहा था , "अल्पसंख्यकों के कल्याण की दिशा में उठाए जा रहे कदमों को और सुदृढ़ किया जाएगा। सरकार वक्फों के प्रशासन को सुदृढ़ करने और आधुनिक बनाने के लिए प्रयास करेगी, हज संचालन के प्रबंधन में सुधार लाएगी और एक सामन अवसर आयोग स्थापित करेगी।" ज़ाहिर है , समान सुधार के नेक काम में जब क्षुद्र राजनीति की अवांछित घुसपैठ हो जाती है , तो उसका जो हश्र होता है , समान अवसर आयोग के साथ भी हुआ | अतः यह बहुत ज़रुरी है कि राजनीति की क्षुद्रता से ऊपर उठकर समान अवसर आयोग को फ़ौरन बहाल किया जाए |

Dec 9, 2015

मानव - प्रकृति का हरहाल में करें लिहाज़

मानव - प्रकृति का हरहाल में करें लिहाज़ 

पूरी दुनिया में महान पैगम्बर हज़रत इबराहीम [ अलैहि .] द्वारा अल्लाह के हुक्म पर अपने पुत्र हज़रत इस्माईल की क़ुरबानी की याद में ईदुल अज़हा मनायी जाती है | यह वास्तव में अल्लाह द्वारा हज़रत इबराहीम [ अलैहि .] की ईशपरायणता की परीक्षा थी , जिस पर वे पूर्णतः खरे उतरे | इस अवसर पर मुस्लिम समाज के सभी व्यक्ति, प्रतीकात्मक रूप से ईश्वर से अपने संबंध, वफ़ादारी और संकल्प को हर वर्ष ताज़ा करते हैं कि ‘‘ ऐ अल्लाह ! तेरा आदेश होगा, आवश्यकता होगी, तक़ाज़ा होगा तो हम तेरे लिए अपनी हर चीज़ क़ुरबान करने के लिए तैयार व तत्पर हैं।’’ यही ईशपरायणता का चरम-बिन्दु है। कुछ लोग अक्सर यह आपत्ति करते हैं कि क़ुरबानी मांसाहार को बढ़ावा और जीवहत्या है , जबकि वे इसका मर्म - मन्तव्य नहीं समझते | अन्य धर्मों और समुदायों में भी क़ुरबानी किसी न किसी रूप में प्रचलित है
भारत के कई राज्यों जैसे तमिलनाडु, पश्चिमी बंगाल व उत्तराखण्ड आदि में गैर-मुस्लिम समाज में बलि की प्रथा प्रचलित है जो बड़ी निर्दयता व निर्भयता से की जाती है। नेपाल में वीरगंज के समीप गढ़ी माई मंदिर में विशेष पूजा के अवसर पर लाखों पशुओं की बलि दी जाती है। नाहन (सिरमौर) गिरिपार में माघी के दिन हर वर्ष हजारों बकरों की बलि दी जाती है और इसे धार्मिक तौर पर विहित व जायज़ माना जाता है | वास्तव में क़ुरबानी और मांसाहार दोनों धर्म के प्रतिकूल नहीं हैं | इनके पक्ष में कुछ वैदिक मंत्रों को भी पेश किया जाता है - 
उक्ष्णो   हि    मे   पंचदश   साकं   पचन्ति   विंशमित्।
उताहमद्मि पवि इदुभा कुक्षी पृणन्ति में विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः।।
(ऋग्वेद, 10-86-14) भावार्थ - मेरे लिए इंद्राणी द्वारा प्रेरित यज्ञकर्ता लोग 15-20 बैल मार कर पकाते हैं, जिन्हें खाकर मैं मोटा होता हूँ। वे मेरी कुक्षियों को भी सोम रस से भरते हैं।
 यजुर्वेद के एक मंत्र में पुरुषमेध का प्राचीन इतिहास इस तरह प्रस्तुत किया गया है।
देवा यद्यज्ञं तन्वानाऽ अवध्नन् पुरुषं पशुम।
     (यजुर्वेद, 31-15)
भावार्थ - इंद्र आदि देवताओं ने पुरुषमेध किया और पुरुष नामक पशु का वध किया।
 अथर्ववेद में स्पष्ट शब्दों में पांच प्राणियों को देवता के लिए बलि दिए जाने योग्य कहा है -
 तवेमे पंच पशवो विभक्ता गावो अश्वाः पुरुषा अजावयः।
     (अथर्ववेद, 11-29-2)
 भावार्थ - हे पशुपति देवता, तेरे लिए गाय, घोड़ा, पुरुष, बकरी और भेड़ ये पांच पशु नियत हैं।
मनुस्मृति में न केवल मांस भक्षण का उल्लेख और संकेत है, बल्कि मांस भक्षण की स्पष्ट अनुमति दी गई है। मनुस्मृति में मांस भक्षण की अनुमति के साथ मांस भक्षण की उपयोगिता और महत्व भी बताया गया है -
यज्ञे वधोऽवधः| (मनु0, 5-39) भावार्थ - यज्ञ में किया गया वध, वध नहीं होता।
अब देखिए एक दूसरा पक्ष - इन मान्यताओं के बीच यह भी सच है कि देश में पशु वध निषेध की संजीदा कोशिशें हो रही हैं | इस विषय में कई क़ानून भी बने हैं | अभी पिछले दिनों कुछ पशु कारोबारियों को दिल्ली की एक अदालत ने उम्रकैद की सज़ा भी सुना दी है इन पर आरोप है कि इन्होंने पशुओं के कारोबार के सिलसिले में आपराधिक साज़िश रची और हत्या की कोशिश की
 अतिरिक्त सेशन जज कामिनी लॉ ने 12 अक्तूबर 2014 को अपने फ़ैसले में कहा कि बचाए गए पशुओं को डील करने के मामले में कानूनी प्रावधान नहीं है। ऐसे कानूनी प्रावधान की जरुरत है ताकि बचाए गए पशुओं का संरक्षण और देखभाल हो सके। मौजूदा कानून के तहत इस बात का प्रावधान नहीं है कि बचाए गए पशुओं को कैसे डील किया जाए ताकि उन्हें दोबारा शिकार न होना पड़े। कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिसमें बचाए गए पशुओं को सुपुर्ददारी पर छोड़ा जाता है और उनका दोबारा वही हाल होता है। कानून इस बारे में चुप है। कानून बनाने वालों को इसे देखना होगा। देश के पशु धन को राष्ट्रीय स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रोटेक्ट करना जरूरी है |

अदालत ने सरकार से कहा है कि संवैधानिक दायित्व का पालन करने के लिए यह जरूरी है कि वह इसके लिए राष्ट्रीय नीति बनाए । बचाए गए जानवर को किसान के हवाले किया जाए ताकि उनका सही देखभाल हो सके। इन्हें दिल्ली एग्रीकल्चर कैटल प्रिवेंशन एक्ट के तहत दोषी करार दिया है। यह मामला 18 जनवरी, 2013 का है। आवश्यकता इस बात की है कि जनता से जुड़े सभी मामलों को मानव के सहज स्वभाव और प्रकृति के अनरूप ही हल किया जाए और अवांछित पाबंदियों से बचा जाए

Dec 3, 2015

किसका आर्थिक विकास ?

किसका आर्थिक विकास ?

एक ओर हमारा देश आर्थिक विकास के पथ पर अग्रसर है , वहीं दूसरी ओर देश में गरीबी और भूख का भयावह विस्तार हो रहा है | पहले हम विकास के आंकड़ों पर एक नज़र डालने की कोशिश करते हैं | कहा जा रहा है कि मोदी सरकार की कोशिशों से देश में विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियों में तेजी आई है , जिसके चलते  जुलाई-सितंबर 2015 की तिमाही में देश की आर्थिक वृद्धि दर 7.4% रही। इसके परिप्रेक्ष्य में लगे हाथ यह दावा किया गया कि चीन को पछाड़ते हुए भारत सबसे तेजी से वृद्धि करने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बन गया है। ताज़ा आंकड़े बताते है कि हमारा देश अब एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है , जिसका सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी की वृद्धि दर चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में बढ़कर 7.4 फीसदी हो गई, जो कि पहली तिमाही में 7 फीसदी थी। 
आठ प्रमुख ढांचागत उद्योगों की वृद्धि दर अक्तूबर में 3.2 फीसदी रही। जीडीपी वृद्धि दर हालांकि, एक साल पहले की इसी तिमाही में हासिल 8.4 फीसदी की वृद्धि दर के मुकाबले काफी नीचे हैं। दुनिया के प्रतिकूल हालात के बीच चीन की अर्थव्यवस्था में गिरावट है, जबकि ब्राजील तथा रूस की उदीयमान अर्थव्यवस्थाओं में संकुचन देखने को मिला है। जुलाई-सितंबर में चीन की आर्थिक वृद्धि दर 6.9 फीसदी रही, जबकि रूस की वृद्धि दर में इस दौरान 4.1 फीसदी की गिरावट आई है। भारत की इस उल्लेखनीय आर्थिक वृद्धि दर के कारण भारतीय रिजर्व बैंकद्वारा द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा नीतिगत ब्याज दरों को स्थिर रखा है |
अब देश की कथित संपन्नता और मज़बूत अर्थव्यवस्था का दूसरा पहलू देखिए - हमारे देश में विकास के आंकड़ों के साथ गरीबी के आंकडे बड़े भयावह हैं | इन आंकड़ों की असलियत और सच्चाई पर बार - बार उठनेवाले सवालों के बावजूद देश की गरीबी और बदहाली को छिपाया नहीं जा सका है | हाल के सर्वेक्षणों में यह बात नुमायाँ तौर पर सामने आ रही है कि 1991 में तत्कालीन कांग्रेस नीत केंद्र सरकार ने जो आर्थिक उदारीकरण प्रक्रिया शुरू की थी , उसका गरीबी बढ़ानेवाला घातक परिणाम आज ही सामने आ रहा है , क्योंकि किसी भी सरकार ने इस पर रोक नहीं लगाई है | भाजपा जब केन्द्रीय सत्ता से बाहर थी , तो उदारीकरण के विरुद्ध बोलती थी , लेकिन सत्ता पाते ही उसकी बोलती बंद ही नहीं हो गई , उसके ख़ुद के क़दम प्राथमिकता के साथ उदारीकरण की ओर ही बढ़े !
हमारा देश ग्राम प्रधान देश है , इसलिए कहा जाता है कि देश की आत्मा गांवों में बसती है | अतः देश की गरीबी में कमीबेशी का सीधा प्रभाव ग्रामीणों पर पडता है | देश की लगभग125 करोड़ आबादी में से गांवों में रहनेवाले 70 फीसद लोगों के लिए गरीबी जीवन का कडुवा सच है | यह बात भी सौ फीसद सच है कि ग्रामीण भारत उससे अधिक गरीब है , जितना अब तक आकलन किया गया था | झूठे सर्वेक्षणों से बार - बार ग्रामीण भारत की भी गलत तस्वीर सामने आती रही है | 
अभी पिछले दिनों बुंदेलखंड परिक्षेत्र में बहुत बुरे हालात पैदा हो गए हैं। अखबारी रिपोर्टों के मुताबिक़ , पिछले आठ माह में 53 प्रतिशत गरीब परिवारों ने दाल के दर्शन नहीं किए और हर पांचवें परिवार को कम से कम एक दिन भूखे सोना पड़ा। 60 फीसद परिवार गेहूं, चावल के बदले मोटे अनाज व आलू का प्रयोग कर पेट भर रहे हैं। बुंदेलखंड की यह भयावह स्थिति स्वराज अभियान की सर्वे रिपोर्ट से जाहिर होती है। अभियान के निदेशक योगेंद्र यादव की निगरानी में कराए सर्वे में 27 तहसील के 108 गांवों को शामिल किया गया और 1206 परिवारों से पूछताछ हुई । वास्तव में यह सवाल बार - बार खड़ा होता है कि एक ओर देश तरक्की कर रहा है , दूसरी ओर गरीबों और बदहाली का भी विस्तार क्यों होता चला जा रहा है !? इस स्थिति में क्या आर्थिक विकास सिर्फ़ कुछ लोगों - उद्योगपतियों का ही नहीं हो रहा है ?

Dec 2, 2015

बिहार में शराबबंदी , अन्य राज्य भी आगे आएं

बिहार में शराबबंदी , अन्य राज्य भी आगे आएं ,

लेकिन कहीं गुजरात जैसा न हो

बिहार में अगले वर्ष के अप्रैल से शराब की बिक्रीपर प्रतिबंध लागू हो जायेगा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मद्य निषेध दिवस के मौके पर पटना में आयोजित एक समारोह में घोषणा की कि एक अप्रैल 2016 से पूरे राज्य में शराबबंदी लागू कर दी जायेगी। इसके लिए अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दे दिया गया है। साथ ही इसके लिए अधिकारियों को विस्तृत नीति तैयार करने को कहा गया है। नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में एक अप्रैल 2016 से नयी उत्पाद एवं मद्य निषेध नीति लागू कर शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जायेगा। मद्य निषेध नीति के लागू होने से राजस्व पर 4000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा और इसकी भरपाई के लिए अलग से उपाय किये जायेंगे। मुख्यमंत्री ने यह बड़ी अच्छी बात कही कि शराब से विशेषकर गरीब लोगों का जीवन जहां प्रभावित होता है, वहीं महिलाएं भी इससे परेशान रहतीं है। देशी और मसालेदार शराब जहां स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, वहीं कम आमदनी वाले लोग इसका अधिक सेवन करते हैं। गरीबों को इससे काफ़ी आर्थिक क्षति होती है। नीतीश कुमार ने कहा कि उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग में उत्पाद पर तो जोर होता है लेकिन मद्य निषेध पर नहीं, इसलिए मद्य निषेध पर जोर दिया गया है। शराबबंदी से आम-आवाम को लाभ होगा। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री ने विधानसभा चुनाव से पूर्व पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में आयोजित ग्राम वार्ता कार्यक्रम के दौरान वादा किया था कि यदि दोबारा उनकी सरकार बनती है तो शराबबंदी लागू किया जायेगा। गुजरात के बाद बिहार दूसरा राज्य होगा, जहां शराब की बिक्री पर प्रतिबंध रहेगा। गुजरात पूरे देश का एकमात्र सूबा है, जहां शराबबंदी लागू है। लेकिन यह शराबबंदी सिर्फ कागजों तक ही सीमित है। जमीनी हकीकत बिलकुल अलग है। वास्तव में गांधी जी की जन्मभूमि गुजरात में साल 1960 शराबबंदी है, लेकिन शराबबंदी की सच्चाई कुछ और हैं। अभी पिछले दिनों गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में आने वाली एक ट्रेन के टॉयलेट से शराब का ' बड़ा खजाना ' मिला है। इतना ही नहीं एक घर से भी शराब का जखीरा बरामद हुआ है। वहां टैंकर का इस्तेमाल भी शराब की तस्करी के लिए किया जाता है। कुछ सप्ताह पूर्व वहां एक टैंकर से भी लाखोंरूपये की शराब जब्त की गई। यह तथ्य है कि गुजरात में राजस्थान, दमणदीव और हरियाणा से बड़े पैमाने पर शराब की तस्करी की जाती है। आंकड़ों के मुताबिक, गुजरात में हर साल 100 करोड़ से ज्यादा की अवैध शराब पकड़ी जाती है | वास्तव में नशा एक धीमा जहर है जिसमें दर्दनाक मौत के सिवा कुछ हासिल नहीं होता है,,, कितने ही परिवारो की जिंदगी इस जहर की शिकार होकर घर से बेघर हो गई है तथा न जाने कितनी जिंदगियां मौत के मुहं में समा चुकी हैं और ऩ जाने कितनी जिंदगियां अतिंम सांसे गिन रही हैं | शराब का नशा सबसे अधिक घातक है | इसीलिए हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने शराबबंदी की ओर भी ध्यान दिया और मद्य निषेध विभाग भी बनाया गया आबकारी विभाग भी अस्तित्व में आया और आरंभिक कुछ समय के बाद यह धड़ल्ले से शराबबंदी का मखौल उड़ाने लगा | सरकारें शराब माफ़िया के आगे झुकती गईं और आबकारी विभाग निरंकुश ढंग से शराब की नई दूकानें खोलने का लाइसेंस बाँटने लगा |
अब हालत यह है कि इस सूरतेहाल पर सरकार से कुछ ख़ास स्वेच्छिक क़दम की अपेक्षा नहीं की जा सकती , क्योंकि सरकार को नशे के कारोबार से करोडो- अरबों का मुनाफा होता है और शराब माफ़िया से राजनेताओं की निरंतर बंदरबांट चलती रहती है | जनस्वास्थ्य की किसी को चिंता नहीं है | योग से शराबबंदी होने से रहीं | अतः इस जहर को रोकने के लिए सरकार के साथ जनता को भी खुलकर आगे आना होगा | देखा गया है कि ऐसे कुछ मामलों में महिलाएं विरोध जताती हैं | मगर यह केवल महिलाओं का काम नहीं होना चाहिए | सच्चाई यह है कि अगर जनता नशा मुक्ति के पक्ष में एक जुट हो जाए तो ये मौत की फैक्टरियां अपने आप बंद हो जायेंगी, और अन्य राज्य सरकारों को मजबूर होकर शराब और अन्य मादक पदार्थों पर प्रतिबन्ध लगाना पड़ेगा | वास्तव में शराबनोशी ने भारतीयों की बड़ी संख्या का जीवन दुष्कर बना डाला है | कुछ समय पहले एक अंग्रेज़ी दैनिक में शराब के इस्तेमाल पर एक सर्वेक्षणात्मक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसमें बताया गया कि भारतीय समाज के विशेषकर अभिजात्य वर्ग के युवक और युवतियां शराब के प्रति तेज़ी से आकर्षित हो रहे हैं । यह वर्ग फैशन के तौर पर भी शराब का इस्तेमाल करता है । कहने का मतलब यह कि इस ज़हरीले पदार्थ का इस्तेमाल पढ़े-लिखे मूर्ख तो पहले से करते रहे हैं, यह दुर्व्यसन अपनी पीढ़ी की ओर भी स्थानांतरित कर रहे हैं । इसकी बुरी आदत और लत ने ख़ासकर कमज़ोर वर्ग के लोगों की आर्थिक स्थिति और स्वास्थ्य पर कल्पनातीत कुप्रभाव डाला है | यह भी सच है कि पुरातनकाल से ही कुछ लोगों की सामाजिक व्यवस्था और जीवनशैली में शराब का प्रवेश था , जिसे पूंजीपतियों ने अपनी धन बढ़ाऊ घिनौनी मानसिकता के फेर में हवा दी है | ये लोग अपने देवताओं और पितरों को संतुष्ट करने के लिए भी हर त्योहार पर , जन्म और विवाह के अवसरों पर शराब का इस्तेमाल अनिवार्य रूप से करते हैं | दैनिक दिनचर्या में भी इस्तेमाल करते हैं | फिर न तो शराब के उपयोग की मात्रा की कोई सीमा है और न ही उनके समाज के किसी सदस्य पर इसके सेवन पर रोक है ! हालत यह है कि शराब पीनेवालों का शरीर और मन - मस्तिष्क सभी अपाहिज हो चुके हैं ! नतीजा यह है कि अच्छे और बुरे की पहचान करने के योग्य नहीं रहे और न ही वे किसी मामले में सही निर्णय कर सकते हैं | क़ुरआन में शराब के लिए ‘‘ख़म्र’’ शब्द प्रयुक्त हुआ है, जिसकी व्याख्या हज़रत उमर [ रज़ि॰] ने इन शब्दों में की है, ‘‘ख़म्र उस चीज़ को कहते हैं जो बुद्धि पर परदा डाल दे ।’’ शराब मन-मस्तिष्क को सर्वाधिक प्रभावित करती है और बुद्धि को नष्ट कर डालती है । डॉ॰ ई॰ मैक्डोवेल कासग्रेव [ एम॰ डी .] केअनुसार,‘‘अल्कोहल मस्तिष्क को नष्ट कर देती है ।’’.इस्लाम ने हर प्रकार की शराब ही को हराम नहीं किया है, बल्कि इसके अन्तर्गत हर वह चीज़ आ जाती है जो नशावर हो और मनुष्य की सोचने-समझने की शक्ति को नष्ट करे या उसे क्षति पहुंचाए । इस अवसर पर इस बात को भी ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि मनुष्य का जिस चीज़ के कारण समस्त प्राणियों में विशिष्ट और प्रतिष्ठित एवं केन्द्रीय स्थान दिया गया है, वह वास्तव में उसकी सोचने-समझने और सत्य-असत्य और भले-बुरे में अन्तर करने की क्षमता है । अब यह स्वाभाविक बात है कि जिस चीज़ या काम से मनुष्य की इस क्षमता और योग्यता को आघात पहुंचा हो या उसके पूर्ण रूप से क्रियाशील होने में बाधा उत्पन्न होती हो, उसको मनुष्य का निकृष्टतम शत्रु समझा जाए । शराब चूंकि मस्तिष्क को स्वाभाविक रूप से कार्य करने में रुकावट डालती है और उसकी तर्कशक्ति को शिथिल करके मनुष्य को मानवता से ही वंचित कर देती है, इसलिए उसे मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु घोषित करना बिलकुल उचित ही है ।क़ुरआन मजीद में शराब के विषय में जो कुछ कहा गया है उसका स्पष्टीकरण अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद [ सल्ल॰ ] के बहुत से कथनों से भी होता है । आपने कहा है , ‘प्रत्येक मादक चीज़ ‘ख़म्र’ है और प्रत्येक मादक चीज़ हराम है ।’ ‘वह हर पेय जो नशा पैदा करे, हराम है और मैं हर मादक चीज़ से वर्जित करता हूं ।’