Dec 30, 2016

संकीर्णता छोड़े , मानवता अपनाएं


 अभी कुछ दिन पहले ही सुप्रीमकोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में भारतीय वायु सेना के एक मुस्लिम जवान के दाढ़ी रखने को नियम - सम्मत मानने से इन्कार कर दिया था | अब मध्य प्रदेश के बढ़वानी ज़िले के अरिहंत होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज के छात्र असअद ख़ान को दाढ़ी रखने की वजह से कॉलेज से निकलना पड़ा है | कालेज पर आरोप है कि दाढ़ी के कारण छात्र पर दबाव बनाया गया , जिसके चलते उसे कालेज छोड़ना पड़ा | जबकि कॉलेज के प्राचार्य एम. के. जैन ने आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि छात्र ने कॉलेज से ट्रांसफर लेने का आवेदन दिया था और उसे ट्रांसफर सर्टिफ़िकेट दे दिया गया है |
बढ़वानी के ज़िलाधिकारी तेजस्वी एस. नायक के अनुसार , छात्र ने शिकायत दी थी कि दाढ़ी रखने के कारण उसके साथ भेदभाव हुआ और इस मामले की जांच की जा रही है | उन्होंने कहा कि संबंधित कॉलेज में स्कॉलरशिप से जुड़े एक मामले की जांच भी चल रही है जिसके साथ इस जांच को भी जोड़ दिया गया है | असअद ख़ान ने बताया कि उन्होंने दिसंबर 2013 में प्रवेश परीक्षा के ज़रिए इस कॉलेज में दाख़िला लिया था | उस समय उन्होंने दाढ़ी नहीं रखी थी |.असअद का आरोप है कि कॉलेज के प्राचार्य एमके जैन ने उन पर बार-बार दाढ़ी कटवाने का दबाव बनाया , जो किसी भी तरह से उचित नहीं | मैंने तीन महीनों तक इसे नज़रअंदाज़ किया | वे दबाव बनाते रहे | मुझे क्लास से बाहर भी निकाल दिया जाता था | जब मैंने कहा कि दाढ़ी रखना मेरा अधिकार है और मैं नहीं कटवा सकता , तो मेरे कॉलेज में आने पर ही रोक लगा दी गई | असअद ने अपनी शिकायत के साथ ज़िला प्रशासन को फ़ोन कॉल का रिकार्ड और प्राचार्य के साथ बातचीत की र्ऑडियो सीडी सबूत के तौर पर पेश की हैं | वहीं कालेज के प्राचार्य एम. के. जैन का कहना है कि हमने कभी दाढ़ी कटवाने के लिए दबाव नहीं बनाया | हमारे कॉलेज में और छात्र भी दाढ़ी रखते हैं | अगस्त 2016 में कॉलेज ने असअद को ट्रांसफर सर्टिफ़िकेट दे दिया लेकिन असद ने आरोप लगाया है कि "कॉलेज ने दूसरे वर्ष की मेरी उपस्थिति ज़ीरो दिखा दी है जिसकी वजह से मैं कहीं दाख़िला नहीं ले सकता हूँ | ये सरासर ग़लत है | इसकी जांच होनी चाहिए और मुझे न्याय मिलना चाहिए | दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता नदीम ख़ान का कहना है कि वे इस मामले को लेकर इंदौर हाई कोर्ट में जाएंगे | जबकि ऐसे ही एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विगत 15 दिसंबर को वायुसेना में मुस्लिम अफसर आफताब अहमद अंसारी की याचिका खारिज कर दी | उन्हें दाढ़ी रखने को लेकर 2008 में वायुसेना से हटा दिया किया गया था | अंसारी ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी |
सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि भारतीय वायुसेना में धार्मिक आधार पर अफसर दाढ़ी नहीं बढ़ा सकते | नियम अलग हैं और धर्म अलग | दोनों एक-दूसरे में दखल नहीं दे सकते |वायुसेना के अफसर आफताब अहमद अंसारी ने अपनी याचिका में कहा था कि उन्होंने धर्म के आधार दाढ़ी रखी थी और वायुसेना ने उन्हें हटाकर उनके साथ भेदभाव किया है | आफताब ने अपनी याचिका में कहा था कि संविधान में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत दाढ़ी रखना उनका मौलिक अधिकार है | उन्होंने दलील दी थी कि जिस तरह वायुसेना में शामिल सिखों को दाढ़ी और पगड़ी रखने की इजाजत है उसी तरह उन्हें भी इसकी अनुमति मिलनी चाहिए | हालांकि तत्कालीन यूपीए सरकार ने किसी तरह के सख्त कदम से बचते हुए यह निर्देश दिया था कि सेना में यदि मुस्लिम व्यक्ति दाढ़ी रखते हैं तो उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न की जाए, लेकिन बाद में सरकार ने विचार की बात कही थी | दाढ़ी रखने के कारण जुलाई 16 में ही मसरूर अहमद को उत्तराखंड की रुद्रपुर इंस्टिट्यूट अफ़ टेक्नालाजी में दाख़िला नहीं मिला था | वर्तमान में सुप्रीमकोर्ट के आदेश को अपवाद मान लें तो केवल इसराईल को छोड़कर किसी अन्य देश में इस प्रकार का कठोर प्रतिबन्ध नहीं है | अमेरिकी सेना में भर्ती के लिए भी दाढ़ी न रखने का नियम है , लेकिन कठोर नहीं है | कुछ ही समय पहले अमेरिका में भारत के दिल्ली निवासी सिख युवक 26 वर्षीय सिमरन लांबा की सेना में भर्ती की गयी और उन्हें दाढ़ी और पगड़ी रखने की अनुमति दी गई | हमारे देश में भी इस प्रकार की अनुमति मिलनी चाहिए |

Dec 26, 2016

नोटबंदी की आड़ में काले धन का करतब !

नोटबंदी की आड़ में काले धन का करतब !

आज नोटबंदी की आड़ में कालेधन का इतना शोर है कि भ्रष्टाचार से प्रभावी रूप से लड़ने वाली संस्था लोकपाल की ओर किसी का ध्यान ही नहीं है मानो इस भवितव्य संस्था को भुला दिया गया हो और इसके लिए कोई प्रयास न किये जा रहे हों | दर हकीक़त यह बात सही भी है , तभी देश के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने देश में अभी तक लोकपाल की नियुक्ति न होने पर एतिराज़ जताते हुए केंद्र सरकार से पूछा कि 2014 में संसद से लोकपाल कानून पास होने के बावजूद अब तक नियुक्ति क्यों नहीं हुई | इस पर एटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने बताया कि कानून के मुताबिक सर्च कमेटी में लोकसभा में विपक्ष के नेता को रखने का प्रावधान है | इस समय कोई नेता विपक्ष न होने की वजह से सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को कमेटी में रखने के लिए संशोधन किया जाना है | बहचर्चित और बहुप्रतीक्षित लोकपाल विधेयक को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने एक जनवरी 2014 को मंज़ूरी दी थी | 17 दिसंबर 13 को इस विधेयक को राज्यसभा ने पारित किया था और अगले दिन लोकसभा ने भी मुहर लगा दी थी | सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिए कि जब तक कानून में संशोधन नहीं हो जाता अदालत इसका आदेश दे सकती है | एटॉर्नी जनरल ने कहा कि 7 दिसंबर को अगली सुनवाई में वे सरकार से इस मसले पर निर्देश लेकर अदालत को बताएंगे | सुप्रीम कोर्ट के रुख को देखकर लग रहा है कि देश को देर - सवेर लोकपाल मिल सकता है और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कारगर लड़ाई लड़ी जा सकेगी | नोटबंदी तो एक सामयिक हंगामा है , जिसका हासिल कुछ खास नहीं ! सभी जानते हैं कि केन्द्रीय सत्ता में आने से पहले से ही भ्रष्टाचार और काले धन को जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना बड़ा मुद्दा बनाया था , उससे इस सोच को बल मिला था कि नई सरकार भ्रष्टाचार और भ्रष्ट लोगों के खिलाफ सख्त कदम उठाएगी , लेकिन लगभग ढाई वर्ष से अधिक गुज़र जाने के बाद भी अमलन कुछ ख़ास नहीं हो सका | नोटबंदी से कालेधन पर प्रहार नामुमकिन है | इससे अर्थव्यवस्था हो गर्क़ होगी | सबसे अधिक काला राजनेताओं के पास है | सरकार बनाते ही प्रधानमंत्री मोदी ने न्यायालयों में भ्रष्ट नेताओं पर चल रहे मामलों की फास्ट ट्रैक सुनवाई करने की अपील की , मगर अभी तक कुछ हो न सका ! पिछले दिनों सरकार ने नोटबंदी की घोषणा की , जिसे निरंकुश फ़ैसले के तौर पर भी देखा जाएगा | नोटबंदी से जनता की परेशानी किसी से छिपी नहीं है | पिछले वर्ष 8 नवंबर को जिन 500 और 1000 रुपए के पुराने नोट बंद करने का ऐलान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था , उनको नोटबंदी की विफलता की आशंका के मद्देनज़र उनकी सरकार ने सफ़ेद करने का नया क़ानून बनाया, जिसके अनुसार , अघोषित नक़दी की स्वेच्छा से घोषणा करने पर 50 प्रतिशत टैक्स लगेगा | इस प्रकार काला धन रखनेवालों ने आधी रक़म देकर अपने धन को सफ़ेद किया | वैसे नोटबंदी की घोषणा के बाद से काले धन को सफ़ेद बनाने के लिए कई विकल्प मौजूद हैं , जिन पर सफलतापूर्वक अमल किया गया | लोकसभा में गत 28 नवंबर 2016 को पेश संशोधित आयकर विधेयक आया , जिसमें 30 दिसंबर तक अघोषित पुराने नोटों में नकदी बारे में स्वेच्छा से घोषणा पर 50 प्रतिशत कर लगाने का प्रस्ताव किया गया। यह प्रावधान भी किया गया कि कर अधिकारियों द्वारा पता लगाने पर अघोषित संपत्ति पर उच्चतम 85 प्रतिशत तक कर लगाया जा सकता है | विधेयक में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना (पीएमजीके) 2016 का प्रस्ताव किया गया | इसमें यह कहा गया कि जो लोग गलत तरीके से कमाई गई राशि अपने पास 500 और 1,000 के पुराने नोट में दबाकर रखें हुए थे और जो उसकी घोषणा करने का विकल्प चुनते हैं, उन्हें पीएमजीके के तहत इसका खुलासा करना होगा। उन्हें अघोषित आय का 30 प्रतिशत की दर से कर भुगतान करना होगा। इसके अलावा अघोषित आय पर 10 प्रतिशत जुर्माना लगेगा। साथ ही पीएमजीके उपकर नाम से 33 प्रतिशत सरचार्ज (30 प्रतिशत का 33 प्रतिशत) लगाया जाएगा। इस प्रकार, कुल मिलाकर 50 प्रतिशत शुल्क देना होगा। जिन लोगों ने अपनी अघोषित आय नहीं बताई है और पकड़े जाते हैं, उनके लिए आयकर कानून के वर्तमान प्रावधानों को संशोधित कर एकमुश्‍त 60 फीसदी टैक्‍स तथा इस पर 25 फीसदी सरचार्ज (15 प्रतिशत) किया जाएगा, जो कि अघोषित आय का 75 प्रतिशत होगा। इसके अलावा जांच अधिकारी चाहे तो 10 फीसदी पेनाल्‍टी भी वसूल सकता है। इस स्थिति में कुल जुर्माना रकम का 85 फीसदी हो जाएगा। यह भी प्रावधान है कि घोषणा करने वालों को अपनी कुल जमा राशि का 25 प्रतिशत ऐसी योजना में लगाना होगा जहां कोई ब्याज नहीं मिलेगा। साथ ही इस राशि को चार साल तक नहीं निकाला जा सकेगा। इस योजना में आयी राशि का उपयोग सिंचाई, आवास, शौचालय, बुनियादी ढांचा, प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य तथा आजीविका जैसी परियोजनाओं में किया जाएगा। इस ' महान कार्य ' में ' दान ' करनेवाले कालेधन के मालिकों के नाम गुप्त रखे जायेंगे और उनसे काली कमाई का स्रोत भी नहीं पूछा जाएगा | इससे पहले भी केंद्र सरकार ने काला धन रखनेवालों को मौक़ा दिया था और 30 सितंबर 16 तक इसे उजागर करने का समय दिया गया था , लेकिन यह स्कीम बुरी तरह विफल हो गई | अरबों रुपये का लेन-देन करने वाले लोगों का पता फर्जी पाया गया है | छह लाख 90 हजार नोटिसें बैरंग वापस लौट आईं हैं | यह बड़ा खुलासा हुआ है कि बैंकों के जरिए बहुत बड़ी तादाद में काले धन का ट्रांजेक्शन हो रहा है | नियम-कानून ताक पर रख कर देश के विभिन्न बैंक पैन नंबर दर्ज किए बगैर करोड़ों और अरबों रुपये का लेन-देन धड़ल्ले से कर रहे हैं | केंद्र सरकार को समझ में ही नहीं आ रहा है कि ऐसे में क्या किया जाए! पैन नंबर दर्ज किए बगैर हुए करोड़ों और अरबों रुपये के सात लाख बड़े व सामूहिक लेन-देन (क्लस्टर ट्रांजैक्शन) से सम्बन्धित लोगों को जो नोटिसें भेजी गई थीं, उनमें से छह लाख 90 हजार नोटिसें ‘एड्रेसी नॉट फाउंड’ लिख कर वापस आ गईं | इन बड़े ट्रांजैक्शंस में जो पते लिखाए गए थे, उन पतों पर कोई नहीं मिला | न नाम का पता चल पा रहा है, न पते पर कोई पाया जा रहा है और न उनके केवाईसी (नो योर कस्टमर) का ही कोई ओर-छोर मिल रहा है. 90 लाख बैंक लेन-देन (ट्रांजैक्शन) पैन नंबर के बगैर हुए, जिनमें 14 लाख बड़े (हाई वैल्यू) ट्रांजैक्शन हैं और सात लाख बड़े ट्रांजैक्शन ‘हाई-रिस्क’ वाले हैं | इन्हीं सात लाख ट्रांजैक्शन के सिलसिले में नोटिसें जारी हुई थीं, जो लौट कर वापस आ गईं | प्रधानमंत्री मोदी ने अघोषित आय का ब्यौरा देने के लिए तय 30 सितंबर तक की मोहलत के बारे में साफ किया था कि यह अंतिम मौका है | लेकिन यह ' अंतिंम मौक़ा ' कब तक आता रहेगा ?यकीनी तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता | प्रधानमंत्री मोदी ने अपने प्रिय कार्यक्रम ' मन की बात ' में कहा था कि ' इसको एक आखिरी मौका मान लीजिए | मैंने बीच में हमारे सांसदों को भी कहा था कि 30 सितम्बर के बाद अगर किसी नागरिक को तकलीफ हो, जो सरकारी नियमों जुड़ना नहीं चाहता है, तो उनकी कोई मदद नही हो सकेगी. मैं देशवासियों को भी कहना चाहता हूं कि 30 सितम्बर के बाद ऐसा कुछ भी न हो, जिससे आपको कोई तकलीफ हो, इसलिए भी मैं कहता हूं | अच्छा होगा 30 सितम्बर के पहले आप इस व्यवस्था का लाभ उठाएं और 30 सितम्बर के बाद संभावित तकलीफों से अपने-आप को बचा लें |' लेकिन हुआ क्या ? उन सभी को तो छूट दे दी गई और आम जनता को जबरन तकलीफ़ों के हवाले कर दिया गया | कालेधन और आतंकवाद की आड़ में लागू नोटबंदी ने आम जन को ठिकाने लगा दिया ! पैसे - पैसे के लाले पड़ गये और देश का दीवाला निकल गया ! प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए इन शब्दों में नोटबंदी का ऐलान किया ,' देश को भ्रष्टाचार और काले धन रूपी दीमक से मुक्त कराने के लिए एक और सख्त कदम उठाना जरूरी हो गया है। आज मध्य रात्रि यानी 8 नवम्बर 2016 की रात्रि 12 बजे से वर्तमान में जारी 500 रुपये और 1000 रुपये के करेंसी नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे यानि ये मुद्राएं कानूनन अमान्य होंगी। 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों के जरिये लेन देन की व्यवस्था आज मध्य रात्रि से उपलब्ध नहीं होगी। भ्रष्टाचार, काले धन और जाली नोट के कारोबार में लिप्त देश विरोधी और समाज विरोधी तत्वों के पास मौजूद 500 एवं 1000 रुपये के पुराने नोट अब केवल कागज के एक टुकड़े के समान रह जायेंगे। ' यहाँ सवाल यह भी है कि पुराने नोट क्या कागज़ के टुकड़े हो गए ? क्या इन्हें सफ़ेद नहीं कराया गया ? आयकर क़ानून में संशोधन ने क्या इसे और विस्तार नहीं दिया है ? क्या दो हजार के नए नोटों ने काला धन रखनेवालों को आसानी नहीं पहुंचाई है ? लोकपाल भी अभी तक हवा में हैं | आप के लोकपाल को भी मोदी सरकार ने रोककर क़ानूनी दांव - पेंच के हवाले कर दिया है और केजरीवाल को निबटाने पर पूरा ज़ोर लगा रखा है | भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून में उचित संशोधन करने के साथ ही लोकपाल जैसी व्यवस्था को लागू करने से भ्रष्टाचार पर रोकथाम में काफी मदद मिल सकती है | आर्थिक विकास से ही भ्रष्टाचार उन्मूलन - संभव नहीं | फिर देश का अपेक्षित आर्थिक विकास भी तो नहीं हो पा रहा !1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भ्रष्टाचार को वैश्विक चलन कहा था | इस वक्तव्य के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री के ऐसी बात करने पर खेद जताया था | 1989 के लोकसभा चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा छाया रहा | तबसे लेकर आज तक चुनावी अभियानों में भ्रष्टाचार मिटाने के दावे बढ़चढ़ कर उछाले जाना आम बात हो गई है | ऐसे में इन दावों की कलई तब खुलती है , जब भारत सूची में बुर्किना फासो, जमैका, पेरु और जाम्बिया जैसे गरीब देशों के पायदान जैसा पाया जाता है | वस्तुस्थिति यह है कि आज हमारा देश भ्रष्टाचार और नैतिक पतन से गंभीर रूप से जूझ रहा है | भ्रष्टाचार पूरी व्यवस्था को तबाह और बर्बाद कर रहा है | जब तक इन्सान के नैतिक अस्तित्व को सबल नहीं बनाया जाएगा और उसके अंदर ईशपरायणता एवं ईशभय नहीं पैदा होगा , तब तक भ्रष्टाचार - उन्मूलन असंभव है | पूरी सृष्टि में केवल इन्सान ही ऐसा प्राणी है , जिसे कर्म और इरादे का अधिकार प्राप्त है | वह ईश्वर द्वारा स्रष्ट सभी जीवों और चीजों में सर्वश्रेष्ठ है , अतः सृष्टि की बहुत - सी चीज़ें उसके वशीभूत की गई हैं , जिनका वह अधिकारपूर्वक उपभोग करता है और कर सकता है | यहाँ यह तथ्य भी स्पष्ट रहे कि इन्सान के न तो अधिकार असीमित हैं और न ही उपभोग | उसके लिए भी एक सीमा - रेखा है , जिसे मर्यादा कहते हैं | यह चीज़ ही इन्सान को नैतिक अस्तित्व प्रदान करती है | मर्यादा और नैतिक अस्तित्व को बनाये रखने के लिए ही सदाचरण के द्वारा इन्हें परिमार्जित करने एवं जीवन को उच्चता की ओर ले जाने के लिए इन्सान को आध्यात्मिकता की ज़रूरत होती है , जो उसके जीवन की नैसर्गिक , बुनियादी और अपरिहार्य आवश्यकता है | अतः भ्रष्टाचार - निवारण के लिए अनिवार्य है कि इन्सान अपने स्रष्टा - पालनहार की ओर पलटे और उसका आज्ञाकारी और ईशपरायण बने |

शिक्षा का भगवाकरण क्यों

शिक्षा का भगवाकरण क्यों ?
' फूट डालो राज करो ' की अंग्रेज़ों की खुली नीति थी , जिसका क्रियान्वयन करके वे सत्ता में बने रहे | इस नीति के तहत पाठ्यक्रमों का दुरूपयोग किया गया , उसमें मनोवांछित सांप्रदायिक बदलाव किए गये | आज भी इसी तिकड़म को अपनाकर उल्लू साधा जा रहा है | घिनौने स्वार्थों की पूर्ति के लिए'सांप्रदायिकता' का जहर बोया जा रहा है। बच्चे देश का भविष्य होते हैं | उनके दिमाग में संकीर्णता और सांप्रदायिकता का धीमा जहर घोला जा रहा है। पाठ्यक्रमों में बदलाव के ज़रिए यह काम हो रहा है | एन सी ई आर टी की कक्षा 12 की पुस्तक को लेकर बहुत - से आरोप - प्रत्यारोप लग चुके है | इसके बाद भी राजस्थान की वसुंधराराजे सरकार पर आरोप लगने बंद नहीं हुए | इस वजह साफ़ थी | वसुंधराराजे सरकार संघ संगठनों से परामर्श कर ऐसे क़दम उठाती रही , जो विवादकर थे | बताया जाता है कि इस सरकार ने विद्या भारती, शिक्षण मंडल, शिक्षा बचाओ, शिक्षक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की थी , जिनमें तीन बिंदु सामने आए थे | एक, राजस्थान और देश के वीर-वीरांगनाओं को पाठ्यक्रम में शामिल करना, दूसरे, पाठ्य-सामग्री ऐसी हो जिससे भारतीय संस्कृति पर गर्व की अनुभूति हो और तीसरे, छात्र देशभक्त और श्रेष्ठ नागरिक बनें | शिक्षण सत्र के मध्य में बदलाव संभव नहीं था इसलिए पूरक पाठ्यक्रम के जरिए महाराणा प्रताप, गोविंद गुरु और सुभाषचंद्र बोस जैसे महापुरुषों के पाठ जोड़े गए | इसके बाद मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के निर्देश पर तय किया गया कि पहली से पांचवीं कक्षा तक 75 फीसदी राजस्थान के बारे में तो 25 फीसदी भारत के बारे में पढ़ाया जाएगा तो छठी से आठवीं तक 50-50 फीसदी और 9वीं कक्षा से विश्व के बारे में पढ़ाया जाएगा | राजस्थान के शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी ने पूर्ण बदलाव की दिशा में कदम उठाया और कमेटी गठित कर पाठ्यक्रम को फिर से लिखने की पहल की | अतः 2016 में सभी पाठ्यक्रम बदले जा चुके हैं और शिक्षा का पूरी तरह भगवाकरण कर दिया गया है | अब पुराना पाठ्यक्रम काफ़ी संशोधित हो चुका है | देवनानी संतुष्ट हैं | फरमा रहे हैं कि '' भगवा त्याग और समर्पण का प्रतीक है | '' उनकी सेंसरवाली कैंची ने विवाद ही विवाद पैदा कर दिए हैं | सबसे अधिक विवाद महापुरुषों को जोडऩे और पाठ्यक्रम से पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू से जुड़े कुछ अंशों में काट-छांट को लेकर है | राज्यों के एकीकरण वाले पाठ में पहले नेहरू की तस्वीर थी, लेकिन अब सरदार पटेल की लग गई है | देवनानी का कहना है कि पहले इतिहास एक विशेष परिवार तक सिमटा था, लेकिन अब बोस, तिलक, पटेल, आंबेडकर वगैरह को भी जोड़ा गया है | पाठ्यक्रम में जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी के कश्मीर आंदोलन, पं. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन, पूर्व सरसंघचालक के.एस. सुदर्शन की पर्यावरण पर कविता, भाजपा नेता मेनका गांधी, नानाजी देशमुख, वीर सावरकर जैसे सीधे संघ से जुड़े हुए नाम शामिल किए गए हैं | इसके अलावा संघ जिन्हें अपना आदर्श मानता हैं , उनमें भी कई नाम पाठ्यक्रम में हैं | इनमें भास्कराचार्य, आर्यभट्ट संघ के प्रातः स्मरणीय पाठ का हिस्सा हैं तो विद्या भारती और शिक्षण मंडल के अनुरोध पर पन्ना धाय को विशेष महत्व के साथ जोड़ा गया | इसके साथ ही कक्षा सात में पढ़ाई जाने वाली रानी लक्ष्मीबाई वाली कविता भी हटा दी गई है, हालांकि देवनानी अब इसे पूरक के तौर पर जोडऩे की बात करते हैं | कविता में सिंधिया को अंग्रेजों का मित्र बताते हुए राजधानी छोडऩे जैसी पंक्तियां है | अब अकबर की जगह महाराणा प्रताप को महान बताया गया है | पाठ्यक्रम में सभी प्रधानमंत्री शामिल हैं. लेकिन बीजेपी नेता और पूर्व पीएम अटलबिहारी वाजपेयी तथा मौजूदा पीएम नरेंद्र मोदी (दोनों का कुल 8 साल का कार्यकाल) को करीब 9 पैराग्राफ जगह दी गई है तो 10 साल तक पीएम रहे मनमोहन सिंह को महज एक पैरा में समेट दिया गया है |.इतना ही नहीं राजस्थान की भाजपा सरकार ने सभी मॉडल स्कूलों का नामकरण स्वामी विवेकानंद के नाम पर कर दिया है और पाठ्यक्रम में भगवद् गीता, योग, वंदे मातरम, सूर्य नमस्कार आदि को शामिल करते हुए वसंत पंचमी पर सरस्वती पूजन को सरकारी शक्ल दे दी है | सरकार को चाहिए कि वह इस पर रोक लगाए और जनता को चाहिए कि वह इसके लिए सरकार पर दबाव बनाए |

Nov 18, 2016

गले पड़ी नोटबंदी , भारी विरोध के बीच उठे कई सवाल

गले पड़ी नोटबंदी , भारी विरोध के बीच उठे कई सवाल
देश का नेशनल मीडिया मोदी सरकार के नोटबंदी के फ़ैसले का लगातार गुणगान करते हुए जन समस्याओं पर भी फोकस कर रहा है , फिर भी मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं , जबकि कई दिनों से बैकों और एटीएम से पैसे निकालने के लिए जिद्दोजहद कर रही जनता की लंबी कतारों और उनको हो रही परेशानी की गूंज पिछले दिनों संसद से सड़क तक गूंजी । संसद में यह मुद्दा बार - बार उठा | 8 नवंबर 2016 को पीएम मोदी की 500 और 1000 के नोट बंद करने की घोषणा के बाद से ही देशभर में हलचल मची हुई है। देश की जनता की परेशानी बढ़ी हुई है | नोट बंदी के विरोध में जहां पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी ने राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया , टीएमसी के अलावा शिवसेना, नेशनल कॉन्फ्रेंस और आम आदमी पार्टी के सांसद भी शामिल हुए I इन्होंने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात की और अपना विरोध जताया | ममता बनर्जी शुरू से ही मोदी सरकार द्वारा बड़े नोट बंद किए जाने का विरोध कर रही हैं और बढ़ - चढ़ कर बयान दे रही हैं I वहीं बसपा प्रमुख मायावती ने नोटबंदी के फैसले की जेपीसी से जांच कराने की मांग की है। मार्च से पहले संसद परिसर में गांधी मूर्ति के पास टीएमसी नेताओं ने काले शॉल ओढ़कर सरकार के फैसले के खिलाफ प्रदर्शन किया I सरकार के लिए उसके सहयोगी शिवसेना ने भी मुश्किलें खड़ी कर दी है I शिवसेना ने यूं तो विगत 14 नवंबर को एनडीए की बैठक में एकजुटता का भरोसा दिया था, लेकिन उद्धव ठाकरे को ममता बनर्जी के फोन के बाद शिवसेना ने ऐलान कर दिया कि नोटबंदी के खिलाफ विपक्षी मार्च में वह भी शामिल होगा | राज्यसभा में कांग्रेस के सांसद आनंद शर्मा ने कहा कि हम कालाधन और आतंकवाद के खिलाफ हैं। सरकार ने नोटबंदी का निर्णय गलत समय लिया इससे किसानों को और आम आदमी को बहुत दिक्कत हो रही है। नोटबंदी पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा यूनियनों को फैसला लीक किया गया। बैंक से कैश निकासी पर रोक क्यों है? नोटबंदी से बेटियों की शादियां तक रुकी हैं। गरीब की लाश अस्पतालों में फंसी है। भाजपा ने घाव दिए और घाव पर नमक भी लगाया। मजदूर, किसान नोटबंदी से बेकार हुए, क्या गाजीपुर की रैली का भुगतान क्रेडिट कार्ड से हुआ? स्टेट बैंक आफ इंडिया को मार्च से नोट बंद होने की जानकारी थी। आनंद शर्मा के सवालों पर भाजपा सांसद पीयूष गोयल ने कहा कि पूरा देश पीएम के फैसले का स्वागत कर रहा है। आनंद शर्मा का अर्थशास्त्र कमजोर है। पहली बार ईमानदारी को सम्मान और बेईमान को नुकसान हुआ है।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा में आपात सत्र के दौरान बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला बोला था और उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे एवं नोटबंदी वापस लेने की केंद्र से मांग करते हुए तीन दिनों का अल्टीमेटम दिया। केजरीवाल ने कहा था कि आदित्य बिरला ग्रुप के एक्‍जीक्‍यूटिव प्र‍ेसिडेंट के पास से बराबद 2012 के मैसेज से पता चला कि उसने गुजरात के मुख्यमंत्री को पैसे
दिए थे। केजरीवाल ने कहा, ‘आदित्य बिरला ग्रुप पर अक्टूबर 2013 में छापा पड़ा था। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने सभी कागजात ले लिए थे। ग्रुप के एक्‍जीक्‍यूटिव प्र‍ेसिडेंट शुभेंन्दु अमिताभ के लेपटॉप, ब्लैकबेरी को भी लिया गया था। उसमें एक एंट्री में लिखा था गुजरात सीएम 25 करोड़। गुजरात के मुख्यमंत्री के आगे 25 करोड़ और ब्रेकिट में 12 दिए और बाकी ? लिखा था। गुजरात के मुख्यमंत्री कौन थे उस वक्त….नरेंद्र मोदी जी 2012 में। केजरीवाल ने विधान सभा में आगे कहा था कि पहली बार कुर्सी पर बैठे किसी प्रधानमंत्री का नाम काले धन के किसी घोटाले में आया है। केजरीवाल ने यह भी कहा था कि पनामा घोटाले में मोदी जी के कितने दोस्‍तों के नाम थे, मगर कोई एक्‍शन नहीं लिया गया। 648 लोगों के स्विस बैंक अकाउंट नंबर तक लिखे हुए थे | मगर कार्रवाई इसलिए नहीं हुई क्‍योंकि इस लिस्‍ट के अंदर प्रधानमंत्री मोदी जी के दोस्‍त हैं।दस्‍तावेज सामने रखते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था, ‘आज मैं सबूत लेकर आया हूं। आयकर विभाग ने 15 अक्‍टूबर 2013 को आदित्‍य बिरला ग्रुप पर छापेमारी हुई। वापस आने के बाद इनकम टैक्‍स की अप्रेजल रिपोर्ट में बिरला ग्रुप के अकाउंटेंट ने कहा कि मैं हवाला का पैसा लेकर आता हूं। मेरे बॉस का नाम शुभेन्‍दु अमिताभ हैं। वे बिरला ग्रुप के एक्‍जीक्‍यूटिव प्र‍ेसिडेंट थे।कई विपक्षी पार्टियों ने मोदी सरकार पर इस फैसले को लेकर निशाना साधा | संसद से बाहर भी समर्थन और विरोध का दौर चल रहा है , जिसमें कुछ सनसनीखेज ख़ुलासे भी हो रहे हैं | राजस्थान के कोटा जिले के भाजपा विधायक भवानी सिंह राजावत ने कथित तौर पर कहा है कि अंबानी और अडानीको 500 और 1000 के नोट बंद किए जाने के बारे में पहले से पता था। गत16 नवंबर को इंटरनेट पर रिलीज किए गए एक वीडियो में भाजपा विधायक कथित तौर पर ऐसा कहते दिख रहे हैं। कथित वीडियो में कहा गया है, “अडानी, अंबानी अतराम-सतराम इन सब को पहले ही पता था। इनको हिंट दे दिया गया। उन्होंने अपना कर लिया।जब 'इंडियन एक्सप्रेस' ने भवानी सिंह से इस वीडियो की सत्यता के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि ये वीडियो कुछ पत्रकारों के संग उनकी अनौपचारिक बातचीतका है जिसे हेरफेर के साथपेश किया जा रहा है। भवानी सिंह ने कहा, “वीडियो में जैसा दिखाया जा रहा है | मैंने वैसा कुछ नहीं कहा।नोटबंदी के बाद जारी किए गए 2000 के नए नोट के बारे में इस वीडियो में कहा जा रहा है, “नए नोट थर्ड क्लास हैं। जाली जैसे लगते हैं।वीडियो में कथित तौर पर विधायक नरेंद्र मोदी सरकार के फैसले की आलोचना करते नजर आ रहे हैं। वीडियो में कहा जा रहा है, “पूरी करेंसी आप प्रिंट करते। देश की आबादी और उसके अनुपात में करेंसी प्रिंट करते, उसके बाद में आप एक साथ। अब पेट्रोल पंप की कीमतों की तरह आज 12 बजे 500 और 1000 के नोट बंद हो जाएगा।भवानी सिंह ने ' इंडियन एक्सप्रेस ' से बातचीत में ऐसा कुछ कहने से इन्कार करते हुए कहा, “कुछ पत्रकार मेरे कोटा स्थित आवास पर आए थे, क्योंकि मैं कुछ समय पहले अपने क्षेत्र के गाँवों में दौरे पर गया था। लेकिन उन्होंने अनैतिक रूप से मेरी अनौपचारिक बातचीत रिकॉर्ड कर ली।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवंबर को 500 और 1000 के नोटों को उसी दिन रात 12 बजे से बंद करने की घोषणा की थी। पुराने नोट 30 दिसंबर तक बैंकों में बदले या जमा कराए जा सकते हैं। बड़े नोटों के बंद होने से आम जनता को नकद पैसे की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में बैंकों और एटीएम के सामने लोगों की लंबी कतारे देखी जा रही हैं। आम लोगों को पैसे पाने के लिए को कई घंटों तक लाइन में लगना पड़ रहा है। उधर सरकार ने साफ़ कर दिया है कि नोटबंदी का फ़ैसला वापस नहीं लिया जायेगा और न ही जेपीसी गठित की जाएगी , लेकिन सरकार को यह ज़रूर करना चाहिए कि नोटबंदी के दुष्परिणामों से जनता को बचाए और एक हज़ार रूपये के नोटों को फिर चलन में लाने के साथ ही अन्य विकल्पों पर विचार करे |


पुलिस सुधार का सहज सवाल

पुलिस सुधार का सहज सवाल
भोपाल - मुठभेड़ के बाद एक बार फिर पुलिस की कार्यशैली विभिन्न सवालों के घेरे में है | हक़ीक़त यह है कि यह महत्वपूर्ण विभाग हमारे देश में सरकार का ग़ुलाम बना रहता है | अतः इसके नसीब में कभी नहीं था और है कि यह आज़ादाना काम करे | निष्पक्षता तो इसके बस की बात नहीं ! सत्तारूढ़ राजनेताओं का बल बनी पुलिस से न्याय और इन्साफ की कैसे आशा की जा सकती है ? यह तथ्य भी बार - बार उजागर हो चुका है कि राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण भी वे अपराध बढ़े हैं , जिन्हें पुलिस ख़ुद अंजाम देती और दिलवाती है |
भोपाल पुलिस द्वारा सिमी के आठ कथित आतंकवादियों को मुठभेड़ बताकर मार गिराने को इसी कारण के अंतर्गत माना जा रहा है | इस घटनाक्रम पर बहुतेरे सवाल पैदा हुए हैं |
दिल्ली पुलिस भी अब अपनी कार्रवाइयों से बदनाम है | उत्तर प्रदेश की पुलिस बरसों से जातीय रंग में रंगी हुई है | वहां आपराधिक भ्रष्टाचार के साथ जातिवाद का बोलबाला है | इस प्रदेश में भी पुलिस अपने आक़ाओं की ग़ुलाम है और वे सारे काम करती है , जो उसे कभी करना चाहिए | अखिलेश यादव के चहेते मंत्री राम मूर्ति सिंह वर्मा के इशारे पर तत्कालीन पुलिस कोतवाल श्रीप्रकाश राय ने अपने साथ चार पुलिसकर्मियों को शाहजहांपुर के पत्रकार जागेन्द्र सिंह को विगत एक जून 2015 को जिन्दा जला दिया , फिर भी इन सबको निलंबन की दिखावटी कार्रवाई के बाद साफ़ बचा लिया गया | पुलिस ने पूरे मामले को गलत ढंग से विवेचित कर दिया !
बिहार पुलिस भी बार - बार अपने निकम्मेपन को साबित कर चुकी है | वह आज के युग में भी जातीय आधार पर चूल्हा - चौके का इन्तिज़ाम करवाती है | इस अफ़सोसनाक सूरतेहाल में पुलिस की कार्यप्रणाली और विवेचना कैसी होगी , सभी को सहज ही समझ में आ सकती है | पुलिस की खराब कार्यप्रणाली और गलतकारी से पुलिस सुधार आयोग सदैव चिन्तित रहता है | उसका मानना है कि पुलिस का वर्तमान तौर - तरीक़ा संतोषजनक नहीं है |
पुलिस सुधार आयोग भी पुलिस तंत्र में सतत सुधार की सिफ़ारिशें करता रहता है , क्योंकि उसका मानना है कि पुलिस का वर्तमान तौर - तरीक़ा संतोषजनक नहीं है | पुलिस सुधार आयोग की सिफ़ारिशों में एक महत्वपूर्ण सिफ़ारिश थानों में पुलिस प्रशासन से अलग एक विवेचना इकाई की स्थापना है , ताकि मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई संभव हो सके | ऐसी सिफ़ारिश विवेचना अधिकारियों द्वारा दबाव में काम करने एवं इस प्रकार न्याय की जगह अन्याय का पैरोकार बनने की शिकायतों के कारण की गयी थी , जिस पर अभी तक अमल नहीं हो सका है |
सत्ता व पुलिस का जो गठजोड़ है , वह एक - दूसरे के मनोबल के प्रति इतना फिक्रमंद होता है कि आम नागरिक का मनोबल बरक़रार न रह सके | देखा जाता है कि इस पूरे मनोबल को बचाने में विवेचनाधिकारी लगा रहता है, जो सबूतों का अभाव खड़ा कर उन्हें बरी करवाने की कोशिश करता है | आजकल सीबीआई भी दबावों से मुक्त नहीं है | अल्पसंख्यकों के मामले में पुलिस की भूमिका क्या होती है ? हम इसे बार - बार देखते और भुगतते हैं | भोपाल में इसे हाल में एक बार फिर देखा गया | अब सारी निगाहें इस कथित मुठभेड़ की जाँच पर लगी हैं | इसकी जाँच भोपाल हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज एस . के . पाण्डेय कर रहे हैं |
देश में पुलिस द्वारा की गई फर्जी मुठभेड़ों की जांच चाहे वह यूपी के सोनभद्र में रनटोला कांड, जहां इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दो छात्रों को डकैत बताकर की गई हत्या का मामला हो या फिर उत्तराखंड के रणवीर हत्याकांड की हो इन सभी में विवेचनाधिकारी ने पुलिस अधीक्षक का नाम न लेकर उसे बचाने का कार्य किया है , जबकि सजा पाने वाले पुलिस कर्मियों ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि ऐसा उन्होंने एसपी के कहने पर किया था | निष्पक्ष विवेचना न्याय का आधार होती है| इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ कांड को कौन भूल सकता हैं, जिसमें राज्य के पुलिस अधिकारियों पर राज्य सरकार के संरक्षण में हत्या का आरोप है |
वहीं उत्तर प्रदेश में आतंकवाद के नाम पर फर्जी तरीके से गिरफ्तार किए गए तारिक-खालिद की गिरफ्तारी पर गठित निमेष कमीशन, गिरफ्तारी को संदिग्ध मानते हुए पुलिस के अधिकारियों को दोषी मानता है, वहीं इस मामले के विवेचनाधिकारी ने पुलिस की गिरफ्तारी को सही माना है| इसी तरह छत्तीसगढ़ में सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर डालने वाले पुलिस अधिकारियों में से एक एसपी अंकित गर्ग को राष्ट्रपति द्वारा स्वर्ण पदक से सम्मानित किया जाता है ! यह एक बड़ी विडंबना है | सर्वोच्च न्यायालय विवेचनाधिकारी को एक स्वंतंत्र जांच अधिकारी के बतौर कार्य करने की बात कहता है | पुलिस की कार्यशैली में आमूल सुधार की ज़रूरत है | भोपाल मुठभेड़ की सही ढंग से जाँच कराकर इसकी शुरूआत की जानी चाहिए |


काले धन के ख़िलाफ़ 9/11 ?


यह तरीक़ा प्रभावकारी नहीं !

विदेश से चाहे काला धन स्वदेश आए या न आए , पांच सौ और हज़ार रुपये के नोट 9 नवंबर से बंद कर दिए और दावा कर दिया गया कि यह काले धन के ख़िलाफ़ सर्जिकल स्ट्राइक व 9 / 11 है | अतः केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू का यह ट्वीट उचित ही कहा जाएगा कि ' भ्रष्टाचार और काले धन पर श्री नरेंद्र मोदी जी की सर्जिकल स्ट्राइक | भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ भारत की लड़ाई में साथ दें | ' वैसे यह फ़ैसला स्वागतयोग्य है , लेकिन पूर्व तैयारी और प्रबंध के पूरी जनता से बड़े नोटों को छीन लेना एवं उन्हें परेशानियों में डाल देना कतई सराहनीय नहीं है | अभी दस रूपये के सिक्कों को लेकर पूरे देश में बक - झक चल रही थी | इसी बीच बड़े नोटों पर सर्जिकल स्ट्राइक करके उन्हें एकबारगी नष्ट कर जनता को अनावश्यक परेशानी में डाला गया | यह काम जनता को कम 'आहत ' करके चरणबद्ध भी हो सकता था | सरकार को शायद यह वह्म और गुमान है कि इस क़दम से काला धन बाहर आकर ही रहेगा और भ्रष्टाचार का अंत हो जाएगा | सच्चाई यह है कि हमारे देश में काला धन सिर्फ पांच सौ और हज़ार रूपये के नोटों तक सीमित नहीं है | देश के काले धन का एक उल्लेखनीय हिस्सा विदेशी बैंकों और विदेशी संपत्तियों में लगा हुआ है | साथ ही स्वदेश में काला धन रियल इस्टेट , सोना , ज़मीन और अन्य बेनामी संपत्तियों में लगा हुआ है | इन वास्तविकताओं को देखते हुए कोई कैसे कह सकता है कि काला धन अब नष्ट होकर ही रहेगा ? हाँ , कुछ ऐसी रक़म का ज़रूर पता चलेगा , लेकिन काले धन के शातिर खिलाड़ियों पर बड़े नोटों को बंद कर देने से विशेष प्रभाव पड़ने से रहा ! डॉ . मनमोहन सिंह ने भी प्रधानमंत्री की हैसियत से 2005 से पूर्व के पांच सौ के नोटों को बंद किया था , लेकिन उनका यह काम चरणबद्ध था | यह प्रयोग एक नहीं दो बार हो चुका है। 16 जनवरी 1978 को मोरारजी देसाई सरकार ने 500, 1000, पांच हजार और 10 हजार के नोटों को बंद करने का काम किया था। लेकिन उसका क्या नतीजा निकला? क्या उससे भ्रष्टाचार रुक गया या फिर कालाधन खत्म हो गया ?
केंद्र सरकार विदेश से तो काला धन वापस नहीं ला पाई , देश के भीतर भी इस बाबत कुछ ठोस काम नहीं कर सकी है | इन्कम डिस्क्लोज़र स्कीम पहले ही बुरी तरह फ्लाप हो चुकी है | केंद्र सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने के लिए काले धन पर लगाम कसने के अपने वादे के तहत विदेशी खातों की जानकारी लेने के साथ ही देश के लोगों को 30 सितंबर 2016 तक अपनी अघोषित आय का ब्योरा देने का जो वक्त दिया था , उसका भी कोई उल्लेखनीय लाभ नहीं मिल पाया | केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना इन्कम डिस्क्लोज़र स्कीम (आईडीएस) बुरी तरह फ्लाप हो गय | अरबों रुपये का लेन-देन करने वाले लोगों का पता फर्जी पाया गया | छह लाख 90 हजार नोटिसें बैरंग वापस लौट आयीं | यह बड़ा खुलासा हुआ है कि बैंकों के जरिए बहुत बड़ी तादाद में काले धन का ट्रांजैक्शन हो रहा है | प्राइवेट बैंक इस दुष्कर्म में बढ़त लिए हुए हैं | नियम-कानून ताक पर रख कर देश के विभिन्न बैंक पैन नंबर दर्ज किए बगैर करोड़ों और अरबों रुपये का लेन-देन धड़ल्ले से कर रहे हैं | केंद्र सरकार को समझ में ही नहीं आ रहा है कि ऐसे में क्या किया जाए ! पैन नंबर दर्ज किए बगैर हुए करोड़ों और अरबों रुपये के सात लाख बड़े व सामूहिक लेन-देन (क्लस्टर ट्रांजैक्शन) से सम्बन्धित लोगों को जो नोटिसें भेजी गई थीं, उनमें से छह लाख 90 हजार नोटिसें एड्रेसी नॉट फाउंडलिख कर वापस आ गईं | इन बड़े ट्रांजैक्शंस में जो पते लिखाए गए थे, उन पतों पर कोई नहीं मिला | न नाम का पता चल पा रहा है, न पते पर कोई पाया जा रहा है और न उनके केवाईसी (नो योर कस्टमर) का ही कोई ओर-छोर मिल रहा है | 90 लाख बैंक लेन-देन (ट्रांजैक्शन) पैन नंबर के बगैर हुए, जिनमें 14 लाख बड़े (हाई वैल्यू) ट्रांजैक्शन हैं और सात लाख बड़े ट्रांजैक्शन हाई-रिस्कवाले हैं | इन्हीं सात लाख ट्रांजैक्शन के सिलसिले में नोटिसें जारी हुई थीं, जो लौट कर वापस आ गईं | दूसरी विदेशी काले धन की बात तक विस्मृत हो चुकी है | विदेशी खाताधारकों की पक्की जानकारी होने के वावजूद उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं जा रही है ! इस सब गंभीर मामलों पर गहरी ख़ामोशी है ! इस विषम स्थिति में नोटबंदी की घोषणा किसी राजनीतिक चाल जैसी है |


Nov 5, 2016

कब मिलेगी ब्याज से मुक्ति ?


कर्ज न चुका पाने पर साहूकारों ने कहा कि पत्नी और बेटी को हमें सौंप दो। इससे अनिल अग्रवाल को गहरा सदमा लगा और उनके पूरे परिवार ने ज़हर खाकर मौत को गले लगा लिया। यह मामला जालंधर [पंजाब] के भोगपुर थाने का का है। इस घटना से साफ पता चलता है कि पंजाब में गरीब लोगों का किस तरह साहूकार शोषण कर रहे हैं। सुसाइट नोट में 55 वर्षीय अनिल अग्रवाल ने लिखा है कि उनसे कुछ लोगों से ब्याज पर आधारित क़र्ज़ लिया था। मगर मूलधन पर ब्याज बढ़ता ही गया। पैसा देने वाले लोग कहते हैं कि वह पत्नी और बेटी को उठा ले जाएंगे, जिससे आहत होकर वह परिवार सहित जान दे रहा है। पुलिस ने घर से अनिल, पत्नी रजनी और 18 वर्षीय राशि और 23 वर्षीय बेटे अभिषेक का शव बरामद किया। सभी ने सल्फास का सेवन कर आत्महत्या की। मौके से सल्फास की शीशी और पानी की बोतल मिली।
हमारे देश में ब्याजमुक्त क़र्ज़ एक सपने की तरह है | हम आयेदिन ब्याज से विभिन्न प्रकार की हानियों को देख रहे हैं | ब्याज ने हमारे देश समेत दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को आहत कर रखा है , फिर भी इसके विरुद्ध कारगर आवाज़ का न उठ पाना बेहद अफ़सोसनाक है | इस्लाम में ब्याज की सभी सूरतें वर्जित हैं | यह बड़े गुनाह का काम है | यह माँ के साथ व्यभिचार के सदृश है | अतः इससे बचने के सभी प्रयास किये जाने चाहिए |
मानसिक तनाव और दबाव आत्महत्या के प्रमुख कारण हैं। सत्य है कि किसान अक्सर बैंकों से ऋण लेते हैं और उसकी अदायगी नहीं कर पाते , चक्र वृद्धि व्याज इसमें अति घातक भूमिका निभाता है | उनके लिए सरकार की भी ' कल्याणकारी राज्य ' की परिकल्पना साकार नहीं हो पाती | सरकार का अनुदारवादी चेहरा ही उन्हें अक्सर देखना पड़ता है | वे इस विषम परिस्थिति का मुक़ाबला नहीं कर पाते और कायरतापूर्ण क़दम उठा लेते हैं | निःसंदेह आज चहुंओर विकट स्थिति है | इतनी विकट कि कहा जाता है कि आज के दौर में शायद दुनिया में कोई ऐसा आदमी न होगा , जिसने अपने जीवन में कभी आत्महत्या करने के बारे मे न सोचा हो।
ऐसा भी होता है कि अनायास या सप्रयास वह बुरा वक्त गुजर जाता है और जिन्दगी फिर अपनी रप्तार से चल पड़ती है । सच यही है कि यदि वह समय गुजर जाये जिस समय व्यक्ति आत्मघात की ओर प्रवृत्त होता है , तो फिर वह आत्महत्या नहीं करेगा | कुछ कहते हैं कि आत्महती लम्बे समय से तनाव में था। महीने? दो महीने? छः महीने? मगर यह मुद्दत तो गुज़ारी जा सकती है | क्या बरसात के बाद सर्दी और सर्दी के बाद गर्मी की ऋतु नहीं आती ? क्या पतझड़ के बाद वसंत नहीं आता ? फिर जिन्दगी में हॅंसी - खुशी के दिन क्यो नहीं आ सकते हैं ? जिन्दगी हजार नेमत है |
वास्तव में जिन्दगी को जीना चाहिए | उसे जीना इन शब्दों में चाहिए कि उसे स्वाभाविक ज़िन्दगी मिले | ज़िन्दगी को निराशा से परे रखना चाहिए |. ठहरा हुआ तो पानी भी सड़ जाता है | अतः ज़िन्दगी में ठहराव अर्थात स्वांत नहीं आना चाहिए . ज़िन्दगी तो है ही चलने का नाम | ये जो गमो की स्याह रात है कितनी भी लम्बी हो कट ही जायेगी . फिर सुबह होगी, सूरज निकलेगा,फूल खिलेंगें, भौंरे गुनगुनायेंगें, पंछी चहचहायेंगें. फिर ज़िन्दगी में ही कैसे अन्धकार कैसे कायम रह सकता है ?
हमेशा सुबह की आशा रखनी चाहिए | लेकिन फिर सवाल यह आएगा कि यह संभव कैसे होगा , तो इसके लिए धार्मिकता को अपनाना ज़रूरी है | वह भी सच्ची धार्मिकता | जब कार्य ईश्वर के इच्छानुसार किये जाएंगे और उसे ही कार्यसाधक भी माना जाएगा , तो ज़िन्दगी में निराशा , चिंता . कुंठा और हतोत्साह का आना असंभव है | दिल में सरलता और निर्मलता आ जाएगी . चिन्तन सकारात्मक होगा |