Jan 31, 2016

कम क्यों घटे पेट्रोल , डीज़ल के दाम ?

कम क्यों घटे पेट्रोल , डीज़ल के दाम ?

अतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत में लगातार जारी गिरावट और रूपए-डॉलर की एक्सचेंज रेट में ठहराव के मद्देनजर हमारे देश में इसकी कीमत एक लीटर मिनरल वाटर से भी नीचे आ सकता था, लेकिन सरकार के उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी के कारण इसका फायदा आम लोगों को नहीं मिल पा रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों में जितनी गिरावट हुई है , उतनी गिरावट भारत में नहीं हुई है | बताया जाता है कि अमेरिका में पिछले 13 माह में पेट्रोल के दाम 22 प्रतिशत घटे हैं , जबकि भारत में 8 . 8 प्रतिशत ही घटे हैं | इसका मुख्य कारण है कि सरकार ज्यादा राजस्व पाने के लिए पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क में लगातार इजाफा कर रही है | अभी साल की शुरुआत में ही उत्पाद शुल्क फिर से बढ़ा दिया गया | विगत 16 जनवरी को पेट्रोल पर 75 पैसे और डीज़ल पर दो रूपये प्रति लीटर उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया गया | अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की घटी हुई कीमतों के कारण इस समय देश में एक लीटर कच्चे तेल की कीमत 12 रूपए हो गई है, जबकि मिनरल वाटर की एक बोतल 15 रूपए से अधिक की आती है | अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जहां 70 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है, वहीं भारत में पेट्रोल कीमतों में सिर्फ 20 प्रतिशत ही कमी लाई गई है | वित्तवर्ष 2015-16 में पेट्रोल पर आधारभूत उत्पाद शुल्क 7.72 रुपये प्रति लीटर तक पहुंचा है, वहीं डीज़ल में यह 7.83 रुपये प्रति लीटर है | सरकार ने पिछले एक साल में कई बार उत्पाद शुल्क बढ़ाया है | आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारतीय बास्केट में कच्चा तेल 2001.28 (30.02 डॉलर प्रति बैरल) रुपए प्रति बैरल पर आ गया। तेल की कीमतें मांग और आपूर्ति में संतुलन न होने के कारण गिरती जा रही हैं। एक बैरल में 158 लीटर तोल होता है। अगर लीटर के संदर्भ में इसकी गणना की जाए तो यह 12.67 रुपए प्रति लीटर का पड़ेगा जो एक लीटर पानी के मूल्य 15 रुपए से भी कम है, लेकिन सरकार के नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के बीच उत्पाद शुल्क में सात बार वृद्धि करने से दिल्ली में पेट्रोल 59.35 रुपए और डीजल 45.03 रुपए प्रति लीटर बिक रहा है।अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का लाभ उठाते हुए राजस्व घाटा कम करने के लिए सरकार ने गत 7 नवंबर से अब तक चार बार पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाया है। 7 नवंबर को पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 1.60 रुपए तथा डीजल पर 30 पैसे प्रति लीटर बढ़ाया गया था, जबकि 16 दिसंबर को इनमें क्रमश: 30 पैसे तथा 1.17 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी की गई थी। सरकार ने इससे पहले नवंबर 2014 से जनवरी 2015 के बीच भी चार बार में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 7.75 रुपए तथा डीजल पर 6.50 रुपए प्रति लीटर बढ़ाया था।
इस प्रकार मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से सात बार में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 11.77 रुपए तथा डीजल पर 11 .97 रुपए प्रति लीटर बढ़ चुका है | इससे सरकार के राजस्व घाटे को कम करने में अवश्य मदद मिलेगी | लेकिन तेल की कीमतों में लगातार कमी के चलते भारतीयों पर पड़नेवाले नुक़सान भी कम नहीं ! इसका तेल निर्यातक खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा प्रभाव भी पड़ रहा है | खाड़ी के देशों में लाखों भारतीय काम कर रहे हैं | बहुतों की नौकरी या तो ख़त्म की जा रही है या ख़तरे में है | नयी भर्तियों को यथासम्भव टाला जा रहा है | सऊदी अरब ने मजबूरन पांच साल में भारी कायापलट की योजना बनायी है | सऊदी सरकार की 90 फ़ीसदी आमदनी तेलों पर निर्भर है | अर्थव्यवस्था का दूसरा बड़ा क्षेत्र वहां धार्मिक यात्राओं से होने वाली आमदनी है , लेकिन कच्चे तेल के गिरते भाव की वजह से वहां बजट घाटा 15 फ़ीसदी से ऊपर चला गया है | बजट घाटे का मतलब है कि सरकारी की आमदनी के मुक़ाबले ख़र्चों का ज़्यादा होना | सऊदी अरब का विदेशी मुद्दा भंडार भी साल भर में 14 फ़ीसदी (100 अरब डॉलर) गिर चुका है | पिछले महीने सऊदी अरब में पेट्रोलियम पदार्थों पर 40 फ़ीसदी टैक्स लगा दिया गया , जो पहले बिल्कुल नहीं था | वहां बिजली और पानी को भी महंगा बनाया जा रहा है | मुफ़्त शिक्षा, स्वास्थ्य और मकान की योजना भी बदली जा रहा है |कच्चे तेल के गिरते भाव का असर भारतीय तेल कम्पनियों पर भी पड़ा है | नये निवेश के लिए उनकी हिम्मत पस्त पड़ रही है | कई जगह तो मौजूदा उत्पादन को इसलिए घटा लिया गया , क्योंकि उसकी लागत आयातित कच्चे तेल के मुक़ाबले महंगी पड़ रही थी | क़रीब डेढ़ साल से कच्चे तेल का गिरता दाम भारत जैसे आयातित ईंधन पर निर्भर देशों के लिए वरदान साबित हो रहा है | दूसरी ओर, तेल उत्पादक देशों की अर्थव्यवस्था पर भारी संकट के बादल मंडरा रहे हैं | इस कारण से खाड़ी का सबसे बड़ा देश सऊदी अरब भी अपनी अर्थनीति में भारी बदलाव के लिए मज़बूर हुआ है. वहां हालात लगभग वैसे ही हैं , जैसे 1991 में भारत में थे, जिसने देश को आर्थिक सुधारों के लिए मज़बूर किया था | अब तेल उत्पादक देशों की खस्ताहाली से देश के विदेशी मुद्रा भंडार भारतीय मुद्रा के मूल्य पर दबाव आया है , लेकिन अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के गिरते भाव ने संकट में फंसी भारतीय अर्थव्यवस्था की मुसीबतों को काफ़ी कम कर दिया है | सरकार दो लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की कमाई पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद शुल्क और करों को बढ़ाकर इसलिए हासिल कर पायी है, क्योंकि कच्चे तेल के भाव लगातार गिर रहे हैं | यह पहला अवसर है कि भारत सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर लागत से भी काफ़ी ज़्यादा टैक्स वसूल रही है | इससे सरकार ने सामाजिक कल्याण की कई योजनाओं पर होने वाले कुल ख़र्च से भी ज़्यादा रक़म जुटा ली है | अतिरिक्त राजस्व से सरकार को ढांचागत निवेश के लिए भी ख़ासी रक़म मिल रही है |




पूंजीवादी दुनिया में गरीब


पूंजीवादी दुनिया में गरीब
आज पूंजीवाद का सर्वाधिक विस्तार हो चुका है , जिसके नतीजे में अमीर और अमीर तथा गरीब और गरीब हुए हैं | कहने का मतलब यह कि लोगों में आय - असमानता का फासला बेहद गहरा गया है , यहाँ तक कि साम्यवादी देश भी इस लानत से अछूते नहीं हैं | एक सर्वेक्षण के अनुसार दुनिया के 62 सबसे अमीर लोगों के पास दुनियाभर के गरीबों की 50 फीसदी आबादी के बराबर धन-संपदा है। खास बात यह है कि इन 62 अमीरों में महिलाओं की संख्या मात्र 9 है। 2010 से इन अमीरों की संपत्ति करीब 500 अरब डॉलर बढ़कर 1,760 अरब डॉलर हो गई। राइट्स समूह ऑक्सफैम के अध्ययन, 'एक प्रतिशत के लिए अर्थव्यवस्था' में यह तथ्य भी सामने आया है कि 2010 के बाद से दुनिया की सबसे गरीब आबादी में से 50 प्रतिशत की संपत्ति करीब 1,000 अरब डॉलर घटी है। यानी उनकी संपत्ति में 41 प्रतिशत की जोरदार गिरावट आई है। समीक्षाधीन अवधि में वैश्विक आबादी में करीब 40 करोड़ लोगों का इजाफा हुआ है। यह रिपोर्ट दावोस में विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) के वार्षिक सम्मेलन से पहले जारी की गई।
अमीरों को और अमीर बनानेवाली नीतियों के चलते दुनिया में अन्य खराबियों के फैलाव के साथ आमजन का शोषण - दमन बढ़ा है | मगर अब इसकी किसी को चिंता नहीं रही ! दुनिया के सभी देश आज प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पूंजीवाद के फैलाव में ही अपनी भलाई समझते हैं | सभी अपने - अपने देशों में पूंजीपतियों के स्वागत के पलक- पांवड़े बिछा रखे हैं , मानो वही अब उनके सब कुछ हों | उनको और अमीर बनाने की चिंता में अपना पूरा समय दे रहे हैं | इस प्रक्रिया में जो कुछ [ उच्छिष्ट ] बचता है , वह उनका होता है ? अर्थात हड्डी चूसकर ही दुनिया के सभी देश जिंदा हैं | असल में दुनिया अब अमीरों की है |
इसकी पुष्टि उक्त सर्वेक्षण भी करता है | सर्वेक्षण के अनुसार 2010 में दुनिया की सबसे गरीब आबादी के 50 प्रतिशत के पास जितनी धन संपदा थी, उतनी ही संपत्ति दुनिया के 388 सबसे अधिक अमीर लोगों के पास थी। उसके बाद यह आंकड़ा लगातार घट रहा है। 2011 में यह घटकर 177 पर आ गया है, 2012 में 159, 2013 में 92 और 2014 में 80 पर आ गया। भारत में भी करोड़पतियों की संख्या बढ़ी है। वहीं प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत निचले पायदान पर हैं।
'न्यू वर्ल्ड वेल्थ की एशिया प्रशांत 2016 संपदा' की रिपोर्ट में यह बात निकल कर आई है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में प्रति व्यक्ति आय 2.37 लाख रुपए हैं। वहीं भारत एशिया प्रशांत क्षेत्र में सबसे ज्यादा अमीरों के मामले में चौथे स्थान पर है। इस लिस्ट में पहले स्थान पर जापान है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2.36 लाख लोग करोड़पति हैं। जिनके हर एक के नाम 6.70 करोड़ रुपए की संपत्ति है। पिछले साल यह आंकड़ा 1 लाख 98 हजार था। यानी एक साल में हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल्स (एचएनआई) की आबादी 19.9 फ़ीसद बढ़ गई। भारतीयों के पास कुल 4.365 अरब डॉलर की संपत्ति निजी तौर पर है।1600 डॉलर औसतन की प्रति व्यक्ति संपत्ति के साथ पाकिस्तानी दुनिया में सबसे गरीब हैं | इसके मुक़ाबले हमारे देश में थोड़ी कम गरीबी है , लेकिन 2012 के विश्व बैंक के एक आंकड़े के मुताबिक , दुनिया में सबसे अधिक गरीब लोग भारत में रहते हैं।
भारत में 21.9 फ़ीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने को मजबूर है। ये वे लोग हैं, जिनकी प्रतिदिन की कमाई 50 रुपए से भी कम है, जिन्हें रोज खाने के लिए रोटी भी नसीब होती। वे एक टाइम ही खाना खा पाते हैं | लेकिन ये आंकड़े हमारे राजनेताओं को चिंता के विषय न कभी लगे हैं और न आज लगते हैं ! 1971 के आम चुनाव में कांग्रेस नेता इंदिरा गाँधी ने '' गरीबी हटाओ '' का नारा दिया था | चौथी पंचवर्षीय योजना [ 19 69 - 74 ] का यह मुख्य विषय रहा , लेकिन क्या यह मतों की प्राप्ति तक सीमित न था ? अगर ऐसा न था , तो गरीबी कभी सही रूप में क्यों न घटी ? इसका लगातार बढना सही मायने में राजनीतिक अक्षमता और सत्ताधारियों की सतही इच्छाशक्ति का प्रतीक है |


भ्रष्टाचार पर क़ाबू न पाने का निहितार्थ


 '' कम हुआ नहीं लगता देश का भ्रष्टाचार '' शीर्षक से प्रकाशित ' कान्ति ' के पिछले 10 जनवरी के अंक के संपादकीय में चिंता जताई गई थी कि लगता है भ्रष्टाचारी किसी सरकार से नहीं डरते | इसलिए भ्रष्टाचार की घटनाएं बार - बार सामने आ रही हैं | अब एक सर्वे में यह तथ्य उजागर हुआ है कि मोदी सरकार के दौरान भी भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ है , जबकि भ्रष्टाचार से परेशान जनता सुशासन की चाह में सत्ता - परिवर्तन किया था | ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (सीपीआई) की ताज़ा रिपोर्ट में है कि सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार का वही हाल है, जो एक साल पहले था। जनता की भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लगातार लड़ाई के बावजूद उक्त संगठन के सर्वेक्षण में देश को महज़ 38 अंक मिले हैं। पिछले वर्ष भी भारत के इतने ही अंक थे। 168 देशों की सूची में भारत का स्थान 76वां है। यह इंडेक्स 168 देशों में सरकारी क्षेत्र की कंपनियों में भ्रष्टाचार की स्थिति पर आधारित है | इंडेक्स में जितने अधिक नंबर होते हैं, भ्रष्टाचार उतना ही कम होता है। इस हिसाब से भारत की स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। वहीं पिछले साल रैंकिंग में 174 देश शामिल थे और उनमें भारत 85वें नंबर पर था। ऐसे में इस बार देशों की संख्या कम होने से रैंकिंग भी कम हुई है। पड़ोसी देशों की बात करें तो भूटान के हालात सबसे बेहतर हैं। 65 अंकों के साथ यह देश 27वें नंबर पर हैं। भारत के सभी पड़ोसी सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार की समस्या से बुरी तरह जूझ रहे हैं। इस रैंकिंग में चीन 83 तो बांग्लादेश 139वें पायदान पर है। पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल के अंकों में मामूली इज़ाफ़ा हुआ है। वहीं दुनिया में डेनमार्क सबसे कम भ्रष्ट देश है। उसे 91 प्वाइंट्स के साथ लगातार दूसरे साल यह तमगा मिला है। दूसरे नंबर पर स्थित फिनलैंड के 90 और स्वीडन के 89 नंबर हैं। उत्तर कोरिया और सोमालिया सूची में सबसे नीचे हैं। दोनों देशों का स्कोर आठ है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के एशिया पैसेफि‌क क्षेत्र के डायरेक्टर श्रीरक प्लीपट के मुताबिक़ , भारत में भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए किए वादों को तोड़ने के मामले बहुत अधिक है। ऐसे मामले मई 2014 में हुए आम चुनाव से फरवरी 2015 दिल्‍ली विधानसभा के बीच ज्यादा देखे गए हैं। उन्होंने कहा कि इस वर्ष जारी सीपीआई इंडेक्स से जनता और नेताओं को कड़ा संदेश मिलेगा। जनता अब सरकार से भ्रष्टाचार के ऊपर सवाल पूछ सकेगी और चुनावी वादों को निभाने के लिए दबाव बना सकेगी। साथ ही उन्होंने वर्तमान मोदी सरकार के कामकाज पर कहा कि यह सरकार वादा करने में सबसे आगे है और निभाने में सबसे पीछे।
सभी जानते हैं कि केन्द्रीय सत्ता में आने से पहले से ही भ्रष्टाचार और काले धन को जिस तरह नरेंद्र मोदी ने अपना बड़ा मुद्दा बनाया था , उससे इस सोच को बल मिला था कि नई सरकार भ्रष्टाचार और भ्रष्ट लोगों के खिलाफ सख्त कदम उठाएगी , लेकिन लगभग डेढ़ वर्ष से अधिक गुज़र जाने के बाद भी अमलन कुछ ख़ास नहीं हो सका | यह बात अलग है कि सरकार बनते प्रधानमंत्री मोदी ने न्यायालयों में भ्रष्ट नेताओं पर चल रहे मामलों की फास्ट ट्रैक सुनवाई करने की अपील की , मगर अभी तक कुछ हो न सका ! दूसरी ओर इस पर भी गौर किया जाना चाहिए कि वर्तमान कैबिनेट में तमाम आपराधिक मामलों में आरोपित लोगों की तादाद पुरानी कांग्रेस सरकार के दागी मंत्रियों से करीब दोगुनी है | 66 सदस्यीय वर्तमान कैबिनेट के करीब एक तिहाई मंत्री आपराधिक धमकी, धोखाधड़ी , तो कुछ दंगा भड़काने और बलात्कार जैसे गंभीर आरोपों में घिरे हैं | लोकपाल भी अभी तक हवा में हैं | आप के लोकपाल को भी मोदी सरकार ने रोककर क़ानूनी दांव - पेंच के हवाले कर दिया है और केजरीवाल सरकार को निबटाने पर पूरा ज़ोर लगा रखा है | भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून में उचित संशोधन करने के साथ ही लोकपाल जैसी व्यवस्था को लागू करने से भ्रष्टाचार पर रोकथाम में काफी मदद मिल सकती है | आर्थिक विकास से ही भ्रष्टाचार उन्मूलन - संभव नहीं | फिर देश का अपेक्षित आर्थिक विकास भी तो नहीं हो पा रहा !1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भ्रष्टाचार को वैश्विक चलन कहा था | इस वक्तव्य के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री के ऐसी बात करने पर खेद जताया था | 1989 के लोकसभा चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा छाया रहा | तबसे लेकर आज तक चुनावी अभियानों में भ्रष्टाचार मिटाने के दावे बढ़चढ़ कर उछाले जाना आम बात हो गई है | ऐसे में इन दावों की कलई तब खुलती है , जब भारत सूची में बुर्किना फासो, जमैका, पेरु और जाम्बिया जैसे गरीब देशों के पायदान जैसा पाया जाता है | वस्तुस्थिति यह है कि आज हमारा देश भ्रष्टाचार और नैतिक पतन से गंभीर रूप से जूझ रहा है | भ्रष्टाचार पूरी व्यवस्था को तबाह और बर्बाद कर रहा है | जब तक इन्सान के नैतिक अस्तित्व को सबल नहीं बनाया जाएगा और उसके अंदर ईशपरायणता एवं ईशभय नहीं पैदा होगा , तब तक भ्रष्टाचार - उन्मूलन असंभव है | पूरी सृष्टि में केवल इन्सान ही ऐसा प्राणी है , जिसे कर्म और इरादे का अधिकार प्राप्त है | वह ईश्वर द्वारा स्रष्ट सभी जीवों और चीजों में सर्वश्रेष्ठ है , अतः सृष्टि की बहुत - सी चीज़ें उसके वशीभूत की गई हैं , जिनका वह अधिकारपूर्वक उपभोग करता है और कर सकता है | उहाँ यह तथ्य भी स्पष्ट रहे कि इन्सान के न तो अधिकार असीमित हैं और न ही उपभोग | उसके लिए भी एक सीमा - रेखा है , जिसे मर्यादा कहते हैं | यह चीज़ ही इन्सान को नैतिक अस्तित्व प्रदान करती है | मर्यादा और नैतिक अस्तित्व को बनाये रखने के लिए ही सदाचरण के द्वारा इन्हें परिमार्जित करने एवं जीवन को उच्चता की ओर ले जाने के लिए इन्सान को आध्यात्मिकता की ज़रूरत होती है , जो उसके जीवन की नैसर्गिक , बुनियादी और अपरिहार्य आवश्यकता है | अतः भ्रष्टाचार - निवारण के लिए अनिवार्य है कि इन्सान अपने स्रष्टा - पालनहार की ओर पलटे और उसका आज्ञाकारी और ईशपरायण बने |

Jan 17, 2016

फरीदाबाद में दो मस्जिदों का विस्तारीकरण

सांप्रदायिक सद्भाव की नयी मिसाल

'' गाँव में भाईचारा मज़बूत है | लोग एक - दूसरे के सुख - दुःख के साथी हैं | मस्जिद के लिए त्यागी साहब द्वारा मस्जिद के लिए ज़मीन देना आज के ज़माने में कोई मामूली बात नहीं , बहुत बड़ी बात है | इससे गाँव की एकता और मज़बूत होगी | '' यह कहना है फ़रीदाबाद [ हरियाणा ] के ददसिया गाँव के इमाम क़ारी उस्मान साहब का , जिनके द्वारा गुलज़ार मस्जिद के विस्तारीकरण का गत पांच जनवरी को विधिवत शुभारंभ हुआ |मस्जिद के विस्तारीकरण कार्यक्रम में स्थानीय मंदिर के पुजारी पंडित सत्यनारायण मिश्रा की उपस्थिति और मस्जिद के इमाम कारी उस्मान द्वारा दुआ कराकर ग्रामीणों ने हिंदु- मुस्लिम सद्भावना और भाईचारे की मिसाल पेश की है। मस्जिद में नमाज के लिए स्थान कम पड रहा था , जिसके लिए युवा समाजसेवी दीपक त्यागी ने मस्जिद के पास का100 गज का प्लॉट मस्जिद के लिए दान कर दिया है। इस अवसर पर युवा उद्यमी दीपक त्यागी ने कहा कि हमारा गांव हिंदु बाहुल्य गांव हैं जिसमें त्यागी बिरादरी ज्यादा है। यहां के मुसलमानों के लिए मस्जिद में नमाज़ के लिए जगह कम होने के बारे में मुझे पता चला | कई मुसलमान भाई एकत्रित होकर मेरे पास आए , तो मैने मस्जिद के साथ लगते हुए अपने प्लाट में से 100 गज जमीन मस्जिद को दान कर दिया , जिसे मस्जिद प्रबन्धन ने सांकेतिक रूप से खरीदी दिखाकर पेपर बनवा लिया। दानकर्ता श्री त्यागी ने कहा कि हमारे गांव में कभी भी हिन्दू - मुसलमान झगडे नही हुए | हम चाहते है कि यह भाईचारा व सौहार्द गांव में आगे भी बना रहे। इस अवसर पर पंडित सत्यनारायण मिश्रा जी भी पूरे मानव - प्रेम और उत्साह में दिखे | उन्होंने मस्जिद - विस्तारीकरण के क्रम में फीता काटकर और स्वयं फावडा चलाकर प्लाट में नींव में पहली ईंट रखी पंडित जी ने कहा कि हम लोग धर्म के आधार पर किसी के साथ कभी भेदभाव नहीं करते | सभी का सम्मान करते हैं | यही हमारी परंपरा है | मस्जिद के इमाम कारी उस्मान साहब ने मस्जिद के नये हिस्से का दुआओं के साथ शिलान्यास करते हुए कुरआन की आयतें पढ़ी और उनका अर्थ भी बताया || उन्होंने यह भी बताया कि '' इस गांव में मै अभी एक साल से हूं | मैने कभी यहां हिन्दू - मुसलमान वाली कोई ऐसी बात नही देखी | यहां ऐसा हिंदू - मुस्लिम भाईचारा, अमन चैन हैं और सौहार्द भरा माहौल है , जो हमने कही नहीं देखा है। '' इया अवसर पर सरदार निर्मल सिंह ने कहा कि ' हमारे तीर्थ स्थल '' स्वर्ण मन्दिर '' की नींव भी एक मुस्लिम सूफ़ी संत मियां मीर ने रखी थी | हिन्दू , मुसलमान , सिख आदि सभी आपस में भाई -भाई हैं और भाईचारे के साथ रहते हैं।

ददसिया गांव स्थित गुलजार मसजिद के विस्तारीकरण के शिलान्यास अवसर पर युवा उद्यमी दीपक त्यागी, पूर्व सरपंच लज्जाराम त्यागी, प्रहलाद त्यागी, बनारसीदास त्यागी, सरदार निर्माेल सिंह, धनसिंह, फैजू दीन, शेरू, नन्नूखान, शैकीन , रमजानी, फैज मुहम्मद , जबरदीन, चून्नू, वहीद, रामरीक, संदीप त्यागी, कुलदीप त्यागी, सहित सैंकडों ग्रामीण मौजूद थे।वास्तव में यह गाँव आज के सांप्रदायिक विद्वेष , घृणा और असहिष्णुता भरे माहौल में भारत की आत्मा है | गंगा - जमुनी तहज़ीब का प्रतीक है | यमुना किनारे बसा यह गांव [ ददसिया ] नदी के कटाव से दो बार उजड़ चुका है | अब यह तीसरी जगह बसा है | तिलपत नामक जमींदार ने इस गाँव का भू - भाग दान कर दिया था | आज ददसिया गांव की पंचायत हैं , जो किडावली गांव को मिलाकर लगभग तीन हजार की आबादी पर आधारित हैं। त्यागी बाहुल गांव में, मुसलमान, हरिजन, ब्राह्मण और सिख रहते हैं। इसी फरीदाबाद ज़िले की एक और मस्जिद हिन्दू और मुस्लिम भाईचारे का प्रतीक बनी हुई है | टिकावली गाँव में एक मन्दिर के महंत ओम प्रकाश जी ने विगत दिनों 18 दिसंबर 2015 को स्वयं पहल करके मस्जिद का निर्माण कार्य शुरू करवाया। पंडित जी हाथ में फावड़ा लिया और दिल्ली जामा मस्जिद के मौलवी इमाम बशीर अहमद साहब ने तशला संभाला और फिर शुरू हो गया मस्जिद का विस्तारीकरण निर्माण - कार्य ! टिकावली गांव की हंसिया मस्जिद के विस्तार के लिए चंदा एकत्रित किया गया | मस्जिद के चंदे के रूप में 3 लाख रूपये की राशि एकत्रित हुए , जिसमें हिंदुओं ने सर्वाधिक योगदान दिया। हिंदू भाइयों की इस दरियादिली से खुश मुसलमानों ने मस्जिद के लिए 1800 वर्गफुट के हॉल का लेंटर डाला। लेंटर डाले जाने के समय आसपास के हिंदू एव मुसलमान बड़ी संख्या में मौजूद थे। मस्जिद के लेंटर की शुरूआत दिल्ली से आए मौलवी बशीर खान और बादशाहपुर गांव के बाबा मोहनराम मंदिर के पुजारी पंडित ओमप्रकाश ने फावडे व तशले से रोडी सीमेंट मिक्शर मशीन में डालकर की। इस अवसर पर मंदिर के महंत ओमप्रकाश ने कहा कि आज उन्हें मुसलमान भाइयों के लिये मस्जिद का उद्घाटन करके अत्यंत खुशी हो रही है | हम सब ईश्वर की संतान हैं | किसी प्रकार कोई जाति , धर्म का भेदभाव हमारे बीच में नहीं होना चाहिये। मौलवी बशीर अहमद ने कहा कि जैसा नजारा आज उन्होंने टिकावली की इस मस्जिद के उद्घाटन में सौहार्द का देखा है | अल्लाह तआला से यही दुआ करता हूं कि ऐसा नज़ारा पूरे हिंदुस्तान में और पूरी दुनिया ज में हो जाए , तो फिर दंगे - फसाद के लिए गुंजाइश ही न बचेगी। इन दिनों देश दुनियां में बनी हुई आईएसआईएस की दहशत के बारे में बोलते हुए मौलवी साहब ने कहा कि कुछ चुनिंदा लोग इस्लाम का नाम लेकर दहशत फैला रहे हैं , उनका इस्लाम से कुछ लेना - देना नहीं हैं | मुसलमान तो वह होता है जो समाज को किसी भी प्रकार का कोई नुक्सान न पहुंचाये। मुसलमान नफा तो कर सकता है , मगर नुक्सान नहीं कर सकता। इस मस्जिद के निर्माण - कार्य की देखरेख कर रहे हमीद खान के मुताबिक़ , जो मस्जिद पहले से मौजूद थी , उसमें बहुत कम जगह थी , जिसके कारण नमाज़ियों को नमाज अदा करने में दिक्कतों का सामना करना पड रहा था, मगर आसपास के मुसलमानों के कम होने और मजदूर तबके के होने के कारण मस्जिद का विस्तार नहीं हो पा रहा था हमारे पास मस्जिद - विस्तार के लिए पैसे नहीं जुट पा रहे थे , तो हमें गांव के हिन्दू भाइयों ने सहारा दिया और पैसे एकत्रित कर उनके लिये मस्जिद बनवाने का कार्य शुरू करवा दिया।

भाजपा की हार और उसकी नीतियों की परीक्षा

भाजपा की हार और उसकी नीतियों की परीक्षा
अभी उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव में भाजपा कुछ ख़ास नहीं कर पाई | इससे पहले गुजरात के पंचायत चुनाव भी उसके लिए निराशाजनक रहे | बिहार विधानसभा चुनाव में भीउसे जबरदस्त सदमा लगा ही था | अब महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर भाजपा के लिए संकट पैदा कर दिया है | नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों में अगर भाजपा को सबसे अंतिम स्थान पर रहने के लिए मजबूर कर दिया | ये सब राजनीतिक परिवर्तन इस बात के संकेत हैं कि भाजपा का जनाधार तेज़ी के साथ घटा है |  
महाराष्ट्र को हिंदुत्व की प्रयोगशाला माना जाता है | इसी क्रम में भाजपा को वहां सरकार बनाने का मौक़ा मिला , लेकिन कुछ ही महीनों के कार्यकाल के बाद ही उसके जनाधार में जबरदस्त गिरावट उसके लिए अत्यधिक चिंताजनक है | महाराष्ट्रकी 17 नगर पंचायतों की 289 सीटों के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस ने सर्वाधिक 107 सीटें जीतकर सत्तारूढ़ भाजपा को जोर का झटका दिया है। राकांपा 58 सीटों के साथ नंबर दो पर रही जबकि शिवसेना तीसरे और भाजपा चौथे नंबर पर रही। कांग्रेस ने 17 में से 7 नगर पंचायतों में स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। भाजपा को मात्र 24 सीटें मिली हैं। कांग्रेस सांसद और प्रदेशाध्यक्ष अशोक चव्हाण ने बताया कि नपं चुनाव से स्पष्ट हो गया है कि जनता ने अब भाजपा को नकारना शुरू कर दिया है। उन्होंने बताया कि नांदेड़ जिले की नायगांव हिमायतनगर, उस्मानाबाद जिले की वाशी, नंदूरबार जिले की आक्राणी, नासिक जिले की दिंडोरी और चंद्रपुर जिले की जिवती कोरपना इन 7 नगर पंचायतों में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला है।
नगर पंचायत की कुल 289 सीटों के लिए चुनाव में सत्तारूढ़ शिवसेना 55 सीट पाकर तीसरे नंबर पर और भाजपा 24 सीट हासिल करके चौथे नंबर पर रही है। अहमदनगर जिले की जामखेड नगर परिषद में गृह राज्यमंत्री राम शिंदे को मुंह की खानी पड़ी है।
भाजपा को सबसे निराशा अहमदनगर जिले के जामखेड़ और चंद्रपुर में मिली। जामखेड़ गृह राज्यमंत्री राम शिंदे का गृहनगर है और चंद्रपुर का प्रतिनिधित्व वहां के वित्तमंत्री सुधीर मुनगंटीवार करते हैं। हालांकि इससे पहले 59 नगर पंचायत और नगर परिषदों में पिछले साल नवंबर में हुए चुनाव के नतीजों में भी भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर थी और राकांपा ने भी अच्छा प्रदर्शन किया था। लेकिन सिर्फ तीन महीनों के दौरान सरकार में होने के बावजूद ताजा चुनावों में भाजपा को जो नतीजे मिले हैं , उनसे भाजपा बुरी तरह आहत है | कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा - शिवसेना गठबंधन सरकार में दरार इस करारी हार का एक प्रमुख कारण है | सभी दलों के मुकाबले सबसे कम सीटें मिलना राज्य की भाजपा की वर्तमान शासन - नीति के साथ - साथ देश की केन्द्रीय सत्ता की उपलब्धियों और नाकामियों की ओर भी संकेत है | वास्तव में केन्द्रीय सत्ता में आने के बाद जहाँ - जहाँ चुनाव हुए , अधिकांश स्थानों पर भाजपा के लिए परेशानी और कड़ी परीक्षा के सबब साबित हुए | दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को जो निराशा - हताशा हाथ लगी , उससे पार्टी आज तक नहीं उबर पाई है , जिसे जंग - केजरीवाल ' जंग ' के तौर पर आज भी देखा जा सकता है | बिहार विधानसभा के हाल के चुनाव भी उसके लिए परेशानी बढ़ानेवाले ही साबित हुए | लालू - नीतीश गठबंधन ने उसके अरमानों को चकनाचूर कर दिया | पंचायतों के चुनाव भी भाजपा के लिए अशुभकारी रहे , यहाँ तक भाजपा शासित राज्यों में भी उसे शिकस्त मिली | बीते साल नवंबर में भाजपा के लिए पिछले लंबे समय से गढ़ बने गुजरात के स्थानीय निकायों के चुनावों में भी भाजपा को शहरी इलाकों में तो समर्थन मिला था, लेकिन जिला पंचायतों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों में लंबे समय के बाद कांग्रेस ने जोरदार वापसी की थी। कहा जा रहा है कि भाजपा के लिए अब हालात अनुकूल नहीं रहे। गुजरात नतीजों के बाद यह कहा गया था कि वहां हार्दिक पटेल के उभार और पाटीदार आरक्षण आंदोलन का असर पड़ा , जिससे इन्कार भी नहीं किया जा सकता है , मगर केवल इसी मुद्दे पर भाजपा चरमरा गई , कहना यही नहीं होगा | साथ यह भी नहीं कहा जा सकता कि केवल स्थानीय मुद्दों से ये चुनाव प्रभावित रहे | जहाँ - जहाँ भाजपा की हार हुई है , उसे केंद्र सरकार की नीतियों और उसके कार्यक्रमों पर जनता की सहज प्रतिक्रिया मानी जानी चाहिए |


Jan 14, 2016

ए एम यू भी निशाने पर ?

ए एम यू भी निशाने पर ?

क्या केंद्र सरकार चाहती है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का अब अल्पसंख्यक चरित्र न रहे ? केंद्र सरकार की ओर से अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी और गौरव शर्मा ने  सुप्रीमकोर्ट से 11 जनवरी 2016 को आग्रह किया है कि सरकार अपनी उस याचिका को वापस लेना चाहती है जिसमें उसने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक चरित्र को ख़त्म किये जाने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले को लगभग आठ वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी |  केद्र सरकार ने देश की शीर्ष अदालत से कहा है कि सेकुलर सरकार किसी धर्म विशेष के संस्थानों का पोषण नहीं कर सकती
इस मामले में केंद्र सरकार का यह यू टर्न खासकर मुसलमानों को हैरान - परेशान करनेवाला है | केंद्र सरकार के इस बदले हुए रुख से अदालत भी सहमत नहीं दिखी | उसने कहा कि सरकार अपना रुख ऐसे नहीं बदल सकती | यदि ऐसा ही था , तो उसने पहले यह अपील दाख़िल ही क्यों की थी ? अदालत ने कहा कि बिना सुनवाई के सरकार को यह याचिका को वापस नहीं लेने दिया जाएगा | इस मामले की सुनवाई अब अप्रैल 16 में होगी | जस्टिस एम वाई इक़बाल और जस्टिस सी नागप्पन की खंडपीठ से अटार्नी जनरल रोहतगी ने कहा कि इस मामले में वे कोर्ट को संतुष्ट करेंगे कि सरकार का पहले का रुख संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध था
 अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति लेफ्टीनेंट जनरल जमीरुद्दीन शाह का कहना है कि विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक चरित्र मौत और ज़िन्दगी का मामला है | भारतीय समाज में दबे - कुचले मुसलमानों की शिक्षा और उन्नति में इस विश्वविद्यालय की उल्लेखनीय भूमिका है | केंद्र के इस रुख से मुसलमानों में गंभीर चिंता पैदा हो गई है | सरकार अपने पिछले रुख से हट गई है | उन्होंने कहा कि हम अपने काज़ के लिए अदालत में लड़ेंगे | उल्लेखनीय है कि 2006 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया था कि यह विश्वविद्यालय संविधान के 30 [ 1 ] के तहत अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय नहीं है , क्योंकि इसका सारा खर्च केंद्र सरकार उठाती है | इसलिए यह 50 फ़ीसद मुस्लिम छात्रों को आरक्षण नहीं दे सकती |केद्र सरकार और विश्वविद्यालय ने इसे चुनौती दी थी और अप्रैल 2008 में सुप्रीम कोर्ट से स्टे प्राप्त कर लिया था |
1920 में केन्द्रीय सरकार के कानून द्वारा इस विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी। विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कालेज सोसायटी और मुस्लिम युनिवर्सिटी फाउण्डेशन कमेटी ने अपने सारे अधिकार, चल-अचल सम्पत्ति सहित नए अधिनियम 1920 के विश्वविद्यालय एक्ट के अन्तर्गत भारत सरकार को सौंप दिए थे। इसे अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय का जामा सन् 1981 में इंदिरा गांधी ने 1920 के विश्वविद्यालय एक्ट में संशोधन कर पहनाया था। 
इसी संशोधन के आधार पर तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने गत 19 मई 2005 को विश्वविद्यालय के 36 परास्नातक विषयों में 50 प्रतिशत स्थान मुसलमानों के लिए आरक्षित किए। जिन विषयों में 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया , उनमें एम.बी.ए., एम.डी.,एम.टेक., एमबीबीएस, एम.सी.ए.,एम.एड. जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रम सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त 20 प्रतिशत सीटें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के स्नातकों के लिए एवं 5 प्रतिशत सीटें कुलपति के विवेकाधीन कोटे हेतु, कर्मचारी-अध्यापक एवं पूर्व छात्रों के बच्चों के लिए सुरक्षित हैं , जिनका मुसलमानों को फ़ायदा मिलता है
यह कोई असंवैधानिक प्रावधान नहीं था और न है मानव संसाधन विकास मंत्रालय में पूर्व संयुक्त सचिव सुनील कुमार विश्वविद्यालय को लिखे अपने पत्र में कहते हैं, "अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एक्ट 1981 (संशोधित) का अधिनियम 5 (सी) विश्वविद्यालय को भारत के मुसलमानों के शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक उन्नयन को विशेष रूप से प्रोत्साहित करने के लिए निर्देशित करता है। सरकार मानती है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एक पांथिक अल्पसंख्यक संस्थान है जो कि भारत के संविधान की धारा 30 (1) के द्वारा स्थापित एवं संचालित है। इसी के अनुसार मुझे यह भी कहना है कि विश्वविद्यालय की एमडी/एमएस/परास्नातक सीटों में उपयुक्त प्राधिकारी द्वारा भारतीय मुसलमानों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान पर भी मंत्रालय को कोई आपत्ति नहीं है।" 
मई सन् 1873 में अलीगढ़ में मुसलमानों में अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार के लिए सर सैयद अहमद खां ने एक प्राइमरी पाठशाला की स्थापना की थी। नाम था "मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल स्कूल" जो आगे चलकर 1876 में एक हाईस्कूल के रूप में परिवर्तित हुआ। सन् 1877 में तत्कालीन वायसराय लार्ड लिटन ने इसे एक कालेज के रूप में चलाने के लिए नए भवन का शिलान्यास किया। कालांतर में सर सैयद अहमद खां द्वारा स्थापित इस कालेज को विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित करने की इच्छा को देखते हुए सन् 1911 से 1920 के मुस्लिम प्रतिनिधियों एवं भारत सरकार के मध्य कई दौर की वार्ता हुई। भारत सरकार ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय को खोलने का निश्चय किया और बाकायदा विश्वविद्यालय एक्ट में इस सन्दर्भ में स्पष्ट नियम बनाए गए। (ए.एम.यू.एक्ट-1920, धारा 8)
भारत सरकार ने 1920 में संसद में कानून पारित कर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना का रास्ता साफ किया। साथ ही इस्लामी अध्ययन के कुछ विशेष पाठ्यक्रमों को स्वीकृति दी गयी और इसके अल्पसंख्यक चरित्र को बरक़रार रखा | केद्र सरकार को चाहिए कि वह इस प्राचीन शिक्षण संस्थान के इस विशेष चरित्र को बनाये रखे |



Jan 5, 2016

बिहार में शराबबंदी - आधी हकीक़त , आधा फ़साना

बिहार में शराबबंदी - आधी हकीक़त , आधा फ़साना

बिहार में अप्रैल 2015 से शराब की बिक्रीपर प्रतिबंध लागू हो जायेगा, ऐसा कहना जल्दबाज़ी होगी | अब इस घोषणा पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार यू-टर्न ले सकते हैं , क्योंकि राजस्व विभाग के अधिकारियों ने उन्हें सलाह दी है कि शराबबंदी का दायरा देसी शराब तक ही सीमित रखना संभव है। राजस्व विभाग के अधिकारी इसके पीछे 5,500 करोड़ रूपये के राजस्व घाटे का तर्क दे रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विगत वर्ष मद्य निषेध दिवस के मौके पर पटना में आयोजित एक समारोह में घोषणा की थी कि एक अप्रैल 2016 से पूरे राज्य में शराबबंदी लागू कर दी जायेगी। मीडिया में यह रिपोर्ट भी आयी कि इस बाबत अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दे दिया गया है। साथ ही इसके लिए अधिकारियों को विस्तृत नीति तैयार करने को कहा गया है। मुख्यमंत्री ने कहा था कि राज्य में एक अप्रैल 2016 से नयी उत्पाद एवं मद्य निषेध नीति लागू कर शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जायेगा। मद्य निषेध नीति के लागू होने से राजस्व पर 4000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा और इसकी भरपाई के लिए अलग से उपाय किये जायेंगे। मुख्यमंत्री ने यह बड़ी अच्छी बात कही कि शराब से विशेषकर गरीब लोगों का जीवन जहां प्रभावित होता है, वहीं महिलाएं भी इससे परेशान रहतीं है। गरीबों को इससे काफ़ी आर्थिक क्षति होती है। 
नीतीश कुमार ने कहा कि उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग में उत्पाद पर तो जोर होता है , लेकिन मद्य निषेध पर नहीं, इसलिए मद्य निषेध पर जोर दिया गया है। केरल में शराब पर आंशिक प्रतिबन्ध के साथ ही गुजरात के बाद बिहार तीसरा राज्य होगा, जहां शराब की बिक्री पर प्रतिबंध रहेगा , चाहे वह सीमित - सिर्फ़ देसी दारू तक ही क्यों न हो। गुजरात पूरे देश का एकमात्र सूबा है, जहां शराबबंदी लागू है। लेकिन यह शराबबंदी सिर्फ कागजों तक सीमित है। जमीनी हकीकत बिलकुल अलग है। वास्तव में गांधी जी की जन्मभूमि गुजरात में 1960 से ही दिखावटी तौर पर शराबबंदी लागू है, लेकिन शराबबंदी की सच्चाई कुछ और हैं। अभी पिछले वर्ष अंतिम महीनों में गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में आने वाली एक ट्रेन के टॉयलेट से शराब की बड़ी खेप प्राप्त हुई थी | इतना ही नहीं एक घर से भी शराब का जखीरा बरामद हुआ। वहां टैंकर का इस्तेमाल भी शराब की तस्करी के लिए किया जाता है। पहले वहां एक टैंकर से भी लाखोंरूपये की शराब जब्त की गई। वहां ऐसा अक्सर होता रहता है | यह तथ्य है कि गुजरात में राजस्थान, दमणदीव और हरियाणा से बड़े पैमाने पर शराब की तस्करी की जाती है। आंकड़ों के मुताबिक, गुजरात में हर साल 100 करोड़ से ज्यादा की अवैध शराब पकड़ी जाती है | यह किंचित प्रसन्नता की बात है कि केरल सरकार ने 10 वर्षों में राज्य में पूरी तरह से शराबबंदी लागू करने के तहत जो नीति बनाई थी , उस पर सुप्रीम कोर्ट ने गत 29 दिसंबर 2015 को मुहर लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की इस नीति के तहत केरल के बारों में शराबबंदी को जारी रखा है।
केवल पांच सितारा होटलों में शराब परोसी जाएगी , जबकि 2, 3 और 4 सितारा बार वालों की याचिका को कोर्ट ने खारिज कर दिया है।सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार की शराबबंदी कानून पर अपनी रजामंदी जताते हुए बारों में शराब पर प्रतिबन्ध को सही बताया है। राज्य सरकार ने नई नीति के तहत केवल पंच सितारा होटलों के बारों में ही शराब परोसने की अनुमति दी है। केरल में वर्तमान समय में आमतौर पर केरल में प्रत्येक निवासी प्रति वर्ष 8.3 लीटर अल्कोहल पी जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर इसकी तुलना करें तो यह दोगुनी मात्रा है। वास्तव में नशा एक धीमा जहर है जिसमें दर्दनाक मौत के सिवा कुछ हासिल नहीं होता है,,, कितने ही परिवारो की जिंदगी इस जहर की शिकार होकर घर से बेघर हो गई है तथा न जाने कितनी जिंदगियां मौत के मुहं में समा चुकी हैं और ऩ जाने कितनी जिंदगियां अतिंम सांसे गिन रही हैं | शराब का नशा सबसे अधिक घातक है | इसीलिए हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने शराबबंदी की ओर भी ध्यान दिया और मद्य निषेध विभाग भी बनाया गया आबकारी विभाग भी अस्तित्व में आया और आरंभिक कुछ समय के बाद यह धड़ल्ले से शराबबंदी का मखौल उड़ाने लगा | सरकारें शराब माफ़िया के आगे झुकती गईं और आबकारी विभाग निरंकुश ढंग से शराब की नई दूकानें खोलने का लाइसेंस बाँटने लगा | अब हालत यह है कि इस सूरतेहाल पर सरकार से कुछ ख़ास स्वेच्छिक क़दम की अपेक्षा नहीं की जा सकती , क्योंकि सरकार को नशे के कारोबार से करोडो- अरबों का मुनाफा होता है और शराब माफ़िया से राजनेताओं की निरंतर बंदरबांट चलती रहती है | जनस्वास्थ्य की किसी को चिंता नहीं है | योग से शराबबंदी होने से रहीं | अतः इस जहर को रोकने के लिए सरकार के साथ जनता को भी खुलकर आगे आना होगा | देखा गया है कि ऐसे कुछ मामलों में महिलाएं विरोध जताती हैं | मगर यह केवल महिलाओं का काम नहीं होना चाहिए | सच्चाई यह है कि अगर जनता नशा मुक्ति के पक्ष में एक जुट हो जाए तो ये मौत की फैक्टरियां अपने आप बंद हो जायेंगी, और अन्य राज्य सरकारों को मजबूर होकर शराब और अन्य मादक पदार्थों पर प्रतिबन्ध लगाना पड़ेगा | वास्तव में शराबनोशी ने भारतीयों की बड़ी संख्या का जीवन दुष्कर बना डाला है | कुछ समय पहले एक अंग्रेज़ी दैनिक में शराब के इस्तेमाल पर एक सर्वेक्षणात्मक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसमें बताया गया कि भारतीय समाज के विशेषकर अभिजात्य वर्ग के युवक और युवतियां शराब के प्रति तेज़ी से आकर्षित हो रहे हैं । यह वर्ग फैशन के तौर पर भी शराब का इस्तेमाल करता है । 
कहने का मतलब यह कि इस ज़हरीले पदार्थ का इस्तेमाल पढ़े-लिखे मूर्ख तो पहले से करते रहे हैं, यह दुर्व्यसन अपनी पीढ़ी की ओर भी स्थानांतरित कर रहे हैं । इसकी बुरी आदत और लत ने ख़ासकर कमज़ोर वर्ग के लोगों की आर्थिक स्थिति और स्वास्थ्य पर कल्पनातीत कुप्रभाव डाला है | यह भी सच है कि पुरातनकाल से ही कुछ लोगों की सामाजिक व्यवस्था और जीवनशैली में शराब का प्रवेश था , जिसे पूंजीपतियों ने अपनी धन बढ़ाऊ घिनौनी मानसिकता के फेर में हवा दी है | ये लोग हर त्योहार पर , जन्म और विवाह के अवसरों पर शराब का इस्तेमाल अनिवार्य रूप से करते हैं | दैनिक दिनचर्या में भी इस्तेमाल करते हैं | फिर न तो शराब के उपयोग की मात्रा की कोई सीमा है और न ही उनके समाज के किसी सदस्य पर इसके सेवन पर रोक है ! हालत यह है कि शराब पीनेवालों का शरीर और मन - मस्तिष्क सभी अपाहिज हो चुके हैं ! नतीजा यह है कि अच्छे और बुरे की पहचान करने के योग्य नहीं रहे और न ही वे किसी मामले में सही निर्णय कर सकते हैं | क़ुरआन में शराब के लिए ‘‘ख़म्र’’ शब्द प्रयुक्त हुआ है, जिसकी व्याख्या हज़रत उमर [ रज़ि॰] ने इन शब्दों में की है, ‘‘ख़म्र उस चीज़ को कहते हैं जो बुद्धि पर परदा डाल दे ।’’ शराब मन-मस्तिष्क को सर्वाधिक प्रभावित करती है और बुद्धि को नष्ट कर डालती है । डॉ॰ ई॰ मैक्डोवेल कासग्रेव [ एम॰ डी .] के अनुसार,‘‘अल्कोहल मस्तिष्क को नष्ट कर देती है ।’’.
इस्लाम ने हर प्रकार की शराब ही को हराम नहीं किया है, बल्कि इसके अन्तर्गत हर वह चीज़ आ जाती है जो नशावर हो और मनुष्य की सोचने-समझने की शक्ति को नष्ट करे या उसे क्षति पहुंचाए । इस अवसर पर इस बात को भी ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि मनुष्य का जिस चीज़ के कारण समस्त प्राणियों में विशिष्ट और प्रतिष्ठित एवं केन्द्रीय स्थान दिया गया है, वह वास्तव में उसकी सोचने-समझने और सत्य-असत्य और भले-बुरे में अन्तर करने की क्षमता है । अब यह स्वाभाविक बात है कि जिस चीज़ या काम से मनुष्य की इस क्षमता और योग्यता को आघात पहुंचा हो या उसके पूर्ण रूप से क्रियाशील होने में बाधा उत्पन्न होती हो, उसको मनुष्य का निकृष्टतम शत्रु समझा जाए । शराब चूंकि मस्तिष्क को स्वाभाविक रूप से कार्य करने में रुकावट डालती है और उसकी तर्कशक्ति को शिथिल करके मनुष्य को मानवता से ही वंचित कर देती है, इसलिए उसे मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु घोषित करना बिलकुल उचित ही है ।क़ुरआन मजीद में शराब के विषय में जो कुछ कहा गया है उसका स्पष्टीकरण अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद [ सल्ल॰ ] के बहुत से कथनों से भी होता है । आपने कहा है , ‘प्रत्येक मादक चीज़ ‘ख़म्र’ है और प्रत्येक मादक चीज़ हराम है ।’ ‘वह हर पेय जो नशा पैदा करे, हराम है और मैं हर मादक चीज़ से वर्जित करता हूं ।’

बेतुके बयानों की समस्या

बेतुके बयानों की समस्या

अयोध्या में मन्दिर निर्माण के लिए राजस्थान से दो ट्रक पत्थर मंगवाए जाने का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि मोदी सरकार के पर्यटन और सांस्कृतिक मंत्री डॉ . महेश शर्मा ने एक बयान देकर इसे ताज़ा कर दिया है | उन्होंने गत 30 दिसंबर की कहा है कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण होना देश की जनता का सपना है। हर व्यक्ति चाहता है कि यह जल्द बने। भाजपा और सरकार ने भी इस पर अपना मत दे दिया है।मामला सुप्रीम कोर्ट में होने की बात पर उन्होंने कहा, हम सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करेंगे या किसी तरह सहमति के माध्यम से राम मंदिर बनाने का प्रयास करेंगे। उन्होंने कहा कि अयोध्या में भव्य रामायण म्यूजियम बन रहा है, जिसके लिए सरकार ने 170 करोड़ रुपये स्वीकृत किये हैं। 
राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश के 2017 में होनेवाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र मतों के केन्द्रीकरण की खातिर मन्दिर - क़वायद तेज़ कर डी गई है | बाबरी मस्जिद मामले के पक्षकार हाशिम अंसारी का कहना है कि जो लोग आजादी के बाद से आज तक बाबरी मस्जिद को मंदिर बनाने के षड्यंत्र कर रहे हैं , वे अपने मजहब और देश के कानून का मजाक उड़ा रहे हैं | यह भी खबर है कि महंत नृत्यगोपाल दास की अगुआई में मंदिर निर्माण जल्द शुरू करवाने को लेकर धर्माचार्यों का एक दल जल्द ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलेगा।
वास्तव में बाबरी मस्जिद की शहादत की दुखद और निंदनीय घटना ने देश की राजनीति और समाज को एक लंबे अरसे से प्रभावित किया है, लेकिन न्याय करने एवं समस्या के समाधान में देश की सम्मानित न्यायपालिका , केंद्र और राज्य सरकारें अभी तक नाकाम रही हैं | अदालत में इसका मुक़दमा 1949 से चल रहा है | मुसलमानों की ओर से इसके एक प्रमुख पक्षकार हाशिम अंसारी हैं , जो भूमि के मालिक़ाना हक़ का मुकदमा लड़ते-लड़ते 92 साल के हो चुके हैं | उनका भी यह मानना है कि इसका फ़ैसला न्यायालय को जल्द करना चाहिए | यह विवाद अंतिम फ़ैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट में है | इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2012 में जो फ़ैसला सुनाया था , उसे इस केस के तीनों पक्षों ने चुनौती दे रखी है | 
हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को अपने फ़ैसले में बाबरी मस्जिद के बाहरी आँगन में स्थित राम चबूतरे और सीता रसोई पर निर्मोही अखाड़ा का दीर्घकालीन कब्ज़ा मानते हुए उसे देने का निर्णय किया था | इसके अलावा मुख्य गुम्बद के नीचे की ज़मीन रामजन्म भूमि मानते हुए राम लला को देने का आदेश किया था | लगभग 1500 वर्ग मीटर विवादित भूखंड का एक तिहाई मुस्लिम पक्षकारों को देने का फ़ैसला किया गया था , जिसमे सुन्नी वक्फ बोर्ड एवं अयोध्या के कुछ मुस्लिम नागरिक शामिल हैं |
मुसलमान इस फ़ैसले से संतुष्ट नहीं थे , इसलिए उन्होंने भी इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी | मुसलमानों की ओर से एक और प्रमुख पक्षकार एडवोकेट ज़फ़रयाब जीलानी ने कहा था , '' उनकी अपील के मुख्यतः तीन आधार हैं | एक तो हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में श्रद्धा और विश्वास को तरजीह दी , जो सबूत की श्रेणी में नहीं आता | सबसे बड़ा सवाल यही है | दूसरा यह कहा गया कि ये स्थल हिंदू और मुसलमानों का साझा कब्ज़े वाला था , जबकि बाबरी मस्जिद पर मुसलमानों का कब्ज़ा था और निर्मोही अखाड़े का बाहरी हिस्से पर | तीसरी बात यह कही गयी कि वहाँ जुमे को ही नमाज पढ़ी जाती थी , जबकि वहाँ पांचों वक्त नमाज होती थी | ''
6 दिसंबर 1992 को कट्टर हिंदुत्ववादियों ने बाबरी मस्जिद को शहीद कर दिया था | विश्व हिन्दू परिषद , बजरंग दल , भाजपा और शिव सेना के लोगों ने इस बर्बर घटना को अंजाम दिया | इस दिन हजारों की संख्या में कार सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढाह दिया, जिसके बाद देश के कई स्थानों पर सांप्रदायिक दंगे हुए , जिसमें सैकड़ों लोग मारे गये। अस्थाई रूप से राम मंदिर बना दिया गया। प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने मस्जिद के पुनर्निर्माण का वादा किया, जो अब तक अधूरा है | 
5 दिसंबर 1992 को ही अयोध्या में लाखों की संख्या में भीड़ इकट्ठा हो गयी थी। राज्य सरकार सारे घटनाक्रम से अवगत थी , फिर भी एहतियाती क़दम नहीं उठाये गये | दूर - दूर से लोग इसमें हिस्सा लेने अयोध्या पहुँचते रहे। कारसेवको का नारा बार-बार गूंज रहा था '' मिट्टी नहीं सरकाएंगे, ढांचा तोड़ कर जाएंगे '' । यह तैयारी एक दिन पहले की गयी थी |कारसेवकों की भीड़ ने अगले दिन 12 बजे का वक्त कारसेवा शुरू करने का तय किया था , जो अहिस्ता - अहिस्ता उन्माद की शक्ल इख़्तियार कर रहा था |
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार 6 दिसंबर को सुबह 11 बजते ही कारसेवकों के एक बड़ा जत्था सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश करता है, लेकिन उसे पीछे धकेल दिया जाता है। तभी वहां कारसेवकों से घिरे हुए वीएचपी नेता अशोक सिंघल नज़र आते हैं कारसेवकों से घिरे हुए और वो उन्हें कुछ समझाते हैं। थोड़ी ही देर में उनके साथ बीजेपी के बड़े नेता मुरली मनोहर जोशी भी इन कारसेवकों से जुड़ जातें हैं। तभी भीड़ में एक और चेहरा नजर आता है लालकृष्ण आडवाणी का। सभी सुरक्षा घेरे के भीतर मौजूद हैं और लगातार बाबरी मस्जिद की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। कारसेवकों के नारे वातावरण में गूंज रहें हैं।
इसी बीच वहां पीली पट्टी बांधे कारसेवकों का आत्मघाती दस्ता आ पहुंचता है। उसने पहले से वहां मौजूद कारसेवकों को कुछ समझाया। सबके चेहरे के भाव से लगता है कि वे किसी बड़ी घटना के लिए सबको तैयार कर रहे हैं। तभी एक चौकाने वाली घटना होती है। बाबरी मस्जिद की सुरक्षा में लगी पुलिस की इकलौती टुकड़ी धीरे धीरे बाहर निकल जाती है। न कोई विरोध, न मस्जिद की सुरक्षा की परवाह। पुलिस के निकलते ही कारसेवकों का दल मस्जिद को शहीद कर देता है | 1990 बैच की आईपीएस अधिकारी अंजू गुप्ता 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने के समय फैजाबाद जिले की असिस्टेंट एसपी थीं | उन्हें आडवाणी की सुरक्षा का जिम्मा दिया गया था। 2010 में उन्होंने एक बयान में कहा कि घटना के दिन आडवाणी ने मंच से बहुत ही भड़काऊ भाषण दिया था।
इसी भाषण को सुनने के बाद कारसेवक और उग्र हो गए थे। अंजू गुप्ता का कहना था कि वे भी मंच पर करीब 6 घंटे तक मौजूद थी | इन्हीं घंटों में मस्जिद को शहीद किया गया था , लेकिन उस वक़्त मंच पर आडवाणी मौजूद नहीं थे। वे मस्जिद को शहीद करवाने में लगे रहे | उस समय वहां कल्याण सिंह की सरकार थी , जिसे बर्खास्त कर दिया गया | कल्याण सिंह को सुप्रीमकोर्ट ने सांकेतिक सज़ा दी | हैरत और चिंता की बात यह भी है कि बाबरी मस्जिद की शहादत और इसके नतीजे में देश के कई हिस्सों में हुई सांप्रदायिक हिंसा के मुख्य आरोपियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं हो पाई ! अतः एक ओर जहाँ यह आवश्यक है कि दोषियों को सज़ा मिले , वहीं दूसरी ओर सुप्रीमकोर्ट में लंबित मुक़दमे का जल्द निबटारा किया जाए |