Feb 28, 2016

ए एम यू को जान - बूझकर बदनाम करने की कोशिश

ए एम यू को जान - बूझकर बदनाम करने की कोशिश 
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे पर सवाल उठाने का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि जान - बूझकर नया विवाद खड़ा कर दिया गया | सोशल मीडिया पर गत 20 फरवरी 2016 को बीफ़ - मुद्दा उछाला गया । व्हाट्स ऐप के एक पोस्ट में आरोप लगाया गया कि एएमयू मेडिकल कॉलेज की कैन्टीन में बीफ बिरयानी परोसी जा रही है। साथ ही कैन्टीन के मेन्यू कार्डकी तस्वीर भी सोशल मीडिया पर डाली गई
इस पर कुछ दक्षिणपंथी संगठनों ने आवाज उठाई और कैन्टीन के ठेकेदार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की। शहर की भाजपा मेयर शकुन्तला भारती ने भाजपा और विहिप के लोगों के स्थानीय लोगों के साथ मांग की कि जिला प्रशासन मामला दर्ज कर जांच का आदेश दे और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें। यह गलत और भ्रामक बात फैलाने की कोशिश की गई मानो गाय का गोश्त परोसा जा रहा हो , जबकि भैंस के गोश्त की बिरयानी की बात थी
अलीगढ़ के वरीय पुलिस अधीक्षक जे रवीन्द्र गौड़ के अनुसार , पुलिस को इस बाबत शिकायत मिली , जिसकी पूरी तरह जाँच की गई , लेकिन भाजपा नेता हमारे रिस्पांस से ख़ुश नहीं हैं | पुलिस इसे औचित्यहीन आरोप मानती है | पुलिस का कहना है कि मामले की आरंभिक जाँच में गाय के गोश्त की बिरयानी नहीं पाई गई है | विश्वविद्यालय प्राक्टर एम मोहसिन खान के नेतृत्व में एएमयू के वरिष्ठ अधिकारियों ने मेडिकल कॉलेज की कैन्टीन पहुंचकर औचक निरीक्षण किया और कुछ भी आपत्तिजनक - प्रतिबंधित सामग्री नहीं पाई
एएमयू प्रवक्ता राहत अबरार ने कहा कि यह संस्था को बदनाम करने के लिए दुष्प्रचार है। मैं भरोसे से कह सकता हूं कि जिस बीफ बिरयानी का जिक्र हो रहा है, वह भैंस का गोश्त है।उन्होंने कहा कि प्रारंभिक जांच से पता चला है कि कैन्टीन का ठेका 23 फरवरी को समाप्त हो रहा है। ठेका पाने की चाह रखने वाले कुछ निहित स्वार्थी तत्वों ने ये अफवाह उड़ाई है कि गाय का गोश्त परोसा जा रहा है। जनाब अबरार ने कुछ दक्षिणपंथी संगठनों और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा वरीय पुलिस अधीक्षक के कार्यालय पर प्रदर्शन पर चिंता जताई
उन्होंने इन आरापों को हास्यस्पद बताते हुए कहा कि एएमयू वह पहला संस्थान है जिसने एक सदी पहले ही अपने परिसर में गाय के गोश्त के सेवन पर प्रतिबंध लगाया था। उन्होंने बताया कि मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज, जो बाद में चलकर 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना, के संस्थापक सर सैयद अहमद खान ने 1884 में एक स्पष्ट आदेश जारी किया था कि न सिर्फ किसी भी डाइनिंग रूम में बीफ नहीं परोसा जाएगा , बल्कि बक़रीद के अवसर पर संस्थान के कर्मचारी गाय की कुर्बानी भी नहीं करेंगे। सर सैयद अहमद ने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि वह हिन्दू भाइयों की भावनाओं को ठेस नहीं पंहुचाना चाहते थे और इस आदेश का उल्लंघन करने वाले संस्थान के एक कर्मचारी को 1884 में बर्ख़ास्त भी कर दिया गया था।

वास्तव में बहुत लंबे समय से यह एक अति संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है | मोदी सरकार के आने के बाद इसे मुस्लिम विरोध के नाम पर कुछ अधिक ही अपना लिया गया है और अख्लाक हत्याकांड जैसी निंदनीय घटनाएं अंजाम दी गई हैं | मुसलमानों को बदनाम करने और उन्हें प्रताड़ित करने के लिए इसका बार - बार इस्तेमाल किया जा रहा है , जो अति निंदनीय और अफ़सोसनाक है | इस कुप्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए |

उ . प्र . का जंगल राज

उ . प्र . का जंगल राज


15 मार्च 2016 को अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल के चार वर्ष पूरे हो जाएंगे | उसके समर्थक सरकार की उपलब्धियों में महिलाओं की सुरक्षा और कल्याण को प्राथमिक तौर पर गिनाते हैं | इस सिलसिले में मुख्यमंत्री द्वारा पुलिस विभाग और वीमन हेल्‍प लाइन यानी 1090 को पूरा ज़िम्मा दिए जाने का उल्लेख किया जाता है | लेकिन अमलन हुआ क्या , इस पर ध्यान नहीं दिया जाता है | प्रदेश में महिला सुरक्षा कैसी है , इसे जानने - समझने से पहले इस सिलसिले में एक ' समाजवादी विचार ' अवश्य सुन लेना चाहिए | समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने बढ़ते बलात्कार की समस्या पर कुछ समय पहले यह ' प्रवचन ' दिया था कि ' लड़कों से गलती हो जाती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया जाए। ' देखते ही देखते अपराधियों ने 27 मई 2014 को बदायूं में दो बच्चियों की बलात्कार के बाद हत्या कर उन्हें पेड़ से लटका दिया ।
इसके बाद से तो राजधानी ही नहीं, प्रदेश भर में मासूम बच्चियों और महिलाओं के साथ बलात्कार और नृशंस हत्या का मानो सैलाब ही आ गया। सबसे हैरतनाक और लोमहर्षक हादसा तो 16-17 जुलाई 2014 को हुआ , जब एक युवती की नंगी लाश राजधानी लखनऊ के मोहनलालगंज के एक सरकारी स्कूल में मिली, जहां एक बड़े बिल्‍डर की कालोनी बन रही थी। लाश खून से सनी हुई थी | बताया जाता है कि इस हादसे में कम से कम छह लोगों ने बलात्कार करके उसकी नृशंस हत्या की थी, लेकिन पुलिस ने, यह जानते हुए भी इस बेहद नृशंस हत्याकांड में कई लोग लिप्त हैं , केवल एक गार्ड को फंसा दिया, जिसका भूमिका केवल उस युवती को मौके पर लाने की थी।
इसके बाद 22 अक्तूबर 14 को पारा में गैंगरेप के बाद एक युवती को मौत के घाट उतार दिया गया | उसकी भी लाश नंगी हालत में मिली थी। दो फरवरी15 को लखनऊ के पीजीआई थाना क्षेत्र में गौरी नाम की एक लड़की के दर्जनों टुकड़े कई स्‍थानों पर बरामद हुए। फिर 17 मई 15 को पारा के ही काशीराम कालोनी में एक बक्से में एक युवती की लाश बरामद हुई। 25 जून-15 को अलीगंज के केंद्रीय विद्यालय की बाउंड्री पर एक युवती की लाश बोरे में बरामद हुई। इस लाश पर विद्रूप करने के लिए हत्यारों ने उस पर तेजाब भी डाल दिया था। 27 जून 15 गैंगरेप के बाद पीजीआई इलाके में ही एक युवती की हत्‍या कर दी गयी। चार दिसंबर 15 को पूरा ट्रांस गोमती इलाका उस हादसे से दहल गया, जब मडि़याहूं में दो युवतियों की लाशें बरामद हुईं। इन लाशों में सिर्फ धड़ ही मिला था, जबकि इन लाशों का सिर लापता था।
पिछले दिनों दस दिन में तो प्रदेश में दस साल की बच्चियों को बलात्कार के बाद जान से मार दिया गया। इनकी हत्याओं के लिए जो तरीका अपनाया गया, वह अमानवीय है जिसे देख कर रोंगटे खड़े हो गये। अगले ही दिन यानी पांच दिसंबर 15 को बंथरा में बीए की एक छात्रा की नंगी लाश खेत में बरामद हुई। बदायूं में एक बंंजारा लड़की को बलात्कार के बाद अपराधियों ने बड़े ही निर्मम ढंग से मौत के घाट उतार दिया। जौनपुर के मडि़याहूं में भी यही हुआ, जहां अपनी मां के साथ एक पारिवारिक समारोह में गयी एक बच्ची की बलात्कार के बाद हत्‍या कर दी गयी। बलिया, मैनपुरी, हैदरगढ़ में भी यही हुआ। लेकिन हैरत की बात रही कि ऐसी किसी भी घटना में इन इलाकों के किसी भी विधायक-मंत्री ने मौके पर पहुंचने का कष्ट नहीं उठाया, सिवाय कांग्रेस की रीता बहुगुणा के। मडि़याहूं के नागरिकों ने पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय के स्थानीय कालेज के शिक्षक अनुराग मिश्र अपने साथियों के साथ लगातार इस मसले पर बाकायदा आंदोलन छेड़े हुए हैं।
महिला - अत्याचार का सिलसिला अभी थमा नहीं है | लखनऊ जू यानी अजायबघर के ठीक पीछे और मुख्‍यमंत्री आवास के घर से चंद दूर एक स्कूली बच्ची की नंगी लाश गत 16 फ़रवरी 16 को बरामद हुई है। इसका पता तब पता चला, जब करीब सुबह साढे दस के करीब लोहिया पथ से गुजर रहे राहगीरों ने इस इलाके में चील-कौवों को मंडराते देखा। जहां पर लाश मिली है, वहां से समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो का आवास और कार्यालय ही नहीं, बल्कि प्रदेश के पुलिस महानिदेशक का आवास बस चंद कदम दूर है। इतना ही नहीं, प्रदेश की महिलाओं को सुरक्षा‍ दिलाने के लिए बनी वीमन हेल्‍प लाइन 1090 के मुख्यालय से बमुश्किलन दो सौ मीटर है | बताया जाता है कि उन्नति विश्वकर्मा के माँ बाप लखनऊ के जानकीपुरम थाने पर 10 फरवरी से बिटिया की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने थाने के चक्कर काटते रहे और दरिन्दों ने बिटिया की हत्या कर डीजीपी आवास के पीछे नाले में फेंक दिया। थाने के एस. ओ. एस. एन. एस. यादव जी केवल मामले को टरकाते रहे और बिटिया की लाश पाँच दिन तक नाले में सड़ती रही।
ये तो उत्तर प्रदेश के ' जंगल राज ' की कुछ झलकियाँ भर हैं | सही सूरतेहाल यह है कि पूरा प्रदेश क़ानून - व्यवस्था की दृष्टि से गंभीर संकट के दौर से गुज़र रहा है | प्रदेश में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव भी होनेवाले हैं | फिर भी लगता है कि अखिलेश सरकार का इस ओर पर्याप्त ध्यान नहीं है | अखिलेश सरकार को चाहिए कि बलात्कार जैसी घटनाएं रोकने के लिए महिला को प्रताड़ित करनेवालों को अमलन कड़ी सज़ा देने के साथ कामुक - अश्लील साहित्य के साथ ब्लू व अश्लील फिल्मों एवं टीवी चैनलों द्वारा फैलाई जा रही अश्लीलता पर भी प्रभावी रोक लगाए | अब तक किसी भी सरकार ने इस ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया है , मानो अश्लीलता को खुली छूट मिली हुई हो | आजकल टीआरपी बढ़ाने के लिए सब कुछ दिखाया जाता है , जिसका समाज पर बुरा प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है | सामाजिक संगठनों को चाहिए कि लोगों में महिला - सम्मान की मानसिकता विकसित करने हेतु ज़ोरदार अभियान चलायें , जिसमें धार्मिक साहित्य का भी इस्तेमाल करें | इस सिलसिले में इस्लाम की शिक्षाएं बड़ी कारगर भूमिका निभा सकती हैं |

काबा के बारे में गलत , भ्रमकारी बयान विशुद्ध एकेश्वरवाद का केंद्र है काबा

काबा के बारे में गलत , भ्रमकारी बयान विशुद्ध एकेश्वरवाद का केंद्र है काबा
द्वारिका शारदा पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने हाल में ही यह भ्रामक और गलत बयान दिया है कि मक्का में मक्केश्वर महादेव मंदिर है। इनसे पूर्व कुछ इसी तरह के इतिहासविरोधी गलत बयान जान - बूझकर दिए जाते रहे हैं , जिनका उद्देश्य समाज में अशांति और नफ़रत पैदा करना है | पी एन ओक ने यह मिथ्या दुष्प्रचार किया था कि मक्केश्वर शिवलिंग हज्रे असवद है। ‘वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास’ नामक पुस्तक में उन्होंने यह गलत और तथ्य विरोधी बात लिखी है कि काबा में शिव का ज्योतिर्लिंग है। ' आर्ट ऑफ़ लिविंग ' के स्वामी श्री रवि शंकर ने भी अपनी अंग्रेज़ी पुस्तक ' हिदुइज्म एंड इस्लाम ' में इस अफ़वाह और दुष्प्रचार को हवा दी है | अब सोशल मीडिया - यू ट्यूब , ट्यूटर , फ़ेसबुक , ब्लाग्स और कुछ वेबसाइटों पर इस तरह की मिलती - जुलती अफ़वाहों पर आधारित मनगढ़ंत बातें फैलाई जा रही हैं | यह कहा जाता है कि काबा एक शिव मंदिर हैं या फिर उसमे शिवलिंग हैं या यशोदा और कृष्ण की तस्वीरे काबा के अन्दर हैं या कोई दीपक हमेशा जलता रहता हैं और मुसलमान हज के दौरान वहा शिव या कृष्ण उपासना करते हैं | यह भी कहा जाता है की वेंकटेश पण्डित ग्रन्थ 'रामावतारचरित' के युद्धकांड प्रकरण में एक अजीब प्रसंग 'मक्केश्वर लिंग' का हैं। यह प्रसंग आम तौर पर अन्य रामायणों में नहीं मिलता है। कहा जाता है कि रावण ने शिव से उसे युद्ध में विजयी होने की प्रार्थना की। शिव ने प्रार्थना स्वीकार कर रावण को एक लिंग (मक्केश्वर महादेव) दिया और कहा कि यह तेरी रक्षा करेगा, मगर ले जाते समय इसे मार्ग में कहीं भी धरती पर नहीं रखना | रावण आकाशमार्ग से लंका रवाना होता है , लेकिन रास्ते में कुछ ऐसी परिस्थितियां बनती हैं कि रावण को शिवलिंग धरती पर रखना पड़ता है। वह दोबारा शिवलिंग को उठाने की कोशिश करता है पर लाख कोशिश के बावजूद लिंग उस स्थान से हिलता नहीं। वेंकटेश पण्डित के अनुसर यह स्थान वर्तमान में सऊदी अरब के मक्का नामक स्थान पर स्थित है। कहा जाता है कि इस्लाम के प्रसार से पहले यहूदी इसकी पूजा करते थे। इनमें से किसी भी बात का सच्चाई से कोई संबंध नहीं है | इस्लाम की विशुद्ध एकेश्वरवादी धर्म है | क़ुरआन में है - '' तुम्हारा पूज्य प्रभु एक ही पूज्य प्रभु है , उस करुणामय और दयावान के सिवा कोई और पूज्य प्रभु नहीं है '' [ 2 - 163 ] इस्लाम में निराकार ईश्वर की ही पूजा - इबादत होती है | काबा की ओर रुख करके नमाज़ पढ़ने का आदेश है | वहां न ही किसी देवी - देवता की मूर्ति है , न ही कोई प्रतीक - प्रतिमा | अलबत्ता काबा के ढांचे के एक कोने पर एक काला पत्थर लगाया हुआ है। इस पत्थर को इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद [ सल्ल . ]  ने चूमा था । चूमने की इस क्रिया में कोई ईश-भावना न थी। अतः आप [ सल्ल . ] की पैरवी में आपके अनुयायी भी इसे चूमने लगे और यह क्रम आज तक जारी है। उस समय किसी के हृदय व मस्तिष्क में यह विचार किंचित भी न था कि इस पत्थर में कोई ईश्वरीय गुण या शक्ति है और यह कोई लाभ या हानि पहुंचा सकता है अतः पूजा रूप में इसे चूमा जाए। 
इस्लाम के अंतिम पैगंबर हज़रत मुहम्मद [ सल्ल.] के बाद दूसरे खलीफ़ा हज़रत उमर (रज़ि॰) के शासनकाल (634-645 ई॰) में इस ख़्याल से कि कहीं आगे चलकर लोग अज्ञानतावश या भावुक होकर इस काले पत्थर को पत्थर से ‘कुछ अधिक’ न समझने लगें; एक अवसर पर जनता के बीच, पत्थर के सामने खड़े होकर हज़रत उमर [ रज़ि .] ने कहा: ‘‘तू एक पत्थर है, सिर्फ़ पत्थर; हम तुझे बस इस वजह से चूमते हैं कि हमने पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) को तुझे चूमते हुए देखा था। इससे ज़्यादा तेरी कोई हैसियत, कोई महत्व हमारे निकट नहीं है। हमारा विश्वास है कि तू एक निर्जीव वस्तु, हमें न कोई फ़ायदा पहुंचा सकता है, न नुक़्सान’’ | दरअस्ल काबा का इतिहास एकेश्वरवाद के केंद्र का है | लगभग चार हज़ार वर्ष पूर्व जब अज्ञानता के घोर अंधकार में मानव-जाति निराकार एकेश्वरवाद की सीधी राह से भटक कर साकार अनेकेश्वरवाद , बहुदेववाद की मिथ्या धारणा में फंसी हुर्इ थी; सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्रों, तारो, पत्थरो, प्रेतात्माओं, पूर्वजों और शक्तिशाली शासकों की उपासना , मूर्ति-पूजा एवं नाना प्रकार के अंधविश्वासों व आडम्बरों से ग्रस्त थी। अपने से तुच्छ पदार्थो के सामने एवं अपने ही जैसे मनुष्यों के चरणों में सिर झुकाने से मनुष्य की गरिमा धूल = धूसरित हो चुकी थी | तत्कालीन पूरी मानव-जाति मे एकेश्वरोपासक एक भी व्यक्ति बाकी न रह गया था। इन विषम परिस्थितियों मे इराक के उर नामक नगर के वासी ‘महंत-महापुजारी’ आजर के घर मे, उसी के बेटे इबराहीम को अल्लाह ने तौहीद( विशुद्ध एकेश्वरवाद) की ज्योति जलाने के लिए चुन लिया और उन्हे अपना पैगम्बर (र्इशदूत) नियुक्त किया। अल्लाह ने पैग़म्बर इब्राहीम (अलैहि॰) को आदेश दिया कि वर्तमान काबा के स्थान पर एक ढांचा बनाओ। उन्होंने अपने बेटे इस्माईल (अलैहि॰) के साथ मिलकर पत्थरों का ढांचा बना लिया। ईश्वर ने इसे ‘अपना घर’ कहा और आदेश दिया कि यहां नमाज़ पढ़ो और इसकी परिक्रमा (तवाफ़) करो। इसे एकेश्वरवाद का प्रतीक क़रार दिया गया। लगभग ढाई हज़ार वर्ष तक यह क्रम चलता रहा, लेकिन अज्ञानता के अंधेरे आए तो काबा में मूर्तियां रख दी गईं | वह अनेकेश्वरवाद का केन्द्र बन गया। इस्लाम के अंतिम पैगंबर हज़रत मुहम्मद [ सल्ल . ] ने अपनी पैग़म्बरी के लगभग 21वें वर्ष इसे मूर्तियों से पाक कर दिया और इसकी ‘एकेश्वरवाद का केन्द्र’ होने की हैसियत को बहाल कर दिया। मक्का में विश्व भर के मुसलमान आम दिनों में प्रतिदिन और विशेषकर हज के दिनों में विशेष आयोजन के साथ काबा की परिक्रमा करते, इसकी दिशा में मुख करके अल्लाह की इबादत करते हैं। इसके साथ ही वे विश्व में कहीं भी हों काबा की ओर रुख़ करके ही नमाज़ पढ़ते हैं, इसी के अनुकूल दुनिया भर में हर जगह हर मस्जिद का निर्धारित दिशानुसार निर्माण होता है। इतिहास के किसी चरण में मक्का के निवासियों को नगर के आसपास कहीं एक काला चमकदार पत्थर मिला। ऐसे पत्थर उस पहाड़ी क्षेत्र के पहाड़ों में कहीं भी नहीं पाए जाते थे। उन्होंने समझा कि यह स्वर्ग लोक से नीचे आया है। संभवतः यह किसी उल्कापिण्ड का टुकड़ा रहा होगा। लोगों ने उसे धन्य और पवित्र समझ कर काबा के एक कोने पर लगा दिया और चूमने लगे। उस समय से पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) के समय तक उन मूर्तिपूजकों और अनेकेश्वरवादियों ने भी उस पत्थर की पूजा कभी नहीं की। इस्लाम का आह्वान करने के साथ मूर्तिपूजा तथा अनेकेश्वरवाद (शिर्क, अर्थात् ईश्वर के साथ किसी को साझी, शरीक, समकक्ष बनाने) का खंडन किया जाने लगा। काले पत्थर को पूजने की परम्परा नहीं थी, लोग इसे केवल चूमते ही रहे थे इसलिए हज़रत मुहम्मद [ सल्ल . ] ने लोगों की भावनाओं को अकारण छेड़ना उचित न समझा बल्कि परम्परागत आप (सल्ल॰) भी उसे चूम लिया करते। आप ही के अनुसरण में मुसलमान उस काले पत्थर को डेढ़ हज़ार वर्ष से आज तक चूमते आ रहे हैं; इस धारणा और विश्वास के साथ कि ‘‘यह मात्र एक पत्थर है, इसमें कोई ईश्वरीय गुण या शक्ति नहीं; यह किसी को न कुछ फ़ायदा पहुंचा सकता है न नुकसान।’’ ऐसे में यह कहना कि यह पत्थर किसी देवी - देवता से संबंधित है या मुसलमानों की इससे किसी प्रकार की श्रद्धा है , बिलकुल गलत , तथ्यहीन और भ्रामक है |

पता नहीं क्या तुझे मेरे कितने असलम हुए !

पता नहीं क्या तुझे मेरे कितने असलम हुए !
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मेरी औक़ात दिखाने वाले कब के बेसर हुए 
पता नहीं एक तू बचा अना खातिर लिए हुए 
अपनी - अपनी पड़ी थी बजने को मेरे लिए 
पता नहीं क्या तुझे मेरे कितने असलम हुए !
- अहमद ' मोहित ' 
27 Jan. 2016

Feb 14, 2016

देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव

देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव
विभिन्न देशी - विदेशी संस्थाएं व संगठन बहुत ही उत्सुकता के साथ मोदी सरकार के अंतरिम बजट समेत तीसरे केन्द्रीय बजट की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इस बजट से मोदी सरकार की आर्थिक सुधारों के प्रति प्रतिबद्धता का भलीभांति पता लगेगा तथा मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिये सरकार के प्रयासों की जानकारी भी प्राप्त होगी। इसके साथ ही सरकार के निवेश वातावरण में सुधार हेतु किए जाने वाले प्रयासों की भी जानकारी मिलेगी। आशा की जाती है कि वित्तमंत्री आम परिवारों पर पडऩे वाले वित्तीय बोझ को कम करने का बजट में प्रयास करेंगे। सकल घरेलू बचत को प्रोत्साहित करने का कार्य करेंगे। इसके साथ ही भारत को पुन: एक आकर्षक निवेश केन्द्र के रूप में विकसित करने की दिशा में कुछ घोषणाएं अवश्य करेंगे। जेटली ने कहा है कि सरकार आर्थिक सुधार और वित्तीय पुर्नगठन को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है। अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाना और निवेश वातावरण को सुधारना उनकी प्राथमिकता है। इसके साथ ही देश में औद्योगिक विनिर्माण लागत को कम करना भी उनकी प्राथमिकता होगी | वित्तमंत्री अरुण जेटली बजट को बेहतर और जनोन्मुखी बनाने के लिए जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से ताल्लुक रखनेवाले संगठनों से सलाह - मशविरा कर रहे हैं | जमाअत इस्लामी हिंद (जेआईएच) ने भी आगामी आम बजट के लिए सरकार को सामाजिक क्षेत्र, ग्रामीण विकास के क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण मशविरों के साथ ही कृषि क्षेत्र को ब्याज मुक्त ऋण प्रदान करने से संबंधित कुछ सुझाव दिए है | सामाजिक विकास की योजनाओं के लिए आवंटन बढ़ाने की मांग की गई है। मुंबई में पिछले दिनों जेआईएच के केन्द्रीय पदाधिकारियों और अर्थशास्त्रियों की एक बैठक में आम बजट से जुड़े मुद्दों पर गहन विचार - विमर्श किया गया और 2016-17 के बजट के लिए चार सुझावों को बढ़ाने का एक प्रस्ताव किया गया । ये सुझाव सामाजिक क्षेत्रों, ग्रामीण विकास, संसाधन सृजन, ब्याज मुक्त ऋण आदि पर आधारित हैं। जमाअत ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से सामाजिक क्षेत्रों को अधिक धनराशि आवंटित करने की मांग की है । उसके मुताबिक़ , शिक्षा और स्वास्थ्य में निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका से इन सेवाओं का खर्च तेजी से बढ़ रहा है, जिससे ये सेवाएं आम लोगों की पहुंच से बाहर हो रही हैं। जमाअत ने देश की जीडीपी का छह प्रतिशत शिक्षा पर और तीन प्रतिशत स्वास्थ्य पर आवंटित करने का सुझाव दिया है। उसके अनुसार , किसान आत्महत्याओं के बहुत से मामलों को कृषि कर्ज से जोड़ा जाता है। सरकारें वसूल न होने लायक कर्ज और उस पर ब्याज को माफ करती रही है। ऐसे में जमाअत का सुझाव है कि किसानों को ब्याज मुक्त कर्ज की उपलब्धता एक अच्छा समाधान हो सकता है। जमाअत के प्रस्तावों में सरकार द्वारा शहरी विकास के लिए किये गए फ़ैसलों को सुखद बताते हुए कहा गया है कि इस विकास से ग्रामीण विकास प्रभावित नहीं होना चाहिए | ग्रामीण क्षेत्रों से मेट्रों और शहरों की ओर जन -विस्थापन को रोकने के लिए प्रस्तावों में कहा गया है कि बिजली , स्वास्थ्य रक्षा से जुड़ी सेवाओं और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित संभव सीमा तक विस्थापन रोका जा सकता है | यह कटु सच्चाई है कि हमारे देश में कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो पा रही है | हालत यह है कि इन क्षेत्रों में उत्पादन के ताजा आंकड़ों को शामिल किये जाने के बाद वर्ष 2014-15 के लिए आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान मामूली रूप से घटकर 7.2 प्रतिशत रह गया है। इससे पहले वर्ष के दौरान 7.3 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया था। केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा राष्ट्रीय लेखा गणना के संशोधित अनुमान हाल में ही जारी किए गए हैं , जिनमें कहा गया है कि ‘वर्ष 2014-15 और 2013-14 के लिए (वर्ष 2011-12 के स्थिर मूल्यों पर) वास्तविक जीडीपी या जीडीपी क्रमश: 105.52 लाख करोड़ रुपये और 98.39 लाख करोड़ रुपये रही , जिससे 2014-15 के दौरान 7.2 प्रतिशत और 2013-14 के दौरान 6.6 प्रतिशत की वृद्धि का पता चलता है।’ वर्ष 2013-14 के लिए भी जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान पूर्व के 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया गया है। पिछले वर्ष सीएसओ ने वर्ष 2014-15 के लिए 7.3 प्रतिशत और 2013-14 के लिए 6.9 प्रतिशत की वृद्धि दर का अनुमान व्यक्त किया था।आम बजट से आम आदमी को अगर गरीबी और महंगाई से किसी हद तक राहत मिल जाती है , तो निस्संदेह यह सरकार की बड़ी उपलब्धि होती है , लेकिन लगता है कि इस दिशा में कुछ ख़ास करने नहीं जा रही है | विकास के जिस रास्ते पर चलने का दावा सरकार द्वारा बार - बार किया जाता है , वह ऐसा रास्ता है , जहाँ बड़े पैमाने पर किसानों को बेदखल करके खेती की जमीनें हड़पी जा रही हैं | अब हरित - क्रांति की बात आई - गई हो गयी | ऊपर से कृषि कार्यों की लागत में लगातार वृद्धि और अनुदानों को कम करने के कदमों तथा मुक्त व्यापार वाले आर्थिक सुधारों ने खेती को तेज़ी से घाटे का पेशा बना दिया है !.वास्तव में खेती - किसानी का संकट बहुत गहराता जा रहा है | 
यह अनगिनत किसानों की आत्महत्याओं में भी दिखाई देता है | ब्याज पर आधारित क़र्ज़ ने किसानों को बहुत तबाह कर डाला है | कृषि उत्पादों की मुनासिब क़ीमत का न मिलना किसानों की बड़ी समस्या रही है | इसे एक मिसाल से यूँ समझ सकते हैं | गन्ना किसानों को उचित भुगतान न मिलने की पुरानी शिकायत है | इस पर भी कथित आर्थिक सुधारों के प्रबल हिमायती सी. रंगराजन की अध्यक्षता में बनी छह सदस्यीय समिति ने पिछले साल चीनी उद्योग को पूरी तरह नियन्त्रणमुक्त करने की सिफ़ारिश की है | अगर ये सिफ़ारिशें मान ली गयीं , तो देश के किसानों की मुसीबतें बेइंतिहा बढ़ जायेंगी | समिति ने सिफ़ारिश की है कि राज्य सरकारों द्वारा गन्ने का समर्थन मूल्य घोषित करने की व्यवस्था समाप्त कर देनी चाहिए और गन्ने की कीमतें मिलों और किसानों के बीच तय होनी चाहिए | अगर ऐसा हुआ , तो बहुत आशंका है कि गन्ने की कीमतें बहुत घट जायेंगी | वास्तव में हमें खेती को बदलने के लिए एक क्रांति की जरूरत है | प्रख्यात अर्थशास्त्री डी .के . जोशी कहते हैं, 'सुधारों की प्रक्रिया ने कृषि क्षेत्र की उपेक्षा की है | बढ़ती महंगाई बता रही है कि यह क्षेत्र अपनी क्षमता के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर रहा | बजट दर बजट इसके हल के लिए सिर्फ छोटे कदम ही उठाए गए | हमें हरित क्रांति जैसे किसी बदलाव की जरूरत है | ' मगर यहाँ तो चिंता अमीर वर्ग के हितों की ही होती है ! देश के बुनियादी ढांचे में सुधार का सवाल भी बड़ा अहम है . यह क्षेत्र भी भयानक संकट का सामना कर रहा है | सड़क, बिजली, पानी का बुरा हाल है | नौकरशाही की लापरवाही और भ्रष्टाचार ने इस बुनियादी क्षेत्र को बहुत बिगाड़ दिया है | अक्सर यही होता है कि पैसा आता भी है , तो उसमें का अधिकांश बिना इस्तेमाल हुए ही वापस चला जाता है | चाहे वह सड़क बनाने वाला लोकनिर्माण विभाग हो या अलग-अलग राज्यों के बिजली और जल बोर्ड, सभी प्रक्रियाओं की जटिलता में फंसे हैं | ये सभी संस्थाएं बुनियादी सुविधाओं को विकसित करने के लिए बनाई गई थीं, लेकिन इनका अच्छा प्रदर्शन सुनिश्चित करने की कोई व्यवस्था नहीं है ! आम बजट में अक्सर इस हकीक़त से जुझने की किसी रणनीति का साफ़ अभाव दिखता है | नये बजट में इस ओर ध्यान देना चाहिए | भारतीय अर्थव्यवथा राजकोषीय घाटे की वजह से ही खस्ताहाली की शिकार है . इस घाटे को कम करने का जो दावा किया जा रहा है , उस पर यकीन करना बहुत मुश्किल है .ज़रूरत है पूरी अर्थव्यवस्था पर विहंगम निगाह डालकर उसके सारे सूराखों को बंद करने की | कुछ वर्ष पहले पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने एक यथार्थपरक बात यह कही थी , मगर न तो वे खुद उस पर अमल कर सके और न ही किसी और न उनकी बात पर ध्यान दिया | उन्होंने देश की बदहाली को दूर करने की खातिर अतिसंपन्न लोगों से ज्यादा कर वसूलने की वकालत की थी | उन्होंने कहा था कि कुछ खास मौकों पर सरकार को अमीरों पर ज्यादा कर लगाने पर विचार करना चाहिए ., हालांकि, विप्रो के अजीम प्रेमजी इस सुझाव को राजनीतिक रूप से सही ठहरा चुके थे |. वहीं, औद्योगिक संगठनों ने सरकार से इस पर विचार नहीं करने का आग्रह किया था | अमीरों से ज्यादा वसूली का सुझाव सबसे पहले प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार सी. रंगराजन ने दिया था | मोदी सरकार को इस सुझाव पर भी विचार करना चाहिए |