Mar 22, 2016

क्या यह अभिव्यक्ति की आज़ादी का हनन नहीं ?

हमारा संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की आज़ादी प्रदान करता है | संविधान के अनुच्छेद 19 [ 1 ] में सभी को अभिव्यक्ति की आज़ादी प्रदान की गई है | किसी सूचना या विचार को बोलकर , लिखकर या किसी अन्य रूप में बिना किसी रोक - टोक के अभिव्यक्ति की आज़ादी ही यह आज़ादी है | भारतीय संविधान में यह प्रावधान भी है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में यह आज़ादी सीमित हो सकती है , लेकिन इस परिस्थिति से अवगत कराए बिना इस आज़ादी को सीमित नहीं किया जा सकता |इसके वावजूद सरकार ने उर्दू लेखकों और पत्रकारों पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया , जो सही मायने में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर कुठाराघात है | सरकार ने उर्दू लेखकों से कहा गया है कि वे साल में एक बार इस बात को सुनिश्चित करें कि वे देश और सरकार के खिलाफ कोई भी 'आपत्तिजनक' सामग्री प्रकाशित नहीं करेंगे, मानो वे पहले ऐसा करते थे और पहले से उन्हें गुनाहगार मान लिया गया है |  नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज (एनसीपीयूएल) ने उर्दू लेखकों के लिए उर्दू में एक डिक्लेरेशन फॉर्म भी जारी किया है , जो आपत्तिजनक है | गौरतलब है, एनसीपीयूएल मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत आने वाला संस्थान है। अंग्रेजी दैनिक 'द इंडियन एक्सप्रेस' [ 19 मार्च 2016 ]की रिपोर्ट के मुताबिक, कई उर्दू लेखकों और संपादकों को पिछले कुछ महीनों के दौरान उक्त फार्म प्राप्त हुआ है। जिसमें लेखकों को दो गवाहों के दस्तखत करवाने के लिए भी कहा गया है। फॉर्म की रुपरेखा इस प्रकार है: "मैं...... पुत्र/पुत्री... यह पुष्टि करता हूं कि मेरी किताब/मैगजीन शीर्षक... जिसे एनसीपीयूएल के मॉनीटरी असिस्टेंस स्कीम के तहत बड़ी तादाद में खरीददारी के लिए मंजूरी मिली है। इसमें कोई भी सामग्री भारत सरकार की नीतियों और राष्ट्र के हितों के खिलाफ नहीं है। यह देश के विभिन्न वर्गों और तबक़ों के बीच किसी प्रकार के नफ़रत पैदा करने की ओर संकेत नहीं करती | साथ ही यह आर्थिक तौर पर किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था से समर्थित नहीं है।" मतलब यह कि ' संकेत ' भी दंडात्मक कार्रवाई में शामिल है | यह भी चेतावनी दी गई है कि इसका उल्लंघन करने पर एनसीपीयूएल लेखक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकता है और आर्थिक सहयोग भी वापस ले सकता है। एनसीपीयूएल के डायरेक्टर इर्तिजा करीम ने बताया, "अगर एक लेखक सरकार की तरफ से आर्थिक मदद चाहता है। तो बिल्कुल ही सामग्री सरकार के विरुद्ध नहीं हो सकती। एनसीपीयूएल एक सरकारी संस्थान है और हम सरकारी कर्मचारी हैं। हम यक़ीनन सरकार के हितों की रक्षा करेंगे।" उनके अनुसार , "डिक्लेरेशन फॉर्म को शामिल करने का फैसला करीब एक साल पहले काउंसिल के सदस्यों के बीच हुई बैठक में लिया गया , जिसमें एचआरडी मंत्रालय भी शामिल है। गृह मंत्रालय को भी इस विषय में जानकारी है।" उन्होंने बताया, "काउंसिल को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई बार एक लेखक की लिखी गई किताब दूसरे के नाम से सबमिट की जाती है। इससे हम कानूनी मामलों में फंस जाते हैं , क्योंकि हमारे पास इतनी मैनपॉवर नहीं है कि हर किताब की हर एक लाइन की जांच करें। इसके लिए यह फॉर्म हमें लेखकों पर जवाबदेही डालने में मदद करेगा।" जनाब करीम ने कहा कि यह कदम पिछले साल हुई एक घटना के बाद उठाया गया , जब अब्दुल कलाम आज़ाद पर आधारित एक किताब में गलत सूचना दी गई। आप जानते ही हैं कि वे एक राष्ट्रीय हस्ती हैं और उनके संबंध में गलत जानकारी एक राष्ट्रीय मुद्दा बन सकता है। हम हर चीज की जिम्मेदारी नहीं ले सकते।" सरकार के इस क़दम की आलोचना स्वाभाविक बात है | कई प्रबुद्धजनों ने इसकी आलोचना करते हुए इसे लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध और अभिव्यक्ति - हनन का प्रयास बताया है | कोलकाता यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर और लेखक शानाज़ नबी कहते हैं कि यह मुस्लिम लेखकों को डराने - धमकाने की कोशिश है | उन्हें पिछले हफ्ते एक फॉर्म प्राप्त हुआ है , जिसके लेखन - कार्य के विवरण मांगे गए हैं | उनके साहित्यिक निबंधों- ' तन्कीदी मुतालियात' के बारे में एक चिट्ठी भी थी। इन आलोचनात्मक निबन्धों को एनसीपीयूएल ने अपने संकलन के लिए 2016 में चयनित किया गया। नबी ने कहा, "एक लेखक से डिक्लेरेशन पर दो गवाहों को दस्तखत करवाने के लिए कहना अपमान है और लेखकों की अभिव्यक्ति के अधिकार पर सीधा हमला है। उर्दू के एक मशहूर लेखक एवं शायर जनाब इन्तिज़ार नईम का कहना है कि पहले से ही गुनाहगार मानकर लेखकों के ज़मीर का सौदा करना हर तरह से निंदनीय है | जमशेदपुर से प्रकाशित एक छमाही पत्रिका 'रावी ' के संपादक,अबरार मुजीब ने कहा, साहित्य का बिंदु है- सरकार की आलोचना करना और समाज की कमियों को उजागर करना ...... लेकिन इस तरह के अनुचित शब्दों में लिखा गया घोषणा पत्र हर किसी को कमजोर करता है और इससे सरकार को काफी ताकत मिलेगी | अब तो लेखक असहमत होने पर बड़ी आसानी से सरकार के हाथों दबा दिया जाएगा !"

Mar 20, 2016

मुसलमानों की उपेक्षा कब तक ?

दशक पर दशक बीतते जा रहे हैं , मगर देश के मुसलमानों को आर्थिक रूप से मज़बूत करने की कभी ठोस और प्रभावी सरकारी कोशिश नहीं की गई और न की जा रही है | सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के मंज़रे आम होने के एक दशक बाद भी मुसलमानों की आर्थिक बदहाली को दूर करने के लिए कोई क़दम नहीं उठाए गए ! हालत इतनी बदतर है कि सरकारी स्तर पर अक्सर उनके साथ उपेक्षा की नीति अपनाई जाती है , यहाँ तक कि सरकारी बैंक उन्हें लोन देने में आनाकानी करते हैं | मुंबई के आरटीआई कार्यकर्ता एम. ए. खालिद ने पब्लिक सेक्टर के आधा दर्जन बैंकों से आरटीआई के जरिए हाल में यह जानकारी हासिल की है कि देश के सरकारी बैंक मुसलमानों को प्राथमिक क्षेत्र के लोन देने में काफी फिसड्डी साबित हो रहे हैं | जानकारी के अनुसार , लगभग आधा दर्जन बैंकों में पिछले डेढ़ सालों में सभी प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों में मिलने वाले लोन का महज 2 प्रतिशत ही मुसलमानों को मिल सका है। ये आंकड़े वित्त वर्ष 2014-15 और 2015 मार्च से 30 सितंबर, 2015 तक के हैं। यह अलग बात है कि मुसलमानों को लोन देने को लेकर कोई सरकारी दिशा-निर्देश नहीं हैं , लेकिन बैंंक मानते हैं कि दिए जाने वाले लोन का 15% अल्पसंख्यकों को देना होता है। भारत की कुल जनसंख्या में मुसलमानों की तादाद 14.2 प्रतिशत (2011 की जनगणना के हिसाब से) है। मुसलमानों की यह मांग रही है कि बैंकों से मिलने वाले लोन में बढ़ोतरी होनी चाहिए। आरटीआई से मिली जानकारी में खालिद ने पाया कि पंजाब एंड सिंध बैंक, इलाहाबाद बैंक, कॉर्पोरेशन बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, विजया बैंक और आंध्र बैंक में से केवल इलाहाबाद बैंक में ही मुस्लिमों को लोन देने की दर में बढ़ोतरी हुई है। इस बैंक में 31 मार्च 2015 तक मुसलमानों को दिए जाने वाले लोन की दर 7.07 % थी, जो इस साल सितंबर तक 7.19 प्रतिशत हो गई। कॉर्पोरेशन बैंक इस मामले में सबसे पीछे है। इस बैंक में 31 मार्च 2015 तक मुसलमानों को मिलने वाले लोन की दर केवल 1.90 प्रतिशत थी , जो सितंबर 15 के अंत में केवल 1.95 प्रतिशत तक पहुंची। आंकड़ों से यह साफ़ है कि इस क्षेत्र में लोन के रूप में मुस्लिमों को मिलने वाले शेयर में सुधार की कोशिशें नहीं की गईं , जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा मौजूद है | जब इस बारे में प्रमुख अंग्रेज़ी दैनिक ' टाइम्स ऑफ इंडिया ' ने पंजाब एंड सिंध बैंक, इलाहाबाद बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र और आंध्र बैंक से स्पष्टीकरण के लिए संपर्क किया था , तो किसी ने भी जवाब नहीं दिया। केवल बैंक आफ़ महाराष्ट्र के एक अधिकारी ने फोन पर बताया, ‘हम और ब्रांच खोल कर मुसलमानों तक पहुंच रहे हैं।’ प्रमुख बैंकरों की एक कमेटी ने अध्ययन में पाया कि सरकार अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों को लोन देने के लिए तैयार नहीं है | ध्यान रहे कि बैंक का लोन वित्तीय इनक्लूजन का संकेतक होता है | गुजरात इस मामले में फिड्डी है| देश के 121 अल्पसंख्यक बहुल जिलों में सिर्फ 26 फीसदी खाते अल्पसंख्यकों के हैं, जबकि लोन र्सिर्फ 12 फीसदी है | उन अल्पसंख्यकों में भी मुसलमानों को मिलने वाला लोन न के बराबर है | टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस के उपनिदेशक डॉ. अब्दुल शबान ने कहा, ‘कुछ साल पहले किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि मुसलमानों की आर्थिक स्थिति उनके इलाकों में बैंकों की उपस्थिति न होने की मुख्य वजहों में से एक है।’ सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में यह भी है कि मुस्लिम केंद्रित इलाकों को कुछ बैंकों द्वारा ‘नेगेटिव’ या ‘रेड’ जोन में रखा गया था। पैनल ने पाया कि चूंकि कई मुसलमानों का खुद का रोजगार है, लिहाजा लोन में बढ़ोतरी उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में मदद करेगी | दूसरी ओर इस अफ़सोसनाक हकीक़त को भी समझना ज़रुरी है कि मुसलमानों के लिए लोन की पात्रता जान - बूझकर मुश्किल या यूँ कहें असंभव बना दी गई है | 
यह निष्कर्ष है सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशों के क्रियान्वयन के एक अध्ययन का | ' ए रिव्यू ऑफ सोशली इनक्लूसिव डेवलपमेंट सिंस 2006 एंड रिकम्नडेशन ऑन पॉलिसीज एंड प्रोग्राम्स’ नामक 189 पेज की रिपोर्ट में यह बात कही गई है कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास और वित्त निगम (एनएमडीएफसी) से कर्ज लेने की योग्यता इतनी सीमित है कि दिल्ली के कुछ भिखारी ही इसके पात्र हो सकते हैं | मुस्लिम समुदाय को फायदा पहुंचाने वाले कार्यक्रमों की परिकल्पना सही नहीं है और वे लक्ष्य से बहुत दूर है | यह बात भी कही गई है कि अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय अल्पसंख्यकों की समस्याओं के मूल कारणों का निवारण नहीं कर रहा है और सच्चर कमेटी के अनुपालन की सरकारी नीतियों के बावजूद मुस्लिम समुदाय का हाशिये पर जाना और उनकी खस्ताहाली लगातार जारी है | इस अध्ययन में बताया गया है कि मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिकऔर शैक्षिक हालत में बदलाव नहीं आया है | उल्लेखनीय है कि देश में मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक दशा जानने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री डॉ .मनमोहन सिंह ने 2005 में दिल्ली हाइकोर्ट केपूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की थी | 403 पेज की रिपोर्ट को 30 नवंबर, 2006 को लोकसभा में पेश किया गया , जिसके द्वारा पहली बार मालूम हुआ कि भारतीय मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जाति-जनजाति से भी अधिक खराब है | कमेटी ने भारतीय मुसलमानों को समान अवसर मुहैया कराने के लिए कई तरह के सुझाव दिए थे और साथ ही उचित रणनीति अपनाने का भी सुझाव दिया था | सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज की एक रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है, “मुस्लिम परिवारों और समुदायों के लिए तय फंड और सेवाएं उन इलाकों में भेज दी जाती हैं, जहां मुसलमानों की संख्या कम है या न के बराबर है !” सामाजिक न्याय और आधिकारिता पर संसद की शीर्ष समिति की 27वीं रिपोर्ट के मुताबिक, “समिति ने पाया कि माइनॉरिटी कंसंट्रेशन डिस्ट्रिक्ट (एमसीडी) में पैसे का पूरा इस्तेमाल नहीं किया | यही नहीं, फंड जिला स्तर पर आवंटित किया जाता है और यह उन ब्लॉक में ज्यादा चला गया जहां अल्पसंख्यकों की तादाद कम है |”रोजगार के मामले में यह चैंकाने वाला है कि मनरेगा में मुसलमानों की भीगीदारी नगण्य है. उन्हें जॉब कार्ड जारी करने के समय से ही नजरअंदाज किया जाता है | यही नहीं मुसलमानों को ‘मास आंगनवाड़ी’ कार्यक्रम, प्राइमरी और एलीमेंटरी शिक्षा कार्यक्रम और मास माइक्रो क्रेडिट प्रोग्राम जैसे प्रमुख कार्यक्रमों में शामिल नहीं किया गया है | अब किसी को शायद समान अवसर आयोग याद ही नहीं रहा , जबकि संप्रग सरकार की मनरेगा जैसी अनेक योजनाएं आज भी संचालित की जा रही हैं ! यह एक ऐसा आयोग था , जिससे मुसलमानों को किसी हद तक न्याय और तटस्थता की उम्मीद थी , मगर वर्तमान सरकार ने अपने कार्यकाल के लगभग दो वर्ष पूरे करनेवाली है , फिर भी इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया है ! सरकार की इस उदासीनता को लेकर तरह - तरह के सवालों का उठाना स्वाभाविक है | यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि सरकार अल्पसंख्यक कल्याण की ओर पूरी तरह गाफ़िल है और वह कोई ऐसा काम नहीं करना चाहती , जिससे मुसलमानों को सीधे तौर कोई फ़ायदा पहुंचे |ज़ाहिर सरकार की ऐसी कोई अघोषित नीति है , तो उसका त्याग करना ही संविधान , देश और समाज की मर्यादा के नितांत अनुकूल है |




जस्टिस पाशा का अजीबोगरीब बयान

बहुपतिवाद ग़ैरइन्सानी और असभ्य सोच

केरल हाईकोर्ट के जज जस्टिस बी कमाल पाशा ने पिछले दिनों मुस्लिम धर्मगुरुओं की मंशा पर सवाल उठाते हुए कुछ अजीबो गरीब बातें कही हैं | उन्होंने मुस्लिम धर्मगुरुओं से पूछा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ को आधार मानकर अगर मुस्लिम पुरुष चार बीवियां रख सकते हैं तो मुस्लिम महिलाएं चार पति क्यों नहीं रख सकती हैं ? विगत 6 मार्च 16 को कोझीकोड [ केरल ] में महिला वकीलों के एनजीओ की ओर से आयोजित एक सेमीनार में जस्टिस पाशा ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ महिलाओं के खिलाफ कई नियमों से भरा पड़ा है। जस्टिस पाशा ने बहुविवाह के लिए मुस्लिम धार्मिक नेताओं को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि नाजुक मुद्दों पर आत्ममंथन की जरूरत है। उन्होंने कहा, मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक , एक आदमी एक साथ चार तक शादी कर सकता है , हालांकि कई मुस्लिम देशों में बहुविवाह पर पाबंदी लग चुकी है , लेकिन भारत में यह जारी है। उन्होंने कहा कि कुरआन में अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या के बावजूद महिलाओं के अधिकारों से वंचित रखा जाता है। धार्मिक नेताओं को आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या वे एकतरफ़ा फैसला देने की योग्यता रखते हैं | लोगों को भी ऐसे लोगों की योग्यता को ध्यान में रखना चाहिए जो इस तरह के फ़ैसले देते हैं | उन्होंने कहा कि संविधान में महिलाओं और पुरुषों को बराबरी की गारंटी दी गई है | जस्टिस पाशा ने यह भी कहा कि देश के सभी क़ानून अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के दायरे में आते हैं जो क्रमश: समानता के अधिकार और जीवन के अधिकार की गारंटी देते हैं | ऐसा लगता है कि जस्टिस पाशा को न तो नैसर्गिक क़ानूनों का कुछ ज्ञान है और न ही इस्लामी क़ानूनों का ! वे ऐसी बातें कह रहे हैं , जो शालीन सभ्यता से ख़ारिज हैं | सभी जानते हैं कि सभ्यता ने कभी महिला को एक से अधिक शादी की आज़ादी दी | केवल महाभारत में एक कथा के अनुसार , द्रोपदी की शादी पांच पतियों [ पांडवों ] से हुई थी , जबकि स्वयंवर में द्रोपदी ने एक ही पति अर्जुन को चुना था | लेकिन यह अपवाद समाज की मान्यता नहीं प्राप्त कर सका | रही इस्लाम की बात , तो यह शालीन , सभ्यता और शिष्टाचार को शिखर तक पहुँचाने का धर्म है , किसकी नज़र में दुनिया की सारी दौलत से ज्यादा कीमती चीज पाक दामन बीबी हैं। जस्टिस पाशा फ़रमाते हैं कि मुसलमान मर्दों को चार तक पत्नियाँ रखने का अधिकार है , तो महिलाओं को क्यों नहीं बहुपति रखने का अधिकार है ? पहले भी इस तरह के सवाल उठाये जाते रहे हैं | यह भी कहा गया कि इस्लाम में बहुपत्नीवाद की अनुमति क्यों हैं? क्या यह महिलाओं पर खुला जुल्म नहीं हैं ? पहली बात तो यह है कि इस्लाम एक से अधिक शादी करने की सशर्त अनुमति देता है | जो पत्नियों में न्याय की शर्त को पूरा नहीं कर सकते , एक से अधिक शादी भी नहीं कर सकते |इस्लाम के अंतिम पैगंबर हज़रत मुहम्मद [ सल्ल . ] के आगमन से पहले अरब मे पत्नियों की संख्या पर कोर्इ हदबन्दी नही थी। इस्लाम ने पुरुष के स्वभाव और अमली जरूरतों का ध्यान रख कर इस असीमित संख्या को चार तक सीमित रखा। 
उस समय अरब दुनिया में शादी - विवाह का कोर्इ विशेष नियम और सिद्धान्त न था। गिरोहों और कबीलों में पत्नियां और दासियां रखने की कोई सीमा न थी | जब चाहा तलाक दे दी और जब चाहा शादी कर ली | इस्लाम ने पत्नियों की संख्या को सीमित कर दिया और तलाक के सम्बन्ध में उचित नियमों और शिष्टाचार की पाबन्दी का हुक्म दिया | कुरआन में है - '' और अगर तुमको अंदेशा हो कि यतीमों के साथ इन्साफ़ न कर सकोगे , तो जो औरतें तुम्हें पसंद आएं उनमें से दो - दो , तीन - तीन , चार - चार से निकाह कर लो | लेकिन अगर तुम्हें अंदेशा हो कि उनके साथ इन्साफ़ न कर सकोगे , तो फिर एक ही पत्नी रखो या उन औरतों को अपने दाम्पत्य जीवन में लाओ , जो तुम्हारे क़ब्ज़े में आई हैं , बेइन्साफी से बचने के लिए यह अधिक अच्छा है '' [ 4 - 3 ] | इस्लाम हो या दुनिया का कोई भी धर्म महिला को एक से अधिक पति रखने का अधिकार नहीं देते , क्योंकि इसके नुक़सान ही नुक़सान हैं | अगर एक पुरुष के पास एक से अधिक पत्नियाँ हों तो ऐसे विवाह से जन्मे बच्चे के माता - पिता का पता आसानी से लग सकता है , लेकिन वहीँ अगर एक महिला के पास एक से ज़्यादा पति हों तो केवल माँ का पता चलेगा, बाप का नहीं | इस्लाम माता - पिता की पहचान को बहुत ज़्यादा महत्त्व देता है | मनोचिकित्सक कहते है कि ऐसे बच्चे मानसिक आघात , उन्माद और पागलपन के शिकार हो जाते है , जो अपने माता - पिता विशेष कर अपने पिता का नाम नहीं जानते | अक्सर उनका बचपन खुशियों से रिक्त होता है| इसी कारण वेश्याओं के बच्चो का बचपन अक्सर स्वस्थ नहीं होता | यदि ऐसे विवाह से जन्मे बच्चों का किसी स्कूल में दाख़िला कराया जाए और उसकी माता से उस बच्चे के पिता का नाम पूछा जाए , तो माता को एक से अधिक पतियों के नाम बताने पड़ सकते हैं |.सक्षमता की दृष्टि से भी बहुपत्नीवाद ही अधिक व्यावहारिक है | समाज विज्ञान के अनुसार एक से ज़्यादा पत्नी रखने वाले पुरुष को एक पति के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना आसान होता है , जबकि अनेक पति रखने वाली महिला के लिए एक पत्नी के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना संभव नहीं है, विशेषकर मासिकधर्म के समय जबकि एक स्त्री तीव्र मानसिक और व्यावहारिक परिवर्तन से गुज़रती है | एक से ज़्यादा पति वाली महिला के एक ही समय में कई यौन साझी होंगे , जिसकी वजह से उनमे यौन सम्बन्धी रोगों में ग्रस्त होने की आशंका अधिक होंगी और यह रोग उसके पतियों को भी लग सकता है चाहे उसके सभी पति उस महिला के अन्य किसी स्त्री के साथ यौन समंध से मुक्त हों | यह स्थिति कई पत्नियाँ रखने वाले पुरुष के साथ घटित नहीं होती है | इस्लामी प्रावधान से निश्चित रूप से समाज में शान्ति की स्थापना होती है | अतः जस्टिस पाशा का उक्त बयान न सिर्फ़ समाज में अशांति को बढ़ावा देनेवाला है , बल्कि हर दृष्टि से निंदनीय और अवांछित है | 

कौन , कितना सांप्रदायिक ?

कौन , कितना सांप्रदायिक ?

कौन कितना सांप्रदायिक है और कौन अपने मुंह से कितना ज़हर उगलता है , इसे लेकर मानो नेताओं में होड़ लगी हुई है ! बनारस में दंगा करवारकर शिवसेना को खड़ी करने की वकालत करने वाले शिवसेना के यूपी प्रमुख अनिल सिंह को पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पार्टी से बाहर निकाल दिया हो , लेकिन संप्रदायीकरण और सांप्रदायिक मानसिकता के विरुद्ध कोई नहीं बोलता , जिसकी आज सख्त ज़रूरत है। 
उल्लेखनीय है कि अनिल सिंह ने जिस शिवसेना नेता अरुण पाठक से फोन पर बात की थी, उसे भी पार्टी से बाहर निकाल दिया गया है और यह छद्म संकेत देने की कोशिश की गई है कि अब शिवसेना सुधर गई है और किसी भी तरह की सांप्रदायिकता को पसंद नहीं करती ! हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दंगे करवाकर पार्टी को यूपी में खड़ा करने की वकालत का ऑडियो क्लिप ' नवभारत टाइम्स ' ने प्रकाशित किया था, जिसके बाद शिवसेना ने पार्टी नेताओं के विरुद्ध कार्रवाई की | क्लिप में अनिल दंगा, बवाल करवाने को कह रहे हैं। पिछले साल अक्टूबर में हुई बातचीत की इस क्लिप की जांच खुद एडीजी (कानून एवं व्यवस्था) दलजीत सिंह चौधरी कर रहे हैं। 
अरुण मान रहे हैं कि क्लिप में उनकी आवाज है। पिछले साल सितंबर में प्रतिमा विसर्जन के मसले पर निकली प्रतिकार यात्रा में अरुण ने शिवसेना की अगुआई की थी। बातचीत इसी संदर्भ में है। प्राप्त विवरण के अनुसार , ' नवभारत टाइम्स ' ने अरुण पाठक को ऑडियो क्लिप के अंश वॉट्सऐप पर भेजे। उन्होंने मान लिया है कि यह आवाज उन्हीं की है। साथ ही यह भी दावा किया है कि दूसरी आवाज शिवसेना के यूपी प्रमुख अनिल सिंह की है। ' नवभारत टाइम्स ' ने शिवसेना के नेता अनिल सिंह को भी ऑडियो क्लिप भेजने के बाद फोन किया था , पर उन्होंने फोन नहीं उठाया। 
अपर पुलिस महानिदेशक (कानून एवं व्यवस्था) दलजीत सिंह चौधरी ने इस मामले में कहा कि ऑडियो क्लिप की जांच करवाई जा रही है। मामला गंभीर है। आवाज की पहचान होने के बाद दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी। उधर, शिवसेना के सांसद चंद्रकांत खेड़े ने इस मुद्दे पर कहा, 'शिवसेना ऐसी हरकतों को बढ़ावा नहीं देती | ' क्लिप में अनिल सिंह का बयान है कि जब तक दंगे - फ़साद नहीं कराओगे शिवसेना कैसे खड़ीं होगी |
इस क्लिप से यह बात तो बिलकुल साफ़ है कि राजनीतिक मज़बूती के लिए सांप्रदायिक दंगों का सहारा लिया जाता है और सांप्रदायिकता को हतोत्साहित नहीं किया जाता | यह घटना भी बताती है कि इस समस्या के निदान हेतु ईमानदारी के साथ अब तक प्रयास नहीं किये गये हैं , इसलिए देशवासियों को इस दिशा में आगे क़दम बढ़ाना होगा | उन्हें इस ज़हर को समाप्त करने के लिए ऐसे लोगों का समर्थन करना चाहिए , जो साम्प्रदायिकता के पूरी तरह ख़िलाफ़ हों और इस ज़हर को समूल नष्ट करने का संकल्प रखते हों |

Mar 8, 2016

बेसिर - पैर के बयानों की बुरी लत

 बेसिर - पैर के बयानों की बुरी लत 

अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में सांप्रदायिकता और फासीवाद को बढ़ावा मिलना देश और समाज की शांति और सद्भाव के नितांत प्रतिकूल है | दुर्भाग्य से ऐसे बयान रहते हैं , जिनसे इंसानियत आहत होती है | अभी चंद दिन पहले उत्तर कन्नड़ से पांच बार के भाजपा सांसद अनंत कुमार हेगड़े पर मुसलमानों के खिलाफ टिप्‍पणी करने पर धार्मिक भावनाएं आहत करने का मामला दर्ज किया गया है। हेगड़े ने गत 28 फ़रवरी को कर्नाटक के सिरसी में इस्लाम को आतंक के टाइम बम के रूप में बताया था और कहा था कि इसे खत्म किए जाने की जरूरत है। हेगड़े ने जेएनयू के गिरफ्तार छात्र उमर खालिद के पिता के बयानों को प्रसारित करने के लिए मीडिया पर आतंकियों की मदद करने का आरोप भी लगाया। हेगड़े के खिलाफ सिरसी थाने में धारा 295 (A) के तहत मामला दर्ज किया गया है। युवा कांग्रेस के दक्षिण कन्‍नड़ यूनिट के उपाध्यक्ष लुकमान बंटवाल की शिकायत पर यह मामला दर्ज किया गया है। दक्षिण कन्नड़ के काजी अहमद मुसलियार ने राज्य सरकार से हेगड़े के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है , जबकि राज्य के स्वास्थ्य मंत्री यू टी खदेर ने गृह मंत्री जी. परमेश्‍वर से हेगड़े के खिलाफ संज्ञान लेने को कहा है।
पिछले दिनों एक केन्द्रीय मंत्री ने आगरा में विवादस्पद बयान दिया | मगर हमारे देश में नेता की प्रवृति ही ऐसी होती है कि एक दिन पहले जो कहते है, उसके दूसरे दिन उस बात से अक्सर मुकर जाते है। इसी का नमूना पेश किया केंद्रीय राज्यमंत्री राम शंकर कठेरिया ने। एक दिन पहले ही आगरा में अरुण माहौर की शोकसभा में पहुंचे कठेरिया ने आग उगलते हुए बदले का भाषण दिया, लेकिन अगले ही दिन कह दिया कि नहीं दिया था ऐसा बयान। कठेरिया ने कहा कि मेरे बयान के बारे में जो भी छपा है, वो पूरी तरह झूठ है। 
मैंने किसी समुदाय विशेष का नाम नहीं लिया। हांलाकि कठेरिया ने कबूला कि उन्होने कहा था कि हत्या करने वालों को फांसी दो। असत्य भाषण और सांप्रदायिक घृणा फैलाने के आरोप अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष कमलेश तिवारी पहले से ही जेल में बंद हैं | इस्लाम और मुसलमानों को जो लोग निशाना बनाते हैं , उन्हें भी यह पता होता है कि सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता | इनमें से कुछ लोग ऐसे भी होते हैं , जो सत्य को बेझिझक स्वीकार कर लेते हैं | इनमें अनार्ड वॉन डूर्न भी शामिल हैं , जो नीदरलैंड की घोर दक्षिणपंथी पार्टी पीवीवी यानी फ्रीडम पार्टी के महत्वपूर्ण सदस्य रह चुके हैं | यह वही पार्टी है जो अपने इस्लाम विरोधी सोच और इसके कुख्यात नेता गिर्टी वाइल्डर्स के लिए जानी जाती रही है | इसके प्रमुख नेता अनार्ड वॉन डूर्न ने 2013 के मार्च में इस्लाम धर्म क़बूल करने की घोषणा की थी | नीदरलैंड के सांसद गिर्टी वाइल्डर्स ने 2008 में एक इस्लाम विरोधी फ़िल्म 'फ़ितना' बनाई थी | इसके विरोध में पूरे विश्व में तीखी प्रतिक्रियाएं हुईं थीं | अनार्ड पार्टी के मुसलमानों से जुड़े विवादास्पद विचारों के बारे में जाने जाते थे | तब वे भी इस्लाम विरोधी थे | वे कहते हैं, "उस समय पश्चिमी यूरोप और नीदरलैंड के बहुत सारे लोगों की तरह ही मेरी सोच भी इस्लाम विरोधी थी. जैसे कि मैं ये सोचता था कि इस्लाम बेहद असहिष्णु है, महिलाओं के साथ ज्यादती करता है, आतंकवाद को बढ़ावा देता है | पूरी दुनिया में इस्लाम के ख़िलाफ़ इस तरह के पूर्वाग्रह प्रचलित हैं | " साल 2008 में जो इस्लाम विरोधी फ़िल्म 'फ़ितना' बनी थी , तब अनार्ड ने उसके प्रचार प्रसार में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था | इस फ़िल्म से मुसलमानों की भावनाओं को काफ़ी ठेस पहुंची थी | वे बताते हैं, "'फ़ितना' पीवीवी ने बनाई थी | मैं तब पीवीवी का सदस्य था. मगर मैं 'फ़ितना' के निर्माण में कहीं से शामिल नहीं था| हां, इसके वितरण और प्रोमोशन की हिस्सा ज़रूर था | " हमारे देश के एक प्रमुख संत स्वामी लक्ष्मी शंकराचार्य जी ने भी जब सत्यता और वास्तविकता को समझा , तो उनकी विचारधारा पूरी तरह बदल गई | वे लिखते हैं , '' कर्इ साल पहले ' दैनिक जागरण ' मे श्री बलराज मधोक का लेख ‘दंगे क्यों होते हैं?’’ पढ़ा था। इस लेख में हिन्दू-मुस्लिम दंगा होने का कारण कुरआन मजीद में काफिरों से लड़ने के लिए अल्लाह के फरमान बताए गए थे। लेख मे कुरआन मजीद की वे आयते भी दी गर्इ थी। इसके बाद दिल्ली से प्रकाशित एक पैम्फलेट ‘कुरआन की चौबीस आयतें, जो अन्य धर्मावलम्बियों से झगड़ा करने का आदेश देती हैं’ किसी व्यक्ति ने मुझे दिया। इसे पढ़ने के बाद मेरे मन में जिज्ञासा हुर्इ कि मैं कुरआन पढूं। इस्लामी पुस्तकों की दुकान से कुरआन का हिन्दी अनुवाद मुझे मिला। कुरआन मजीद के इस हिन्दी अनुवाद मे वे सभी आयतें मिली, जो पैम्फलेट मे लिखी थी। इससे मेरे मन में यह गलत धारणा बनी कि इतिहास में हिन्दू राजाओं व मुस्लिम बादशाहों के बीच जंग में हुर्इ मार-काट तथा आज के दंगों और आतंकवाद का कारण इस्लाम हैं। दिमाग भ्रमित हो चुका था, इसलिए हर आतंकवादी घटना मुझे इस्लाम से जुड़ती दिखार्इ देने लगी। '' स्वामी जी आगे लिखते हैं कि '' इस्लाम, इतिहास और आज की घटनाओं को जोड़ते हुए मैने एक पुस्तक लिख डाली ‘इस्लामिक आतंकवाद का इतिहास’ जिसका अंग्रेजी अनुवाद ‘ The History Of Islamic Terrorism” के नाम से सुदर्शन प्रकाशन, सीता कुंज, लिबर्टी गार्डेन, रोड नम्बर-3, मलाड (पश्चिम), मुम्बर्इ-400064 से प्रकाशित हुआ। फिर मैने इस्लाम धर्म के विद्वानों (उलेमा) के बयानों को पढ़ा कि इस्लाम का आतंकवाद से कोर्इ सम्बन्ध नही हैं। इस्लाम प्रेम, सदभावना व भार्इचारे का धर्म हैं। किसी बेगुनाह को मारना इस्लाम धर्म के विरूद्ध हैं। आतंकवाद के खिलाफ फतवा (धर्मादेश) भी जारी हुआ। इसके बाद मैंने कुरआन मजीद में जिहाद के लिए आर्इ आयतों के बारे में जानने के लिए मुस्लिम विद्वानों से सम्पर्क किया, जिन्होने मुझे बताया कि कुरआन मजीद की आयतों भिन्न-भिन्न तत्कालीन परिस्थितियों में उतरी। इसलिए कुरआन मजीद का केवल अनुवाद ही न देखकर यह भी देखा जाना जरूरी हैं कि कौन-सी आयत किस परिस्थिति में उतरी, तभी उसका सही मतलब और मकसद पता चल पाएगा। साथ ही ध्यान देने योग्य हैं कि कुरआन इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल0) पर उतारा गया था। अत: कुरआन को सही मायने मे जानने के लिए पैगम्बर मुहम्मद(सल्ल0) की जीवनी से परिचित होना भी जरूरी हैं। विद्वानों ने मुझसे कहा, ‘‘ आपने कुरआन मजीद की जिन आयतों का हिन्दी अनुवाद अपनी किताब से लिया हैं, वे आयतें उन अत्याचारी काफिर और मुशरिक लोगो के लिए उतारी गर्इ जो अल्लाह के रसूल (सल्ल0) से लड़ार्इ करते और मुल्क में फसाद करने के लिए दौड़ते फिरते थे। सत्य धर्म की राह में रोड़ा डालनेवाले ऐसे लोगो के विरूद्ध ही कुरआन में जिहाद का फरमान हैं।’’ उन्होने मुझसे कहा कि इस्लाम की सही जानकारी न होने के कारण लोग कुरआन मजीद की पवित्र आयतों का मतलब समझ नहीं पाते। यदि आपने पूरे कुरआन मजीद के साथ हजरत मुहम्मद (सल्ल0) की जीवनी भी पढ़ी होती, तो आप भ्रमित न होते। मुस्लिम विद्वानों के सुझाव के अनुसार मैने सबसे पहले पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) की जीवनी पढ़ी। जीवनी पढ़ने के बाद इसी नजरिए से जब मन की शुद्धता के साथ कुरआन मजीद शुरू से अन्त तक पढ़ा, तो मुझे कुरआन मजीद की आयतों का सही मतलब और मकसद समझ में आने लगा। '' स्वामी जी लिखते हैं , ''सत्य सामने आने के बाद मुझे अपनी भूल का एहसास हुआ कि मैं अनजाने में भ्रमित था और इसी कारण ही मैने अपनी उक्त किताब ‘इस्लामिक आतंकवाद का इतिहास’ में आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ा हैं जिसका मुझे हार्दिक खेद हैं। मैं अल्लाह से, पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल0) से और सभी मुस्लिम भाइयों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगता हूं तथा अज्ञानता मे लिखे व बोले शब्दों को वापस लेता हूं। जनता से मेरी अपील हैं कि ‘इस्लामिक आतंकवाद का इतिहास ' पुस्तक में जो लिखा हैं उसे शून्य समझें। ''