May 28, 2016

उस हैवानियत की याद


1987 में हुए हाशिमपुरा [ मलियाना , मेरठ ] कांड के गत 22 मई 2016 को 29 साल हो गये , मगर अभी तक पीड़ितों को न्याय नहीं मिल सका है | वास्तव में यह अमानवीयता का नंगा नाच था , जिसने देश की राजनीति को हिलाकर रख दिया था। लोग बताते हैं कि अप्रैल 1987 में दंगा हुआ और उसे काबू में कर लिया गया। 18 मई को फिर दंगा भड़का। हाशिमपुरा और आसपास के इलाके शांत थे। इसी दौरान एक युवक की हत्या से शहर का माहौल बिगड़ गया। बाद में जो हुआ , वह बड़ा ही हृदय विदारक है | किसी ने भाई तो किसी ने पति को खोया। किसी ने अपने मां-बाप को खो दिया। अब मरहम के लिए हाईकोर्ट में लड़ाई लड़ी जा रही है। एक मामला दिल्ली हाईकोर्ट , तो एक मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में विचाराधीन है। हालांकि दिल्ली की विशेष अदालत ने गत वर्ष हाशिमपुरा कांड के आरोपी पीएसी जवानों, अधिकारियों को बरी कर दिया। अब यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में विचाराधीन है।
इस कांड में पी ए सी ने मुसलमानों को एक लाइन में खड़ा करके 42 रोज़ेदार मुसलमानों की हत्या कर दी थी | पांच लोग गोली लगने के बाद भी बच गए। इसके बाद शुरू हुई जिंदगी की जिद्दोजहद और न्याय की जंग आज भी बदस्तूर जारी है। पिछले दिनों 22 मई - रविवार को हाशिमपुरा कांड की 29वीं बरसी पर जलसा हुआ। मारे गए लोगों के लिए मगफिरत को नम आंखों से दुआ की गई| हाशिमपुरा इंसाफ कमेटी की ओर से हाशिमपुरा के बाहर मेन रोड पर दुआइया जलसा' हुआ। इसमें वक्ताओं ने उक्त घटना में अब तक न्याय न मिलने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को ज़िम्मेदार ठहराया |
जलसे की सदारत करते हुए शहर काजी जनाब जैनुस साजिदीन ने कहा कि आज का दिन मेरठ के इतिहास का काला दिन है। मुल्क पर मुसलमानों का बड़ा अहसान है। मुसलमानों ने आपसी सद्भाव, भाईचारे और मिलजुलकर रहने के माहौल को बढ़ाया। उन्होंने कहा कि इस मामले में अदालत से जिस तरह के फैसले की उम्मीद थी, वैसा नहीं मिला। यह लड़ाई हिन्दू- मुसलमान की नहीं, बल्कि जुल्म और इंसाफ के बीच है। उन्होंने इस मामले में सियासी दलों की भी आलोचना की | दूसरी ओर रिहाई मंच ने समाजवादी पार्टी पर हाशिमपुरा जनसंहार के दोषी पुलिस व पीएसी अधिकारियों को बचाने का आरोप लगाते हुए कहा है कि इस मामले में इंसाफ न मिल पाने के सबसे बड़े दोषी सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव हैं।
हाशिमपुरा जनसंहार की 29 वीं बरसी पर लखनऊ के लाटूश रोड स्थित रिहाई मंच कार्यालय पर हुई बैठक में मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि घटना के दिन पीएसी और पुलिस बल की तैनाती से सम्बंधित सारे सबूत जो दोषियों को सजा दिलवाने के लिए प्रयाप्त होते, 1 अप्रेल 2006 को साजिशन नष्ट कर दिया गया। उन्होंने कहा कि तब मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे और इतने अहम मुद्दे के सबूतों को नष्ट करने का काम बिना मुख्यमंत्री की सहमति के नहीं हो सकता था। उन्होंने कहा कि हाशिमपुरा जनसंहार की हर बरसी मुसलमानों को सपा जैसी तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों द्वारा दिए गए धोखे की याद दिलाता है।
रिहाई मंच अध्यक्ष ने कहा कि 22 मई 1987 को हुए हाशिमपुरा में 42 मुसलमानों को पीएसी और पुलिस ने उनके मोहल्ले से उठाकर गंग नहर में मार कर फेंक दिया था और उसके दो दिन बाद मेरठ के ही मलियाना मोहल्ले में पीएसी और पुलिस द्वारा 72 मुसलमानों की हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद मुलायम सिंह ने हाशिमपुरा और मलियाना को इंसाफ दिलाने का वादा करते हुए मुसलमानों से चौराहों-चौराहों पर वोट मांगा था। लेकिन तीन बार मुख्यमंत्री रह कर उन्होंने सिर्फ दोषी पुलिस अधिकारियों को प्रमोशन देने का ही काम नहीं किया बल्कि उनके कार्यकाल में 1 अप्रेल 2006 को हाशिमपुरा के हत्यारे पीएसी और पुलिस अधिकारियों की घटना के रात की तैनाती से जुड़े सभी दस्तावेजी सबूत नष्ट कर दिए गए जिसका खुलासा खुद पीड़ितों द्वारा प्राप्त आरटीआई से हुआ है। उन्होंने कहा कि इसी तरह उसी दौरान मलियाना केस का एफआईआर भी थाने से गायब कर दिया गया जिसके कारण मुकदमा बेरूह का हो गया। 
दिल्ली में तीस हजारी की एक अदालत ने गत 21 मार्च को 1987 के हाशिमपुरा जनसंहार के सभी 16 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। इसमें खास तौर पर आरोपियों की पहचान से जुड़े सबूतों का अभाव था। इस बर्बर घटना में पांच लोग जिंदा बच गए, जिन्हें अभियोजन ने गवाह बनाया। ये पांच गवाह आरोपियों को पहचान नहीं पाए। इस मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, गाजियाबाद के समक्ष 1996 में आरोपपत्र दायर किया गया था। इसमें 19 लोगों को आरोपी के तौर पर नामजद किया गया था |
सुनवाई के दौरान 19 में से तीन आरोपियों की मौत हो गई | 16 के खिलाफ 2006 में यहां की अदालत ने हत्या, हत्या का प्रयास, सबूतों के साथ छेड़छाड़ और साजिश के आरोप तय किए थे | सितंबर 2002 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मामला दिल्ली स्थानांतरित किया गया। मामले की जांच करने वाली उत्तर प्रदेश की सीबी-सीआइडी ने 161 लोगों को गवाह के तौर पर सूचीबद्ध किया था। मामले में आरोपपत्र 1996 में गाजियाबाद के चीफ जूडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में दाखिल की गई थी, लेकिन सितंबर, 2002 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इस मामले को दिल्ली हस्तांतरित किया गया।
साल 2006 में आरोपियों के खिलाफ हत्या, हत्या की कोशिश, सबूतों से छेड़छाड़ और साजिश रचने के आरोप तय किए गए थे। यह सरकारी आतंकवाद से सीधा जुड़ा हुआ मामला है , जिसमें सबने पी ए सी के जवानों को बचाया ही और इन्साफ की राह में बहुत - सी अडचनें पैदा कर दीं | कांग्रेस , सपा , बसपा - ये सभी एक ही भगवाई रंग में रंगी नज़र आती हैं | हालत इतनी बदतर कर डाली गई कि मुस्लिम नवजवानों को भूनने वाले जवानों के खिलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई ! पीड़ितों ने इसके लिए बार - बार गुहार लगाई , किन्तु कोई नतीजा सामने नहीं आया | जो पहले से तय कर लिया गया था कि कोई कार्रवाई नहीं होगी , वही हुआ | लोग उम्मीद लगाए बैठे थे कि आरोपियों को सख्त सज़ा मिलेगी | लेकिन उन्हें साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया जाएगा ऐसा किसी ने सोचा तक नहीं था। कुछ लोग मान रहे थे कि कम से कम आजीवन कारावास तो होगा ही । कहने को तो अभी यह मामला अभी विचाराधीन है |


May 20, 2016

ये इश्क़ नहीं आसां ..

पांच राज्यों की विधानसभाओं के नतीजे
देश के पांच राज्यों - असम, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी की विधानसभाओं के चुनाव नतीजे आ चुके हैं | इन चुनावों पर सभी की नज़रें टिकी हुई थीं | अब यह बहुत साफ़ हो गया है कि देश में किसी भी पार्टी की न तो लहर है और न ही राष्ट्रीय स्तर पर कोई भी पार्टी ऐसी है , जो सही मायने में अपने को राष्ट्रीय पार्टी कहने का दमखम रखती हो | इन चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियों का प्रभाव ठीक से दिखा है , जो राष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन की राजनीति का फैलाव करके लोकतंत्र को मजबूत करता दिखेगा | इसी गठबंधन की बदौलत भाजपा ने असम में अपनी सरकार बना ली है और इस प्रकार वहां की 15 वर्ष पुरानी कांग्रेस सरकार का अंत हो गया है | उसके गठबंधन को 126 सदस्यीय विधानसभा में 86 सीटें मिली हैं , जो बहुमत से अधिक हैं | सर्बानंद सोनोवाल असम के नए मुख्यमंत्री होंगे | इन्हें पहले से ही भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया जा रहा था | सर्बानंद भाजपा में आने से पहले असम गण परिषद के छात्र नेता थे | उन्होंने कथित बंगलादेशी घुसपैठ के मामले में सुप्रीमकोर्ट जाकर उसे एक सियासी मुद्दा बनाया | देखना है कि सत्ता में आने के बाद वे इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं | इसे लेकर तरह - तरह की आशंकाएं बनी हुई हैं | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एन डी ए को समर्थन देने पर मतदाताओं का शुक्रिया अदा किया है | भाजपा ने असम में असम गण परिषद [ ए जी पी ] से सीटों का तालमेल किया था | उसने बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ भी गठबंधन किया था | इन गठबंधनों का उसे भरपूर फ़ायदा मिला | इस स्थिति को कुछ चुनावी प्रेक्षक समझ नहीं सके | एक चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के नतीजों में दावा किया गया है कि असम विधानसभा चुनाव के परिणाम आने पर किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा और राज्य में भाजपा और सत्ताधारी कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है , जबकि ऐसा सिरे से नहीं था | सर्वेक्षण के नतीजों में कहा गया है कि विधानसभा की 126 सीटों वाले असम में बीजेपी की अगुआई वाला गठबंधन 55 सीटें जीत सकता है जबकि मुख्यमंत्री तरूण गोगोई की अगुआई में कांग्रेस 53 सीटें जीत सकती है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 78 सीटें मिली थीं। गौरतलब है कि असम में सरकार बनाने के लिए 64 सीटों की जरूरत होती है। जनाब बदरूद्दीन अजमल के ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) को 13 सीटें मिली हैं। इस बार उन्होंने राजद और जदयू के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाया था , जो अधिक कारगर नहीं हो सका | पिछली बार एआईयूडीएफ को 18 सीटें मिली थीं। अन्य को छह सीटें मिल सकती हैं। असम की 126 सीटों के लिए अप्रैल 2011 में हुए चुनावों में कांग्रेस ने 78 सीटों पर जीत दर्ज कर सरकार बनाई थी | इन चुनावों में भाजपा ने 120 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और महज पांच सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार जीत दर्ज करने में सफल हुए थे | कहा जाता है कि भाजपा ने सांप्रदायिक आधार पर अपने मतों का जुगाड़ किया है , जिसे लोकतांत्रिक नहीं माना जा सकता | वहीं दूसरी ओर अलगाववादी बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट से भाजपा का गठबंधन और अपनी नैमित्तिक मांग रखनेवाले छात्र आन्दोलन से उपजे असम गण परिषद के साथ भाजपा का गठबंधन राज्य में क़ानून - व्यवस्था की नई समस्या खड़ीं कर सकता है |
पश्चिम बंगाल के मतदाता अधिक बौद्धिक हैं | उन्होंने अपनी बौद्धिकता का परिचय देते हुए एक बार फिर ममता बनर्जी को सरकार बनाने का मौक़ा दिया है | 294 सदस्यीय विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस को 211 सीटें मिली हैं , जो ऐतिहसिक है | इस बौद्धिक प्रदेश में भाजपा गठबंधन को सिर्फ़ 6 सीटें ही मिल पायीं , जो पिछले चुनाव से तीन अधिक है | कांग्रेस को पिछले चुनाव के मुक़ाबले दो सीटों का फ़ायदा हुआ है | उसे 44 सीटें मिली हैं | सबसे अधिक नुकसान कम्युनिस्ट पार्टियों को हुआ है | उनकी सीटें घटकर 33 हो गई हैं , जो पहले से 28 कम हैं | इसका मतलब यह हुआ कि ममता बनर्जी की कम्युनिस्ट पार्टियों के गढ को ध्वस्त करने की टेक्निक बहुत कारगर है | 294 सदस्यों की पश्चिम बंगाल विधानसभा में ममता को पिछले चुनाव में 184 सीटें ही मिली थीं और कांग्रेस को 42 सीट मिली थी | वहीं कम्युनिस्ट पार्टियों के गठबंधन को महज 62 सीट मिल पाई थी | अब ये सीटें काफ़ी सिमट गई हैं | कम्युनिस्ट पार्टियों के संयुक्त रूप से बनाये गये मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार सूर्यकान्त मिश्र कुछ खास नहीं कर सके , बल्कि सही मायने में वे ममता के दांव को समझ ही नहीं पाए | पहली भी भाजपा ने सभी सीटों पर अपनी किस्मत को आज़माया था , लेकिन वह अपना खाता खोलने में भी सफल नहीं हो पाई थी | इस बार भी उसे कुछ खास नहीं मिल सका | केंद्र सरकार की योजनाओं की बारिश मतदाताओं को नहीं रिझा सकी | दूसरी ओर केरल के विधानसभा चुनाव कम्युनिस्ट पार्टियों के खुशियों की झोली लेकर आए | वहां की 140 सदस्यीय विधानसभा में एलडीएफ गठबंधन को 91 सीटें मिली हैं | इस प्रकार वहां एलडीएफ गठबंधन को सरकार बनाने का मौक़ा मिल गया है | इसे पहले के मुक़ाबले 24 सीटें अधिक मिली हैं , लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर माकपा में खींचतान इस कैडर बेस पार्टी को अन्य पार्टियों से अलग नहीं करती | केरल में पिछला चुनाव 2011 में हुआ था , जिसमें कांग्रेस नेतृत्व के यूडीएफ गठबंधन को 140 में से 72 सीटों पर जीत मिली थी | कम्युनिस्ट पार्टी [ भाकपा ] के नेतृत्व वाले एलडीएफ गठबंधन को 68 सीटों पर जीत मिली थी , जिसने उसे सत्ता से बाहर कर दिया था और कांग्रेस नीत यू डी एफ को सरकार बनाने का मौक़ा मिला था | इस बार यू डी एफ को मात्र 47 सीटें प्राप्त हुई हैं | भाजपा ने पिछले चुनाव में एन डी ए के बैनर तले सभी 140 सीटों पर चुनाव लड़ा था और बिना कोई सीट जीते महज 6 फीसदी मत पाप्त किया था , जबकि. ज्यादातर पोल सर्वेक्षणों ने 2011 में भाजपा के लिए 2-6 सीटों की उम्मीद जताई थी | इस बार भाजपा के लिए केरल के द्वार खुले और उसे एक सीट मिल गई | भाजपा के पूर्व केन्द्रीय मंत्री ओ . राजागोपाल ने नेमम सीट जीत ली | तमिलनाडु में जयललिता की पुनः वापसी हो गई है | उनकी कल्याणकारी योजनाओं के साथ ही प्रदेश की जनता का व्यक्तिवाद उन्हें सत्ता से दूर नहीं कर सका | एआईएडीएमके को 134 सीटें मिलीं ,जो पिछले चुनाव के मुक़ाबले 15 कम हैं | इस बार डी एम के को 67 सीटों का फ़ायदा हुआ है | कांग्रेस के साथ बने उसके गठबंधन को कुल 98 सीटें प्राप्त हुई हैं | इससे पहले तमिलनाडु विधानसभा की 234 सीटों के लिए अप्रैल 2011 में चुनाव हुए थे | इन चुनावों में एक तरफ जयललिता की एआईएडीएमके और कम्युनिस्ट पार्टियों का गठबंधन था और दूसरी तरफ डीएमके के साथ कांग्रेस का गठबंधन बना था , जो इस बार भी बना रहा | हालांकि इस राज्य में भाजपा का अस्तित्व न के बराबर है लेकिन राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते उसने पिछले चुनाव में सभी सीटों पर अकेले उम्मीदवार उतारा था , लेकिन उसे कोई सीट नहीं मिल सकी थी | इस बार भी भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा | केवल पुडुचेरी ही ऐसा राज्य है , जहाँ कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर मिला है | कांग्रेस - डी एम के गठबंधन को 17 सीटें मिली हैं | विधानसाभा की 30 सीटों के लिए हुए चुनाव में ए आई एन आर सी को मात्र 8 सीटें मिलीं , जो विगत चुनाव से 7 कम हैं | इसे पिछली बार सरकार बनाने का मौक़ा मिला था | विधानसभाओं के इन चुनावों का राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव पड़ना तय है | असम को छोड़ दें , तो अन्य राज्यों में भाजपा की उपलब्धि नगण्य रही | केंद्र सरकार के दो वर्ष के कार्यकाल को जनता ने कुछ खास नहीं माना | असम की बात अलग है | अगर वहां सांप्रदायिक कार्ड न खेला जाता और इसके लिए सोनोवाल को न लाया जाता , तो भाजपा के लिए ख़ुशी का कोई मौक़ा न होता | जो लोग यह समझते थे कि नरेंद्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा के पर लग जाएंगे , वे खामखयाली में पहले भी थे और चुनाव नतीजों ने साफ़ कर दिया है कि आज भी इससे नहीं उबर पाए हैं |

May 12, 2016

कल्याणकारी योजनाएं निष्प्रभावी क्यों ?


 कल्याणकारी योजनाएं निष्प्रभावी क्यों ?

लोगों का जीवन - स्तर ऊपर उठाने के लिए अनेक प्रकार की सरकारी योजनाएं चल रही हैं | प्रधानमंत्री की कई बीमा योजनाएं और जनधन योजना मौजूद है , लेकिन इनका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है | बढ़ते भ्रष्टाचार ने सभी योजनाओं पर सवालिया निशान लगा दिया है | अभी हाल में बलिया [ उ . प्र . ] से शुरू की गई मुफ़्त रसोई गैस सिलिंडर की योजना में कई स्थानों पर डेढ़ - डेढ़ हज़ार रूपये में आवेदन - पत्र दिए जाने की ख़बरें हैं , मगर लगता है कि भ्रष्टाचारियों को छूट मिली हुई है | अब शायद ही कोई राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के खिलाफ़ संजीदा कोशिशें कर रहा है | जिस देश में एक कटोरी दाल के लाले पड़े हों , भुखमरी और आत्महत्या जैसी स्थितियां बार - बार समाज की नियति बन जाती हों , उस देश के भविष्य का क्या कहना ?! क्या जुमलेबाज़ी और योजनाओं के सब्ज़बाग से देश का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है ? कदापि नहीं | नारेबाज़ी देश का दशकों पुराना शगल है , जिसका धरातल पर कभी कोई उल्लेखनीय लाभ कभी नहीं दिखा | ' गरीबी हटाओ ' का नारा दशकों से सुनते आ रहे हैं , जिसके शब्द तो बदलते रहे , पर केन्द्रीय भाव एक ही रहता रहा | अति दुखद और आश्चर्य है , कभी गरीबी नहीं हटी , न ही कम हुई बल्कि गरीबी बढती ही जा रही है , गरीबों की संख्या बढ़ती जा रही है | इससे उलट अमीरी बढ़ी और नये - नये करोड़पति , अरबपति बनते जा रहे हैं | हमारे देश की गरीबी बड़ी मर्मान्तक है | यह किसी जानलेवा बीमारी से कम नहीं ! अभी पिछले दिनों पानीपत की जगदीश कॉलोनी में एक व्यक्ति ने गरीबी से तंग आकर अपनी तीन बेटियों के साथ जहर खा लिया। इसमें एक बच्ची की मौत हो गई, जबकि पिता समेत दो की कई दिनों तक हालत गंभीर बनी हुई थी। बताया गया कि कर्जदार होने पर उठाया गया ऐसा कदम | पिछले साल की एक घटना देखिए , जो यह बताती है कि किसी की अंतिम इच्छा एक कटोरी दाल हो सकती है। कैसे कोई पूरी उम्र एक कटोरी दाल के लिए तरसता रह सकता है। यह कैसे हो सकता है कि एक आदमी जब मौत के निकट हो तो उसका परिवार दाल के लिए पड़ोसियों के घर दौड़ रहा हो। पूरी उम्र वह औरत एक कटोरी दाल के लिए तरसती रही। अरहर, मसूर, चना, मूंग या उड़द का विकल्प नहीं था उसके पास। जब उसने गरीबी से हारकर जहर खा लिया तो अपने अपाहिज पति से कहा , ' अब तो जा रही हूं। आखिरी इच्छा है मेरी, जाते हुए दाल तो चखा दो। ' 
एक मरती हुई औरत अपनी उखड़ती हुई सांसों के साथ आखिरी ख़्वाहिश के तौर पर एक कटोरी दाल मांग रही थी। उत्तर प्रदेश के जिला गोंडा, तहसील तरबगंज के गांव अकौनी में ऋतु बस इस दुनिया को छोड़ने से पहले दाल का स्वाद चख लेना चाहती थी। अपनी पत्नी की इस इच्छा के सामने बहुत बेचारा था उसका पति। क्‍योंकि घर में दाल नहीं थी इसलिए पड़ोसी के आगे कटोरी फैलानी पड़ी। तब जाकर वह अपनी पत्नी के लिए एक कटोरी दाल का इन्तिज़ाम कर पाया | यह भी एक बिडंबना ही है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में दाल की कीमतें ही अधिक बढ़ी हैं | अभी तक इनकी क़ीमतों पर काबू नहीं पाया जा सका है | अब तो खेसारी दाल भी प्रतिबंधित नहीं रही | फिर भी देश की तरक्की के दावे बढ़ - चढ़कर किये जा रहे हैं | जीवन की मूलभूत ज़रूरतों के सामान जुटाने में सरकार की नाकामी बार - बार सामने आती रहती है | फिर भी समस्या के हल के ठोस प्रयास तक नहीं हो पाते | बहुत कुछ राजनीति के भी हवाले हो जाता है | उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में त्राहि - त्राहि मची हुई है | सूखे जैसी प्राकृतिक आपदा से जनता घुट - घुट ज़िन्दगी जीने को अभिशप्त है | वास्तव में गरीबों का कोई पुरसानेहाल नहीं है ! ताज़ा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में पांच साल तक की उम्र के 45 फीसदी बच्चे कुपोषित पाए गए हैं। इस उम्र के 48 फीसद बच्चों का विकास उनकी उम्र के हिसाब से बेहद कम पाया गया और 25 फीसद से भी अधिक बच्चों की स्थिति बेहद बुरी पाई गई। एक चिंतनीय बात जो इन आंकड़ों में सामने आई वह यह है कि इन कुपोषित और बेहद कमजोर हालत वाले बच्चों में ज्यादातर संख्या लड़कियों की है। परिवार में लड़कों को अच्छा पौष्टिक खाना देने वाले ज्यादातर परिवार लड़कियों को वही पौष्टिक खाना नहीं देते। मेडिसिन सेंस फ्रंटियर्स इंडिया नाम की संस्था के मेडिकल एक्टिविटी मैनेजर जिया उल हक़ ने बताया कि पांच महीने के एक स्वस्थ बच्चे का आदर्श वजन कम-से-कम 5 किलो होना चाहिए, लेकिन उनके पास ज्यादातर ऐसे बच्चे आते हैं जिनका वजन 2.5 साल की उम्र में भी महज 5 किलो होता है। उन्होंने बताया कि उनके पास आने वाले कुपोषित बच्चों में लड़कियों की तादाद सबसे ज्यादा होती है। संयुक्त राष्ट्र के एक आंकड़े के अनुसार , कुपोषण से मरने वाले बच्चों की सालाना तादाद 30 लाख है | कुपोषण के कारण इन बच्चों के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहद कम होती है। आंकड़े बताते हैं कि कुपोषण का स्तर लड़कों से कई गुना ज्यादा लड़कियों में पाया जाता है। ज़ाहिर है ,इस गरीबी की विषम और विकट स्थिति से उबरने की दिशा में हमें अभी बहुत कुछ करना है , जिसकी ओर सरकार को पर्याप्त ध्यान देना चाहिए | राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सतही प्रयास सदैव निरर्थक और असफल ही होंगे |

May 3, 2016

गाँधी जी का शराबमुक्त भारत का स्वप्न

गाँधी जी का शराबमुक्त भारत का स्वप्न
गुजरात , केरल , नागालैंड , लक्ष द्वीप और मणिपुर के कुछ हिस्सों में शराबबंदी के बाद अब बिहार में पूर्णतः शराबबंदी लागू है , लेकिन इनमें से कोई राज्य ऐसा नहीं है , जहाँ चोरी - छिपे और कभी खुले तौर पर इसका उल्लंघन दिखाई न पड़ता हो | फिर भी इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि इन राज्यों में शराबबंदी से अच्छे नतीजे सामने आए हैं | बिहार में तो इसे लागू किए जाने के साथ ही इसके उल्लंघन की गंभीर ख़बरें आने लगीं और विधायक तक का नाम उल्लंघनकारियों में आने लगा ! बिहार में शराबबंदी लागू होने के दौरान शराब पीने की पेशकश करते कैमरे में कैद हुए कांग्रेस विधायक की मुश्किलें बढ़ती जा रही है। नरकटियागंज के विधायक विनय वर्मा को पार्टी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इधर विगत 26 अप्रैल को उनके आवास पर पुलिस ने छापेमारी की। पुलिस उन्हें पूछताछ के लिए थाना लेकर पहुंची, लेकिन यहां उनके समर्थकों ने हंगामा कर विधायक को छुड़ा लिया और अब फरार विधायक की तलाशी की जा रही है। दूसरी ओर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने का दावा किया है कि बिहार में जब से शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा है, तब से राज्य में अपराध में गिरावट आयी है। उन्होंने डीएम-एसपी से कहा कि सीमा पर हो रहे शराब की तस्करी को हर हाल में रोके। अगर जरुरी हुआ तो पड़ोसी राज्यों के डीएम-एसपी से बात कर तस्करी रोकने की कार्रवाई करें। मुख्यमंत्री के अनुसार , पिछले 24 दिन में शराबबंदी के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। इस दौरान हत्या, लूट, दुष्कर्म व छिनैती के मामलों में रिकॉर्ड गिरावट हुई है। मुख्यमंत्री ने पटना प्रमंडल के सभी 6 जिलों के डीएम एसपी के साथ बैठक कर शराब बंदी,अगलगी, पेयजल संकट और सात निश्चय की प्रगति की समीक्षा की। उन्होंने जिला अधिकारियों से कहा कि शराब के कारोबारी हर रोज नए-नए हथकंडे इजाद करने के प्रयास में है। उनके किसी भी प्रयास को सफल नहीं होने देना है। इसके लिए नई रणनीति बनाकर कार्रवाई करें। मुख्यमंत्री को डीजीपी ने बताया शराब बंदी के बाद आपराधिक घटनाओं का ग्राफ गिरा है। लूट की घटनाओं में 56% चोरी में 54 प्रतिशत और अपहरण में 33% प्रकार दुष्कर्म की घटनाओं में 40% कमी आई है। दूसरी ओर पटना में अपने आवास पर 26 मार्च 16 को आयोजित जनता दरबार के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए बिहार विधान परिषद में प्रतिपक्ष के नेता सुशील कुमार मोदी [ भाजपा ] ने आरोप लगाया कि प्रदेश में सत्ताधारी महा गठबंधन (जदयू-राजद-कांग्रेस) में आधा दर्जन से अधिक मंत्री और विधायक शराब के आसक्त हैं, जिससे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बिहार में पूर्ण शराबबंदी के संकल्प पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि शराब पर पाबंदी और इसके उत्पादन, बिक्री और उपभोग करने पर सजा का प्रावधान किए जाने के बावजूद इसका प्रत्याशित परिणाम नहीं समाने आया है, क्योंकि शराब बिहार के सभी हिस्सों में अवैध रूप से बेची जा रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बिहार में शराबबंदी के कारण अपराध की घटनाओं में गिरावट आने के दावे को खारिज करते हुए कहा कि आपराधिक वारदात यथा हत्या, डकैती, लूट आदि का शराब से कोई ताल्लुक नहीं है। उन्होंने कहा कि भाजपा पूर्ण शराबबंदी के पक्ष में है और सरकार अवैध शराब की बिक्री के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे। इस प्रदेश की शराबबंदी की तरह अब उत्तर प्रदेश में भी शराबबंदी की चाहत दिखाई दे रही है ! फिर भी उत्तर प्रदेश में शराब की क़ीमतें घटाई गई हैं | प्रदेश के तकनीकी शिक्षा मंत्री [ स्वतंत्र प्रभार ] फरीद महमूद किदवई ने पिछले दिनों बाराबंकी में एक प्रेस कॉफ्रेंस में मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि वे चाहते हैं कि प्रदेश में शराब पर प्रतिबन्ध लग जाए। इसके लिए वे खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से सिफारिश करेंगे।अखिलेश यादव ने एक अप्रैल से शराब के दामों में 25 फीसदी की भारी कटौती का ऐलान किया था। यूपी सरकार ने अपनी आबकारी नीति में बदलाव करते हुये अंग्रेजी शराब के दामों में 25 फीसदी की कमी कर दी ! वहीं देशी शराब एक रुपए महंगी कर दी !प्रदेश के आबकारी विभाग का साल 2015-16 का लक्ष्य 1700 करोड रूपए था, लेकिन यह विभाग लक्ष्य पूरा नहीं कर पाया। करीब 1400 करोड रूपए ही राजस्व वसूली कर पाया। सरकार ने आगामी वित्तीय वर्ष के लिए आबकारी विभाग का लक्ष्य बढाकर 1900 करोड़ रुपए कर दिया है। इस समस्या का एकलौता ठोस समाधान यही है कि राज्य सरकारें कमाई के लिए शराब की जगह अन्य विकल्पों का सृजन करें। राज्यों की सरकारें चाहें तो एक अध्ययन करवा सकती हैं, जिसके तहत यह पता लगाया जाए कि शराब से प्राप्त होने वाले राजस्व और उससे पैदा बीमारियों , अपराधों और अन्य सामजिक समस्याओं से होने वाले आर्थिक नुकसान तथा शराब के नशे की लत से मुक्ति के लिए संचालित जागरूकता अभियानों आदि पर आने वाले व्यय के बीच कितना अंतर है। इस अध्ययन के बाद संभवतः यह स्पष्ट हो जाएगा कि सरकारें शराब से जितना राजस्व अर्जित करती हैं, उतना या उससे अधिक ही उससे पैदा समस्याओं आदि पर व्यय भी कर देती हैं। इसके बाद इन राज्य सरकारों के लिए शराब पर प्रतिबन्ध लगाना कठिन नहीं रह जाएगा। अब जो भी हो, कुछ न कुछ कदम तो उठाने ही होंगे क्योंकि समय रहते इस मामले में अगर कुछ नहीं किया गया तो देश की आबादी, खासकर युवा आबादी नशे की चपेट में भयावह रूप से आ जाएगी | नशा एक धीमा जहर है जिसमें दर्दनाक मौत के सिवा कुछ हासिल नहीं होता है,,, कितने ही परिवारो की जिंदगी इस जहर की शिकार होकर घर से बेघर हो गई है तथा न जाने कितनी जिंदगियां मौत के मुहं में समा चुकी हैं और ऩ जाने कितनी जिंदगियां अतिंम सांसे गिन रही हैं | शराब का नशा सबसे अधिक घातक है | 
इसीलिए हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने शराबबंदी की ओर भी ध्यान दिया और मद्य निषेध विभाग भी बनाया गया | आबकारी विभाग भी अस्तित्व में आया और आरंभिक कुछ समय के बाद यह धड़ल्ले से शराबबंदी का मखौल उड़ाने लगा | सरकारें शराब माफ़िया के आगे झुकती गईं और आबकारी विभाग निरंकुश ढंग से शराब की नई दूकानें खोलने का लाइसेंस बाँटने लगा | अब हालत यह है कि इस सूरतेहाल पर सरकार से कुछ ख़ास स्वेच्छिक क़दम की अपेक्षा नहीं की जा सकती , क्योंकि सरकार को नशे के कारोबार से करोडो- अरबों का मुनाफा होता है और शराब माफ़िया से राजनेताओं की निरंतर बंदरबांट चलती रहती है | जनस्वास्थ्य की किसी को चिंता नहीं है | योग से शराबबंदी होने से रहीं | अतः इस जहर को रोकने के लिए जनता को ही पहल करनी होगी , कयोंकि यह एक बड़ी समस्या बनी हुई है | अगर जनता नशा मुक्ति के पक्ष में एक जुट हो जाए तो ये मौत की फैक्टरियां अपने आप बंद हो जायेंगी, और सरकार को मजबूर होकर उन पर प्रतिबन्ध लगाना पड़ेगा | वास्तव में शराबनोशी ने भारतीयों की बड़ी संख्या का जीवन दुष्कर बना डाला है | कुछ समय पहले एक अंग्रेज़ी दैनिक में शराब के इस्तेमाल पर एक सर्वेक्षणात्मक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसमें बताया गया कि भारतीय समाज के विशेषकर अभिजात्य वर्ग के युवक और युवतियां शराब के प्रति तेज़ी से आकर्षित हो रहे हैं । यह वर्ग फैशन के तौर पर भी शराब का इस्तेमाल करता है । कहने का मतलब यह कि इस ज़हरीले पदार्थ का इस्तेमाल पढ़े-लिखे मूर्ख तो पहले से करते रहे हैं, यह दुर्व्यसन अपनी पीढ़ी की ओर भी स्थानांतरित कर रहे हैं । इसकी बुरी आदत और लत ने ख़ासकर कमज़ोर वर्ग के लोगों की आर्थिक स्थिति और स्वास्थ्य पर कल्पनातीत कुप्रभाव डाला है | यह भी सच है कि पुरातनकाल से ही कुछ लोगों की सामाजिक व्यवस्था और जीवनशैली में शराब का प्रवेश था , जिसे पूंजीपतियों ने अपनी धन बढ़ाऊ घिनौनी मानसिकता के फेर में हवा दी है | ये लोग अपने देवताओं और पितरों को संतुष्ट करने के लिए भी हर त्योहार पर , जन्म और विवाह के अवसरों पर शराब का इस्तेमाल अनिवार्य रूप से करते हैं | दैनिक दिनचर्या में भी इस्तेमाल करते हैं | फिर न तो शराब के उपयोग की मात्रा की कोई सीमा है और न ही उनके समाज के किसी सदस्य पर इसके सेवन पर रोक है ! हालत यह है कि शराब पीनेवालों का शरीर और मन - मस्तिष्क सभी अपाहिज हो चुके हैं ! नतीजा यह है कि अच्छे और बुरे की पहचान करने के योग्य नहीं रहे और न ही वे किसी मामले में सही निर्णय कर सकते हैं | आज कल बलात्कार और अन्य अपराध की जितनी घटनाएं घट रही है हैं , उनके मूल कारणों में एक बड़ा कारण शराब का सेवन है . वास्तव में शराब बीमारियों की जननी है । मेडिकल साइंस ने इधर जाकर इसकी पुष्टि की है कि इसके शरीर पर बहुत घातक प्रभाव पड़ते हैं । सम्राट जार्ज के पारिवारिक डॉक्टर सर फ्रेडरिक स्टीक्स वार्ट का कहना है, ‘‘शराब शरीर की पची हुई शक्तियों को भी उत्तेजित करके काम में लगा देती है, फिर उसके ख़र्च हो जाने पर शरीर काम के लायक़ नहीं रहता ।’’ इसी प्रकार सर एंड्रू क्लार्क वार्ट [ एम॰डी॰] का कथन है, ‘‘शरीर को अल्कोहल से कभी लाभ नहीं हो सकता ।’’ गांधी जी ने कहा था कि स्वतंत्र भारत में एक बूंद शराब नहीं होगी , किन्तु आज गांधी के आदर्शों पर चलने वाले नेता ही शराब को बढ़ावा दे रहे हैं ! सरकार को भी यह मालूम है कि शराब की वजह से औरतों की जिंदगी सबसे अधिक प्रभावित होती है। अतः यह अनिवार्य है कि बलात्कार की रोकथाम के लिए शराब समेत सभी प्रकार के नशों को बंद कर दिया जाए । आज जगह-जगह बने नशामुक्ति केन्द्रों के होने का तो यही मतलब है कि सरकार चाहती है कि देश में ज्यादा से ज्यादा शराब की बिक्री हो और लोग वहां इलाज कराने आएं | वह राजस्व का बहाना बनाकर शराबबंदी नहीं चाहती | पुलिस भी इसमें सहायक है | वह शराब के दुष्प्रभावों के मामलों को भी नजरअंदाज कर देती है | उस पर यह आरोप भी लगता रहा है कि वह अपराध कम दिखाने के चक्कर में एफआईआर दर्ज नहीं करती या झूठे केस दर्ज करती है | पूर्व पुलिस कमिश्नर टी आर कक्कड़ ने भी कहा था कि अपराध को बढ़ावा गृहमंत्री से मिलता है जो सच लगता है ,क्योंकि गृहमंत्री चाहता है कि उसके कार्यकाल में कम से कम अपराध दर रहे। इसका फायदा पुलिस और गृह मंत्रालय दोनों को पहुंचता है। पुलिस अपराधियों से रिश्वत लेती हैं और यह गृह मंत्रालय तक पहुंचती है। दूसरा फायदा यह है कि मामले कम दर्ज होते हैं और गृहमंत्री बदनामी से बचता है। बलात्कार जैसी घटनाएं रोकने के लिए महिला को प्रताड़ित करनेवालों को अमलन कड़ी सज़ा देने के साथ कामुक - अश्लील साहित्य के साथ ब्लू व अश्लील फिल्मों एवं टीवी चैनलों द्वारा फैलाई जा रही अश्लीलता पर भी प्रभावी रोक आवश्यक है | अब तक किसी भी सरकार ने इस ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया है , मानो अश्लीलता को खुली छूट मिली हुई हो | आजकल टीआरपी बढ़ाने के लिए सब कुछ दिखाया जाता है , जिसका समाज पर बुरा प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है | सामाजिक संगठनों को चाहिए कि लोगों में महिला - सम्मान की मानसिकता विकसित करने हेतु ज़ोरदार अभियान चलायें , जिसमें धार्मिक साहित्य का भी इस्तेमाल करें | इस सिलसिले में इस्लाम की शिक्षाएं बड़ी कारगर भूमिका निभा सकती हैं |

May 1, 2016

मालेगांव के आरोपियों की बाइज्ज़त रिहाई

क्या कोई लौटा सकता है इनके गुज़रे दस क़ीमती साल ?

2006 के मालेगांव धमाके में मकोका अदालत ने सभी 8 आरोपियों को दस साल तक जेल में क़ैद रखने के बाद बरी कर दिया है। एक आरोपी शब्बीर अहमद की पहले ही मौत हो चुकी है जबकि चार आरोपी फरार हैं। एनआईए ने इस फैसले का स्वागत किया है। एनआईए के डीजी ने कहा कि हम इस फैसले का स्वागत करते है और कानून अपना काम करेगा। वह चाहती है कि आगे मुक़दमा चले | इन आरोपियों को सिमी से जुड़ा हुआ बताया गया था। मुख्य आरोपी नूरुल हुदा ने मीडिया को बताया कि हमें एटीएस ने जबर्दस्ती गिरफ्तार करके इकबालिया बयान लिया था। मालेगांव [ महाराष्ट्र ] में 8 सितंबर 2006 को कुल चार बम धमाके हुए थे। तीन हमीदिया मस्जिद में और एक मुशावरत चौक पर शक्तिशाली बम फटे , जिनमें 31 लोगों की मौत हुई थी और 312 के करीब जख्मी हुए थे। इस मामले की शरुआती जाँच ए टी एस ने की और 13 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर 9 युवकों को गिरफ्तार किया था और उनके खिलाफ मकोका के तहत आरोपपत्र दायर किया था। एटीएस ने मामले में एक आरोपी को सरकारी गवाह भी बनाया था, लेकिन बाद में वह फर्जी घटना के कारण मुकर गया। सीबीआई ने भी एटीएस की कहानी को ही आगे बढ़ाया और बेकसूरों को कोई राहत नहीं दी , जबकि एटीएस की जांच पर सवाल उठने पर मामला सीबीआई को दे दिया गया था। सीबीआई ने भी 11 फ़रवरी 2010 को सभी 9 आरोपियों के खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट दायर की। बाद में यह मामला एन आई ए [ राष्ट्रीय जांच एजेंसी ] के पास गया , जिसने जाँच को आगे बढ़ाया , हालाँकि इस मामले में एटीएस की जांच में 'अभिनव भारत ' संस्था का नाम सामने आया था और स्वामी असीमानंद, कर्नल पुरोहित सहित साध्वी प्रज्ञा सिंह को गिरफ्तार किया गया था। इस मामले की जांच अभी जारी है। असीमानंद ने अपने इकबालिया बयान में सुनील जोशी का नाम लिया था। कहा जाता है कि सुनील जोशी ने इस हमले के बारे में कहा था कि उनके लड़कों ने यह काम किया था। बाद में सुनील जोशी की हत्या हो गई थी। पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं कर पाई थी।
इसके बाद मामले में नया मोड़ तब आया जब असीमानन्द के बयान के बाद एन आई ए ने 4 दूसरे लोगों को मामले में आरोपी बनाया और उनके खिलाफ 25 मई 2013 को विशेष अदालत में आरोप पत्र दायर किया। तब से मामला उलझा हुआ है। एनआईए द्वारा गिरफ्तार सभी 4 हिन्दू आरोपी जेल हिरासत में हैं | इनके नाम हैं - 1 - मनोहर नरिवाला उर्फ़ सुमेर ठाकुर (जेल हिरासत में) 2- राजेंद्र चौधरी उर्फ़ दशरथ (जेल हिरासत) 3 - ध्यान सिंह (जेल हिरासत) और 4 - लोकेश शर्मा (जेल हिरासत) जमानत पर छूट आरोपियों ने अपने खिलाफ दर्ज मामले को ख़ारिज करने की अर्जी दी थी, जिस पर विशेष अदालत का फैसला 25 अप्रैल 16 को आया। इस मामले के मुस्लिम आरोपियों के नाम इस प्रकार हैं - नूरुल हुदा (जमानत पर) , शब्बीर अहमद मसीउल्लाह (मृत) , रईस अहमद रजब अली मंसूरी (जमानत पर) , डॉ. सलमान फ़ारसी अब्दुल (जमानत पर) . फरोग इक़बाल अहमद मक्दूमी (जमानत पर) ,शेख मुहम्मद अली आलम अमानत अली शेख ( जेल हिरासत में ) ,आसिफ खान बशीर खान (जेल हिरासत } , मुहम्मद ज़ाहिद अब्दुल मजीद अंसारी ( जमानत पर ) , अबरार अहमद गुलाम अहमद ( जमानत पर) , रियाज अहमद शफी अहमद ( फरार ) , इश्तियाक अहमद मुहम्मद इसहाक ( फरार ) , मुनव्वर अहमद मुहम्मद अमीन ( फरार )13) मुज़म्मिल ( पाकिस्तानी - फरार ) | अदालत द्वारा बरी किये गये आरोपियों ने अपनी रिहाई और बेकसूरी पर जो ख़ुशी जताई है , वह स्वाभाविक है इससे पहले भी अदालतों द्वारा मुस्लिम बेकसूरों की रिहाई की जाती रही है | इसी वर्ष के शुरू में अज़ीजुर रहमान , मुहम्मद अली अकबर और शेख़ मुख़्तार हुसैन की रिहाई हुई | इन पर जुल्म - ज़्यादती के पहाड़ तोड़े गए | 24 परगना के बशीर हाट के रहने वाले 31 वर्षीय अजीरजुर रहमान ने बताया कि उसे 11 जून 2007 को सीआईडी वालों ने चोरी के इल्जाम में उठाया था। 16 जून को कोर्ट में पेश करने के बाद 22 जून को दोबारा कोर्ट में पेश कर 26 तक हिरासत में लिया। जबकि यूपी एसटीएफ ने मेरे ऊपर इलज़ाम लगाया था कि मैं 22 जून को लखनऊ अपने साथियों के साथ आया था। आप ही बताएं कि यह कैसे हो सकता है कि जब मैं 22 जून को कोलकाता पुलिस की हिरासत में था तो यहां कैसे उसी दिन कोई आतंकी घटना अंजाम देने के लिए आ सकता हूं। 12 दिन की कस्टडी में यूपी एसटीएफ ने रिमांड में 5 लोगों के साथ लिया और बराबर नौशाद और जलालुद्दीन के साथ टार्चर किया जा रहा था , जिसे देख हम दहशत में आ गए थे कि हमारी बारी आने पर हमारे साथ भी ऐसा ही किया जाएगा। टार्चर कुछ इस तरह था कि बिजली का झटका लगाना, उल्टे लटका कर नाक से पानी पिलाना, टांगे दोनों तरफ फैलाकर खड़ाकर डंडे से पीटना, नंगा कर पेट्रोल डालना, पेशाब पिलाना इन जैसे तमाम जिसके बारे में आदमी सोच भी नहीं सकता, हमारे साथ किया जाता था। छह दिन तक लगातार एक भी मिनट सोने नहीं दिया। हमारा रिमांड खत्म होने के एक दिन पहले लखनऊ से बाहर जहां ईट भट्टा और एक कोठरी नुमा खाली कमरा पड़ा था, वहां ले जाकर गाड़ी रोका और मीडिया के आने का इन्तिज़ार किया। यहां लाने से पहले एसटीएफ वालों ने हमसे कहा था कि मीडिया के सामने कुछ मत बोलना। इस बीच धीरेन्द्र नाम के एक पुलिस कर्मी ने सीमेंट की बोरी और फावड़ा लिया और कोठरी के अंदर गया | फिर कोठरी के अंदर गड्डा खोदा, बोरी के अंदर से जो भी सामान ले गए थे गड्डे के अंदर टोकरी में रख दिया। फिर जब सारे मीडिया वाले आ चुके तो हमको गाड़ी से निकालकर उस गड्डे के पास से एक चक्कर घुमाया , जिसका फोटो मीडिया खींचती रही। एसटीएफ वालों ने मीडिया को बताया कि ये आतंकी हैं जो कि यहां दो किलो आरडीएक्स, दस डिटोनेटर और दस हैंड ग्रेनेड छुपाकर भाग गए थे।

इनकी निशानदेही पर यह बरामद किया गया है। मीडिया वाले बात करना चाह रहे थे पर एसटीएफ ने तुरंत हमें ढकेलकर गाड़ी में डाल दिया। अजीजुर्रहमान ने बताया कि हम लोगों को जब यूपी लाया गया उस समय उसमें एक लड़का बंगलादेशी भी था। पूछताछ के दौरान उसने बताया कि वह हिन्दू है और उसका नाम शिमूल है। उसके बाद दो कांस्टेबलों ने उसके कपड़े उतरवाकर देखा कि उसका खतना हुआ है कि नहीं। जब निश्चिंत हो गए की खतना नहीं हुआ है तो पुलिस वालों ने उससे कहा कि यह बात कोलकाता में क्यों नहीं बताया। उसके बाद दो कांस्टेबल उसे फिर से कोलकाता छोड़ आए। सिर्फ मुसलमान होने के नाते हमें आतंकी बताकर फंसा दिया गया। मिदनापुर निवासी शेख मुख्तार हुसैन ने जो कि मटियाबुर्ज में सिलाई का काम करते थे बताया कि उसने एक पुराना मोबाइल खरीदा था। उस समय उसकी बहन की शादी थी। उसी दौरान एक फोन आया कि उसकी लाटरी लग गयी है और लाटरी के पैसों के लिए उसे कोलकाता आना होगा। इस पर उसने कहा कि अभी घर में शादी की व्यस्तता है | अभी नहीं आ पाउंगा। उसी दौरान उसे साइकिल खरीदने के लिए नंद कुमार मार्केट जाना था तो उसी दौरान फिर से उन लाटरी की बात करने वालों का फोन आया और उन लोगों ने कहा कि वे वहीं आ जाएंगे। फिर वहीं से उसे खुफिया विभाग वालों ने पकड़ लिया। उनके जीवन के साढे़ आठ साल बर्बाद हो गए। उनका परिवार बिखर चुका है। उन्होंने अपने बच्चों के लिए जो सपने बुने थे उसमें देश की सांप्रदायिक सरकारों, आईबी और पुलिस ने आग लगा दी। उनके बच्चे पढ़ाई छोड़कर सिलाई का काम करने को मजबूर हो गए, उनकी बेटी की उम्र शादी की हो गई है। लेकिन साढे आठ साल जेल में रहने के कारण अब वे पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं। अब उनके सामने आगे का रास्ता भी बंद हो गया है। क्योंकि फिर से जिंदगी को पटरी पर लाने के लिए जो पैसा रुपया चहिए वह कहा से आएगा। सरकार पकड़ते समय तो हमें आतंकवादी बताती है पर हमारे बेगुनाह होने के बाद न तो हमें फंसाने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई होती है और न ही मुआवजा मिलता है। पत्रकारों द्वारा सवाल पूछने पर कि मुआवजा की लड़ाई लड़ेगे पर शेख मुख्तार ने कहा कि छोड़ने के वादे से मुकरने वाली सरकार से मुआवजे की कोई उम्मीद नहीं। 24 परगना बनगांव के रहने वाले अली अकबर हुसैन ने कहा कि देश के खिलाफ नारे लगाने के झूठे आरोप ने उसे सबसे ज्यादा झटका दिया। जिस देश में हम रहते हैं उसके खिलाफ हम कैसे नारा लगाने की सोच सकते हैं। आज जब यह आरोप बेबुनियाद साबित हो चुके हैं तो सवाल उठता है कि हम पर देश के खिलाफ नारा लगाने का झूठा आरोप क्यों मढ़ा गया ? उन्होंने कहा कि हमारे वकील मु0 शुऐब जो कि हमारा मुकदमा लड़ने (12 अगस्त 2008) कोर्ट में गए थे को मारा पीटा गया और हम सभी पर झूठा मुकदमा दर्ज कर दिया गया कि हम देश के खिलाफ नारे लगा रहे थे। जेल में बीते इन सभी की ज़िंदगी के दस अहम साल क्या अदालत लौटा पाएगी इनको इस अवधि का मुआवज़ा ज़रूर मिलना चाहिए | साथ ही यह अहम बात भी कि क्या भविष्य में बेक़सूर मुसलमानों को झूठे मामलों में नहीं फंसाया जाएगा ? इन सवालों का जवाब मौजूदा माहौल में सकारात्मक नहीं मिल सकता | आज सत्ता के विभिन्न स्तरों पर कमोबेश वह मानसिकता प्रवाहित है , जो अल्पसंख्यकों ख़ासकर मुसलमानों के प्रति दुर्भाव से काम लेती है | सभी देश हितैषियों और समाज के हित - चिंतकों को चाहिए कि वे इस सूरतेहाल में बदलाव लाने के लिए सक्रिय रूप से काम करें | यही देश , समाज और लोकतंत्र के हित में है | जमाअत इस्लामी हिन्द के महासचिव मुहम्मद सलीम इंजीनियर ने मालेगांवबम धमाकों में फंसाए गए बेकसूरों की रिहाई का स्वागत किया है और कहा है कि अदालत के इस फ़ैसले से जमाअत इस्लामी हिन्द के इस राय को मज़बूती मिली है कि मुस्लिम नव जवानों को एक बड़ी साज़िश के तहत बेबुनियाद आरोप लगाकर गिरफ्तार किया जाता है , ताकि मुस्लिम समुदाय को हतोत्साहित किया जाए , देश में सांप्रदायिक दरार डाली जाए और असल अपराधियों को संरक्षण दिया जाए| जमाअत के महासचिव ने भारत सरकार से मांग की है कि वह उन सभी मुस्लिम नवजवानों को तत्काल रिहा करे , जन्हें झूठे आरोपों में गिरफ्तार किया गया है | उन्होंने सरकार से मांग की है कि बाइज्जत बरी किए गये उक्त लोगों को मुआवज़ा देने के साथ सरकारी नौकरी दी जाए और मामले की सघन पड़ताल की जाए एवं अन्य जो भी इस कांड में संलिप्त हों , उन्हें गिरफ्तार किया जाए |