Aug 28, 2016

शमशेर अली की बदहाली

शमशेर अली की बदहाली और कल्याणकारी राज्य की कल्पना
हमारे देश का संविधान कल्याणकारी राज्य का प्रावधान रखता है | अतः सरकार को वांछित है कि इस ध्येय की यथासंभव पूर्ति करे | ऐसा इसलिए भी कि भारतीय संविधान की अंतरात्मा न्याय , समता , अधिकार और बन्धुत्व के आसव से अभिसिंचित है | इस निहित भाव के जानकार बार - बार यह कहते रहे हैं कि जो सच भी है कि जब तक भूख के भय से, अज्ञान के अन्धकार से, आवास के अभाव से, बुनियादी यातनाओ एवं आतंको से, शोषण, अत्याचार, लाचारी और विवशता से इस देश के करोङोँ जनोँ को मुक्ति प्राप्त नहीँ होती , तब तक राजनीतिक स्वाधीनता अधूरी स्वाधीनता ही रहेगी | इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हमारे देश को अभी भी सही अर्थों में पूर्ण स्वाधीनता नहीं मिल पाई है | देश में शमशेर अली जैसे सैकड़ों लोग हैं , जो निहायत ही गरीबी , उपेक्षा और तिरस्कार का दंश झेल रहे हैं और संविधान की कल्याणकारी राज्य की कल्पना पर प्रश्न चिह्न लगा रहे हैं |
अकबरपुर ज़िले की टांडा तहसील के ऐनवा बाजार से सटे लक्ष्मणपुर गाँव का रहने वाले शमशेर अली पुत्र जुम्मन की हालत गरीबी के चलते बुरी तरह दयनीय हो गयी है। काफ़ी समय से वे बीमार रहते हैं | शमशेर की बिगड़ती हालत के बाद पत्नी और बच्चों ने भी उनका साथ छोड दिया। मजबूर होकर शमशेर गरीबी व लाचारी की जिंदगी अकेले दम पर जीने को मजबूर है। शमशेर अली शुरू से ही स्वाभिमानी रहे हैं | वे मेहनत- मजदूरी करके अपना पेट भर लेते थे | इसी बीच उन पर विपत्ति आ गई | उन्हें चोट लग गई , जिसकी वजह से उन्हें अपना हाथ कटवाना पड़ा | अब वह दाने - दाने का मुहताज है | न उसके पास रहने को घर है और न खाने की कोई सामग्री ! ग्राम पंचायत भी उसकी कोई मदद नहीं कर रही है | उसके पास न तो राशन कार्ड है और न ही उसे पेंशन मिल रही है। बस भीख माँग कर वह किसी तरह अपनी जिन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ा रहा है।
शमशेर का आरोप है कि लेखपाल मंशाराम ने पेंशन व राशन कार्ड के नाम पर पैसा माँगा। पैसा देने में असमर्थ शमशेर अली ने कोटेदार हृदयराम यादव से गुहार लगाई , लेकिन दाने-दाने को मुहताज शमशेर की हालत पर वह भी नहीं पिघला। बीमारी से जूझ रहा शमशेर अली आखिर कहां जाये, उसके जीवन का क्या होगा, इस गरीब व लाचार के लिए सभी सरकारी योजनाएं बेमानी साबित हो रही हैं। जनसेवा का दम भरनेवाली स्वयं सेवी संस्थाएं शायद शमशेर के लिए बनी ही नहीं हैं और शायद यह भी सच है कि वे किसी की दया का पात्र नहीं हैं | किसी मुसलमान भाई - बहन ने भी उनकी सुध - ख़बर नहीं ली है | यह विषम स्थिति आख़िर किस तरह के समाज को प्रदर्शित करती है ? क्या यह स्थिति नहीं बदलनी चाहिए ?