Oct 14, 2016


मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप हरहाल में अस्वीकार्य

मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप हरहाल में अस्वीकार्य

ऑल इंडियन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और देश के कुछ दूसरे प्रमुख मुस्लिम संगठनों ने समान सिविल कोड पर विधि आयोग की प्रश्नावली का बहिष्कार करने का फैसला किया है | मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में इसे पक्षपातपूर्ण और बदनीयती पर निर्भर क़रार दिया है | बोर्ड ने कहा है कि विधि आयोग के सवाल ऐसे हैं , जिनका जवाब किसी भी विकल्प से दिए जाएंगे , तो वे समान सिविल कोड के पक्ष में ही जाएंगे | अतः इस प्रश्नावली का बहिष्कार किया जाएगा | विगत 13 अक्तूबर को दिल्ली के प्रेस क्लब में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुस्लिम संगठनों दावा किया कि यदि समान आचार संहिता को लागू कर दिया जाता है , तो यह सभी लोगों को एक रंगमें रंग देने जैसा होगा, जो देश के बहुलतावाद और विविधता के लिए खतरनाक होगा | पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव वली रहमानी, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी, ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के प्रमुख डॉ . मंजूर आलम, जमाअत इस्लामी हिंद के जनाब मुहम्मद जाफ़र, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य जनाब कमाल फारूकी और कुछ अन्य संगठनों के पदाधिकारियों ने तीन तलाक और समान आचार संहिता के मुद्दे पर सरकार को घेरा | एक साथ तीन तलाक के मुद्दे पर सरकार के रूख को खारिज करते हुए इन संगठनों ने दावा किया कि उनके समुदाय में अन्य समुदायों की तुलना में, खासतौर पर हिंदू समुदाय की तुलना में तलाक के मामले कहीं कम हैं | मौलाना वली रहमानी ने कहा कि बोर्ड और दूसरे मुस्लिम संगठन इन मुद्दों पर मुस्लिम समुदाय को जागरूक करने के लिए पूरे देश में अभियान चलाएंगे और इसकी शुरूआत लखनऊ से होगी | उन्होंने कहा, ‘‘विधि आयोग का कहना है कि समाज के निचले तबके के खिलाफ भेदभाव को दूर करने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है, जबकि यह हकीकत नहीं है | यह कोशिश पूरे देश को एक रंग में रंगने की है जो देश की बहुलतावाद और विविधता के लिए खतरनाक है |’’ मौलाना ने कहा कि ‘‘सरकार अपनी नाकामियों से लोगों का ध्यान भड़काने की कोशिश में है | मुझे यह कहना पड़ रहा है कि वह इस समुदाय के खिलाफ युद्ध छेड़ना चाहती है. हम उसकी कोशिश का पुरजोर विरोध करेंगे |’’बोर्ड के पदाधिकारियों यह माना कि पर्सनल लॉ में कुछ खामियांहैं , जिनको दूर किया जा रहा है |जमीयत प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने कहा, ‘‘देश के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं. सीमा पर तनाव है | निर्दोष लोगों की हत्याएं हो रही हैं | सरकार को समान सिविल कोड पर लोगों की राय लेने की बजाय, इन चुनौतियों पर ध्यान देना चाहिए |’’यह पूछे जाने पर कि मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने ही एक साथ तीन तलाक के मुद्दे पर पर्सनल लॉ बोर्ड के रूख का विरोध किया है , तो मौलाना रहमानी ने कहा कि लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात रखने का पूरा हक हासिल है | बोर्ड की महिला सदस्य मोहतरमा असमा ज़हरा ने कहा, ‘‘पर्सनल लॉ में किसी सुधार की जरूरत नहीं है | एक साथ तीन तलाक कोई बड़ा मुद्दा नहीं है और समान सिविल कोड थोपने की दिशा में सरकार का कदम लोगों की धार्मिक आजादी को छीनना है | यही वजह है कि हम लोग संघर्ष कर रहे हैं |’’ उल्लेखनीय है कि हाल ही में केंद्र सरकार ने एक साथ तीन तलाक और बहुविवाह के मुद्दे पर सुप्रीमकोर्ट में हलफनामा दायर कर बोर्ड के रूख का विरोध किया और कहा कि ये प्रथाएं इस्लाम में अनिवार्य नहीं हैं | विधि आयोग ने सात अक्टूबर को जनता से राय मांगी थी कि क्या तीन तलाक की प्रथा को खत्म किया जाए और देश में समान सिविल कोड लागू किया जाए | वास्तव में ये कोशिशें अनावश्यक और देश के संविधान के विरुद्ध हैं | इस सन्दर्भ में जमाअत इस्लामी हिन्द के अमीर [ अध्यक्ष ] मौलाना सैयद जलालुद्दीन उमरी के एक वक्तव्य को यहाँ उद्धरित करना समीचीन व आवश्यक होगा | मौलाना ने कहा है कि हमारे देश के संविधान ने प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म और आस्था पर अमल करने , प्रचार - प्रसार करने और इस बाबत संस्था बनाने और इसकी शिक्षा को आम करने का पूरा हक़ दिया है | धर्म की आज़ादी व्यक्तिगत आज़ादी के अंतर्गत आती है | संविधान में इसकी ज़मानत दी गई है और इसे व्यक्ति के मौलिक अधिकार से जोड़ा गया है | मौलाना ने कहा कि तलाक़ , बहु विवाह और अन्य शरई मामले विशुद्ध इस्लामी आदेश हैं | मुसलमान अपने धार्मिक मामलों में शरीअत [ जीवन - व्यवस्था ] पर अमल करने के पाबंद हैं | इन पर किसी भी तरह दूसरे क़ानून नहीं थोपे जा सकते | उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के दायरे में आने वाले क़ानून विशुद्ध रूप से धार्मिक क़ानून हैं | सरकार को इनका आदर करना चाहिए न किइन्हें खत्म करने की साजिश करनी चाहिए | उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार मुसलमानों को अन्य क़ौमों की जीवन - शैली अपनाने पर मजबूर नहीं कर सकती , बल्कि उसे तो यह देखना चाहिए कि प्रत्येक धर्म और धारणा वालों पर किसी प्रकार की ज़बरदस्ती तो नहीं की जा रही है और उन्हें पूर्ण आज़ादी प्राप्त हो रही है या नहीं , लेकिन इसके विपरीत सरकार इस कोशिश में लगी है कि देश समान सिविल कोड लागू कर दिया जाए | अमीरे जमाअत ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि जो लोग तीन तलाक़ या अन्य मामलों में मतभेद कर रहे हैं , उनकी संख्या आटे में नमक के बराबर है | वे देश के सभी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं , बल्कि 99 प्रतिशत मुसलमान शरीअत पर अमल करने और मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत अपने मामले हल करने के इच्छुक हैं | इसलिए देश के विभिन्न हिस्सों से आवाज़ें उठाई जा रही हैं | मौलाना ने कहा कि सरकार को व्यक्ति के धर्म और उसकी आस्था से कोई सरोकार नहीं होना चाहिए | मुसलमान कभी नहीं चाहेंगे कि उनकी मौत के बाद उन्हें दफ्न के बजाय आग के हवाले किया जाये | इसी प्रकार हिन्दू , सिख , ईसाई और धर्मों के अनुयायियों का हाल है | सरकार विभिन्न धर्मों के माननेवालों पर समान क़ानून नहीं लागू कर सकती | यह उनके निजी क़ानून में सीधा हस्तक्षेप है , जिसे वे किसी भी तरह से स्वीकार नहीं करेंगे | अमीरे जमाअत जो स्वयं सुख्यात धर्मवेत्ता हैं , ने कहा कि जमाअत इस्लामी हिन्द इस अहम मामले में पूरी तरह मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का समर्थन करती है | वह इसके साथ हर जगह खड़ी है | मुस्लिम पर्सनल लॉ ही भारत के सभी मुसलमानों की प्रतिनिधि - संस्था है | मौलाना ने कहा कि मुसलमानों की धारणा है कि क़ुरआन , हदीस और शरीअत में किसी भी तरह का बदलाव क़यामत तक संभव नहीं | किसी भी हीले - बहाने से इसमें परिवर्तन की गुंजाइश नहीं | इस्लाम एक पूर्ण जीवन - व्यवस्था है , जिससे जीवन का कोई भी विभाग और क्षेत्र अछूता नहीं है और यह हर प्रकार से दोषरहित व त्रुटिरहित है | उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि तीन तलाक़ , बहु विवाह और अन्य इस्लामी प्रतीकों के मामले में सभी मुस्लिम संगठन एकजुट हैं | उनमें किसी प्रकार का मतभेद नहीं है | जो लोग उनमें मतभेद पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं , उन्हें कदापि सफलता नहीं मिलेगी | मौलाना ने आगे कहा कि तीन तलाक़ के मामले को बेहतर तरीक़े से समझने की कोशिश नहीं की गई है , अपितु इसको उलझाने की कोशिश की जा रही है और बहु विवाह का मामला छेड़ कर मुसलमानों की छवि बिगाड़ी जा रही है और यह गलत बात फैलाई जा रही है कि मुसलमान महिलाओं के साथ ज़ुल्म - ज़्यादती कर रहे हैं | अमीरे जमाअत ने कहा कि सच्चाई यह है कि एक से अधिक शादियों का चलन मुसलमानों में न के बराबर है , बल्कि इसका धार्मिक आदेश नहीं दिया गया | हाँ , इसकी अनुमति केवल आवश्यकता के अंतर्गत है और इसे भी इस्लाम ने शर्त के साथ रखा है | कुछ महिलाओं को इसके ख़िलाफ़ उभार कर सरकार कुछ हासिल नहीं कर पाएगी |शरीअत के कानूनों में मुसलमान सीसा पिलाई दीवार की तरह हैं | इनकी एका को कमज़ोर करने की कोशिश करनेवालों के हाथ कुछ भी नहीं आएगा | समाज - सुधार के नाम पर समान सिविल कोड को लागू करने की कोशिश से देश में बिखराव पैदा हो जाएगा , जो देश के लिए ठीक नहीं है |मौलाना ने कहा कि चार शादियों के मामले में भी आम लोगों को गुमराह किया जा रहा है | अन्य मुस्लिम देशों के मुक़ाबले में भारत में यह नाममात्र है | अमीरे जमाअत ने तीन तलाक़ पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मुस्लिम समुदाय के अधिकतर आलिम और धर्मशास्त्री एक बार में दी गई तीन तलाकों को तीन ही मानते हैं , अगर मुसलमान मर्द यह कहे कि उसने तीन तलाक़ दी है | लेकिन अगर वह यह कहे कि उसकी मंशा एक ही तलाक़ देने की थी , तो उसे एक ही तलाक़ माना जाएगा | इस्लाम ने तलाक़ का जो तरीक़ा बताया है , उसके मुताबिक़ तीन तुहर [ तीन माह ] में एक - एक करके दी जानी चाहिए और इस दौरान पीटीआई जब चाहे रुजू कर सकता है | इद्दत के दौरान रुजू करने का उसे पूरा हक़ हासिल है | इस्लाम ने औरत को खुलअ का हक़ दिया है | अगर वह अपने पति से खुश नहीं है , तो वह मांग करेगी कि वह अपना मह्र वापस ले ले और उसे आज़ाद कर दे | अगर मर्द इस पर राज़ी न हो , तो वह क़ज़ा [अदालत ] का रुख कर सकती है और क़ाज़ी [ न्यायाधीश ] खुलअ लेने में उसकी मदद करेगा | मौलाना ने कहा कि ये मामले विशुद्ध रूप से धार्मिक हैं | ये हमारे व्यक्तिगत , पारिवारिक और दाम्पत्य जीवन से संबंधित मसले हैं | इनसे सरकार को कोई वास्ता नहीं रखना चाहिए | हम अपनी समस्याएं स्वयं हल करने में सक्षम हैं | इसमें किसी का भी हस्तक्षेप हरहाल में अस्वीकार्य है |