Nov 18, 2016

गले पड़ी नोटबंदी , भारी विरोध के बीच उठे कई सवाल

गले पड़ी नोटबंदी , भारी विरोध के बीच उठे कई सवाल
देश का नेशनल मीडिया मोदी सरकार के नोटबंदी के फ़ैसले का लगातार गुणगान करते हुए जन समस्याओं पर भी फोकस कर रहा है , फिर भी मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं , जबकि कई दिनों से बैकों और एटीएम से पैसे निकालने के लिए जिद्दोजहद कर रही जनता की लंबी कतारों और उनको हो रही परेशानी की गूंज पिछले दिनों संसद से सड़क तक गूंजी । संसद में यह मुद्दा बार - बार उठा | 8 नवंबर 2016 को पीएम मोदी की 500 और 1000 के नोट बंद करने की घोषणा के बाद से ही देशभर में हलचल मची हुई है। देश की जनता की परेशानी बढ़ी हुई है | नोट बंदी के विरोध में जहां पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी ने राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया , टीएमसी के अलावा शिवसेना, नेशनल कॉन्फ्रेंस और आम आदमी पार्टी के सांसद भी शामिल हुए I इन्होंने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात की और अपना विरोध जताया | ममता बनर्जी शुरू से ही मोदी सरकार द्वारा बड़े नोट बंद किए जाने का विरोध कर रही हैं और बढ़ - चढ़ कर बयान दे रही हैं I वहीं बसपा प्रमुख मायावती ने नोटबंदी के फैसले की जेपीसी से जांच कराने की मांग की है। मार्च से पहले संसद परिसर में गांधी मूर्ति के पास टीएमसी नेताओं ने काले शॉल ओढ़कर सरकार के फैसले के खिलाफ प्रदर्शन किया I सरकार के लिए उसके सहयोगी शिवसेना ने भी मुश्किलें खड़ी कर दी है I शिवसेना ने यूं तो विगत 14 नवंबर को एनडीए की बैठक में एकजुटता का भरोसा दिया था, लेकिन उद्धव ठाकरे को ममता बनर्जी के फोन के बाद शिवसेना ने ऐलान कर दिया कि नोटबंदी के खिलाफ विपक्षी मार्च में वह भी शामिल होगा | राज्यसभा में कांग्रेस के सांसद आनंद शर्मा ने कहा कि हम कालाधन और आतंकवाद के खिलाफ हैं। सरकार ने नोटबंदी का निर्णय गलत समय लिया इससे किसानों को और आम आदमी को बहुत दिक्कत हो रही है। नोटबंदी पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा यूनियनों को फैसला लीक किया गया। बैंक से कैश निकासी पर रोक क्यों है? नोटबंदी से बेटियों की शादियां तक रुकी हैं। गरीब की लाश अस्पतालों में फंसी है। भाजपा ने घाव दिए और घाव पर नमक भी लगाया। मजदूर, किसान नोटबंदी से बेकार हुए, क्या गाजीपुर की रैली का भुगतान क्रेडिट कार्ड से हुआ? स्टेट बैंक आफ इंडिया को मार्च से नोट बंद होने की जानकारी थी। आनंद शर्मा के सवालों पर भाजपा सांसद पीयूष गोयल ने कहा कि पूरा देश पीएम के फैसले का स्वागत कर रहा है। आनंद शर्मा का अर्थशास्त्र कमजोर है। पहली बार ईमानदारी को सम्मान और बेईमान को नुकसान हुआ है।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा में आपात सत्र के दौरान बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला बोला था और उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे एवं नोटबंदी वापस लेने की केंद्र से मांग करते हुए तीन दिनों का अल्टीमेटम दिया। केजरीवाल ने कहा था कि आदित्य बिरला ग्रुप के एक्‍जीक्‍यूटिव प्र‍ेसिडेंट के पास से बराबद 2012 के मैसेज से पता चला कि उसने गुजरात के मुख्यमंत्री को पैसे
दिए थे। केजरीवाल ने कहा, ‘आदित्य बिरला ग्रुप पर अक्टूबर 2013 में छापा पड़ा था। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने सभी कागजात ले लिए थे। ग्रुप के एक्‍जीक्‍यूटिव प्र‍ेसिडेंट शुभेंन्दु अमिताभ के लेपटॉप, ब्लैकबेरी को भी लिया गया था। उसमें एक एंट्री में लिखा था गुजरात सीएम 25 करोड़। गुजरात के मुख्यमंत्री के आगे 25 करोड़ और ब्रेकिट में 12 दिए और बाकी ? लिखा था। गुजरात के मुख्यमंत्री कौन थे उस वक्त….नरेंद्र मोदी जी 2012 में। केजरीवाल ने विधान सभा में आगे कहा था कि पहली बार कुर्सी पर बैठे किसी प्रधानमंत्री का नाम काले धन के किसी घोटाले में आया है। केजरीवाल ने यह भी कहा था कि पनामा घोटाले में मोदी जी के कितने दोस्‍तों के नाम थे, मगर कोई एक्‍शन नहीं लिया गया। 648 लोगों के स्विस बैंक अकाउंट नंबर तक लिखे हुए थे | मगर कार्रवाई इसलिए नहीं हुई क्‍योंकि इस लिस्‍ट के अंदर प्रधानमंत्री मोदी जी के दोस्‍त हैं।दस्‍तावेज सामने रखते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था, ‘आज मैं सबूत लेकर आया हूं। आयकर विभाग ने 15 अक्‍टूबर 2013 को आदित्‍य बिरला ग्रुप पर छापेमारी हुई। वापस आने के बाद इनकम टैक्‍स की अप्रेजल रिपोर्ट में बिरला ग्रुप के अकाउंटेंट ने कहा कि मैं हवाला का पैसा लेकर आता हूं। मेरे बॉस का नाम शुभेन्‍दु अमिताभ हैं। वे बिरला ग्रुप के एक्‍जीक्‍यूटिव प्र‍ेसिडेंट थे।कई विपक्षी पार्टियों ने मोदी सरकार पर इस फैसले को लेकर निशाना साधा | संसद से बाहर भी समर्थन और विरोध का दौर चल रहा है , जिसमें कुछ सनसनीखेज ख़ुलासे भी हो रहे हैं | राजस्थान के कोटा जिले के भाजपा विधायक भवानी सिंह राजावत ने कथित तौर पर कहा है कि अंबानी और अडानीको 500 और 1000 के नोट बंद किए जाने के बारे में पहले से पता था। गत16 नवंबर को इंटरनेट पर रिलीज किए गए एक वीडियो में भाजपा विधायक कथित तौर पर ऐसा कहते दिख रहे हैं। कथित वीडियो में कहा गया है, “अडानी, अंबानी अतराम-सतराम इन सब को पहले ही पता था। इनको हिंट दे दिया गया। उन्होंने अपना कर लिया।जब 'इंडियन एक्सप्रेस' ने भवानी सिंह से इस वीडियो की सत्यता के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि ये वीडियो कुछ पत्रकारों के संग उनकी अनौपचारिक बातचीतका है जिसे हेरफेर के साथपेश किया जा रहा है। भवानी सिंह ने कहा, “वीडियो में जैसा दिखाया जा रहा है | मैंने वैसा कुछ नहीं कहा।नोटबंदी के बाद जारी किए गए 2000 के नए नोट के बारे में इस वीडियो में कहा जा रहा है, “नए नोट थर्ड क्लास हैं। जाली जैसे लगते हैं।वीडियो में कथित तौर पर विधायक नरेंद्र मोदी सरकार के फैसले की आलोचना करते नजर आ रहे हैं। वीडियो में कहा जा रहा है, “पूरी करेंसी आप प्रिंट करते। देश की आबादी और उसके अनुपात में करेंसी प्रिंट करते, उसके बाद में आप एक साथ। अब पेट्रोल पंप की कीमतों की तरह आज 12 बजे 500 और 1000 के नोट बंद हो जाएगा।भवानी सिंह ने ' इंडियन एक्सप्रेस ' से बातचीत में ऐसा कुछ कहने से इन्कार करते हुए कहा, “कुछ पत्रकार मेरे कोटा स्थित आवास पर आए थे, क्योंकि मैं कुछ समय पहले अपने क्षेत्र के गाँवों में दौरे पर गया था। लेकिन उन्होंने अनैतिक रूप से मेरी अनौपचारिक बातचीत रिकॉर्ड कर ली।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवंबर को 500 और 1000 के नोटों को उसी दिन रात 12 बजे से बंद करने की घोषणा की थी। पुराने नोट 30 दिसंबर तक बैंकों में बदले या जमा कराए जा सकते हैं। बड़े नोटों के बंद होने से आम जनता को नकद पैसे की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में बैंकों और एटीएम के सामने लोगों की लंबी कतारे देखी जा रही हैं। आम लोगों को पैसे पाने के लिए को कई घंटों तक लाइन में लगना पड़ रहा है। उधर सरकार ने साफ़ कर दिया है कि नोटबंदी का फ़ैसला वापस नहीं लिया जायेगा और न ही जेपीसी गठित की जाएगी , लेकिन सरकार को यह ज़रूर करना चाहिए कि नोटबंदी के दुष्परिणामों से जनता को बचाए और एक हज़ार रूपये के नोटों को फिर चलन में लाने के साथ ही अन्य विकल्पों पर विचार करे |


पुलिस सुधार का सहज सवाल

पुलिस सुधार का सहज सवाल
भोपाल - मुठभेड़ के बाद एक बार फिर पुलिस की कार्यशैली विभिन्न सवालों के घेरे में है | हक़ीक़त यह है कि यह महत्वपूर्ण विभाग हमारे देश में सरकार का ग़ुलाम बना रहता है | अतः इसके नसीब में कभी नहीं था और है कि यह आज़ादाना काम करे | निष्पक्षता तो इसके बस की बात नहीं ! सत्तारूढ़ राजनेताओं का बल बनी पुलिस से न्याय और इन्साफ की कैसे आशा की जा सकती है ? यह तथ्य भी बार - बार उजागर हो चुका है कि राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण भी वे अपराध बढ़े हैं , जिन्हें पुलिस ख़ुद अंजाम देती और दिलवाती है |
भोपाल पुलिस द्वारा सिमी के आठ कथित आतंकवादियों को मुठभेड़ बताकर मार गिराने को इसी कारण के अंतर्गत माना जा रहा है | इस घटनाक्रम पर बहुतेरे सवाल पैदा हुए हैं |
दिल्ली पुलिस भी अब अपनी कार्रवाइयों से बदनाम है | उत्तर प्रदेश की पुलिस बरसों से जातीय रंग में रंगी हुई है | वहां आपराधिक भ्रष्टाचार के साथ जातिवाद का बोलबाला है | इस प्रदेश में भी पुलिस अपने आक़ाओं की ग़ुलाम है और वे सारे काम करती है , जो उसे कभी करना चाहिए | अखिलेश यादव के चहेते मंत्री राम मूर्ति सिंह वर्मा के इशारे पर तत्कालीन पुलिस कोतवाल श्रीप्रकाश राय ने अपने साथ चार पुलिसकर्मियों को शाहजहांपुर के पत्रकार जागेन्द्र सिंह को विगत एक जून 2015 को जिन्दा जला दिया , फिर भी इन सबको निलंबन की दिखावटी कार्रवाई के बाद साफ़ बचा लिया गया | पुलिस ने पूरे मामले को गलत ढंग से विवेचित कर दिया !
बिहार पुलिस भी बार - बार अपने निकम्मेपन को साबित कर चुकी है | वह आज के युग में भी जातीय आधार पर चूल्हा - चौके का इन्तिज़ाम करवाती है | इस अफ़सोसनाक सूरतेहाल में पुलिस की कार्यप्रणाली और विवेचना कैसी होगी , सभी को सहज ही समझ में आ सकती है | पुलिस की खराब कार्यप्रणाली और गलतकारी से पुलिस सुधार आयोग सदैव चिन्तित रहता है | उसका मानना है कि पुलिस का वर्तमान तौर - तरीक़ा संतोषजनक नहीं है |
पुलिस सुधार आयोग भी पुलिस तंत्र में सतत सुधार की सिफ़ारिशें करता रहता है , क्योंकि उसका मानना है कि पुलिस का वर्तमान तौर - तरीक़ा संतोषजनक नहीं है | पुलिस सुधार आयोग की सिफ़ारिशों में एक महत्वपूर्ण सिफ़ारिश थानों में पुलिस प्रशासन से अलग एक विवेचना इकाई की स्थापना है , ताकि मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई संभव हो सके | ऐसी सिफ़ारिश विवेचना अधिकारियों द्वारा दबाव में काम करने एवं इस प्रकार न्याय की जगह अन्याय का पैरोकार बनने की शिकायतों के कारण की गयी थी , जिस पर अभी तक अमल नहीं हो सका है |
सत्ता व पुलिस का जो गठजोड़ है , वह एक - दूसरे के मनोबल के प्रति इतना फिक्रमंद होता है कि आम नागरिक का मनोबल बरक़रार न रह सके | देखा जाता है कि इस पूरे मनोबल को बचाने में विवेचनाधिकारी लगा रहता है, जो सबूतों का अभाव खड़ा कर उन्हें बरी करवाने की कोशिश करता है | आजकल सीबीआई भी दबावों से मुक्त नहीं है | अल्पसंख्यकों के मामले में पुलिस की भूमिका क्या होती है ? हम इसे बार - बार देखते और भुगतते हैं | भोपाल में इसे हाल में एक बार फिर देखा गया | अब सारी निगाहें इस कथित मुठभेड़ की जाँच पर लगी हैं | इसकी जाँच भोपाल हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज एस . के . पाण्डेय कर रहे हैं |
देश में पुलिस द्वारा की गई फर्जी मुठभेड़ों की जांच चाहे वह यूपी के सोनभद्र में रनटोला कांड, जहां इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दो छात्रों को डकैत बताकर की गई हत्या का मामला हो या फिर उत्तराखंड के रणवीर हत्याकांड की हो इन सभी में विवेचनाधिकारी ने पुलिस अधीक्षक का नाम न लेकर उसे बचाने का कार्य किया है , जबकि सजा पाने वाले पुलिस कर्मियों ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि ऐसा उन्होंने एसपी के कहने पर किया था | निष्पक्ष विवेचना न्याय का आधार होती है| इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ कांड को कौन भूल सकता हैं, जिसमें राज्य के पुलिस अधिकारियों पर राज्य सरकार के संरक्षण में हत्या का आरोप है |
वहीं उत्तर प्रदेश में आतंकवाद के नाम पर फर्जी तरीके से गिरफ्तार किए गए तारिक-खालिद की गिरफ्तारी पर गठित निमेष कमीशन, गिरफ्तारी को संदिग्ध मानते हुए पुलिस के अधिकारियों को दोषी मानता है, वहीं इस मामले के विवेचनाधिकारी ने पुलिस की गिरफ्तारी को सही माना है| इसी तरह छत्तीसगढ़ में सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर डालने वाले पुलिस अधिकारियों में से एक एसपी अंकित गर्ग को राष्ट्रपति द्वारा स्वर्ण पदक से सम्मानित किया जाता है ! यह एक बड़ी विडंबना है | सर्वोच्च न्यायालय विवेचनाधिकारी को एक स्वंतंत्र जांच अधिकारी के बतौर कार्य करने की बात कहता है | पुलिस की कार्यशैली में आमूल सुधार की ज़रूरत है | भोपाल मुठभेड़ की सही ढंग से जाँच कराकर इसकी शुरूआत की जानी चाहिए |


काले धन के ख़िलाफ़ 9/11 ?


यह तरीक़ा प्रभावकारी नहीं !

विदेश से चाहे काला धन स्वदेश आए या न आए , पांच सौ और हज़ार रुपये के नोट 9 नवंबर से बंद कर दिए और दावा कर दिया गया कि यह काले धन के ख़िलाफ़ सर्जिकल स्ट्राइक व 9 / 11 है | अतः केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू का यह ट्वीट उचित ही कहा जाएगा कि ' भ्रष्टाचार और काले धन पर श्री नरेंद्र मोदी जी की सर्जिकल स्ट्राइक | भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ भारत की लड़ाई में साथ दें | ' वैसे यह फ़ैसला स्वागतयोग्य है , लेकिन पूर्व तैयारी और प्रबंध के पूरी जनता से बड़े नोटों को छीन लेना एवं उन्हें परेशानियों में डाल देना कतई सराहनीय नहीं है | अभी दस रूपये के सिक्कों को लेकर पूरे देश में बक - झक चल रही थी | इसी बीच बड़े नोटों पर सर्जिकल स्ट्राइक करके उन्हें एकबारगी नष्ट कर जनता को अनावश्यक परेशानी में डाला गया | यह काम जनता को कम 'आहत ' करके चरणबद्ध भी हो सकता था | सरकार को शायद यह वह्म और गुमान है कि इस क़दम से काला धन बाहर आकर ही रहेगा और भ्रष्टाचार का अंत हो जाएगा | सच्चाई यह है कि हमारे देश में काला धन सिर्फ पांच सौ और हज़ार रूपये के नोटों तक सीमित नहीं है | देश के काले धन का एक उल्लेखनीय हिस्सा विदेशी बैंकों और विदेशी संपत्तियों में लगा हुआ है | साथ ही स्वदेश में काला धन रियल इस्टेट , सोना , ज़मीन और अन्य बेनामी संपत्तियों में लगा हुआ है | इन वास्तविकताओं को देखते हुए कोई कैसे कह सकता है कि काला धन अब नष्ट होकर ही रहेगा ? हाँ , कुछ ऐसी रक़म का ज़रूर पता चलेगा , लेकिन काले धन के शातिर खिलाड़ियों पर बड़े नोटों को बंद कर देने से विशेष प्रभाव पड़ने से रहा ! डॉ . मनमोहन सिंह ने भी प्रधानमंत्री की हैसियत से 2005 से पूर्व के पांच सौ के नोटों को बंद किया था , लेकिन उनका यह काम चरणबद्ध था | यह प्रयोग एक नहीं दो बार हो चुका है। 16 जनवरी 1978 को मोरारजी देसाई सरकार ने 500, 1000, पांच हजार और 10 हजार के नोटों को बंद करने का काम किया था। लेकिन उसका क्या नतीजा निकला? क्या उससे भ्रष्टाचार रुक गया या फिर कालाधन खत्म हो गया ?
केंद्र सरकार विदेश से तो काला धन वापस नहीं ला पाई , देश के भीतर भी इस बाबत कुछ ठोस काम नहीं कर सकी है | इन्कम डिस्क्लोज़र स्कीम पहले ही बुरी तरह फ्लाप हो चुकी है | केंद्र सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने के लिए काले धन पर लगाम कसने के अपने वादे के तहत विदेशी खातों की जानकारी लेने के साथ ही देश के लोगों को 30 सितंबर 2016 तक अपनी अघोषित आय का ब्योरा देने का जो वक्त दिया था , उसका भी कोई उल्लेखनीय लाभ नहीं मिल पाया | केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना इन्कम डिस्क्लोज़र स्कीम (आईडीएस) बुरी तरह फ्लाप हो गय | अरबों रुपये का लेन-देन करने वाले लोगों का पता फर्जी पाया गया | छह लाख 90 हजार नोटिसें बैरंग वापस लौट आयीं | यह बड़ा खुलासा हुआ है कि बैंकों के जरिए बहुत बड़ी तादाद में काले धन का ट्रांजैक्शन हो रहा है | प्राइवेट बैंक इस दुष्कर्म में बढ़त लिए हुए हैं | नियम-कानून ताक पर रख कर देश के विभिन्न बैंक पैन नंबर दर्ज किए बगैर करोड़ों और अरबों रुपये का लेन-देन धड़ल्ले से कर रहे हैं | केंद्र सरकार को समझ में ही नहीं आ रहा है कि ऐसे में क्या किया जाए ! पैन नंबर दर्ज किए बगैर हुए करोड़ों और अरबों रुपये के सात लाख बड़े व सामूहिक लेन-देन (क्लस्टर ट्रांजैक्शन) से सम्बन्धित लोगों को जो नोटिसें भेजी गई थीं, उनमें से छह लाख 90 हजार नोटिसें एड्रेसी नॉट फाउंडलिख कर वापस आ गईं | इन बड़े ट्रांजैक्शंस में जो पते लिखाए गए थे, उन पतों पर कोई नहीं मिला | न नाम का पता चल पा रहा है, न पते पर कोई पाया जा रहा है और न उनके केवाईसी (नो योर कस्टमर) का ही कोई ओर-छोर मिल रहा है | 90 लाख बैंक लेन-देन (ट्रांजैक्शन) पैन नंबर के बगैर हुए, जिनमें 14 लाख बड़े (हाई वैल्यू) ट्रांजैक्शन हैं और सात लाख बड़े ट्रांजैक्शन हाई-रिस्कवाले हैं | इन्हीं सात लाख ट्रांजैक्शन के सिलसिले में नोटिसें जारी हुई थीं, जो लौट कर वापस आ गईं | दूसरी विदेशी काले धन की बात तक विस्मृत हो चुकी है | विदेशी खाताधारकों की पक्की जानकारी होने के वावजूद उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं जा रही है ! इस सब गंभीर मामलों पर गहरी ख़ामोशी है ! इस विषम स्थिति में नोटबंदी की घोषणा किसी राजनीतिक चाल जैसी है |


Nov 5, 2016

कब मिलेगी ब्याज से मुक्ति ?


कर्ज न चुका पाने पर साहूकारों ने कहा कि पत्नी और बेटी को हमें सौंप दो। इससे अनिल अग्रवाल को गहरा सदमा लगा और उनके पूरे परिवार ने ज़हर खाकर मौत को गले लगा लिया। यह मामला जालंधर [पंजाब] के भोगपुर थाने का का है। इस घटना से साफ पता चलता है कि पंजाब में गरीब लोगों का किस तरह साहूकार शोषण कर रहे हैं। सुसाइट नोट में 55 वर्षीय अनिल अग्रवाल ने लिखा है कि उनसे कुछ लोगों से ब्याज पर आधारित क़र्ज़ लिया था। मगर मूलधन पर ब्याज बढ़ता ही गया। पैसा देने वाले लोग कहते हैं कि वह पत्नी और बेटी को उठा ले जाएंगे, जिससे आहत होकर वह परिवार सहित जान दे रहा है। पुलिस ने घर से अनिल, पत्नी रजनी और 18 वर्षीय राशि और 23 वर्षीय बेटे अभिषेक का शव बरामद किया। सभी ने सल्फास का सेवन कर आत्महत्या की। मौके से सल्फास की शीशी और पानी की बोतल मिली।
हमारे देश में ब्याजमुक्त क़र्ज़ एक सपने की तरह है | हम आयेदिन ब्याज से विभिन्न प्रकार की हानियों को देख रहे हैं | ब्याज ने हमारे देश समेत दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को आहत कर रखा है , फिर भी इसके विरुद्ध कारगर आवाज़ का न उठ पाना बेहद अफ़सोसनाक है | इस्लाम में ब्याज की सभी सूरतें वर्जित हैं | यह बड़े गुनाह का काम है | यह माँ के साथ व्यभिचार के सदृश है | अतः इससे बचने के सभी प्रयास किये जाने चाहिए |
मानसिक तनाव और दबाव आत्महत्या के प्रमुख कारण हैं। सत्य है कि किसान अक्सर बैंकों से ऋण लेते हैं और उसकी अदायगी नहीं कर पाते , चक्र वृद्धि व्याज इसमें अति घातक भूमिका निभाता है | उनके लिए सरकार की भी ' कल्याणकारी राज्य ' की परिकल्पना साकार नहीं हो पाती | सरकार का अनुदारवादी चेहरा ही उन्हें अक्सर देखना पड़ता है | वे इस विषम परिस्थिति का मुक़ाबला नहीं कर पाते और कायरतापूर्ण क़दम उठा लेते हैं | निःसंदेह आज चहुंओर विकट स्थिति है | इतनी विकट कि कहा जाता है कि आज के दौर में शायद दुनिया में कोई ऐसा आदमी न होगा , जिसने अपने जीवन में कभी आत्महत्या करने के बारे मे न सोचा हो।
ऐसा भी होता है कि अनायास या सप्रयास वह बुरा वक्त गुजर जाता है और जिन्दगी फिर अपनी रप्तार से चल पड़ती है । सच यही है कि यदि वह समय गुजर जाये जिस समय व्यक्ति आत्मघात की ओर प्रवृत्त होता है , तो फिर वह आत्महत्या नहीं करेगा | कुछ कहते हैं कि आत्महती लम्बे समय से तनाव में था। महीने? दो महीने? छः महीने? मगर यह मुद्दत तो गुज़ारी जा सकती है | क्या बरसात के बाद सर्दी और सर्दी के बाद गर्मी की ऋतु नहीं आती ? क्या पतझड़ के बाद वसंत नहीं आता ? फिर जिन्दगी में हॅंसी - खुशी के दिन क्यो नहीं आ सकते हैं ? जिन्दगी हजार नेमत है |
वास्तव में जिन्दगी को जीना चाहिए | उसे जीना इन शब्दों में चाहिए कि उसे स्वाभाविक ज़िन्दगी मिले | ज़िन्दगी को निराशा से परे रखना चाहिए |. ठहरा हुआ तो पानी भी सड़ जाता है | अतः ज़िन्दगी में ठहराव अर्थात स्वांत नहीं आना चाहिए . ज़िन्दगी तो है ही चलने का नाम | ये जो गमो की स्याह रात है कितनी भी लम्बी हो कट ही जायेगी . फिर सुबह होगी, सूरज निकलेगा,फूल खिलेंगें, भौंरे गुनगुनायेंगें, पंछी चहचहायेंगें. फिर ज़िन्दगी में ही कैसे अन्धकार कैसे कायम रह सकता है ?
हमेशा सुबह की आशा रखनी चाहिए | लेकिन फिर सवाल यह आएगा कि यह संभव कैसे होगा , तो इसके लिए धार्मिकता को अपनाना ज़रूरी है | वह भी सच्ची धार्मिकता | जब कार्य ईश्वर के इच्छानुसार किये जाएंगे और उसे ही कार्यसाधक भी माना जाएगा , तो ज़िन्दगी में निराशा , चिंता . कुंठा और हतोत्साह का आना असंभव है | दिल में सरलता और निर्मलता आ जाएगी . चिन्तन सकारात्मक होगा |


Nov 3, 2016

भोपाल मुठभेड़ सवालों के घेरे में

भोपाल मुठभेड़ सवालों के घेरे में


मध्य प्रदेश की भोपाल सेन्ट्रल जेल से फ़रार हुए प्रतिबंधित संगठन सिमी के आठ आरोपियों को पिछले दिनों 31 अक्तूबर 2016 को पुलिस के एक विशेष आपरेशन में भोपाल से लगभग 10 किमी दूर गुनगा थाना क्षेत्र में मौत के घात उतार कर वाहवाही लूटी गई | भोपाल पुलिस के अनुसार , दीवाली की रात लगभग दो बजे सिमी के ये आरोपी रमा शंकर यादव नामक एक पुलिसकर्मी की हत्या कर फ़रार हो गए थे | इन आतंकियों की तलाश करने के लिए पुलिस ने एक विशेष अभियान चलाया था | इस मुठभेड़ पर कई तरह के सवालिया निशान लगे हैं , जो पहले से ही बदनाम चल रही पुलिस के दाग को गहराती ही है | कांग्रेस , माकपा , आप, बसपा , जद [ यू ] , राजद , जमीअत उलमा - ए हिन्द , जमाअत इस्लामी हिन्द और एम आई एम आदि के नेताओं ने इस मुठभेड़ पर चिंता प्रकट करते हुए कुछ सवाल खड़े किए हैं | वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कमलनाथ ने कहा कि सिमी कार्यकर्ता अत्यंत सुरक्षा वाली जेल से भाग गए और कुछ घंटे के अंदर उन्हें न केवल खोज लिया गया , बल्कि एनकाउंटर कर दिया गया | अब उनसे पूछताछ नहीं की जा सकती, कोई सबूत नहीं है, उनके बयान रिकॉर्ड नहीं किए जा सकते | उन्होंने कहा, 'मैं न्यायिक जांच की मांग कर रहा हूं | सरकार को भी पता चलना चाहिए कि वे किन परिस्थितियों में भागे | ' साथ ही राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भी जांच की मांग की है | उन्होंने मुठभेड़ पर सवाल उठाते हुए कहा कि क़ैदी जेल से भागे या भगाए गए? दिग्विजय सिंह ने सिमी और बजरंग दल की तुलना करते हुए कहा कि दोनों की संगठन शांति भंग करने का काम करते हैं। इन दोनों ही संगठनों पर बैन लगाने की सिफारिश मैंने तब एनडीए सरकार से की थी, लेकिन अब तक केवल सिमी पर ही बैन लग पाया है। उन्होंने यह भी सवाल किया कि हमेशा मुस्लिम क़ैदी ही जेल तोड़कर क्यों भागते हैं ? कांग्रेस के एक और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी मुठभेड़ पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, इस तरह की घटना खंडवा में भी थी। उन्होंने कहा कि आश्चर्य की बात है कि बार - बार ऐसी घटनाएं मध्य प्रदेश में ही क्यों हो रही है?मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता प्रकाश करात ने इस घटना की निंदा की है और मुठभेड़ को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया है | जबकि उन्हीं की पार्टी की नेता वृंदा करात ने पुलिस मुठभेड़ में आठ सिमी कार्यकर्ताओं की हत्या की न्यायिक जांच की मांग की है। माकपा की पोलित ब्यूरो की सदस्य ने कहा, “सरकार की ओर से दिया गया बयान संदिग्ध है और अपने ही पूर्व बयानों से विरोधाभासी है।उन्होंने आगे कहा, “इसलिए सच्चाई का पता लगाने के लिए यह बेहद जरूरी है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के अधीन इसकी स्वतंत्र जांच करवाई जाए। सरकार के इस मनगढ़ंत बयान पर कोई भी विश्वास नहीं कर सकता।वृंदा करात ने कहा, “मारे गए सभी आतंकवादियों के खिलाफ अभी अदालत में मामला चल ही रहा था और उन्हें सिमी का आतंकवादी कहना और इस तरह मार देना कानून का उल्लंघन है।बसपा प्रमुख मायावतीने इस पूरे मामले की न्यायिक जाँच कराने की मांग की है | जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने कहा कि भोपाल में जिन लोगों को तथाकथित एनकाउंटर में मार डाला गया, वे अंडर ट्रायल थे। कोर्ट ने आतंकी नहीं माना था। देश में कानून का राज है। किसी को सजा देने का अधिकार कोर्ट काे है। यह काम न्यायपालिका के माध्यम से ही होना चाहिए। सजा तय करने वाले हम, आप या सरकार कौन होती है। अभी तो यह तय भी नहीं हुआ था कि जिन्हें मारा गया है, वे आतंकी ही थे। राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने कहा कि भोपाल के केंद्रीय कारागार से भागे सिमी के आठ क़ैदियों के साथ मुठभेड़ फेक है या सच, इस पर संदेह है। इस घटना की पूरी जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा के मामले में केंद्र सरकार पूरी तरह फेल हो चुकी है। कहां है 56 इंच का सीना, दिख नहीं रहा है। पाकिस्तान की सीमा पर रोज सैनिक शहीद हो रहे हैं। केंद्र सरकार का कोई कंट्रोल नहीं रह गया है। जमीअत उलमा - ए हिन्द के अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी ने सिमी कार्यकर्ताओं को मारे जाने की कड़ी निंदा की है और सुप्रीमकोर्ट से अनुरोध किया है कि वह इस कथित मुठभेड़ की जाँच के लिए संज्ञान ले | उन्होंने कहा कि इस मामले की जाँच के लिए अदालत की निगरानी में एक एस आई टी का गठन किया जाए , ताकि देश भर की जनता विशेषकर मुसलमानों में फैली बेचैनी को दूर किया जा सके | इस मुठभेड़ की वीडियो वायरल हो जाने के बाद संदेह के बादल घने हो गए हैं | देश के शीर्ष मुस्लिम संगठन जमाअत इस्लामी हिन्द के महासचिव जनाब मुहम्मद सलीम इंजीनियर ने सिमी कार्यकर्ताओं के मारे जाने पर गहरी चिंता प्रकट की है | उन्होंने अपने बयान में कहा कि आठ विचाराधीन क़ैदियों को भोपाल के निकट पुलिस द्वारा मौत के घाट उतारने की घटना बहुत मर्माहत करनेवाली है | कुछ मीडिया रिपोर्टों में इस मुठभेड़ को फेक बताया गया है और ढेर सारे सवाल खड़े किये गए हैं , जैसे मध्यप्रदेश की सर्वाधिक सुरक्षित जेल की तीस फिट से अधिक ऊंची दीवाल पर आरोपी कैसे चढ़ गये ? उनके पास हथियार खान से आए ? क़ैदी हथियार लिए थे या नहीं , इस सिलसिले में अधिकारियों के विरोधभासी बयान हैं | आरोपियों को नए कपड़े , घड़ियाँ और बैंड कैसे प्राप्त हुए ? यदि उनके पास हथियार प्राप्त करने के माध्यम थे , तो वे भागने के लिए वाहन क्यों नहीं पा सके ? जेल में सीसीटीवी कैमरे क्यों नहीं काम कर रहे थे ? आरोपी जेल से आने के आठ घंटे बाद तितर - बितर क्यों नहीं हुए और भोपाल से आगे क्यों नहीं बढ़ सके ?
जमाअत के महासचिव महोदय ने कहा कि आरोपियों के वकील के अनुसार आरोपियों के ख़िलाफ़ मामले काफ़ी कमज़ोर थे और उनकी जल्द रिहाई की अधिक संभावना थी | फिर उनका जेल से भागने का क्या औचित्य था ? अतः यह घटना खालिद मुजाहिद , क़तील सिद्दीकी और मुहम्मद वक्कास जैसे लोगों की हिरासत में मौत जैसी है | जनाब मुहम्मद सलीम इंजीनियर ने इस पूरे घटनाक्रम की सुप्रीमकोर्ट की निगरानी में उच्च स्तरीय जाँच की मांग की , ताकि सही तथ्य सामने आ सके | एआइएमआइएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भोपाल सेंट्रल जेल से सिमी सदस्यों के भागने और बाद में पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश के गृह मंत्री और पुलिस के बयान किसी भी तर्कसंगत व्यक्ति के गले नहीं उतर सकते। सुप्रीम कोर्ट के जज की अगुआई में इसका सच सामने आना चाहिए। हैदराबाद से सांसद ओवैसी ने पूरी घटना को बेहद चौंकाने वाला बताया। उन्होंने कहा कि यह हैरान करने वाला है कि जेल से भागते हुए इन विचाराधीन कैदियों ने पूरे कपड़े, जूते, घडि़यां और कलाई पर बैंड पहने हुए थे। साथ ही उनकी पैंट में बेल्ट भी लगी थी। विचाराधीन कैदियों को ये सब चीज़ें नहीं दी जाती हैं। जांच में ही पता चल सकता है कि उनके पास ये वस्तुएं कहां से आई। ओवैसी ने कहा कि अगर जेल के सीसीटीवी कैमरे काम नहीं कर रहे थे तो ये चिंता की बात है. ऐसा कैसे हो सकता है? उन्होंने सवाल उठाए कि कुछ अन्य आतंकी घटनाओं के हिंदू अभियुक्त भी इसी इलाके से हैं और उन्हें पुलिस अभी तक पकड़ नहीं पाई है | दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी सिमी के आठ सदस्यों के भोपाल में कथित मुठभेड़ में मारे जाने की घटना कीसुप्रीमकोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की है | उन्होंने ट्विटर पर कहा,‘‘यह बहुत गंभीर है। हम सुप्रीमकोर्ट की निगरानी वाली एक जांच की मांग करते हैं।’’ आम आदमी पार्टी की विधायक अलका लांबा ने भी ट्वीट करके लिखा, ‘आतंकी मारे गये, अच्छा हुआ। 8 आतंकियों का एक साथ भागना, फिर कुछ घंटों बाद एक ही साथ एनकाउंटर में मारे जाना। सरकार के पास व्यापमफार्मूला भी था | 'मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव ने ये सात सवाल उठाए - 1 . जब केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर पूरे देश में हाई अलर्ट रखे जाने की बात कही गयी थी, जिसमें दीपावली पर्व को लेकर स्पष्ट निर्देश थे तब राज्य सरकार ने उन निर्देशों की अनदेखी क्यों, किसलिए और किसके निर्देश पर की? 2 . जेल मैन्युअल के अनुसार किसी भी जेल में आठ से अधिक दुर्दांत अपराधियों को नहीं रखा जाना चाहिए, तो राजधानी की जेल में एक साथ 35 क़ैदियों को क्यों रखा गया? 3 . कुछ वर्षों पूर्व सिमी कार्यकर्ताओं के खंडवा जेल से फ़रार हो जाने की घटना से भी सरकार ने सबक़ क्यों नही लिया? 4 . हाई अलर्ट के दौरान 35 क़ैदियों को रखे जाने वाली जेल की सुरक्षा मात्र दो सिपाहियों के भरोसे क्यों, कैसे और किसलिए रखी गई ? 5 . जेल से फ़रार होने के बाद क़ैदियों ने 8 से 9 घंटे तक भोपाल के ही नज़दीक रहने का निश्चय क्यों किया? प्रदेश की सीमा से बाहर भागने के लिए 8 से 9 घंटे पूर्णतः पर्याप्त होते हैं | 6 . फ़रार हुए लोगों को आधुनिकतम हथियार कहाँ से और किससे प्राप्त हुए ? आईजी भोपाल का यह बयान कई रहस्य और आशंकाओं को जन्म दे रहा है | 7 . इस घटना और गहरे षड्यंत्र के नेपथ्य में कौन - कौन सी आंतरिक शक्तियां शामिल हैं ? सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने सिमी कार्यकर्ताओं के एनकाउंटर पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं | उन्होंने इस एनकाउंटर को फर्जी करार दिया है और अपने फेसबुक पोस्ट में संदिग्ध आतंकियों को मुठभेड़ में मारने का कड़ा विरोध किया है | जस्टिस काटजू ने लिखा, "जहां तक मुझे जानकारी मिली है, भोपाल में हुआ कथित एनकाउंटर फर्जी है | जो भी इसके लिए जिम्मेदार है, न केवल वे जिन्होंने इसे अंजाम दिया, बल्कि इस मुठभेड़ का आदेश देने वाले वरिष्ठ पुलिस अफसरों और नेताओं को फांसी की सजा मिलनी चाहिए | मेरी बेंच ने प्रकाश कदम और रामप्रसाद विश्वनाथ गुप्ता केस में ऐसा ही कदम उठाया था |" इस मुठभेड़ के बाद सोशल मीडिया पर कई वीडियो अपलोड किए गए हैं, जिनमें दावा किया गया कि ये वीडियो सिमी सदस्यों के साथ हुई मुठभेड़ के हैं। इन वीडियो की सत्यता की अभी तक पुष्टि नहीं हो सकी है , लेकिन यदि ये वीडियो सही हैं तो इनसे मध्य प्रदेश पुलिस के दावों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। ऐसे एक वीडियो में पांच कैदी हाथ उठाकर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने की कोशिश करते दिख रहे हैं, लेकिन बाद में इन सभी को मुठभेड़ में मारा गया बताया गया। ऐसे ही एक दूसरे वीडियो में एक घायल कैदी को एक पुलिसवाला गोली मारता दिख रहा है। ऐसे ही एक तीसरे वीडियो जिसके कथित तौर पर किसी ग्रामीण ने बनाया है, एक पुलिसवाला एक कैदी के शव पर गोली चलाता दिख रहा है। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तेवारी ने कहा, ‘‘कथित तौर पर जेल से भागने को लेकर सामने आए तथ्यों और परिस्थितियों से कई सवाल उठते हैं। जेल से भागे आठों सदस्यों का पुलिस मुठभेड़ में मारा जाना कई प्रासंगिक सवाल खड़े करता है कि उन्हें गोलीबारी में मारा गया या उनके पास भी हथियार थे।’’ उन्होंने कहा कि कई समाचार चैनलों और सोशल मीडिया पर छाए इस वीडियो में एक पुलिसकर्मी सिमी के कथित सदस्य पर गोली चला रहा है। वहीं एक अन्य पुलिसकर्मी मरे पड़े एक सिमी सदस्य की जेब से चाकू निकाल रहा है। वीडियो में दिखाए गए घटनास्थल पर सिमी के ये संदिग्ध सदस्य मृत अवस्था में जमीन पर पड़े दिखाई दे रहे हैं। तिवारी ने कहा, ‘‘तथाकथित वीडियो में दिखाई दे रहा है कि पुलिस ने जैसा दावा किया है एनकाउंटर उस तरह का नहीं है। यह फर्जी एनकाउंटर प्रतीत हो रहा है। इसलिए इस पूरे मामले की जांच केंद्र और राज्य दोनों सरकारों से स्वतंत्र रूप से सुप्रीमकोर्ट के किसी मौजूदा न्यायाधीश के अधीन कराई जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके।’’ सभी कैदियों के मारे जाने के बाद मीडिया में जो तस्वीरें सामने आईं उनमें वे घड़ी, जूते और बेल्ट पहने दिख रहे हैं। एआईएमआईएम के प्रमुख ने यही सवाल प्रखर रूप में उठाया किडेड बॉडी देखकर पता लगता है कि जेल से भागे कैदियों ने जूते, घड़ी और बेल्ट जैसी चीजें पहनी हुई हैं। वहीं, जब किसी भी आरोपी का ट्रायल होता है तो उसे जेल में ऐसी चीजें पहनने की इजाजत नहीं होती है। उन्होंने कहा कि यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि जेल से फरार हुए इन लोगों ने ऐसे सामान पहने हुए थे जो उन्हें जेल में नहीं मिलते।ओवैसी के इस सवाल को कोई भी यूं नहीं खारिज कर सकता। जेल और अदालती कार्यवाही से परिचित लोग जानते हैं कि जब कैदियों पर मुकदमा चल रहा हो उन्हें जेल में ये चीजें पहनने की इजाज़त नहीं होती। मध्य प्रदेश पुलिस और राज्य के गृह मंत्री ने दावा किया कि सभी कैदी जेल में खाने के लिए मिलनेवाली प्लेटों और चम्मचों के सुरक्षा गार्ड का गला काटकर फरार हो गए। अभी तक पुलिस ने इस बात का जवाब नहीं दिया है कि मारे गए कैदियों के पास कोई हथियार था या नहीं। अगर कैदियों के पास जेल से भागते समय केवल प्लेट और चम्मच थीं , तो कुछ ही घंटे में 10-15 किलोमीटर के दायरे में उन्होंने पुलिस पर हमला कैसे किया होगा? पुलिस के मुठभेड़ के दावे पर सबसे ठोस सवाल यही है कि जेल से भागने के करीब सात-आठ घंटे बाद सभी कैदी महज 15 किलोमीटर दूर एक ही वक्त एक जगह क्यों मौजूद थे? सभी कैदियों को पता रहा होगा कि पुलिस और खुफिया एजेंसियां उनके पीछे पड़ी होगी और एक साथ रहने से वो आसानी से पहचाने और पकड़े जा सकते थे। फिर वो एक ही वक्त पर एक ही जगह मौजूद रहे! भोपाल सेंट्रल जेल को राज्य की सबसे सुरक्षित जेल मानी जाती है और वहां चौबीसों घंटे इलेक्ट्रॉनिक निगरानी की व्यवस्था है। फरार कैदियों पर आतंकवादी गतिविधियों, राजद्रोह और डकैती के आरोपों में मुकदमे चल रहे थे। उन पर ऐसे संगठन का सदस्य होने का आरोप था जो बरसों से प्रतिबंधित है। ऐसे में ये कैदी भागने की योजना बनाने और उसे अंजाम देने में कैसे कामयाब हो गए? मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कैदी चादरों से रस्सी का काम लेकर दीवार पर चढ़ गए और जेल से भाग गए। कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने सवाल उठाया है कि मध्य प्रदेश की जेलों से केवल सिमी के सदस्य होने के आरोपी ही जेल से क्यों फरार होते हैं? सिंह ने 2013 में राज्य की खंडवा जेल से फरार होने की याद दिलाते हुए मामले पर शंका जाहिर की। खंडवा जेल से फरार चारों सिमी सदस्यों को 2016 में ओडिशा से गिरफ्तार किया गया था। मध्य प्रदेश सरकार ने इस मामले की जाँच एन आई ए को सौंपी है | पांच जेल अधिकारियों का निलंबन हुआ है | प्रदेश के गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह ने मुठभेड़ पर शक जाहिर करने वालों को आड़े हाथों लिया है | उन्होंने कहा कि तारीफ नहीं तो कम से कम आलोचना तो न करें | मध्य प्रदेश सरकार का दावा है कि जेल में कैद ये आतंकी फरार होने के बाद एनकाउंटर में ढेर कर दिए गए , लेकिन मध्य प्रदेश की सरकार को एनकाउंटर पर उठ रहे सवालों के जवाब भी देने चाहिए | वैसे अब यह मुक़दमा आरंभिक तौर पर भोपाल हाईकोर्ट में चलेगा |